Posts tagged ‘kavita’

अप्रैल 8, 2016

कविता में भाषा का इस्तेमाल कैसा हो – राजेश जोशी

कवि, चाँद और बिल्लियाँ

मन के एक टुकड़े से चांद बनाया गया
और दूसरे से बिल्लियाँ

मन की ही तरह उनके भी हिस्से में आया भटकना
अव्वल तो वे पालतू बनती नहीं और बन जाएं
तो भरोसे के लायक नहीं होतीं
उनके पांव की आवाज़ नहीं होती
हरी चालाकी से बनाई गयीं उनकी आंखें
अंधेरे में चमकती हैं
चांद के भ्रम में वो भगोनी में रखा दूध पी जाती हैं

मन के एक हिस्से से चांद बनाया गया
और दूसरे से बिल्लियाँ
चांद के हिस्से में अमरता आई
और बिल्लियों के हिस्से में मृत्यु
इसलिए चांद से गप्प लड़ाते कवि का
उन्होंने अक्सर रास्ता काटा
इस तरह कविता में संशय का जन्म हुआ

वो अपने सद्य: जात बच्चे को अपने दांतों के बीच
इतने हौले से पकड़कर एक जगह से
दूसरी जगह ले जाती हैं

कवि को जैसे भाषा को बरतने का सूत्र
समझा रही हों।

(राजेश जोशी)

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फ़रवरी 9, 2015

प्यारे बच्चों…

प्यारे बच्चो, हम तुम्हारे काम नहीं आ सके । तुम चाहते थे हमारा क़ीमती
समय तुम्हारे खेलों में व्यतीत हो । तुम चाहते थे हम तुम्हें अपने खेलों
में शरीक करें । तुम चाहते थे हम तुम्हारी तरह मासूम हो जाएँ ।

प्यारे बच्चो, हमने ही तुम्हें बताया था जीवन एक युद्धस्थल है जहाँ
लड़ते ही रहना होता है । हम ही थे जिन्होंने हथियार पैने किये । हमने
ही छेड़ा युद्ध हम ही थे जो क्रोध और घृणा से बौखलाए थे । प्यारे
बच्चो, हमने तुमसे झूठ कहा था ।

यह एक लम्बी रात है । एक सुरंग की तरह । यहाँ से हम देख सकते
हैं बाहर का एक अस्पष्ट दृश्य । हम देखते हैं मारकाट और विलाप ।

बच्चो, हमने ही तुम्हें वहाँ भेजा था । हमें माफ़ कर दो । हमने झूठ कहा
था कि जीवन एक युद्धस्थल है ।

प्यारे बच्चो, जीवन एक उत्सव है जिसमें तुम हँसी की तरह फैले हो ।
जीवन एक हरा पेड़ है जिस पर तुम चिड़ियों की तरह फड़फड़ाते हो ।

जैसा कि कुछ कवियों ने कहा है जीवन एक उछलती गेंद है और
तुम उसके चारों ओर एकत्र चंचल पैरों की तरह हो ।

प्यारे बच्चो, अगर ऐसा नहीं है तो होना चाहिए ।

(मंगरेश डबराल)

फ़रवरी 1, 2014

जीवन रस की हर बूँद पी लेना : संत सिद्धार्थ

जीवन हमें मिलता है तो इसलिए नहीं कि हम मौत के साये में जीकर जीवन के पलों को व्यर्थ कर दें या मौत का इन्तजार करें कि एक दिन वह आयेगी इसलिए उसे रोकने के साधन जुटा लें| मौत आनी है एक दिन यह बोध होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक इसलिए है कि एक दिन मौत आकर जीवन को अपने साथ ले जायेगी इसलिए जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना बेहद जरूरी है| मौत के सत्य का बोध इसलिए नहीं कि उसके आने के भय में जीवन को बच बच कर जीने लगें, जो करना चाहते हैं उसे कल पर टालने लगें|

जीवन के हर पल को सघनता से जीना, हर पल को जीने में अपने अंतस के गहनतम तल तक की उर्जा लगा देना तभी पूर्णता की अनुभूति होगी और किसी भी बात में अटकने से बच जाओगे| जीवन का हरेक पल का एकमात्र लक्ष्य है मनुष्य को अनुभूति देकर उसके पार पहुंचाना|

ऊर्जा को बचाने वाले कंजूस का जीवन मत जीना, न ही पलों को संजोकर रखने वाले जमाखोर का जीवन जीना| कुछ अच्छा करने की इच्छा बलवती हो जाए तो उसे कर गुजरना क्योंकि केवल करने से ही उसे समझ पाओगे, उसके पार हो पाओगे अगर दमन करते रहोगे, कल परसों पर बात को टालते रहोगे तो चेतनता पर इच्छाओं का बोझ लदता चला जाएगा और जब जाने का मौक़ा आएगा तो उस समय बेहद दरिद्र जीवन जीकर मौत के चंगुल में जाने का भाव सारे जीवन की व्यर्थता की पीड़ा को और घनीभूत कर देगा| जब जाना हो तो इच्छाओं की स्लेट एकदम कोरी हो, यही शर्त है श्रेष्ठ तरीके से जीवन जीने की|

तुम्हे पहाओं पर चढ़ना है, तैरना सीखना है, गीत गाना सीखना है, वाद्ययंत्र बजाने सीखने हैं, चित्रकला सीखनी है, मूर्ति बनाना सीखना है, कोई खेल विशेष खेलना है, कहीं यात्रा पर जाना है, विभिन्न स्थान देखने हैं,एक कविता,कहानी,उपन्यास, या किताब लिखनी है, या कुछ भी सीखना है, तो ऐसी सब इच्छाओं की पूर्ती करने के प्रयास ही एकमात्र रास्ता  है| इन्हें टालना मत क्योंकि नहीं पता कि फिर इन रास्तों से गुजरने का मौक़ा मिले न मिले| मौत जब दस्तक दे तो उसके सामने गिडगिडाने की जरुरत न पड़े कि अभी तो यह रह गया था वह रह गया था करने से|

मौत हमारे हाथ की बात नहीं पर जीवन कैसे जियें यह पूरी तरह से हमारे वश में है| बच्चों को देखते हो कैसे जो वे करना चाहते हैं उसे करने में पूरी तल्लीनता से मगन हो जाते हैं बस वही तो कुंजी है जीवन जीने की जिसे बड़े होते होते सब लोग कहीं खो देते हैं और फिर जीवन भर दुख से भरे रहते हैं कि यह नहीं कर पा रहे, वह नहीं कर पा रहे| नौकरी और व्यवसाय के कारण सब छुटा जा रहा है, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ छुटा जा रहा है| जब करने की इच्छा सच्ची हो तो उसे करने का वक्त भी निकल जाता है| हो सकता है गले गले तक जिम्मेदारियों में डूबे हुए हो पर तब भी समय और ऊर्जा निकालना उन कामों को करने के लिए जिन्हें करना चाहते हो केवल अपने लिए, अपने अंतर्मन को आनंद पहुंचाने के लिए|

जरूरी नहीं कि हर काम में औरों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए प्रयास किये जाएँ और जब तक ऐसा न लगे कि अच्छा स्तर पा लिया है तब तक काम शुरू न किया जाए| बहुत बार ऐसा होता है कि सपने पाल लिए जाते हैं कि अगर ऐसा न करके वैसा करते जो जीवन कुछ और ही होता| जिस मार्ग को चुनना चाहते थे उस पर अब चलना शुरू करके देखो| ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की देखादेखी उस मार्ग पर चलने की इच्छा बलवती हुयी थी| अपने मन की सच्ची संतुष्टि और आनंद के लिए कामों को करो| जीवन में ऐसा हल्का महसूस करने लगोगे जैसा पहले कभी नहीं किया| बोझ हटाओ उन सब बातों का जिनका दमन किया है, या जिन्हें कर नहीं पाए हो| जितना संभव हो उन्हें करने का प्रयास करो|

जीवन को जी लोगे तो मौत के भय का कोई अर्थ नहीं रह जाता वह अटल सत्य की तरह आयेगी पर तब वह तुम्हारी दमित इच्छाओं को साथ नहीं लेकर जायेगी|

जाते समय कोरे कोरे जाओ इससे बेहतर योगदान धरती पर तुम नहीं दे नहीं सकते|

सारे अध्यात्मिक संदेशों में महत्वपूर्ण है यह बात कि – जीवन को जियो!

नवम्बर 19, 2013

मेरे दिल में कितनी गहरी खाई खोद गईं तुम!

मेरे तुम्हारे बीच के फासलों पेmansnow-001
बर्फ की एक चादर बिछी है!
दूरियां पहले भी इतनी ही थीं
लम्बी अब महसूस होती हैं
बीच के ठंडेपन से शायद!
हमारे मध्य
बर्फीले द्वीप तो पहले भी थे,
पर तब मेरे तुम्हारे मध्य की दूरी
पिघल जाती थी
मेरी तुम्हारी गर्म साँसों से
तुम्हारे दिल में उठते
नीम गर्म अहसासों से
मौन कविताएं समेटे,
सतरंगी सपनों की चादर ताने|
बसंत जैसे फूल उठता था चारों ओर
बसंत!
ओह…बसंत…,
याद नहीं कब था पिछली बार
इस पतझड़ से पहले का बसंत
बहुत चाहा कि तेरी बातों से
बहला लूँ खुद को
खींच लूँ साए तेरी यादों के खुद पे…
लेकिन…
कमबख्त अब तो वो भी मुकरने लगे हैं
जैसे अब तुम
सपनो में भी आने से
कतराने लगी हो…
पास आकर फिसल जाने लगी हो…
कुछ होता नहीं फिर भी कुछ तो होता है
जिसके न होने का अहसास रहा करता है
जैसे कुछ था जो नहीं है अब
चारों तरफ से सब कुछ
बस उस खालीपन
की तरफ बह रहा है
भरने को इसे
मगर…
कितने गहरे से निकल कर गयी हो तुम?
(रजनीश)
नवम्बर 13, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1) से आगे…

देखिये कामना जी आप इसे मेरे द्वारा आपका मजाक उड़ाने की चेष्टा के रुप में न लें अतः यहाँ सीधे-सीधे रुप में जोड़ना चाहता हूँ यौन- शिक्षा के मुद्दे को, जो कि सम-सामायिक मसला है और आपकी कहानियों की नायिकाओं के शारीरिक सम्बंधों को लेकर दृष्टिकोण से सीधे-सीधे सम्बंध रखता है।

अनिल जी, यौन शिक्षा एक अलग मामला है। उन्होने आँखें तरेर कर गुस्से से कहा।

पर फिर भी किशोर लड़कियाँ तो शिक्षा लेंगी ही आपकी कहानियों से कि खूब शारीरिक सम्बंध बनाओ, कुछ नहीं होता, सब वैसे ही डराते हैं। और यौन शिक्षा अलग मुद्दा नहीं है। आपने खुद ही अपने एक लेख में एक सर्वे को कोट करते हुये लिखा है कि कैसे गरबा खेलने के महीने के बाद कुछ प्रांतों में गर्भपात करवाने के मामलों में बढोत्तरी हो जाती रही है और इस बरस उन प्रांतों में गरबा के महीने में गर्भ निरोधक सामग्रियों की बिक्री में बहुत ज्यादा वृद्धि देखी गयी है। तो एक तरफ तो इतनी जागरुकता आ रही है और आप जाने क्या कहना चाहती हैं अपनी कहानियों के माध्यम से।

लेखिका ने कुछ हथियार डालते हुये कहा,” आपके कुछ तर्कों से मैं सहमत हूँ पर मौटे तौर पर अभी भी कहूँगी कि कहानी के चरित्र समाज से ही लिये जाते हैं और अगर ये चरित्र समाज को गलत रुप में प्रभावित करते तो अज्ञेय, जैनेंद्र, यशपाल, मण्टो, और मृदुला गर्ग आदि इतने प्रसिद्ध लेखक न बनते। इन लेखकों ने भी स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबधों को खुलकर अपनी कहानियों और उपन्यासों का हिस्सा बनाया है। और भी बहुत सारे लेखक एवम लेखिकायें हैं जिन्होने ऐसा किया है।

कामना जी, जैनेंद्र जी का साफ साफ आग्रह अपनी नायिकाओं को घर से बाहर के क्षेत्रों में पुरुषों के समकक्ष स्थापित करने का था। वे ऐसी महिलायें स्थापित करना चाहते थे जो अपने फैसले खुद ले सकें और पुरुषों की ही भाँति समाज निर्माण में भागीदारी कर सकें। अज्ञेय, नदी के द्वीप में अगर रेखा को विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंधों में सलंग्न होते हुये दिखाते हैं तो वे उसे पहले गर्भवती होने और बाद में गर्भपात की यातनामयी वेदना से गुजरते हुये भी दिखाते हैं। वे बहुत जागरुक और जिम्मेदार लेखक के रुप में सामने आते हैं। और आप ऐसा एक भी उदाहरण दे दें जहाँ आपने पाया हो कि कोई पुरुष मण्टो की खोल दो या ठण्डा गोश्त जैसी कहानियाँ पढ़कर कामुकता के भाव से जाग्रत हो गया हो।

लेखिका इस विश्लेषण पर कुछ और गुस्से से भर गयीं| उन्हें आभास हो गया कि उनके लेखन की तुलना इन्ही लेखकों के लेखन से आने ही वाली है| वे चुप रहीं|

कामना जी,  दर्पण झूठ नहीं बोला करता| आप कहती हैं कि कहानियां और चरित्र समाज से ही लिए जाते हैं और कहानियां समाज को दर्पण दिखाती हैं| कहानियां समाज को दर्पण तब दिखाती हैं जब वे एक जिम्मेदार भूमिका निभाएं| क्षमा कीजियेगा आपकी ज्यादातर कहानियां आजकल के सनसनी फैलाने के तौर तरीकों का अनुसरण करती ज्यादा दिखाई देती हैं| आप अपनी किसी भी एक कहानी का उदाहरण दे दें जहां आपकी कहानी की नायिका या नारी चरित्र ने विवाह पूर्व और विवाह से बाहर जाकर पुरुष से शारीरिक संबंध बनाए हों और आपने उस चरित्र को ऐसी संभावना के आसपास से भी गुजारा हो जहां इस तरह के संबंधों से उत्पन्न दुष्परिणामों से उनका पाला पड़ता हो| आपने तो ऐसे संबंधों के इर्दगिर्द आनंद का ऐसा मिथ्या वातावरण रचा है जैसा कि अपरिपक्व दिमाग वाले किशोर पाठकों के लिए झूठे रोमांटिक किस्से कहानी और उपन्यास रचते रहे हैं|

लेखिका का चेहरा क्रोध से अजीब से भूरेपन से रंग गया था| वे कुछ कहना चाहती थीं पर शायद उन्हें शब्द नहेने मिल पा रहे थे या वे अपने गुस्से के कारण नहीं बोल पा रही थीं| उनके हाव भाव ऐसे हो चले थे मानो आँखों से ही भस्म कर देंगी|

उनकी एक शिष्या उनके बचाव में मैदान में कूदी और तीखे तेवर के साथ बोली|

कहानी समाज के घटनाक्रमों से उठायी जाती हैं और लेख इनके व्यक्तिगत विचार को प्रकट करते हैं| अतः आपके द्वारा इनकी आलोचना गलत है|

महोदया पहले तो आप एक सुधार कर लें मैं इनकी आलोचना कर रहा हूँ| में कुछ प्रश्न उठाना चाहता हूँ जैसा कि मैंने शुरू में भी निवेदन किया था कि कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर महिला रचनाकारों को खोजने चाहियें| आज सुबह ही कार्क्रम में मंच से तो कामना जी भी औरों के लिखे हुए पर पचास किस्म के प्रश्न उठा रही थीं|

शिष्या के तेवर कुछ कमजोर पड़े और वह पहले से धीमे स्वर में बोली|

लेखक का दायित्व समाज सुधार का तो होता नहीं|

महोदया, हो सकता है आपकी बात सही हो पर मुझे लगता है कि यह बात तभी तक सच है जब तक कि लेखक कल्पित संसार में विचरण कर रहा है और इसी संसार में कविता,कहानी और उपन्यासों के रचनाशील कर्म में सलंग्न है पर अगर वही लेखक लेखों के द्वारा नैतिक-अनैतिक के सवाल पर समाज में चीख पुकार मचा रहा है और अपने को नैतिकता का ठेकेदार के रूप में प्रचारित कर रहा है तो समाज को भी देखना होगा कि ऐसा रचनाकार असल में रच क्या रहा है और समाज एं अपने लेखन से क्या फैला रहा है| अभी तो हो क्या रहा है कि नशा बेचने वाले खुद ही ढोल पीट रहे हैं कि  लोग नशे के आदि हो रहे हैं| अरे इतना ख्याल है समाज का तो नशा बेचना और बनाना बंद करो पहले|

शिष्या ने अपनी गुरु के तमतमाते चेहरे को देखा और नये शब्दों से आक्रमण करना चाहा, पर तर्क के अभाव में कम शब्दों के साथ शिकायती बन गयी|

यह तो लेखक की व्यक्तिगत आलोचना हो गयी|

…जारी

…[राकेश]

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

सितम्बर 29, 2011

संभाल लो विरासत

 

भारी है कलम का बोझ
कांपती उंगलियां
निद्रा खो चुकी आँखों में
कोई सपना भी नहीं बाकी
जिससे
साकार कर सके कविता
इससे पहले कि मैं सो जाऊँ
इससे पहले कि कलम छुट जाए
टूट जाए मुझसे
जाग्रत ज़हनो, नवोदित विचारों
लो, संभालो इसे

(रफत आलम)

सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस – भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 30, 2011

बाज की चोंच में ब्रह्मांड

मैं खुश होते-होते रुक जाता हूँ
मैं प्यार करते-करते डर जाता हूँ
मैं कवितायें लिखते-लिखते
गद्य की तरफ मुड़ जाता हूँ
मुझे रह-रहकर आ जाती है याद
कि एक बाज की चोंच से छूट
ब्रह्मांड जायेगा फूट
फिर क्या होंगी मेरी खुशियाँ
क्या होगा मेरा प्यार
क्या होंगी ये कवितायें
जिन्हे मैं
लिख रहा हूँ।

(बद्रीनारायण)

जून 13, 2011

अमर गान कैसे हो?

सागर किनारे पहुंचा मैं!

लहरें गा रही थी
अथाह गहराई में बैठा
गुनगुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

चमन की राह से गुज़रा मैं!

फूलों का दिल बन कर
खुशबूओं में फैला रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

आकाश को तकने लगा मैं !

तारों की महफ़िल में
चांदनी को सुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

वही अमर गीत!
रुमी-तुलसी की ज़बान में है
कबीर-नानक के बयान में है
सूर–मीरा के भक्तिभाव में डूबा
राधा-किशन के बखान में है।
मासूमियत का अहसास बन कर
बच्चे की कोमल मुस्कान में है
प्रीत की कसोटी बनकर
लैला-मजनू की दास्तान में है
इश्क की बुलंदिया छूता हुआ
खुसरो ओ रसखान में है
ग़ालिब–निराला की भाषा बन कर
कविता की आन-बान में है
मंजिलों का पता देता
पक्षियों की उड़ान में है।

खय्याम से मस्ती में गवा रहा है कोई!
प्यारे, तू किराए के मकान में है।

जिस्म में रूह फूंकने वाले ने
मेरे शब्दों को शान नहीं बख्शी
कवि का दिल दे तो दिया
कलम को जान नहीं बख्शी

वह अमर गीत कैसे गाता मैं?

(रफत आलम)

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