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फ़रवरी 22, 2017

समर शेष है … रामधारी सिंह दिनकर

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

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सितम्बर 14, 2015

हिंदी दिवस के ढकोसले को बंद कीजिये : योगेन्द्र यादव

हर साल 14 सितम्बर के दिन ऊब और अवसाद में डूब कर हिंदी की बरसी मनायी जाती है। सरकारी दफ्तर के बाबू हिन्दी की हिमायत में इसका कसीदा और स्यापा दोनों एक साथ पढ़ते हैं। हिंदी की पूजा-अर्चना और अतिशयोक्ति पूर्ण महिमामंडन के मुखौटे के पीछे हिंदी के चेहरे पर पराजयबोध साफ़ झलकता है। मानो, इस दिन दुनिया की (चीनी,स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद ) चौथी सबसे बड़ी भाषा अपना जीवित-श्राद्ध आयोजित कर रही है |

हर साल हिंदी दिवस के इस कर्मकांड को देख मेरा खून खौलता है | पूछना चाहता हूँ कि इस देश में अंग्रेजी दिवस क्यों नहीं मनाया जाता है (बाकी 364 दिन अंग्रेजी दिवस ही तो हैं! ) सरकारी दफ्तरों के बाहर हिंदी पखवाड़े के बेनूर बैनर को देख चिढ़ होती है | उतर भारत में तमिल का पखवाड़ा मने, दिल्ली में हिंदी की सैकड़ो विलुप्त होती “बोलियों” का पखवाडा मने, तो समझ में आता है लेकिन अगर पचास करोड़ लोगो की भाषा को अपने ही देश में अपनी आकांक्षा को एक पखवाड़े भर में सिकोड़-समेट लेना पड़े तो लानत है ! हर बार यह सब देख के रधुवीर सहाय की कविता “हमारी हिंदी” याद आती है | सुहागिन होने की खुशफहमी तले दुहाजू की नई बीबी जैसी हमारी यह हिंदी सीलन और चीकट से घिरी है, दोयम दर्जे का जीवन जीने को अभिशप्त है |

हिंदी दिवस पसरते जाते हैं, हिंदी सिकुड़ती जाती है। आज इस देश में हिंदी भाषा अंग्रेजी की दासी , अन्य भारतीय भाषाओँ की सास और अपनी ही दर्जनों बोली या उप-भाषाओ की सौतेली माँ बन गई है | संघ लोक सेवा आयोग के सीसैट पर्चे की परीक्षा के विरुद्ध आन्दोलन ने एक बार फिर अंग्रेजी के बरक्स हिंदी की हैसियत का एहसास कराया है। चाहे प्रश्न-पत्र हो या सरकारी चिट्ठी, राज-काज की मूल प्रामाणिक भाषा अंग्रेजी है | रैपिड इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स के सर्वव्यापी विज्ञापन और कुकरमुत्ते की तरह उगते इंग्लिश मीडियम के स्कूल अंग्रेजी के साम्राज्य का डंका बजाते हैं | बॉस को खुश करने को लालायित जूनियर , मेहमान के सामने बच्चे को पेश करते माँ–बाप या प्रेमिका को पटाने की कोशिश में लगा लड़का…जहाँ–जहाँ अभिलाषा है वहां–वहां अंग्रेजी है| सत्ता का व्याकरण हिंदी में नही अंग्रेजी में प्रकट होता है | ऐसे में राज-भाषा का तमगा एक ढकोसला है !
दरअसल यह ढकोसला हिंदी के लिए अभिशाप बनता जा रहा है | हिंदी के पल्ले और कुछ तो है नहीं, बस राज भाषा होने का एक खोखला अहंकार है | इसके चलते हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच एक खाई बनी रहती है | हमारा संविधान कही”राष्ट्र-भाषा”का जिक्र नहीं करता लेकिन अपने गरूर में हिंदी वाले मान कर चलते हैं कि उनकी भाषा इस देश की राष्ट्र-भाषा है | वे हिन्दी को मकान मालिक समझते है, बाकी भाषाओं को किरायेदार | हर गैर हिंदीभाषी को स्कूल में हिंदी सीखनी पड़ती है लेकिन हिंदीभाषी दक्षिण या पूर्व भारत की एक भी भाषा नहीं सीखते। इसके चलते अन्य भारतीय भाषाओं के बोलने वालों को हिंदी से चिढ़ होती है |और तो और, आज हिंदी और उर्दू के बीच भी फांक बना दी गयी है। इस झगड़े का फायदा उठा कर अंग्रजी का राज बदस्तूर चलता रहता है |
हिंदी-दिवस का ढकोसला हमारी आँखों से खुद हिंदी की बनावट को ओझल करता है | यह इस गलतफहमी को पैदा करता है कि आकाशवाणी–दूरदर्शन की खड़ी बोली पचास करोड़ देशवासियों की मातृभाषा है | हम सब अब भोजपुरी,मगही,अवधी,मेवाती,बागड़ी,मारवाड़ी,भीली,हाड़ोती,मालवी,छत्तीगढ़ी,संथाली जैसी भाषाओ को महज बोली कहने लगे हैं | नतीजतन इन भाषाओँ में उपलब्ध सांस्कृतिक धरोहर और रचनात्मकता का भण्डार आज विलुप्त होने के कगार पर है | अंग्रेजी के बोझ तले दबी हिंदी खुद इन भाषाओँ को दबाने का औजार बन गई है |

अगर आज भी हिंदी में कुछ जान बची है तो इस राजभाषा के कारण नहीं | सरकारी भाषा-तंत्र के बाहर बम्बईया फिल्मों , क्रिकेट कमेंट्री और टीवी तथा अखबार ने हिंदी को आज भी जीवित रखा है | न जाने कितने गैर हिंदीभाषियों ने बम्बईया फिल्मो के माध्यम से हिंदी सीखी | पिछले बीस सालों में टीवी के अभूतपूर्व प्रसार ने हिंदी का अभूतपूर्व विस्तार किया | समकालीन हिंदी साहित्य किसी भी अन्य भाषा के श्रेष्टतम साहित्य से हल्का नहीं है | पिछले कुछ सालो से अंग्रेजीदां हिन्दुस्तानी भी हिंदी के कुछ जुमले बोलते वक्त झेंप महसूस नहीं करते| लेकिन इस सब का राजभाषा संवर्धन के सरकारी तंत्र से कोई लेना-देना नहीं है |
इसलिए, मै गुस्से या खीज में नहीं, ठंढे दिमाग से यह प्रस्ताव रखना चाहता हूँ कि हिंदी दिवस के सरकारी ढकोसले को बंद कर देना चाहिए |योजना आयोग की तरह राजभाषा प्रसार समितियों को भी भंग कर देना चाहिए। सरकार इस ढकोसले को बंद करना नहीं चाहेगी | अंग्रेजी वाले भी नहीं चाहेंगे | ऐसे में हिंदी के सच्चे प्रेमियों को हिदी दिवस का बहिष्कार करना चाहिए | इसके बदले 14 सितम्बर को भारतीय भाषा संकल्प दिवस के रूप में मनाना चाहिए | इस अवसर पर सभी भारतीय भाषाओँ को एक जुट हो कर अंग्रेजी भाषा के विरूद्ध नहीं बल्कि अंग्रेजी के वर्चस्व के विरूद्ध संघर्ष करने का संकल्प लेना चाहिए | लेकिन भाषा का संघर्ष केवल विरोध और बहिष्कार से नहीं हो सकता, इसमें नवनिर्माण सबसे जरूरी है|
इसका मतलब होगा कि हिंदी की पूजा-अर्चना छोड़ उसका इस्तेमाल करना शुरू करें | जैसे मिस्त्रियों ने हर कल पुर्जे के लिए अपनी हिंदी गढ़ ली है (पिलास, चिमटी, ठंढा/गर्म तार) उसी तरह हमें अर्थ-व्यवस्था, क़ानून, खगोलशास्त्र और डाक्टरी के लिए भी एक नई भाषा गढ़नी होगी | देश और दुनिया की तमाम भाषाओँ से शब्द उधार लेने होंगे, शब्द-मैत्री की नई रवायत बनानी होगी | गुलज़ार की तरह हर पौराणिक कहानी को बाल साहित्य में बदलना होगा | सुकुमार राय के ‘आबोल ताबोल’ की तर्ज पर बच्चो को हँसने – गुदगुदाने वाली कवितायेँ लिखनी होंगी | हैरी पॉटर का मुकाबला कर सकने वाला रहस्य और रोमांच से भरा किशोर साहित्य तैयार करना होगा | कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हर विषय की मानक पाठ्यपुस्तकें तैयार करनी होगी | अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान के असीम भण्डार का अनुवाद करना होगा | चीनी और जापानी की तरह हिंदी को भी इन्टरनेट की सहज – सुलभ भाषा बनाना होगा |इसके बिना अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध बेमानी है।
यह सब करने के लिए अन्य भारतीय भाषाओँ के साथ सास जैसा व्यवहार छोड़ कर सखा-भाव बनाना होगा | अंग्रेजी के वर्चस्व के खिलाफ लडाई तभी लड़ी जा सकती है जब तमाम भारतीय भाषाएँ एक जुट हो जाएँ | हिंदी संख्या के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी भाषा भले ही हो लेकिन न तो सबसे वरिष्ठ है और न ही सबसे समृद्ध | हिंदी को तमिल के प्राचीन ग्रन्थों, आधुनिक कन्नड़ साहित्य, मलयाली समाचार पत्रों, मराठी विचार-परंपरा, बांग्ला अकादमिक लेखन और उर्दू–फ़ारसी की कानूनी भाषा से सीखना होगा | अपनी ही बोलियों को मान–सम्मान दे कर मानक हिंदी के दरवाजे इन सब भाषाओं के लिए खोलने होंगे |अगर हिंदी की गरिमा हिन्द की गरिमा से जुडी है तो हिंदी को हिन्दवी की परंपरा से दुबारा जुड़ना होगा, हिन्द के भाषायी संसार का वाहक बनाना होगा।
हिंदी प्रमियों को गैर-हिंदी इलाकों में हिंदी के प्रचार–प्रसार-विस्तार की कोशिशों से बाज आना होगा | अगर वे हिंदीभाषी प्रदेशों में ही हिंदी को मान–सम्मान दिला पायें तो बहुत बड़ी बात होगी | हिंदी की वकालत का काम महात्मा गाँधी , डॉक्टर आंबेडकर, काका कालेलकर, और चक्रवर्ती राज गोपालाचारी जैसे गैर हिंदीभाषियों ने किया था | यह उन्ही को शोभा देता है |
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जून 7, 2015

‘प. नेहरु’ और ब्रिटिश राज के बाद का भारत

Nehru

[दैनिक जनसत्ता ने ब्रिटिश राज के बाद भारत के प्रति नेहरु के योगदान और उनकी छवि को धूमिल किये जाने वाले राजनीतिक षड्यंत्र पर प्रकाश डालते हुए एक अच्छा लेख (

नेहरू को नकारने के निहितार्थ)

प्रकाशित किया है]

आजादी की लड़ाई पर सुनियोजित हमला किया जा रहा है। नेहरू इस हमले का मुख्य निशाना हैं। नेहरू का नाम आते ही नेहरू परिवार की बात शुरू हो जाती है। देश की हर समस्या, हर मुसीबत का नाम नेहरू के खाते दर्ज किया जाता है। नेहरू को एक सत्ता-लोलुप की तरह पेश किया जाता है, जिन्होंने गांधी को किनारे लगा कर अंगरेजों से सत्ता हथिया ली। या फिर, गांधी की कृपा से वे गांधी के उत्तराधिकारी बने। अगर नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री न होते तो देश की सूरत अलग होती। क्योंकि वे निर्णय लेने में अक्षम थे। वे तो पटेल थे जिनकी लोहे जैसी इच्छाशक्ति ने इस देश को बचा लिया। या फिर इस देश में नेहरू की इकलौती विरासत वंशवाद की नींव रखना था। यह और इस तरह के जाने कितने आरोप एक सांस में नेहरू पर मढ़ दिए जाते हैं। दरअसल, नेहरू कौन थे यह बात आम आदमी की याददाश्त से गायब हो चुकी है। नई पीढ़ी, जिसका सबसे बड़ा स्कूल इंटरनेट है, यू-ट्यूब वाले नेहरू को जानती है। वे नेहरू जो तथाकथित रूप से आला दर्जे के शौकीन आदमी थे।

नेहरू के दुश्मन एक नहीं, अनेक हैं। सांप्रदायिक एजेंडे में वे गांधी की तरह एक रोड़ा हैं। साम्राज्यवादियों और नव-साम्राज्यवादियों के लिए आजादी की पूरी लड़ाई एक झूठ और दिखावा थी, जो कि ब्रिटिश राज की भलाई देखने के बजाय उसकी जड़ खोदने का काम करती थी। सबाल्टर्न इतिहासकारों के हिसाब से नेहरू उस जमात के नेता थे जो अभिजात थी, जिसका नीचे से यानी जनता के भले से कोई लेना-देना नहीं था। रूढ़ मार्क्सवादी इतिहास-लेखन नेहरू को उस बूर्जुवा नेतृत्व का प्रतिनिधि मानता रहा जिसने समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद क्रांति की ऐतिहासिक संभावनाओं को कमजोर किया।

गांधी की हत्या के बाद गांधीवादियों ने नेहरू से यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि वे भी गांधी के अंतिम दिनों की तरह सत्ता से दूर रहेंगे। वे उस गांधी को भूल गए जो अपने हृदय के हर कोने से खांटी राजनीतिक थे। समाजवादियों की जमात ने कभी नेहरू के नेतृत्व में ही समाजवाद का ककहरा सीखा था। आजादी के बाद वही समाजवादी नेहरू की जड़ें खोदने पर आमादा हो गए। पटेल 1950 में स्वर्ग सिधार गए। गांधी की पहले ही 1948 में हत्या हो चुकी थी। बाकी बचे मौलाना आजाद, जो नेहरू के मुश्किल दिनों के साथी थे।

यानी आजादी के पहले और आजादी के बाद दो अलग दौर थे। पहले दौर में गांधी के व्यापक नेतृत्व में एक भरी-पूरी कांग्रेस थी, जिसमें नेहरू गांधी के बाद बिना शक नंबर दो थे। लेकिन आजादी के बाद और गांधी की हत्या के बाद सिर्फ नेहरू थे। आजादी और विभाजन के द्वैध को भुगत कर निकला देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा था। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शोषण ने देश को अंदर तक खोखला कर दिया था। इस एक तथ्य से ही हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है- 1947 में भारत में औसत आयु मात्र बत्तीस वर्ष थी।

ऐसे कठिन दौर में नेहरू ने मोर्चा संभाला। उन्होंने दिन-रात काम किया। अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सिर्फ चार-चार घंटे सोकर बिताया। जिन्हें नेहरू की मेहनत का अंदाजा लगाना हो वे गजानन माधव मुक्तिबोध का निबंध ‘दून घाटी में नेहरू’ पढ़ लें। किसी को आजादी के पहले के नेहरू से एतराज नहीं है। सबकी दिक्कत आजादी के बाद के नेहरू से है। इसलिए यहां बात सिर्फ इसी नेहरू की होनी है। उस नेहरू की, जिस पर आजादी की लड़ाई की समूची विरासत को आजाद भारत में अकेले आगे बढ़ाना था। जिसके हिस्से ‘सत्ता’ का ‘अमृत’ आया था; औपनिवेशिक शोषण और सांप्रदायिकता से टूटे-बिखरे मुल्क में ‘विष’ भी इसी नेहरू के हिस्से आया।

सबसे पहली बात रियासतों के एकीकरण की। इस काम में सरदार पटेल और वीपी मेनन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। लेकिन भारत का एकीकरण आजादी की लड़ाई का मूल विचार था। जिस देश को पिछले सौ सालों में जोड़ा-बटोरा गया था, उसे सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों में टूटने नहीं देना था। यह काम आजाद भारत की सरकार के जिम्मे आया, जिसे पटेल ने गृहमंत्री होने के नाते बखूबी अंजाम दिया। लेकिन भारत को सैकड़ों हिस्सों में तोड़ने वाला मसविदा ब्रिटेन भेजने के पहले माउंटबेटन ने नेहरू को दिखाया। माउंटबेटन के हिसाब से ब्रिटेन को क्राउन की सर्वोच्चता वापस ले लेनी चाहिए। यानी जितने भी राज्यों को समय-समय पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता स्वीकारनी पड़ी थी, इस व्यवस्था से सब स्वतंत्र हो जाते।

नेहरू यह मसविदा देखने के बाद पूरी रात सो नहीं सके। उन्होंने माउंटबेटन के नाम एक सख्त चिट्ठी लिखी। तड़के वे उनसे मिलने पहुंच गए। नेहरू की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे मजबूरन माउंटबेटन को नया मसविदा बनाना पड़ा, जिसे तीन जून योजना के नाम से जाना जाता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दो राज्य इकाइयों की व्यवस्था दी गई। ध्यान रहे पटेल जिस सरकार में गृहमंत्री थे, नेहरू उसके प्रधानमंत्री थे। इस तरह, यह निश्चित रूप से पटेल का नहीं, पटेल और नेहरू का मिलाजुला काम था।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की चुनौती थी। देश सांप्रदायिक वहशीपन के सबसे बुरे दौर से गुजर चुका था। लोगों ने गांधी के जिंदा रहते उनकी बात अनसुनी कर दी थी। जिन्ना ने अपना दार-उल-इस्लाम बना लिया था; मुसलमानों का ‘अपना’ मुल्क पाकिस्तान वजूद में आ गया था। भीषण रक्तपात, विस्थापन के साथ हिंदू और सिख शरणार्थियों के जगह-जगह पहुंचने के साथ ही ‘हिंदू’ सांप्रदायिक दबाव बहुत जबर्दस्त हो गया था। हिंदुस्तान का पहला आम चुनाव सामने था। यह ऐसा चुनाव था जो सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के मुद््दे पर लड़ा जा रहा था। नेहरू ने ‘जन भावनाओं’ की मुंहदेखी नहीं की। उन्होंने वह कहा जो बहुतों के लिए अलोकप्रिय था। उनमें अलोकप्रिय होने का साहस था।

उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के हक में आवाज बुलंद की और जनता को अंधेरे समय में रोशनी दिखाई। जनता ने अपने नेता को खुद से ज्यादा समझदार माना। इस चुनाव में नेहरू ने तकरीबन पूरा देश नाप लिया। तकरीबन चालीस हजार किलोमीटर का सफर तय किया। हर दस में एक भारतीय को सीधा संबोधित किया। यह वक्त हिंदू सांप्रदायिकता के उभार के लिए सबसे मुफीद था। लेकिन इसी समय इसे मुंह की खानी पड़ी। यह चुनाव एक तरह से धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जनमत संग्रह सिद्ध हुया। नेहरू पर एक और बड़ा जिम्मा था। आजादी की लड़ाई के दौरान बोए गए लोकतांत्रिक पौधे की जड़ें मजबूत करने का। नेहरू की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की एक रोचक कहानी है। नेहरू हर तरफ अपनी जय-जयकार सुन कर ऊब चुके थे। उनको लगता था कि बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं।

नवंबर 1957 में नेहरू ने मॉडर्न टाइम्स में अपने ही खिलाफ एक जबर्दस्त लेख लिखा। चाणक्य के नाम से ‘द प्रेसिडेंट’ नाम के इस लेख में उन्होंने पाठकों को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेताया। उन्होंने कहा कि नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वे सीजर हो जाएं।

मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर अपने कार्टूनों में नेहरू की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। नेहरू ने उनसे अपील की कि उन्हें बख्शा न जाए। फिर शंकर ने नेहरू पर जो कार्टून बनाए उनका संग्रह इसी नाम से प्रकाशित हुया- ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लंबे समय तक प्रतिबंध को नेहरू ने ठीक नहीं माना। उनका मानना था कि आजाद भारत में इन तरीकों का प्रयोग जितना कम किया जाए, उतना अच्छा। नेहरू को इस बात की बड़ी फिक्र रहती थी कि लोहिया जीत कर संसद में जरूर पहुंचें, जो हर मौके पर नेहरू पर जबर्दस्त हमला बोलते थे।

उनकी आर्थिक योजना, जिसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं, ने देश को एक मजबूत आधार दिया। जिस वक्त भारत आजाद हुया, उसे नब्बे प्रतिशत मशीनरी बाहर से आयात करनी होती थी। जर्मनी को छोड़ कर हर जगह से तकनीक का आयात किया गया। महालनोबिस योजना का मुख्य उद््देश्य भारी उद्योगों को बढ़ावा देना था। ठहरी हुई खेती के साथ खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल करना एक बड़ा सवाल था। नेहरू ने लोकतांत्रिक दायरों में रह कर भूमि सुधार किए। डेढ़ सौ साल पुरानी जमींदारी व्यवस्था को खत्म करना कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी।

गरीबों को ऊपर उठाने के लिए नेहरू और उनके योजनाकारों ने सामुदायिक व्यवस्था का सहारा लिया। नेहरू ने गांवों में ग्राम-सेवकों की पूरी फौज भेज दी। नेहरू उद्योग और कृषि में कोई फर्क नहीं करते थे। उनके मुताबिक दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई चीजें थीं। उनको विकास का महत्त्व पता था। वे मानते थे कि गरीबी का बंटवारा नहीं किया जा सकता, सबमें बांटने के लिए उत्पादन जरूरी है। लेकिन उसके लिए वे खेती से समझौता नहीं करते थे।

उन्होंने देश में हरित क्रांति की परिस्थितियां तैयार कीं। देश के पंद्रह जिलों में एक पाइलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। उनकी मृत्यु के बाद शास्त्रीजी ने हरित क्रांति को साकार कर दिया। डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पहले इक्कीस सालों में किया गया, उतना दो सौ साल किए गए काम के बराबर है। दुनिया के लगभग सारे अर्थशास्त्री- जिन्होंने नेहरू की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया- नेहरू की रणनीति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

नेहरू के विजन में गरीब लोकतंत्र की कसौटी था। उन्होंने तय किया कि गरीबों के हित परिदृश्य से बाहर नहीं फेंके जा सकते। उन्होंने गरीबों के प्रति पक्षधरता का वह बुनियादी सोच पैदा किया कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दबाव के बाजवूद गरीब किसान-मजदूर अब भी बहस का सामान्य मुद्दा बने हुए हैं। नेहरू मानते थे, ‘लोकतंत्र समाजवाद के बिना अधूरा है और समाजवाद लोकतंत्र के बिना’।

बात नेहरू के महिमामंडन की नहीं है। नेहरू की विफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं। लेकिन हर नेता अपने समय के संदर्भ में निर्णय लेता है, नीति बनाता है। जो कमियां-कमजोरियां आज हमें दिखाई दे रही हैं, वे नेहरू को नहीं दिख रही थीं। क्योंकि नेहरू अपने युग में बैठ पर दुनिया देख रहे थे। उस पर से तमाम भयानक चुनौतियों के बीच।
हमारे बीच एक बड़ा दंगा, एक बड़ी आपदा, सब-कुछ उथल-पुथल कर देती है। नेहरू ऐसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह लड़ रहे थे, जहां विफलता ही नियति थी। एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था- हमने अपनी विफलताओं से ही सही, देश की सेवा तो की।

मोहित सेन ने लिखा है कि तिब्बत सीमा विवाद के वक्त चीन ने नेहरू का कद छोटा करने के लिए उनका चरित्र हनन करना शुरू किया था। चीनी नेतृत्व (इसमें माओ शामिल नहीं थे) का मानना था कि नेहरू से टकराने के लिए, नेहरू का कद घटाना जरूरी है। यही बात सांप्रदायिक दलों पर लागू होती है। क्योंकि नेहरू उनके लिए खतरनाक हैं।

(सौरभ वाजपेयी)  – जनसत्ता 6 जून 2015
फ़रवरी 19, 2015

आचार्य नरेंद्र देव – समाजवादी आंदोलन के पुरोधा

narendradevआचार्य नरेंद्र देव का जन्म 31 अक्टूबर 1889 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ था। उनका घर का नाम अविनाशीलाल था। परंतु उनके पिता के दोस्त पं. माधव प्रसाद मिश्र ने उनका नाम नरेन्द्र देव रख दिया। उनके पिता वकालत करते थे। बचपन से ही वे पिता के साथ कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाने लगे थे। 1905 में वे पहली बार बनारस कांग्रेस अधिवेशन में गये थे। कांग्रेस ने जब गरम दल बना तब उसमें शामिल हो गये। कांग्रेस के अधिवेशन में 1908 के बाद जाना छोड़ दिया लेकिन उसके बाद 1916 में जब नरम दल व गरम दल फिर एक साथ आ गये तब उन्होंने फिर से कांग्रेस के कार्यक्रमों में आना-जाना शुरू किया। 1915 में एलएलबी पास करके केे फैजाबाद में वकालत शुरू की तथा होमरूल लीग में शामिल होकर फैजाबाद की शाखा के मंत्री चुने गये। जब बनारस में विद्यापीठ खुला तब डा. भगवानदास के प्रस्ताव पर वे उपाध्यक्ष बना दिये गये तथा 1926 में उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया।

आचार्यजी अति संकोची थे। वे पद लेना तथा चुनाव लड़ना नहीं चाहते थे लेकिन जब उ. प्र. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने से उन्होंने इन्कार कर दिया तथा पं. जवाहर लाल नेहरू के कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल होने के प्रस्ताव को उन्होंने अस्वीकार कर दिया था लेकिन बाद में अपने सहयोगियों के आग्रह पर उन्होंने दोनों पद स्वीकार किये। इसी तरह 1934 में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाने का प्रस्ताव जे.पी. ने उनके समक्ष रखा तब उन्होंने सम्मेलन का सभापति बनने से इन्कार किया। बाद में वे कार्यकर्ताओं के आग्रह पर 1934 में सम्मेलन के सभापति बनाये गये। आचार्यजी के कहने पर ही पार्टी का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता रखा गया था। 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें विशेष ट्रेन से अहमदनगर ले जाया गया। 1945 में 14 जून को जवाहर लाल जी के साथ रिहा किये गये। आजादी मिलने के बाद जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से अलग होने की चर्चा शुरू हुई तब उन्होंने कहा कि कांग्रेस यदि कोई ऐसा नियम बनाती है जिसमें हम लोगों का कांग्रेस में रहना असंभव हो जाये तो सबसे पहले मैं कांग्रेस छोड़ दूंगा। कांग्रेस के निर्णय के बाद उन्होंने यही किया, कांग्रेस पार्टी छोड़ दी।

आचार्य नरेंद्र देव मानव समाज के कल्याण और नैतिक जीवन के विकास के लिए अन्याय का विरोध आवश्यक समझते थे उनका विचार था कि शोषणविहीन समाज में सामाजिकता के आधार पर मनुष्य का नैतिक विकास हो सकता है लेकिन स्वार्थ प्रेरणा पर आश्रित वर्ग समाज में सामाजिक भावनाओं का विकास बहुत कुछ अवरूद्ध हो जाता है। ऐसे अन्यायपूर्ण समाज में अन्याय का निरंतर का विरोध नैतिक जीवन और मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। उनकी दृष्टि में वही नैतिक है, जो अन्याय के साथ समझौता करने को तैयार न हो, स्वयं अन्याय करने से बचता रहे तथा दूसरे के अन्याय को सहन करने को तैयार न हो। उन्हें इस बात का संतोष था कि वह जीवन भर अन्याय का विरोध करते रहे। उन्हें विदेशियों के द्वारा किया जा रहा अन्याय खटकता था परंतु स्वजनों द्वारा आर्थिक और सामाजिक अन्याय किये जाने की खिलाफत वे लगातार करते थे। इसलिए वे राजनैतिक स्वराज्य के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक स्वराज्य के लिए भी प्रयत्नशील रहे। राजनैतिक स्वतंत्रता मिल जाने के बाद देश में जनतांत्रिक समाजवादी समाज निर्मित करने का प्रयास करते रहे।

आचार्य नरेंद्र देव जी को देश और दुनिया माक्र्सवादी तथा बौद्ध दर्शन का प्रखर विद्वान जानती और मानती है। लेकिन आमतौर पर आचार्य जी का किसान आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान की जानकारी कम लोगों को है। 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान अवध के 4 प्रमुख जिलों रायबरेली, फैजाबाद, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर में किसान आंदोलन तेजी से चला। आचार्यजी ने इस आंदोलन का ख्ुालकर समर्थन किया तथा उनके प्रभावशाली भाषण के चलते किसान आंदोलन में डटे रहे। सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए 7 जनवरी 1921 को मुंशीगंज में गोली चालन कराया। दमन के बावजूद आंदोलन उग्र रूप धारण कर लगातार चलता रहा तब सरकार को किसानों की बेदखली रोकने वाली मांग स्वीकार करनी पड़ी। अवध आंदोलन भी आचार्यजी की भूमिका के चलते सफल रहा। आंदोलन के दौरान किसानों को यह प्रतिज्ञा करायी गयी कि वे गैरकानूनी टैक्स अदा नहीं करेंगे, बेगार-बिना मजदूरी नहीं करेंगे। पलई, भूसा तथा रसल बाजार भाव पर बेचेंगे तथा नजराना नहीं देंगे। बेदखल खेत को कोई दूसरा किसान नहीं खरीदेगा तथा बेदखली कानून मंजूर होने तक सतत संघर्ष चलाएंगे। 1936 में भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। आचार्यजी को 1939 में गया अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया जिसमें आचार्यजी ने किसान सभाओं और कांग्रेस संगठन के संबंधों पर जोर देते हुए कहा कि साम्राज्यवाद के विरोध में दोनों को एक साथ खड़े होकर किसान क्रांति को परिपक्व करने की जरूरत है ताकि किसान जमीन का मालिक बन जाये। राज्य और किसानों के बीच मध्यवर्ती शोषकों का शोषण अंत हो जाय। कर्जे के बोझ से किसानों को छुटकारा मिले तथा श्रम का पूरा लाभ उन्हें मिल सके। 1949 में सोशलिस्ट पार्टी ने पटना में अधिवेशन कर किसान पंचायत संघर्ष समिति बनाई। उ. प्र. का किसान पंचायत क्रांति सम्मेलन आचार्य जी की अध्यक्षता में कानपुर जिले के ग्राम सिठमरा में हुआ। डा. लोहिया की प्रेरणा से सोशल्स्टि पार्टी व किसान पंचायत का संयुक्त अधिवेशन 25 नवंबर 1949 को लखनऊ में हुआ जिसमें 50 हजार किसानों ने भाग लिया। आचार्य नरेंद्र देव ने खुलकर सरकार पर किसानों की उपेक्षा और अन्याय करने का आरोप लगाते हुए जमीदारी खत्म करने, जमीन का बंटवारा करने, सरकारी खेती, ग्रामीण उद्योग को बढ़ावा, भूमि सेना का गठन, कृषि उत्पादों तथा कपड़ा और सीमेंट की कीमतों में संतुलन, खेतिहर मजदूरों के कर्जे माफ करने तथा जमीनों से बेदखली रोकने का मांग-पत्र सरकार के समक्ष रखा। फरवरी 1950 में डा. लोहिया की अध्यक्षता में रीवा में हिंद किसान पंचायत का पहला अधिवेशन हुआ, तब आचार्य जी ने किसानों का हौसला बढ़ाते हुए किसानों से संगठित होने का आह्वान किया। आचार्य जी ने जमीदारी उन्मूलन कमेटी को 1947 में लिखे स्मृति पत्र में कहा कि जिस तरह से जमीदारों ने किसानों को लूटा, खसोटा और चूसा है यदि उसका हिसाब लगाया जाय तो किसानों के ऋण से मुक्त होना जमीदारों के बूते की बात नहीं। ऐसी हालत में जमीदारों को मुजावजा देने का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए। आचार्य जी ने देवरिया सत्याग्रह में किसानों की फसल खराब होने के बाद भागीदारी करते हुए किसानों और सरकारी कर्मचारियों के भेद को समाप्त करने की मांग की। 1950 में पंजाब में भी नरेंद्र देव जी ने हिसार जिले में भी बेदखली के खिलाफ संघर्ष किया था। आचार्य जी का किसानों का संघर्ष का लंबा इतिहास है जो आज भी किसान आंदोलन को ताकत दे सकता है।

अपने बारे में आचार्यजी कहते थे कि मेरे जीवन के अब कुछ वर्ष ही शेष रह गये हैं। शरीर नामक संपत्ति भी अच्छी नहीं है किंतु मन में अभी उत्साह है। जीवन सदा अन्याय से लड़ते जिया है। यह काम कोई छोटा नहीं है। स्वतंत्र भारत में इसकी और भी आवश्यकता है। अपनी जिंदगी पर एक निगाह डालने से मालूम होता है कि जब मेरी आंखें मुंदेंगी मुझे यह संतोष होगा कि मैंने विद्यापीठ में स्थाई काम किया। यही मेरी पूंजी है। इसके आधार पर मेरी राजनीति चलती है।
आचार्यजी को बीमारी ने आजादी आंदोलन के दौरान ही जकड़ लिया था। शुरू से ही वे दमा के रोग से पीडि़त थे। स्वयं गांधी जी ने वर्धा आश्रम बुलाकर आचार्यजी की प्राकृतिक चिकित्सा भी की थी। आचार्यजी ने 19 फरवरी 1956 को शरीर त्याग दिया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आचार्यजी को अजातशत्रु कहा था। उन्होंने कहा था कि आचार्यजी और गांधी जी अतिरिक्त उन्हें अब तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो आदमियत, व्यक्तित्व, इंसानियत, बौद्धिक शक्ति, ज्ञान, वाक्पटुता, भाषण शक्ति, इतिहास और दर्शन की समझ आचार्य नरेंद्रदेव जैसी रखता हो। आचार्य नरेंद्रदेवजी समाजवादी समाज के साथ-साथ समाजवादी सभ्यता का निर्माण करना चाहते थे। उनका स्पष्ट मत था कि समाजवादी समाज को बनाने के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ-साथ जनता के मानस को बदलने की, जागृत करने की, स्वयं अपनी समस्याओं को सुलझाने योग्य बनाने तथा समाजवादी नैतिक मूल्यों के समुचित प्रशिक्षण की नितांत आवश्यकता है।

संपूर्णानंद ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि वे संस्कृत और पाली के उच्च कोटि के विद्वान थे जिन्होंने काशी विद्यापीठ को गरिमा प्रदान की थी। वे हंसमुख थे तथा खूब मजाक किया करते थे। उनका सेंस आॅफ ह्यूमर अद्वितीय था।
राहुल सांकृत्यायन ने आचार्यजी के बारे में कहा था कि उनकी अंग्रेजी भाषा पर असाधारण पकड़ थी। बौद्ध दर्शन पर उनकी किताब ‘अभिकोश भाष्य’ को उन्होंने ऐतिहासिक ग्रन्थ बताया था। कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो का अनुवाद भी आचार्य जी और राहुल जी ने मिलकर शुरू किया था। जिसके कुछ अंश प्रेमचंद जी की प्रेस में छपे भी थे। लेकिन वह पूर्ण नहीं हो सका।

डा. राममनोहर लोहिया ने आचार्य के बारे में कहा था कि वे बौद्ध दर्शन, बौद्ध साहित्य, बौद्ध इतिहास के साथ-साथ राजनीति की गहराई से जानकारी रखने वाले विद्वान थे। मंत्री पद न लेना, लखनऊ विश्वविद्यालय का वाईस चांसलर बनने से इंकार करना उनके लिए छोटी बात थी। आचार्यजी के भाषण शिक्षाप्रद और जोशीले होते थे। उन्होंने काशी विद्यापीठ में हजारों विद्यार्थियों को समाजवादी विचार से शिक्षित किया।

चंद्रशेखर जी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि आचार्य जी ऋषिकुल परंपरा के ऐसे संत थे जिनका जीवन कठोर साधना में बीता। जिन्होंने सुख-दुख को समान समझा। उनकी पीड़ा आमजन के प्रति थी। अतीत में जो कुछ शुभ है उसको अक्षुण रखने का संकल्प था। लेकिन विकृतियों, अंधविश्वासों तथा रूढि़वादिता के खिलाफ वे आजीवन संघर्ष करते रहे। उन्होंने बुद्ध की करूणा तथा माक्र्स के दर्शन को जीवन का संबल बनाया था।

आचार्यजी की पुण्य तिथि आज 19 फरवरी 2015 को देशभर में मनाई जा रही है। आचार्यजी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके पथ पर समाजवादी समाज की रचना के लिए न केवल किसानों, मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित करें, बल्कि पठन-पाठन करते हुए नैतिकता आधारित जीवन जीते हुए स्वयं के आध्यात्मिक विकास के लिए प्रयासरत रहें।

डाॅ सुनीलम
पूर्व विधायक, राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम

जनवरी 7, 2015

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं…

पुरखों की कसम खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

आर्य, शक, हूण, मंगोल, मुगल, अंग्रेज,

द्रविड़, आदिवासी, गिरिजन, सुर-असुर

जाने किस-किस का रक्त

प्रवाहित हो रहा है हमारी शिराओं में

उसी मिश्रित रक्त से संचरित है हमारी काया

हाँ हम सब वर्णसंकर हैं।

पंच तत्वों को साक्षी मानकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र, कावेरी से लेकर

वोल्गा, नील, दजला, फरात और थेम्स तक

असंख्य नदियों का पानी हिलोरें मारता है हमारी कोशिकाओं में

उन्हीं से बने हैं हम कर्मठ, सतत् संघर्षशील

सत्यनिष्ठा की शपथ लेकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

जाने कितनी संस्कृतियों को हमने आत्मसात किया है

कितनी सभ्यताओं ने हमारे ह्रदय को सींचा है

हज़ारों वर्षों की लंबी यात्रा में

जाने कितनों ने छिड़के हैं बीज हमारी देह में

हमें बनाए रखा है निरंतर उर्वरा

इस देश की थाती सिर-माथे रखते हुए कहता हूँ

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

बुद्ध, महावीर, चार्वाक, आर्यभट्ट, कालिदास

कबीर, ग़ालिब, मार्क्स, गाँधी, अंबेडकर

हम सबके मानस-पुत्र हैं

तुम सबसे अधिक स्वस्थ एवं पवित्र हैं

इस देश की आत्मा की सौगंध खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

हम एक बाप की संतान नहीं

हममें शुद्ध रक्त नहीं मिलेगा

हमारे नाक-नक्श, कद-काठी, बात-बोली,

रहन-सहन, खान-पान, गान-ज्ञान

सबके सब गवाही देंगे

हमारा डीएन परीक्षण करवाकर देख लो

गुणसूत्रों में मिलेंगे अकाट्य प्रमाण

रख दोगे तुम कुतर्कों के धनुष-बाण

मैं एतद् द्वारा घोषणा करता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

हम जन्मे हैं कई बार कई कोख से

हमें नहीं पता हम किसकी संतान हैं

इतना जानते हैं पर

जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं

हम उस राम के वंशज नहीं

माफ़ करना रामभक्तों

हम रामज़ादे नहीं!

हे शुद्ध रक्तवादियों,

हे पवित्र संस्कृतिवादियों

हे ज्ञानियों-अज्ञानियों

हे साधु-साध्वियों

सुनो, सुनो, सुनो!

हर आम ओ ख़ास सुनो!

नर, मुनि, देवी, देवता

सब सुनो!

हम अनंत प्रसवों से गुज़रे

इस महादेश की जारज़ औलाद हैं

इसलिए डंके की चोट पर कहता हूँ

हम सब हरामज़ादे हैं।

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं।

(मुकेश कुमार , मीडियाकर्मी)

नवम्बर 24, 2014

महात्मा गांधी और वसुधैव कुटुम्बकम : इटेलियन स्टाइल

धार्मिक प्रतीकों से अलग हटें तो पूरी दुनिया में जिस भारतीय का नाम सबसे ज्यादा जाना जाता है और जिस एक भारतीय को पूरी दुनिया सम्मान देती है, और अपनी नै पीढ़ी को जिसके बारे मने लगातार जाग्रत बनाए रखती है उस शख्सियत का नाम गांधी है|

इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य को, कि भारत में ऐसे वर्ग भी हैं जो गांधी से घृणा तक करते रहे हैं,  नजरअंदाज करें तो हर उस भारतीय के लिए जिसे गांधी में थोड़ी सी भी दिलचस्पी है, इटेलियन विज्ञापन एक सुखद एहसास लेकर आता है|

अक्टूबर 31, 2014

महात्मा गांधी बनाम अंग्रेज : कार्टूनिस्ट शंकर की निगाह से

गांधी विरोधी ‘अंग्रेजों’ की खिंचाई कार्टूनिस्ट शंकर स्टाइल

लाजवाब, ऐतिहासिक कार्टून

Gandhicartoon

कार्टून : साभार श्री ओम थानवी (जनसत्ता)

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मई 23, 2014

गांधी Vs हिटलर

 

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एक देश की करुणा संचित होती है गांधी में

एक देश का घमंड एकत्रित होता है हिटलर में

एक के उल्लेख के साथ प्रेम का आभास होता है

दूसरे के साथ घृणा की परिकाष्ठा का भय सताता है

एक आशा और प्रकाश का धोतक है

दूसरे की स्मृति अन्धेरा फैलाती है

पहला मानवता को पोषित करता है

दूसरा मानवता का विनाश करता है

पहला सदियों देश की जयजयकार करवाता है

दूसरा सदा देश को गालियाँ दिलवाता है

चुनाव सदा हाथ में है…

…[राकेश]

अप्रैल 9, 2014

अरविंद केजरीवाल: “आप” बचा पायेगी भारतीय राजनीति को कोर्पोरेट के औपनिवेशिक हमले से?

10000CRORbjpदिल्ली में और कई अन्य स्थानों पर कल 10 अप्रैल को चुनाव होना है और आज 9 अप्रैल को कई बड़े कांग्रेसी नेता ट्वीट आदि माध्यमों से बताते रहे कि भाजपा (मोदी) 10,000 करोड़ रूपये खर्च कर चुके हैं| इतनी अथाह धनराशी के बलबूते भारत को एक प्रोपेगंडा में डुबाकर नरेंद्र मोदी की नकली लहर का भ्रम पैदा करने वाली भाजपा के सामने 20 करोड़ के चंदे के साथ खड़ी “आप” कैसे लड़ पायेगी? क्या पैसा सच्चाई को हरा देगा?

देश को देखना और सिद्ध करना है कि लोकतंत्र में पैसा ही सब कुछ नहीं| आखिर जो लोग 10,000 करोड़ रूपये  चुनाव जीतने के लिए खर्च कर रहे हैं वे सत्ता में आने के बाद इस खर्चे की भरपाई भी तो करेंगे ही और वह वह जनता का शोषण किये बगैर तो हो नहीं सकती|

क्या कांग्रेस चुनाव होने से पहले ही हार मान चुकी है? दिल्ली में कुछ अरसा पहले राहुल गांधी के भी पोस्टर लगे थे पर ज्यादातर उन्ही स्थानों पर अब मोदी के पोस्टर लग गये हैं और राहुल गांधी के पोस्टर लगभग गायब हो गये हैं| कांग्रेस कहीं भी ढंग से चुनाव प्रचार करती नहीं दिखाई दे रही| क्या कांग्रेस कोर्पोरेट आकाओं का आदेश मान कर चुप है कि – इस बार मोदी की सरकार बन जाने दो?
अरविंद केजरीवाल जो कहते हैं उसकी तीव्र और तीखी प्रतिक्रया देश भर में होती है और मीडिया और राजनीतिक नेता उन पर आक्रमण कर देते हैं पर कुछ समय बाद ही अरविंद के कथन सच साबित होने लगते हैं| इस बार भी कुछ महीनों में ही स्पष्ट हो जायेगा कि अरविंद वाकई सच बोल रहे थे कि कोर्पोरेट इस देश पर कब्जा कर चुके हैं और कांग्रेस और भाजपा सरकारों की अदला बदली केवल जनता की आँखों में धूल झोंकने का प्रयास मात्र है|

AKatRajghatकल फिर अरविंद केजरीवाल पर हमला हुआ और सोशल मीडिया पर मोदी समर्थक जश्न मनाते दिखाई दिए और कांग्रेस समर्थक चुटकियाँ लेते|

भारत में मोदी समर्थक बहुतायत में सेडिस्ट हैं और यह बार बार सिद्ध हो रहा है| इतनी बड़ी संख्या में मानसिक रुग्णता इस देश का अहित करेगी ही करेगी| मोदी जैसों के मूड न भी हों पर यह भीड़ अपने अंदर की पाशविक हिंसा की संतुष्टि के लिए उन जैसे नेताओं को तानाशाह बना कर ही चैन पायेगी क्योंकि तब इस भीड़ के लिए अपने विरोधियों से बदला चुकाना और निबटना आसान हो जायेगा|

बड़े आनंद की बात है कि विजय मल्होत्रा जैसे निरर्थक हो चुके नेता को सारी कीमियागिरी पता है कि अरविंद केजरीवाल पर हमले उनकी खुद की रची नौटंकी है, तब वे क्यों नहीं ऐसा नाटक करके वर्तमान राजनीति में सार्थक बन जाते? दूसरा आनंद का विषय है कि जब ये थप्पड़-मुक्के मारने वाले नाटक के पात्र बनते हैं तो क्या पिटने के लिए भी तैयार होकर आते हैं? समर्थक तो ऐसे अचानक उत्पन्न हुए हालात में रोकते रोकते भी दो चार रसीद कर ही देते हैं|

भाजपाइयों की थकी हुयी बुद्धि के अनुसार “आप” और अरविंद केजरीवाल सब कुछ मीडिया का ध्यान पाने के लिए करते हैं| भाजपाइयों की मूर्खतापूर्ण सोच के साथ यही सिद्ध होता है पहले दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा के पैरों के नीचे से कालीन खींच कर “आप” ने सोचा कि अब सरकार बनाने के बाद तो मीडिया उन्हें पूछेगा नहीं सो उन्होंने आनन्-फानन में विनोद कुमार बिन्नी को लुभाया और उससे कहा कि अब तू “आप” से विद्रोह करने का नाटक कर और रोज मुझे और “आप” को गालियाँ दे| तू भी मीडिया में रहेगा और हम भी| और देखना कहीं भाजपाइयों और कांग्रेसियों के साथ रसगुल्ले खाते हुए न पकड़ा जाना वरना तेरा सारा खेल चौपट और तेरे साथ हमारा भी|

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कुछ दिन ऐसा चला फिर अरविंद ने अपने कई साथियों को, जो “आप” में रहकर दिल में भाजपा को बसाए रखते थे, कहा कि अब वे एक एक करके उनका और “आप” का विरोध करें और “आप” छोड़ दें या “आप” उन्हें निकाल देगी और इस तरह सभी चरित्र मीडिया में बने रहेंगे| “अश्विन उपाध्याय” को भी भरमाया कि भाई तुम ऐसे ऐसे आरोप लगाओ कि मीडिया दौड़ा चला आए तुम्हारे पास और तुम ऐसे ऐसे संवाद बोलना कि मीडिया सारे सारे दिन तुम्हारे वचन ही दिखाता रहे| फिर अरविंद ने अपने को पिटवाने और शारीरिक क्षति पहुंचाने वाले लोग भी तैयार कर लिए| आखिर मीडिया में बने जो रहना था|

बातों के थप्पड़ सही, और लात-घूंसों के मामले झूठे? वाह भाजपा, वाह  कांग्रेस!

वो (भाजपाईकांग्रेसी) क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती, अरविंद आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम!’ !

सरकार, क़ानून और मीडिया और कांग्रेस + भाजपा क्या अरविंद केजरीवाल और “आप” द्वारा एफ.आई.आर करवाने का ही मुँह ताकते रहते हैं? किसी ने शारीरिक हमला किया, जमाने ने देखा, हमलावर को पकड़ो, जैसी जांच करवानी है करवाओ, उसे क़ानून के घेरे में लाओं| मीडिया और विपक्षी अपने तौर पर गहरी जांच कर लें कि सच्चाई क्या है| दसियों हजार करोड़ खर्च करने वाली भाजपा के पास क्या लोकल जासूसों को देने के लिए भी पैसे नहीं बचे जो सच्चाई सामने लाकर अरविंद को दुनिया के सामने एक्सपोज कर दें? कहाँ गये मीडिया के स्टिंग धुरंधर? ज़रा सामने तो आओ, अपनी कला का नमूना दिखाओ| या भय यह है कि अगर असली मास्टर माइंड तक पहुँच गये लोग तो किरकिरी हो जायेगी?

अरविंद तो खुद ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर श्री बी.एस.बस्सी के पास गये कि उन पर हो रहे लगातार हमलों की जांच करवाई जानी चाहिए जिससे कि पता लग सके इन् सब हमलों के पीछे कौन मास्टर माइंड है?

अरविंद अपने पर आक्रमण करने वाले से मिलने उसके घर गये तो AK laliभाजपा को तो छोड़ ही दें संघ को भी समस्या होने लगी कि वे क्यों अपने पर हमले करने वालों को माफ करे दे रहे हैं|

“लगे रहो अरविंदभाई” गांधीगिरी में, बदलाव आएगा ही आएगा!

जन्म से ही कोई महान नहीं होता, अलबत्ता उसमें ऐसी संभावनाओं के बीज जरुर छिपे रहते हैं पर उसे सप्रयास इन् बीजों को अंकुरित करके पहले पौधे और बाद में फल-फूल से भरा वृक्ष बनाना पड़ता है और यह एक लंबा और सतत चलने वाला और बेहद कठिन और परिश्रमबद्ध कार्य होता है| इस कार्य में परिस्थितियाँ और विरोधी लोग बार-बार अपमान करते हैं, शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचाते हैं, पर कठिन परिस्थितियों और बेहद कठिन कसौटियों से गुजर कर ही जन-नायकों का उदय होता है| महात्मा गांधी की आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” में अतुल्य हीरा बनने की यात्रा का बेहद असरदार वर्णन है| गांधी जब अपने अंतस पर नियंत्रण पाकर, जनता के दुख दर्द तो आत्मसात करके उनके हित की ही बात करके जीने का प्रण लेकर द.अफ्रीका से भारत आए तो वे 45 साल के थे| और अगले कुछ दशकों में उन्होंने गुलामी के कारण थक-हार कर घिसट-घिसट कर जीवन जीते भारत की न केवल आत्मा को जगाया बल्कि निहत्थे, गरीब और कमजोर भारतीयों को इतने  तेज से भर दिया कि वे पूरे देश में अंग्रेजों और उनकी अथाह ताकत के सामने सिर उठा कर खड़े हो गये और अंग्रेजों को यहाँ से अपना अत्याचारी राज खत्म करके वापिस अपने देश जाना पड़ा|

AAP49daysगांधी का अंतिम सपना “स्वराज” का था परन्तु ऐसे लोग जो अंग्रेजों के शासन में अपनी ज्यादा भलाई समझते थे, उनके ऐसे किसी भी लक्ष्य के विरोधी थे और अंततः साम्प्राद्यिक राजनीति की कुत्सित विचारधारा में पाले बढे अपराधी मानसिकता के लोगों ने गांधी की ह्त्या कर दी| जिन्होने देश को सम्भाला अंग्रेजों के बाद, उनका लक्ष्य “स्वराज” नहीं था, और अपनी तमाम भलमनसाहत के बावजूद वे इस बात के लिए सही तरीके से शिक्षित नहीं थे कि सोच विचार कर गांधी के लक्ष्य को पूरा करने के मार्ग पर चल सकें और बाद के नेताओं की पीढियां तो अपने घर भरने में ही लगी रहीं और भ्रष्टाचार को इस कदर पचने वाला तत्व बना दिया गया भारतीय समाज में भारतीय राजनेताओं द्वारा कि ऐसा माने जाना लगा कि ईमानदारी की बात करने वाला आदमी “पागल” होता है|
दशकों भारत में भ्रष्टाचार का अँधेरा व्याप्त रहा है अब जाकर कुछ रोशनी की किरण चमकी है और इस आशा को जगाने में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ है, परन्तु यह आंदोलन किसी खास राजनीतिक दल के खिलाफ सीमित नहीं हो सकता और इसीलिए जो लोग इस आंदोलन से अपने राजनीतिक हित साधने के लिए जुड़े थे वे धीरे धीरे करके अपने अपने राजनीतिक आकाओं के पाले में जाकर बैठ गये हैं और खुलकर भारतीय राजनीति में ईमानदारी लेन वाले निष्पक्ष योद्धाओं के खिलाफ मोर्चा संभाल रहे हैं|

AKpolice
45 साल के अरविंद केजरीवाल को भी हम लोग अपने को निरंतर अपने को गढते, तराशते और तैयार करते देख रहे हैं और उनके बहुत से अन्य साथी भी इस कार्य में लगे हुए हैं| और यही एक बात बहुत बड़ी आशा बंधाती है| ऐसा कभी किसी काल में नहीं हुआ कि सिर्फ अपना हित देखने वाले भ्रष्टाचारी, बुरी ताकतों के खिलाफ कोई आवाज उठाये और ये ताकतें उस आंदोलनकारी का पुरजोर विरोध न करें| वे करेंगे और उनका लक्ष्य ऐसे विरोध को कुचलने का और संभव हो तो ऐसे नेता को नष्ट करने का होता है| यही सब कुत्सित प्रयास हमारे इर्द-गिर्द चल रहे हैं| पर बुराई के साथ साथ अच्छाई का जन्म और विकास भी प्रकृति में चलता ही रहता है और हर बार प्रकृति यह स्थापित करके दिखाती है कि अंततः अच्छाई बुराई पर विजय प्राप्त कर ही लेती है| यह जीत आज मिले या दस साल बाद या बीस साल बाद मिले पर भारतीय राजनीति के उद्धार की जो प्रक्रिया शुरू हुई है यह अब रुकने वाली है नहीं| आर्थिक और सुविधाओं के लिहाज से समाज के सबसे नीचे तबके से लेकर सबसे ऊपर के तबके में सुगबुगाहट है और एक मंथन चल रहा है और हर स्तर से लोग इस आंदोलन के समर्थन (और विरोध में भी) में सामने आयेंगे या मौन रहकर अपना मत देकर समर्थन देंगे| इस आंदोलन के कारवाँ के यात्रियों को हमेशा एक बात स्मृति में रखने की जरुरत है कि वे अकेले नहीं हैं और उन जैसी भावनाओं वाले करोड़ों भारतीय देश के कोने कोने में इस महान यात्रा में उनके सहभागी हैं| भारत सुधार की ओर अग्रसर है, सो स्पष्ट है कि भ्रष्ट ताकतें अपने हमलों की तीव्रता और शक्ति बढाएंगी ही पर यही उनकी हताशा का सूबूत भी होगा|

दिल्ली में और कई अन्य स्थानों पर जहां कल चुनाव होगा, “आप” कि स्थिति बहुत बेहतर है कांग्रेस और भाजपा की तुलना में, और ऐसा हुआ है भाजपा और कांग्रेसी षड्यंत्रों के बावजूद|

Vote4AAP
रात में एक आरामपूर्ण नींद के बाद सुबह उठकर ताजगी भरे मन से देश की सफाई की शुरुआत करने की बेहद महत्वपूर्ण घड़ी लोगों के सामने कल सुबह 7 बजे आ जायेगी और पूरे दिन यह शुभ उपलब्ध रहेगा| देश की सफाई के लिए “झाडू” को शक्ति देना एक पुनीत कार्य में हाथ बंटाना है| पहली बार वोट देने वालों ने इतना थ्रिल पहले कभी महसूस नहीं किया होगा जीवन में जैसा वे कल सुबह करेंगे “झाडू” को वोट देते हुए|
“आरम्भ” होती है “आप” की देश-सफाई -यात्रा कल सुबह से! कल का वोट देश में बड़े बदलाव लाने का पहला और बेहद महत्वपूर्ण कदम है|

 

जनवरी 24, 2014

अरविंद केजरीवाल : अकेला ‘धरना’ क्या भाड़ झोंकेगा!

arvindkअरविंद केजरीवाल एक संवैधानिक पद पर हैं और इस छोटी अवधि वाले आंदोलन से उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे आप के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री दोनों के रूप में जनता के हितों को साधने के अपने धर्म की रक्षा भली भांति कर सकते हैं| उन्होंने एक बार कहा था कि वे और आप पुराने दलों और नेताओं को राजनीति सिखाने आए हैं और उन्होंने इसे सिद्ध भी कर दिया|

किरण बेदी जैसे एक्टीविस्ट लोग, जो ईर्ष्या और “अंगूर खट्टे हैं” वाले सिंड्रोम से पीड़ित हैं, जब टीवी पर विलाप करते हुए चीखते हैं कि मीडिया को हटा लो और फिर देखो कितने लोग वहाँ रहते हैं तो वे भूल जाते हैं कि 20 जनवरी की सुबह अरविंद केजरीवाल तो गृहमंत्री के दफ्तर के बाहर अपने छह मंत्रियों के साथ धरना देने चले थे और उन्होंने आम जनता को वहाँ आने से मना किया था| चार हजार पुलिस वाले अगर परिंदे को भी पर नहीं मारने देते रेल भवन पर तब भी अरविंद केजरीवाल अपने छह साथियों के साथ डटे रहते| मीडिया को तो खबर चाहिए और आज की तारीख में अरविंद केजरीवाल से बढ़कर कोई नहीं है जो उन्हें एक्सक्लूसिव बाईट दे|

26 जनवरी की तारीख देखते हुए अरविंद केजरीवाल का 20 तारीख को धरने पर बैठने का निर्णय दुधारी तलवार जैसा था और यही हालत केन्द्र सरकार की भी थी| अरविंद केजरीवाल को रेल भवन पर रोकने का निर्णय केन्द्र सरकार का था जिसके बाद ही अरविंद केजरीवाल ने अपील की कि धरने के समर्थक वहाँ पहुंचें| अगर गृहमंत्री दिल्ली के मंत्रियों को अपने मंत्रालय के बाहर बैठने देते तो बहुत से टकराव टाले जा सकते थे| पर केन्द्र सरकार को तो अरविंद केजरीवाल को बदनाम करना था सो सुबह से ही मेट्रो के चार स्टेशन बंद कर दिए गये| उन्हें अपने चार हजार पुलिस वालों पर भरोसा नहीं था कि वे जनता को वहाँ जाने से रोक पायेंगे|

कुछ लोग दलीलें दे रहे हैं कि कम समर्थक वहाँ उमड़े इसलिए अरविंद केजरीवाल ने निराश होकर धरना वापिस ले लिया| लोग भूले दे रहे हैं कि धरना सोमवार से शुरू हुआ था और कामकाजी वर्ग को धरने पर जाने में बहुत मुश्किलें आनी थीं| और लोगों को वहाँ आने की अपील सोमवार दोपहर के आसपास की गयी| एकदम से तो लोग पहुँच नहीं पायेंगे तब विशेष रूप से जब पुलिस ने वहाँ छावनी बना डाली हो| इसके बाद भी यही धरना अगर शुक्रवार को शुरू होता तो आधी से ज्यादा दिल्ली वहीं नजर आनी थी| पिछले साल दामिनी मामले में शनिवार और रविवार को उत्पन्न हुए जमावड़े को याद कर लें तो बात आसानी से समझ में आ जायेगी और अरविंद केजरीवाल का यह कदम इतना अजूबा था आम जनता के समझने के लिए कि जब तक वे इसके लाभ, नुकसान और अर्थ को समझ पाते, धरना ही खत्म हो गया|

अरविंद केजरीवाल और आप का लचीला रुख सामने आया जो फिर से भाजपा और कांग्रेस के दुष्प्रचारों पर कुठाराघात था| इन्हें आशा थी कि अरविंद केजरीवाल अड़ियल आदमी की तरह अड़े रहेंगे और सत्ता तंत्र  उन्हें कुचल देगा|

अरविंद केजरीवाल  की तुरंत निर्णय लेने की क्षमता (या आलोचक उतावली कहना चाहें तो कह सकते हैं), उनके इस धरने से स्पष्ट हो जाती है|

गांधी भी अपने आंदोलनों को एक अवधि के बाद वापिस लिया करते थे जिसका एक बड़ा कारण स्पष्ट है कि जनता की भागीदारी वाले आंदोलन बहुत लंबे समय तक नहीं खींचे जा सकते क्योंकि हरेक की अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याएं गुरुत्वाकर्षण बल का काम करती हैं व्यक्ति की आंदोलनकारी प्रवृत्ति पर|

अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ पर मौजूदा राजनीतिक तंत्र की तरह से किये जा रहे हमलों के कारण राजेश जोशी की एक प्रसिद्द कविता की कुछ पंक्तियाँ बेहद प्रासंगिक दिखाई देती हैं|

बरदाश्त नहीं किया जायेगा

किसी की कमीज हो

उनकी कमीज से ज्यादा सफेद।

जिसकी कमीज पर

दाग नहीं होंगे

मारे जायेंगे।

इस समय

सबसे बड़ा अपराध है

निहत्था और निरपराध होना।

जो

अपराधी नहीं होंगे

मारे जायेंगे। 

कांग्रेस की यह चाल थी कि आप की सरकार बनाकर वह इसकी कमीज को भी पुराने दलों जैसी गंदी साबित कर देगी और फिर से सालों के लिए अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित कर लेगी| किसी भी मामले पर कमेटी बैठा देना, जांच समिति बैठा देना इस आशा में कि कुछ दिनों में जनता भूल जायेगी और मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा, ऐसा अभी तक सारे राजनीतिक दल करते आए थे| पुराने राजनीतिक तंत्र द्वारा सारी कवायद यही चल रही है कि देश के सामने यह जल्दी से जल्दी सिद्ध कर दिया जाए कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथी भी उतने ही भ्रष्ट हैं, अगर यह नहीं होता तो देश को दिखाया जाये कि ये लोग अक्षम हैं सरकार चलाने में| कांग्रेस रोज ही राग अलापती है कि वह ‘आप‘ को तब तक समर्थन देगी जब तक वे जनहित के काम करते रहेंगे पर अंदरखाने वह किसी भी तरह ‘आप‘ कुछ भी ऐसा नहीं करने देना चाहती जिससे कि इनकी छवि बने या निखरे| कांग्रेस ने पहले हाँ करके अब अरविंद केजरीवाल को उनकी भ्रष्टाचार रोधी शाखा के लिए उपयुक्तत अधिकारी देने में असमर्थता दिखाई है| कुछ ही दिन पहले एक टीवी साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वे कॉमनवेल्थ खेल घोटाले को उजागर करने के लिए सम्बंधित फाइलें देख रहे हैं और कांग्रेस पछताएगी कि उसने क्यों ‘आप‘ को समर्थन दिया| कांग्रेस को ‘आप‘ की सरकार को समर्थन एक जाल है और ‘आप‘ को इस चक्रव्यूह को तोड़कर ही अपनी श्रेष्ठता दिखानी है|

अगर केन्द्र सरकार और पुराने राजनीतिक दल ये सोच रहे हैं कि वे अरविंद केजरीवाल को अपने जैसा बना लेंगे तो यह धरना उनकी आँखें खोलने के लिए पर्याप्त है कि ऐसा होने वाला है नहीं|  अरविंद केजरीवाल के धरने ने स्पष्ट जता दिया है कि उनके साथ और उनके रहते भारत में ऐसा हो पाना कठिन होगा और आगे तो यह असंभव हो जाएगा| जो गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि धरना अराजक था उन्हें अपने सिद्धान्त और अपने विचार फिर से खंगालने की जरुरत है| अरविंद केजरीवाल राजनीति में पुराने की जगह बैठ कर वही सब करने नहीं आए हैं जो चलता आ रहा है| वह इस खेल के सारे नियम बदलने आए हैं| इसमे कतई अतिशयोक्ति नहीं कि अगर ऐसा उस समय होता जब गांधी, सुभाष और भगत सिंह जिंदा थे तो शत प्रतिशत तीनों क्रांतिकारी नेता इस धरने के मंच पर बैठे दिखाई देते|

इस धरने ने कांग्रेस को स्पष्ट सन्देश दे दिया कि वह ‘आप‘ की बांह मरोड कर राजनीति नहीं कर सकती और ‘आप‘ चांटा खाकर दूसरा गाल आगे करने वाली है नहीं वह कांग्रेस के दोनों गाल जनता के सामने शर्म से लाल करवा देगी ज्यादा बुद्धिमत्ता दिखाकर| अभी कांग्रेस की एक चाल ‘आप‘ पर भारी रही है मेट्रो को बंद करके कांग्रेस ने पूरा इंतजाम कर दिया कि आम लोग ‘आप‘ के खिलाफ हो जाएँ| हो सकता है इस बात ने ‘आप‘ को बहुत प्रभावित किया हो पर थोड़ी अवधि में लोग असल बात समझ जायेंगे|

भाजपा को सन्देश दे दिया कि अब मुद्दे ‘आप‘ निश्चित करेगी और भाजपा की मजबूरी रहेगी ‘आप‘ के उठाये मुद्दों पर प्रतिक्रया देकर या उसकी नक़ल करके उसकी पिछलग्गू पार्टी बनने की|

किरण बेदी जैसे किसी खास भावना से ग्रस्त हो चुके दिमाग ही यह सोच सकते हैं कि सोमनाथ भारती के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए यह धरना आयोजित किया गया था| उनकी जानबूझ कर बंद की हुयी आखें देख पाने में असमर्थ हैं कि सोमनाथ भारती का मुद्दा क्या भुला दिया गया, क्या वह पार्श्व में चला गया? बल्कि वह तो और ज्यादा सामने आ गया है| सोमनाथ भारती की आड़ में पुरानी राजनीति ‘आप‘ पर और तीव्र हमले करगी| हो सकता हो सोमनाथ भारती की गलती हो पर क्या सिर्फ इसलिए कि यह मुद्दा ‘आप’ सरकार से जुड़ा हुआ है, एक ड्रग्स और देह व्यापार से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण मसले को रंगभेद और नस्लीय अंतर का मामला करार देकर देश की छवि से खेल सकते हैं पुराने दल? सोमनाथ भारती बलि चढ़ जायंगे या नहीं मुद्दा यह नहीं है|

वास्तविक  मुद्दा यही है कि भारतीय राजनीति में बदलाव की क्रिया शुरू हो चुकी है| या तो पुरानी राजनीति अपने आचार व्यवहार और सोच में परिवर्तन लाकर सच में समाज में अंतिम व्यक्ति के हितों की रक्षा करने के प्रयास करेगी, या जनता ही इन्हें सुधरने पर मजबूर कर देगी और वे दोनों ही तेरीकों से नहीं सुधरते तो धरती पर जीवन का इतिहास बताता है कि अस्तित्व तो यहाँ बेहद शक्तिशाली डायनासोर का भी नहीं रहा, भ्रष्ट राजनीति भी अप्रासंगिक हो दफा हो जायेगी|

पुराने राजनीतिक दलों, उनके थिंक टैंक, बड़े बड़े राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार, लेखक, समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी, कोई ऐसा नहीं है जो पहले से अनुमान लगा ले कि अरविंद केजरीवाल और योगेन्द्र यादव एवं साथी क्या करने वाले हैं, इनकी दिशा क्या है? ये लोग जब कुछ कर देते हैं तब बुद्धिजीवी मंथन शुरू कर देते हैं| दो बातें संभव हैं – या तो जहां इनकी  किताबी सिद्धांत आधारित बुद्धि खत्म हो जाती है उससे परे का ‘आप‘ पार्टी के कर्ता-धर्ता सोच रहे हैं या वे इतना साधारण सोच रहे हैं और इन बुद्धिजीवियों को नाक और आँखें नीचे करके सोचने का तरीका ही नहीं आता सो वे देख और समझ ही नहीं पा रहे हैं अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक  रणनीति, जो खुलेआम कदमताल करती हुयी समाज के सबसे निम्न वर्ग की ओर बढ़ती जा रही है, और रास्ते से सभी वर्गों की सहूलियत के लिए भ्रष्टाचार पर झाडू फेरती जा रही है|

यह धरना समाज के अंतिम व्यक्ति का महत्व भारतीय राजनीति के सम्मुख बढाने की ओर पहला कदम है|

गांधी ने कहा था कोई भी योजना बनाने से पहले समाज के अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचना कि क्या यह योजना उसे लाभान्वित करेगी अगर नहीं तो योजना बेकार है| अरविंद केजरीवाल उसी ओर बढते नजर आ रहे हैं| उच्च वर्ग को तो अरविंद केजरीवाल से बहुत दिक्कतें होने वाली हैं क्योंकि दशकों से जो घोषित एवं अघोषित सब्सिडी विभिन्न सरकारों से लेकर उन्होंने अपनी सम्पन्नता को बरकरार रखा है वह सुविधा खत्म हो जायेगी अगर आप केन्द्र की राजनीति में अपना दखल बढाती है| एफ.डी.आई पर दिल्ली राज्य में आप सरकार द्वारा निर्णय लेते ही मीडिया चैनलों और अखबारों की तोपें आप सरकार की तरफ स्पष्ट रूप से गोले दागने लगीं|

सुविधाभोगी वर्ग को बेहद तकलीफ होती है जब कोई विकेन्द्रीकरण की बात करता है क्योंकि उनके लिए आसान है एक खास वर्ग को अपनी मुट्ठी में रखना परन्तु अगर आम जनता में शक्ति फ़ैल जाए तो उन्हें बेहद मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है, कठोर परिश्रम करना पड़ता है|

पूरे देश ने देखा होगा एक युवक को जो धरना स्थल पर पुलिस के समूह में घूम घूम कर तलाश कर रहा था कि किस पुलिस वाले ने उसे मारा था| क्या कोई सोच सकता था ऐसा हो पाना अब से पहले? पुलिस ने अपनी छवि एक दुर्दांत समूह की बना ली है| बहरहाल इतना तय है कि इस धरने के बाद दिल्ली पुलिस न तो अरविंद केजरीवाल सरकार को और न ही आम जनों की समस्याओं को टालने की हिम्मत कर पायेगी| उसे एक्शन लेना ही पड़ेगा वरना जनता में उसके खिलाफ असंतोष बढ़ता ही जाएगा और मुखरित भी होने लगेगा| आखिरकार जनता को इतना तो समझ में आता ही है अब कि चाहे पुलिस का सिपाही हो या कमिश्नर, दिल्ली में गृह सचिव हो या उनके दफतर में कार्यरत सबसे छोटा सरकारी कर्मचारी, सबक वेतन जनता के दिए धन से ही चुकाए जाते हैं और उनकी जवाबदेही जनता के प्रति है| भ्रष्ट तंत्र ने ऐसा माहौल बना दिया था कि सरकारी कर्मचारियों को जनता के प्रति उत्तरदायित्व होना चाहिए ऐसी धारणा ही खत्म हो चली थी| इस धरने से बहुत से सरकारी कर्मचारी अपने आप ही अपने उत्तरदायित्व का पालन करते नजर आयेंगे क्योंकि उन्हें दिख गया होगा कि अब जनता ज्यादा जागरूक हो गई है|

आप पर हमले बढते जा रहे हैं| रोचक बात है कि आप जनता की लड़ाई लड़ रही है और जनता खुद आप के लिए लड़ रही है| दीवार पर इबारत साफ़ साफ़ लिखी है जिन बुद्धिजीवियों को दिखाई नहीं दे रही उन्हें भी कुछ महीनों में दिखने लगेगी|

ऐसा भी संभव है कि पुरानी राजनीति अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ को समाप्त कर दे या हरा दे पर अब इस क्रान्ति के बीज को पनपने से रोका नहीं जा सकता|

किसी और से ज्यादा ये पंक्तियाँ अरविंद केजरीवाल और आप के लिए ज्यादा मुनासिब दिखाई देती हैं|

मेरी हिम्मतें अभी झुकी नहीं,

मेरे शौक अभी बुलंद रहे

मुझे हार-जीत से क्या गरज

मेरी जंग थी मैं लड़ा किया!

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