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मई 26, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नितिन गडकरी : भ्रष्टाचार एवं मान हानि केस

AK court case
अरविन्द और उन की पार्टी का यह मानना है कि उन्होंने नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया था वह सही था और ऐसा करना जनहित में था। ऐसा करना वे लोग अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि कोई इस कारण से उन पर किसी अदालत में मुकदमा करता है तो वे प्रतिभूति-बंधपत्र नहीं देंगे। उन का कहना यह भी है कि उन्हें कई बार बिना प्रतिभूति-बंधपत्र के केवल निजी मुचलके पर छोड़ा जा चुका है। अदालत के आदेश के अनुसार प्रतिभूति-बंधपत्र प्रस्तुत करना या न करना उस व्यक्ति के चुनाव पर निर्भर है जिसे ऐसा आदेश दिया गया है। अरविंद एक राजनैतिक व्यक्ति हैं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलनरत हैं। उन्होंने प्रतिभूति-बंधपत्र प्रस्तुत कर रिहा होने के स्थान पर उसे प्रस्तुत न कर जेल में रहना पसंद किया। यह उनका निजी मामला है। प्रेस को इसे हौवा बनाने से बचना चाहिए।
AK Jail

अरविंद की पार्टी ने बेईमान लोगों की एक सूची जारी की थी, जिसमें देश के अनेक राजनेताओं के नाम थे। स्पष्ट था कि अरविन्द की पार्टी खुद तो सब के विरुद्ध मुकदमा चलाने से रही। उनका मानना है कि यह राज्य का दायित्व है कि वह भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध मुकदमा चलाए। सूचीबद्ध नेताओं में एक नितिन गडकरी ने अरविन्द के विरुद्ध माँ हानि किए जाने के अपराध का परिवाद अदालत में प्रस्तुत किया। यदि अरविन्द खुद गडकरी के विरुद्ध मुकदमा पेश करते तो उन्हें खुद ही साक्ष्य से साबित करना होता कि गड़करी ने भ्रष्टाचार किया है या फिर बेईमानी की है।

Kaushik
लेकिन अब गडकरी को अपने मुकदमे में साबित करना पड़ेगा कि अरविन्द ने जो किया उस से उन का अपमान हुआ है। इस के लिए गडकरी को खुद गवाही देनी होगी और गवाही के दौरान अरविन्द और उस के वकीलों को उन से सवाल करने का अवसर मिलेगा। उनके सामने प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों और खुद के बयानों का स्पष्टीकरण देना पड़ेगा। जो निश्चित ही गडकरी को कठगरे में खड़ा करने वाला और मजेदार होने वाला है। यह सब आगे आने वाली राजनीति पर भी अपना असर छोड़े बिना नहीं रहेगा। (नौशाद)

MKSINGHAL
बेल के खेल की एक कथा विस्तार से पढ़ें

सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस – भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 3, 2011

भ्रष्टाचार: कुछ अनबुझे सवाल

एक किसान होकर मैं
पूछता हूँ कि,
बीज बोने से लेकर
फसल काटने तक
किसान, खेत मज़दूर जो
जीतोड़ मेहनत करके
अपनी फसल तैयार करके
मंडी में बेचने ले जाता है
और वहां कौड़ियों के भाव
अपनी फसल बेचने के बाद
खाली हाथ लौटकर
क़र्ज़ के बोझ तले
घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर
आत्महत्या को विवश होता है,

और

किसान से खरीदी गयी
उसी फसल को
चौगुने दाम बेचने वाले’ दलालों’
और जो खुली बाज़ार व्यवस्था के नाम पर
किसान, मज़दूर के भाग्य से
खुलकर खेलतें हैं
उन मुनाफाखोरों से निबटने का
क्या लोकपाल के पास
कोई उपाय है?

जो किसान, खेत-मजदूर अन्न उगाए
वही पेट भर न खाए
व्यवस्था की इससे बड़ी नाकामी
और कोई है क्या?

यह केवल अन्याय ही नहीं
एक बड़ा अत्याचार भी है
जो रोटी पैदा करे
उसी से रोटी छीन ली जाए
और अन्न
बड़े बड़े ताले लगे गोदामों में
ज्यादा कीमतों के फेर में
भूखे गरीब का पेट भरने के बजाय
सड़, गल कर फैंक दिया जाए
तो ऐसे जमाखोरों से
निबटने के लिए
लोकपाल के पास
है कोई उपाय?

इसलिए
उस शहरी पढे लिखे मध्यम वर्ग
जिसने थाली में पड़ी
गोल रोटी तो देखी है
पर जिसे यह अहसास नहीं कि
इस रोटी के पीछे
किसान खेत मज़दूर की
कितनी पसीने की बूंदे बहीं हैं
भला सोचो वह क्योँ और
कितनी कशिश से
इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ सकता है?

सबको रोटी कपड़ा
पैदा करने वाला किसान, खेत मज़दूर
जब तक पेटभर रोटी और
पूरा तन ढकने के लिए कपड़ा
तक भी न जुटा पाएगा
तब तक
भ्रष्टाचार के विरुद्ध
लड़ी जाने वाली कोई भी लड़ाई
इसलिए सफल न होगी

क्योंकि…

अत्याचार और अन्याय
किसी भी किस्म के
भ्रष्टाचार से बढकर होता है!

(अश्विनी रमेश)

अगस्त 26, 2011

अन्ना सोचो तो बताओ तो

मैं जनता हूँ
मुझमें और कसाई की भेड़ों में
बस इतना ही अंतर है,
भाषणों के बाजीगरों द्वारा
संवेदना की छुरियों से काटा जाता है मुझे।

मेरा पथप्रदर्शक ही असल पथभ्रष्ट हैं
उसका रास्ता सदा शहादतों को रौंधता हुआ
सत्ता सुख तक जाता है।

हर आंदोलन में ठगा जाता है
स्वप्निल दुनिया में जीने वाला मध्यम वर्ग
या फिर सर्वहारा शोषित
समाज की यही भीड़
ज़मीनी वास्तविकताओं से दूर
असम्भव को संभव बनाते वादाफरोशों की
सबसे बड़ी शिकार है।

कोई हो तो बताओ
आंदोलनो, क्रान्तियों या इन्कलाबों से
सत्ता परिवर्तन के सिवा क्या हुआ है?
जनता का कितना भला हुआ है?

समय के गुलाम उत्तेजित हालात
नियति के धारे में जाने कब बह जाते हैं
न भूख की तस्वीर बदलती है, न प्यास की सूरत।

अन्ना हो कि कोई दूसरा मसीहा
हालात में बदलाव के सूत्रधार
आंदोलनों के बेक़सूर औजार
ज़हर के प्यालों, सूलियों या गोलियों के शिकार
चौराहों पर पत्थर के बुत बना दिए जाते है।

कबूतरों का वास बन कर
बीटों में सड़ते रहते है बेचारे
बाकी कुछ भी नहीं बदलता
कैलेण्डर के पन्नों के सिवा।

(रफत आलम)

अगस्त 25, 2011

कितना ज़रूरी है सह-अस्तित्व पर चलना

भ्रष्टाचार
भौतिकवाद का लाडला परपोता है
जबकि पूंजीवाद इसका बेटा
और उपभोक्तावाद
भौतिकवाद का पोता है।

इतनी पीढ़ियों तक
जिस भौतिकवाद ने
अपने पांव जमा दिए हों
तो सोचो ज़रा
बाप, दादा, परदादा के होते
क्या तुम इस लाडले परपोते
भ्रष्टाचार के पांव उखाड़ सकते हो?

यह तुम कैसे भूल गए कि
तुम भी तो उस
राजा परीक्षित की संतान हो
जिसने कलियुग यानी
मशीनीयुग संपन्न भौतिकवाद को
अपने मुकुट पर जगह देकर
इसे सम्मानित, सुशोभित किया था।

इसके असर का जादू तो
तुम पर भी सिर चढ़कर बोलता है
एक चेतन पुरुष ने भी तो
सही कहा था कि
भौतिकवाद का चहेता पूँजीवाद
अपने नए नए रुप बदलकर
इन्सान को छलने के लिए शोषण के
नए नए तरीकों के साथ आता है।

उपभोक्तावाद हमारे युग का वही चेहरा है
जिसे भौतिकवाद की संतान पूंजीवाद ने
तुम्हे रिझाने के लिये
मैदान में उतारा है
और तुम उपभोक्तावाद से
ऐसे ही आकर्षित होते हो
और ऐसे ही नाचते हो
जैसे मदारी बन्दर को नचाता है
फिर भ्रष्टाचार से शिकायत कैसी और क्योँ?

यह तो बेचारा उसी उपभोक्तावाद का
बच्चा ही तो है
उपभोक्तावाद की न रूकने वाली प्रतिस्पर्धा में
तुम्हारा तो केवल
एक ही लक्ष्य है
प्रतिस्पर्धा यानि अपने पड़ोसी और
दूसरे लोगों से
तुम आगे रहना चाहते हो।

प्रतिस्पर्धा,
उपभोक्तावाद का ऐसा करिश्माई जादू है
जो हर व्यक्ति के
सर चढ़कर बोलता है
अगर तुम्हारे पडोसी के पास
मारूति ८०० है तो तुम
मारुति स्विफ्ट खरीदकर ही दम लोगे
उसके पास चार कमरे है तो तुम
आठ कमरे बनाकर ही छोड़ोगे
जब हर व्यक्ति प्रतिस्पर्धा के
चक्रब्यूह में फसा हुआ है तो
क्या भ्रष्टाचार पर किसी
जादुई छड़ी से अंकुश लगेगा
या फिर क़ानून बनाने से
कानून को लागू करने वाले और
उसपर अमल करने वाले
क्या आसमान से टपकेंगे
वे भी तो तुम्ही में से होंगे

इसलिए व्यक्ति सुनो!
जिस दृढ़ता के साथ
कलियुग यानि भोतिकवाद के मशीनीयुग ने
इस पृथ्वी पर अपना पांव जमाया है
क्या तुममे इतना धैर्य और दृढ़ता है
जो इस पांव को निष्प्रभाव कर सके, उखाड़ सके
अभी ऐसा नहीं लगता
फिर भी यदि कोई
ईमानदारी से
इस मज़बूत पांव उखाड़ने की
अपनी सोच में भी
नियत रखता है तो
वह व्यक्ति इसलिए ईमानदार है कि
उपभोक्तावाद उसे अभी
अन्धा और निष्क्रिय नहीं कर पाया
और उसकी चेतना जिंदा है।

यह जानते हुए कि
जीवन का अहसास
वस्तु से नहीं
चेतना से है
और प्रतिस्पर्धा–
एक व्यक्ति से
दूसरे व्यक्ति के बीच का
वह फासला है
जो उन्हें नज़दीक नहीं आने देता
और जिस दिन तुम
यह अहसास कर लोगे कि
यह फासला स्वाभाविक नहीं बल्कि कृत्रिम है
उस दिन तुम
प्रतिस्पर्धा की अन्धी दौड़ से
बाहर निकलकर
अपनी जीवनयात्रा के
सहयात्रियों का बारी बारी हाथ पकड़कर
इस जीवनयात्रा को
सुखमय बना दोगे
और इस तरह तुम
सह-अस्तित्व के पथ पर
चलते हुए
जीवन को जीवन की तरह
जीते हुए
इसे सार्थक कर दोगे!

(अश्विनी रमेश)

अगस्त 19, 2011

भ्रष्टाचार और दोहरे चरित्र का द्वन्द

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
बहती हुयी गंगा में
आज हर कोई
हाथ धोने के लिए तत्पर है
केवल यह दिखाने के लिए कि
वह कितना संजीदा है और
कितना बड़ा देशभक्त है
जो खुलकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध
नारेबाजी, धरने, प्रदर्शन कर रहा है
हो सकता है कुछ लोग
इस उद्देश्य के प्रति
ईमानदार नियत और समर्पण रखते हों
और यह भी ठीक है कि
लोकतंत्र में जनहित के मुद्दों पर
लोग जागरूक हों
तभी तो लोकतंत्र बेहतरी की राह पर
आगे बढ़ सकता है
लेकिन यह भी तो
सबसे बड़ा सच है कि
भ्रष्टाचार यानि भ्रष्ट आचरण
जिसका सन्दर्भ यहां
गलत तरीको से
कमाए जाने वाले धन-दौलत से
लिया जा रहा है
वह बुरायी का एक पहलू है
जिसका मूल लालच है
और यदि बीमारी का इलाज
खोजना हो तो उसके मूल
यानि जड़ को पकड़ना जरूरी है
और अब प्रश्न यह कि
बुरायी क्या कभी खत्म हुयी है
या फिर बुरायी पर कभी
ऐसा अंकुश लगा है कि
उसका प्रभाव ही न हो
कभी नहीं
जब से मानवता का इतिहास
जाना जा सकता है
तबसे बुरायी और अच्छाई दोनों
इस तरह विद्यमान रही है
जैसे फूलों के साथ
कांटे भी विद्यमान रहतें हैं
इन्सान की प्रकृति में
तीन गुण-सत्व, रजस, और तमस रहतें हैं
जिनके अंशो के आधार पर ही
एक व्यक्ति में अच्छाई
दूसरे में बुरायी और
तीसरे में अच्छाई और बुरायी दोनों का मिश्रण
अधिक पाया जाता है
और इसके अनुसार ही उनका कार्य भी
इसलिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने के लिए
तत्पर हर व्यक्ति को
अपनी आत्मा के प्रति
होना होगा जवाबदेह
कि वह लालची कर्म प्रवृत नहीं
और यदि जवाब न दे सके तो
इस लड़ाई लड़ने से पहले
उसे करनी होगी
अपने कर्म की शुद्धता से
अन्तःकरण की शुद्धि
क्योंकि ज़ाहिर है कि
नकली मुखौटा जल्दी ही उतरकर
व्यक्ति का असली चेहरा
हो जाता है बेनकाब
और यह तय है कि
दोहरे चरित्र के द्वन्द से
लड़ रहा व्यक्ति
जब स्वयं से ही न जीत पाए तो
वह किसी भी क्रन्तिकारी युद्ध में
समर्पित और विजयी योद्धा कैसे हो सकता है !

(अश्विनी रमेश)

अगस्त 17, 2011

हम खुद ही न मार डालें कहीं अन्ना को!


आजकल हालात के चलते
कई बार सोचने पर मजबूर हूँ
उस सच के बारे में
जिसे सब जानते है
पर बोलने को कोई तैयार नहीं-
यह कि सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भाँग पड़ी है।

मैं दस गुना फीस देकर
डाक्टर से इलाज करा रहा हूँ
उस पर तुर्रा यह
भगवान तुल्य वह बेशर्म डाक्टर
आपरेशन के अलग से मांगता है।

हम में कोई भी कम कहाँ है मित्रों!

बच्चों की आला स्कूल में भरती से लेकर
रेल टिकट तक के लिए
सब खुशी खुशी ऊपर से देते हैं
काले धन बल के बदले
मेघावी उम्मीदवारों को पीछे धकेल
अपनी कर्महीन संतानों के लिए
नौकरियाँ हथियाँ रहे हैं।

सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भांग पड़ी है।

इस बेईमान माहौल में
ये जो बूढा फकीर अन्ना बाबा
ईमान की भीख मांगता फिर रहा है
करनी के हम सब चोर
कथनी से उसे प्रोत्साहित करने वाले
शायद बेचारे को टूटा दिल मार देंगे।

कहो कौन है
अपने काले धन से अटे लॉकर खोलने वाला
बताओ कौन है
जो आगे आकर कहे
बाबा मुझसे पाप हुआ
देश के नाम लो ये
स्विस बैंक की चाबी।

सच तो यह है मित्रों!
सरापा बेईमान हो चुकी इस बस्ती में
ईमान की बात ही फ़िज़ूल है
फिर भी यदि अब भी कहीं
विवेक की चिंगारियाँ बाकी हैं
दुआ करो वे आग बने
काले धन के सर्वव्यापी इस कीचड़ में
ईमान के कंवल खिलें
हो सदा के लिए भ्रष्टाचार के तम का नाश
उजाला हो दिलो में, दिमागों में देश हित का
दुआ करो !प्रकाशित विकास मार्ग पर
कदम मिला कर सब चलें।

(रफत आलम)

जून 16, 2011

बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस


बतकही 1-
बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

अशोक – एक बार को मान भी लो कि चलो भाई आर.एस.एस ने बाबा रामदेव के कार्यक्रम का समर्थन किया तो ऐसा करना कहाँ गलत है? क्या आर.एस.एस को अधिकार नहीं है भ्रष्टाचार का विरोध करने का? क्या आर.एस.एस भारत का अंग नहीं है।

हरि – अशोक बाबू हमारा आर.एस.एस की अनुदार विचारधारा से हमेशा से मतभेद रहा है परंतु यहाँ हमें भी आपकी बात के कुछ पहलू अनुचित नहीं लगते। कोई भी संगठन क्यों न हो उसका कैसा भी इतिहास क्यों न र्हा हो, उसकी कैसी भी छवि न रही हो, अगर वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में साथ देना चाहता है तो क्यों उसके इन प्रयासों को गलत नज़र से देखा जाये?

सुनील – यह बात सही है। एक तरफ तो सरकार आतंकवादियों से हथियार छोड़ने, मुख्य धारा में आने और देश के विरोध में अलगाववादी बातें करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करती और दूसरी ओर इस आसान से मुद्दे को इतना जटिल बना कर पेश कर रही है। यहाँ असली मुद्दा आर्थिक भ्रष्टाचार का है और अगर आर.एस.एस इस लड़ाई में साथ आना चाहती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। भाई या तो आर.एस.एस और अन्य संगठनों को देश निकाला दे दो या फिर उनकी आड़ लेकर भ्रष्टाचार जैसे बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की धार खत्म मत करो।

विजय – लोकतंत्र की बढ़ोत्तरी के लिये भारत के राजनीतिक और सामाजिक रुख में और उदारता और स्पष्टता लाने की जरुरत है। हर मुद्दे को अलग-अलग ढ़ंग से देखे जाने की जरुरत है। अभी अगर आर्थिक मुद्दा हल हो जाये तो अगला मुद्दा नैतिकता का होगा। और उस मुद्दे पर सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन कमजोर नज़र आते हैं। वहाँ सभी दलों और संगठनों में बहुत ज्यादा सुधार की आवश्यकता है।

हरि- मुझे तो ऐसा लगता है कि अन्ना हज़ारे के अनशन के बाद से जैसा माहौल देश में बना था उसमें ज्यादातर नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, अपनी साख खो चुके थे और घायल होकर वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं। कांग्रेस को खुश होना चाहिये कि आर.एस.एस भ्रष्टाचार जैसे एक मुद्दे पर मुख्य धारा से जुड़ना चाहती है और यह ऐसा मुद्दा है जिसने पूरे देश के और इसके सभी वर्गों के लोगों के विकास के काम को बाधित किया है।

अशोक – अजी कांग्रेस के राज में इतना भ्रष्टाचार पनपा है। उसे तो घबराहट होगी ही।

सुनील – अशोक जी, यह एकतरफा सोच है। भ्रष्टाचार तो हरेक सरकार के काल में जम कर पनपा है। भाजपा के काल में भी कम नहीं था भ्रष्टाचार। कुछ को ही सही पर कांग्रेस के काल में कलमाड़ी, ए. राजा, और कनीमोझी जैसे शक्तिशाली नेताओं को जेल में बंद किया गया है। उन पर जाँच चल रही है। अशोक – इन्हे तो जनता के दबाव में अंदर किया गया है।

विजय – सुनील जी, आपकी बात वाजिब है। सनक भरी एकतरफा सोच से तो देश का काम चलेगा नहीं। आपकी बात को थोड़ा आगे बढ़ाऊँ तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भले ही कांग्रेस द्वारा की जा रही कार्यवाही भ्रष्टाचार के विकराल रुप को देखते हुये ऊँट के मुँह में जीरा लगे पर एक शुरुआत तो हुयी है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने चाहे किन्ही भी दबाव में ऐसा किया हो पर आर.टी.आई आदि जैसी सुविधायें जनता को दी हैं। अपने और सहयोगी दलों के नेताओं को जेल भेजा है। कांग्रेस की बदकिस्मती से वक्त्त ऐसा है कि जनता केवल इतने भर से संतुष्ट नहीं है। जहाँ कांग्रेस आशा कर रही थी कि उसे जनता से सहयोग और शाबासी मिलेगी इन निर्णयों को लेने से वहीं जनता के सामने बहुत बड़े बड़े मामले खुलते जा रहे हैं। विदेश में जमा काला धन, देश में काले धन की समांतर अर्थ-व्यवस्था, मंहगाई, राजनीतिक भ्रष्टाचार और अक्षमता आदि मुद्दे जनता को अधीर कर रहे हैं। अब जनता का बहुत बड़ा हिस्सा मूर्ख बन कर नेताओं को लाभ देते रहने की स्थिति को पार कर चुका है या तेजी से पार करता जा रहा है। कांग्रेस को कुछ और ठोस कदम उठाने पड़ेंगे तभी वह कुछ उजली और सक्षम दिख सकती है अन्य दलों के मुकाबले में।

सुनील- विजय जी सही है आपकी बात। मुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि कांग्रेस अपने द्वारा लिये गये कुछ अच्छे निर्णयों पर भी जनता से सराहना नहीं पा सकी है और यही इसकी कुंठा है। इसी कुंठा में वह बाबा रामदेव के मुद्दे को ढ़ंग से सुलटा नहीं पायी। उसे यह भी दिख गया कि अगर वह आगे भी अच्छे निर्णय अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव जैसे गुटों के दबाव के कारण लेगी तो उसे कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला है। मुझे लगता है कि कुछ निर्णय कांग्रेस अपने आप लेगी और उसकी ही नहीं बल्कि हर दल के नेताओं की अंदुरनी इच्छा और कोशिश यही होगी कि ऐसे गुट निष्प्रभावी हो जायें ताकि जनता में पैंठ बना चुके इन मुद्दों के राजनीतिक लाभ नेताओं को ही मिलें।

हरि – इन विचारों से मेरे दिमाग में एक बात आयी है कि चूँकि कांग्रेस को आर.टी.आई और कलमाड़ी आदि को जेल भेजने के फैसलों का लाभ नहीं मिल पा रहा था तो उसके सामने साफ हो गया कि ये मुद्दे तो अपनी जगह है पर इन मुद्दों की आड़ में राजनीतिक तंत्र की सारी कालिख कांग्रेस के मुँह पर ही मलने के गुपचुप प्रयास भी हो रहे थे। सरकार घोटालों और महंगाई के बावजूद विपक्ष के मुकाबले मजबूत थी और भाजपा समेत विपक्ष के सामने अगले तीन साल तक सरकार को गिराने का बहुत बड़ा अवसर था नहीं। पाँच साल तक दल इंतजार करने को तैयार नहीं थे, खासकर भाजपा। चूँकि कोई भी दल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम में पाक-साफ नज़र नहीं आ सकता इसीलिये भाजपा और आर.एस.एस ने मौका तलाशते हुये बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के अंदोलन से उठी जन-जाग्रती की लहर पर सवार होने की चेष्टा की।

अशोक – ऐसा कैसे कहा जा सकता है?

विजय – बात से बात निकलती है। आपकी बात में सच्चाई नज़र आती है सुनील जी। भाजपा खुद ऐसा आंदोलन नहीं खड़ा कर सकती थी क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार के बहुत बड़े बड़े आरोप लगे हुये हैं। वह ऐसा करती तो दोगली करार दी जाती। तभी जब जनता आंदोलित हो गयी तो भाजपा के प्रवक्त्ता आदि टीवी चैनलों पर एक बात स्थापित करने में जोर लगा रहे हैं कि ये सारे मुद्दे आडवाणी ने उठाये थे। आडवाणी तो उप-प्रधानमंत्री भी रहे हैं और भाजपा अध्यक्ष भी, तब तो उन्होने अपने दल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ कदम नहीं उठाये। भाजपा की राजनीति के पीछे कहीं न कहीं यह इच्छा भी है कि किसी तरह से आडवाणी एक बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लें। अगर तीन साल और इंतजार किया तो जीवन भर यह मौका हाथ नहीं आयेगा। हो सकता है आने वाले तीन सालों में राजनीतिक फिजां बदल जाये और कांग्रेस कुछ और बड़ी मछलियों को जेल भेजे और जनता अंतत: कांग्रेस के पक्ष में हो जाये। ऐसा लगता है कि कलमाड़ी आदि को जेल भेजना विपक्षी दलों को हिला गया है। भ्रष्ट सभी दल हैं और अगर कांग्रेस अपने नेताओं को जेल भेज सकती है तो दूसरे दल के नेताऒ पर कोताही करने का कोई मतलब है ही नहीं।

हरि- आप लोग कह रहे हैं तो मुझे भी दूर की एक कौड़ी सूझी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो अब देश में खड़ा होना ही है और हो रहा है पर कांग्रेस जो कह रही है कि बाबा रामदेव के आंदोलन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है तो यह कुछ हद तक सही लगता है। खाली आर.एस.एस का ही नहीं बल्कि अन्य ताकतों का भी जो भी कांग्रेस की सप्रंग सरकार को पाँच साल तक सत्ता में देखने को तैयार नहीं है। देखिये हो सकता है दूर की कौड़ी हो परंतु ध्यान दिया जाये तो जून का महीना भारत में राजनीतिक रुप से इमेरजैंसी वाले महीने के रुप में याद दिलाने की चेष्टा गैर-कांग्रेसी दल करते रहे हैं। भाजपा और आडवाणी इस बात पर विशेष तवज्जो देते रहे हैं। रामदेव का अनशन जून के माह में ही क्यों आयोजित किया गया? यह मार्च में भी हो सकता था जब इतनी गर्मी नहीं थी। या कुछ माह बाद सितम्बर या अक्टुबर में। पर इसे जून में किया गया। अगर आंदोलन केवल रामदेव के हाथों में होता तो शायद वे सरकार से कई मुद्दों पर आश्वासन मिलने के बाद अनशन खत्म कर देते पर उनके ऐसा करने से केवल उन्हे और सरकार को ही लाभ और राहत मिलती। विपक्षी दल अपने आप को सारे मामले से अलग महसूस करते। अनशन न तोड़ने देने के लिये जरुर ही रामदेव को शातिर दिमागों ने सलाह दी होगी। रामदेव राजनीति में नौसिखिया हैं। वे इतनी दूर का नहीं सोच सकते। कुछ लोगों को पक्का पता था कि अगर रामदेव दिल्ली में डटे रहें तो सरकार और रामदेव में टकराव होना ही होना है। उन्होने सोचा था कि सरकार सख्ती करेगी और उस पर आपातकाल के आरोप लगाये जायेंगे। अगर सरकार रामदेव के आंदोलन को कुचलती है तो एक तो रामदेव व्यक्तिगत रुप से उसके खिलाफ हो जायेंगे दूसरे सरकार बदनाम होगी और तीसरे भ्रष्टाचार का मुद्दा रामदेव और अन्ना हज़ारे के पास ही न रहकर विपक्षी दलों खासकर भाजपा के पास आ जायेगा। रामदेव का तो ठीक है कि उन्हे राजनीति की समझ नहीं है पर कांग्रेस को क्या कहा जाये वह भी इन चालों के सामने धराशायी हो गयी? एक से एक शातिर राजनीतिक दिमाग कांग्रेस के पास हैं और वे इन संभावनाओं को नहीं देख पाये और अब टीवी चैनलों पर तमतमाये हुये बयान देते घूम रहे हैं और अपनी और ज्यादा फजीहत करा रहे हैं।

अशोक – आपको लगता है कि आर.एस.एस और भाजपा इतनी आगे की सोच सकते हैं? अगर रामदेव उनके बढ़ाये हुये होते तो उन्हे रामदेव की ऐसी हालत करके क्या हासिल होता। रामदेव की समझ में भी तो आयेगा कि उन्हे इस्तेमाल किया गया है।

सुनील- राजनीतिक दल कितनी भी आगे की सोच सकते हैं। हरि भाई आपकी सोच पर चलें तो अब समझ में आता है राजघाट पर खुशी से नाचने का मतलब। अब यह भी लगता है कि अगर आर.एस.एस और भाजपा को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाना भी है तो उन्हे पहले अपने संगठनों से शुरुआत करनी चाहिये। बल्कि किसी भी राजनीतिक दल को यही करना चाहिये। उन्हे किसने रोका है कि वे अपने दल के आरोपित लोगों के खिलाफ कार्यवाही करें? अभी तो इन सभी दलों ने असली मुद्दे को पीछे ढ़केल दिया है और अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेकने आगे आ गये हैं। आर.एस.एस को खुले रुप में आंदोलन खड़ा करना चाहिये। उनका इतना बड़ा काडर है वे आज तक क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं कर पाये। भाजपा का इतना बड़ा समर्थक वर्ग है वह खुद से और अपने समर्थकों से शुरुआत क्यों नहीं करती। मुझे ऐसा लगता है कि कोई भी दल और संगठन गम्भीर नहीं है भ्रष्टाचार को समापत करने के लिये। ऐसा करना उनके हितों के खिलाफ है।

विजय- सही है सुनील जी, रामदेव के आंदोलन से सही ढ़ंग से निबटने में कांग्रेस की विफलता ने भाजपा को वह जगह मुहैया करा दी है जो उसे मिल नहीं रही थी उसके लाख प्रयास के बावजूद। लोगों का जिस तेजी से कांग्रेस से मोह भंग हुआ है उसकी भरपाई करने के लिये कांग्रेस को बहुत बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। अभी ऐसा माहौल बना दिया गया है कि कांग्रेस के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन गति नहीं पकड़ पा रहा है। जबकि सच्चाई यह नहीं है। सभी दल भ्रष्ट हैं। कांग्रेस ने दिखावे के लिये ही सही पर थोड़े से कदम उठाये हैं, पर वे काफी नहीं हैं। अपनी जमीन वापिस पाने के लिये उसे बड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे। अब कांग्रेस को जमीन में तो दफनाया नहीं जा सकता। आर.एस.एस समर्थित भाजपा से तो लोगों की शंकायें रहेंगी ही। देशव्यापी दलों में कांग्रेस ही है जिस पर देश के बहुत सारे वर्गों का भरोसा रहा है। देश की एकजुटता की खातिर कांग्रेस का बने रहना जरुरी है। कांग्रेस को अपनी और देश की खातिर अपनी सफाई और अपने सुधार से शुरुआत करनी चाहिये।

हरि – कांग्रेस और भाजपा, दोनों बड़ी राजनीतिक शक्तियों को चाहिये कि देश हित में भ्रष्टाचार जैसे राक्षस को समाप्त करने के लिये वे भले ढ़ंग से आपस में सहयोग करें। कांग्रेस को चाहिये कि वह बचे हुए तीन सालों में सत्ता का सदुपयोग करके भ्रष्टाचार समाप्त करने की ओर ठोस कदम उठाये। भाजपा को चाहिये कि एक अच्छे विपक्ष की तरह सरकार पर दबाव बनाये रखे। पिछले दरवाजे से सत्ता नहीं मिलने वाली और अगर मिल भी जाये तो यह दलों की साख गिराती ही है। भारत के लोकतंत्र को स्वच्छ और विकसित बनाने के लिये राजनीतिक दलों को शातिर और कुटिल चालों के बजाय साफ-सुथरी और पारदर्शी राजनीति को स्थान देना ही पड़ेगा।

…जारी…

जून 8, 2011

भ्रष्टाचार विरोध को इंसाफ मिलेगा क्या?


बीते दिनों
सन्यासी, ठग, व्यपारी और
मसीहा के बीच
उलझे हुये
सत्य का
अजीब रूप देखने को मिला है।

खून-पसीने की चोरी का
हिसाब माँगने गए
निहत्थे आंदोलनकारियों पर
क्यों भांजी गयी लाठियाँ,
समझ से बाहर है।

फिर शुरू हो गया
आरोप प्रत्यारोप का दौर
बंदरों में होड़ मच गयी है
भ्रष्टाचार विरोध की सिकी
रोटी हथियाने की।

चक्की के दोनों बड़े पाट तैयार हैं
पिसे हुओं को और पीसने के लिए
जनसंवेदनाओं से मखौल कर
वोटों की राजनीती हुई है गर्म
कोयल के वेश में काग-राग से
असल मुद्दा–बेमुद्दा हो चला है।

हराम कमाई से हुए मुस्टंडे
नूरा-कुश्ती के माहिर
काले धन के बचाव का दाव
खेल गए हैं।

डर है डूबो न दी जाएँ
भ्रष्टाचार विरोधियों की नावें
इस गन्दी व्यवस्था के कीचड़ में
फिर धोखा खा न जाएँ
इन्साफ की बाट तकती
गीली आँखें।

(रफत आलम)

जून 6, 2011

बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमों ने भारत को हलचल से भर दिया है। कहीं कोलाहल है तो कहीं चुपचाप देखा जा रहा है कि आगे क्या होगा। कल, विजय, अशोक, हरि और सुनील, चार बुजुर्ग मित्रों की रोज़ाना होने वाली बैठक एक बहस-गोष्ठी में बदल गयी। बहुत समय बाद चारों के दिमाग और ज़ुबान दोनों ही राजनीतिक तेवरों से ओत-प्रोत हो रहे थे।

आम तौर पर चारों सुबह दस बजे किसी भी एक के घर मिल बैठ दुनिया जहान की बातें किया करते हैं। दोस्ताना माहौल में वक्त्त अच्छा बीत जाता है। सुख-दुख की बातें हो जाती हैं।

मजमा विजय के घर पर लगा। चारों के हाथों में अलग-अलग अखबार थे।

विजय बाबू ने गहरी साँस भ्रने के बाद गम्भीर स्वर में कहा,” घटनाक्रमों ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सारे मामले के बहुत सारे पहलू उजागर हुये हैं”।

हरि – विजय जी, एक बात तो तय है कि अनशन को तोड़ने के लिये आधी रात को पुलिस बल से जैसी हिंसक कारवाही करवायी गयी है उस निर्णय ने जैसी किरकिरी कांग्रेस पार्टी और सरकार की की है, उसका कलंक आसानी से हटने वाला है नहीं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत का इससे अच्छा उदाहरण हो नहीं सकता।

सुनील – ये तो सही कहा आपने हरि भाई। पर विजय बाबू आप कुछ सवाल और पहलुओं की बात कर रहे थे। कुछ बताओ।

अशोक – हाँ पहले आप ही बताओ आपको क्या दिखता है इस मामले में?

विजय – पहली बात तो यही है कि बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के अनशन के समय से ही सार्वजनिक रुप से मीडिया को दिये साक्षात्कारों में बार-बार कह रहे थे कि वे जून के पहले हफ्ते से अपने एक लाख समर्थकों के साथ भ्रष्टाचार और काले धन की विदेश से वापसी जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिये सरकार पर उचित कार्यवाही करने के लिये दबाव बनाने के लिये अनशन पर बैठेंगे। सरकार कहती है कि अनुमति सिर्फ योग-शिविर लगाने के लिये ली गयी थी। अगर ऐसा था तो दिल्ली में जब रामलीला मैदान में शिविर लगाये जा रहे थे तभी सरकार ने उचित कदम क्यों नहीं उठाये? बाबा रामदेव के दिल्ली पहुँचने के बाद भी उनसे स्पष्ट क्यों नहीं कहा कि शिविर की अनुमति के साथ वे शांतिपूर्ण ढ़ंग से भी वहाँ अनशन पर नहीं बैठ सकते।

हरि – सही कह रहे हो विजय बाबू, जब बाबा रामदेव और सरकार दोनों को पता था कि अनुमति सिर्फ योग शिविर लगाने की ली गयी है और सरकार अनशन के दूसरे या तीसरे दिन कानूनी कार्यवाही कर सकती है तो क्यों हजारों लोगों की जान को जोखिम में डाला गया? अनशन से पहले दिन टीवी पर ऐसी बातें भी उठ रही थीं कि रामलीला मैदान में योग शिविर ही रहेगा और अनशन जंतर-मंतर पर किया जायेगा। सरकार के चार बड़ी मंत्रियों ने हवाई-अड्डे पर ही बाबा रामदेव को पकड़ कर क्या इस बात की संभावना उनके दिमाग से हटा दी कि जंतर-मंतर पर अलग से अनशन करने की जरुरत नहीं है और सरकार से बातचीत से उचित हल निकल आयेगा, और बाबा रामदेव जंतर मंतर को भूलकर रामलीला मैदान में ही अनशन की लीला दिखाने लगे और उन्हे लगता था कि सब कुछ ठीक पटरी पर चल रहा है और सब ऐसे ही निबट जायेगा? हमें तो घपला लगता है मामले में।

सुनील – जब अनशन की पहली ही शाम आते आते सरकार और बाबा रामदेव में वार्ता टूट गयी तो क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता था कि अनशन स्थल पर बैठे हजारों लोगों की जान की सलामती की फिक्र करती? सरकार का बाबा रामदेव से कुछ भी रिश्ता हो, कोई भी सरकार हजारों लोगों की भीड़ की जान के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है? बहुत शोर मचाकर कहा जा रहा है कि सांसद संवैधानिक रुप से जनता द्वारा चुने गये हैं तो ऐसे समय में संविधान की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाते हुये इन्ही सांसदों से बनी सरकार ने हजारों लोगों की जान जोखिम में डालते हुये पुलिस को आधी रात को लोगों को वहाँ से हटाने के लिये भेजा? कैसे पुलिस को आदेश देने वाले मंत्रियों ने नहीं सोचा कि अगर पुलिस की लाठियों से लोग बच भी गये तो भगदड़ में महिलायें, बच्चे और वृद्ध अपनी जान बचा पायेंगे या घायल होने से बच पायेंगे? सरकार अनशन पर बैठे लोगों को दिन में नोटिस देकर कुछ घंटे का समय नहीं दे सकती थी जिससे लोगों को पता चल जाये कि सरकार की मंशा अब रामलीला मैदान से लोगों को हटाने की है। अगर अनशन अवैध था तो कोर्ट से नोटिस लाया जा सकता था। पर किसी तरह से भी संविधान का सम्मान न करते हुये लोगों को सबक सिखाने के लिये पुलिसिया कार्यवाही की गयी।

अशोक – अरे सरकार की बदमाशी है। यह सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास दिखावा है। इन्होने ही तो इमेरजैंसी लगवायी थी, तभी भाजपा राजघाट पर अनशन में बैठ गयी है इनकी करतूतों के विरोध में।

विजय – अशोक बाबू भाजपा भी दूध की धुली नहीं है। राजघाट में कब से उसकी श्रद्धा हो गयी? कल्याण सरकार के दिन भूल गये क्या? कैसे गांधी को पानी पी पी कोसा जाता था। गाँधी से इनका क्या लेना देना। बल्कि किसी भी दल का कुछ लेना देना नहीं है गाँधी से। उन्हे तो अलग ही रखें।

सुनील – कांग्रेस नियंत्रित सप्रंग सरकार की दूसरी पारी के आरम्भ से ही भाजपा निष्क्रिय स्थिति में पड़ी हुयी थी। उसे राजनीतिक जमीन नहीं मिल रही थी। पांच साल का इंतजार उसे और निष्क्रिय बना देता। कांग्रेस की सरकार ने भाजपा में जान डाल दी। उसे मुकाबले में खड़ा कर दिया। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को संघ की ओर धकेल दिया। सबको लगता था कि कांग्रेस नियंत्रित सरकार की दूसरी पारी आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और कहीं कई अड़चन नहीं आयेगी। ताजे घटनाक्रमों ने दिखा दिया है कि सरकार की आगे की राह मुश्किल हैं। सरदार जी ने माथे पर कलंक लगवा ही लिया। इतिहास तो उन्हे ऐसे प्रधानमंत्री के रुप में याद करेगा जिसकी सरकार ने रात में सोते हुये स्त्री-बच्चों, बूढ़ों और अनशनकारियों पर लाठियाँ बरसवायीं। उन्हे घायल किया और उनकी जान को जोखिम में डाला।

हरि- कांग्रेस की सरकार ने तो भाजपा को थाली में सजाकर मौका दे दिया है। इससे ज्यादा खुश भाजपा और अन्य विपक्षी दल कभी भी नहीं हुये होंगे, पिछले पांच-सात साल में।

अशोक- अजी भाजपा निष्क्रिय नहीं थी। उसी ने मुद्दा उठाया था काले धन की वापसी का, भ्रष्टाचार के खात्मे का।

विजय- अशोक जी भाजपा की ईमानदारी तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के मामलों में चमक ही रही है। गुजरात के मामले में उसकी नैतिकता भी जगजाहिर रही है!

सुनील – भाजपा की बात छोड़ो। मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार बार उठ रहा है – क्या शुरु में बाबा रामदेव से मीठी मीठी बातें करने के कुछ घंटो बाद सरकार को वस्तुस्थिति का एहसास हुआ कि अगर बाबा रामदेव के अनशन के कारण उनकी माँगें मानी गयीं तो यह बाबा रामदेव की जीत कहलायेगी और सरकार द्वारा उठाये गये कदम मजबूरी में उठाये गये कदम कहलायेंगे और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ नहीं मिल पायेगा।

हरि – सरकार के किन्ही भी सलाहकारों ने ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही करने की सलाह दी हो और उस पर दबाव डाला हो, क्या कांग्रेस को इस घटना के बाद किसी किस्म का राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? इसमें पूरा संदेह है।

विजय- कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस मायावाती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल में उ.प्र पुलिस द्वारा किसानों पर अत्याचार कराने को लेकर संघर्षरत थी। अब उसकी खुद की सरकार ने वैसा ही कर दिया है। कांग्रेस के पास अब नैतिक चेहरा है ही नहीं किसी अन्य सरकार द्बारा पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही कराये जाने की निंदा करने का। भारत की जनता हमेशा से ही शोषित के पक्ष में रही है और अब पुराना समय नहीं रहा जब किसी तरह की कोई भी खबर दबायी जा सकती थी। इस इलेक्ट्रानिक युग में कांग्रेस ने ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है और इसका राजनीतिक खामियाजा या तो अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देगा या फिर उसकी सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि वह बड़ी संख्या में दूसरे दलों पर निर्भर हो जाये।

सुनील- देश अगली बार फिर से कई दलों की मिली जुली सरकार के चंगुल में फंसता दिखायी दे रहा है। कांग्रेस का उ.प्र अभियान भी गड्ढ़े में पड़ा समझिये। दुख की बात है कि दो दशकों से ज्यादा समय से उ.प्र क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों द्वारा संचालित हो रहा है। विकास कार्य लगभग ठप रहे हैं। वैसे भी पाँच नहीं तो दस साल में सरकारें बदल जानी चाहियें। तभी संतुलन ठीक बना रहता है।

अशोक – कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव के अनशन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है। अगर ऐसा है भी तो जब हवाईअड्डे पर सरकार के बड़े मंत्री उनकी अगुवाई करने गये थे तब भी उन्हे इस बात का पता होगा। अगर पता था और उन्हे इस बात से परहेज था तो उन्होने अनशन को शुरु ही क्यों होने दिया?

सुनील- अशोक जी आपकी इस बात से सहमति है। अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो इस संगठन को कानून का सहारा लेकर प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो कांग्रेस और इसके द्वारा नियंत्रित सरकार आर.एस.एस द्वारा समर्थित और नियंत्रित भाजपा के सांसदों से परहेज क्यों नहीं करती? उन्हे संसद से बाहर का रास्ता दिखा दे। उन्हे किसी भी कमेटी में न रखे। आखिरकार भाजपा को तो आर.एस.एस का पूरा समर्थन है। ऐसा कैसी हो सकता है कि भाजपा के सांसद तो स्वीकार्य हैं पर जो सांसद नहीं हैं और जिन पर शक है कि आर.एस.एस उन्हे समर्थन देता है, वे स्वीकार्य नहीं हैं।

विजय- सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे, जो भारत को खाये जा रहे हैं, को लेकर जनता को ठोस हल चाहिये और उसे इस बात से क्या मतलब कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये जा रहे प्रयास को आर.एस.एस समर्थन दे रहा है या कोई अन्य संगठन।

हरि- अरे अगर ऐसा है तो आर.एस.एस को देशद्रोही साबित करके प्रतिबंधित कर दो, कानूनी राह पर चला दो और अगर ऐसा साबित हो जाता है तो जनता चूँ भी नहीं करेगी।

विजय- मेरी समझ में तो ऐसा पैरानोइया आता नहीं। आप ये जानो कि जब भाजपा राजनीतिक दौर के शिखर पर थी तब भी उसे केवल 26% मतों का समर्थन हासिल था और जो अब घटकर 20% के आसपास आ गया है। देश की कुल आबादी का 75-80% हिन्दुओं को माना जा सकता है तो ऐसा तो है नहीं कि सभी हिन्दु भाजपा को समर्थन देते हैं और मत देते हैं। फिर क्यों इतनी हायतौबा, क्यों इतना भय? यह देश मुख्यतः सेकुलर रहा है और रहेगा।

…जारी…

बतकही 2 -बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस

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