Archive for जुलाई, 2010

जुलाई 30, 2010

10 रुपये के नये सिक्के की मनोहर छवि

देखें भारतीय मुद्रा के नये सिंबल के साथ दस रुपये के नये सिक्के के लुभावने रुप रंग को।

यूरोप की यूरो मुद्रा के 2 यूरो के सिक्के जैसा आकर्षक है भारतीय मुद्रा का 10 रुपये का सिक्का

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जुलाई 30, 2010

कवि शरद की कलम से

प्रसिद्ध कवि “शरद” की ख्याति में हिन्दी में गज़ल रचने की भी बड़ी भूमिका रही है। उन्होने हिन्दी गज़ल में प्रयोग भी किये। प्रस्तुत है उनकी एक बहुत पुरानी गजल

काँटों की ओट लिये मैंने फूलों को चुभते देखा है
ये बात अगर कह दूँ सबसे बदनाम चमन हो जायेगा।


विरह का पत्थर छूने से हर दिल सोना हो जाता है
ये बात अगर कह दूँ सबसे बदनाम मिलन हो जायेगा।


रज़कण की अपनी आदत है नीलाम नहीं वह होता है
ये बात अगर कह दूँ सबसे बदनाम रत्न हो जायेगा।

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जुलाई 29, 2010

अधिनायक… खोजते हैं रघुवीर सहाय

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चँवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढ़ोल बजा कर
जय-जय कौन कराता है?

पूरब पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है?

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

रघुवीर सहाय

जुलाई 27, 2010

जीवन

जीवन क्या है?

आशा या निराशा?
सफलता या विफलता?
प्रेम या नफरत?
अहिंसा या हिंसा?
आस्था या अनास्था?
ज्ञान या अज्ञान?


क्या जीवन एक नाटक का नाम है
जिसमें की हम सभी को
पात्र दिये गये हैं निभाने को?

क्या जीवन उस अंक का नाम है
जो शुरु होता है
एक शिशु के जन्म के साथ
और जो खत्म मान लिया जाता है
एक शब्द “मौत” के अस्तित्व मे आ जाने के बाद?

क्या जीवन पद्य है?
या कि यह गद्य है?

क्या यह अमीरी के साथ ही फलता फूलता है
या यह गरीबी के साथ भी पनप जाता है?

क्या जीवन पाँच सितारा होटलों में बसता है?
या यह करवटें बदलता है फुटपाथ पर भी?

लाखों लोग भूखे पेट सोने को विवश होते हैं
कीड़ों की तरह घिसट घिसट समय काटते हैं
और बिना किसी पहचान को पाये हुये विदा हो जाते हैं।

क्या ये जीवन है?

जीवन कहाँ है?


क्या यह बह रहा है पवित्र गंगा की लहरों के साथ
या यह अठखेलियाँ कर रहा है
विशाल समुद्र के ज्वार भाटे के साथ?
जो कि हर तरह की गंदगी को अपने में समो लेता है?

फूलों, पत्तों और घास पर पड़ी
ओस की बूँदें भी तो अहसास करा जाती हैं
जीवन के अस्तित्व का।

आखिरकार क्या है जीवन?

एक निबंध परिभाषित कर सकता है जीवन को?
या कि यह ढ़ेर सारे विकल्पों वाला प्रश्न है?
जहाँ पर कि अंतिम विकल्प
“ऊपर दिये गये सारे विकल्प ठीक हैं”
ठीक उत्तर के कुछ करीब जा पहुँचता है।

जो भी धरा पर
सम्पन्न होता है
ज्ञात – अज्ञात
देखा – अनदेखा
सुना – अनसुना
समझा – अनसमझा
सब कुछ जीवन का एक अंशमात्र है।

जीवन का अंश
एक को ज्ञात हो या बहुतों को या सबको
पर पूरी तरह से तो जीवन अज्ञात ही रहता है।

जीवन बहुत विशाल है
मनुष्य की समझ के हिसाब से।

हम जी सकते हैं
जीवन को महसूस कर सकते हैं
परंतु इसे समझ नहीं सकते पूर्णतया

जीवन सबसे बड़ा रहस्य है धरती पर।

…[राकेश]

पुनश्च : वोट देने का अधिकार पाने के पूर्व के जीवन के किसी मोड़ पर की हरकत अपने मूल रुप में।

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जुलाई 24, 2010

क्रम ….(कविता – कृष्ण बिहारी)

हमारी उम्र के साथ
गुजर रही है एक पीढ़ी
दुनिया से।

आने वाली पीढ़ियों के लिये
छोड़नी होगी जगह
गुजरना होगा हमें।

जीवन और मृत्यु के
बंधन में बंधा है सब कुछ
अनश्वर,
किसी के न होने की स्थिति का नाम है।

बालों का पकना
दांतों का गिरना
जोड़ों में दर्द
पेड़ से पत्तियों का टूटना है।

एक दिन टहनियाँ
लगेंगी गिरने
एक दिन गिर जायेगा पेड़।

होंगी थोड़ी सी हलचल
थोड़ी सी खामोशी
धरती पर।

दुनिया में फिर उगेंगे पेड़ नये
पुरानों की जगह
जंगलों और बागों में
नगरों और गाँवों में
यही है क्रम।

{कृष्ण बिहारी}

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जुलाई 23, 2010

शहीद चन्द्रशेखर आजाद : तीन रोचक प्रसंग

23 जुलाई अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की जयंती तिथि है।

पंडित जी की प्रचंड देशभक्ति के तमाम किस्से मशहूर हैं। उनके सामने एक ही लक्ष्य था, भारत की आजादी और बाकी सारे मुद्दे गौण थे इस लक्ष्य के सामने। व्यक्तिगत जीवन का तो कोई मोल था ही नहीं उनके लिये इस लक्ष्य को पाने के लिये तो जीवन में सुख सुविधाओं की चिंता करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता उनके मामले में।

अर्जुन की तरह पंडित जी अपना पूरा ध्यान इसी एक बात पर लगाये रहते थे कि कैसे आजादी प्राप्त की जाये। मुल्क की आजादी पाने के लिये उन्होने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन की स्थापना की थी और शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव एवम बटुकेश्वर दत्त आदि भी इसके सदस्य बने।

उनके जीवन से विशुद्ध आजादी के प्रयासों के अलावा भी और बहुत सारे रोचक प्रसंग जुड़े हुये हैं। उनमें से कुछ का जिक्र यहाँ किया जा सकता है।

बात उन दिनों की है जब भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त भी इलाहाबाद में प्रवास कर रहे थे। एक दिन सुखदेव कहीं से एक कैलेंडर ले आये जिस पर शायद किसी सिने तारिका की मनमोहक तस्वीर छपी थी। सुखदेव को कैलेंडर अच्छा लगा और उन्होने उसे लाकर कमरे की दीवर पर टांग दिया और बाद में वे बाहर चले गये। उनके जाने के बाद पंडित जी वहाँ पँहुचे और ऐसे कैलेंडर को देखकर उनकी भृकुटी तन गयी, उनके गुस्से को देखकर वहाँ मौजूद अन्य साथी डर गये। वे सब पंडित जी का मिजाज़ जानते थे। पंडित जी ने किसी से कुछ नहीं कहा पर कैलेंडर को उतार कर फाड़कर फेंक दिया। कुछ समय बाद सुखदेव वापिस आ गये। दीवार पर कैलेंडर न देख कर वे इधर उधर देखने लगे और उन्हे उसके अवशेष दिखायी दिये तो वे क्रोधित हो गये। वे भी गर्म मिजाज़ के व्यक्ति थे। उन्होने गुस्से में सबको ललकारा कि किसने उनके लाये कैलेंडर की यह दशा की है?

पंडित जी ने शांत स्वर में उनसे कहा,” हमने किया है “?

सुखदेव थोड़ा बहुत कसमसाये परंतु पंडित जी के सामने क्या बोलते सो धीरे से बोले कि अच्छी तस्वीर थी।

पंडित जी ने कहा,”यहाँ ऐसी तस्वीरों का क्या काम”।

उन्होने सुखदेव को समझा दिया कि ऐसे किसी भी आकर्षण से लोगों का ध्यान ध्येय से भटक सकता है।

दूसरी घटना दूसरे दशक के अंत की है। अंग्रेजों का दमन चक्र तेजी से चल रहा था और जनता में खासा रोष था। एक दिन महिलायें इलाहाबाद में जुलूस निकाल रही थीं और हाथ पड़ जाने वाले किसी भी पुरुष पर खासी लानत भेज रहीं थीं उन्हे चुनौती देकर कि वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आजाद अपने किसी साथी के साथ वहाँ से गुजर रहे थे। महिलाओं ने उन्हे घेर लिया और एक महिला ने गरजते हुए उन पर शब्दों से आक्रमण कर दिया,” आप लोगों से कुछ होने वाला नहीं है, आप सब मर्दों को चूड़ी पहन कर घर बैठ जाना चाहिये”।

एक दो महिलाओं ने आजाद के हाथ पकड़ लिये और कहने लगीं कि इन्हे चूड़ियां पहनाओ।

जाहिर था कि उन्होने आजाद को पहचाना नहीं था।

आजाद मुस्कुराये और उन्होने अपनी कलाइयाँ बढ़ाते हुये कहा कि लो बहन पहना लो चूड़ियाँ।

कद्दावर शरीर के मालिक आजाद के हष्ट-पुष्ट हाथों के चौड़े गट्टों में भला कौन सी चूड़ी चढ़ सकती थी?

कुछ देर में महिलायें शर्मिंदा हो गयीं।

तीसरी घटना उस समय की है जब आजाद चाकू चलाने की कला में माहिर एक उस्ताद से चाकू चलाना सीखा करते थे। उस्ताद जी पंडित जी को छत पर चाकू चलाना सिखाते थे। पास ही स्थित एक दूसरे घर की छत से, जो इस घर की छत से थोड़ा ऊँची थी, रोज एक युवती और उसका छोटा भाई इस ट्रेनिंग को देखा करते थे। दोनों नियत समय पर छत पर आकर बैठ जाते थे और आजाद को ट्रेनिंग लेते हुये देखते थे।

एक दिन ऐसा संयोग हुआ कि सीखते हुये आजाद का ध्यान थोड़ा हट गया और उस्ताद जी का चाकू उनके शरीर को छीलता हुआ निकल गया। उस्ताद जी और उनके शागिर्द पंडित जी के घाव को देख रहे थे कि उस दूसरी छत से बहुत सारी चीजें वहाँ बरसनी शुरु हो गयीं। युवती, जो भी उसके हाथों में आ रहा था वह उसे निशाना साध कर उस्ताद जी के ऊपर फेंक रही थी और उसका छोटा भाई भी उसकी सहायता कर रहा था।

उस्ताद जी ने मुस्कुराते हुये पंडित जी से कहा,”लगता है लड़की का दिल लग गया है तुमसे”

प्रेम, विवाह, परिवार, धन-सम्पत्ति आदि सब तरह के सुख जो एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन में चाहता है, उन्हे पंडित चन्द्रशेखर आजाद जैसे देशभक्तों ने अपने जीवन में प्रवेश करने ही नहीं दिया। जिस बहुमूल्य आजादी का आज हम सब जीवित लोग दुरुपयोग करके देश को रसातल में पहुँचा रहे हैं, वह ऐसी महान आत्माओं के बलिदान से हमें मिली है। ये सब लोग इतने कर्मठ और काबिल थे कि ऐश्वर्य से भरपूर जीवन जी सकते थे पर वे तैयार नहीं थे स्वाभिमान को ताक पर रखकर गुलामी में जीने को और देशवासियों को गुलामी की जंजीरों से छुड़वाने के लिये उन्होने अपने जीवन होम कर दिये।

नमन पंडित जी जैसी महान आत्माओं को।

पुनश्च : प्रंसग यशपाल द्वारा लिखित अदभुत पुस्तक “फाँसी के फँदे तक” से स्मरण के सहारे प्रस्तुत किये गये हैं।

जुलाई 23, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन: दो उपलब्धियों वाली दास्तान

युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन में भी यही भोलापन कूट कूट कर भरा था। भोले शंकर से मिलते जुलते कई गुण उनमें थे।

रावण द्वारा रचित शिव-ताण्डव-स्त्रोत को वे बहुत पसंद करते थे और उसे पूरे भाव से गाते भी थे और नाचते भी थे। उनके गायन को सुन और नृत्य को देख पाने वाले चुनींदा अतिभाग्यशाली मित्र दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। कुछ होने लगता था सबको।

उनके करीबियों को इस बात का पता था कि जब वे करीब पैंतीस साल के थे तो उनके एक परिचित, जिनका बहुत योगदान था पर्वतों से घिरे एक स्थान पर एक खूबसूरत से विश्वविद्यालय की शुरुआत करने में, ने उन्हे उस विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिये राजी कर लिया था। नसरुद्दीन उनका बेहद सम्मान करते थे अतः उन्हे राजी होना पड़ा परंतु वे राजी हुये इस शर्त पर कि वे किसी भी तरह का वेतन न लेंगे छात्रों को पढ़ाने के लिये। उन्होने कहा कि छात्रों को विद्या देकर धन न कमायेंगे, आजीविका के और बहुत सारे साधन हैं। विवाह उन्होने तब तक किया नहीं था और उनके मुताबिक एक अकेली जान को कितना पैसा चाहिये जीने के लिये? वे विवाह के खिलाफ न थे, पर जो काम वे करते थे और बाकी की जिन्दगी में उन्हे करने थे उनकी प्रकृति को देख कर उन्हे लगता था जिससे भी उनका विवाह होगा वह अकारण कुछ परेशानियाँ झेलेगी। मजाक करते हुये वे कहते थे कि वे भी बजरंग बली की तरह पचास साल तक ब्रह्मचर्य को साधना चाहते थे। हालाँकि कुछ साल बाद अड़तीस साल की आयु में उनका विवाह हुआ। कैसे हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, वह कथा किसी और दिन के लिये मुनासिब है।

बहरहाल, विश्वविद्यालय में पढ़ाने से इतना हुआ कि एक तो उन्हे अपनी रुचि के विषयों में शोध करने के लिये एक व्यवस्थित रास्ता मिल गया और बाद में तो वे एक घुमंतु अध्यापक बन गये। आज यहाँ ज्ञान बाँट रहे हैं तो कल किसी और जगह। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अनेक मित्र बने, अनगिनत शिष्य और प्रशंसक बने। उनके घनघोर प्रशंसकों और शिष्यों में से एक थे शांतनु।

वे दसवीं में ही रहे होंगे जब उनके माता पिता का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था। उनके सामने बहुत मुश्किलें आयीं पर मेहनत, सूझबूझ और अपनी प्रतिभा के दम पर पायी छात्रवृत्ति के बलबूते वे पढ़ते रहे। संयोग से उन्हे बाबा नसरुद्दीन की छत्रछाया मिल गयी।

शांतनु ने नसरुद्दीन के मार्गदर्शन में डाक्टरेट की और बाद में उनकी ही छत्रछाया में उपनिषदों पर बहुत शोध किया और एक सूक्ति ने उन्हे जीवन भर के लिये काज दे दिया। उपनिषद का वह वाक्य था,

अज्ञान तो अंधकार में रखता ही है, ज्ञान उससे भी बड़े अंधकार में धकेल सकता है“।

ये वाक्य उन्हे रात दिन कचोटता और इस एक वाक्य ने उन्हे एक सजग विधार्थी और शोधार्थी बना दिया।

बाद में शांतनु भी एक अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। कुछ साल गुजर गये।

इस बीच शांतनु कुछ साल के लिये अमेरिका भी रह आये एक अमेरिकन विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर। वे जाना नहीं चाहते थे और उन्होने नसरुद्दीन से सलाह की तो उन्होने कहा कि जाओ बरखुद्दार उधर की दुनिया भी तो देख आओ। जाने से कुछ अरसा पहले ही उनका विवाह भी सम्पन्न हो गया|

जब शांतनु अमेरिका में ही थे तो वहाँ उन्हे एक अन्य भारतीय प्रोफेसर मिले जो कि उनकी तरह ही कुछ समय के लिये वहाँ पढ़ाने के लिये गये हुये थे। प्रोफेसर साब की पत्नी भी उनके साथ थीं और शांतनु की पत्नी और उनमें परदेस में खूब छनने लगी। बच्चे प्रोफेसर साब के थे नहीं। आयु उनकी इकतालिस बयालिस के आसपास ही होगी उस समय, उनकी पत्नी उनसे कोई दसेक साल छोटी थीं।

यूँ तो वे विद्वान थे पर उनमें कुछ सनकें भी थीं। उन्हे अपना तखल्लुस रखने की सनक थी। तखल्लुस तो बहुत लोग रखते हैं पर इन साहब के साथ दिक्कत ये थी कि ये अब तक कम से तीन तखल्लुस बदल चुके थे। उन दिनों वे हिन्द्स्तानी शायरी पर शोध कर रहे थे और उलझन में थे कि क्या तखल्लुस रखें। उनके सामने बहुत सारे विकल्प मौजूद थे।

मीर की शायरी की तर्ज पर अपना तखल्लुस रखें “तीर” कयोंकि बकौल उनके मीर की शायरी एक तीर की तरह सुनने वाले के ह्र्दय में प्रवेश कर जाती है और वह मीरमयी हो जाता है। अमीर खुसरो का काव्य उन्हे “प्रेम” कहकर पुकार रहा था तो गालिब शरारत कर रहे थे कि मियाँ “विद्रोही” हो जाओ| मजाज़ पेश कर रहे थे उन्हे “मिजाज़“।

शायरी की बात हो तो नसरुद्दीन का जिक्र शांतनु को करना लाजिमी था, आखिरकार नसरुदीन ठहरे शायरी के बहुत बड़े कद्रदानों में से एक। शांतनु ने प्रोफेसर से बातचीत करते वक्त्त अपने गुरु नसरुद्दीन के शायरी के प्रति प्रेम को बताया और उनकी विद्वता का बखान भी किया और बखान इतना किया कि प्रोफेसर के दिल में नसरुद्दीन के दर्शन करने की तलब हिलोरे मारने लगी।

उस समय भारत के शायरों पर काम कर रहे प्रोफेसर को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। खासकर मजाज़ पर शोध करने में उन्हे कठिनाइयाँ आ रही थीं। शांतनु ने उन्हे बताया कि गुरुदेव नसरुद्दीन उनकी सहायता कर सकते हैं। प्रोफेसर साब खिल उठे उन्होने हाथ पकड़ लिये शांतनु के कि तुरंत खत लिखो अपने गुरु को। दिल में कहीं उनके नसरुद्दीन को आजमाने की बात भी थी कि जरा देखें इन नसरुद्दीन साहब का दम खम।

कुछ ही दिन बाद शांतनु को एक बड़ा सा पैकेट पार्सल द्वारा मिला। अपने लिये भेजे गये व्यक्तिगत सामान को निकाल उन्होने प्रोफेसर को नसरुद्दीन द्वारा भेजे गये कागजात दे दिये। प्रोफेसर सारी रात सो नहीं पाये। डिनर करने के बाद नसरुद्दीन द्वारा भेजी गयी सामग्री पढ़नी शुरु की तो कब रात बीती उन्हे पता ही नहीं चला, जब सुबह के सूरज ने अपनी लालिमा से खिड़की के शीशों की मार्फत अंदर आकर कमरे के बाकी स्पेस और साजो सामान को जगा दिया तब उनका ध्यान भंग हुआ।

“कमाल कर दिया गुरु” बड़बड़ाते हुये वे कुर्सी से उठे और एक भरपूर अंगड़ायी लेकर वे तैयार होने चले गये। शांतनु से मिलते ही उन्होने घोषणा कर दी कि वे भी आज से उनके गुरु नसरुद्दीन के मुरीद और शिष्य हो गये हैं और उन्होने तय कर लिया है कि भारत लौटते ही चल रहे शोध कार्य से इतर वे हिन्दुस्तानी शायरी पर एक किताब भी लिखेंगे जो नसरुद्दीन को समर्पित होगी। उन्होने भावविभोर होकर नसरुद्दीन को एक लम्बा सा आभार पत्र लिख भेजा और उसमें भी उन्होने अपने द्वारा उनके शिष्य होने की घोषणा लिख भेजी और उनसे प्रार्थना की कि वे भी उन्हे शिष्य रुप में स्वीकार करें।

अमेरिका से लौटने के कुछ अरसे बाद संयोग कहिये या प्रोफेसर साब के प्रयास, वे भी शांतनु के विश्वविद्यालय में आ गये पढ़ाने। उन्होने दो शोध छात्रों को शायरी पर चल रहे अपने शोध कार्य से जोड़ लिया। भारत आते ही वे नसरुद्दीन से मिलना चाहते थे पर संयोग ऐसा बैठा कि शांतनु और प्रोफेसर के अमेरिका से लौटने से पहले ही नसरुद्दीन चले गये तजाकिस्तान और वहाँ से उन्हे तुर्की जाना था। वे खुद रुमी पर शोध कर रहे थे उन दिनो और इसी सिलसिले में वे दो साल के लिये बाहर चले गये थे। मजाज़ पर शोध के संदर्भ में प्रोफेसर साब उनसे नियमित पत्र व्यवहार करते रहे और नसरुद्दीन भी पत्रों के द्वारा ही उनका मार्ग दर्शन करते रहे। जहाँ भी नसरुद्दीन कहते प्रोफेसर अपने दोनों दोनों शोधार्थियों को वहाँ भेज देते। काम बड़ी तन्मयता से चल रहा था।

नसरुद्दीन के वापिस आने से कुछ अरसा पहले ही प्रोफेसर साब ने शोध कार्य खत्म कर दिया और एक किताब भी तैयार कर दी। प्रोफेसर साब तो नसरुद्दीन को भी सहलेखक के रुप में शामिल करना चाहते थे पर नसरुद्दीन ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। प्रोफेसर ने किताब को छपवाने के लिये नहीं भेजा, उन्होने कहा कि नसरुद्दीन आयेंगे और पांडुलिपी का ही विमोचन करेंगे और किताब का नाम तय करेंगे और उनसे मूल पांडुलिपी पर ऑटोग्राफ लेकर ही उसे छपने के लिये प्रेस में भेजा जायेगा।

सारा कार्यक्रम उन्होने शांतनु के साथ मिल कर तय कर दिया कि भारत आते ही नसरुद्दीन वहाँ आयेंगे और पांडुलिपी का विमोचन करेंगे। नसरुद्दीन को मानना पड़ा और पत्र द्वारा उन्होने स्वीकृति और भारत वापसी का अपना कार्यक्रम भेज दिया।

आज का किस्सा सीधे उनके द्वारा की गयी किसी कारगुजारी से सम्बंधित नहीं है पर वे भी उस घटना के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।

संयोग अगर संयोग ही उत्पन्न न करें तो उन्हे संयोग ही क्यों कहा जाये? इधर प्रोफेसर साब का शोध पूरा हुआ, पांडुलिपी तैयार हुयी और उधर प्रोफेसर की पत्नी की कोख से भी एक कृति का जन्म हो गया और उन्होने एक पुत्र को जन्म दिया। प्रोफेसर तो नहीं परंतु उनकी पत्नी ग्रह नक्षत्र को बहुत मानती थी। उनके विवाह के लगभग दस ग्यारह साल बाद उन्हे संतान की प्राप्ति हुयी थी सो वे किसी किस्म का कोई रिस्क लेना नहीं चाहती थी। बच्चे के जन्मते ही उसकी जन्मकुंडली बनवाने का इंतजाम उन्होने अस्पताल जाने से पहले ही कर दिया था और ऐसा ही हो भी गया। परंतु दिक्कत ये आ गयी कि पंडित ने घोषणा कर दी कि बालक ने ऐसे नक्षत्रों में जन्म लिया है कि बालक की माता के मातापिता भाई बहन आदि बच्चे को तीन माह तक न देखें। पर दिक्कत ये थी कि प्रोफेसर की पत्नी के परिवार में पीढ़ियों से रिवाज चला आ रहा था कि नवजात शिशु का नामकरण बच्चे का नाना या अगर वह जीवित नहीं है तो बच्चे का मामा करेगा। अगर दोनों ही जीवित नहीं हैं तो जिसे भी बच्चे की माता दिल से अपने पिता या भाई स्वरुप मानती है वह यह कार्य करेगा। और बड़ी दिक्कत यह आयी कि पंडित ने आगे कहा कि बच्चे का नामकरण दो माह के अंदर करना बहुत जरुरी है और जो भी बच्चे का नामकरण करेगा उसे बच्चे के जन्म के बारे में कुछ मालूम नहीं होना चाहिये और बच्चे को एकदम से उसके सामने लाया जाना चाहिये और उसे कुछ ही क्षणों में एक सुयोग्य नाम बच्चे को देना चाहिये।

प्रोफेसर इन सब ग्रह नक्षत्रों की बातों को नहीं मानते थे पर पत्नी को नाहक नाराज भी नहीं करना चाहते थे। नसरुद्दीन वहाँ आ ही रहे थे सो प्रोफेसर की पत्नी और शांतनु की पत्नी ने भी तय कर लिया कि नसरुद्दीन के आने के अवसर पर ही बच्चे के जन्म की खुशी का समारोह आयोजित किया जाये और नसरुद्दीन ही बच्चे का नामकरण भी करें। पर ये बात दोनों ही स्त्रियों ने प्रोफेसर को न बतायी और साथ ही साथ शांतनु को भी विवश कर दिया कि यह बात प्रोफेसर को न बतायी जाये।

प्रोफेसर अपनी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन की तैयारी में व्यस्त थे पर इसी बीच उपकुलपति के आदेशानुसार उन्हे एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये कुछ दिनों के लिये बम्बई जाना पड़ गया और अब उन्हे उसी दिन वापिस आना था जिस दिन नसरुद्दीन का वहाँ पधारने का कार्यक्रम था। प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को निमंत्रण पत्र का मसौदा और किसे किसे निमंत्रण भेजना है, उन सब नामों की लिस्ट दे दी और कहा कि शांतनु और उनके छात्रों की सहायता से वे निमंत्रण पत्र छपवा कर सबको भेज दें। वे नसरुद्दीन के समारोह में आगमन को एक यादगार घटना बनाना चाहते थे। उनके जाने के बाद प्रोफेसर की पत्नी ने किताब के विमोचन के निमंत्रण पत्र को बच्चे के जन्म की खुशी में आयोजित समारोह का निमंत्रण पत्र बना कर सब लोगों को भिजवा दिया। वैसे लगभग सारे नाम तो उन्ही परिचितों के थे, जिन्हे चाहे किसी भी कारण से बुला लो। अतिथियों को भी इस बात का अहसास था कि प्रोफेसर और उनकी पत्नी को निस्संदेह बहुत ज्यादा खुशी होगी विवाह के इतने साल बाद संतान प्राप्ति से। आखिर उनका आँगन भी बच्चे की किलकारियों से गूँजेगा।

नियत दिन आ गया। नसरुद्दीन तो पहुँच गये। शांतनु उन्हे स्टेशन से ले आया और उन्होने बच्चे के नामकरण की रस्म भी विधिवत अदा कर दी और बच्चे को नाम दिया “पुलकित”।

समारोह में अतिथिगण आने लगे पर प्रोफेसर साब न पहुँच पाये थे, रेलवे स्टेशन पर पता किया गया तो पता चला की गाड़ी कुछ देरी से आयेगी।

उधर प्रोफेसर साब भी इस चिंता में घुले जा रहे थे कि नसरुद्दीन वहाँ पहुँच गये होंगे और वे अभी भी रेल में ही हैं। जाने क्या सोचते हों नसरुद्दीन? उन्होने उपकुलपति को थोड़ा कोसा।

ऐसे ही बैचेनी में भरे वे रेल के स्टेशन पर पँहुचने का इंतजार करते रहे और जैसे ही रेल स्टेशन पर पँहुची वे गाड़ी के रुकने से पहले ही रेल के डिब्बे से बाहर प्लेटफॉर्म पर कूद पड़े और तीर की तरह बाहर की ओर भागे। टैक्सी लेकर वे फौरन से पेश्तर घर पँहुचे।

उनका ही इंतजार हो रहा था। घर पँहुचते ही वे सबसे पहले नसरुद्दीन से मिले। उनकी पत्नी ने उन्हे याद दिलाया कि मेहमान कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं उनके आने का।

प्रोफेसर ने हाथ मुँह धोकर वस्त्र बदले और अपनी लिखी पुस्तक की पांडुलिपी लेकर वे घर के बाहर ही स्थित समारोह स्थल पर पँहुच गये। लोगों ने ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

प्रोफेसर के हाथों में हल्के लाल रंग के रेशमी वस्त्र में लिपटी पांडुलिपी थी। वे नसरुद्दीन, अपने छात्रों और शांतनु को लेकर मंच पर चले गये जहाँ उनकी पत्नी नवजात शिशु को गोद में लिये बैठी थी और पास ही शांतनु की पत्नी भी खड़ी थी। प्रोफेसर ने सबको शांत रहने के लिये अपना एक हाथ उठाकर इशारा किया सब उनकी तरह देखने लगे।

प्रोफेसर ने बोलना शुरु किया।

आज मेरी जिंदगी का बहुत अहम दिन है। आज हमारे बीच शांतनु के गुरु नसरुद्दीन जी मौजूद हैं। उनकी उपस्थिति मुझे कितनी खुशी दे गयी है मैं उसका वर्णन नहीं कर पाऊँगा और आप लोग शायद अनुमान न लगा पायेंगे। उनकी यहाँ उपस्थिति एक बहुत महत्वपूर्ण काम की परिणति होने के परिणामस्वरुप संभव हो पायी है अतः मेरा फर्ज बनता है कि मैं उस महत्वपूर्ण काम पर कुछ प्रकाश डालूँ।

लोगों ने तालियाँ बजानी शुरु कर दीं। वे तो समझ रहे थे कि जैसे उन्हे बच्चे के जन्म की खुशी बाँटने के लिये आमंत्रित किया गया है वैसे ही नसरुद्दीन भी निमंत्रण पर आये होंगे।
प्रोफेसर लोगों को शांत करते हुये आगे बोले।

कई बरसों से मैं जिस काम में लगान हुआ था वह अपनी परिणति को पँहुच गया है। मेरे गुरु नसरुद्दीन ने इतना मेरा मार्गदर्शन किया है इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने में कि मैं ताउम्र उनका शुक्रगुजार रहूँगा। आज वे उस कृति को अपने आशीर्वाद से सुशोभित करने आये हैं जिसका जन्म ही उनके आशीर्वाद से सम्पन्न हो पाया है।

लोग नसरुद्दीन की तरह कौतुहल की दृष्टि से देखने लगे। उन्हे नसरुद्द्दीन कोई पीर या संत लगे। प्रोफेसर लोगों का ध्यान नसरुद्दीन की तरफ देख कर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होने कहा।

मैं बहुत ज्यादा आभारी हूँ डा. शांतनु का जिन्होने मुझे गुरु के सम्पर्क में लाने का सौभाग्य प्रदान किया। यह उनका कर्ज रहा मुझ पर। अब तो वे मेरे गुरुभाई हैं।

अपने दोनों छात्रों को स्नेहमयी दृष्टि से देखकर मुस्कुराते हुये उन्होने कहा।

उम्र अपना असर दिखाती है और मेरे लिये इतना कठिन कार्य करना संभव न हो पाता यदि ये दो नौजवान अपनी भरपूर शक्ति, लगन और मेरे प्रति भक्ति से इस कार्य को पूरा करने में मेरी सहायता न करते। इन्होने दिन देखा न रात, जब भी मुझे इनकी जरुरत पड़ी ये उपस्थित रहे। इनके कठिन परिश्रम की बदौलत ही यह कार्य सम्पूर्ण हो पाया है। मैं इनके उज्जवल भविष्य़ को साफ साफ देख पा रहा हूँ।

बच्चे के जन्म के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रोफेसर और उनकी पत्नी की खुशी में सम्मिलित होने आये अतिथिगण थोड़े भौचक्के से खड़े प्रोफेसर, नसरुद्दीन और प्रोफेसर के छात्रों को देख रहे थे। कुछ मुस्कुरा भी रहे थे।

खैर उन सबको अनर्गल लगने वाले प्रोफेसर के भाषण का रहस्य तब खुल ही गया जब प्रोफेसर ने रेशमी कपड़े में बंधी पांडुलिपी बाहर निकाली पर उन क्षणों की कल्पना ही की जा सकती है जब अतिथि प्रोफेसर के भाषण को बच्चे के जन्म से सम्बंधित समझ रहे थे और प्रोफेसर यह सोचकर बोल रहे थे कि सब अतिथि उनकी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन के अवसर पर वहाँ एकत्रित हुये हैं।

किस्सा बहुत साल तक विश्वविद्यालय में हास्य उत्पन्न करता रहा।

…[राकेश]

जुलाई 19, 2010

कमियों को पूरा करने में – (कृष्ण बिहारी)

खोखला होता जाता है इंसान
एक-एक चीज को जमा करते हुये
निचुड़ जाता है जवानी का जोश
उसका रक्त्त
उसकी मज्जा
जाती है सूख
एक-एक चीज को बार-बार गिनने में।


यह हो गया
वह हो गया
वह अभी बाकी है
जैसे कि हर चीज डिग्री हो
जिसे हासिल करना जरुरी हो
जिसके बिना हर योग्यता
अधूरी हो।


बढ़े हुये कागज
परीक्षाओं की सनदें
अनुभवों के प्रमाण-पत्र
भविष्य निधि और बीमें की किश्तें
गहनों की रसीदें
आयकर से बचने के लिये ली गई
पॉलिसियों के पेपर और विकास-पत्र
सब पर लग रही है दीमक
बुढ़ाते जिस्म की तरह
खोखले हो रहे हैं रिश्ते।


सोचता हूँ मैं
सोचते हैं लोग
मकान बन जाये तो चैन मिले
जबकि मालूम है
मकान और मुकदमे से चैन नहीं मिलता
भटकने लगती है रुह मकान में
मकान बनने से पहले
झक्की हो जाता है आदमी
हो जाता है बीमार
मुकदमे का फैसला होने तक
और तैयार हो जाता है
सब कुछ खोने तक।


एक दिन छूट जाती है दुनिया
चीजों को सहेजने और रखने में
मर जाता है एक-एक पल
अपना और पराया परखने में।

{कृष्ण बिहारी}

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जुलाई 18, 2010

दाता द्वार खोलत नाहीं

“कुछ भी देकर उन्हे आप,
माहौल बिगाड़ रहे हैं
आप भिखारियों की संख्या में बढ़ोतरी कर रहे हैं”

भिखारी उन्मूलन संस्था बनायी है उन्होने
देश भर में दौरा करते हैं इसके अध्यक्ष की हैसियत से
गला दुखने लग जाता है
उस हद तक बोलते हैं
खिलाफ भिक्षावृत्ति के।

सब सार्वजनिक स्थलों से
भिखारियों को हटाने की मुहिम
उन्होने चलायी हुयी है,
“सबको आत्म निर्भर होना चाहिये”
उनका सूत्र वाक्य है,
और उनकी संस्था का भी।

वैसे वे अपने को धार्मिक कहते हैं
धर्म स्थलों की ही यात्रा नहीं करते
घर में भी नियमित रुप से
प्रार्थना आदि करते रहते हैं,
दिन रात कभी भी करने लगते हैं।

ईश्वर की कृपादृष्टि बनी रहे
उन्हे और उनके प्रियजनों को जो चाहिये
उसके लिये हाथ जोड़े
सिर झुकाये
प्रार्थना करते रहते हैं।

पर कुछ हो गया है,
आजकल
मामला कुछ जम नहीं रहा।

सारी दुनिया के साथ यही हो गया है।

कहीं कोई मुस्कुराया है!

घर में
या धर्मस्थलों में
कहीं भी जाकर प्रार्थना करके
कुछ भी माँगते रहो
आजकल मिलता कुछ नहीं।

जिससे मिल सकता है
वह तो मंद मंद मुस्कुराने
में व्यस्त है।

...[राकेश]

जुलाई 18, 2010

नेता पुराण

विशेषण के वर्गीकरण पर जायें तो ये नेता जी हैं तो उसी बिरादरी के जिसके कभी मनोहर श्याम जोशी जी के “नेताजी कहिन” वाले नेता जी हुआ करते थे पर तब से अब तक यमुना एक गंदे नाले में बदल चुकी है, गंगा में भी प्रदुषण नियंत्रण वालो ने बीओडी सीओडी नापना मापना छोड़ दिया है और बहुत से लोग मान चुके हैं कि अब गंगा किनारे वाली सभ्यता समाप्ति की ओर बह रही है।

सो जब इतने बदलाव आ चुके हैं तो नयी पीढ़ी के नेता जी के रुप, आकार, प्रकृति, प्रवृति और बुद्धि, लालच, क्षमता आदि में भी बदलाव आने स्वाभाविक हैं। विशाल भारद्वाज ने संभवत: अपनी पिछली फिल्म का शीर्षक इन्ही नेता जी के करमों और व्यक्तित्व से उधार लिया होगा। कमीनियत इनमें कूट कूट कर भरी है। इस गुण का हाल ये है कि एक बार इनके एक विरोधी, जो हालाँकि इन्ही की पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं, ने इनसे नाराज होकर इन्हे डपट दिया था,” क्या कुत्ते की तरह भौंक रहे हो “।

उनका पालतू कुत्ता वहीं खड़ा था वह इस तुलना से इतना नाराज हो गया कि मालिक को काटा तो नहीं पर उनकी वेशभूषा को जरुर तार तार करके डिजायनर वेयर का एक नया और नायाब किस्म का नमूना बना दिया और उनके शरीर पर भी यहाँ वहाँ पंजों से खरोंचे मार दी।

वो तो ये वक्त पर संभल गये वरना कुछ समय पहले इनकी चमचा पार्टी ने तो बाकायदा इन्हे पटा ही लिया था कि कमीनीगिरी के कुछ गुरों पर वर्ल्ड पेटेंट ले लिया जाये। इनके भतीजे ने जो दुनिया के बहुत सारे देशों में भारतीय फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी के व्यापार में अच्छा बड़ा हिस्सेदार है, ने इन्हे बता दिया कि चचा क्या कर रहे हो आपसे बड़े बड़े कमीने वैश्विक राजनीति में पड़े हैं और आपकी एप्लीकेशन रिजेक्ट होने के बहुत चांसेज हैं और आपकी जो भी इज्जत है वहाँ इंडिया में उसका फालूदा बन जायेगा, लोग खायेंगे और डकार तक न लेंगे।

नेता जी ने एक बार एक आंदोलन के नाम पर जनता से करोड़ों रुपये जमा कर लिये थे और आज तक किसी को पता नहीं कि उस धन का क्या हुआ। जाने किस की कृपा से एक बार नेता जी, मंत्री भी बन गये थे, उस दौरान सुबह ही झक सफेद कपड़े पहन, माथे पर टीका लगा कर वे कुर्सी पर विराजमान हो जाते थे और अपने चेलों के साथ दिन भर कैसे ज्यादा से ज्यादा धन कमाया जाये इसकी जुगत भिड़ाते रहते थे और मौका मिलते ही पत्रकारों को दी गयी बोलियों की मार्फत हर उस आदमी को हड़काई भेजते रहते थे जो उन्हे भ्रष्टाचार में लिप्त बताता था।

नेता जी की सीनाजोरी का हाल ये रहा है कि एक बार इन्ही की पार्टी की नगर पालिका के स्तर की युवा नेत्री ने इन पर जबरदस्ती शारीरिक शोषण का आरोप लगाया तो इन्होने उसे ही चरित्रहीन बता दिया था और कहा था कि ऐसी स्त्री उनके चरित्र हनन का प्रयास कर रही है। मामला अदालत में जाने तक तो खबरें छपती रहीं बाद में जनता भूल गयी और नेत्री कहाँ गायब हो गयी कोई नहीं जानता।

कुछ समय लो प्रोफाइल रहने के बाद नेता जी फिर सक्रिय राजनीति में अपने गुर दिखाने और अपने खुरों की धार आजमाने पूरे जोर शोर से आ गये और विरोधियों को चुनौती देने लगे कि वे तो खुला खेल फरुखाबादी खेलने आये हैं, जिसमें दम हो सामने आ जाये।

गले में बड़े बड़े रुद्राक्षों के मनकों वाली माला, दोनों हाथों की ऊँगलियों में कम से कम आधा दर्जन अँगूठियाँ पहन किसी तरह से उन्होने अपने दल में महासचिव का पद हथिया लिया और साथ ही उन्होने जुगाड़ कर लिया कि टीवी आदि पर बहस में भी वे दल की तरफ से हिस्सा लेंगे।

एक राज्य में चुनाव होने वाले थे और एक्जिट पोल्स ने इनके दल की हार की संभावना व्यक्त की थी तो इन्होने सारे ऐसे पोल्स को झूठा और विपक्षियों की साजिश बताया। वे कैमरे के सामने  एक्जिट पोल करने वाली संस्थाओं एवम विपक्षी दलों को गरियाते रहे।

हल्ले गुल्ले के मध्य चुनाव हो गये और नेता जी महाश्य टीवी स्टूडियो में चल रहे चुनाव नतीजों पर आधारित कार्यक्रम में शामिल हो गये। चुनाव के नतीजे आने से पहले से ही उन्होने रट लगानी शुरु कर दी थी कि उनके दल को दो तिहाई बहुमत मिलने जा रहा है और उनका दल ही सरकार बनायेगा।

चुनाव नतीजे आने शुरु हुये, वे टीवी पर ही विपक्षी दलों के सदुस्यों से झगड़ा करते रहे। वे एक ही बात बोले जा रहे थे कि उनका दल दो तिहाई बहुमत लेकर रहेगा।

यहाँ तक कि केवल पांच छह सीटों के चुनाव नतीजे रह गये थे और अब तक के नतीजों में उनके दल को बहुमत तो छोड़िये चालीस प्रतिशत सीटे ही मिली थीं। जब चुनाव चर्चा का संचालन कर रहे टीवी जर्नलिस्ट ने उनसे पूछा कि अब आपका क्या कहना है तो तब भी नेता जी दावे कर रहे थे कि उन्हे ही बहुमत मिलेगा।

जर्नलिस्ट ने उन्हे याद दिलाया कि नेता जी गणित पर भी तो ध्यान दीजिये तो नेता जी गरज कर बोले, ये गणित वणित क्या होता है, हमारा दल ही बहुमत से जीतेगा और दो तिहाई बहुमत हमें मिलेगा।

जर्नलिस्ट और विपक्षी दलों के सदस्यों के लिये तो मुश्किल था ही वहाँ स्टूडियो में हँसी रोक पाना, जनता जरुर टीवी पर नेता जी के दावे सुन सुन कर हँस हँस कर दुहरी हुयी जा रही थी।

अगले दिन नेता जी ने प्रेस कांफ्रेंस करके घोषणा कर दी कि चुनाव में धाँधली हुयी है। जब पत्रकारों ने उन्हे याद दिलाया कि पर नेता जी राज्य में सरकार तो आपके ही दल की थी तब दूसरे दल कैसे धाँधली कर सकते हैं तो उन्होने आरोप लगा दिया कि केन्द्र सरकार ने जनता के साथ मिलकर उनके दल के खिलाफ साजिश की है वरना अगर ढ़ंग से निष्पक्ष ढ़ंग से चुनाव हुये होते और ईमानदारी से वोटों की गिनती हुयी होती तो उनके दल को दो तिहाई बहुमत मिलना तय था।

इनके अपने दल में समीकरण कुछ ऐसे पलटे कि इन्हे और इनके जैसे कुछ नेताओं को हाशिये पर डाल दिया गया। ये बहुत कुलबुलाये, बहुत बिलबिलाये पर इनकी ज्यादा चली नहीं।
समीकरण फिर पलटे हैं और वे फिर से कुछ सक्रिय हुये हैं, देखें अब इस बार की पारी में वे क्या गुल खिलाते हैं?

…[राकेश]

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