Archive for अप्रैल, 2014

अप्रैल 30, 2014

दाने दाने पर कहाँ लिखा है जरूरतमंद का नाम?

हैम्बुर्ग पहुंचकर हम एक रेस्त्रां के अंदर गये| अंदर हमने देखा कि ज्यादातर मेजें खाली थीं| एक मेज पर एक युवा जोड़ा खाना खा रहा था| हमने ध्यान दिया कि उनके सामने मेज पर केवल दो तश्तरियाँ और दो ग्लास बीयर के रखे थे|
जर्मनी एक विकसित और औधोगिक देश है| ऐसा अनुमान सहज ही प्रतीत होता है कि ऐसे विकसित देश के निवासी आरामदायक और ऐश्वर्य से भरपूर ज़िंदगी जीते होंगे|

युवा जोड़े को इतना सादा खाना खाते देख लगा कि इस दावत में रोमांटिक भाव कहाँ हैं और निश्चित ही यह युवती इस कंजूस लड़के को जल्द ही अलविदा कह देगी|

एक अन्य कोने की मेज पर कुछ वृद्धाएं बैठी थीं| जब भी वेटर कोई डिश लेकर आता वह उन सबमें उसे बांट देता और महिलायें अपनी प्लेटों में परोसे गये खाने को पूरी तरह से खाकर समाप्त कर देती थीं|

हम लोगों को बहुत भूख लगी थी| स्थानीय साथी ने हम लोगों के लिए बहुत सा खाना आर्डर कर दिया| जब हमने मेज छोड़ी तो हमारे मेज पर कम से कम एक तिहाई से ज्यादा खाना बचा हुआ था|

जब हम रेस्त्रां से निकल रहे थे| एक वृद्धा ने हमसे अंग्रेजी में बात शुरू कर दी| हमें महसूस हुआ कि उन महिलाओं को हमारा मेज पर इतना सारा खाना छोड़ना अच्छा नहीं लगा|

“हमने खाने का पैसा दिया है और यह आप लोगों का मसला नहीं है कि हम कितना खाते हैं या कितना प्लेट में छोड़ देते हैं”| साथी ने थोड़े गुस्से से महिला को जवाब दिया|

महिलायें क्रोधित हो गयीं| उनमें से एक ने तुरंत पर्स से फोन निकाल कर किसी को फोन किया और कुछ ही देर में वर्दी पहने हुए सोशल सिक्योरिटी संस्था का प्रतिनिधि वहाँ हमारे सामने खड़ा था|
मामले को जानकर उसने हम पर 50 यूरो का फैन लगा दिया| हम चुप रहे|
अधिकारी ने गंभीर आवाज में हमें चेताया,” उतना ही आर्डर करो जितना आप लोग खा सकते हो| धन अवश्य ही आपका अपना है पर संसाधन पूरे देश और समाज की सामूहिक संपत्ति हैं| दुनिया में बहुत हैं जिनके पास साधन नहीं हैं और आपको कोई हक नहीं है संसाधनों को नष्ट करने का”|

धनी जर्मनी के लोगों के विचारों ने हमें शर्मिंदगी में धकेल दिया| हमें वाकई गहरे में विचार करने की जरुरत है| हमारा देश एक गरीब देश है| संसाधनों की कमी है|

हम भारी मात्रा में खाना बेकार करते हैं| दावतों में भी और रोजमर्रा के स्तर पर व्यक्तिगत जीवन में भी|

[जर्मनी में एक व्यक्ति के साथ हुये हादसे की कथा]

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अप्रैल 30, 2014

ध्रुवीकरण के धुरंधर – रवीश कुमार (NDTV)

Muslim tirangaमुसलमान एक तरफ़ जाएगा तो उसके ख़िलाफ़ हिन्दू दूसरी तरफ़ जाएगा। इससे मिलता जुलता विश्लेषण आप टीवी पर ख़ूब सुनते होंगे। मतदान की आती तस्वीरों के साथ टीवी स्टुडियो में बैठे जानकार किस आधार पर यह बात कह रहे होते हैं समझना मुश्किल है। हमारी राजनीति में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण एक तथ्य है मगर यह मिथक भी है। ध्रुवीकरण सतही और सामान्य व्याख्या का ऐसा औज़ार हो गया है जिसके सहारे जानकार एक मतदाता को साम्प्रदायिक रंग से पेंट कर देते हैं। इसी के साथ एक और मिथक की रचना करने लगते हैं। ‘टैक्टिकल वोटिंग’ का मिथक। क्या अन्य जाति धर्म समूह इस तरह से वोटिंग नहीं करते अगर करते हैं तो क्या वो इस कथित टैक्टिकल वोटिंग के जैसा ही है।

एक साइड मुसलमान तो दूसरी साइड हिन्दू। ऐसा लगता है कि स्टुडियो में बैठे जानकार एक ख़ास समुदाय की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि मुसलमान एकजुट हो रहे हैं । भाजपा के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं लिहाज़ा स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को भी भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाना चाहिए। अख़बारों में भी ऐसी बातें ख़ूब लिखी जा रही हैं। कई बार लगता है कि एक रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है। मतदान प्रक्रिया का एक अदना सा एक्सपर्ट भी जान सकता है कि कुछेक अपवादों को छोड़ सामान्य रूप से यह बात सही नहीं है। कई बार लगता है कि चुनाव के समय ऐसे विश्लेषणों के सहारे समाज में साम्प्रदायिकता को भड़काने का काम किया जाता है।

क्या हिन्दू हमेशा यह देखकर वोट देता है कि मुसलमान किस तरफ़ वोट दे रहा है या मुसलमान यह देखकर वोट देता है कि हिन्दू किस तरफ़ देता है । इसका वैज्ञानिक आधार क्या है। हर चुनाव में मुस्लिम मतदाता को ब्रांड करने का खेल खेला जाता है। जैसे उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं है और वो सिर्फ मुसलमान बनकर वोट करता है। अगर ऐसा होता तो यह बात सही होती कि एक आम मुस्लिम मतदाता इमाम बुख़ारी जैसे धर्मगुरुओं के कहने पर ही वोट कर देता। किसी भी चुनाव का आँकड़ा देखेंगे तो यह ग़लत साबित होता है। आम मुस्लिम मतदाता बड़े आराम से मतदान के फ़ैसले में मुल्ला मौलवियों की दख़लंदाज़ी को पसंद नहीं करता। खुलकर बोलता भी है लेकिन मीडिया ऐसे धर्मगुरुओं के बहाने मुस्लिम मतदाताओं का सांप्रदायिकरण करता रहता है।

इसी संदर्भ में एक और बात कहना चाहता हूँ। बाबा रामदेव जैसे कई योग गुरु और धर्मगुरु भी तो किसी पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। इमाम बुख़ारी का अपील करना साम्प्रदायिक और बाबा रामदेव या शंकराचार्य का अपील करना राष्ट्रभक्ति। कैसे? मैं दोनों की तुलना नहीं कर रहा लेकिन मूल बात यह है कि सभी प्रकार के मज़हबी नेता चुनाव के वक्त सक्रिय होते हैं। कोई आशीर्वाद के नाम पर इनके पास जाता है तो कोई अपने भाषणों में देवी देवताओं के प्रतीकों का इस्तमाल करके धर्म का इस्तमाल करता है। खुद को ईश्वर का दूत बताना क्या है।

आम मतदाता को इससे सचेत होने की ज़रूरत है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हमारे तमाम धर्मों के गुरुओं का समाज से गहरा नाता होता है। झट से उनके किसी राजनीतिक आचरण को साम्प्रदायिक क़रार देने से पहले देखना चाहिए कि वे क्यों ऐसा कर रहे हैं। उनका आधार सांप्रदायिक है धार्मिक है या राजनीतिक। अगर विरोध करना है तो एक साथ डेरों, मठों, मस्जिदों की राजनीतिक दख़लंदाज़ी का विरोध कीजिये।

मैं फिर से लौटता हूँ अपनी मूल बात पर। तमाम अध्ययन बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता अपनी पसंद के हिसाब से अलग अलग राज्यों में अलग अलग पार्टी और नेता को वोट करता है। मुसलमान एक नहीं कई दलों को वोट करने के साथ साथ बीजेपी को भी वोट करता है। मध्यप्रदेश राजस्थान और गुजरात में भी करता है। हो सकता है कि प्रतिशत के लिहाज़ से कम हो लेकिन आप यह भी तो देखिये कि बीजेपी ने इन राज्यों में लोकसभा के चुनावी मैदान में कितने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में कितने उतारे हैं। पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी को पचीस छब्बीस प्रतिशत मत मिले थे शेष और पचहत्तर फ़ीसदी मत अन्य दलों को। अगर हिन्दू वोट जैसा कुछ होता तो बीजेपी को पचहत्तर फ़ीसदी वोट मिलते। जो हिन्दू बीजेपी को वोट नहीं करते उनके न करने के आधार क्या हैं। हमारे ये जानकार हिन्दू मतदाताओं के विवेक के साथ भी अन्याय करते हैं। मतदाताओं का अति हिन्दूकरण कर साम्प्रदायिक रंग देते हैं।

चलिये इस बात को एक और तरीके से देखते हैं। हर समुदाय या जाति के लोग अपने उम्मीदवारों को वोट देते हैं। इसी आधार पर कांग्रेस बीजेपी सब अपने उम्मीदवार तय करते हैं। तब भी बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान किसी मुसलमान उम्मीदवार को वोट नहीं करता है। वो उसी दल या उम्मीदवार को वोट करेगा जिसके पास पर्याप्त वोट हो। यह वोट कहाँ से आता है। कथित रूप से हिन्दू समाज से ही न। तो यह बात कैसे उचित ठहराई जा सकती है कि हिन्दू एक तरफ़ जाते हैं और मुस्लिम दूसरी तरफ़ । क़ायदे से तो एक दूसरे की पार्टी को हराने के लिए दोनों मिल-जुल कर एक दूसरे के ख़िलाफ़ गोलबंद होते हैं। इसके बाद भी सारे मुसलमान किसी एक व्यक्ति या दल को वोट नहीं करेंगे।

मुसलमानों को कथित रूप से बीजेपी के ख़िलाफ़ पेश किये जाने के बाद भी जानकार जानते हैं कि वे कहीं भी एकमुश्त वोटिंग नहीं करते। यह संभव भी नहीं है। ऐसा होने लगा तो समझिये कि मुस्लिम समाज के भीतर आपसी टकराव ही समाप्त हो जायें। आप भी जानते हैं कि मुसलमानों के बीच अगड़े पिछड़े और दलित मुसलमानों के हक़ को लेकर ज़बरदस्त टकराव है। पिछले दिनों कई राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश, केरल और असम, मुस्लिम दलों का उदय हुआ है क्या ये सभी बीजेपी के ख़िलाफ़ उभरे हैं? नहीं। इनसे चुनौती कांग्रेस सपा बसपा लेफ़्ट को भी मिलती है।

इसीलिए जानकारों को ध्रुवीकरण की बेहद सतही और ख़तरनाक व्याख्या से बचना चाहिए। बनारस में नरेंद्र मोदी जब अपने नामांकन के लिए जा रहे थे तो उस भीड़ में भी कैमरे मुसलमान ढूँढ रहे थे। उनका क्लोज़ अप दिखा रहे थे। मुझे इस बात से आपत्ति है। क्या कैमरे उस भीड़ में शामिल अन्य लोगों को भी उसी निगाह से देख रहे थे। अगर नहीं तो फिर एक या दो मुसलमान की तलाश क्यों हो रही थी। तब भी जब नरेंद्र मोदी के साथ मुख़्तार अब्बास नकवी नज़र आ रहे थे। बीजेपी भले हिन्दुत्व या संघ के कहने पर चले पर उसे मिलने वाला हर वोट इसके लिए नहीं मिलता। बीजेपी के कार्यकर्ता चाहें जितना हिन्दुत्व के रंग रूप में ढल कर आक्रामक हो जायें उनकी पार्टी को मिलने वाला हर वोट हिन्दू वोट नहीं है। ज़्यादातर दलित मतदाताओं को खुद को इस पहचान से जोड़ कर देखे जाने से आपत्ति हो सकती है जबकि हो सकता है कि वो वोट बीजेपी को दें।

हमें जनमत का साम्प्रदायिकरण नहीं करना चाहिए। सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण हमारी राजनीति की ख़तरनाक सच्चाई है लेकिन ऐसा हर जगह किसी एक फ़ार्मूले के तहत नहीं होता कि मुसलमान इधर गए तो हिन्दू उधर चले जायेंगे । कई बार लगता है कि जानकार मुस्लिम मतदाताओं का मज़हबी चरित्र चित्रण करते हुए ग़ैर मुस्लिम मतदाताओं को इशारा कर रहे होते हैं कि उन्हें वोट कहाँ देना चाहिए।

(रवीश कुमार)

अप्रैल 30, 2014

शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की माँ का पत्र नरेंद्र मोदी के नाम

CaptBatraMom69 वर्षीय कमल कांत बत्रा, हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से लोकसभा का चुनाव “आम आदमी पार्टी” के टिकट पर लड़ रही हैं| श्रीमती बत्रा, ने पाकिस्तान द्वारा भारत पर जबरदस्ती थोपे गये कारगिल युद्ध में अपने 24 वर्षीय बेटे कैप्टन विक्रम बत्रा को खोया था| शहीद होने से पहले NDTV को दिए साक्षात्कार में विक्रम बत्रा द्वारा कहा गया जुमला ” ये दिल मांगे मोर” उस समय भारतीय सेना का उत्साह बढाने के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम का नारा बनकर बहुत प्रसिद्द हो गया था|

श्रीमती बत्रा ने भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखा है|

प्रिय श्री मोदी जी,

आपने अपने चुनाव प्रचार में मेरे शेर बेटे का नाम और उसका नारा – ये दिल मांगे मोर, इस्तेमाल किया है| लोग मेरे बेटे को कारगिल का शेर शाह कहते हैं| जसी समय वह कारगिल युद्ध में शहीद हुआ तब उसकी आयु मात्र 24 साल की थी|

अब आप विक्रम का नाम और उसका नारा इस्तेमाल कर रहे हैं| मुझे आपसे पूछना है कि 1999 से अब तक 15 सालों में न तो आपने न ही भाजपा को न मेरे बेटे की याद आयी न उसके नारे की| अब चुनाव में आपको अचानक ही यह सब याद आ गया और चुनावी फायदे के लिए आपने एक वीर सैनिक की शहादत का सहारा लेना शुरू कर दिया|  यह भ्रष्ट राजनीति का नमूना है|

 

श्री मोदी जी, अगर आप सेना और उसके शहीदों का सम्मान करते हैं तो शहीदों के परिवार आपके लिए ईश्वर के समान होते| अगर मैं आपकी जगह होती तो शहीद के परिवार के नुमाइंदे के खिलाफ खड़े भाजपा उम्मीदवार को चुनाव मैदान से हटने के लिए कहती|

अगर आपके दिल में कैप्टन बत्रा के परिवार के लिए सम्मान है तो आपको याद रहता कि मैं विक्रम की माँ हूँ| मेरे बेटे की प्रशंसा करते हुए “ये दिल मांगे मोर” कहते हुए आपको स्मृति में रहता कि शहीद के परिवार को सम्मान देने के लिए क्या किया जा सकता है|

ऐसा क्यों है कि भाजपा ने कभी भी शहीदों के परिवारजनों को टिकट नहीं दिये?

मेरे लिए यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, यह किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लड़ाई नहीं है| यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई है| लोगों को भष्टाचार से निजात चाहिए|

सारा भारत विक्रम बत्रा को जानता है|

कुछ गाँवों में आम आदमी पार्टी के स्वयसेवकों ने लगों से मेरे लिए कहा,” ये शहीद विक्रम बत्रा की माँ हैं”| इसमें क्या गलत है? विक्रम ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान की| उसे गर्व होगा जानकार कि मैं भी उसकी भांति देश सेवा करने उतरी हूँ| क्या मेरे बेटे का नाम मुझसे अलग किया जा सकता है? मेरा नाम मेरे बेटे के साथ आएगा और मेरे बेटे का नाम मेरे साथ जुड़ा रहेगा| कोई इस सत्य को झुठला नहीं सकता|

इस लोकसभा के चुनाव प्रचार में आपका नाम हर जगह है|

आपको ज्ञात होना चाहिए कि केवल अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने हमें इस तरह सम्मान देने के बारे में सोचा| उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चुनाव लड़कर लोगों की सहायता करना चाहूंगी?

मैं केवल एक स्त्री ही नहीं बल्कि भारतीय नागरिक भी हूँ| मेरा अधिकार है राजनीति में प्रवेश करने का| हर भारतीय नागरिक का अधिकार है यह|

जब आम आदमी पार्टी ने मुझसे हिमाचल प्रदेश से चुनाव लड़ने का अग्राह किया मैं इंकार नहीं कर पाई| उनके आग्रह में सच्चाई की ताकत थी|

और दलों ने हमें बुरी तरह निराश किया है|

भवदीय,

कमल कांत बत्रा

अप्रैल 29, 2014

नरेंद मोदी की बनारस से हार का गणित

AKvs Modiबनारस का सियासी समीकरण नरेन्द्र मोदी को नाको चने चबवाने पर मजबूर कर सकता है| हम इस वक़्त बनारस में रहकर काशी की इस दिलचस्प लड़ाई का जायज़ा ले रहे है| इस दौरान हमें मोदी की कई ऐसी बातें मालूम पड़ी जो आपको चौंका सकती है| हम आपके सामने सिलसिलेवार तरीके से ऐसे पहलू रखने जा रहे हैं, जो चक्रव्यूह में फंसे मोदी की हक़ीक़त बेपर्दा कर देंगे|

मोदी ने काशी की लड़ाई में पार पाने के खातिर आनन-फानन में ‘अपना दल’ से समझौता कर लिया| अपना दल की पटेल-कुर्मी वोटरों पर पकड़ है और बनारस में इस तबके की आबादी ढाई लाख के करीब है| ऐसे में मोदी की जीत-हार में यह फैक्टर निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है| दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता ‘अपना दल’ की युवा अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने आनन-फानन में बग़ैर अपने काडर की राय लिए कर लिया और बदले में मिर्ज़ापुर की लोकसभा सीट पर बीजेपी के सहयोग से टिकट हासिल कर लिया. जबकि इससे पहले ‘अपना दल’ की बातचीत कांग्रेस के साथ चल रही थी. ऐसे में काडर खुद को बुरी तरह ठगा महसूस कर रहा है. चर्चा गर्म है कि ‘अपना दल’ का यही काडर इस दग़ाबाज़ी का बदला चुनाव में मोदी की हार सुनिश्चित करके ले सकता है|

काशी में भूमिहार वोट तकरीबन सवा से डेढ़ लाख के बीच में है. यह पूरा वोट लामबंद होकर कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय के हक़ में गिर रहा है|

काशी की लड़ाई में दलित वोट भी बहुत महत्वपूर्ण है. एक से सवा लाख के बीच का यह दलित वोट-बैंक बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद टस से मस होने को तैयार नहीं है|

काशी में चौरसिया समाज के डेढ़ लाख वोट हैं| यादव 70 से 80 हज़ार हैं| पाल, सैनी जैसे दूसरे वोट-बैंक भी दो से ढाई लाख के करीब हैं, जो खांटी तौर पर जाति राजनीति के साथ जा रहे हैं| बीजेपी मज़हब की चाशनी के नाम पर इन्हें अपने खेमे में खींचने की पूरज़ोर कोशिश कर रही है, मगर यह वोट बैंक अपनी जातिय प्रतिबद्धताओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है|

मुस्लिम वोटबैंक बनारस में तीन से साढ़े तीन लाख के करीब है, जो ध्रुवीकरण की सूरत में बग़ैर बंटे एक तरफा तरीके से मोदी के खिलाफ जाएगें, जो मोदी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद घातक हो सकता है.

मोदी की सबसे बड़ी चिंता ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर है| काशी में ढ़ाई लाख के करीब ब्राह्मण हैं| यह तबका मुरली मनोहर जोशी की उपेक्षा और जातिय स्वाभिमान का उचित प्रतिनिधित्व न मिलने से भड़का हुआ है| इस बात की संभावनाएं है कि इस तबके के वोटों में चुनाव के मौके पर भारी बिखराव हो सकता है|

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अरविन्द केजरीवाल जिस तरीके से मोदी के गुजरात में छाए भ्रष्टाचार की कलई खोल रहे हैं, उसका असर पढ़े-लिखे तबके पर सीधे तौर पर पड़ रहा है. यह तबका अपनी विवेक के आधार पर सही मौके पर सही क़दम उठा सकता है|

मोदी का दो जगह से चुनाव लड़ना भी उनके खिलाफ काम कर रहा है| काशी के मतदाताओं के बीच यह मुद्दा उथल-पुथल पैदा कर चुका है. इस बात की चर्चाएं आम होती जा रही है कि मोदी चुनाव जीतने पर बनारस को चूसे हुए आम की गुठली की तरह फेंक देंगे|

मोदी के लिए राजनाथ फैक्टर भी टेढ़ी खीर बन चुका है| सुत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह अंदर ही अंदर मोदी को काटने में लगे हुए हैं| राजनाथ सिंह को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर मोदी बनारस से हार गए तो उनके पीएम बनने की राह में हमेशा के लिए दीवार खड़ी हो जाएगी.

मोदी की काशी से दूरी भी उनके खिलाफ जा रही है. सुत्रों के मुताबिक मोदी के सलाहकारों ने उन्हें समझा दिया है कि उन्हें बनारस में जीत की खातिर पसीने बहाने की कोई ज़रूरत नहीं है. यहां जीत तय है. उन्हें नामांकन छोड़कर बनारस आने की भी ज़रूरत नहीं है. यही वजह है कि मोदी बनारस में दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, जबकि पास-पड़ोस के ज़िलों में रैली करके निकल जा रहे हैं. मोदी का यह अति आत्म-विश्वास उन पर भारी पड़ सकता है.

नरेन्द्र मोदी के लिए काशी की लड़ाई किसी वाटर लू से कम नहीं है. अगर मोदी यहां हारे तो उनके राजनीतिक भविष्य को कोई नहीं बचा सकता है| काशी में मोदी के वाटर लू की शुरूआत हो चुकी है|
(Shams Tabrez)

अप्रैल 28, 2014

ब्याहना

बाबा!Daughter-001
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल

मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप…

महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी

मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे

उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे !

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक

चुनना वर ऐसा
जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली
और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत

बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल

जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे ।

(निर्मला पुतुल)

अप्रैल 28, 2014

(नये) ईश्वर का चुनाव : अशोक वाजपेयी

Modi ishvar

साभार जनसत्ता

अप्रैल 28, 2014

“आम आदमी पार्टी” को कितनी सीटें? : शरद शर्मा (NDTV)

AKbanaras1कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की ?

कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की?
पिछले कुछ महीनों से लोग अक्सर मुझसे ये सवाल करते हैं और ये बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि मै आम आदमी पार्टी कवर करता हूँ इसलिये लोग जानना चाहते हैं कि मेरा क्या आंकलन है इस पार्टी को लेकर|

लेकिन बात इतनी सीधी नहीं होती लोग पहले मुझसे पूछते हैं और फिर बिन मांगे अपनी राय भी दे देते हैं…और राय ज़्यादातर ये होती है कि कुछ ना होना केज़रीवाल और उसकी पार्टी का, अब कहानी खत्म है|

मैं मन ही मन सोचता हूँ कि ये लोग पूछने आये थे,
बताने आये थे,
या फिर बहस करने आये थे?

असल में ये लोग केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने आते हैं जिसके अलग अलग काऱण हैं

लेकिन ज़रा सा अपने दिमाग पर ज़ोर डालें तो आप देखेंगे कि आजकल शादी में जाओ तो राजनीति डिस्कस हो रही है, बस में, ट्रेन में, दफ्तर में, गली मोहल्ले में राजनीती पर ही चर्चा चल रही है|
क्या पहले ऐसा होता था?
क्या लोग राजनीती जैसे ऊबाऊ विषय पर अपने दिल की बात बोला करते थे?

एक दौर आया था जब न्यूज़ चैनल्स को देखनेवाले लोगों की संख्या घट रही थी और लोग न्यूज़ चैनल देखने की कोई ख़ास ज़हमत नहीं उठाते थे|
लेकिन आज से तीन साल पहले दिल्ली के जंतर मंतर से जो आंदोलन शुरू हुआ उसने आम लोगों को वापस राजनीती के बारे में बात करने के लिए विवश किया, आम लोग बहुत समय के बाद घर से बाहर निकलकर अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ खुलकर नारे लगाते और टीवी पर बोलते दिखे|

और वहीँ से सरकार के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ जो आज इस मोड़ पर आ गया है कि लोगों में इस बात पर शर्त लग रही है कि कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा तीन डिजिट में जायेगा या दो में ही रह जाएगा|

वहीँ से लोगों में एक बार फिर न्यूज़ चैनल देखने वाले लोगों की तादाद बढ़ी
वहीँ से बहुत से न्यूज़ चैनल…. न्यूज़ और डिबेट दिखाने को मजबूर हो गए वरना याद कीजिये उससे पहले कुछ चैनल्स क्या दिखाया करते थे?
उसके बाद से आजतक चुनाव में पहले से ज़्यादा मतदान हो रहा है और पोलिंग के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं|

हाँ ये जनलोकपाल का आंदोलन था जिसने समाज को कुछ नया सोचने और उम्मीद पालने का जज़्बा दिया|

अण्णा हज़ारे इस आंदोलन का चेहरा रहे, जबकि अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी इस आंदोलन का दिमाग|
जो उम्मीद इस आंदोलन से आम जनता को बंधी वो समय के साथ टूटती दिखी
अपनी विचारधारा और काम करने के तरीके को लेकर इस आंदोलन के कर्ता धर्ताओं में मतभेद की खबरें आम थी|
और फिर एक दिन सामजिक आंदोलन पोलिटिकल पार्टी की तरफ बढ़ गया और नतीजा हुआ कि ये टीम दो हिस्सों में बंट गई पोलिटिकल और नॉन पोलिटिकल
और लगा कि सब खत्म क्योंकि जब साथ रहकर कुछ न कर पाये तो अलग होकर क्या करेंगे?

लेकिन धीरे धीरे एक उम्मीद फिर दिखाई दी, ये उम्मीद थी अण्णा के अर्जुन कहे जाने वाले अरविन्द केजरीवाल, जिन्होंने आम आदमी पार्टी बनायी और धीरे धीरे दिल्ली के अंदर आम आदमी के मुद्दे इस क़दर उठाये कि बहुत समय के बाद…कम से कम दिल्ली के आम आदमी को गरीब आदमी को किसी पार्टी से या यूँ कहें कि किसी नेता से कुछ उम्मीद हो गयी और इसी उम्मीद की वजह से आम आदमी पार्टी दिल्ली में 70 में से 28 सीटें जीत गयी, कांग्रेस ने बिन मांगे समर्थन दे दिया और देखते ही देखते अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए|

आम लोगों से बातचीत के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि केजरीवाल के शासनकाल में भ्रष्टाचार कम हुआ, बिजली और पानी के दाम भी ज़रूर घटे थे|

लेकिन केजरीवाल के इस्तीफा देने से उन उम्मीदों को धक्का लगा जो लोगों को अपने इस नए नेता से थी , असल में जिसने वोट दिया था और जिसने वोट नहीं भी दिया था सब के सब महंगाई और भ्रष्टाचार से तंग तो थे ही…. इसलिए सब को केजरीवाल से उम्मीद थी …..ये नेता कुछ करके दिखायेगा!

दिल्ली और देश के जिस हिस्से में मैं गया वहां इस पार्टी या इस नेता के लिए बस एक ही नेगेटिव पॉइन्ट दिखता है, एक ही सवाल है कि सरकार क्यों छोड़ी? क्या लोकसभा चुनाव लड़ने का लालच आ गया था मन में ? या लग रहा था कि जैसे मुख्यमंत्री बन गया वैसे ही प्रधामंत्री बन जाऊँगा?

खैर केजरीवाल ने इसके जवाब अपने हिसाब से दिए भी लेकिन जनता कितना उसको कितना समझ पायी है या समझेगी इस पर साफतौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि कुछ लोग नाराज़गी के चलते कह रहे हैं ‘आप‘ की गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद और एक तबका ऐसा भी है जो कहता कि दिल दुखा है लेकिन टूटा तो नहीं है उम्मीद का दामन छूटा तो नहीं है

वैसे केजरीवाल के काम करने का तरीका हमेशा चर्चा और विवाद में रहा हो लेकिन उनकी ईमानदार आदमी की छवि पर कोई डेंट नहीं है ये सब मानते हैं और उनकी ईमानदारी पर शक़ होता तो लोग उनके इस्तीफे पर कहते कि अच्छा हुआ राहत मिली एक खाऊ मुख्यमंत्री और उसकी सरकार से, जबकि लोग अभी कह रहे हैं कि सरकार नहीं छोड़नी चाहिए थी। मैं सोचता हूँ कि ईमानदारी तो ठीक है लेकिन उसका जनता क्या करेगी अगर आप उसको अच्छा शासन ना दिखा पाएं

खैर अब बात फिर वहीँ आती है कि आप की कितनी सीटें आ रही हैं? तो जवाब ये है कि इस पार्टी का वोटर साइलेंट रहता है इसलिए पार्टी का जनाधार पता लगाना या फिर आंकलन कर पाना बहुत कठिन है। दिल्ली चुनाव से पहले कौन कह रहा था कि केजरीवाल शीला को हराएंगे और वो भी एकतरफा? या केजरीवाल की पार्टी 28 सीटें जीतेगी और केजरीवाल मुख्यमंत्री बन जाएंगे?

और बात आजकल ये भी हो गयी है कि वोटर आसानी से बताता नहीं है की वो किसको वोट देगा या फिर दे चुका है ? क्योंकि वो अपने इलाके के किसी दूसरी पार्टी के नेता, विधायक, सांसद जो शायद उसका दोस्त, जानने वाला, पडोसी वगैरह भी हो सकता है लेकिन वोट उसको नहीं किसी दूसरी पार्टी को देना चाहता है ऐसे में आपको बताकर वो उसका बुरा नहीं बनना चाहता|

यही नहीं आजकल तो हालत ये हो गए हैं की दिल्ली में एक परिवार के सारे वोट एक पार्टी को चले जाएँ ये पक्का नहीं है…… मेरे एक पत्रकार मित्र जो बीजेपी कवर करते हैं उन्होंने दिल्ली में वोटिंग वाले दिन मुझसे पहले तो दिल्ली की स्थिति पर चर्चा करी और फिर बताया कि हालात जैसे दिख रहे थे वैसे असल हैं नहीं , मैंने पूछा क्या हुआ ….. बोले यार हद हो गयी …. मैं बीजेपी को वोट देकर आया हूँ लेकिन मेरे घर के 4 झाड़ू (आप) को चले गए|

मेरे लिए ये कोई अचम्भा नहीं था क्योंकि मैं दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में देख चुका था कि जो परिवार सालों से बीजेपी को वोट दे रहे थे उसमे इस बार माँ बाप तो कमल का बटन दबाकर आये थे लेकिन बच्चे झाड़ू चलकर आये थे जिसकी वजह से बीजेपी के हाथ से उसके गढ़ शालीमार बाग़, रोहिणी जैसी सीटें निकल गयी थी

इसलिए कोई सीटों का आंकड़ा दिए बिना मैं मानता हूँ कि ये पार्टी 8 दिसंबर की तरह 16 मई को चौंका दे तो मुझे हैरत नहीं होगी .

Sharad Sharma, Journalist NDTV

अप्रैल 28, 2014

श्रीमती अरविंद केजरीवाल आपको डर नहीं लगता अपने पति के लिए?

Arvindwifeलोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि तुम अरविंद की पत्नी होने में कैसा महसूस करती हो?

क्या तुम्हें डर नहीं लगता?

मैं उन्हें मुस्कुरा कर जवाब देती हूँ कि नहीं, मुझे डर नहीं लगता|

मगर सच्चाई ये है कि मुझे कभी कभी थोड़ा डर महसूस होता है|

खास तौर से तब जब अरविंद घर पर नहीं होते|

आधी रात को उठ कर अपने दोनों बच्चों के बेड के पास जाकर घंटों खड़ी रहती हूँ| कभी कोई बुरा ख़याल आ जाता है तो खामोशी से रो लेती हूँ|

शायद ये स्वाभाविक भी है|

पहले पहले दिल करता था कि अरविंद से कह दूं कि देश की चिंता छोड़ो.

अपने बच्चों की चिंता करो,

अपनी पत्नी की,

अपने बूढ़े माँ-बाप की चिंता करो|

देश की चिंता के लिए भगवान किसी और को खड़ा कर देगा…

मगर अब मुझे अपनी उस सोच पर शर्म आती है…

अब मुझे अपनी किस्मत पर गर्व होता है

कि अरविंद ने मुझे अपना जीवनसाथी चुना है|

अरविंद के साथ रह कर मेरा ये विश्वास भी पक्का हो गया कि आख़िर में जीत

सच्चाई की ही होती है|

हाँ…अरविंद

सच्चाई के इस रास्ते पर मैं

तुम्हारे साथ हूँ और हमेशा रहूंगी|

भगवान मेरा सुहाग सलामत रखेगा, और तुम्हें बहुत सारे लोग मिलेंगे जो इस सच्चाई के रास्ते में तुम्हारा साथ देंगे|

अप्रैल 28, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नरेंद्र मोदी @ वाराणसी में नामांकन

Neetish@Modi

भीड़ दोनों तरफ है फर्क बस इतना है

एक तरफ आई हुई है

दूसरी तरफ लाई हुई है

हवा दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ बनी हुई है

दूसरी तरफ पैसे के दम पर बनाई हुई है

जीत का विश्वास दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ आम लोगो के दम पर है

दूसरी तरफ अंबानी अडानी के दम पर है

चर्चा दोनों तरफ की है

फर्क बस इतना है

एक तरफ की चर्चा आम जनता में है

दूसरी तरफ मीडिया ने बनाई हुई है

AKvsModi@Benaras

लगता है कि बनारस में कारपोरेट मीडिया/भाजपा समर्थित कथित ‘सुनामी’ के सबसे पहले शिकार ख़ुद पत्रकार हो गए हैं और यह ‘सुनामी’ उन्हें पूरी तरह बहा ले गई है.

सबूत चाहिए तो कल टीवी पर और आज के अखबारों में बनारस में नमो के नामांकन की रिपोर्टिंग पढिए. जिस श्रद्धा और भक्ति से रिपोर्टिंग की गई है, उसमें सबसे पहले तथ्यों को अनदेखा किया गया है|

उदाहरण के लिए टाइम्स आफ इंडिया और इकनामिक टाइम्स की रिपोर्टों में तथ्यों में फ़र्क़ है| उनकी तुलना बाक़ी अख़बारों की रिपोर्टों से करें तो उन सबके बीच तथ्यों का फ़र्क़ साफ़ दिखने लगता है.

कुछ साल मैंने भी बनारस में गुज़ारे हैं. कुछ सवाल सिर्फ तथ्यों के बारे में. पहली बात यह है कि अगर मलदहिया से मिंट हाउस,नदेसर की दूरी गूगल मैप के मुताबिक़ १.७ किमी है, उसे २ किमी भी मान लिया जाए और उसे पूरी तरह लोगों से भरा हुआ भी मान लिया जाए तो उसमें ४० हज़ार से ज़्यादा लोग नहीं होंगे. वह लाखों और कुछ अख़बारों/चैनलों में ३ लाख तक कैसे पहुँच गई? थोड़ा सा गणित का इस्तेमाल कीजिए,आपको वहाँ पहुँची भीड का अंदाज़ा लग जाएगा|

susheel modi tweetयह ज़रूर ‘सुनामी’ का ही असर है! श्रद्धा में बह रहे मीडिया में तथ्य बह जाएँ तो किमाश्चर्यम?

एक आदमी को खड़े होने के लिए एक हाथ लम्बी और एक हाथ चौड़ी जगह तो चाहिए ही. मतलब 18 इंच गुने 18 इंच. यानी लगभग 50 cm x 50 cm. यानि कि 1 sq meter में अधिकतम ४ आदमी

वाहन के आस पास के 200 meter में 1 sq meter में ४ आदमी घनत्व, उसके पिछले 300 meter में 1 sq meter में केवल 2 आदमी का घनत्व तथा बाकी 1500 meter में 2 sq meter में 3 आदमी के घनत्व के हिसाब से मलदहिया से कचहरी के बीच की सड़क को 60 फीट (यानि 18 meter) चौड़ी मानते हुए ये संख्या होगी [(200x18x4)+(300x18x2)+(1500x18x2/3)] यानी कुल 14400+10800+18000 = 43200

अगर ये मान भी लिया जाए कि 7-8 हजार लोग लंका, काशी विद्यापीठ और मलदहिया और बीच के रास्ते में ही रह गये और जुलूस में शामिल नहीं हुए तो जुलूस की पूरी संख्या 50 हजार कही जा सकती है

अब अगर इसमें से बनारस की अन्य लोकसभा क्षेत्रों, पूर्वांचल के अन्य लोकसभा क्षेत्रों और बिहार से आये हुए लोगों की संख्या (जैसा सुशील मोदी का दावा है) को, यानि की कुल 25 लोकसभा क्षेत्रों के लिए @ 1000 के हिसाब से तथा गुजरात और अन्य राज्यों से आकर बनारस में कैम्प कर रहे 5 हजार लोग यानी कुल बाहरी संख्या को 30 हजार भी मानकर घटा दिया जाए तो यह तथाकथित सुनामी बनारस संसदीय क्षेत्र से केवल 20 हजार लोगों को ही बटोर पाई.” [Anand Pradhan]

…..

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी रोज चार से छह रैलियां करते हैं। वह देश के कोने-कोने जाकर प्रचार कर रहे हैं। लेकिन, रात अपने बंगले में ही बिताते हैं। (यह भी एक रहस्य की बात है!) उन्हे उड़ाने के लिए तीन जहाजों का बेड़ा हमेशा तैनात रहता है। इनमें एक जेट प्लेन और दो चॉपर शामिल हैं। ये विमान अदाणी ग्रुप और डीएलएफ जैसी कंपनियों के हैं।

मोदी को उड़ाने के लिए अहमदाबाद एयरपोर्ट पर हर सुबह एक एंब्रेयर एयरक्राफ्ट EMB-135BJ तैयार रहता है। यह जेट विमान करनावती एविएशन का है, जो अदाणी ग्रुप की ही एक कंपनी है। मोदी के हवाई बेड़े में अगस्ता AW-139 चॉपर भी शामिल है। यह डीएलएफ ग्रुप का विमान है। इनके अलावा निजी कंपनी के चॉपर बेल 412 से भी मोदी ने उड़ानें भरी हैं। बिहार और यूपी जैसे राज्योंु के लिए मोदी ने अगस्ता AW-139 चॉपर का इस्ते माल किया था।

विशेषज्ञों के मुताबिक एक इंजन के चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 70,000 से 75000 रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। दो इंजन वाले चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 1 से 1.2 लाख प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। वहीं जेट विमान के जरिए उड़ान भरने की कुल लागत करीब 3 लाख रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। नरेंद्र मोदी देशभर में अब तक तकरीबन 150 रैलियां कर चुके हैं। इस दौरान उन्हों ने 2.4 लाख किमी की यात्रा की है। यानी, रोज लगभग 1,100 किमी का सफर। हिसाब लगाइये की कम्पनियां कितना पैसा खर्च कर रही हैं।

अब देश की समझदार जनता विचार करे की मोदी के ऊपर इतना पैसा खर्च करने वाली कंपनियां मोदी के सत्ता में आते साथ ही किस तरह से अपनी रकम की कई गुना वसूली करने का जालिमाना तरीका अपनाएंगी![Anurag Ojha]

अप्रैल 23, 2014

अरविंद केजरीवाल : हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के शातिराना खेल का हिस्सा है मीडिया

Arvindbenaras15 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल बनारस पहुंचे भारत के चुनाव की सबसे बड़ी जंग में भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी को चुनौती देने के लिए| बनारस पहुँचते ही वे सड़क पर निकल पड़े और पहुँच गये एक ऐसे परिवार के घर जिनका एकमात्र कमाऊ सदस्य दुर्भाग्य से मेनहोल में घुसकर सीवर की सफाई करने के दौरान मृत्यु को प्राप्त हो गया था| शोकग्रस्त परिवार से मिलने के बाद उन्होंने एक संवाद कार्यक्रम में शिरकत की जहां लोगों ने उनसे विभिन्न तरह के सवाल पूछे| 

अगले दिन वे रोहिण्या, जो कि काशी देहात का क्षेत्र है, में पहुँच गये और गाँवों में रैलियां और सभाएं करते रहे और बीच में अपने रास्ते में अपने प्रशंसकों से रुक कर मिलते रहे| एजाज़ अशरफ कपारफोड़वा गाँव में अरविंद केजरीवाल के वाहन पर सवार हो गये और हर्सोस गाँव आने तक जहां एक और रैली थी, २०-२५ मिनट अरविंद केजरीवाल से सवाल पूछते रहे|

जब आप कुछ दिन पहले वाराणसी आए थे तो आप पर अंडे और स्याही फेंके गये थे| तब से आप पर कई बार हमले किये ज चुके हैं| आप पर इन हमलों का क्या असर पड़ा है? 

ये हमले वाराणसी में शुरू नहीं हुए|  कब शुरू हुए ये हमले? ये शुरू हुए जब मैंने मार्च की शुरुआत में गुजरात की यात्रा की| क्या यह केवल एक संयोग है या इससे अधिक कुछ है? मैं वास्तव में नहीं जानता| हम बहुत बड़े लोगों का विरोध कर रहे हैं और जाहिर सी बात है कि वे लोग चुप तो बैठेंगे नहीं| वे हम पर हमले करेंगे|

 इन हमलों ने व्यक्तिगत रूप से आप पर क्या प्रभाव डाले हैं|

ऐसे  हमलों से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ था क्योंकि ये तो अपेक्षित थे| मुझे ऐसा भी लगता है कि चुनाव होने तक ये हमले हल्के रहेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि मुझ पर घातक हमला करने से चुनाव में उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है|  पर चुनाव के बाद, मुझे लगता है वे मुझे छोड़ेंगे नहीं| वे लोग कुछ करेंगे| मोदी और अंबानी जैसे लोग … मुझे बताया गया है कि उधोगपतियों को धमकाया गया है, संपादकों को धमकाया गया है|  उन्हें कहा गया है कि मोदी सत्ता में आ रहे हैं और मोदी किसी को नहीं छोड़ते और वे बदला हमेशा लेते हैं| तो वे मुझसे भी बदला लेंगे…पर मैं तैयार हूँ किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए|

आपका परिवार कैसे लेता है इन सब बातों को?

वे नर्वस हैं| मैं उन्हें शांत करने की कोशिश करता हूँ| मुझे लगता है उनके पास अब कोई विकल्प भी नहीं है (हँसते हुए)

आप मार्च में भी वाराणसी आए थे| तब और अब के बीच आपके चुनाव प्रचार ने किसी प्रगति की है?

यह केवल मेरा चुनाव प्रचार नहीं है| यह तो जनता का चुनाव प्रचार है| यदि यह मेरा चुनाव प्रचार होता तो अलग बात होती और मैं आपके सवाल का जवाब दे सकता था| सांसद बन्ना मेरा लक्ष्य नहीं  है| मेरा लक्ष्य लोगों को जागरूक बनाना है| उन्हें बदलाव के लिए तैयार करना है| यदि वे इस बार जाग जाते हैं अच्छा है अन्यथा अगले चुनाव में सही| मेरी लड़ाई जारी रहेगी|

“आप” के उम्मीदवार पर नालंदा, बिहार में भी  हमला किया गया था|  कुछ उम्मीदवारों ने अपना नामांकन वापिस ले लिया| क्या ये दूसरों द्वारा डाले दबाव के कारण है…? T

दबाव एक कारण हो सकता है| कुछ उम्मीदवारों ने नामांकन वापिस लिए हैं क्योंकि हमारी पार्टी के पास उन्हें देने के लिए पैसे नहीं थे और उनके पाने पास भी पैसे नहीं थे| तो उन्होंने अपने नाम वापिस ले लिए यह कह कर कि किसी और उम्मीदवार को टिकट दे दिया जाए|  उन्होंने चुनाव से भले ही नाम वापिस ले लिए हों पर वे पार्टी के साथ खड़े हैं| दबाव भी एक कारण हो सकता है पर मेरे पास इस बात का कोई सुबूत नहीं है| नालंदा से हमारे उम्मीदवार पर किया हमला बताता है कि आज की राजनीति कितने एअमान्वीय हो चुकी है|

AK banaras1आप वाराणसी में मुस्लिम समुदाय से भी मिले हैं| आपको कैसी प्रतिक्रया मिली उनसे? 

स्पष्टत: मुस्लिम मोदी को हराना चाहते हैं| लेकिन हम इसे दूसरी तरह से देख रहे हैं| यदि इस बार ऐसा संभव हो कि हिंदू और मुसलमान मिल कर वोट दें बिना किसे प्रकार के ध्रुवीकरण का शिकार हुए हुए… आपको पता ही है कि मोदी की राजनीति ध्रुवीकरण वाली राजनीति है| क्या हम सभी संप्रदायों और जातियों के लोगों को एक साथ ला सकते हैं चुनाव लड़ने के लिए?  मुख्य प्रश्न यह है हमारे सामने| और यही हमारा ध्येय भी है|

मूलत: हमारी जंग तो सच्चाई और ईमानदारी के लिए है| ये तो सार्वभौमिक मूल्य हैं चाहे हिंदुत्व के एबात करें या इस्लाम की, या सिख धर्म की बात करें या जैन धर्म की| ये मूल्य हरेक धर्म में उपस्थित हैं| हमारी लड़ाई समाज में प्रेम और इंसानियत को कायम रखने की है|  उनकी राजनीति नफ़रत भरी है जबकि हम प्रेममयी राजनीति करना चाहते हैं|  उनकी राजनीति भ्रष्टाचार की पोषक भी है जबकि हम ईमानदारी की स्थापना राजनीति में करना चाहते हैं| यह अनिवार्य हो गया है कि सभी लोग एक साथ आएं और इस लक्ष्यपूर्ति में सहयोग दें|  I

तो एक तरह से वाराणसी उस राजनीतिक बदलाव की राजधानी बन सकता है जो आप और आपकी पार्टी दोनों देखना चाहते हैं?

ईश्वर ने वाराणसी और अमेठी के लोगों के हाथ में देश की राजनीति बदलने की कुंजी दे दी है| यदि लोग बाहर निकलते हैं और मोदी को वाराणसी में और राहुल गांधी को अमेठी में हरा देते हैं तो भारत की राजनीति में भूचाल आ जायेगा| कांग्रेस और भाजपा दोनों खत्म हो जायंगे| एक साल बाद फिर से चुनाव होगा और आप देखेंगे कि नये किस्म के लोग राजनीति में शामिल होंगे|

मुख्तार अंसारी ने चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली है| लोग इस बात को कई तरीकों से देख रहे हैं| (2009 में, मुख़्तार अंसारी, एक कथित माफिया, बसपा के टिकट पर वाराणसी से लड़ा था और भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से  करीब 17000 वोटों से हार गया था) )

मुख्तार अंसारी इस देश का एक नागरिक है और यह उसकी स्वतंत्रता है कि वह चुनाव लड़े या अपना नाम वापिस ले ले| यह उस पर निर्भर करता है| लेकिन हम उसके संपर्क में नहीं हैं|

क्या आपने एक बार भी वाराणसी से हार जाने के बारे में सोचा है? क्या आपको हार का भय नहीं है?

जीत हो या हार, मैं इन् बातों की चिंता नहीं करता|  जीत या हार कुछ भी मेरी नहीं होगी| यह लोगों की जीत या हार होगी| मेरा लक्ष्य लोगों को यह समझाना है| मेरे हाथ में सिर्फ कर्म करना है फल तो ईश्वर के हाथ में है|

क्या आपको लगता है कि मीडिया के साथ आपके संबंधों में सुधार आ रहा है?

निश्चित रूप से नहीं! यह फेज तो बहुत महत्वपूर्ण है उनके लिए|  बहुत बड़ी मात्रा में धन निवेश  किया गया है मीडिया में और मीडिया-मालिकों और संपादकों को धमकियां दी गई हैं| मैं कुछ ऐसे रिपोर्टर्स को जानता हूँ जिनके बीट को केवल इसलिए बदल दिया गया क्योंकि उन्होंने हमारे पक्ष में साधारण से ट्वीट कर दिए|

क्या “आप” ने Times Now का बहिष्कार किया हुआ है? “आप” के प्रतिनिधि उस चैनल पर दिखाई नहीं देते| 

 हाँ, हम लोग कुछ टीवी चैनल्स से दूरी बना कर चल रहे हैं| क्योंकि हमने देखा कि वे हमारे खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे थे और गलत तरीकों से भाजपा को प्रचारित करने के लिए हमें निशाना बना रहे थे|  

तो हमने निर्णय लिया कि ऐसे चैनल्स के साथ बातचीत का कोई फायदा नहीं है| क्योंकि जो भी हम बोलेंगे वे लोग उसे तोडमरोड कर ही प्रस्तुत करेंगे|  तो हमने तय किया कि वे जो चाहें वो दिखाएँ हमारे बारे में अगर उनको अपनी ही मर्जी से ही तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना है तो उनसे बात करके भी क्या लाभ होगा? हम लोग बहुत छोटे हैं वे बहुत बड़े हैं, बहुत शक्तिशाली हैं Times Now, India TV, India News, Dainik Jagran.

वाराणसी में आपका पहला पड़ाव एक दलित बस्ती में था और वहाँ का एक आदमी मेनहोल में सफाई करते हुए मारा गया था| पर टीवी आपकी काजी से मुलाकत को ही दिखाता रहा|

मीडिया पक्षपाती है| It यह भी हिंदू-मुस्लिम का ध्रुवीकरण काने वाले तंत्र का एक हिस्सा है| मीडिया स्वतंत्र नहीं है| सारे मीडिया के बारे में ऐसा नहीं कहूँगा| कुछ मीडिया अच्छा भी है| कुछ रिपोर्टर अच्छे हैं|  कुछ मीडिया के मालिक भ्रष्ट हो चुके हैं| पत्रकार मालिकों के दबाव के सम्मुख टिक नहीं पाते| उन्हें नौकरी की रक्षा करनी पड़ती है|

15 अप्रैल को वाराणसी के प्रभावशाली व्यापारियों के साथ आपकी भेंट हुयी| मैंने उनमें से कुछ के साथ बात की और मुझे लगा कि उनमें से बड़ी उम्र के लोग “आप” से भयभीत थे| 

वे “आप” से क्यों भयभीत हैं? भेंट में उन्होंने हमारी अर्थनीति के सन्दर्भ में कुछ शंकाएं व्यक्त कीं| मैंने उनके सभी शंकाओं का निवारण किया और मुझे लगा जी वे लोग बेहद प्रसन्न थे| |मैंने सुबूतों  के साथ उनसे स्पष्ट कहा और मैंने उन्हें अपने पुराने भाषण दिखाए कि मैं कोई अभी कहानियां नहीं बना रहा उनके सामने, बल्कि हमारी अर्थनीति में एक निरंतरता बनी रही है| उन्होंने इस बात को सराहा| मैंने उनसे कहा कि सबसे बड़ा सुबूत तों आँखों देखे अपने अनुभव का है|  मैंने उन्हें बताया कि दिल्ली में  49 दिनों की सरकार के दौरान मैंने दिल्ली के व्यापारियों और उधोगपतियों के साथ भेंट की और हमने कानूनों को आसान बनाने की चेष्टा की| वैट को आसान बनाया| हमने उधोगपतियों के लिए कुछ सार्थक करने की कोशिश की|   मैंने उन्हें बताया कि वे मेरे कहे पर न जाकर मेरे कहे की खुद ही जांच कर लें|  मुझे तों कहीं से नहीं लगा कि वे हमसे भयभीत थे|

(कार रुकती है, लोगों का झुण्ड उनसे बाहर निकलने के लिए अनुरोध करता है| लोग उन्हें माला पहनाते हैं और उनके समर्थन में नारे लगाते हैं| थोड़ी देर में वे वाहन में वापिस आ जाते हैं| मैं पूछता हूँ- कितना थकान भरा है यह सब संभालना?)

चुनाव प्रचार बेहद थकान वाला काम है| आपको पता है उनमें से एक ने मुझसे कहा कि एक आदमी के दो जगहों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए| उसने कहा कि उसे भी दो क्षेत्रों से वोट देने की सुविधा मिलनी चाहिए क्योंकि नेता तों दो जगह से चुनाव लड़ लेते हैं|   गाँव वालों के पास बहुत विचार हैं|

मुझे यह भी बताया गया कि व्यापारियों के समूह में युवावर्ग “आप” के प्रति ज्यादा उत्सुक और खुला हुआ था|

हाँ मुझे भी ऐसा महसूस हुआ|लेकिन वास्तव में किसी व्यापारी को “आप” से डरने की जरुरत नहीं  है|

आपको भारत  की संसदीय प्रतिनिधि  प्रणाली में क्या कमियां लगती हैं?

हमारे लोकतंत्र में कुछ समस्याएं हैं| जैसे लोकसभा सीट के क्षेत्र बहुत बड़े बड़े हैं और एक प्रतिनिधि लगभग 20-25 लाख लोगों का अप्रतिनिधित्व करता है| बड़े लोकसभा क्षेत्रों को बांटने की जरुरत है|  और सांसद और विधायकों के पास वास्तव में कोई शक्ति नही हैं जबकि लोगों की उनसे अपेक्षायें बहुत होती हैं|  शक्तियां ब्यूरोक्रेट्स को दी गई हैं जो कि जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं| उन्हें मुख्या धारा में लाये जाने की जरुरत है| (गवर्नेंस तंत्र विकसित करने की जरुरत है)

आपकी पंजाब यात्रा कैसी थी?

बहुत अच्छी, देवीय, बहुत ही अच्छी| मुझे इतने बढ़िया रेस्पोंस की अपेक्षा नहीं थी| मैंने इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सड़कों पर आते हुए नहीं देखा|  हमें पंजाब में अच्छा प्रदर्शन करना चाहिए|

AK nominationतो लोकसभा चुनाव में कितनी सीटें “आप” को मिल जायेंगीं?

(हँसते हुए) आपको सच बताऊँ तो मुझे इन सब बातों की चिंता नहीं है, कभी नहीं रही| मेरा मानना रहा है कि – कर्म करते रहो ईश्वर अपने आप फल देगा|

“आप” की क्या भूमिका संसद में रहेगी?

(हँसते हुए) अगर हमें बहुमत मिलता है तो हम सरकार चलायेंगे…

अरे बहुमत नहीं…

अन्यथा विपक्ष में बैठेंगे|

किसी के साथ गठबंधन नहीं?

नहीं!

वाराणसी में 12 मई को चुनाव के बाद आपकी क्या योजना है?

मैं जयपुर जाउंगा विपस्सना करने| मतगणना वाले दिन भी मैं ध्यान में रहूंगा| मैं वहाँ  20 मई तक रहूंगा|

अगर “आप” चौंकाने वाले परिणाम लेकर आती है और आपकी जरुरत हो सरकार बनाने की प्रक्रिया में?

और लोग निर्णय लेंगें| पार्टी सिर्फ अरविंद केजरीवाल तों है नहीं|

क्या आप हरियाणा और बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?

हम लोग लोकसभा चुनाव के नाद तैयारी शुरू कर देंगे|

आपको फंड कहाँ से मिलेगा?

जनता  के पास से फंड आएगा| यह उनका चुनाव है| 

By Ajaz Ashraf
मूल साक्षात्कार अंग्रेजी में – Arvind Kejriwal interview

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