Posts tagged ‘Kuan’

जून 4, 2014

आखिरी ख़त

बहुत देर से शब्द मिल नहीं रहे हैं…tum-001

खाली कुएं से तो अपनी ही आवाज़ लौटेगी न

अब किसको आवाज़ दूं?

किसको पुकारूं??

दिल का खला भरा नहीं अब तक

तेरे इंतज़ार में आँखें पत्थर हो गयीं

आवाज़ भी अपनी ग़ुम गयी जैसे

दिल के कुएं से टकरा के वापस जो नहीं आई…

सोचता हूँ कि आखिरी ख़त भी लिख रखूं

तुम इस का जवाब मत देना

मैं मुन्तजिर न रहूँगा

ये सिलसिला-ऐ-तबादला-ऐ- ख्याल रुक जाये अब

बेवज़ह गर्म ख्यालों का जवां रहना ठीक तो  नहीं

ये सिलसिला सौ नए अरमानो का वायस बनता है

ये नहीं टूटेगा तो लाजिमी दिल टूट जायेंगे

बंद करना ही होगा हर रास्ता

हर झरोखे के मुंह पे पत्थर रखना ही होगा

मुलाकात की हर वज़ह मिटानी ही  होगी

मिटाने होंगे

इस किराये के मकां के पते के निशां

कल से मैं तुम्हे नहीं मिलूँगा यहाँ…

Rajnish sign

नवम्बर 19, 2013

मेरे दिल में कितनी गहरी खाई खोद गईं तुम!

मेरे तुम्हारे बीच के फासलों पेmansnow-001
बर्फ की एक चादर बिछी है!
दूरियां पहले भी इतनी ही थीं
लम्बी अब महसूस होती हैं
बीच के ठंडेपन से शायद!
हमारे मध्य
बर्फीले द्वीप तो पहले भी थे,
पर तब मेरे तुम्हारे मध्य की दूरी
पिघल जाती थी
मेरी तुम्हारी गर्म साँसों से
तुम्हारे दिल में उठते
नीम गर्म अहसासों से
मौन कविताएं समेटे,
सतरंगी सपनों की चादर ताने|
बसंत जैसे फूल उठता था चारों ओर
बसंत!
ओह…बसंत…,
याद नहीं कब था पिछली बार
इस पतझड़ से पहले का बसंत
बहुत चाहा कि तेरी बातों से
बहला लूँ खुद को
खींच लूँ साए तेरी यादों के खुद पे…
लेकिन…
कमबख्त अब तो वो भी मुकरने लगे हैं
जैसे अब तुम
सपनो में भी आने से
कतराने लगी हो…
पास आकर फिसल जाने लगी हो…
कुछ होता नहीं फिर भी कुछ तो होता है
जिसके न होने का अहसास रहा करता है
जैसे कुछ था जो नहीं है अब
चारों तरफ से सब कुछ
बस उस खालीपन
की तरफ बह रहा है
भरने को इसे
मगर…
कितने गहरे से निकल कर गयी हो तुम?
(रजनीश)
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