Posts tagged ‘Ganga’

जुलाई 21, 2017

माँ – अनोखे रूप

काशी दशाश्वमेघ घाट पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं, उन्ही में से एक छोटा- सा मंदिर गंगा में अधडूबा सा है, नौका-विहार करते समय एक मल्लाह  ने मुझे उस भग्न अध डूबे मंदिर की कहानी सुनाई|

एक बुड्ढी विधवा थी, उसका एक बेटा था| बुढ़िया ने मेहनत मजदूरी करके बेटे को पढ़ाया-लिखाया| बेटा बुद्धिमान था, पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया|वह अपनी माँ के दिन भूला नहीं , गंगा-तट पर उसने मंदिर बनवाया|

मंदिर बन गया तो माँ से बोला – माँ तूने मेरे लिए इतना किया| मैंने तेरे लिए मंदिर बनवा दिया है, अब तू इधर-उधर मत जा| इसी मंदिर में भगवान की पूजा कर| तूने मेरे लिए इतना किया मैंने भी मंदिर बनवा कर तेरे ऋण से मुक्त हो गया|

कहते हैं कि जैसे ही बेटे ने कहा- मैं तेरे ऋण से मुक्त हो गया वैसे ही मंदिर टूटकर गंगा जी में डूब गया|

मल्लाह ने मुझे बताया – वह यही मंदिर है|

* * * * * * * * * * * * * * * * * * *

मेरे स्वर्गीय मित्र डॉ. बिंदु माधव मिश्र की वृद्धा माता बीमार थीं| ९० से ज्यादा की उम्र थी| लोग उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित थे| घर भर सेवा में लगा था|

मैं भी उन्हें देखने गया, चरण स्पर्श किया, बोलीं – सोचती हूँ इतने जाड़े में मरी तो बच्चों को बड़ी तकलीफ होगी, किरिया कर्म, सर मुंडाना, सर्दी लग जायेगी|

(विश्वनाथ त्रिपाठी)

साभार: कथादेश, जून २०१७

Advertisements
फ़रवरी 22, 2017

समर शेष है … रामधारी सिंह दिनकर

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

मई 16, 2016

स्वच्छता … ( महात्मा गांधी )

gandhi2“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन/दिमाग का वास हो सकता है”|

कोई भी ऐसा व्यक्ति जो लापरवाही से इधर उधर थूक कर, कूड़ा करकट फेंककर या अन्य तरीकों से जमीन को गंदा करता है, वह इंसान और प्रकृति के विरुद्ध पाप करता है| दुर्भाग्य से हम सामाजिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता की महत्ता को नहीं समझते|

हम अपने कुओं, पोखरों और नदियों की शुद्धता का बिल्कुल भी सम्मान नहीं करते और उनके किनारे ही गंदे नहीं करते वरन अपने शरीर की गंदगी से इन प्राकृतिक वरदानों के जल को भी गंदा करते हैं| भारतीयों की इस बेहद शर्मनाक कमी से ही हमारे गाँवों में असम्मानजनक स्थितियां बनी रहती हैं और इसी कारण पवित्र नदियों के पवित्र किनारे गंदे दिखाई देते हैं और इस कारण उत्पन्न अस्वच्छता से विभिन्न बीमारियाँ भारतीयों को अपना शिकार बनाए रखती है|

“देश के अपने भ्रमण के दौरान मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ गंदगी को देखकर हुई…इस संबंध में अपने आप से समझौता करना मेरी मजबूरी है।’

‘इस तरह की संकट की स्थिति में तो यात्री परिवहन को बंद कर देना चाहिए लेकिन जिस तरह की गंदगी और स्थिति रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बों में है उसे जारी नहीं रहने दिया जा सकता क्योंकि वह हमारे स्वास्थ्य और नैतिकता को प्रभावित करती है। निश्चित तौर पर तीसरी श्रेणी के यात्री को जीवन की बुनियादी जरूरतें हासिल करने का अधिकार तो है ही। तीसरे दर्जे के यात्री की उपेक्षा कर हम लाखों लोगों को व्यवस्था, स्वच्छता, शालीन जीवन की शिक्षा देने, सादगी और स्वच्छता की आदतें विकसित करने का बेहतरीन मौका गवां रहे हैं।’

‘मैं पवित्र तीर्थ स्थान डाकोर गया था। वहां की पवित्रता की कोई सीमा नहीं है। मैं स्वयं को वैष्णव भक्त मानता हूं, इसलिए मैं डाकोर जी की स्थिति की विशेष रूप से आलोचना कर सकता हूं। उस स्थान पर गंदगी की ऐसी स्थिति है कि स्वच्छ वातावरण में रहने वाला कोई व्यक्ति वहां 24 घंटे तक भी नहीं ठहर सकता। तीर्थ यात्रियों ने वहां के टैंकरों और गलियों को प्रदूषित कर दिया है।’

‘हमें पश्चिम में नगरपालिकाओं द्वारा की जाने वाली सफाई व्यवस्था से सीख लेनी चाहिए…पश्चिमी देशों ने कोरपोरेट स्वच्छता और सफाई विज्ञान किस तरह विकसित किया है उससे हमें काफी कुछ सीखना चाहिए… पीने के पानी के स्रोतों की उपेक्षा जैसे अपराध को रोकना होगा…’

‘लोक सेवक संघ के कार्यकर्ता को गांव की स्वच्छता और सफाई के बारे में जागरूक करना चाहिए और गांव में फैलने वाली बिमारियों को रोकने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए’

Ganga‘वह (कांग्रेसी कार्यकर्ता) गांव के धर्मगुरु या नेता के रूप में लोगों के सामने न आएं बल्कि अपने हाथ में झाड़ू लेकर आएं। गंदगी, गरीबी निठल्लापन जैसी बुराइयों का सामना करना होगा और उससे झाड़ू कुनैन की गोली और अरंडी के तेल साथ लड़ना होगा…’

‘गांव में रहने वाले प्रत्येक बच्चे, पुरुष या स्त्री की प्राथमिक शिक्षा के लिए, घर-घर में चरखा पहुंचाने के लिए, संगठित रूप से सफाई और स्वच्छता के लिए पंचायत जिम्मेदार होनी चाहिए”

‘बच्चों के लिए स्वच्छता और सफाई के नियमों के ज्ञान के साथ ही उनका पालन करना भी प्रशिक्षण का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए,… ”

 

 

 

जनवरी 7, 2015

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं…

पुरखों की कसम खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

आर्य, शक, हूण, मंगोल, मुगल, अंग्रेज,

द्रविड़, आदिवासी, गिरिजन, सुर-असुर

जाने किस-किस का रक्त

प्रवाहित हो रहा है हमारी शिराओं में

उसी मिश्रित रक्त से संचरित है हमारी काया

हाँ हम सब वर्णसंकर हैं।

पंच तत्वों को साक्षी मानकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र, कावेरी से लेकर

वोल्गा, नील, दजला, फरात और थेम्स तक

असंख्य नदियों का पानी हिलोरें मारता है हमारी कोशिकाओं में

उन्हीं से बने हैं हम कर्मठ, सतत् संघर्षशील

सत्यनिष्ठा की शपथ लेकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

जाने कितनी संस्कृतियों को हमने आत्मसात किया है

कितनी सभ्यताओं ने हमारे ह्रदय को सींचा है

हज़ारों वर्षों की लंबी यात्रा में

जाने कितनों ने छिड़के हैं बीज हमारी देह में

हमें बनाए रखा है निरंतर उर्वरा

इस देश की थाती सिर-माथे रखते हुए कहता हूँ

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

बुद्ध, महावीर, चार्वाक, आर्यभट्ट, कालिदास

कबीर, ग़ालिब, मार्क्स, गाँधी, अंबेडकर

हम सबके मानस-पुत्र हैं

तुम सबसे अधिक स्वस्थ एवं पवित्र हैं

इस देश की आत्मा की सौगंध खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

हम एक बाप की संतान नहीं

हममें शुद्ध रक्त नहीं मिलेगा

हमारे नाक-नक्श, कद-काठी, बात-बोली,

रहन-सहन, खान-पान, गान-ज्ञान

सबके सब गवाही देंगे

हमारा डीएन परीक्षण करवाकर देख लो

गुणसूत्रों में मिलेंगे अकाट्य प्रमाण

रख दोगे तुम कुतर्कों के धनुष-बाण

मैं एतद् द्वारा घोषणा करता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

हम जन्मे हैं कई बार कई कोख से

हमें नहीं पता हम किसकी संतान हैं

इतना जानते हैं पर

जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं

हम उस राम के वंशज नहीं

माफ़ करना रामभक्तों

हम रामज़ादे नहीं!

हे शुद्ध रक्तवादियों,

हे पवित्र संस्कृतिवादियों

हे ज्ञानियों-अज्ञानियों

हे साधु-साध्वियों

सुनो, सुनो, सुनो!

हर आम ओ ख़ास सुनो!

नर, मुनि, देवी, देवता

सब सुनो!

हम अनंत प्रसवों से गुज़रे

इस महादेश की जारज़ औलाद हैं

इसलिए डंके की चोट पर कहता हूँ

हम सब हरामज़ादे हैं।

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं।

(मुकेश कुमार , मीडियाकर्मी)

जुलाई 6, 2014

गंगा आए कहाँ से…गंगा बचे कैसे?

Ganga pollutedगंगा समग्र यात्रा के दौरान कानपुर में उमा भारती ने कहा था कि उनकी पार्टी की सरकार बनने पर दो काम उनकी प्राथमिकता में होंगे। एक यह कि कानपुर के गंगा-जल को आचमन के योग्य बनाएंगे। और दूसरा, गौ हत्या पर काफी सख्त कानून बनाया जाएगा। लेकिन यहां हम बात केवल गंगा की कर रहे हैं। गंगा को लेकर बड़े-बड़े वादे करने वाले अब सत्ता में हैं।

कानपुर से ही बात शुरू करते हैं। इन पंक्तियों के लेखक का दावा है कि कानपुर में गंगा-जल है ही नहीं। तो फिर आचमन-योग्य किस चीज को बनाया जाएगा? कानपुर गंगा पथ का ऐसा अभागा शहर है जहां नाव पतवार से नहीं, बांस से चलती है। यहां की गंगा में तो टीबी अस्पताल के नाले जैसे कई नालों की गाद और टिनरीज का लाल-काला पानी है, जिसमें बांस गड़ा-गड़ा कर नाव को आगे बढ़ाया जाता है। हरिद्वार में आधे से ज्यादा गंगा-जल दिल्ली को पीने के लिए हर की पैड़ी में डाल दिया जाता है। इसके बाद बिजनौर में मध्य गंगा नहर से भारी मात्रा में पानी सिंचाई के लिए ले लिया जाता है। बचा-खुचा पानी नरौरा लोअर गंग नहर में डाल कर उत्तर प्रदेश के हरित प्रदेश में पहुंचा दिया जाता है।

वास्तव में गंगा नरौरा में आकर ही खत्म हो जाती है। अदालत की लगातार फटकार और लोगों के दबाव में नरौरा के बाद बहुत थोड़ा-सा पानी आगे बढ़ता है। नरौरा, जहां नहर नदी की तरह दिखाई देती है और नदी नहर की तरह। नाममात्र के इस गंगा-जल को कानपुर पहुंचने से ठीक पहले बैराज बना कर शहर को पानी पिलाने के लिए रोक लिया जाता है। चूंकि शहर में पानी की किल्लत रहती है इसलिए यहां से एक बूंद पानी भी आगे नहीं बढ़ पाता। इसके बाद इलाहाबाद के संगम में और बनारस की आस्था के स्नान में गंगा-जल को छोड़ कर सबकुछ होता है। वास्तव में आस्थावान लोग जिसमें गंगा समझ कर डुबकी लगाते हैं वह मध्यप्रदेश की नदियों- चंबल और बेतवा- का पानी होता है, जो यमुना में मिलकर गंगा को आगे बढ़ता है। तो अगर नई सरकार का मन कानपुर में आचमन करने का है तो गंगा को वहां पहुंचाना होगा और उसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की जरूरत है।

नई सरकार आने के बाद से गंगा को लेकर नदी विकास की बातें प्रमुखता से कही गई हैं। तट विकसित होंगे, पार्किंग बनेंगी, घाट बनेंगे, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लाइट ऐंड साउंड कार्यक्रम होगा, परिवहन होगा, गाद हटाई जाएगी, मछली पालन भी होगा। लेकिन इस सब में मूल तत्त्व गायब है, गंगा में पानी कहां से आएगा इस पर कोई बात नहीं हो रही। जहाजरानी मंत्रालय की ओर से ग्यारह बैराज बनाने का विचार सामने आया है। इसकी सार्थकता पर सरकार के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। तो फिर किया क्या जाए?

पहले कदम के रूप में निजी और उद्योगों के नालों को बंद करने का कदम उठाना चाहिए, ये नाले सरकारी नालों की अपेक्षा काफी छोटे होते हैं लेकिन पूरे गंगा पथ पर इनकी संख्या हजारों में है। रही बात बड़े और सरकारी नालों की, तो उन्हें बंद करने का वादा नहीं नीयत होनी चाहिए। वास्तव में उत्तरकाशी, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस और गाजीपुर जैसे शहरों की सीवेज व्यवस्था ही ऐसे डिजाइन की गई है, जिसमें गंगा मुख्य सीवेज लाइन का काम करती है। अब इन शहरों में पूरी सीवेज व्यवस्था को नए सिरे से खड़ा करना होगा ताकि गंगा इससे अछूती रहे। नए सीवेज सिस्टम के लिए बनारस भविष्य में एक मॉडल का काम कर सकता है।

वाराणसी को तीन पाइपलाइन मिलनी थी, पीने के पानी के अलावा वर्षाजल निकासी और सीवेज की पाइपलाइन डाली जानी थी। शहर खोदा गया, सीवेज के पाइप डाले गए, लेकिन सीवेज संयंत्र के लिए जरूरी जमीन का अधिग्रहण नहीं हो सका।

वाराणसी में हर रोज पैदा होने वाले चालीस करोड़ लीटर एमएलडी सीवेज में से मात्र सौ एमएलडी साफ हो पाता है, बाकी सारा गंगा को भेंट हो जाता है। सरकार के लिए वाराणसी की गलियों की ऐतिहासिकता बचा कर रखते हुए इस काम को कर पाना बड़ी चुनौती है।

दूसरा बेहद जरूरी कदम यह है कि कानपुर के चमड़ा-कारखानों को तुरंत वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने भी कई बार इन कारखानों को हटाने का आदेश दिया है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के चलते यह अब तक संभव नहीं हो सका। अकेले उत्तर प्रदेश में 442 बड़े और मंझोले चमड़ा कारखाने हैं। जब सरकार चीन को बिजनेस पार्क के लिए जगह दे सकती है तो इन कारखानों को क्यों नहीं?

तीसरा कदम है रिवर पुलिसिंग का। हर दो किलोमीटर पर एक गंगा चौकी हो, जहां जल-पुलिस की तैनाती हो, जिसमें स्थानीय मछुआरों को रोजगार दिया जाए। रिवर पुलिस लोगों को गंगा में कचरा डालने से रोकेगी। अर्थदंड लगाने जैसे अधिकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा देंगे, इसलिए रिवर पुलिस की भूमिका जागरूकता फैलाने और स्थानीय प्रशासन के बीच सेतु बनाने की होनी चाहिए।

गंगा संरक्षण की दिशा में चौथा उपाय मोटर से चलने वाली छोटी नाव पर रोक के रूप में होना चाहिए। रोजगार के नाम पर लाखों की संख्या में डीजल आधारित मोटरबोट गंगा में चलती हैं। नावों में लगाई जाने वाली ये सेकेंडहैंड मोटरें बड़ी संख्या में बांग्लादेश से तस्करी कर लाई जाती हैं। अत्यधिक पुरानी होने के चलते इनसे काला धुआं और तेल की परत निकलती है, जिसमें मछलियां और उनके अंडे जीवित नहीं रह पाते। इन नावों में डीजल की जगह केरोसिन का उपयोग होता है। एक तर्क यह दिया जाता है कि जब छोटे जहाज और स्टीमर गंगा में चल सकते हैं तो इन गरीबों की नाव रोकने की क्या तुक है। पर गंगा में स्टीमर और फेरी मुख्यत: बिहार और बंगाल में ही चलते हैं जहां गंगा में पानी की समस्या नहीं है। बनारस तक के क्षेत्र में, जहां गंगा अस्तित्व के लिए ही जूझ रही है, वहां यह बंद होना चाहिए। वहां गैस से चलने वाले स्टीमर की इजाजत दी जा सकती है।

पांचवां और बेहद महत्त्वपूर्ण विषय है आस्था को ठेस पहुंचाए बिना पूजन सामग्री के निपटान का। गंगा पथ पर बसे घरों की समस्या यह है कि वे पूजा के फूलों और पूजन सामग्री का क्या करें। मजबूरी में लोग उसे नदी में डालते हैं, क्योंकि कहीं और फेंकने से आस्था को ठेस पहुंचती है। एक उपाय यह है कि हर रोज नगर निगम इस पूजन सामग्री को लोगों के घरों से इकट्ठा करें। इस काम के लिए कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों का उपयोग न किया जाए। इस इकट्ठा की गई पूजन सामग्री का उपयोग खाद बनाने में हो सकता है। मूर्ति विसर्जन पर पूर्णत: रोक छठा कदम है, जिसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए। सातवां निर्णय तुरंत लागू किया जा सकता है, कि मौजूदा सीवेज शोधन संयंत्र अपनी पूर्ण क्षमता से काम करें। अभी तो आधे से भी कम संयंत्र चालू हालत में हैं, ये भी अपने दावे के अनुरूप नहीं चलते। सिर्फ उत्तर प्रदेश में पैंतालीस बड़े नाले गंगा में गिरते हैं, छोटे नालों की तो गिनती ही नहीं है। अकेले बनारस में तीस छोटे-बड़े नाले गंगा में मिलते हैं। बिजली की भारी कमी के चलते भी सीवेज प्लांट नहीं चलते।

यह हालत खासकर उत्तर प्रदेश में है जहां इन संयंत्रों का चालू रहना बेहद जरूरी है। साथ ही यह पक्का किया जाए कि भविष्य में कोई नया प्लांट नहीं लगाया जाएगा। हमारे देश की स्थिति लंदन से अलग है। हमारे यहां सीवेज जमीन के भीतर नहीं इकट्ठा होता जिसे शोधित कर उपयोग में लाया जा सके। हमारे यहां तो बहते हुए नालों को ही सीवेज ट्रीटमेंट सेंटर बनाने की जरूरत है और उस शोधित पानी को भी गंगा में या सिंचाई में उपयोग में न लाया जाए। एक बानगी देखिए। वाराणसी के पास सारनाथ से सटे कोटवा गांव में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया। पहले पहल शहर के गंदे नाले का पानी खेतों में डाला गया तो लगा दूसरी हरित क्रांति हो गई। फसल चार से दस गुना तक बढ़ी।

मगर अब स्थानीय लोग खुद इन खेतों की सब्जियों को हाथ नहीं लगाते, क्योंकि वे देखने में तो चटक हरी, बड़ी और सुंदर होती हैं मगर उनमें कोई स्वाद नहीं होता, और कुछ ही घंटों में कीड़े पड़ जाते हैं। यही हाल अनाज का भी है, सुबह की रोटी शाम को खाइए तो बदबू आएगी। कई सालों तक उपयोग करने के बाद बीएचयू के एक अध्ययन में यह सामने आया कि शोधित पानी सोने की शक्ल में जहर है। इन साग-सब्जियों में कैडमियम, निकिल, क्रोमियम जैसी भारी धातुएं पाई जाती हैं।

लोकलुभावन घोषणाओं और गंभीर पहल के बीच का फर्क समझते हुए उमा भारती को अगले कदम के रूप में हरिद्वार और ऋषिकेश के आश्रमों को नोटिस देना चाहिए कि वे एक समय-सीमा के भीतर अपने सीवेज का वैकल्पिक इंतजाम कर लें। इनके भक्तों पर गंगा को निर्मल बनाने और निर्मल रखने की इनकी अपील का असर तब पड़ेगा, जब ये खुद इस पर अमल करेंगे। अब तक तो गंगा आंदोलन में शामिल सभी आश्रमों के मुंह से निर्मल गंगा की बात ऐसे ही लगती है जैसे हम पेड़ काटते हैं, उसका कागज बनाते हैं और फिर उस पर लिखते हैं ‘वृक्ष बचाओ’।

अविरल गंगा के रास्ते की बाधा हटाने का नौवां कदम होना चाहिए हर बैराज के ठीक पहले डिसिल्टिंग का। गंगा पर बने हर बैराज के पहले कई किलोमीटर तक भारी गाद जमा हो गई है; फरक्का बैराज के पहले जमा गाद ने गंगा की सहायक नदियों पर भी काफी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। साथ ही गंगा में रेत खनन पर जारी रोक को तुरंत हटाना चाहिए। रेत खनन न होने से कई जगह नदी का स्तर उठ गया है, जो आने वाले मानसून में बाढ़ का सबब हो सकता है। रेत खनन विशेषज्ञ की देखरेख में किया जाए, क्योंकि गाद हटाने के नाम पर रेत माफिया कब से गंगा पर नजर गड़ाए हुए हैं। वास्तव में यह रेत खनन नहीं रेत चुगान होना चाहिए। बालू के क्षेत्र को नियंत्रित किया जाना जरूरी है।

दसवां और सबसे महत्त्वपूर्ण काम। गंगा में गंदगी डालने को कार्बन क्रेडिट जैसा मामला नहीं बनाना चाहिए। किसी भी उद्योग पर गंदगी डालने पर जुर्माना न लगाया जाए, हर हाल में यह पक्का करना चाहिए कि गंदगी न डाली जाए, जुर्माने वाली व्यवस्था से सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। कई बड़े उद्योगों का गणित यह है कि जुर्माना देना सरल है, वैकल्पिक व्यवस्था करना महंगा है। इसलिए वे जुर्माने को मलबा निपटान की अपनी लागत में जोड़ कर चलते हैं।

एक प्यारी छोटी-सी मछली होती है हिल्सा। फरक्का बनने से पहले वह गंगा में ही पाई जाती थी। खारे पानी की यह मछली अंडे देने मीठे पानी में उत्तराखंड तक आती थी। कानपुर का जल आचमन के लायक हुआ या नहीं, इस पर वैज्ञानिक बहस करते रहेंगे। पर जिस दिन कानपुर में हिल्सा नजर आई, समझें वह नई मंत्री का इस्तकबाल करने आई है। क्या नए शासन में इतनी इच्छाशक्ति है?

अभय मिश्र

साभार : जनसत्ता

 

अप्रैल 28, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नरेंद्र मोदी @ वाराणसी में नामांकन

Neetish@Modi

भीड़ दोनों तरफ है फर्क बस इतना है

एक तरफ आई हुई है

दूसरी तरफ लाई हुई है

हवा दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ बनी हुई है

दूसरी तरफ पैसे के दम पर बनाई हुई है

जीत का विश्वास दोनों तरफ है

फर्क बस इतना है

एक तरफ आम लोगो के दम पर है

दूसरी तरफ अंबानी अडानी के दम पर है

चर्चा दोनों तरफ की है

फर्क बस इतना है

एक तरफ की चर्चा आम जनता में है

दूसरी तरफ मीडिया ने बनाई हुई है

AKvsModi@Benaras

लगता है कि बनारस में कारपोरेट मीडिया/भाजपा समर्थित कथित ‘सुनामी’ के सबसे पहले शिकार ख़ुद पत्रकार हो गए हैं और यह ‘सुनामी’ उन्हें पूरी तरह बहा ले गई है.

सबूत चाहिए तो कल टीवी पर और आज के अखबारों में बनारस में नमो के नामांकन की रिपोर्टिंग पढिए. जिस श्रद्धा और भक्ति से रिपोर्टिंग की गई है, उसमें सबसे पहले तथ्यों को अनदेखा किया गया है|

उदाहरण के लिए टाइम्स आफ इंडिया और इकनामिक टाइम्स की रिपोर्टों में तथ्यों में फ़र्क़ है| उनकी तुलना बाक़ी अख़बारों की रिपोर्टों से करें तो उन सबके बीच तथ्यों का फ़र्क़ साफ़ दिखने लगता है.

कुछ साल मैंने भी बनारस में गुज़ारे हैं. कुछ सवाल सिर्फ तथ्यों के बारे में. पहली बात यह है कि अगर मलदहिया से मिंट हाउस,नदेसर की दूरी गूगल मैप के मुताबिक़ १.७ किमी है, उसे २ किमी भी मान लिया जाए और उसे पूरी तरह लोगों से भरा हुआ भी मान लिया जाए तो उसमें ४० हज़ार से ज़्यादा लोग नहीं होंगे. वह लाखों और कुछ अख़बारों/चैनलों में ३ लाख तक कैसे पहुँच गई? थोड़ा सा गणित का इस्तेमाल कीजिए,आपको वहाँ पहुँची भीड का अंदाज़ा लग जाएगा|

susheel modi tweetयह ज़रूर ‘सुनामी’ का ही असर है! श्रद्धा में बह रहे मीडिया में तथ्य बह जाएँ तो किमाश्चर्यम?

एक आदमी को खड़े होने के लिए एक हाथ लम्बी और एक हाथ चौड़ी जगह तो चाहिए ही. मतलब 18 इंच गुने 18 इंच. यानी लगभग 50 cm x 50 cm. यानि कि 1 sq meter में अधिकतम ४ आदमी

वाहन के आस पास के 200 meter में 1 sq meter में ४ आदमी घनत्व, उसके पिछले 300 meter में 1 sq meter में केवल 2 आदमी का घनत्व तथा बाकी 1500 meter में 2 sq meter में 3 आदमी के घनत्व के हिसाब से मलदहिया से कचहरी के बीच की सड़क को 60 फीट (यानि 18 meter) चौड़ी मानते हुए ये संख्या होगी [(200x18x4)+(300x18x2)+(1500x18x2/3)] यानी कुल 14400+10800+18000 = 43200

अगर ये मान भी लिया जाए कि 7-8 हजार लोग लंका, काशी विद्यापीठ और मलदहिया और बीच के रास्ते में ही रह गये और जुलूस में शामिल नहीं हुए तो जुलूस की पूरी संख्या 50 हजार कही जा सकती है

अब अगर इसमें से बनारस की अन्य लोकसभा क्षेत्रों, पूर्वांचल के अन्य लोकसभा क्षेत्रों और बिहार से आये हुए लोगों की संख्या (जैसा सुशील मोदी का दावा है) को, यानि की कुल 25 लोकसभा क्षेत्रों के लिए @ 1000 के हिसाब से तथा गुजरात और अन्य राज्यों से आकर बनारस में कैम्प कर रहे 5 हजार लोग यानी कुल बाहरी संख्या को 30 हजार भी मानकर घटा दिया जाए तो यह तथाकथित सुनामी बनारस संसदीय क्षेत्र से केवल 20 हजार लोगों को ही बटोर पाई.” [Anand Pradhan]

…..

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी रोज चार से छह रैलियां करते हैं। वह देश के कोने-कोने जाकर प्रचार कर रहे हैं। लेकिन, रात अपने बंगले में ही बिताते हैं। (यह भी एक रहस्य की बात है!) उन्हे उड़ाने के लिए तीन जहाजों का बेड़ा हमेशा तैनात रहता है। इनमें एक जेट प्लेन और दो चॉपर शामिल हैं। ये विमान अदाणी ग्रुप और डीएलएफ जैसी कंपनियों के हैं।

मोदी को उड़ाने के लिए अहमदाबाद एयरपोर्ट पर हर सुबह एक एंब्रेयर एयरक्राफ्ट EMB-135BJ तैयार रहता है। यह जेट विमान करनावती एविएशन का है, जो अदाणी ग्रुप की ही एक कंपनी है। मोदी के हवाई बेड़े में अगस्ता AW-139 चॉपर भी शामिल है। यह डीएलएफ ग्रुप का विमान है। इनके अलावा निजी कंपनी के चॉपर बेल 412 से भी मोदी ने उड़ानें भरी हैं। बिहार और यूपी जैसे राज्योंु के लिए मोदी ने अगस्ता AW-139 चॉपर का इस्ते माल किया था।

विशेषज्ञों के मुताबिक एक इंजन के चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 70,000 से 75000 रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। दो इंजन वाले चॉपर विमान से उड़ान भरने की कुल लागत 1 से 1.2 लाख प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। वहीं जेट विमान के जरिए उड़ान भरने की कुल लागत करीब 3 लाख रुपए प्रति घंटे के हिसाब से बैठती है। नरेंद्र मोदी देशभर में अब तक तकरीबन 150 रैलियां कर चुके हैं। इस दौरान उन्हों ने 2.4 लाख किमी की यात्रा की है। यानी, रोज लगभग 1,100 किमी का सफर। हिसाब लगाइये की कम्पनियां कितना पैसा खर्च कर रही हैं।

अब देश की समझदार जनता विचार करे की मोदी के ऊपर इतना पैसा खर्च करने वाली कंपनियां मोदी के सत्ता में आते साथ ही किस तरह से अपनी रकम की कई गुना वसूली करने का जालिमाना तरीका अपनाएंगी![Anurag Ojha]

अप्रैल 1, 2014

गंगा और महादेव… (राही मासूम रज़ा)

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं

और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके

कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ

मेरा भी एक संदेश है।

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है

मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको

और उस योगी से कह दो- महादेव

अब इस गंगा को वापस ले लो

यह जलील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया

लहू बनकर दौड़ रही है।

[राही मासूम रज़ा]

मार्च 25, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नरेंद्र मोदी @ वाराणसी : क्यों?

aktrain25 मार्च को बनारस में सुबह एक अलग ही किस्म की होगी…
इतनी उत्सुकता, बनारस की गलियों, इसके मोहल्लों, इसके कूचों, और इसके बाशिंदों ने अरसे से न महसूस की होगी जैसी 25 मार्च की सुबह लेकर आयेगी|

रहे होते आज बिस्मिल्लाह खान साब तो किसी और ही अंदाज में गंगा तट पर शहनाई बजाते आज की सुबह|
बनारस, दुनिया के प्राचीनतम शहरों में से एक, (जिसका पुराना नाम काशी/वाराणसी/बनारस दो हजार साल से चला आ रहा है), बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाने जा रहा है|

बनारस ने सदियों से दुनिया को ज्ञान दिया है, सभ्यता की मिसालें दी हैं, सांस्कृतिक और कलात्मक धरोहरें प्रदान की हैं…

और आज फिर देश बनारस की ओर देख रहा है…

बनारस को निर्धारित करना है …

– यह संकुचित विचारधारा अपनाने वाली बुरी राजनीतिक शक्ति को, जिसके पास धन बल की सामर्थ्य बहुत बड़ी है और जिसने आपनी राजनीतिक दुकान साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर, देश के मानस को बांटकर चलाई है, समर्थन देकर अपने अस्तित्व पर एक कालिख मल लेता है,

या

– यह देश के लिए बदलाव की बात करने वाली उदारवादी, एक नई राजनीतिक आशा को शक्ति प्रदान करता है|

 

AK@Benaras

 

नवम्बर 18, 2013

ओमप्रकाश वाल्मीकि : गंगा में नहीं नहाऊँगा (श्रद्धांजलि)

balmikiहिंदी साहित्य में दलित जीवन के वर्णन को प्रमुखता से जगह दिलवाने वाले, जूठन जैसी अति-प्रसिद्द आत्मकथा के लेखक, वर्तमान हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर  ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की  स्मृति में कर्मकांड पर प्रहार करती उनकी एक सशक्तत कविता

जब भी चाहा छूना
मंदिर के गर्भ-गृह में
किसी पत्थर को
या उकेरे गये भित्ति-चित्रों को

हर बार कसमसाया हथौडे़ का एहसास
हथेली में
जाग उठी उंगलियों के उद्गम पर उभरी गांठें

जब भी नहाने गये गंगा
हर की पौड़ी
हर बार लगा जैसे लगा रहे हैं डुबकी
बरसाती नाले में
जहाँ तेज धारा के नीचे
रेत नहीं
रपटीले पत्थर हैं
जो पाँव टिकने नहीं देते

मुश्किल होता हैjoothan
टिके रहना धारा के विरुद्ध
जैसे खड़े रहना दहकते अंगारों पर

पाँव तले आ जाती हैं
मुर्दों की हडि्डयाँ
जो बिखरी पड़ी हैं पत्थरों के इर्द-गिर्द
गहरे तल में

ये हडि्डयां जो लड़ी थीं कभी
हवा और भाषा से
संस्कारों और व्यवहारों से
और, फिर एक दिन बहा दी गयी गंगा में
पंडे की अस्पष्ट बुदबुदाहट के साथ
(कुछ लोग इस बुदबुदाहट को संस्कृत कहते हैं)

ये अस्थियाँ धारा के नीचे लेटे-लेटे
सहलाती हैं तलवों को
खौफनाक तरीके से

इसलिये तय कर लिया है मैंने
नहीं नहाऊंगा ऐसी किसी गंगा में
जहां पंडे की गिद्ध-नजरें गड़ी हों
अस्थियों के बीच रखे सिक्कों
और दक्षिणा के रुपयों पर
विसर्जन से पहले ही झपट्टा मारने के लिए बाज की तरह !

(ओमप्रकाश वाल्मीकि)

नीचे दिए वीडियो लिंक्स में वाल्मीकि जी को कविता पाठ करते देखा-सुना जा सकता है|
नवम्बर 12, 2013

गंगा@वाराणसी

बहुत मुश्किल हैBenaras

गंगा तीर पर बैठकर

गंगा पर कुछ लिखना !

शरद की सांझ की सिमटी नवयौवना

या कि ग्रीष्म की सुबह की सकुचाती ललना

और या भादों की उफान भरी कामातुरा

घाटों पर आए न आए

मसि-कागद समेत मन को बहाए ले जाती है!

आप छंदों में उसे बाँधने को कहते हैं

या कि कटोरा भर पानी से उसे परखने को

और या मेरी क्षुद्रता से उस असीम को तौलने को

समझ में आए न आए

शुभ्र-कलुष समेत मन को बहाए ले जाती है!

Yugalsign1

%d bloggers like this: