Archive for अप्रैल, 2016

अप्रैल 30, 2016

दिल्ली की चुनावी राजनीति में एक नया प्रयोग

‘स्वराज अभियान’ वजीरपुर – वार्ड ६७, में एमसीडी के उपचुनाव में एक नया राजनीतिक प्रयोग करने जा रहा है| इसकी सफलता भारतीय राजनीति में सुधार की ओर एक सार्थक कदम होगी|

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अप्रैल 24, 2016

मल्लिकार्जुन मंसूर को सुनते हुए …(अशोक वाजपेयी)

MansurVajpeyee[1]
काल के खुरदरे आंगन में
समय के लंबे गूंजते गलियारों में
वे गाते हैं
अपने होने के जीवट का अनथक गान

वे चहलकदमी करते हुए
किसी प्राचीन कथा के
बिसरा दिए गए नायक से
पूछ आते हैं उसका हालचाल

वे बीड़ी सुलगाए हुए
देखते हैं
अपने सामने झिलमिल
बनते-मिटते संसार का दृश्‍य

देवताओं और गंधर्वों के चेहरे
उन्‍हें ठीक से दीख नहीं पड़ते
अपनी शैव चट्टान पर बैठकर
वे गाते हैं
अपने सुरों से
उतारते हुए आरती संसार की –

वे एक जलप्रपात की तरह
गिरते रहते हैं-
स्‍वरों की हरियाली
और राग की चांदनी में
अजस्र-

वे सींचते हैं
वे जतन से आस लगाते हैं
वे खिलने से निश्‍छल प्रसन्‍न होते हैं
वे समूचे संसार को एक फूल की तरह चुनकर
कालदेवता के पास
फिर प्रफुल्‍लता पर लौटने के लिए
रख आते हैं-

वे बूढ़े ईश्‍वर की तरह सयाने-पवित्र
एक बच्‍चे की फुरती से
आते हैं-
ऊंगली पकड़
हमें अनश्‍वरता के पड़ोस में ले जाते हैं

[2]

अपनी रफ्तार से चलते हुए
बहुत बाद में
आते हैं
मल्लिकार्जुन मंसूर
और समय से आगे निकल जाते हैं

उलझनों-भरे घावों-खरोचों से लथपथ
टुच्‍चे होते जाते समय से
आगे
उनके पीछे आता है
गिड़गिड़ाता हुआ समय दरिद्र और अपंग
भीख मांगता हाथ फैलाए समय-
हांफता हुआ

मल्लिकार्जुन मंसूर
अपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे में
हलका -सा झुककर
रखते हैं
कल के कंधे पर पर अपना हाथ
ठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ी
चल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्‍याशित
पड़ाव की ओर

अपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथ
सिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछ
गुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसार

ईश्‍वर आ रहा होता
घूमने इसी रास्‍ते
तो पहचान न पाता कि वह स्‍वयं है
या मल्लिकार्जुन मंसूर

[3]

राग के अदृश्‍य घर का दरवाजा खोलकर
अकस्‍मात् वे बाहर आते हैं
बूढ़े सरल-सयाने

राग की भूलभुलैया में
न जाने कहां
वे बिला जाते हैं
और फिर एक हैरान बच्‍चे की तरह
न जाने कहां से निकल आ जाते हैं
वे फूल की तरह
पवित्र जल की तरह
राग को रखते हैं
करते हैं आराधना
होने के आश्‍चर्य और रहस्‍य की ,
वे ख़याल में डूबते हैं
वचन में उतरते हैं

वे गाते हैं
जो कुछ बहुत प्राचीन हममें जागता है
गूंजता है ऐसे जैसे कि
सब कुछ सुरों से ही उपजता है
सुरों में ही निमजता है
सुरों में ही निवसता और मरता है ।

(अशोक वाजपेयी)

 

अप्रैल 20, 2016

कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

दूर-दूर तक
सोई पडी थीं पहाड़ियाँ
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे ।
एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में
बदल गया ।
शान्त धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवण्डर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरस कर शान्त हो गए ।
तभी किसी
बाँस के बन में आग लग गई
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गईं ।
पूरा वन असंख्य बाँसुरियों में बज उठा,
पत्तियाँ नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन कर उड़ गईं ।
लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फँसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारहसिंहा ।
सारा जंगल काँपता हिलता रहा
लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनन्त तक फैला हुआ है ।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अप्रैल 8, 2016

कविता में भाषा का इस्तेमाल कैसा हो – राजेश जोशी

कवि, चाँद और बिल्लियाँ

मन के एक टुकड़े से चांद बनाया गया
और दूसरे से बिल्लियाँ

मन की ही तरह उनके भी हिस्से में आया भटकना
अव्वल तो वे पालतू बनती नहीं और बन जाएं
तो भरोसे के लायक नहीं होतीं
उनके पांव की आवाज़ नहीं होती
हरी चालाकी से बनाई गयीं उनकी आंखें
अंधेरे में चमकती हैं
चांद के भ्रम में वो भगोनी में रखा दूध पी जाती हैं

मन के एक हिस्से से चांद बनाया गया
और दूसरे से बिल्लियाँ
चांद के हिस्से में अमरता आई
और बिल्लियों के हिस्से में मृत्यु
इसलिए चांद से गप्प लड़ाते कवि का
उन्होंने अक्सर रास्ता काटा
इस तरह कविता में संशय का जन्म हुआ

वो अपने सद्य: जात बच्चे को अपने दांतों के बीच
इतने हौले से पकड़कर एक जगह से
दूसरी जगह ले जाती हैं

कवि को जैसे भाषा को बरतने का सूत्र
समझा रही हों।

(राजेश जोशी)

अप्रैल 7, 2016

कठफोड़वा : दक्षतम बढ़ई कलाकार

शहर शहर सुरसा के मुख समान अनवरत फैलते सीमेंट के जंगलों में वास करती, बड़ी होती पीदियों में संभवतः लगभग सभी लोगों ने कभी भी कठफोड़वा नामक पक्षी को पेड़ के तने में अपनी मजबूत चोंच से छेद करते न देखा होगा और शायद अपनी आँखों से कठफोड़वा देखा ही न हो| सीमेंट के जंगल ने पेड़-पौधों से गुलज़ार जंगलों के असली जानवरों एवं पक्षियों में से बहुत सी किस्मों को मनुष्य की आँखों से ओझल ही कर दिया है|

कठफोड़वा के कलाकारी कृत्य का आनंद लें और शायद इससे कठफोड़वा को असल में देखने की चाह उभरे और उसके दर्शन भी कभी हो जाएँ||

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अप्रैल 1, 2016

तो तुम लेखक बनना चाहते हो ?

अमेरिकन पिता और जर्मन माता की संतान के रूप में सन १९२० में जन्मे Charles Bukowski २४ वर्ष की उम्र में अपनी पहली कहानी छपवा पाए और उनकी पहली कविता तब छपी जब वे ३५ साल के थे| ३९ वर्ष की आयु में उनकी कविताओं की पहली पुस्तक छपी और १९९४ में मृत्यु होने तक गद्य और पद्य दोनों विधाओं में वे ४५ पुस्तकें लिख चुके थे| १९४१ में लेखक बनने के लिए उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी लेकिन १९४६ तक लगातार लिखने के बावजूद उन्हें अपने लिखे को छपवाने में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई और इस असफलता ने १९४६ में उनसे लेखन को दरकिनार कर जीवन यापन के लिए अन्य बहुत से कार्य करवाए| इस असफलता को पचा नहीं पाने के कारण वे शराब के नशे में डूब गये और दस सालों तक तब तक शराब के चंगुल में रहे जब तक वे गंभीर रूप से अल्सर के रोगी न बन गये| उन्होंने लेखन को फिर से अपनाया और इस बार कलम उठा कर नहीं रखी|हालांकि जीवन को सहारा देने के लिए वे अन्य क्षेत्रों में काम करते रहे पर जीवन पर्यंत लेखन को उन्होंने नहीं छोड़ा| उनकी एक बेहद प्रसिद्ध और प्रभावशाली कविता है – So you want to be a writer?

प्रस्तुत है मूल अंग्रेजी की कविता का हिन्दी रूपांतरण :

यदि तुम्हारे भीतर से यह विस्फोट के रूप में बाहर निकल कर नहीं आता

तो लिखने की तीव्र इच्छा और तमाम अन्य कारण

इतने पर्याप्त नहीं कि तुम लिखो|

 

जब तक कि यह तुम्हारे दिल और दिमाग से

और मुँह और आँतों से

अपने आप बाहर निकलने के लिए तत्पर नहीं होता,

तुम्हे इसे लिखने का अधिकार नहीं है|

 

यदि तुम्हे उचित शब्दों के इंतजार में

अपने कम्प्यूटर स्क्रीन को ताकते हुए

या टायप राइटर को घूरते हुए

घंटो बैठना पड़ता है,

तो तुम्हे बिल्कुल ही लिखना नहीं चाहिए|

 

यदि तुम इसलिए लिखना चाहते हो कि

लेखन से तुम्हे संपत्ति या प्रसिद्धि मिलेगी

तो मत लिखो|

या कि तुम इस मोह में लिखना चाहते हो कि

बहुत सी स्त्रियों को तुम अपने लेखन के मोहपाश में बांध कर

अपनी शैया पर लाकर अंकशायिनी बना पाने में कामयाबी पा लोगे

तो तुम हरगिज ही न लिखो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को बैठ कर

बार बार सुधार कर पुनर्लेखन करना पड़े

तो मत लिखो|

 

यदि तुम किसी और जैसा लिखना चाह रहे हो,

तो लिखना भूल ही जाओ|

 

यदि तुम्हे उस वक्त का इंतजार करना पड़े,

जब लेखन तुम्हारे भीतर से गर्जना करता हुआ बाहर आए

तो तुम धैर्य से उस घड़ी का इंतजार करो|

और यदि यह गर्जना करता बाहर नहीं निकलता तो

तुम किसी और उचित काम में अपनी ऊर्जा का उपयोग करो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को पहले अपनी पत्नी, या गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड

या अपने माता-पिता या किसी अन्य को पढ़ कर सुनाना पड़े,

अपने लिखे पर उनका अनुमोदन लेना पड़े,

तब अभी तुम लेखन के लिए अंकुरित नहीं हुए हो,

इसे स्वीकार कर लो कि अभी तुम तैयार नहीं हो|

 

अन्य बहुत से लेखकों की तरह मत बनो,

उन हजारों लोगों की तरह मत बनो

जो स्वयं को लेखक कहते हैं,

बोरियत से भरा और बोझिलता से भारी हो चुका लेखन मत करो,

दिखावा मत करो,

अपने ही प्रति प्रेम से मत घिर जाओ|

 

अगर ऐसे ही लक्षणों से तुम ग्रसित हो

तो स्पष्ट जान लो,

दुनिया भर में पुस्तकालय,

तुम्हारी तरह के कथित लेखकों के कारण पहले से ही निद्रावस्था में हैं,

उनकी मूर्छा में बढोत्तरी मत करो|

मत लिखो|

 

यदि तुम्हारी आत्मा से लेखन

एक राकेट की तरह बाहर नहीं आता,

और यदि तुम्हे ऐसा न लगने लगे

कि तुमने अगर अब नहीं लिखा

तो या तो तुम पागल हो जाओगे

या तुम आत्मघाती हो जाओगे

या हत्यारे ही बन जाओगे

तो तुम मत लिखो|

 

अगर लिखने का वास्तविक समय आ गया है,

और तुम एक माध्यम के रूप में चुने गये हो

तब लेखन स्वयं ही तुम्हारे भीतर से बाहर आ जायेगा

और यह बाहर आता ही रहेगा जब तक कि

या तो तुम ही न मर जाओ

या कि लेखन ही तुम्हारे भीतर न मर जाए|

 

इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है,

कभी भी नहीं रहा!

(Charles Bukowski )

अनुवाद – राकेश

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