Posts tagged ‘Daya’

अगस्त 3, 2017

सौंदर्यबोध

 

अपने इस गटापार ची बबुए के

पैरों में शहतीरें बांधकर

चौराहे पर खड़ा कर दो,

फिर, चुपचाप ढ़ोल बजाते जाओ,

शायद पेट भर जाए :

दुनिया विवशता नहीं

कुतूहल खरीदती है|

 

भूखी बिल्ली की तरह

अपनी गरदन में संकरी हाँडी फँसाकर

हाथ-पैर पटको,

दीवारों से टकराओ,

महज छटपटाते जाओ,

शायद दया मिल जाए:

दुनिया आँसू पसन्द करती है

मगर शोख चेहरों के|

 

अपनी हर मृत्यु को

हरी-भरी क्यारियों में

मरी हुई तितलियों-सा

पंख रंगकर छोड़ दो,

शायद संवेदना मिल जाए :

दुनिया हाथों-हाथ उठा सकती है

मगर इस आश्वासन पर

कि रुमाल के हल्के-से स्पर्श के बाद

हथेली पर एक भी धब्बा नहीं रह जाएगा|

 

आज की दुनिया में

विवशता,

भूख,

मृत्यु,

सब सजाने के बाद ही

पहचानी जा सकती है|

बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती हैं|

शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी

जो मरने के पूर्व

कफ़न और फूलों का

प्रबन्ध नहीं कर लेंगें|

ओछी नहीं है दुनिया:

मैं फिर कहता हूँ,

महज उसका सौंदर्य-बोध

बढ़ गया है|

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अप्रैल 29, 2013

आंसू एक न गिरने दूंगा…

चाहे घड़ी विदा की आये

दुनिया ठुकुरसुहाती गाये

मेरा धैर्य नहीं टूटेगा

मैं खुद को न ढहने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

युगों युगों से रोज संजोया

अंतर्मन ने खूब भिगोया

फिर भी कसम यही खाई है

मैं इनको न बहने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

दुनिया ने खेती की धन की

मेरी धरती यही नयन की

इसमें फसल उगाई है

जो वह न सबको चरने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

मुझे जरुरत नहीं दया की

मुझमे मूरत है ममता की

तुम जो चाहो हाथ धरो

तो यह न तुमको करने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

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