Archive for अगस्त, 2013

अगस्त 25, 2013

मैं वर्तमान हूँ !

मैं जीवन के बीते समय पर पछतावा कर रहा था

और आने वाले समय के प्रति भयभीत हो रहा था,

अचानक, मैंने सुना,

मेरा ईश्वर बोल रहा था ,

“मेरा नाम “वर्तमान” है”|

वह रुका, मैंने इन्तजार किया,

उसने फिर बोलना शुरू किया,

“जब तुम भूतकाल में जीते हो,

बीते समय में की गई गलतियों और पछतावों के साथ,

तब मुश्किल हो जाती है मेरे लिए,

मैं ऐसे माहौल में नहीं रह सकता|

मेरा नाम ” भूत” नहीं है|”

“जब तुम भविष्य में जीते हो,

आने वाली समस्याओं और भय की कल्पनाओं के साथ,

तब भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है,

मैं वहाँ भी नहीं रहता,

मेरा नाम “भविष्य” नहीं है|”

जब तुम इसी क्षण में,

-जो तुम्हारे सामने है,

जीते हो,

तब कतई कोई मुश्किल मेरे लिए नहीं होती,

मैं यहीं रहता हूँ,

मेरा नाम “वर्तमान” है|”

[I Am by Helen Mallicoat]

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अगस्त 23, 2013

मुहम्मद अल्वी : दिल्ली और अन्य कवितायेँ

Muhammed Alviदुनिया में एक से बढ़कर एक गुणी और रचनात्मक व्यक्ति जीते रहे हैं।

बेहतर लिखने वाले किसी शहर पर भी चंद पंक्तियों में ऐसा लिख सकते हैं कि पढ़ने वाला शब्दों के जादू में खो जाए|

शायर मुहम्मद अल्वी साहब की रचनायें भी ऐसी ही आकर्षक हैं कि उन्हें सिर्फ एक बार पढ़ने वाला भी  भूल नहीं पाता|

दिल्ली पर कविता तो लाजवाब है। और बाकी भी ऐसी हैं कि पढ़ते जाओ… डूबते जाओ… उबरो… फिर पढ़ते जाओ|

दिल्ली तेरी आँख में तिनका

कुतुबमीनार

दिल्ली तेरा दिल पत्थर का

लाल किला

दिल्ली तेरे बटुए में

ग़ालिब की मज़ार

रहने भी दे बूढी दिल्ली

और न अब कपडे उतार|

 * * * * * * * * * * *

         सुबह

       . . . . .

आँखें मलते आती है

चाय की प्याली पकड़ाकर

अखबार में गुम हो जाती है

             शहर

        …………

कहीं भी जाओ, कहीं भी रहो तुम

सारे शहर एक जैसे हैं

सड़कें सब साँपों जैसी हैं

सबके ज़हर एक जैसे हैं

       उम्मीद

      …………

एक पुराने हुजरे* के

अधखुले किवाड़ों से

झांकती है एक लड़की .

[हुजरे* = कोठरी]

            इलाजे – ग़म

           …………………..

 मिरी जाँ घर में बैठे ग़म न खाओ

उठो दरिया किनारे घूम आओ

बरहना-पा* ज़रा साहिल पे दौड़ो

ज़रा कूदो, ज़रा पानी में उछलो

उफ़क में डूबती कश्ती को देखो

ज़मीं क्यूँ गोल है, कुछ देर सोचो

किनारा चूमती मौजों से खेलो

कहाँ से आयीं हैं, चुपके से पूछो

दमकती सीपियों से जेब भर लो

चमकती रेत को हाथों में ले लो

कभी पानी किनारे पर उछालो

अगर खुश हो गए, घर लौट आओ

वगरना खामुशी में डूब जाओ !!

[बरहना-पा* = नंगे पाँव]

      हादसा

    …………..

लम्बी सड़क पर

दौड़ती हुई धूप

अचानक

एक पेड़ से टकराई

और टुकड़े-टुकड़े हो गयी

         कौन

      ………

कभी दिल के अंधे कूएँ में

पड़ा चीखता है

कभी दौड़ते खून में

तैरता डूबता है

कभी हड्डियों की

सुरंगों में बत्ती जला के

यूँ ही घूमता है

कभी कान में आ के

चुपके से कहता है

तू अब भी जी रहा है

बड़ा बे हया है

मेरे जिस्म में कौन है ये

जो मुझसे खफा है

         खुदा

      ………

घर की बेकार चीजों में रखी हुई

एक बेकार सी

लालटेन है !

कभी ऐसा होता है

बिजली चली जाय तो

ढूंढ कर उसको लाते हैं

बड़े ही चैन से जलाते हैं

और बिजली आते ही

बेकार चीजों में फैंक आते हैं !

पुनश्चः – मुहम्मद अल्वी के काव्य संगृह ‘चौथा आसमान ‘ को 1992 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला|

अगस्त 6, 2013

हिरोशिमा-नागासाकी में ट्रूमन का खेल

बहुत बड़ी गलती नहीं की क्या

प्रकृति ने ?

Hiroshima

इंसान तो बनाया ही बनाया

साथ उसे  प्रदान कर दी,

जरुरत से ज्यादा

सोचने और समझने की शक्ति!

प्रकृति बसाती जाती है

इंसान उजाड़ता जाता है,

विध्वंस का प्रयोग करता है

एक इंसान दूसरे इंसान के विरुद्ध

पेड़-पौधे और जानवर तो

अणु बम बनाते नहीं

ये सब कारनामें तो इंसान के ही हैं|

आइंस्टाइन की वैज्ञानिक मेधा का दुरुपयोग करके

जब ट्रूमन ने हिरोशिमा और नागासाकी

में विनाश फैलाने की योजना बनाई

तब उसे पता तो था

कि जापान आत्मसमर्पण के लिए तैयार था

फिर क्यों इतना बड़ा विध्वंस रचा उसने?

क्या उसके दिमाग पर शैतान ने कब्जा कर लिया था?

या उसे बाकी देशों को अपनी शक्ति दिखानी थी?

कारण जो भी रहा हो उसके बोये बीजों से

उपजी फसल धरती पर जीवन को

हमेशा के लिए संक्रमित कर गई है|

जिनके पास अपने नागरिकों को खिलाने के

लिए भोजन तक नहीं है ऐसे

देश भी एटम बम थैले में लिए घूम रहे हैं|

आत्मघाती तो इंसान सदा से ही रहा है-

वरना वह धरती पर प्रकृति की देन का ऐसा नाश न करता रहता-

ट्रूमन के कदम ने

उसे पूरी धरती को नष्ट करने का औजार देकर

भस्मासुर भी बना दिया|

देर-सबेर कोई न कोई

सनकी राजनीतिज्ञ

इस धरती को लील कर ही

अंतिम  शान्ति को प्राप्त होगा|

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