Archive for जुलाई, 2011

जुलाई 31, 2011

अंत का प्रारंभ (रघुवीर सहाय)

सुप्रसिद्ध कवि स्व. रघुवीर सहाय ने मनुष्य के जीवन की गति और दिशा और जीवन-दर्शन और जीवन के प्रति समझ में आने वाले उतार-चढ़ाव पर बहुत ही अच्छी कविता लिखी थी।

मधुर यौवन का मधुर अभिशाप मुझको मिल चुका था
फूल मुरझाया छिपा कांटा निकलकर चुभ चुका था
पुण्य की पहचान लेने, तोड़ बंधन वासना के
जब तुम्हारी शरण आ, सार्थक हुआ था जन्म मेरा
क्या समझकर कौन जाने, किया तुमने त्याग मेरा
अधम कहकर क्यों दिया इतना निठुर उपलंभ यह
अंत का प्रारंभ है यह!

जगत मुझको समझ बैठा था अडिग धर्मात्मा क्यों,
पाप यदि मैंने किये थे तो न मुझको ज्ञान था क्यों
आज चिंता ने प्रकृति के मुक्त्त पंखों को पकड़कर
नीड़ में मेरी उमंगों के किया अपना बसेरा
हो गया गृहहीन सहज प्रफुल्ल यौवन प्राण मेरा
खो गया वह हास्य अब अवशेष केवल दंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

है बरसता अनवरत बाहर विदूषित व्यंग्य जग का
और भीतर से उपेक्षा का तुम्हारा भाव झलका
अनगिनत हैं आपदायें कहाँ जाऊँ मैं अकेला
इस विमल मन को लिये जीवन हुआ है भार मेरा
बुझ गये सब दीप गृह के, काल रात्रि गहन बनी है
दीख पड़ता मृत्यु का केवल प्रकाश स्तंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

(रघुवीर सहाय)

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जुलाई 30, 2011

बाज की चोंच में ब्रह्मांड

मैं खुश होते-होते रुक जाता हूँ
मैं प्यार करते-करते डर जाता हूँ
मैं कवितायें लिखते-लिखते
गद्य की तरफ मुड़ जाता हूँ
मुझे रह-रहकर आ जाती है याद
कि एक बाज की चोंच से छूट
ब्रह्मांड जायेगा फूट
फिर क्या होंगी मेरी खुशियाँ
क्या होगा मेरा प्यार
क्या होंगी ये कवितायें
जिन्हे मैं
लिख रहा हूँ।

(बद्रीनारायण)

जुलाई 29, 2011

गुलाबी दुपट्टा

ऐसी ही भीगी रातों में
कांपते थे हाथ, दिल और दिमाग
जब परत दर परत
जिस्मों के तलिस्म खुलते थे।

अधखुली पलकों में
ठहर जाती थी रात
होठों के जाग उठे उभारों पर
सियाह बदलियाँ अमृत बरसा जाती थी।

चाहत की मदिरा पीकर
मदहोश हो जाता था अहसास
विस्मरति के भवँर में डुबाते
आत्मबोध के वे लम्हे
शरीर के बंधनों से परे
आत्माओं का मिलन करा जाते थे
जहाँ अंतर मिट जाता है
मैं और तू के बीच
वही पल तो थे अपनी पहचान के।

आज भी खुल कर बरस रही है घटा
खिड़की के गीले शीशों से परे
धुंधला गए है सब मंज़र
उसी तरह के जब
मैंने माटी के अंधे घर में छोड़ा था तुम्हे।

साथ गुज़ारे लाखो लम्हे
एक साथ जल रहे थे
सुन्न हो गये ज़हन के अलाव में
आखों के चश्मे में भाप थी मगर
उस रोज रो कब पाया था मैं।

सुहाग का जोड़ा पहने
दूर जाते,
बहुत दूर जाते देखता रहा था तुम्हे,
तब से एक गुलाबी दुपट्टा
मेरे ख्यालों में लहरा जाता है अक्सर
सुहाने मौसमों में रुला जाता है अक्सर।

(रफत आलम)

जुलाई 29, 2011

जीवन प्रश्न भी और उत्तर भी

किसी दूसरे को
जानने के लिए
पहले स्वयं को
जानना जरूरी है
स्वयं से प्रश्न करना
और
स्वयं ही उसका उत्तर खोजना
इसलिए जरूरी है कि
हर व्यक्ति को
अपने जीवन का रास्ता
स्वयं ही तय करना है
तुम स्वयं ही गुरु हो
और शिष्य भी स्वयं ही हो
यह भूल जाओ कि
तुम कुछ जानते हो
स्वयं से प्रश्न करो कि
जीवन क्या है और क्योँ है?
इस प्रश्न का उत्तर
तुम्हारा मन, बुद्धि और तर्क नहीं दे सकते
इसका उत्तर जीवन की उस
बंद किताब की तरह है
जिसको तुम यदि
खोलने की चेष्टा ही न करो
तो यह तुम्हारी अलमारी के
एक कोने में पड़ी
व्यर्थ सी चीज़ रह जायेगी
तुम्हारी जीवन की किताब के भी
अनेक पन्ने हैं
जिनको तुम्हे
पढ़ने के लिए
जानने के लिए
खोलने का कष्ट
करना ही होगा
जीवन की इस किताब का एक पन्ना
तुम्हारी जीवनयात्रा का
एक कदम मात्र है
तुम्हे जीवनयात्रा
एक एक कदम से
तय करनी है
यदि तुम बिना देखे छलांग लगाओगे तो
तुम्हारा गिरना तय है
इस जीवनयात्रा का कोई शॉर्ट-कट नहीं
न कोई गुरु है
जो तुम्हे
यह घुट्टी पिला दे कि
तुम्हे कहाँ से और
कैसे चलना है
तुम्हे तो
स्वयं ही चलना है
और वह भी कदम कदम पैदल
तभी तो तुम जान पाओगे कि
यह यात्रा कितनी कष्टदायी
और कितनी सुखदायी है
इस यात्रा की मंज़िल और यात्रा
दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं
और तभी यह जीवनयात्रा
‘जीवन’ और ‘यात्रा’
एक दूसरे में
ऐसे समाए हुए हैं
जैसे
जीवन एक प्रश्न
और जीवन ही उसका उत्तर
एक दूसरे में
समाए हुए हैं!

(अश्विनी रमेश)

जुलाई 28, 2011

चिंता जहर, चिंतन संजीवनी (संत सिद्धार्थ)

मित्रों, आज कुछ देर बात हो जाये चिंता पर। चिंता दीमक समान है जीवन के लिये और यह धीरे-धीरे मानव की चेतना को खाकर जीवन को पूर्णतया नष्ट कर देती है। आप गौर से अपने स्वभाव को देखना, अपने आसपास के लोगों के स्वभाव को देखना, चिंता करना धीरे-धीरे एक आदत बन जाती है।

चिंता उपजती है भय से। भय कि कल क्या होगा। चिंता उपजती है अहंकार से जन्मी निराशा से कि जीवन की बागडोर हाथ से निकल रही है… जैसे कि जगत में सब कुछ मानव की इच्छा से हो रहा है! क्या मानव हर बात को नियंत्रित कर सकता है?

आज में न जीकर, अभी न जीकर जब लोग भविष्य में जीना शुरु कर देते हैं, भूत काल के भूतों के साथ रहना शुरु कर देते हैं तब चिंता को उनके अंदर वास करने का मौका मिल जाता है। कभी किसी जानवर को चिंता करते देखा है? अगर कोई खतरा आन पड़ा है तो वे वे बस क्षण में निर्णय लेते हैं। उस खतरे के पूर्वाभास में चिंता में नहीं गले रहते।

एक और बात स्पष्ट कर लें। चिंता और चिंतन एक ही बात नहीं है। चिंता निराशाजनक है…प्राणघातक है, भय में इसका मूल छिपा होता है। चिंता ऋणात्मक भाव है। चिंता सुप्त मस्तिष्क का भाव है। चिंता ऐसे सारी ऊर्जा सोख लेती है जैसे कि बहुत से पेड़ और लतायें भू-जल सोख कर आसपास की जमीन की उर्वरा क्षमता को भी खा जाती हैं। चिंता से होकर जाने वाला रास्ता चिता की ओर ले जाता है। चिंता करने की आदत वाला व्यक्त्ति जीवन में परेशानियों का सामना नहीं करता बल्कि उनके बारे में सोचता रहता है। वह नदी किनारे बैठा रहता है कि अगर पानी में उतर गया तो गीला हो जायेगा, ठण्ड लग जायेगी, बीमार पड़ जायेगा। वह कभी नदी के उस पार नहीं जा पाता और वहाँ क्या क्या बसा है इसे देखने, जाने और समझने से वंचित ही रह जाता है। चिंता करने वाला व्यक्त्ति जीवन के बहुत सारे पहलुओं से अनभिज्ञ ही रह जाता है।

चिंतन के साथ ऐसा कोई ऋणात्मक वातावरण नहीं उपजता। चिंतन का मूल साहस में छिपा होता है। चिंतन चेतन मस्तिष्क की उपज है। कुछ परेशानी आये जीवन में तो चिंतन करने वाला व्यक्त्ति रास्ता खोजता है आगे बढ़ने का। चिंतन करने वाला व्यक्त्ति प्रबंधन करने में कुशल होता जाता है। वह जीना सीख लेता है। वह हर पल भय में नहीं जीता कि कल क्या होगा। वह अपने को तैयार करता रहता है, गुणों से भरता रहता है ताकि जीवन में किसी भी परिस्थिति में वह और उसका मस्तिष्क तत्परता से सक्रियता दिखा सके। हार-जीत, सफलता-असफलता से परे वह जीने में विश्वास करने लगता है।

ऐसा नहीं कि चिंतन करने वाला व्यक्त्ति भविष्य के प्रति उदासीन रहेगा। पर वह चिंता करने वाले की भांति भविष्य का भय वर्तमान पर लाद कर आज और अभी के पलों को नष्ट नहीं करेगा।

चिंता करते वक्त्त मस्तिष्क में बेकार के विचार ही घूमते रहते हैं। मस्तिष्क कोई भी उपयोगी विचार उत्पन्न नहीं कर पाता और चिंतित व्यक्त्ति अंत में हार मानकर बैठ जाता है कि अब उससे कुछ न हो सकेगा।

बहुत से व्यक्त्ति ऐसे भी हैं जो इसलिये चिंता को अपना लेते हैं क्योंकि उन्हे लगता है कि अगर वे चिंता न करें तो वे सक्रिय नहीं रह पायेंगे और चिंता उन्हे हमेशा कुछ न कुछ करने की ओर धकेलती है और वे वे बुरे से बुरे विचार सोचते रहते हैं और फिर चिंता की वर्तुलाकार गति में उलझे रह जाते हैं।

चिंता जीवन में जो कुछ भी अच्छा है उस सबकी ओर से व्यक्त्ति की आँखें बंद करवा देती है। धीरे-धीरे चिंता व्यक्त्ति को अवसाद, उदासी, और तनाव से भरे ऋणात्मक वातावरण में ले जाती है और वह नींद और सुख-चैन से हाथ धो बैठता है। और किस कारण यह सब? सिर्फ मस्तिष्क में ऊट-पटांग सोचते रहने के कारण। चिंता करने की आदत रखने वाला हर बात में चिंता करने की गुंजाइश खोज लेता है। वह हरेक बात से परेशान रहता है।

अगर आपके साथ भी ऐसा होता है। भले ही कभी कभी ही सही तो जागरुक होने की आवश्यकता है। चिंता को चिंतन में बदलने का प्रयास करें। समझ कर प्रयास करेंगे तो धीरे-धीरे ही सही पर आप चिंता से दूर होकर चिंतन की ओर बढ़ना शुरु कर देंगे और जीवन जीना शुरु कर देंगे।

चाहे तो इसे इस तरह से मान लें कि चिंता के साथ हर तरह की हानि आती है जीवन में और चिंतन के साथ लाभ आते हैं। कोई क्यों हानि भरा जीवन जीना चाहेगा?

जगत से भयभीत न हों। जीवन से भय न रखें। जीवन के उतार-चढ़ावों से न घबरावें। जीवन में मौसम के बदलाव से चिंतित न हों। जीवन की अनिश्चितता से भयभीत होकर जीवन में घुन न लगा लें।

जब एक घंटे का या कुछ घंटों का खेल खेलते हो तो क्या इस बात से भयभीत होकर मैदान से बाहर ही बैठे रहते हो कि हार जाओगे? या हे भगवान चोट लग जायेगी या कैसे सब कुछ होगा।

नहीं आप मैदान में उतरते हो…खेल खेलते हो और जैसी परिस्थितियाँ खेल के दौरान सामने आती हैं उसी के अनुरुप प्रदर्शन करने की कोशिश करते हो। बस यही जीवन का भी खेल है।

जैसे खेल के लिये अपने को गुणी बनाते हो, तैयार करते हो, वैसे ही जीवन में भी करने की जरुरत है।

गौर से देखना आप विचारों को रोक सकते हो, उनकी दिशा बदल सकते हो। जब तक आप रेडियो ऑन नहीं करते तब तक कोई स्टेशन नहीं लगता और यह आपके हाथ में है किस स्टेशन को आप सुनना चाहें, कहीं गीत आ रहे हैं, कही वार्ता चल रही है, कहीं नाटक चल रहा है। आप जो चाहते हो सुनते हो। मानव मस्तिष्क भी कुछ कुछ ऐसा ही है। हजारों-लाखों तरह के स्टेशन रुपी विचार तैर रहे हैं और मानव मस्तिष्क उन्हे पकड़ लेता है। अभ्यास से अपने मस्तिष्क को ऐसा बनायें कि यह उपयोगी बातें विचारने लगे।

विचार को रोकना या बदलना सीखें। जब आपको लगे कि चिंता आपको ग्रसित कर रही है। कुछ शारीरिक काम ही करने लग जायें, या कुछ भी और करें… ध्यान बँट जायेगा…विचार दूसरी ओर केंद्रित हो जायेंगे। ऊर्जा सही रुप में उपयोग होने लगेगी। धीरे-धीरे आपको विचारों पर नियंत्रण करना आ जायेगा।

ध्यान रखें हमेशा कि जीवन तो चुनौतियाँ देता रहेगा। और यह मानव को सोचना है कि वह क्या करना चाहता है नयी परिस्थितियों के साथ?

अगर जीना है तो उसे कमर कसनी होगी कि रास्ते खोजे आगे बढ़ने के और मस्तिष्क का सही प्रयोग करेगा तो रास्ते मिल ही जायेंगे।

जीवन को चिंता से दूर ले जाकर चिंतन की ओर मोड़ें। यही एकमात्र वास्तविक प्रबंधन है जीवन में।

जुलाई 28, 2011

खुदारा पूछना मत कहाँ थे

सपनों के सजीले शहजादों जैसे कहाँ थे
आपने जो समझा था हम वैसे कहाँ थे

खो गए थे अँधेरे में कहीं शाम के बाद
क्या बताएं रात गये तक कैसे कहाँ थे

रेशमी छोड़ सूती साडी भी ना ला सके
अरमान तो था यार मगर पैसे कहाँ थे

वो कागजी डिग्रियां तो किताबें ले आईं
नौकरी की खरीद के लिए पैसे कहाँ थे

फूल, तितली, बादल, बरखा, धनक, बहार
हसीन थे सब मगर आप जैसे कहाँ थे

गम के सौ समंदरों का निचोड़ हैं आँसू
ये पानी के चंद कतरे ऎसे–वैसे कहाँ थे

शाम हुए घर लौटा है राह भूला आलम
खुदारा कोई ये ना पूछना कैसे कहाँ थे

(रफत आलम)

जुलाई 27, 2011

ओशो, महावीर, ज्योतिष, आत्मघाती और जीने की इच्छा

ओशो ने ज्योतिष जैसे विवादित विषय का भी विश्लेषण अपनी अदभुत दृष्टि से किया है। ज्योतिष को अद्वैत का विज्ञान बताते हुये वे इस विषय की अनूठी व्याख्या करते हैं। उन्होने प्राचीनतम उपलब्ध ज्ञान और उदाहरणों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक समझ वाले उदाहरणों को एक सूत्र में पिरोकर बेहद रोचक व्याखान प्रस्तुत किये हैं जो इस विषय के सम्बंध में एक बिल्कुल स्पष्ट छवि लेकर आते हैं। ज्योतिष और जीवन को वे तीन भागों में जोड़ते हैं।

बहुत बार सत्य खोज लिए जाते हैं, खो जाते हैं। बहुत बार हमें सत्य पकड़ में आ जाता है, फिर खो जाता है। ज्योतिष उन बड़े से बड़े सत्यों में से एक है जो पूरा का पूरा खयाल में आ चुका और खो गया। उसे फिर से खयाल में लाने के लिए बड़ी कठिनाई है। इसलिए मैं बहुत सी दिशाओं से आपसे बात कर रहा हूं। क्योंकि ज्योतिष पर सीधी बात करने का अर्थ होता है कि वह जो सड़क पर ज्योतिषी बैठा है, शायद मैं उसके संबंध में कुछ कह रहा हूं। जिसको आप चार आने देकर और अपना भविष्य-फल निकलवा आते हैं, शायद उसके संबंध में या उसके समर्थन में कुछ कह रहा हूं।
नहीं, ज्योतिष के नाम पर सौ में से निन्यानबे धोखाधड़ी है। और वह जो सौवां आदमी है, निन्यानबे को छोड़ कर उसे समझना बहुत मुश्किल है। क्योंकि वह कभी इतना डागमेटिक नहीं हो सकता कि कह दे कि ऐसा होगा ही। क्योंकि वह जानता है कि ज्योतिष बहुत बड़ी घटना है। इतनी बड़ी घटना है कि आदमी बहुत झिझक कर ही वहां पैर रख सकता है। जब मैं ज्योतिष के संबंध में कुछ कह रहा हूं तो मेरा प्रयोजन है कि मैं उस पूरे-पूरे विज्ञान को आपको बहुत तरफ से उसके दर्शन करा दूं उस महल के। तो फिर आप भीतर बहुत आश्वस्त होकर प्रवेश कर सकें। और मैं जब ज्योतिष की बात कर रहा हूं तो ज्योतिषी की बात नहीं कर रहा हूं। उतनी छोटी बात नहीं है। पर आदमी की उत्सुकता उसी में है कि उसे पता चल जाए कि उसकी लड़की की शादी इस साल होगी कि नहीं होगी।
इस संबंध में यह भी आपको कह दूं कि ज्योतिष के तीन हिस्से हैं।

एक–जिसे हम कहें अनिवार्य, एसेंशियल, जिसमें रत्ती भर फर्क नहीं होता। वही सर्वाधिक कठिन है उसे जानना।

फिर उसके बाहर की परिधि है–नॉन-एसेंशियल, जिसमें सब परिवर्तन हो सकते हैं। मगर हम उसी को जानने को उत्सुक होते हैं।

और उन दोनों के बीच में एक परिधि है–सेमी- एसेंशियल, अर्द्ध-अनिवार्य, जिसमें जानने से परिवर्तन हो सकते हैं, न जानने से कभी परिवर्तन नहीं होंगे। तीन हिस्से कर लें।

एसेंशियल–जो बिलकुल गहरा है, अनिवार्य, जिसमें कोई अंतर नहीं हो सकता। उसे जानने के बाद उसके साथ सहयोग करने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। धर्मों ने इस अनिवार्य तथ्य की खोज के लिए ही ज्योतिष की ईजाद की, उस तरफ गए।

उसके बाद दूसरा हिस्सा है–सेमी एसेंशियल, अर्द्ध अनिवार्य। अगर जान लेंगे तो बदल सकते हैं, अगर नहीं जानेंगे तो नहीं बदल पाएंगे। अज्ञान रहेगा, तो जो होना है वही होगा। ज्ञान होगा, तो आल्टरनेटिव्स हैं, विकल्प हैं, बदलाहट हो सकती है।

और तीसरा सबसे ऊपर का सरफेस, वह है…नॉन-एसेंशियल। उसमें कुछ भी जरूरी नहीं है। सब सांयोगिक है।

लेकिन हम जिस ज्योतिषी की बात समझते हैं, वह नॉन-एसेंशियल का ही मामला है। एक आदमी कहता है, मेरी नौकरी लग जाएगी या नहीं लग जाएगी? चांद तारों के प्रभाव से आपकी नौकरी के लगने, न लगने का कोई भी गहरा संबंध नहीं है। एक आदमी पूछता है, मेरी शादी हो जाएगी या नहीं हो जाएगी? शादी के बिना भी समाज हो सकता है। एक आदमी पूछता है कि मैं गरीब रहूंगा कि अमीर रहूंगा? एक समाज कम्युनिस्ट हो सकता है, कोई गरीब और अमीर नहीं होगा। ये नॉन-एसेंशियल हिस्से हैं जो हम पूछते हैं। एक आदमी पूछता है कि अस्सी साल में मैं सड़क पर से गुजर रहा था और एक संतरे के छिलके पर पैर पड़ कर गिर पड़ा, तो मेरे चांद तारों का इसमें कोई हाथ है या नहीं है? अब कोई चांद तारे से तय नहीं किया जा सकता कि फलां-फलां नाम के संतरे से और फलां-फलां सड़क पर आपका पैर फिसलेगा। यह निपट गंवारी है।
लेकिन हमारी उत्सुकता इसमें है कि आज हम निकलेंगे सड़क पर से तो कोई छिलके पर पैर पड़ कर फिसल तो नहीं जाएगा। यह नॉन एसेंशियल है। यह हजारों कारणों पर निर्भर है, लेकिन इसके होने की कोई अनिवार्यता नहीं है। इसका बीइंग से, आत्मा से कोई संबंध नहीं है। यह घटनाओं की सतह है। ज्योतिष से इसका कोई लेना-देना नहीं है। और चूंकि ज्योतिषी इसी तरह की बात-चीत में लगे रहते हैं इसलिए ज्योतिष का भवन गिर गया। ज्योतिष के भवन के गिर जाने का कारण यह हुआ कि ये बातें बेवकूफी की हैं। कोई भी बुद्धिमान आदमी इस बात को मानने को राजी नहीं हो सकता कि मैं जिस दिन पैदा हुआ उस दिन लिखा था कि मरीन ड्राइव पर फलां-फलां दिन एक छिलके पर मेरा पैर पड़ जाएगा और मैं फिसल जाऊंगा। न तो मेरे फिसलने का चांदत्तारों से कोई प्रयोजन है, न उस छिलके का कोई प्रयोजन है। इन बातों से संबंधित होने के कारण ज्योतिष बदनाम हुआ। और हम सबकी उत्सुकता यही है कि ऐसा पता चल जाए। इससे कोई संबंध नहीं है।
सेमी एसेंशियल… कुछ बातें हैं। जैसे जन्म-मृत्यु सेमी एसेंशियल हैं। अगर आप इसके बाबत पूरा जान लें तो इसमें फर्क हो सकता है; और न जानें तो फर्क नहीं होगा। चिकित्सा की हमारी जानकारी बढ़ जाएगी तो हम आदमी की उम्र को लंबा कर लेंगे–कर रहे हैं। अगर हमारी एटम बम की खोजबीन और बढ़ती चली गई तो हम लाखों लोगों को एक साथ मार डालेंगे–मारा है। यह सेमी एसेंशियल, अर्द्ध अनिवार्य जगत है। जहां कुछ चीजें हो सकती हैं, नहीं भी हो सकती हैं। अगर जान लेंगे तो अच्छा है; क्योंकि विकल्प चुने जा सकते हैं। इसके बाद एसेंशियल का, अनिवार्य का जगत है। वहां कोई बदलाहट नहीं होती। लेकिन हमारी उत्सुकता पहले तो नॉन एसेंशियल में रहती है। कभी शायद किसी की सेमी एसेंशियल तक जाती है। वह जो एसेंशियल है, अनिवार्य है, अपरिहार्य है, जिसमें कोई फर्क होता ही नहीं, उस केंद्र तक हमारी पकड़ नहीं जाती, न हमारी इच्छा जाती है।

ज्योतिष संबंधी अपने व्याखानों में बेहद रोचक कथाओं से अपनी बात स्पष्ट करते हैं। उन्ही कथाओं में से एक उन्होने महावीर स्वामी, कभी उनके शिष्य रहे गोशालक और जीने की इच्छा के बारे में कही है। इस कथा में सुसाइडल इंस्टिक्ट और जीने की प्रबल इच्छा पर बेहद गहरी समझ उन्होने दुनिया को देकर उसे समृद्ध बनाया है।

प्रस्तुत है वही अनूठी कथा।

महावीर एक गांव के पास से गुजर रहे हैं। और महावीर का एक शिष्य गोशालक उनके साथ है, जो बाद में उनका विरोधी हो गया। एक पौधे के पास से दोनों गुजरते हैं।

गोशालक महावीर से कहता है कि सुनिए, यह पौधा लगा हुआ है। क्या सोचते हैं आप, यह फूल तक पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा? इसमें फूल लगेंगे या नहीं लगेंगे? यह पौधा बचेगा या नहीं बचेगा? इसका भविष्य है या नहीं?

महावीर आंख बंद करके उसी पौधे के पास खड़े हो जाते हैं।

गोशालक पूछता है कि कहिए, आंख बंद करने से क्या होगा? टालिए मत।

उसे पता भी नहीं कि महावीर आंख बंद करके क्यों खड़े हो गए हैं। वे एसेंशियल की खोज कर रहे हैं। इस पौधे के बीइंग में उतरना जरूरी है, इस पौधे की आत्मा में उतरना जरूरी है। बिना इसके नहीं कहा जा सकता कि क्या होगा।

आंख खोल कर महावीर कहते हैं कि यह पौधा फूल तक पहुंचेगा।

गोशालक उनके सामने ही पौधे को उखाड़ कर फेंक देता है, और खिलखिला कर हंसता है, क्योंकि इससे ज्यादा और अतर्क्‍य प्रमाण क्या होगा? महावीर के लिए कुछ कहने की अब और जरूरत क्या है? उसने पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया, और उसने कहा कि देख लें। वह हंसता है, महावीर मुस्कुराते हैं। और दोनों अपने रास्ते चले आते हैं।

सात दिन बाद वे वापस उसी रास्ते पर लौट रहे हैं। जैसे ही महावीर और वे दोनों अपने आश्रम में पहुंचे जहां उन्हें ठहर जाना है, बड़ी भयंकर वर्षा हुई। सात दिन तक मूसलाधार पानी पड़ता रहा। सात दिन तक निकल नहीं सके। फिर लौट रहे हैं। जब लौटते हैं तो ठीक उस जगह आकर महावीर खड़े हो गए हैं जहां वे सात दिन पहले आंख बंद करके खड़े थे। देखा कि वह पौधा खड़ा है। जोर से वर्षा हुई, उसकी जड़ें वापस गीली जमीन को पकड़ गईं, वह पौधा खड़ा हो गया।
महावीर फिर आंख बंद करके उसके पास खड़े हो गए, गोशालक बहुत परेशान हुआ। उस पौधे को फेंक गए थे। महावीर ने आंख खोली।

गोशालक ने पूछा कि हैरान हूं, आश्चर्य! इस पौधे को हम उखाड़ कर फेंक गए थे, यह तो फिर खड़ा हो गया है!

महावीर ने कहा, यह फूल तक पहुंचेगा। और इसीलिए मैं आंख बंद करके… खड़े होकर इसे देखा! इसकी आंतरिक पोटेंशिएलिटी, इसकी आंतरिक संभावना क्या है? इसकी भीतर की स्थिति क्या है? तुम इसे बाहर से फेंक दोगे उठा कर तो भी यह अपने पैर जमा कर खड़ा हो सकेगा? यह कहीं आत्मघाती तो नहीं है, सुसाइडल इंस्टिंक्ट तो नहीं है इस पौधे में, कहीं यह मरने को उत्सुक तो नहीं है! अन्यथा तुम्हारा सहारा लेकर मर जाएगा। यह जीने को तत्पर है? अगर यह जीने को तत्पर है तो…मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंक दोगे।

गोशालक ने कहा, आप क्या कहते हैं?

महावीर ने कहा कि जब मैं इस पौधे को देख रहा था तब तुम भी पास खड़े थे और तुम भी दिखाई पड़ रहे थे। और मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंकोगे। इसलिए ठीक से जान लेना जरूरी है कि पौधे की खड़े रहने की आंतरिक क्षमता कितनी है? इसके पास आत्म-बल कितना है? यह कहीं मरने को तो उत्सुक नहीं है कि कोई भी बहाना लेकर मर जाए! तो तुम्हारा बहाना लेकर भी मर सकता है। और अन्यथा तुम्हारा उखाड़ कर फेंका गया पौधा पुनः जड़ें पकड़ सकता है।

गोशालक की दुबारा उस पौधे को उखाड़ कर फेंकने की हिम्मत न पड़ी; डरा।

पिछली बार गोशालक हंसता हुआ गया था, इस बार महावीर हंसते हुए आगे बढ़े।

गोशालक रास्ते में पूछने लगा, आप हंसते क्यों हैं?

महावीर ने कहा कि मैं सोचता था कि देखें, तुम्हारी सामर्थ्य कितनी है! अब तुम दुबारा इसे उखाड़ कर फेंकते हो या नहीं?

गोशालक ने पूछा के आपको तो पता चल जाना चाहिए कि मैं उखाड़ कर फेंकूंगा या नहीं।

तब महावीर ने कहा, वह गैर अनिवार्य है। उखाड़ कर फेंक भी सकते हो। अनिवार्य यह था कि पौधा अभी जीना चाहता था। उसके पूरे प्राण जीना चाहते थे, वह अनिवार्य था। वह एसेंशियल था। यह तो गैर अनिवार्य है, तुम फेंक भी सकते हो, नहीं भी फेंक सकते हो। यह तुम पर निर्भर हे। लेकिन तुम पौधे से कमजोर सिद्ध हुए हो—हार गए।

महावीर से गोशालक के नाराज हो जाने के कुछ कारणों में एक कारण यह पौधा भी था।

जिस ज्‍योतिष की मैं बात कर रहा हूं उसका संबंध अनिवार्य से एसेंशियल से फाउण्‍ड़ेशनल से है। आपकी उत्‍सुकता ज्‍यादा से ज्‍यादा सेमी एसेंशियल तक आती है। पता लगाना चाहते हे कि कितने दिन जियूंगा, मर तो नहीं जाऊँगा, जीकर क्‍या करूंगा। जी ही लुंगा तो क्‍या करूंगा, आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। मरूंगा तो मरने के बाद क्‍या करूंगा। इस तक भी आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती। घटनाओं तक पहुँचती है, आत्‍माओं तक नहीं पहुँचती। जब मैं जी रहा हूं तो यह तो घटना है सिर्फ—जीकर मैं क्‍या हूं। वह मेरी आत्‍मा होगी। हम सब मरेंगे। मरने के मामले में सबकी घटना होगी। लेकिन मरते क्षण में मैं क्‍या होऊंगा, क्‍या करूंगा। मरने के क्षण में हमारी स्‍थिति सब से भिन्‍न होगी। कोई मुस्कराते हुए भी मर सकता है।

साभार : ओशो की पुस्तक – ज्योतिष और अध्यात्म

जुलाई 27, 2011

पाब्लो नेरुदा : आज की रात लिख सकता हूँ

आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
लिख सकता हूँ,
जैसे कि –
आज की रात टूटन भरी है
और दूरस्थ नीले तारों में कम्पन है।
रात की हवा घूम रही है आकाश में
और गा रही है।

आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
मैंने उसे प्रेम किया था,
और कभी उसने भी मुझसे प्रेम किया था।

आज की रात जैसी ही रातों में
मैंने उसे अपनी बाहोँ में भरा था
मैंने उसे चूमा था बार- बार
इसी अथाह आकाश के नीचे।

उसने भी कभी मुझसे किया था प्रेम
और मैंने भी उसे प्रेम किया था,
कैसे कोई उसकी शांत, गहरी आँखों से
प्रेम न करता?

आज की रात मैं लिख सकता हूँ
सबसे दुख भरी पंक्तियाँ,
यह सोचकर कि
अब वह मेरे साथ नहीं है,
यह महसूस करके कि
मैंने उसे खो दिया है।

इस गहरी रात को सुन कर,
जो कि उसकी अनुपस्थिति में
गहरा गई है और भी ज्यादा,
और काव्यमयी शब्द गिरते हैं
आत्मा पर उसी तरह से
जैसे ओस की बूँदें गिरती हैं घास पर,
इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि
मेरा प्यार उसे रोक नहीं पाया।

आज की रात टूटन से भरी है
और वह मेरे साथ नहीं है।

यह सब कुछ है,
दूर कोई गा रहा है,
बहुत दूर,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है
कि इसने उसे खो दिया है।

मेरी दृष्टि खोजती है उसे
मानो उसके पास पहुँचना चाहती हो,
मेरी दिल उसकी राह तकता है,
और वह मेरे पास नहीं है।

पुरानी रातों की तरह ही
इस रात की दूधिया रोशनी भी
चमका रही है इन्ही पेड़ों को
पर उस वक्त्त के हम
वही नहीं हैं।


मैं अब उसे प्रेम नहीं करता,
यह निश्चित है,
पर ओह!
मैंने उसे कैसे प्रेम किया था!
मेरी आवाज हवा के उस झौंके को
तलाशती है जो उसे सुनायी देगी।

किसी और की होगी वह।
वह किसी दूसरे की हो जायेगी,
जैसे कि मेरे चुम्बन थे पहले,
उसकी आवाज़,
उसका चमकता बदन,
उसकी अनंत आँखें,
सब हो जायेंगे किसी और के।

मैं अब उसे प्रेम नहीं करता,
इतना निश्चित है,
पर शायद मैं अब भी प्रेम करता हूँ उसे,
प्रेम भले ही कम समय की बात हो,
पर भूल पाना कितने लम्बे काल की बात है,
क्योंकि यद्यपि आज रात जैसी ही
रातों में मैंने किया था उसे
आलिंगनबद्ध,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं हो पायी है
क्योंकि मैंने उसे खो दिया है,
तब भी यह आखिरी दर्द है
जो वह मुझे दे सकती है
और यह आखिरी कविता है
जो मैं लिख रहा हूँ उसके लिये।

(Pablo Neruda)

हिंदी अनुवाद – …[राकेश]

Pablo Neruda की कविता – Tonight I can write the saddest lines, से अनुवादित

जुलाई 26, 2011

प्यार की बात

मत करो मुझसे इस समय
प्यार की बात,
बहुत मजबूरियाँ हैं,
पिता नहीं हैं
माँ बूढ़ी है
सबसे छोटी बहन फलाँगते हुये
चढ़ गयी है सीढ़ियाँ उम्र की
और छोटा भाई
डिग्रियों का बोझ लादे
बेकार है।

करनी है बहन की शादी
लगाना है भाई को
रास्ते पर
देखना है घर-परिवार,
ऐसे में
क्या करुँ मैं तुमसे
प्यार की बात
ज़िंदगी में बहुत कुछ है
प्यार से ऊपर,
जिन्हे जिम्मेदारियाँ कहते हैं!

मैं भी चाहता हूँ
कुंतला,
येलोकेशी,
जिसके अंग सुते हुये हों साँचें में
एक गौरांगी प्रिया
जो लम्बी हो,
स्लिम हो
गहरी नाभी और सपाट पेट वाली हो
जिसकी कमर मेरी बाहोँ के घेरे में आने से शरमाए
जो मुझे चाहे मेरी तरह।
हर भारतीय नौजवान की तरह
मुझे भी लुभाती है हर यौवना।

मगर यह संभव नहीं है
हकीकतें ज़िंदगी से बड़ी हैं।
देश में
जिस वक्त्त हर मोर्चे पर
हो रहा हो अनवरत भ्रष्टाचार
और जहाँ घर में
बैठी हो जवान बहन
भाई बेकार
वहाँ मैं कर सकता हूँ
केवल
क्रांति
पर नहीं कर सकता प्यार
फिलहाल इस समय एक युवती से।

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 25, 2011

फाइबर : अच्छे पाचन-तंत्र की युक्त्ति

आंतों को स्वस्थ रखने और कैंसर जैसी प्राण-घातक बीमारी से बचाने की विधि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिये भी चिंतन का विषय है। मनुष्य इतना ज्यादा जंक फूड और मीट आदि खाता है कि उसकी आंतों की स्वस्थता एक बड़ा मसला बन जाती है।
आयुर्वेद की भांति आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी अब Animal Food के बजाय Plant Food को तरजीह देने लगा है। खायी हुयी कोई भी खाद्य-सामग्री आंतों से गुजर कर जाती है और खाद्य-सामग्री में उपस्थित अघुलनशील फाइबर roto-rooter की तरह से कार्य करता हुआ पचने से बचे हुये बेकार अवशेषों और शरीर के लिये जहरीले तत्वों को शरीर से बाहर करने में मुख्य भूमिका निभाता है। खाद्य-सामग्री में फाइबर की मात्रा पर्याप्त न होने से कब्ज हो सकता है और अगर किसी को 24 घंटे तक एक बार भी हाजत नहीं होती तो उसे अपनी भोजन सामग्री में फाइबर की कम मात्रा के बारे में चिंतन करना चाहिये और इस मात्रा को कई गुना बढ़ा देना चाहिये।

कई दशकों पहले तक भारत में बहुत ज्यादा चोकर डालकर रोटी सेकी जाती थी जबकि उस समय के लोग शारीरिक श्रम आज के भारतीयों के मुकाबले ज्यादा करते थे, पैदल ज्यादा चलते थे। आज के भारतीय का जीवन आरामतलब हो गया है और गेहूँ का आटा चोकर रहित होकर मैदा बन गया है।

आज के मशीनी सहायता से चलने वाले दौर में ज्यादा अघुलनशील फाइबर भोजन का आवश्यक अंग होना चाहिये और मनुष्य को ऐसे फाइबर को भोजन के साथ ग्रहण करके बाद में पूरे दिन काफी मात्रा में पानी पीना चाहिये।

घुलनशील फाइबर पाचन-तंत्र से रक्त्त में मिश्रित होकर arteries और veins की दीवारों से cholesterol, fats और plaque को हटाता है जिससे कि ब्लड-प्रैशर और दिल की बीमारी से बचाव होता है।

मीट, मछली, अंडों, पोल्ट्री और डेरी पदार्थों जैसी खाद्य-सामग्रियों को खाने से यथासंभव बचना चाहिये और अगर ऐसा न हो सके तो इनकी मात्रा धीरे-धीरे काफी कम कर देनी चाहिये।

फलों, सब्जियों, अनाज, सीडस, बीन्स, और मेवों में फाइबर होता है अतः इनका अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिये और ये खाद्य-पदार्थ फाइबर-सप्लीमेंट्स से हर तरह से श्रेष्ठ विकल्प हैं। इनमें विटामिन्स और मिनरल्स भी ज्यादा होते हैं जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायता करते हैं।

रेड मीट (पोर्क, बीफ, बकरा, लैम्ब) और प्रोसेस्ड मीट (हैम, सलामी, हॉट डॉग, एवम सौसेसेज़ आदि) को एकदम तिलांजलि देनी चाहिये। शोध बताते हैं कि इन्हे खाने से आंतों के कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।

अच्छे पाचन-तंत्र को बनाये रखने के लिये नियमित रुप से व्यायाम या शारीरिक श्रम आवश्यक है। सारे समय का आरामतलब जीवन और अच्छा पाचन-तंत्र नदी के दो किनारों के समान हैं जो मुश्किल से ही मिल सकते हैं।

(चिकित्सा विज्ञान और खाद्य-सामग्री  संबंधी लेखों में दी जानकारी पर आधारित)

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