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फ़रवरी 3, 2017

तुम मेरे बोलने और विरोध करने की स्वतंत्रता मुझसे नहीं छीन सकते : अनुराग कश्यप

anuragkप्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, लेखक एवं अभिनेता अनुराग कश्यप केवल शब्दों के ही धनी नहीं हैं वरन वे बेहद साहसी किस्म के भी हैं| अमिताभ बच्चन ने तो फ़िल्म के परदे पर ही अपनी दमदार आवाज में संवाद बोले कि आज मेरी जेब में पांच पैसे भी नहीं और मैं पांच लाख का सौदा करने निकला हूँ| और वास्तविक जीवन में तो अमिताभ बच्चन ने पूरे समाज की बात छोड़ दीजिए कभी फ़िल्मी दुनिया में कायम किसी गलत बात के लिए भी आवाज नहीं उठायी, और यही हाल कमोबेश हिन्दी फ़िल्म उद्योग के ज्यादातर बड़े नामों का है, किन्तु अनुराग कश्यप जब फ़िल्मी दुनिया में वास्तविक जीवन में भी जब बेहद मुश्किल और हालात से गुजर रहे थे तब भी उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया अमिताभ बच्चन या फ़िल्मी दुनिया में शक्ति केन्द्र बन चुके प्रोडक्शन हाउसेज और बड़े फ़िल्मी लोगों से नेक्सस बनाकर चलने वाले शक्तिशाली फ़िल्म क्रिटिक्स के खिलाफ खुलकर खड़े होकर बोलने में| अनुराग ने परिणाम की परवाह कम ही की है और उनका विरोध और गलत बात से उपजा क्रोध उनकी फिल्मों मे दिखाई भी देता है|
पिछले कुछ समय से जो उन्हें गाल्ट लग रहा है उसके खिलाफ वे मुखर होकर बोल रहे हैं और इंटरनेट संसार के ट्रोल्स (जिनमें पैसा लेकर ऐसा करने वाले किराए के ट्रोल्स भी मौजूद हैं) की भीड़ ने उन पर आक्रमण किये हैं| उन सबका विरोध करते हुए उन्होंने नीचे दिए दो बयान सोशल मीडिया पर चस्पाये|

मैं उस वक्त से अपनी रीढ़ सीधी रखकर खड़ा हो रहा हूँ जब आवाज और चेहरे विहीन लोगों को भीड़ का भ्रम जुटाने के लिए सोशल मीडिया का धरातल उपलब्ध नहीं हुआ करता था| इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरे विरुद्ध क्या कहते हो या क्या करते हो, मुझ पर गालियों से आक्रमण करते हो या मुझ पर शारीरिक आक्रमण करते हो, मुझे जो उचित लगेगा मैं उसे कहता रहूंगा| तुम्हारी भीड़ मुझे भयभीत नहीं कर सकती, मैं तुम्हारी किसी धमकी से नहीं डरता, तुम लाख चीख लो चिल्ला लो, मेरी आवाज तुम्हारी भीड़ के सामूहिक शोर से ज्यादा बुलन्द रहेगी| मैं अपने सच को गले लगाता हूँ और मुझे तुम्हारे दवारा लगाए आरोपों से तनिक भी भय नहीं लगता|
मुझे सिखाया गया है कि अपने विवेकानुसार बोलने, तर्क करने और प्रश्न पूछने की आजादी बाकी सारी आजादियों से बड़ी है और मैं अपने इस अधिकार का उपयोग सदैव करता रहूंगा| तुम मुझे परिभाषित नहीं करते, मैं स्वयं और मेरा काम मुझे परिभाषित करते हैं, और यह परिभाषा कुछ भी हो सकती है लेकिन यह सदैव मेरी अपनी होगीI मैं अपने प्रयासों में सफल बनूँ या असफल, जिस भी मात्रा में ये मुझ तक आएं ये मेरी अपनी होंगीं|
मुझे सिखाया गया है कि उन लोगों के सोच विचार और कर्म पर दृष्टि रखो और उनसे प्रश्न पूछते रहो जिन्हें हमने सरकार बनाने के लिए चुना है| और मैं यह तब से करता आ रहा हूँ जबकि मैं एक विधार्थी ही था और देश के प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह हुआ करते थे] उनके बाद कांग्रेस की सरकारें बनीं फिर भाजपा की बनी| मुझे सिखाया गया कि हमें अपने प्रधानमंत्री से प्रश्न करने, उससे उत्तर पाने की अपेक्षा रखने, उसके निर्णयों और किये पर प्रश्न उठाने, उससे तर्क करने का पूरा अधिकार है और उससे भय तो कदापि नहीं रखना है| अगर किसी को उससे भयभीत होना है तो यह बेहद दुखद बात है क्योंकि उसे हमने देश की खुशहाली के लिए स्वयं चुन कर देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बिठाया है| सम्मान निर्देश देकर प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसे कमाना पड़ता है| मेरा किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं है और कुछ भी मुझे राजनीतिक और सत्ता तंत्र से प्रश्न पूछने से नहीं रोकता|
तुम लोग मुझे कुछ भी कह सकते हो, मेरे ऊपर चिल्ला सकते हो| मेरा अपने संविधान पर पूरा भरोसा है और मुझे पूर्ण-विश्वास अपने अधिकारों और अपनी स्वतंत्रता पर और जहां मुझे आवश्यक लगेगा मैं इनका भरपूर उपयोग करूँगा| तो तुम लोग जितना भी जोर लगा लो, तुम मुझे रोक नहीं पाओगे, तुम्हारे मुझ पर प्रेम उडेलने के लिए धन्यवाद|
और जो लोग ये रट लगा रहे हैं – उस वक्त तुम कहाँ थे, उस घटना के कहाँ तुम क्यों चुप थे, ऐसा पूछने वाली ट्रोल्स की भीड़ के लिए मेरे पास एक ही जवाब है कि मैं यहीं था पर मेरे बोलने की जरुरत इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि जिन्हें बोलना चाहिए या जिनके ऊपर बोलने का उत्तरदायित्व था वे बोल रहे थे| चाहे वह जायरा का मामला हो, जहां सरकार और उसके नुमाइंदें तुरंत बोल पड़े थे और गलत की निंदा की उन्होंने, और चाहे विवेक की फ़िल्म की बात हो जहां राज्य का समर्थन उसके साथ था| | मैं तभी बोलता हूँ जब राज्य सत्ता या तो चुप्पी धारण कर लेती है या मामले को नजरंदाज कर देती है| क्योंकि यही समय होता है जब किसी को बल्कि हम सभी को बोलना चाहिए|
जिस एक वक्त की अपनी चुप्पी का मुझे अभी तक खेद है वह है FTII का मामला| जब यह सब चल रहा था मैं सरकार के साथ काम कर रहा था और मुझे विश्वास दिलाया गया था कि सरकार वास्तव में बिगड़ती जा रही स्थितियों को संभालने की कोशिश में लगी हुयी है और मैंने उनके कहे पर विश्वास किया| और मुझसे ये बातें स्वयं आई एंड बी के कनिष्ठ मंत्री ने कहीं| उन्होंने कहा कि मुझे इस मुददे पर शामिल होने की जरुरत नहीं है और वे लोग समाधान पर काम कर रहे हैं| मैंने उनके कहे पर विश्वास कर लिया| एक और बार मैंने विश्वास किया जब सेंसरशिप का मुद्दा उठा और मैं चुप रहा| और तब मुझे दीवार की ओर ढकेल दिया गया जब “उड़ता पंजाब” प्रदर्शन के लिए तैयार थी और उन सबने मौन धारण कर लिया, मुझसे चुप्पी साध ली| उस वक्त मैं उनके तरीके को समझ पाया कि कैसे शोषण किया जाता है और कैसे मेरे जैसे को उसके विश्वास करने के कारण एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है| तब मैं जागा और तब से मैं यहाँ हूँ और लगातार बोल रहा हूँ उन उन बातों पर जिन पर बहुत से चुप रहे गये| और मैं हर उस बात के लिए बोलूंगा जिस पर बोलना चाहिए और जिस पर सत्ता शक्ति लोगों की चुप्पी चाहती है| मैं इस स्थान पर हूँ और रहूंगा तो तुम सारे लोग जो तोता रटंत लगा रहे हो कि उस वक्त मैं कहाँ था, उस मामले में चुप क्यों रहा, अपनी रट की बत्ती बना लो और ….
धन्यवाद !

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जुलाई 15, 2015

जाति के आंकड़ों से कौन डरता है? …योगेन्द्र यादव

YY1जाति का भूत देखते ही अच्छे-अच्छों की मति मारी जाती है| या तो लोग बिल्ली के सामने आंख मूंदे खड़े कबूतर की तरह हो जाते है, कड़वी सच्चाई का सामना करने के बजाय यह खुशफहमी पालने लगते हैं कि जाति है ही नहीं, या फिर उनकी गति सावन के अंधे की तरह हो जाती है| सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है और इसी तर्ज पर कुछ लोगों को हर बात में जाति ही जाति नजर आने लगती है| सरकार द्वारा सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना के जाति संबंधी आंकड़े सार्वजनिक न करने से उपजी बहस हिंदुस्तानी दिमाग की इसी बीमारी का एक नमूना है| सरकार की सफाई पहली नजर में ठीक लगती है|

जनगणना के आंकड़े बीनने-छानने में वक्त लग जाता है| इसलिए सारे आंकड़े एक साथ जारी नहीं होते, इसमें कई साल लग जाते हैं| पहले सात-आठ साल लगते थे, अब के कंप्यूटरी जमाने में तीन-चार साल लगते हैं| बेहतर होता, सरकार बताती कि किस तारीख तक जाति की गिनती को कागज पर अंतिम रूप दे दिया जायेगा, जातिवार आंकड़े सार्वजनिक कर दिये जायेंगे| पर जाति संबंधी आंकड़े जारी न करने को लेकर सरकार की दलील सुनने पर सरकार की नीयत पर शक होता है|

जब जेटली कहते हैं कि इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी की जानकारी जुटाना है, तो साफ है कि सरकार गोली देने की कोशिश कर रही है| हकीकत यह है कि कांग्रेस या बीजेपी, किसी भी सरकार की मंशा नहीं थी कि जातिवार जनगणना हो| दोनों सरकारों ने इसे रोकने, टालने और मोड़ने की कोशिशें कीं| खैर कहिए कि संसद में बहस हो गयी और सरकार को जातिवार जनगणना की बात सिद्धांत रूप में स्वीकारनी पड़ी| फिर इसे उलझाने के षड्यंत्र रचे गये| जाति की गणना संग सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण भी नत्थी कर दिया| अब कहा जा रहा है कि असली बात तो सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की ही थी, जाति की गणना नहीं|

जब रामविलास पासवान जाति गणना को गोपनीय रखने के तर्क देने लगते हैं, तो सरकार की नीयत पर शक और पुष्ट होने लगता है| व्यक्तिगत आंकड़े गोपनीय होते हैं, आप नहीं पूछ सकते कि फलां व्यक्ति ने अपनी जाति क्या बतायी है! पर जाति विषयक कुल तालिकाओं का जोड़-जमा सार्वजनिक करना जरूरी है| यह सब जानते-बूझते जब पासवान जी कहते हैं कि जातियों की गणना को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो जान पड़ता है कि सरकार ने इस आंकड़े को दबाने की ठान ली है|

जातिवार जनगणना के आंकड़े से सरकार डरती है, बड़े राजनीतिक दल डरते हैं, और डरते हैं सामाजिक न्याय के वे पक्षधर जो जाति की तहों के भीतर झांकने से कतराते हैं| सबके डर की अपनी-अपनी वजहें हैं|

जाति के आंकड़ों से कांग्रेस-बीजेपी और पूरा राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान डरता है. उन्हें डर है कि जाति का जिन्न बोतल से बाहर आ जायेगा| पिछड़ी जातियों की संख्या सार्वजनिक हो जायेगी और लोगों को आधिकारिक रूप से पता चल जायेगा कि जिस जाति समुदाय की संख्या इस देश में सबसे ज्यादा है, वह शिक्षा और नौकरियों के अवसर के मामले में कितना पीछे है|

उन्हें डर यह है कि जाति और नौकरी के संबंध पर से परदा उठ जायेगा| राजनीति, अफसरशाही और अर्थव्यवस्था पर अगड़ी जाति के वर्चस्व का राज खुल जायेगा| वैसे इसमें कुछ छुपा नहीं है, पर जाति के आंकड़ों के सामने आते ही इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो जायेगी| मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद से मोटा-मोटी जानते तो सब ही हैं कि इस देश में अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल लोगों की संख्या 45 से 50 फीसदी और सवर्ण जाति के लोगों की संख्या 16-20 फीसदी के आस-पास है, पर जाति की आधिकारिक गणना के सार्वजनिक होने से शिक्षा और नौकरियों में संख्या के हिसाब से भागीदारी का सवाल भी पुरजोर तरीके से उठेगा| बराबरी के इसी सवाल को बड़ी पार्टियां और सरकार कभी खुल कर सामने नहीं आने देना चाहते|

जाति के आंकड़ों से मंडल और सामाजिक न्याय के पक्षधरों में भी बेचैनी हो सकती है| उन्हें डर है, सर्वेक्षण कहीं यह न दिखा दे कि जाति सामाजिक अन्याय का एक महत्वपूर्ण कारक तो है, पर एकमात्र कारक नहीं|

ओबीसी में आनेवाली जातियों के बीच शिक्षा और नौकरियों में अवसर के लिहाज से चंद जातियों के वर्चस्व की बात जाति जनगणना के आंकड़ों से आधिकारिक रूप से उजागर हो सकती है| यह भी सामने आ सकता है कि एक ही जाति के बीच वर्ग और लिंग-भेद भी अवसरों की असमानता का बहुत बड़ा कारक है| इन बातों के उजागर होने पर सामाजिक न्याय की राजनीति को पुराने र्ढे पर चलाना मुश्किल होगा|

जातिवार आंकड़े को सार्वजनिक करना जातिवाद नहीं है, यह जाति के भूत को वश में करने का तरीका है| आरक्षण पर रुक गयी बहस को सार्थक दिशा में ले जाने का यह एक जरूरी अवसर भी है, बशर्ते हम जाति के भूत से आंखें खोल कर सामना करने को तैयार हों|

(योगेन्द्र यादव – प्रभात खबर में)

फ़रवरी 4, 2015

योगेन्द्र यादव का सर्वे (आप जीतेगी 51 सीटें या अधिक ) : अरविंद केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल द्वारा सोशल मीडियाऔर अन्य स्थानों पर जारी बयान के मुताबिक़ –

Aam Aadmi Party leader and noted psephologist Yogendra Yadav on Wednesday made public the findings of the pre-poll survey commissioned by the party before the Delhi assembly elections.
Survey findings are based on questions to 3188 respondents (the exercise conducted on Jan 31 & Feb 1) in 35 constituencies (odd assemblies picked).

The main findings of the survey are :

Party vote percentage : AAP 46%, BJP 33%, Cong 11 % (finally adjusted from raw data)

Seat projection for parties (likely scenario) : AAP 51, BJHP 15 and Cong + others 4.

आम आदमी जीत रहा है!

7 फ़रवरी को इतिहास लिखा जाने वाला है!

 

AAP survey

दिसम्बर 16, 2014

कुमार विश्वास : दामिनी – तुम्हे श्रद्धांजलि निर्भया लाडो

KV16 दिसंबर 2012 … मन बहुत व्यथित था !

एक पत्रकार ने अभी-अभी फोन पर बताया था कि पांच-छह दरिंदो ने एक लड़की के साथ बेहद क्रूर बलात्कार किया है ! उसने जो-जो बताया उसे सुन कर दिमाग गुस्से से दहक उठा था ! उस दिन मेरा ड्राइवर छुट्टी पर था सो मैं खुद ड्राइव कर के सफदरगंज-अस्पताल पहुँचा !

ऐसी परिस्थिति का सामना करने में अजीब सा लग रहा था तो मैंने अपनी साथी शाज़िआ इल्मी और डॉ वर्तिका नंदा को भी घटना की सूचना दे कर बुला लिया ! हम तीनो दामिनी के माँ-पिता जी से मिले, उसे बेड पर निश्छल आँखें बंद किये लेटे देखा ! वहाँ मौजूद डॉ मुझे पहचानते थे, उन्होंने जो बताया उसे सुन कर आखँ छलकने लगीं, आँसूं रोकना मुश्किल पड़ गया !

बाहर प्रेस से सामना हुआ तो एक चैनल के कांग्रेसी-पत्रकार (जो आजकल एक पूर्व कांग्रेसी केंद्रीय मंत्री का निजी सचिव है) ने मुझ से कैमरे पर बदतमीज़ी की ! उसने कहा “आप लोग मामले को हवा देना चाहते हैं, शर्म करिये, इस परेशान परिवार को अपने हाल छोड़ दीजिये !”

मैं उलझन-दुःख और बेचारगी में लिपटा घर वापस आ गया !

दो दिन बड़ी बेचैनी से बीते! साथी कह रहे थे, हमें कुछ नहीं करना चाहिए, गलत लिया जायेगा मीडिया द्वारा !

21 दिसंबर की रात मैंने फेसबुक पर लिखा कि मैं इस लोकतंत्र  के सबसे बड़े बाबा “महामहिम राष्ट्रपति” जी घर जा रहा हूँ देश की इस बेटी की चीखों का हिसाब माँगने, जिसे आना हो विजय-चौक आ जाये !

सुबह-सुबह कुछ सौ लड़के-लड़कियाँ साथ आये ! वक़्त बढ़ते-बढ़ते गुस्से से तमतमाते हज़ारों युवा “we want justice” का नारा लगाते विजय-चौक पर फ़ैल गए !

सुबह 10 बजे तक पुलिस ने दर्ज़न बार ठंडा-गन्दा पानी फेंका और लगभग 7 बार लाठियाँ चलाईं ! 11 बजे के आस-पास एक लाठीचार्ज में दिल्ली-पुलिस के एक पुराने परेशान अफसर नें RPF की टुकड़ी को विशेष दिखा कर इशारा किया ! राष्ट्रपति भवन के दायीं और लॉन की झाड़ियों के पास गिरा कर RPF ने बड़ी बेहरमी से तब तक लाठियां मारी जब तक ANI का कैमरा भागता-भागता वहाँ आ नहीं गया ! दिन भर ठंड भीगा शरीर लाठियाँ खा कर जगह-जगह से सूज गया पर वहाँ से कोई हटने को तैयार नहीं था ! हारकर पुलिस ने रात होने का इंतज़ार किया और आखिर रात 12 बजे एक बार फिर लाठीचार्ज कर के सब को खदेड़ दिया !

अगले कुछ दिन सरकार और हमारे बीच इसी तरह के संघर्ष में बीते!

आधी रात दामिनी के माता-पिता से मिल कर आया कि हम कुछ कर सकते हैं क्या उसकी चिकित्सा के लिए !

सरकार की नीचताओं पर शक था सो सिंगापुर में अपने एक दोस्त को छूटी दिला कर हॉस्पिटल के आस-पास बने रहने को कहा !

एक दिन सुबह 4 बजे उसका फ़ोन आया ! नींद में सुना “भाई वो नहीं बची“!

ऐसा लगा जैसे घर का कोई मर गया !

दिमाग सुन्न पड़ गया !

आँखें भर आई.……दो साल हो गए हैं !

अभी कुछ दिन पहले एक लड़की से बलात्कार करते हुए एक दरिंदे ने कहा “मुहँ खोला तो दामिनी की तरह “—–” रॉड डाल दूँगा ” !

पता नहीं क्या बदला है ?

क्या बदलना है ?

सरकार-चेहरे-घटना ?

हमें माफ़ कर दो लाड़ो !

अगले जनम मेरी बिटिया बन कर मेरे आँगन में आना !

(कुमार विश्वास)

मई 30, 2014

योगेन्द्र यादव : 21वीं सदी में नहीं चल सकती 20वीं सदी की राजनीति

Yogendra Yadav‘प्रभात खबर’ के रंजन राजन ने राजनीतिक विश्‍लेषक व ‘आप’ नेता योगेंद्र यादव से लंबी बातचीत की|

रंजन – 2014 के जनादेश को आप कैसे देखते हैं? क्या इसे आप ‘मोदी लहर’ का परिणाम मानते हैं?

योगेन्द्र – ‘चुनावी लहर’ का मतलब है चुनाव क्षेत्रों और राज्यों की सीमाओं को लांघ कर देश के बड़े इलाके में एक जैसा रुझान दिखना. नतीजे में जब भी ऐसी स्थिति दिखे, तो उसे हम ‘चुनावी लहर’ का नाम दे सकते हैं. जैसे 1971 में हुआ, 1977 में हुआ, 1984 में हुआ. इस लिहाज से 2014 के जनादेश को ‘चुनावी लहर’ कहना बिल्कुल सही होगा. यह सही है कि इस लहर में नरेंद्र मोदी की भी भूमिका है, लेकिन इसे ‘मोदी लहर’ मान लेना या ‘मोदी लहर’ की संज्ञा देना, इस चुनावी लहर के चरित्र को समझने में चूक होगी|
दरअसल, 2014 की ‘चुनावी लहर’ के तीन प्रमुख कारक हैं. पहला, जो शायद सबसे बड़ा कारक था, यूपीए-2 के राज ने देश में एक तरह का नैतिक और राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया था. इसलिए जनता के मन में असंतोष नहीं, बल्कि गुस्सा घर कर गया था. लोग कह रहे थे कि यूपीए को छोड़ कर जो मर्जी सत्ता में आ जाये. दूसरा, इस गुस्से में लोग एक पुख्ता और जाना-पहचाना विकल्प भी ढूंढ रहे थे. इस लिहाज से भारतीय जनता पार्टी एक जानी-पहचानी पार्टी थी, पायदार दिखाई दे रही थी और लोगों को भरोसा था कि यह पार्टी देशभर में जीत हासिल कर सकती है, 272 के आंकड़े को छू सकती है, केंद्र में सरकार बना सकती है|

नरेंद्र मोदी इस चुनावी लहर के तीसरे कारक थे. उनका योगदान यह था कि उन्हें देश में एक मजबूत नेता के रूप में पेश किया गया. ऐसे में मोदी की छवि ने चुनावी रुझान को एक लहर में तब्दील कर दिया. मोदी की छवि में लोगों को वह शून्य भरने की संभावना दिखाई देने लगी. मनमोहन सिंह के लचर एवं कमजोर व्यक्तित्व के सामने लोग अगर एक मजबूत एवं निर्णायक व्यक्तित्व देखना चाह रहे थे, तो नरेंद्र मोदी की छवि ने उस कमी को पूरा किया. मोदी की छवि में लोगों को भविष्य के लिए आशा दिखाई दी. जिन-जिन बातों को लेकर लोगों के मन में एक कसक थी, वह पूरी होती दिखायी दी. ऐसा अकसर होता है कि इस तरह की किसी छवि में जो कोई व्यक्ति जो कुछ भी ढूंढ़ना चाहता है, ढूंढ़ लेता है|

रंजन – नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे किये हैं, उसके आधार पर बहुत से लोगों को लग रहा है कि देश में ‘अच्छे दिन’ बस आने ही वाले हैं. आप कितने आशान्वित हैं?

योगेन्द्र – सपने देखना अच्छी बात है. जब कोई समूह या देश सपने देखता है, तो उससे उसका मनोबल बढ़ता है. उसकी ऊर्जा बढ़ती है. उसका मन बड़ा होता है. इसलिए अगर आज देश के एक बड़े वर्ग में आशा है, तो मैं न तो उस आशा से झगड़ना चाहूंगा और न ही उस आशा को पंचर करना चाहूंगा. अगर आज इस देश के लोगों को नरेंद्र मोदी में आस्था है, तो जनता में आस्था रखने के नाते मुङो उन लोगों का सम्मान करना सीखना चाहिए. हालांकि मुङो यह डर भी है कि लोगों की आशाएं कहीं खोखली न साबित हो. मुङो डर है कि कहीं नरेंद्र मोदी के कई दावे महज लफ्फाजी न साबित हों. हालांकि मैं चाहूंगा कि मैं इसमें गलत साबित होऊं|

मैं समझता हूं कि देश में अगर अच्छे दिन आ सकते हैं और हमारी पार्टी उसकी वाहक नहीं बनती है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है. जो भी पार्टी वाहक बने, देश का भला हो यह बड़ी बात है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी एवं अप्रत्याशित पराजय के प्रमुख कारक क्या-क्या रहे?

योगेन्द्र – इस बार के जनादेश को सिर्फ कांग्रेस की हार कहना अपर्याप्त होगा. उसकी यह हार अप्रत्याशित और बहुत गहरी ही नहीं थी, बल्कि साथ-ही-साथ यह दीर्घ काल में कांग्रेस के पतन का संकेत देती है. यूपीए की सरकार को दो मौके मिले. चूकि उसकी पहली बार की जीत भी अप्रत्याशित थी, इसलिए उस सरकार के विरुद्ध असंतोष उभरते-उभरते भी समय लगा. चूंकि यूपीए-1 की जीत अप्रत्याशित थी, इसलिए उसका आशा-निराशा का चक्र सामान्य सरकार की तरह नहीं चला. उस सरकार से आशा बंधनी देर से शुरू हुई और यूपीए की पहली सरकार खत्म होने तक भी आशा का माहौल बना ही रहा. लेकिन यूपीए-2 की शुरुआत होते ही निराशा आरंभ हो गयी. यह निराशा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते चरम सीमा पर पहुंची और 2014 का चुनाव आते-आते नैराश्य में बदल गया|

जनता कांग्रेस से निराश ही नहीं थी, जनता को कांग्रेस से असंतोष ही नहीं था, बल्कि उसमें गुस्सा घर कर गया था. लोग किसी भी सूरत में कांग्रेस से छुटकारा पाना चाह रहे थे. सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की ईमानदारी की चमक उतर चुकी थी. लोग इन्हें एक भ्रष्ट सरकार के मुखौटे के रूप में देखने लगे थे. राजनीतिक रूप से इस सरकार में किसी दिशा बोध का सर्वथा अभाव था. वह चाहे कश्मीर का मसला हो या तेलंगाना का, कांग्रेस सरकार एक के बाद एक आत्मघाती कदम उठाती चली गयी. सरकारी कामकाज के मामले में भी सबकुछ ठहर गया था. एक तरफ आम आदमी परेशान था, तो दूसरी तरफ उद्योगपति और पूंजीपति भी निराश हो गये थे. ऐसे में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार अप्रत्याशित नहीं थी. लेकिन कांग्रेस का आंकड़ा 50 से भी नीचे गिर जायेगा, इसकी कल्पना मैंने भी नहीं की थी|

कांग्रेस की यह अभूतपूर्व हार एक सामान्य चुनावी हार नहीं है, कि पार्टी इससे पांच साल में उबर जायेगी. यह कांग्रेस के पतन का एक नया दौर हो सकता है. 1989-91 के दौरान कांग्रेस इस देश में राजनीति की धुरी की जगह कई राष्ट्रीय पार्टियों में से एक पार्टी बन गयी थी. उसके बाद से जिस-जिस राज्य में कांग्रेस एक बार बैठ गयी, वहां वापस खड़ी नहीं हो पायी. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु इसके बड़े उदाहरण हैं. मुङो लगता है कि इस चुनाव के बाद देश की जो मध्य पट्टी है, कांग्रेस उसमें बहुत बड़े संकट में आ सकती है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में कांग्रेस बीते 15 साल से विपक्ष में रही है, लेकिन किसी भी तरह का विपक्ष देने में असमर्थ रही है. इस बार कांग्रेस का इस सारी पट्टी से सफाया होने के बाद संभव है कि कांग्रेस इस इलाके में बैठ जाये और फिर कभी उबर नहीं पाये. यही दिल्ली और हरियाणा में भी संभव है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस विपक्ष में तो है, लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़क पर विपक्ष की भूमिका निभा पायेगी, इसमें मुङो संदेह है. और अगर ऐसा हुआ तो राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के अप्रासंगिक होने की संभावना पैदा हो गयी है|

रंजन – कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि ‘आप’ के चुनाव मैदान में उतरने से भाजपा विरोधी मतों का बिखराव बढ़ा, जिससे भाजपा को बहुमत पाने में सुविधा हुई. दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि आप ने कांग्रेस के मुसलिम वोट बैंक में सेंध लगायी, जिससे उसकी सबसे बड़ी हार हुई. आप इन विचारों को कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – यह बहुत ही सतही समझ है. कौन किसके वोट काट रहा है, यह समझने के लिए हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि उस वोटर ने पिछले चुनावों में किसे वोट दिया था. हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि वह वोटर अगर आम आदमी पार्टी मैदान में नहीं होती तो किसे वोट देता. यह कांग्रेस की खुशफहमी है कि जिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, वे ‘आप’ के नहीं रहने पर कांग्रेस को वोट देते. हकीकत यह है कि उनमें से काफी लोगों ने पिछली बार कांग्रेस को भले ही वोट दिया हो, लेकिन उनमें से एक बड़ा वर्ग इस बार के चुनाव में कोई विकल्प नहीं होने पर झक मार कर भाजपा को ही वोट देता. इसीलिए आम आदमी पार्टी से भाजपा जितनी बौखलायी हुई थी, उतनी तो कांग्रेस भी नहीं बौखलायी थी|

दिल्ली विधानसभा चुनाव पर गौर करें. अगर उसमें आम आदमी पार्टी चुनाव नहीं लड़ती, तो जाहिर है भाजपा को बहुत बड़ी सफलता मिलती. अब तो दिल्ली का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया है और कम-से-कम दिल्ली के बारे में तो हमें यही कहना चाहिए कि वहां कांग्रेस ही आम आदमी पार्टी के वोट काट रही है. अगर कांग्रेस ने एक-दो संसदीय क्षेत्रों में वोट न काटा होता, तो शायद लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली में ‘आप’ को एक-दो सीटें मिल जाती. लेकिन राजनीति का गुणा-भाग केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता. मैं समझता हूं कि अगर आम आदमी पार्टी चुनाव में नहीं होती, तो देश के लिए, देश के भविष्य की दिशा ढूंढनेवाले काफी लोगों का मन नैराश्य में डूब जाता. नरेंद्र मोदी में देश का भविष्य न देखनेवाले लोगों को इस चुनाव में देश के भविष्य के लिहाज से कुछ नजर ही नहीं आता. आम आदमी पार्टी ने इस देश के आदर्शवादियों, और खास कर देश के युवाओं, के मन में देश के भविष्य के प्रति एक उम्मीद जगायी है. यह किसी भी चुनावी गणित से बड़ी बात है|

रंजन – इस बार के जनादेश में वामपंथी दलों की जमीन और खिसकी है. अब वाम दलों की राजनीति की दशा-दिशा और भविष्य की चुनौतियों को आप कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – पिछले दो-तीन दशकों से लेफ्ट की राजनीति धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है. लेफ्ट राष्ट्रीय ताकत की जगह पर एक क्षेत्रीय ताकत में तो पहले ही बदल चुका था, अब उन क्षेत्रों से भी धीरे-धीरे फेल होता जा रहा है. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट खत्म भले ही न हो रहा हो, लेकिन ममता बनर्जी से हार के बाद पहले जैसा दबदबा कायम नहीं कर सकता. केरल में तो एलडीएफ एक वामपंथी शक्ति बचा ही नहीं. उधर, मानिक सरकार पुरानी राजनीतिक पूंजी और अपने व्यक्तिगत प्रताप से चुनाव जीत रहे हैं|

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जनाभिमुखी और गरीब व्यक्ति के सपनों की राजनीति की जगह नहीं बची है. मैं मानता हूं कि ऐसी राजनीति भारत के लोकतंत्र के केंद्र में है और रहेगी. लेकिन मैं मानता हूं कि लेफ्ट की ‘ऑर्थोडॉक्स राजनीति’ आज जन आकांक्षाओं का वाहक नहीं बन पा रही है. जनता की आकांक्षाओं को एक नयी राजनीति की तलाश है. पिछले दो-तीन दशकों के जनांदोलन इसी तलाश का परिणाम हैं. और मैं चाहता हूं कि आम आदमी पार्टी भी इसी तलाश का वाहक बने|

रंजन – आप विकल्प की बात करते हैं, तो आपकी आर्थिक नीतियां कांग्रेस और भाजपा से किस तरह अलग हैं? क्या इस चुनाव में वामपंथी दलों की ओर से खाली हुई राजनीतिक जमीन को भरने की दिशा में आपकी पार्टी बढ़ेगी?

योगेन्द्र – किसी भी नयी राजनीति की यह नियति होती है कि उसे शुरुआत में पुराने चश्मे से ही देखा जाता है. हमारे साथ भी यही हो रहा है. हम स्थापित राजनीतिक खांचों के बाहर अपनी राजनीति स्थापित कर रहे हैं, लेकिन हमारे हर कदम को अब भी उन्हीं पुराने राजनीतिक खांचों में फिट करने की कोशिश की जाती है. मैंने बार-बार कहा है कि हमारी राजनीति न तो लेफ्ट की है, न ही राइट की|

आर्थिक नीतियों को लेकर इस देश में जो जड़ता आयी है, आर्थिक नीतियों के बारे में सोच जिस तरह से दो खांचों में बंध गयी है, हम उससे बाहर निकलना चाहते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हम सामाजिक न्याय या आर्थिक समता के विरुद्ध हैं. इस देश का संविधान समता, न्याय और बंधुत्व की बुनियाद पर ही खड़ा है. लेकिन हम अंतिम व्यक्ति की भलाई को किसी पुराने वैचारिक खांचे से बांध कर नहीं देखते. हमारा साध्य है अंतिम व्यक्ति के हाथ में संसाधन पहुंचना, लेकिन हमारे साधन और औजार किसी बने-बनाये मॉडल से नहीं आते. अंतिम इनसान की खुशहाली अगर सरकार के दखल देने से बेहतर होती है, तो हम दखल के पक्ष में हैं और अगर सरकार के हाथ खींचने से बेहतर होती है, तो हम हाथ खींचने के पक्ष में हैं|

कुछ सेक्टर हैं- जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य-जहां हम सरकार की पहले से ज्यादा दखल चाहते हैं, लेकिन व्यापार और उद्योग में हम चाहेंगे कि सरकार कुछ न्यूनतम नियमन के अलावा बहुत ज्यादा दखलंदाजी न करे. यह बात चूंकि नयी है, इसलिए लोगों को अटपटी लगती है और वे कहते हैं कि हमारे विचार स्पष्ट नहीं हैं. लेफ्ट के साथी सोचते हैं कि हम अभी उनकी तरह हो नहीं पाये हैं. सच यह है कि हम उस तरह के वैचारिक ढांचे से बंधना ही नहीं चाहते. बीसवीं सदी की विचारधाराओं के गिरफ्त से मुक्त हुए बिना इक्कीसवीं सदी के विचारों को, इक्कीसवीं सदी की राजनीति को स्थापित नहीं किया जा सकता|

रंजन – इस जनादेश के बाद विरोध की राजनीति को आप गैर-कांग्रेसवाद से गैर-भाजपावाद में शिफ्ट होते देख रहे हैं? क्या विरोध की राजनीति को दिशा देने के लिए आम आदमी पार्टी अन्य दलों के बीच तालमेल का प्रयास करेगी, या चुनाव से पहले की एकला चलो की नीति पर ही चलती रहेगी?

योगेन्द्र – नरेंद्र मोदी की राजनीति के विरोध के दो अलग-अलग स्वरूप होंगे और इसकी दो अलग-अलग जमीन होगी. इसमें कोई शक नहीं है कि संसद के भीतर गैर-भाजपाई ताकतें किसी न किसी किस्म का गैर-भाजपावाद चलाने की कोशिश करेंगी. यह कोई नयी चीज नहीं है. पिछले तीस साल में कांग्रेस, वामपंथी दलों और कुछ अन्य संगठनों ने मिल कर इस तरह की कोशिशें कई बार की है|

लेकिन इसके अनुभव ने हमें सिखाया है कि भाजपा के विरोध के लिए मतलबी गंठजोड़ बनाने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि इससे भाजपा और ज्यादा मजबूत होती है. इस प्रयोग ने यह भी सिखाया है कि भाजपा विरोध के नाम पर सेक्युलर खेमा बनाने की कोशिश भी एक ढकोसला बन कर रह जाती है. कांग्रेस, राजद, सपा सरीखे पार्टियों का सेक्युलरिज्म मुसलमानों को बंधक बनाये रखने का षड्यंत्र है. जनता इसे खारिज कर चुकी है. मुङो नहीं लगता कि इस तरह के किसी प्रयास से भाजपा का विकल्प बनाने में कोई मदद मिलेगी. संसद के भीतर एकाध बार कुछ छोटी सफलता मिल सकती है, लेकिन इससे भाजपा की राजनीति का मुकाबला करने की ऊर्जा खड़ी नहीं हो सकती|

आम आदमी पार्टी कांग्रेस विरोध या भाजपा विरोध के नाम पर अवसरवादी गंठबंधनों के खिलाफ रही है. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब संसद में भाजपा के खिलाफ कभी-कभार बोल देना या उसके कुछ कानूनों का विरोध करना भर नहीं होगा. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब होगा उस तरह की राजनीति का विरोध करना, जिसकी प्रतीक आज भाजपा है. हमारे लिए भाजपा के विरोध का मतलब होगा हर किस्म के भ्रष्टाचार का विरोध करना, हर किस्म की सांप्रदायिकता का विरोध करना, देश में लोकतंत्र के हनन का विरोध करना और एक नंगे किस्म के पूंजीवाद का विरोध करना. आज भाजपा इन खतरों का प्रतीक है, लेकिन सिर्फ भाजपा इस अपराध की दोषी नहीं है|

इसमें देश का पूरा सत्ता प्रतिष्ठान शामिल रहता है. इसलिए विपक्ष की राजनीति हमारे लिए ऐसी राजनीति नहीं हो सकती कि हम सिर्फ भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में बोलें, और कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर चुप हो जायें. सिर्फ भाजपा की सांप्रदायिकता के बारे में बोलें और सपा या एमआइएम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन) की सांप्रदायिकता पर मौन साध लें. विपक्ष की राजनीति हमारे लिए केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगी. मैं समझता हूं कि अगले पांच साल तक मोदीमय भाजपा के विरोध का असली मंच संसद नहीं होगा, बल्कि इस लड़ाई को सड़क और मैदान पर लड़ना होगा. मुङो नहीं लगता कि यह कांग्रेस के बस की बात है|

इसलिए आम आदमी पार्टी को यह बीड़ा उठाना पड़ेगा. संसद में भले ही हम एक छोटी विपक्षी पार्टी के रूप में गिने जायेंगे, लेकिन अगले पांच साल में आम आदमी पार्टी जमीन पर इस देश की प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में उभरेगी. जहां तक दूसरी पार्टियों के बीच तालमेल का सवाल है, मेरे अब तक के जवाब में ही इसका उत्तर अंतर्निहित है, यानी कि भाजपा विरोध के नाम पर भानुमति का कुनबा जोड़ने की राजनीति में हमारा विश्वास नहीं है|

रंजन – भाजपा के कुछ नेताओं ने कहा है कि इस वक्त भाजपा विरोध की बात करना 2014 के जनादेश का अपमान होगा?

योगेन्द्र – मैं समझता हूं कि लोकतंत्र में यह कहना ही लोकतंत्र का अपमान है, कि किसी भी दल का विरोध करना जनादेश का अपमान होगा. मैं समझता हूं कि अगर कोई पार्टी इतना बड़ा जनादेश लेकर सत्ता में पहुंची है, तो उसे स्वयं इस बात की चिंता होनी चाहिए कि उसके किसी गलत कदम का अच्छा विरोध हो पायेगा या नहीं. विपक्ष तो लोकतंत्र की आत्मा है. उससे डरना लोकतंत्र से डरना होगा|

रंजन – यह भी कहा जा रहा है कि इस बार के जनादेश में यूथ फैक्टर काफी अहम रहा है. देश के करोड़ों युवा मतदाताओं की आकांक्षाएं अलग तरह की हैं और उनमें बड़ी उम्मीद है नरेंद्र मोदी को लेकर, इसलिए उन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ कर विकास के नाम पर, मोदी सरकार बनाने के लिए मतदान किया है. इस संबंध में आपकी क्या राय है?

योगेन्द्र – मैंने इस बार के चुनाव के आंकड़े ठीक से देखे नहीं हैं, क्योंकि मैं किसी भी सव्रेक्षण की टीम में शामिल नहीं था. इसलिए मैं प्रमाण के साथ तो नहीं कह पाऊंगा, लेकिन मुङो इस तरह के दावों में अतिशयोक्ति नजर आती है. इसमें कोई शक नहीं कि भारत में युवाओं और युवा मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. और इसमें भी कोई शक नहीं कि बाकी मतदाता-समूहों की तुलना में युवाओं में भाजपा के लिए आकर्षण अपेक्षाकृत ज्यादा है, लेकिन इतना भर से युवा वोट या युवा शक्ति का भाजपामय हो जाना जैसे निष्कर्षो पर हम नहीं पहुंच सकते. हमें अभी देखना है कि युवाओं का यह रुझान झणिक है या दीर्घकालिक. इसके बाद ही किसी बड़े निष्कर्ष पर हम पहुंच सकते हैं|

रंजन – पहले माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का जाति आधारित मजबूत जनाधार है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि खासकर हिंदी पट्टी में यूथ फैक्टर इतना कारगर रहा कि क्षेत्रीय दलों के किले ध्वस्त हो गये. इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का जनाधार क्यों खिसक गया और इसके बाद क्षेत्रीय दलों की राजनीति के समक्ष क्या प्रमुख चुनौतियां हैं?

योगेन्द्र – इस चुनावी लहर में भाजपा या भाजपा समर्थक दलों को छोड़ कर बाकी ज्यादातर दलों को भारी नुकसान हुआ है. खास कर उत्तर भारत के क्षेत्रीय दल इसी का शिकार हुए हैं. हालांकि यह बात दक्षिण और पूर्वी भारत के क्षेत्रीय दलों पर पूरी तरह लागू नहीं होती है. अन्ना द्रमुक, द्रमुक, वाइएसआर की पार्टी, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति, बीजेडी और ममता बनर्जी की पार्टी को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. अगर नुकसान हुआ तो मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के क्षेत्रीय दलों को. इसलिए यहां उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रीय दलों की हार पर अलग से गौर करना बेहतर होगा|

मैं समझता हूं कि इन दोनों राज्यों में मंडलीकरण के बाद की जातीय राजनीति अपने एक चरम बिंदु पर पहुंच कर अप्रासंगिक होने लगी थी. जातिगत राजनीति की यही नियति है कि एक जाति आधारित वोट बैंक मजबूत होते-होते एक ऐसे बिंदु तक पहुंच जाती है, जहां राजनीतिक जड़ता आ जाती है और जहां लोगों को समझ आने लगता है कि इस जड़ता से बाहर निकलने की जरूरत है. खासकर उत्तर प्रदेश में लोगों ने पिछले दस-पंद्रह वर्षो में सभी मुमकिन राजनीतिक समीकरण इस्तेमाल कर लिये थे- अगड़ों का, पिछड़ों का, दलित, यादव, मुसलिम आदि सभी इस्तेमाल हो चुके थे. और यह यात्रा एक ठहराव के बिंदु पर पहुंच गयी थी|

इस बार भाजपा की बड़ी विजय उसके परंपरागत सामाजिक समीकरण की विजय नहीं है. वह सभी जाति-समुदायों के एक बड़े हिस्से को जोड़ कर बेहतर सरकार बनाने की राजनीति की विजय है. इस लिहाज से नरेंद्र मोदी की विजय में कहीं जातिवादी राजनीति से मुक्त होकर एक बेहतर सरकार और बेहतर राजकाज की इच्छा शामिल थी. मुङो नहीं लगता कि भाजपा या नरेंद्र मोदी वास्तव में इस इच्छा को पूरा कर पायेंगे, लेकिन इस इच्छा का होना दोनों राज्यों में, खास तौर पर उत्तर प्रदेश में एक सार्थक राजनीतिक संभावना की ओर इशारा कर रहा है|

रंजन – यदि जातीय राजनीति अप्रासंगिक हो जायेगी, तो कई क्षेत्रीय दलों का ‘वोट बैंक’ ही खत्म हो जायेगा. ऐसे में इस जनादेश के बाद क्षेत्रीय दलों को अपनी राजनीति को किस तरह से आगे बढ़ाना होगा?

योगेन्द्र – इस विषय में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय, सभी सभी दलों को विचार करने की जरूरत है. खास कर उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति एक खास दौर से गुजर चुकी है. सामाजिक न्याय के नारे के तहत हुई राजनीति के इस दौर में लोगों के जीवन के, रोजमर्रा के, मुद्दों में बेहतरी के सवाल गौण हो गये थे. मोदी की जीत इस ओर इशारा करती है कि इन सवालों को दबाया नहीं जा सकता. यानी क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, सभी दलों को खुद को आम लोगों की जिंदगी में खुशहाली के सपने से जोड़ना होगा. मैं नहीं मानता कि नरेंद्र मोदी इस काम को पूरा कर पायेंगे. हालांकि वे इस सपने के वाहक बनते हुए दिखाई दे रहे हैं, इस बात से मैं इनकार नहीं कर सकता|

रंजन – क्षेत्रीय दलों की ओर से सामाजिक न्याय का नारा भी तो इसी तर्क के साथ दिया जाता है कि संसाधनों के बंटवारे में जो लोग अपना हिस्सा पाने से वंचित रह गये हैं, उन्हें उनका हक दिलायेंगे. तो इस जनादेश से क्षेत्रीय दलों को क्या सबक लेने की जरूरत है|

योगेन्द्र – सामाजिक न्याय की राजनीति ने इस प्रकार के नारे तो दिये, लेकिन व्यवहार में वह राजनीति केवल प्रतीकात्मक हिस्सेदारी की राजनीति बन गयी. इसमें चेहरों में तो हिस्सेदारी हुई, यानी कितने एमएलए किस समुदाय के बनेंगे, कितने मिनिस्टर किसके बनेंगे; लेकिन विकास के फल में हिस्सेदारी का माहौल नहीं बन पाया|

मैं समझता हूं कि बिहार में शुरू में यह सबक नीतीश कुमार सरकार ने सीखा, कि लोगों को सिर्फ सामाजिक न्याय का नारा नहीं चाहिए, उसे सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार आदि में हिस्सेदारी भी चाहिए, हालांकि बाद में वे भी इस पर पूरी तरह कायम नहीं रह पाये. मुङो लगता है कि इस बार के जनादेश से खास कर उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा और बिहार में राजद को यह सबक सीखना होगा कि जब तक वे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के सवालों पर कुछ करेंगे नहीं, तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक सामाजिक न्याय की बात करने से उनकी राजनीति बहुत दिन तक टिकनेवाली नहीं है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से काफी कम क्यों रहा?

योगेन्द्र – आम आदमी पार्टी के लिए यह जनादेश न तो निराशाजनक रहा है और न ही बहुत अप्रत्याशित. संभव है कि हमारे कुछ समर्थकों, शुभचिंतकों के मन में बड़ी उम्मीदें बंध गयी थीं. लेकिन दरअसल अपने पहले लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी से इससे ज्यादा अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए. पिछले तीस-चालीस साल में केवल दो नयी राष्ट्रीय पार्टियां इस देश में स्थापित हुईं- भाजपा और बसपा. उन दोनों पार्टियों के पहले लोकसभा चुनाव पर आप गौर कीजिए. 1984 में भाजपा ने अपना पहला राष्ट्रीय चुनाव लड़ा था, उसे सिर्फ दो सीटें आयी थीं. लेकिन चूंकि उसमें एक पुरानी पार्टी का अंश शामिल था, इसलिए उसे सात फीसदी वोट हासिल हो गये थे. 1989 में बसपा ने पहली बार राष्ट्रीय चुनाव लड़ा, उसे दो सीटें आयीं और दो प्रतिशत वोट हासिल हुए. इस तरह पहले चुनाव के लिहाज से हमारा प्रदर्शन बुरा नहीं है|

हां, हमें दिल्ली में निराशा जरूर हुई. दिल्ली में हमारा वोट प्रतिशत भले ही बढ़ा हो, लेकिन हमें कोई सीट नहीं मिली और भाजपा का फासला हमसे बढ़ा. हमें वाराणसी में भी निराशा हुई. मैंने सोचा था कि दिल्ली के बाद हमें हरियाणा में एक नयी शुरुआत मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. लेकिन इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को जो हासिल हुआ है, वह कम नहीं है. चार सीटें अपने-आप में कम जरूर लगती हैं, लेकिन दिल्ली से बाहर एक नये राज्य-पंजाब-में हमें कामयाबी मिली है|

रंजन – इस चुनाव में ‘आप’ को उम्मीद से काफी कम सीटें मिलने पर कुछ विश्लेषक दो बड़े कारण गिना रहे हैं. पहला, दिल्ली में 49 दिनों में ही सरकार चलाने से इनकार कर देना और दूसरा, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव तथा ज्यादातर फैसले अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया जैसे कुछेक नेताओं द्वारा मनमाने तरीके से लिया जाना. आप क्या कहेंगे?

योगेन्द्र – जहां तक दिल्ली सरकार के इस्तीफा देने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इस्तीफा देने से दिल्ली में भी और दिल्ली के बाहर भी बड़े तबके को धक्का लगा. उन्हें लगा कि कोई सरकार, जो उनके लिए बहुत सारे काम कर सकती थी, अचानक चली गयी. और पूरे चुनाव में यह बात हमें हर जगह और बार-बार सुनने को मिली. हम पर भगोड़े का आरोप कहीं चिपक गया. हम तर्क देते रह गये, लेकिन जनता हमारी बात को नहीं मानी. राजनीति का काम है जनता से सबक लेना. और मैं समझता हूं कि यह एक सबक हमारे लिए है कि हमें दिल्ली सरकार को छोड़ने का फैसला भी हमें जनता के साथ किसी राय-मशविरे के बाद लेना चाहिए था, जैसा कि हमने सरकार बनाने के वक्त किया था. और अगर जनता कहती कि छोड़ना नहीं चाहिए, तो हमें जनता की बात माननी चाहिए थी. उसमें हमारी राजनीतिक समझ की एक चूक हुई, यह मानने में हमें कोई संकोच नहीं है|

रही बात पार्टी की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया की, तो मैं समझता हूं कि आम आदमी पार्टी देश की अन्य पार्टियों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक है और पूरी तरह से लोकतांत्रिक बनना अपने आप में एक प्रक्रिया है, जिसमें तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं. और मुङो यकीन है कि स्वराज के जिस विचार को लेकर यह पार्टी बनी है, उसे यह अपनी कार्यप्रणाली में भी समाहित कर पायेगी|

रंजन – इस जनादेश के बाद आपलोगों ने इस पर मंथन किया होगा. आम आदमी पार्टी ने इस जनादेश से क्या-क्या प्रमुख सबक लिये हैं और उनके आधार पर पार्टी आगे अपनी रणनीति में किस तरह की तब्दीली करने जा रही है?

योगेन्द्र – अभी हमारी बैठकों का सिलसिला पूरा नहीं हुआ है और हमारी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होनी अभी बाकी है. इसलिए मैं अपनी समझ के बारे में ज्यादा कह पाऊंगा, पार्टी की सामूहिक समझ के बारे में अभी ज्यादा नहीं कह पाऊंगा|

मुङो लगता है कि हमारे लिए बड़ा सबक यह है कि लोग हमारी ईमानदारी पर तो भरोसा करते हैं, लेकिन हमारी समझदारी के बारे में अभी आश्वस्त नहीं हैं. हमें लोगों के बीच यह साबित करना है कि हम सरकार बनाने और चलाने के बारे में गंभीर हैं. हममें सरकार चलाने की काबिलियत है और हम रोजमर्रा के मुद्दों को हल करने के लिए धैर्य के साथ काम कर सकते हैं|

दूसरा सबक यह है कि पोलिंग बूथ के स्तर पर संगठन बना कर पोलिंग बूथ मैनेजमेंट किये बिना बड़ी पार्टियों के मुकाबले में चुनाव लड़ना और जीतना संभव नहीं है|

तीसरा सबक कह लीजिये या चुनौती, बड़े मीडिया और बड़ी पूंजी का जो सम्मिलित हमला है, उसके सामने टिकना आसान काम नहीं है. इस बार के चुनाव में जिस तरह से इस देश का बड़ा पूंजीपति वर्ग और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा नरेंद्र मोदी के प्रचार-प्रसार में लग गया, उसके सामने खड़ा होने की रणनीति अभी हमारे पास नहीं है. इसकी रणनीति हमें बनानी पड़ेगी|

इसका मतलब है कि आम आदमी के लिए आगे का रास्ता है संगठन का निर्माण करना. हमें नीचे से ऊपर तक, यानी पोलिंग बूथों से लेकर संसदीय क्षेत्रों तक, राज्यों से राष्ट्र स्तर तक अपना संगठन बनाना होगा और आनेवाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से जनता को समझाना होगा कि हम गंभीर और सफल सरकार बनाने में सक्षम हैं. यह काम असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए बहुत धीरज की जरूरत है|

रंजन – एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक से एक संसद सदस्य बनने की दिशा में आपके द्वारा उठाये गये कदम का एक उम्मीदवार के रूप में व्यक्तिगत अनुभव कैसा रहा और इससे आपको क्या-क्या नयी चीजें सीखने को मिलीं?

योगेन्द्र – मेरे लिए पूर्णकालिक राजनीति में आना उतना बड़ा बदलाव नहीं था, जितना बाहर से दिखाई दे रहा था. पिछले तीन दशकों से मैं देश के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूं, देश भर की खाक छानता रहा हूं, तमाम जनांदोलनों का हमसफर रहा हूं. इसलिए मेरे लिए राजनीति में या जमीन पर काम करना उतनी नयी चीज नहीं थी. लेकिन फिर भी बदलाव तो था और बहुत बड़ा बदलाव था. खास तौर पर जमीन पर चुनाव लड़ना और जीतने के इरादे से चुनाव लड़ना एकदम नया अनुभव था. इसने मुङो बहुत कुछ सिखाया. पहला तो यह सीखा कि मैं राजनीति के बारे में कितना कम जानता हूं. दुनिया मुङो विशेषज्ञ होने का तगमा जरूर देती रही है, लेकिन सच बात यह है कि राजनीति का वह किताबी ज्ञान धरातल पर चुनाव लड़ने के वक्त बहुत काम नहीं आया|

दूसरा यह कि जिस इलाके को मैं अपनी मातृभूमि और कर्मभूमि मानता रहा हूं, उस इलाके को भी मैं कितना कम जानता हूं. मेरे लोकसभा क्षेत्र के कितने गांव, इलाके, क्षेत्र ऐसे थे, जिन्हें मैंने कभी देखा भी नहीं था, जिनके दुख-तकलीफ को मैं समझता भी नहीं था. इसलिए चुनाव में असफल होने पर पहला विचार मेरे मन में यही आया कि शायद अभी मैं इसके काबिल ही नहीं था. मुङो तो अभी अपने इलाके के बारे में बहुत कुछ जानना है, समझना है|

तीसरा, कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए. कुछ इस किस्म के अनर्गल और व्यक्तिगत आरोप लगे, जो तीखे तो थे ही, बहुत छिछले भी थे और मेरी चमड़ी अभी इतनी मोटी नहीं है कि इन बातों का कोई असर नहीं पड़े. जाहिर है, दिल को चोट भी पहुंची और मैं अभी समझ नहीं पाया हूं कि उस किस्म की घटिया हरकतों से कैसे निपटा जाये, जिससे मानसिक द्वेष न हो|

लेकिन सबसे बड़ा अनुभव यह रहा कि आम लोगों का इतना प्यार मिला, जितना पहले न तो कभी मुङो मिला था और न ही जिसके मैं काबिल हूं. केवल अपने गांव के इर्द-गिर्द नहीं, केवल स्वजातीय लोगों में नहीं, बल्कि तमाम इलाकों में वोट मिला या न मिला हो, लेकिन मुङो लोगों का भरपूर स्नेह मिला. क्षेत्र के भीतर से और बाहर से इतने सारे कार्यकर्ताओं ने खुद आकर धन दिया, ऊर्जा दी और इस चुनाव अभियान को अपना अभियान बना दिया|

मई 20, 2014

असहमति का अधिकार…विष्णु नागर

मैंने देश के करोड़ों लोगों की तरह अपने क्षेत्र के भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को और परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी को वोट नहीं दिया। मतदाता के रूप में किसी का भी यह अधिकार है कि भले ही कोई दल या गठबंधन स्पष्ट रूप से सत्ता में आता दिख रहा हो, फिर भी उसे वह वोट न दे, किसी और को वोट दे या फिर ‘नोटा’ दबाए। उसे यह भी अधिकार है कि वह चाहे तो वोट देने के बाद अपने वोट की गोपनीयता को बनाए रखे या उसे खुद भंग कर दे या वोट देने से पहले वोट देने का अपना इरादा किसी को बताए या न बताए या यहां तक कि अंत समय में अपने इरादे से पलट जाए।

यों भी, कोई कितना ही बड़ा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर का लोकप्रिय नेता या दल हो, भले ही उसके पक्ष में लहर ही क्या, सुनामी तक चल रही हो (जैसा कि इस बार नरेंद्र मोदी और भाजपा के बारे में बताया गया है), उसे देश भर में वोट न करने वालों का प्रतिशत वोट करने वालों से अक्सर ज्यादा बड़ा ही होता है। ऐसे मतदाता उसकी विचारधारा, उसके आचरण, उसकी कार्यप्रणाली से स्थायी या अस्थायी रूप से असहमत हो सकते हैं। और ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए, जो कि पहले भी कई बार हुआ है। इसी प्रकार, इस बार भी मेरे जैसे करोड़ों मतदाताओं के पक्ष में वोट न देने के बावजूद मोदी प्रधानमंत्री बन रहे हैं। इतना ही नहीं, तीस बरस बाद कोई एक दल अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति में आ चुका है। उम्मीद है कि पांच साल तक यह सरकार चलेगी और 2019 में फिर से मोदीजी लोगों से अपनी सरकार को वोट देने को कहेंगे, अगर लोकतंत्र जैसा अब तक चलता आया है, तमाम आशंकाओं के विपरीत उसी तरह चलता रहता है तो!

लेकिन मेरी तरह करोड़ों मतदाता भारी बहुमत प्राप्त इस सरकार के आगे झुकने क्यों लगें? क्या इसलिए कि इसे बहुमत प्राप्त है? क्या इस आधार पर किसी दल या गठबंधन से असहमत होने का अधिकार छिन जाता है? बहुमत सरकार चलाने के लिए दिया जाता है, हर तरह के विरोधी विचारों को कुचलने के लिए नहीं, अगर उनके प्रचार-प्रसार के लिए अलोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है तो, जिनका कि इस्तेमाल भाजपा के सहयोगी संगठन अक्सर पहले भी करते रहे हैं और ऐसी आशंकाएं हैं कि अब और भी करेंगे। जिन्हें इस सरकार से आशाएं हैं, वे जरूर पालें। उनसे भी यह अधिकार कोई छिन नहीं रहा है। मगर हमारा अधिकार भी छीनने का अधिकार किसी को नहीं है। हम अगर पूर्वग्रहग्रस्त हैं तो ऐसा होना भी हमारा अधिकार है, जब तक कि हम खुद इस पर विचार करने के लिए बाध्य न हों।

हमारे विरोध के बावजूद जो सरकार जनसमर्थन से अस्तित्व में आई है, हमारा उससे सहमत होना क्यों अनिवार्य है, जैसा कि बुद्धिजीवियों का एक वर्ग शायद अब समझ रहा है। अभी मुंबई से एक मित्र ने बताया कि वहां के एक बड़े अखबार में हिंदी के जिन बुद्धिजीवियों की इस सरकार पर जो प्रतिक्रिया छपी है, उसमें से कुछ की बड़ी शर्मनाक है जो कि उनके इस सरकार के आने के पहले के रुख से बिल्कुल भिन्न है। अगर वे पहले सही थे तो अब गलत क्या सिर्फ इसलिए हो गए कि उनकी इच्छा-आकांक्षा, उनके सोच-विचार के बावजूद इस पार्टी, इस गठबंधन को बहुमत मिल गया है?

लेकिन ऐसा तो नहीं था कि पहले यह संभावना नहीं थी, इसलिए विरोध किया जा रहा था और अब अचानक यह संभावना पैदा हो गई है! अगर मान लें कि ऐसा भी है तो इससे अंतर क्यों पड़ना चाहिए? अगर पहले मोदी के विरोध के ठोस तार्किक आधार थे, तो अब उनके प्रधानमंत्री बन जाने के अलावा और ऐसा क्या हो गया है, जो इनमें से किसी के भी विचार यकायक बदल जाएं!

विचारों में किसी को परिवर्तन करना तभी जरूरी लग सकता है, जब सरकार काम करना शुरू करे और मतदाताओं के इस वर्ग की उस पार्टी, संगठन और उस नेता के बारे में पूर्वधारणाओं को ध्वस्त कर दे। अगर मोदी और भाजपा से बुनियादी किस्म की असहमतियां हैं तो उनकी सरकार बन जाने मात्र से वे भहरा कर कैसे ढह सकती हैं, कैसे वे अंतर्विरोध हवा हो जा सकते हैं जो उस पार्टी और विचारधारा की बुनियाद में हैं। किसी नई स्थिति का सम्यक विश्लेषण करना अलग बात है और परिस्थितियों के अनुसार अपने विचार बदल लेना बिल्कुल अलग और बेहद ओछी बात है।

यह अवसरवाद से भी अधिक घटिया है और दूसरों से ज्यादा खुद के साथ बेईमानी है। हमने बिल्कुल मान लिया है कि हमारे नेता अक्सर ऐसा किया करते है। मगर जो अपने आपको बुद्धिजीवी मानते और कहते हैं, जो अपने को लेखक-कवि मानते और कहते हैं, उनकी अवधारणाएं रातोंरात कैसे बदल सकती हैं, कैसे वे जीतने वाले के साथ अपने को फटाफट जोड़ सकते हैं। किसी पर तो भरोसा किया जाए कि वह नहीं बदलेगा या बदलेगा तो बदलने का विश्वसनीय आधार प्रस्तुत करेगा।

उदाहरण यू अनंतमूर्ति का लें। उनकी उस बात का मजाक भाजपाई अब उड़ा रहे हैं कि अगर मोदी सरकार बन गई तो वे देश छोड़ देंगे। लेकिन अनंतमूर्ति को ही क्या, किसी भी मोदी-विरोधी को इस मौके पर अकेले कर दिए जाने, उसका मजाक बना दिए जाने, उसे अपमानित किए जाने के लिए तैयार नहीं होना चाहिए और इस स्थिति में भी अपना प्रतिरोध जारी रखना चाहिए।

भाजपा-संघ परिवार तो अपमान करने की उस हद तक भी जाते रहे हैं कि जिस हद तक वे हुसेन के मामले में गए थे। लेकिन क्या हर बात आज से इसीलिए कही जाएगी कि उसका हर वक्त, हर जगह स्वागत ही होना चाहिए? क्या हर वक्त फूलमालाएं ही गले में पड़नी चाहिए, विरोध को सहने के लिए तैयार नहीं रहना चाहिए?

बहरहाल, केंद्र में मोदी और आडवाणी के अलावा किसी और भाजपाई नेता के नेतृत्व में सरकार बनती तो उससे हमारी असहमति विचारधारात्मक अधिक होती, जिसे हममें से बहुत-से लोग देश के लिए घातक मानते आए हैं। हम मानते आए हैं कि यह विचारधारा एक तरह से केवल भारत नहीं, मानवता के बुनियादी विचार के ही खिलाफ है। लेकिन मोदी के आने से एक बात और इसमें विशेष रूप से जुड़ गई है कि 2002 में जो कुछ गुजरात में उनके मुख्यमंत्री रहते हुए हुआ, जो जनसंहार हुआ, उसके लिए वे पूरी तरह जिम्मेदार हैं।

हालांकि बात को इस तरह कहना भी दरअसल इसे बहुत ही नरम ढंग से रखना है। भले ही तमाम कारणों से लोगों ने उनके नेतृत्व में आस्था प्रकट की है, मगर इस जनसंहार की जिम्मेदारी से वे कैसे बच सकते हैं, भले ही नई स्थितियों में कानूनन भी उनका कुछ न बिगड़ पाए या उनके स्वागत में जगह-जगह लोग पलक-पांवड़े बिछाए रहें।

एक बात और। यों भले ही भाजपा को लोकसभा में दो सौ बयासी सीटें मिली हों और राजग को कुल तीन सौ छत्तीस सीटें और इस सरकार के स्थिर रहने की पूरी संभावना है। मगर कुछ दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण तथ्यों की ओर न हमारा ध्यान पहले जाता था, न इस जीत से आतंकित होने के कारण अब पर्याप्त रूप से जा पा रहा है। मोदी के सघनतम प्रचार अभियान के बाद और तरकश का हर तीर आजमा लेने के बाद भाजपा को अकेले भले ही स्पष्ट बहुमत मिल गया है, मगर यह भी उतना ही सच है कि उसे महज इकतीस फीसद वोट मिले हैं और राजग के वोट भी कुल साढ़े अड़तीस फीसद हैं। यानी साढ़े इकसठ फीसद मतदाताओं ने, यानी देश के बहुमत ने इस सरकार को नकारा है।

हम इसके कारणों में नहीं जा रहे हैं। मगर कारण जो भी हों, क्या यह एक तथ्य नहीं है और क्या इसलिए इसे भूल जाना जरूरी है कि इससे किसी सीट विशेष पर किसी उम्मीदवार की जीत या हार पर आधारित संसदीय व्यवस्था में सरकार की वैधता पर कोई फर्क नहीं पड़ता? यह बात सही होते हुए भी इस सरकार के लिए ही नहीं, बल्कि किसी भावी सरकार के लिए भी यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि भले ही उसके पास सीटों का बहुमत हो, मगर मतदाताओं की संख्या का भी हो, यह जरूरी नहीं। अक्सर उस दल या सरकार से सहमत मतदाताओं की अपेक्षा उससे असहमत मतदाताओं का बहुमत बड़ा होता है और उनके प्रति सरकार की ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि लोकतांत्रिक चुनाव पद्धति का बहुमत एक दूसरी तरह से उस सरकार के साथ नहीं है।

चुनावी आंकड़े यह महत्त्वपूर्ण बात भी बताते हैं कि इससे पहले किसी भी एक पार्टी की सरकार इतने कम प्रतिशत वोट पाकर नहीं बनी है। यही नहीं, निश्चित रूप से सीटों की दृष्टि से कांग्रेस की हालत इस बार ऐतिहासिक रूप से पतली है, लेकिन एक दिलचस्प बात यह भी है कि 2009 में वोट प्रतिशत के मामले में भाजपा की स्थिति इससे भी विकट थी। उसे महज साढ़े अठारह फीसद वोट मिले थे। हालांकि सीटें एक सौ सोलह मिल गई थीं। जबकि इस बार उससे करीब एक प्रतिशत अधिक वोट पाकर भी कांग्रेस को महज चौवालीस सीटें मिली हैं। इससे सरकार की वैधानिक स्थिति पर कोई अंतर नहीं पड़ता, मगर ये आंकड़े सरकार और तमाम जनतांत्रिक ताकतों को एक और सच से अवगत कराते हैं और यह सच भी महत्त्वपूर्ण और विचारणीय है।

इसके अलावा, कई क्षेत्रीय दलों को लोकसभा चुनाव में वहां के मतदाताओं ने उससे भी भारी समर्थन दिया है जो मोदी को लोकसभा के लिए मिला है। क्या किसी भी केंद्र सरकार को इस तथ्य की उपेक्षा करनी चाहिए? क्या ऐसा करना व्यापक राष्ट्रीय हित में होगा? यों सीट आधारित बहुमत की मौजूदा व्यवस्था की विसंगतियों पर भी विचार का समय आ गया है और इसका भी कि क्या कुछ ज्यादा सीटों वाले प्रदेशों को ही पूरे भारत के बारे में राजनीतिक फैसले लेने का हक होना चाहिए? क्या ऐसी पद्धति विकसित की जानी चाहिए कि केंद्र की सरकार से अलग राह पर जिन राज्यों के मतदाता चले हैं, उनकी भी राष्ट्रीय स्तर पर निर्णय में बराबर की भागीदारी हो, भले ही उनके द्वारा समर्थित दलों की केंद्र सरकार में भागीदारी हो या न हो!

साभार : जनसत्ता 20 मई, 2014

मई 18, 2014

हाथी-घोड़ा-पालकी : कहानी भाजपा की जीत, और कांग्रेस के Fall की!

कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण की। जनता भी कभी छप्पर फाड़ कर देती है। पहली बार भाजपा को अपने बूते पूर्ण बहुमत मिला है। और कांग्रेस को अपूर्व विमत। पंद्रह साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं। पार्टी के इतिहास में उसकी वह न्यूनतम उपलब्धि थी। इस दफा, जब चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में रही, कांग्रेस को 43 सीटें मिली हैं। यारो, कैसा गिरने में गिरना है!

भाजपा ने राजग गठबंधन में चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने राजग की 336 सीटों में भाजपा को 282 सीटें दे दी हैं। यानी अब सरकार चलाने को गठबंधन की बैसाखी की जरूरत नहीं, न काम करने या न करने के पीछे गठबंधन को जिम्मेदार ठहराने के बहाने ढूंढ़ने की गुंजाइश। पिछले पच्चीस बरसों में सबसे ज्यादा 244 सीटें कांग्रेस को मिली थीं, 1991 में। खरीदफरोख्त के बाद गठबंधन सरकार बनी, घोटाले हुए। फिर गठबंधन का युग चल निकला। मनमोहन सिंह जैसे भले मगर नाकारा प्रधानमंत्री की नाक नीचे विराट घोटाले हुए , ठीकरा फिर गठबंधन के मत्थे फोड़ा गया। क्या इसी सब के चलते जनता जनार्दन ने नरेंद्र मोदी की ‘अच्छे’ दिनों या सुशासन की पुकार सुनी। और उन्हें प्रचण्ड बहुमत अता फरमाया है?

हम जानते हैं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संदेह का लाभ देते हुए जनता ने पांच साल पहले दुबारा चुना था। एक भले और अर्थशास्त्र के विद्वान प्रधानमंत्री को पूरे दस बरस राज करने का मौका मिला। लेकिन प्रगति की जगह बंटाढार हुआ। भले ही क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो की तर्ज पर मनमोहन सिंह ने कहा कि भविष्य में इतिहास उन्हें सही समझेगा। उनके एक सलाहकार ने चुनाव के बीच मुनादी की कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई है, उतनी मानव जाति के इतिहास में किसी देश में कभी न हुई होगी। लेकिन ऐसे दावे इतिहास की प्रविष्टियों से अर्थवत्ता नहीं पाते। लोग देखते हैं कि उनके दैनंदिन जीवन में क्या प्रगति हुई है। देश की अर्थव्यवस्था कहां पहुंची है। आटे-दाल का भाव कम हुआ है या ज्यादा। रुपया कितना चढ़ा या लुढ़का है। देश में हिंसा बढ़ी है या घटी है। खेती, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, कानून-व्यवस्था, पर्यावरण या हवा-पानी आदि जीवन से सीधे जुड़े क्षेत्रों में हम कितना आगे बढ़े हैं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों का सचमुच कितना उद्धार हुआ है। दूसरे देशों की नजरों में हमारी साख ऊंची हुई है या गिरी है।

कहना न होगा, इन सवालों के जवाब में हाथ मलता भारतवासी चुनाव नजदीक आते-न-आते अपने सबसे ताकतवर हथियार- मताधिकार- की धार तेज करने में लग गया था। जिस कारपोरेट जगत यानी बड़ी पूंजी के जमावड़े ने कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह उसे उखाड़ फेंकने में जुट गया। गुजरात में विकास के नारे उछालने वाले नरेंद्र मोदी से उसका इश्क पहले से परवान पर था। हालांकि कांग्रेस ने चुनिंदा मंत्री तक कारपोरेट घरानों की मरजी मुताबिक नियुक्त किए थे। राडिया टेप याद करें तो यह दास्तान याद आएगी। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का बेदाग ‘परसोना’ थे, मगर कारपोरेट को उनसे बाजार को संभाल लेने की उम्मीदें थीं। मोहभंग होने पर कमान उनके हाथ से खिंचने लगी। मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब के हवाले खयाल करें तो वित्त मंत्री तक प्रधानमंत्री की जानकारी के बगैर तय होने लगे। खुद को सत्ता का निर्मोही जाहिर कर सोनिया गांधी ने आखिर मनमोहन सिंह को भोलेपन में आगे नहीं किया था। वे तन कर खड़े नहीं हो सकते थे। क्वात्रोकी की मुक्ति जैसे मामले तो बहुत मामूली थे। एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते जितने बड़े आर्थिक घोटाले सरकार में हुए , पहले कब हुए होंगे? मगर सोनिया-मनमोहन भी सब उद्यमियों की इच्छाएं पूरी न कर सके। नतीजतन ताकतवर कारपोरेट का नरेंद्र मोदी के पाले में जा खड़े होना कांग्रेस के लिए खतरे की खुली घंटी बन गया।

जो इस खेल को समझने से आंख चुराएगा, उसे सब मोदी का जलवा दिखाई देगा। ‘मोदी-मोदी’ या ‘हर-हर मोदी’ का रंग-रोगन बाद का है। इतना तो गाफिल भी कहता मिलेगा कि ऐसा खर्चीला चुनाव पहले नहीं देखा। पैसा पानी का तरह नहीं बहा, हवा की तरह उड़ा। सिर्फ इसलिए नहीं कि रोज के दो-तीन लंबे दौरों-सभाओं के बाद शाम को मोदी को अपने घर गांधीनगर लिवा लाने के लिए दो गुजराती उद्योगपतियों के तीन हवाई जहाज तैनात रहते थे। आधुनिक तकनीक वाले तमाम प्रचार माध्यमों और पेशेवर प्रतिभाओं की मदद से प्रधानमंत्री पद के दावेदार का सुनियोजित रूपक गढ़ा गया। मीडिया का एक हिस्सा मिलीभगत में अभियान का हिस्सा बन गया। साबुन-तेल के प्रचार की मानिंद मॉडलिंग करते ‘मोदीजी’ का रूपक गली-गली हर जुबान पर पहुंचाया गया। कोई अखबार, टीवी, रेडियो, सड़क, दीवार, यहां तक कि सोशल मीडिया पर बेनामी षड्यंत्रकारी भी खाली न रहे। जरा सोचें कि इतने संसाधनों, तैयारी के साथ प्रचार अभियान की कमान अगर सुषमा स्वराज के हाथ होती तब भी परिणाम क्या बहुत भिन्न होते?

पर प्रचार के ऊपर मोदी की ऊर्जा, और नाटकीय सही, वक्तृता अलबत्ता असरदार ज्यादा रही। चरमराई अर्थव्यवस्था, महंगाई, असंतुलित विकास, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को उन्होंने सबसे अहम मुद्दा बनाया। युवा वर्ग, खास कर नए मतदाता को रोजगार का झुनझुना थमाया। गुजरात का सच्चा-झूठा विकास का मिथक उनकी स्थायी टेक बन गया। आखिरी दौर में उन्होंने जातिवादी पत्ता भी चलाया, मुसलमान बस्तियों में घूमे, मुसलिम बुजुर्गों के पांव छुए। तूफानी दौरों में अपने सीमित या फिसलते ज्ञान (अंडमान में भगत सिंह, बिहार में तक्षशिला, गंगा किनारे सिकंदर, मौर्य नहीं गुप्त साम्राज्य के चंद्रगुप्त, श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अस्थियां आदि) के बावजूद कांग्रेस से ऊबे मतदाताओं में मोदी यह उम्मीद जगाने में सफल रहे कि वे परिवर्तन ला सकते हैं। प्रचार प्रबंधकों के गढ़े नारे और गाने (मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट… हम मोदीजी को लाने वाले हैं… अच्छे दिन आने वाले हैं!)  पुरउम्मीद और आहत मतदाता के लिए मरहम का काम करते दिखाई दिए। अनेक राजनीतिक दल हाशिए पर जाने लगे। उत्तर प्रदेश में बसपा पता नहीं कहां धंस गई। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों ने अपनी जमीन खो दी। कारण कांग्रेस वाला ही था। लोग उन्हें आजमा चुके थे और मोहभंग से त्रस्त थे।

इसे प्रचार अभियान का एक अंग कहना ही मुनासिब होगा कि कांग्रेस केंद्रित गठबंधन से उकताए लोगों की परिवर्तन की चाह को चौतरफा ‘मोदी लहर’ के रूप में देखा गया। सच्चाई यह है कि ‘मोदी लहर’ के प्रादुर्भाव के बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे। लोगों ने पंद्रह साल पुरानी कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद हार गईं। चुनाव से पहले रोहिणी में नरेंद्र मोदी विराट जनसभा में अपनी रणभेरी बजा गए थे। लेकिन लोगों ने दुबले-पतले मफलर-शुदा अरविंद केजरीवाल की नई-नवेली आम आदमी पार्टी को ज्यादा उम्मीद से देखा।

दिल्ली की सफलता ने केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर पंख पसारने को प्रेरित किया। पर यह फैसला जल्दबाजी का साबित हुआ। फिर बड़े पूंजीपतियों पर हाथ डालते हुए केजरीवाल ने उनको मोदी के हक में पूरी ताकत से एकजुट होने को ही प्रेरित किया। बहरहाल, केजरीवाल पार्टी से ज्यादा एक विचार के रूप में सामने आए थे। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और राहुल गांधी के साथ वे ही केंद्र में नजर आए। जीते ज्यादा नहीं, पर कई जगह उनके उम्मीदवार पार्टी की पहचान बनाने में सफल रहे। मतों का अहम हिस्सा उनकी झोली में भी आया है। दिल्ली में उनके मतों का प्रतिशत बढ़ा है। खुद नरेंद्र मोदी को बनारस में केजरीवाल ने नाकों चने चबाने वाली टक्कर दी। एक नई पार्टी के लिए अपनी पहचान को इतने कम समय में इतना विस्तार देना मामूली बात नहीं। हैरानी नहीं होनी चाहिए जो आने वाले दिनों में मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, करुणानिधि आदि दिग्गज नेताओं के बरक्स उनकी पहचान और पुख्ता हो।

इस घटाटोप में कांग्रेस के खेवनहार बनने वाले राहुल गांधी तो पार्टी के लिए बोझ ही साबित हुए हैं। वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने, चुनाव समिति की कमान भी संभाली। वे पार्टी में साफ छवि के उम्मीदवारों के साथ नई बयार लाना चाहते थे। पर खूसट नेताओं के सामने उनकी शायद ज्यादा न चली। मोदी से कम, पर खर्चीले चुनाव प्रचार को निकले। भाषणों में उनके पास ठोस मुद्दे न थे। पार्टी के पुराने मुसलिम-आदिवासी ‘वोट बैंक’ में भी पराए सेंध मार गए। खुद के चुनाव क्षेत्र में बेड़ा पार लगाने के लिए उन्हें छोटी बहन- और पूर्णकालिक राजनीति में अनिच्छुक- प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर देखना पड़ा। ऊंच-नीच की राजनीति के जुमले छेड़ प्रियंका खबरों में रहीं, पर दोनों मिलकर भी मतदाताओं में एक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर सके।

इस सब के बीच यह घड़ी अंतत: नरेंद्र मोदी को शिखर पर ले आई है। इसके श्रेय पर भाजपा का अपना दावा भले हो। पर पुरजोर दावा संघ ने किया है, जिसके स्वयंसेवकों ने पहली बार इस कदर जी-जान एक की। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी। वजह साफ थी कि पहली बार उनके भरोसे का स्वयंसेवक (वाजपेयी पर इतना भरोसा संघ बाद में कब करता था!) देश की कमान का दावेदार था, विशुद्ध रूप से संघ परिवार के काडर के भरोसे। इसी ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपने ही लोगों के बीच इतना शक्तिमान बनाया कि आडवाणी घर जा बैठे, मुरली मनोहर जोशी की सीट मोदी ने हथिया ली, सुषमा स्वराज राष्ट्रीय पटल से अपने चुनाव क्षेत्र भेज दी गईं, वेंकैया नायडू अंतर्धान मुद्रा में चले गए, जसवंत सिंह पार्टी से बाहर कर दिए गए। गडकरी-जेटली रास्ते पर चले। राजनाथ सिंह ने संघ की बंसी के सुर मोदी के इशारों के अनुरूप रखे। गुजरात के सबसे विवादास्पद नेता अमित शाह ‘साहेब’ की कृपा से और सबों से आगे जा बैठे। इसी के चलते मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता के रूप में सामने आए हैं। यह मोदी की जीत है, मगर कहीं गहरे पार्टी की हार है।

मोदी का मानस कट्टर पहचान देता आया है। सेकुलर विचार उनके घेरे में शायद ही किसी को भाता हो। गोधरा के बाद का खूनखराबा अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। ‘मियां मुशर्रफ’ जैसे संबोधनों की शैली और राममंदिर उनकी विचार-पद्धति का अंग माने जाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने आप को संभाला है। क्या इनसे वे अपने आपको हमेशा के लिए ऊंचा उठा पाएंगे? बाजार को भी उनसे बड़ी आशाएं हैं। मनमोहन सिंह सरकार ढीली थी। दो-दो मंत्री बदलकर भी अंबानी को गैस के मनचाहे दाम न दे सकी। क्या मोदी देंगे? गैस महज एक कसौटी है। कारपोरेट की तो बहुत बड़ी झोली उनके सामने पसरी है।

लेकिन उससे बड़ा फलक जनता की उम्मीदों का है। महंगाई से लोग त्रस्त हैं। पड़ोसियों से तनाव के रिश्ते हैं। आतंकवाद रह-रह कर सिर उठाता है। विभिन्न समुदायों में आपसी सौहार्द वक्त की जरूरत है। इन सब मामलों में कुछ को चाहे मोदी से बहुत कम आशाएं हों, पर देश को उन्होंने बड़े सपनों में बांधा है। पर लोगों को बुलेट ट्रेन से ज्यादा अमन-चैन का जीवन यानी सांप्रदायिक सौहार्द चाहिए। आजाद भारत में अल्पसंख्यक भयभीत होकर कैसे जी पाएंगे। जीत के गाजे-बाजे और हाथी-घोड़ा-पालकी के बीच लाख टके का सवाल यह है कि क्या  इस विराट विजय के बाद मोदी अपना मानस बदलने को तैयार हैं? कमजोर विपक्षके बीच यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है। लोग उनसे रामराज्य यानी सुशासन की उम्मीद रखते हैं। मगर माईबाप संघ अभी से उन्हें राममंदिर और ऐसे ही संकीर्ण लक्ष्यों की याद दिलाने लगा है। देखते हैं देश को रामराज्य हासिल होता है या राममंदिर। या दोनों नहीं।

साभार : श्री ओम थानवी, संपादक – जनसत्ता

मई 12, 2014

अरविन्द केजरीवाल : इस चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं

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मई 6, 2014

लोकसभा 2014, सबसे महत्वपूर्ण चुनाव नहीं : मार्क टली (BBC)

Mark Tullyअतिशयोक्ति इस आम चुुनाव की पहचान हो गई है। यह सही है कि ये सबसे बड़े और सबसे लंबे चुनाव हैं। बाद वाली विशेषता पर चुनाव आयोग को विचार करना चाहिए। कुछ मतदाता तो पांच हफ्तों तक चलने वाले सारे चुनाव प्रचार, सारे मीडिया कवरेज से गुजर रहे हैं जबकि कुछ अन्य तो यह सब शुरू होने के पहले ही वोट डालने पहुंच गए। ऐसे में क्या यह कहा जा सकता है कि पूरा चुनाव समान स्तर पर लड़ा जा रहा है। अतिशयोक्तियां तो देखिए- ये सबसे महत्वपूर्ण चुनाव हैं। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अंत होने वाला है। नेहरू-गांधी परिवार का प्रभाव खत्म हो रहा है। मोदी की लहर-यह सब गलतफहमी पैदा करने वाले और खतरनाक दावे हैं।
जरा सबसे महत्वपूर्ण चुनाव के दावे को देखेंं। सारे चुनाव ही महत्वपूर्ण होते हैं। इतिहास वह नहीं होता, जिसके हम आज साक्षी हैं यदि पूर्व में हुए किसी भी चुनाव के नतीजे एकदम अलग होते। इसे भुला दिया जाता है कि इंदिरा गांधी ने जब 1977 में चुनाव की घोषणा की थी तो आपातकाल उठा नहीं लिया था। मुझे लगता है कि यदि वे चुनाव जीत जातीं तो अपनी जीत को आपातकाल की लोकतांत्रिक पुष्टि के रूप में लेतीं और इसे जारी रहने देतीं। क्या इस चुनाव के नतीजे इंदिरा गांधी की हार से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?
यह कहना कि ये चुनाव सबसे महत्वपूर्ण हैं, भाजपा के इस दावे को विश्वसनीयता प्रदान करता है कि देश को नया मोड़ देने का मौका है। पुरानी, भ्रष्ट, गैरजवाबदार सरकार, जिसने देश को अभी भी ठप कर रखा है, उसका अंत होगा। तेज रफ्तार विकास के युग की शुरुआत होगी, जिसका लाभ समाज के सभी तबकों को मिलेगा। भाजपा कहती है कि मोदी ही वे व्यक्ति हैं, जिनका गुजरात में रिकॉर्ड बताता है कि वे यह चमत्कार करके दिखा सकते हैं। लेकिन वे इसे कैसे हासिल करेंगे? जब भाजपा अलग पार्टी होने के नारे (पार्टी विद अ डिफरेंस) पर पहली बार उत्तरप्रदेश की सत्ता में आई थी तो मैंने लालकृष्ण आडवाणी से कहा था, ‘आप इस दावे पर पछताएंगे।’ वे अवाक रह गए। मैंने उनसे कहा, ‘आपको उसी भ्रष्ट नौकरशाही, पुलिस बल और राजनीतिक व्यवस्था के साथ काम करना पड़ेगा, जिनके साथ अन्य लोगों ने काम किया है। इसलिए इनके कारण लोगों को जल्दी ही पता चल जाएगा कि भाजपा भी अन्य दलों की तरह ही है।’ यही हुआ भी। मोदी भी खुद को ऐसी स्थिति में पा सकते हैं। अन्य नेताओं जैसा नेता जो अपने वादे पूरे करने में नाकाम रहा। इससे वे तभी बच सकते हैं जब वे ऐसे पहले प्रधानमंत्री बनकर दिखाएं, जिसमें न्यायपालिका सहित देश की सारी संस्थाओं में आमूल-चूल बदलाव लाने का साहस हो। गुजरात जैसे किसी एक राज्य की सरकार थोड़ी बहुत कार्यक्षम बनाकर दिखाने की तुलना में यह बहुत जटिल समस्या है।
जनमत संग्रहों और मीडिया ने मोदी लहर का आभास निर्मित कर दिया है। मैंने भारत में दो चुनावी लहरों को कवर किया है और उनके बाद से कोई लहर दिखाई नहीं दी है। मुझे खासतौर पर 1977 के चुनाव की रिपोर्टिंग याद आती है। तब मैं जहां भी जाता एक नारा हमेशा सुनाई देता, ‘इंदिरा, संजय और बंसीलाल नसबंदी के तीन दलाल।Ó मुझे उस लहर पर कोई शक नहीं था, जिसने बाद में इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। फिर 1984 के चुनाव जो भाजपा के लिए शोक-सभा ही थे। स्पष्ट था कि राजीव गांधी को सहानुभूति लहर का फायदा मिल रहा था। मैंने हाल ही में उत्तरप्रदेश में तीन दिन बिताए हैं और मैं कह सकता हूं कि मुझे बाराबंकी, उन्नाव, फैजाबाद और मोहनलालगंज के मतदाता किसी लहर में बहते नजर नहीं आए। परंपरागत तत्व ही वोटर के दिमाग में सबसे ऊपर नजर आए- जाति, प्रत्याशी और समुदाय। बाराबंकी को ही लीजिए। हालांकि, ज्यादातर विश्लेषकों ने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को खारिज कर दिया है पर बाराबंकी में मैंने पाया कि वहां कांग्रेस के आरएल पूनिया द्वारा किए विकास कार्यों की तारीफ हो रही है। आम राय है चुनाव में उनके लिए अच्छे अवसर हैं।
उन्नाव में चाय की एक दुकान का मालिक स्थानीय भाजपा नेता था। उसने कहा कि पार्टी प्रत्याशी साक्षी महाराज ही माहौल खराब कर रहे हैं। वे कहते फिर रहे हैं, ‘मैं क्यों चुनाव प्रचार करूं? मैं तो साधु हूं। यह तो मोदी का चुनाव है।’ जब मैंने भाजपा के इस नेता से पूछा कि क्या मोदी की कोई लहर है तो उसने जवाब दिया, ‘मोदी लहर है तो सही पर समस्या जाति की है।’
धर्मनिरपेक्षता के अंत के दावे की पुष्टि सत्ता में भाजपा के पुराने रिकॉर्ड से नहीं होती। न इसका औचित्य प्रचार के दौरान मोदी द्वारा कही किसी बात या तोगडिय़ा जैसे अतिवादियों को उनके द्वारा लगाई फटकार से साबित होता है। फिर ऐसा दावा करना भारत की संस्थाओं का अपमान है। क्या सुप्रीम कोर्ट, मीडिया, सिविल सेवाएं धर्मनिरपेक्ष संविधान के उलटे जाने को चुपचाप देखते रहेंगे? यह सही है कि आपातकाल के दौरान उन्होंने यही किया था, लेकिन अब वे कहीं ज्यादा शक्तिशाली और खुले दिमाग वाले हैं। कांग्रेस के इस दावे से कि मोदी की जीत से भारत बिखर जाएगा, अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुस्लिमों में खतरे की घंटी बज जाती है। यह मतदान को प्रभावित करने की जानबूझकर की गई कोशिश है। इसके साथ ही धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा फिर सबसे ऊपर आ जाता है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने मुझसे चर्चा में माना कि धर्मनिरपेक्षता एक ‘पुराना और घिस’ चुका मुद्दा है।
फिर यह दावा कि इस चुनाव के बाद नेहरू-गांधी परिवार का राजनीतिक अवसान हो जाएगा। लखनऊ में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने मुझसे चर्चा में स्वीकारा कि परिदृश्य काफी निराशाजनक है, लेकिन उन्होंने आगे यह भी कहा, ‘हम चिंतित नहीं हैं। हम पहले भी ऐसी स्थिति का सामना कर चुके हैं और हम हमेशा इससे उबर आए हैं।’ नेहरू-गांधी परिवार को पहले भी खारिज किया जा चुका है, लेकिन ये चुनाव परिवार की उस अत्यंत महत्वपूर्ण स्थिति को दर्शाते हैं जो उसे भारतीय राजनीति में अब भी हासिल है। यदि कांग्रेस का प्रदर्शन जनमत संग्रहों में उसके लिए बताए सबसे खराब नतीजों जैसा भी रहा तो भी यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इस परिवार का राजनीतिक अवसान हो जाएगा। पार्टी को छोडऩे वालों का वही हश्र होगा, जो इंदिरा गांधी को छोड़कर जाने वालों का हुआ था। इसलिए जो सोनिया, राहुल और अब मुझे प्रियंका का नाम भी जोडऩा पड़ेगा, को खारिज कर रहे हैं वे मतदाताओं को धोखा दे रहे हैं।
ये सबसे बदजुबानी वाले और सबसे आवेशपूर्ण चुनाव हो सकते हैं। निश्चित ही ये सबसे खर्चीले चुनाव तो हैं ही। सोशल मीडिया और मतदाताओं को आने वाले मोदी के फोन कॉल और मैसेज जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधन पहले की तुलना में ज्यादा बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। मगर मुझे भरोसा है कि जब चुनावी धूमधाम की धूल बैठ जाएगी तो जाहिर हो जाएगा कि अतिशयोक्ति फैलाने वालों ने मतदाताओं को धोखा दिया है। यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि ये सबसे महत्वपूर्ण चुनाव भी नहीं थे।
मार्क टली
भारत में बीबीसी के पूर्व ब्यूरो चीफ
marktullydelhi@gmail.com

 

अप्रैल 29, 2014

नरेंद मोदी की बनारस से हार का गणित

AKvs Modiबनारस का सियासी समीकरण नरेन्द्र मोदी को नाको चने चबवाने पर मजबूर कर सकता है| हम इस वक़्त बनारस में रहकर काशी की इस दिलचस्प लड़ाई का जायज़ा ले रहे है| इस दौरान हमें मोदी की कई ऐसी बातें मालूम पड़ी जो आपको चौंका सकती है| हम आपके सामने सिलसिलेवार तरीके से ऐसे पहलू रखने जा रहे हैं, जो चक्रव्यूह में फंसे मोदी की हक़ीक़त बेपर्दा कर देंगे|

मोदी ने काशी की लड़ाई में पार पाने के खातिर आनन-फानन में ‘अपना दल’ से समझौता कर लिया| अपना दल की पटेल-कुर्मी वोटरों पर पकड़ है और बनारस में इस तबके की आबादी ढाई लाख के करीब है| ऐसे में मोदी की जीत-हार में यह फैक्टर निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है| दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता ‘अपना दल’ की युवा अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने आनन-फानन में बग़ैर अपने काडर की राय लिए कर लिया और बदले में मिर्ज़ापुर की लोकसभा सीट पर बीजेपी के सहयोग से टिकट हासिल कर लिया. जबकि इससे पहले ‘अपना दल’ की बातचीत कांग्रेस के साथ चल रही थी. ऐसे में काडर खुद को बुरी तरह ठगा महसूस कर रहा है. चर्चा गर्म है कि ‘अपना दल’ का यही काडर इस दग़ाबाज़ी का बदला चुनाव में मोदी की हार सुनिश्चित करके ले सकता है|

काशी में भूमिहार वोट तकरीबन सवा से डेढ़ लाख के बीच में है. यह पूरा वोट लामबंद होकर कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय के हक़ में गिर रहा है|

काशी की लड़ाई में दलित वोट भी बहुत महत्वपूर्ण है. एक से सवा लाख के बीच का यह दलित वोट-बैंक बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद टस से मस होने को तैयार नहीं है|

काशी में चौरसिया समाज के डेढ़ लाख वोट हैं| यादव 70 से 80 हज़ार हैं| पाल, सैनी जैसे दूसरे वोट-बैंक भी दो से ढाई लाख के करीब हैं, जो खांटी तौर पर जाति राजनीति के साथ जा रहे हैं| बीजेपी मज़हब की चाशनी के नाम पर इन्हें अपने खेमे में खींचने की पूरज़ोर कोशिश कर रही है, मगर यह वोट बैंक अपनी जातिय प्रतिबद्धताओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है|

मुस्लिम वोटबैंक बनारस में तीन से साढ़े तीन लाख के करीब है, जो ध्रुवीकरण की सूरत में बग़ैर बंटे एक तरफा तरीके से मोदी के खिलाफ जाएगें, जो मोदी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद घातक हो सकता है.

मोदी की सबसे बड़ी चिंता ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर है| काशी में ढ़ाई लाख के करीब ब्राह्मण हैं| यह तबका मुरली मनोहर जोशी की उपेक्षा और जातिय स्वाभिमान का उचित प्रतिनिधित्व न मिलने से भड़का हुआ है| इस बात की संभावनाएं है कि इस तबके के वोटों में चुनाव के मौके पर भारी बिखराव हो सकता है|

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अरविन्द केजरीवाल जिस तरीके से मोदी के गुजरात में छाए भ्रष्टाचार की कलई खोल रहे हैं, उसका असर पढ़े-लिखे तबके पर सीधे तौर पर पड़ रहा है. यह तबका अपनी विवेक के आधार पर सही मौके पर सही क़दम उठा सकता है|

मोदी का दो जगह से चुनाव लड़ना भी उनके खिलाफ काम कर रहा है| काशी के मतदाताओं के बीच यह मुद्दा उथल-पुथल पैदा कर चुका है. इस बात की चर्चाएं आम होती जा रही है कि मोदी चुनाव जीतने पर बनारस को चूसे हुए आम की गुठली की तरह फेंक देंगे|

मोदी के लिए राजनाथ फैक्टर भी टेढ़ी खीर बन चुका है| सुत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह अंदर ही अंदर मोदी को काटने में लगे हुए हैं| राजनाथ सिंह को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर मोदी बनारस से हार गए तो उनके पीएम बनने की राह में हमेशा के लिए दीवार खड़ी हो जाएगी.

मोदी की काशी से दूरी भी उनके खिलाफ जा रही है. सुत्रों के मुताबिक मोदी के सलाहकारों ने उन्हें समझा दिया है कि उन्हें बनारस में जीत की खातिर पसीने बहाने की कोई ज़रूरत नहीं है. यहां जीत तय है. उन्हें नामांकन छोड़कर बनारस आने की भी ज़रूरत नहीं है. यही वजह है कि मोदी बनारस में दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, जबकि पास-पड़ोस के ज़िलों में रैली करके निकल जा रहे हैं. मोदी का यह अति आत्म-विश्वास उन पर भारी पड़ सकता है.

नरेन्द्र मोदी के लिए काशी की लड़ाई किसी वाटर लू से कम नहीं है. अगर मोदी यहां हारे तो उनके राजनीतिक भविष्य को कोई नहीं बचा सकता है| काशी में मोदी के वाटर लू की शुरूआत हो चुकी है|
(Shams Tabrez)

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