Posts tagged ‘India against corruption’

सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस – भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

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अगस्त 29, 2011

कौन रहेगा ईमानदार?


विजय दिवस था कल
एक बूढी लाठी के आगे
नतमस्तक हुए शाह–वजीर
अचरज से देख रहे थे
कबाड़े से निकल आई
गाँधी टोपियों का कमाल
सिर पर रखते ही
हरीशचन्द्र बन रहे थे लोग
जिन्हें लेख का शीर्षक भी पता नही
टीकाकार बन गए थे कौवे
कोयलें चुप थीं।

उस बड़े मैदान में
सुनहरे कल के सपने
प्यासों के आगे
बिसलेरी बोतलों के समान
उछाले जा रहे थे,
परंतु जो सपना उठा लाया
वह रात भर सो न सका
उसे याद आ गया था
माटी बने पुल की नींव से
कमीशन खोद कर निकालना है,
उसने भी माइक पर
ईमान की कसम दोहराई थी
रोज गीता–कुरआन पर
हाथ रख कर,
झूठी गवाहियाँ देने वाला दिल
व्याकुल रहता कब तक?

वह उठा और
माटी के पुल के रास्ते चल पडा
उस समय तक सभी सियार
जश्न का खुमार उतरने के बाद
शेर की खाल ओढ़ रहे थे,
रोज़मर्रा समान
निजी लाकरों और स्विस बैंकों के
दफ्तर भी खुल चुके थे।

(रफत आलम)

अगस्त 28, 2011

समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

अगस्त 26, 2011

अन्ना सोचो तो बताओ तो

मैं जनता हूँ
मुझमें और कसाई की भेड़ों में
बस इतना ही अंतर है,
भाषणों के बाजीगरों द्वारा
संवेदना की छुरियों से काटा जाता है मुझे।

मेरा पथप्रदर्शक ही असल पथभ्रष्ट हैं
उसका रास्ता सदा शहादतों को रौंधता हुआ
सत्ता सुख तक जाता है।

हर आंदोलन में ठगा जाता है
स्वप्निल दुनिया में जीने वाला मध्यम वर्ग
या फिर सर्वहारा शोषित
समाज की यही भीड़
ज़मीनी वास्तविकताओं से दूर
असम्भव को संभव बनाते वादाफरोशों की
सबसे बड़ी शिकार है।

कोई हो तो बताओ
आंदोलनो, क्रान्तियों या इन्कलाबों से
सत्ता परिवर्तन के सिवा क्या हुआ है?
जनता का कितना भला हुआ है?

समय के गुलाम उत्तेजित हालात
नियति के धारे में जाने कब बह जाते हैं
न भूख की तस्वीर बदलती है, न प्यास की सूरत।

अन्ना हो कि कोई दूसरा मसीहा
हालात में बदलाव के सूत्रधार
आंदोलनों के बेक़सूर औजार
ज़हर के प्यालों, सूलियों या गोलियों के शिकार
चौराहों पर पत्थर के बुत बना दिए जाते है।

कबूतरों का वास बन कर
बीटों में सड़ते रहते है बेचारे
बाकी कुछ भी नहीं बदलता
कैलेण्डर के पन्नों के सिवा।

(रफत आलम)

अगस्त 17, 2011

हम खुद ही न मार डालें कहीं अन्ना को!


आजकल हालात के चलते
कई बार सोचने पर मजबूर हूँ
उस सच के बारे में
जिसे सब जानते है
पर बोलने को कोई तैयार नहीं-
यह कि सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भाँग पड़ी है।

मैं दस गुना फीस देकर
डाक्टर से इलाज करा रहा हूँ
उस पर तुर्रा यह
भगवान तुल्य वह बेशर्म डाक्टर
आपरेशन के अलग से मांगता है।

हम में कोई भी कम कहाँ है मित्रों!

बच्चों की आला स्कूल में भरती से लेकर
रेल टिकट तक के लिए
सब खुशी खुशी ऊपर से देते हैं
काले धन बल के बदले
मेघावी उम्मीदवारों को पीछे धकेल
अपनी कर्महीन संतानों के लिए
नौकरियाँ हथियाँ रहे हैं।

सारे कुएँ में भ्रष्टाचार की भांग पड़ी है।

इस बेईमान माहौल में
ये जो बूढा फकीर अन्ना बाबा
ईमान की भीख मांगता फिर रहा है
करनी के हम सब चोर
कथनी से उसे प्रोत्साहित करने वाले
शायद बेचारे को टूटा दिल मार देंगे।

कहो कौन है
अपने काले धन से अटे लॉकर खोलने वाला
बताओ कौन है
जो आगे आकर कहे
बाबा मुझसे पाप हुआ
देश के नाम लो ये
स्विस बैंक की चाबी।

सच तो यह है मित्रों!
सरापा बेईमान हो चुकी इस बस्ती में
ईमान की बात ही फ़िज़ूल है
फिर भी यदि अब भी कहीं
विवेक की चिंगारियाँ बाकी हैं
दुआ करो वे आग बने
काले धन के सर्वव्यापी इस कीचड़ में
ईमान के कंवल खिलें
हो सदा के लिए भ्रष्टाचार के तम का नाश
उजाला हो दिलो में, दिमागों में देश हित का
दुआ करो !प्रकाशित विकास मार्ग पर
कदम मिला कर सब चलें।

(रफत आलम)

जून 16, 2011

बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस


बतकही 1-
बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

अशोक – एक बार को मान भी लो कि चलो भाई आर.एस.एस ने बाबा रामदेव के कार्यक्रम का समर्थन किया तो ऐसा करना कहाँ गलत है? क्या आर.एस.एस को अधिकार नहीं है भ्रष्टाचार का विरोध करने का? क्या आर.एस.एस भारत का अंग नहीं है।

हरि – अशोक बाबू हमारा आर.एस.एस की अनुदार विचारधारा से हमेशा से मतभेद रहा है परंतु यहाँ हमें भी आपकी बात के कुछ पहलू अनुचित नहीं लगते। कोई भी संगठन क्यों न हो उसका कैसा भी इतिहास क्यों न र्हा हो, उसकी कैसी भी छवि न रही हो, अगर वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में साथ देना चाहता है तो क्यों उसके इन प्रयासों को गलत नज़र से देखा जाये?

सुनील – यह बात सही है। एक तरफ तो सरकार आतंकवादियों से हथियार छोड़ने, मुख्य धारा में आने और देश के विरोध में अलगाववादी बातें करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करती और दूसरी ओर इस आसान से मुद्दे को इतना जटिल बना कर पेश कर रही है। यहाँ असली मुद्दा आर्थिक भ्रष्टाचार का है और अगर आर.एस.एस इस लड़ाई में साथ आना चाहती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। भाई या तो आर.एस.एस और अन्य संगठनों को देश निकाला दे दो या फिर उनकी आड़ लेकर भ्रष्टाचार जैसे बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की धार खत्म मत करो।

विजय – लोकतंत्र की बढ़ोत्तरी के लिये भारत के राजनीतिक और सामाजिक रुख में और उदारता और स्पष्टता लाने की जरुरत है। हर मुद्दे को अलग-अलग ढ़ंग से देखे जाने की जरुरत है। अभी अगर आर्थिक मुद्दा हल हो जाये तो अगला मुद्दा नैतिकता का होगा। और उस मुद्दे पर सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन कमजोर नज़र आते हैं। वहाँ सभी दलों और संगठनों में बहुत ज्यादा सुधार की आवश्यकता है।

हरि- मुझे तो ऐसा लगता है कि अन्ना हज़ारे के अनशन के बाद से जैसा माहौल देश में बना था उसमें ज्यादातर नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, अपनी साख खो चुके थे और घायल होकर वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं। कांग्रेस को खुश होना चाहिये कि आर.एस.एस भ्रष्टाचार जैसे एक मुद्दे पर मुख्य धारा से जुड़ना चाहती है और यह ऐसा मुद्दा है जिसने पूरे देश के और इसके सभी वर्गों के लोगों के विकास के काम को बाधित किया है।

अशोक – अजी कांग्रेस के राज में इतना भ्रष्टाचार पनपा है। उसे तो घबराहट होगी ही।

सुनील – अशोक जी, यह एकतरफा सोच है। भ्रष्टाचार तो हरेक सरकार के काल में जम कर पनपा है। भाजपा के काल में भी कम नहीं था भ्रष्टाचार। कुछ को ही सही पर कांग्रेस के काल में कलमाड़ी, ए. राजा, और कनीमोझी जैसे शक्तिशाली नेताओं को जेल में बंद किया गया है। उन पर जाँच चल रही है। अशोक – इन्हे तो जनता के दबाव में अंदर किया गया है।

विजय – सुनील जी, आपकी बात वाजिब है। सनक भरी एकतरफा सोच से तो देश का काम चलेगा नहीं। आपकी बात को थोड़ा आगे बढ़ाऊँ तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भले ही कांग्रेस द्वारा की जा रही कार्यवाही भ्रष्टाचार के विकराल रुप को देखते हुये ऊँट के मुँह में जीरा लगे पर एक शुरुआत तो हुयी है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने चाहे किन्ही भी दबाव में ऐसा किया हो पर आर.टी.आई आदि जैसी सुविधायें जनता को दी हैं। अपने और सहयोगी दलों के नेताओं को जेल भेजा है। कांग्रेस की बदकिस्मती से वक्त्त ऐसा है कि जनता केवल इतने भर से संतुष्ट नहीं है। जहाँ कांग्रेस आशा कर रही थी कि उसे जनता से सहयोग और शाबासी मिलेगी इन निर्णयों को लेने से वहीं जनता के सामने बहुत बड़े बड़े मामले खुलते जा रहे हैं। विदेश में जमा काला धन, देश में काले धन की समांतर अर्थ-व्यवस्था, मंहगाई, राजनीतिक भ्रष्टाचार और अक्षमता आदि मुद्दे जनता को अधीर कर रहे हैं। अब जनता का बहुत बड़ा हिस्सा मूर्ख बन कर नेताओं को लाभ देते रहने की स्थिति को पार कर चुका है या तेजी से पार करता जा रहा है। कांग्रेस को कुछ और ठोस कदम उठाने पड़ेंगे तभी वह कुछ उजली और सक्षम दिख सकती है अन्य दलों के मुकाबले में।

सुनील- विजय जी सही है आपकी बात। मुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि कांग्रेस अपने द्वारा लिये गये कुछ अच्छे निर्णयों पर भी जनता से सराहना नहीं पा सकी है और यही इसकी कुंठा है। इसी कुंठा में वह बाबा रामदेव के मुद्दे को ढ़ंग से सुलटा नहीं पायी। उसे यह भी दिख गया कि अगर वह आगे भी अच्छे निर्णय अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव जैसे गुटों के दबाव के कारण लेगी तो उसे कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला है। मुझे लगता है कि कुछ निर्णय कांग्रेस अपने आप लेगी और उसकी ही नहीं बल्कि हर दल के नेताओं की अंदुरनी इच्छा और कोशिश यही होगी कि ऐसे गुट निष्प्रभावी हो जायें ताकि जनता में पैंठ बना चुके इन मुद्दों के राजनीतिक लाभ नेताओं को ही मिलें।

हरि – इन विचारों से मेरे दिमाग में एक बात आयी है कि चूँकि कांग्रेस को आर.टी.आई और कलमाड़ी आदि को जेल भेजने के फैसलों का लाभ नहीं मिल पा रहा था तो उसके सामने साफ हो गया कि ये मुद्दे तो अपनी जगह है पर इन मुद्दों की आड़ में राजनीतिक तंत्र की सारी कालिख कांग्रेस के मुँह पर ही मलने के गुपचुप प्रयास भी हो रहे थे। सरकार घोटालों और महंगाई के बावजूद विपक्ष के मुकाबले मजबूत थी और भाजपा समेत विपक्ष के सामने अगले तीन साल तक सरकार को गिराने का बहुत बड़ा अवसर था नहीं। पाँच साल तक दल इंतजार करने को तैयार नहीं थे, खासकर भाजपा। चूँकि कोई भी दल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम में पाक-साफ नज़र नहीं आ सकता इसीलिये भाजपा और आर.एस.एस ने मौका तलाशते हुये बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के अंदोलन से उठी जन-जाग्रती की लहर पर सवार होने की चेष्टा की।

अशोक – ऐसा कैसे कहा जा सकता है?

विजय – बात से बात निकलती है। आपकी बात में सच्चाई नज़र आती है सुनील जी। भाजपा खुद ऐसा आंदोलन नहीं खड़ा कर सकती थी क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार के बहुत बड़े बड़े आरोप लगे हुये हैं। वह ऐसा करती तो दोगली करार दी जाती। तभी जब जनता आंदोलित हो गयी तो भाजपा के प्रवक्त्ता आदि टीवी चैनलों पर एक बात स्थापित करने में जोर लगा रहे हैं कि ये सारे मुद्दे आडवाणी ने उठाये थे। आडवाणी तो उप-प्रधानमंत्री भी रहे हैं और भाजपा अध्यक्ष भी, तब तो उन्होने अपने दल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ कदम नहीं उठाये। भाजपा की राजनीति के पीछे कहीं न कहीं यह इच्छा भी है कि किसी तरह से आडवाणी एक बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लें। अगर तीन साल और इंतजार किया तो जीवन भर यह मौका हाथ नहीं आयेगा। हो सकता है आने वाले तीन सालों में राजनीतिक फिजां बदल जाये और कांग्रेस कुछ और बड़ी मछलियों को जेल भेजे और जनता अंतत: कांग्रेस के पक्ष में हो जाये। ऐसा लगता है कि कलमाड़ी आदि को जेल भेजना विपक्षी दलों को हिला गया है। भ्रष्ट सभी दल हैं और अगर कांग्रेस अपने नेताओं को जेल भेज सकती है तो दूसरे दल के नेताऒ पर कोताही करने का कोई मतलब है ही नहीं।

हरि- आप लोग कह रहे हैं तो मुझे भी दूर की एक कौड़ी सूझी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो अब देश में खड़ा होना ही है और हो रहा है पर कांग्रेस जो कह रही है कि बाबा रामदेव के आंदोलन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है तो यह कुछ हद तक सही लगता है। खाली आर.एस.एस का ही नहीं बल्कि अन्य ताकतों का भी जो भी कांग्रेस की सप्रंग सरकार को पाँच साल तक सत्ता में देखने को तैयार नहीं है। देखिये हो सकता है दूर की कौड़ी हो परंतु ध्यान दिया जाये तो जून का महीना भारत में राजनीतिक रुप से इमेरजैंसी वाले महीने के रुप में याद दिलाने की चेष्टा गैर-कांग्रेसी दल करते रहे हैं। भाजपा और आडवाणी इस बात पर विशेष तवज्जो देते रहे हैं। रामदेव का अनशन जून के माह में ही क्यों आयोजित किया गया? यह मार्च में भी हो सकता था जब इतनी गर्मी नहीं थी। या कुछ माह बाद सितम्बर या अक्टुबर में। पर इसे जून में किया गया। अगर आंदोलन केवल रामदेव के हाथों में होता तो शायद वे सरकार से कई मुद्दों पर आश्वासन मिलने के बाद अनशन खत्म कर देते पर उनके ऐसा करने से केवल उन्हे और सरकार को ही लाभ और राहत मिलती। विपक्षी दल अपने आप को सारे मामले से अलग महसूस करते। अनशन न तोड़ने देने के लिये जरुर ही रामदेव को शातिर दिमागों ने सलाह दी होगी। रामदेव राजनीति में नौसिखिया हैं। वे इतनी दूर का नहीं सोच सकते। कुछ लोगों को पक्का पता था कि अगर रामदेव दिल्ली में डटे रहें तो सरकार और रामदेव में टकराव होना ही होना है। उन्होने सोचा था कि सरकार सख्ती करेगी और उस पर आपातकाल के आरोप लगाये जायेंगे। अगर सरकार रामदेव के आंदोलन को कुचलती है तो एक तो रामदेव व्यक्तिगत रुप से उसके खिलाफ हो जायेंगे दूसरे सरकार बदनाम होगी और तीसरे भ्रष्टाचार का मुद्दा रामदेव और अन्ना हज़ारे के पास ही न रहकर विपक्षी दलों खासकर भाजपा के पास आ जायेगा। रामदेव का तो ठीक है कि उन्हे राजनीति की समझ नहीं है पर कांग्रेस को क्या कहा जाये वह भी इन चालों के सामने धराशायी हो गयी? एक से एक शातिर राजनीतिक दिमाग कांग्रेस के पास हैं और वे इन संभावनाओं को नहीं देख पाये और अब टीवी चैनलों पर तमतमाये हुये बयान देते घूम रहे हैं और अपनी और ज्यादा फजीहत करा रहे हैं।

अशोक – आपको लगता है कि आर.एस.एस और भाजपा इतनी आगे की सोच सकते हैं? अगर रामदेव उनके बढ़ाये हुये होते तो उन्हे रामदेव की ऐसी हालत करके क्या हासिल होता। रामदेव की समझ में भी तो आयेगा कि उन्हे इस्तेमाल किया गया है।

सुनील- राजनीतिक दल कितनी भी आगे की सोच सकते हैं। हरि भाई आपकी सोच पर चलें तो अब समझ में आता है राजघाट पर खुशी से नाचने का मतलब। अब यह भी लगता है कि अगर आर.एस.एस और भाजपा को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाना भी है तो उन्हे पहले अपने संगठनों से शुरुआत करनी चाहिये। बल्कि किसी भी राजनीतिक दल को यही करना चाहिये। उन्हे किसने रोका है कि वे अपने दल के आरोपित लोगों के खिलाफ कार्यवाही करें? अभी तो इन सभी दलों ने असली मुद्दे को पीछे ढ़केल दिया है और अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेकने आगे आ गये हैं। आर.एस.एस को खुले रुप में आंदोलन खड़ा करना चाहिये। उनका इतना बड़ा काडर है वे आज तक क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं कर पाये। भाजपा का इतना बड़ा समर्थक वर्ग है वह खुद से और अपने समर्थकों से शुरुआत क्यों नहीं करती। मुझे ऐसा लगता है कि कोई भी दल और संगठन गम्भीर नहीं है भ्रष्टाचार को समापत करने के लिये। ऐसा करना उनके हितों के खिलाफ है।

विजय- सही है सुनील जी, रामदेव के आंदोलन से सही ढ़ंग से निबटने में कांग्रेस की विफलता ने भाजपा को वह जगह मुहैया करा दी है जो उसे मिल नहीं रही थी उसके लाख प्रयास के बावजूद। लोगों का जिस तेजी से कांग्रेस से मोह भंग हुआ है उसकी भरपाई करने के लिये कांग्रेस को बहुत बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। अभी ऐसा माहौल बना दिया गया है कि कांग्रेस के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन गति नहीं पकड़ पा रहा है। जबकि सच्चाई यह नहीं है। सभी दल भ्रष्ट हैं। कांग्रेस ने दिखावे के लिये ही सही पर थोड़े से कदम उठाये हैं, पर वे काफी नहीं हैं। अपनी जमीन वापिस पाने के लिये उसे बड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे। अब कांग्रेस को जमीन में तो दफनाया नहीं जा सकता। आर.एस.एस समर्थित भाजपा से तो लोगों की शंकायें रहेंगी ही। देशव्यापी दलों में कांग्रेस ही है जिस पर देश के बहुत सारे वर्गों का भरोसा रहा है। देश की एकजुटता की खातिर कांग्रेस का बने रहना जरुरी है। कांग्रेस को अपनी और देश की खातिर अपनी सफाई और अपने सुधार से शुरुआत करनी चाहिये।

हरि – कांग्रेस और भाजपा, दोनों बड़ी राजनीतिक शक्तियों को चाहिये कि देश हित में भ्रष्टाचार जैसे राक्षस को समाप्त करने के लिये वे भले ढ़ंग से आपस में सहयोग करें। कांग्रेस को चाहिये कि वह बचे हुए तीन सालों में सत्ता का सदुपयोग करके भ्रष्टाचार समाप्त करने की ओर ठोस कदम उठाये। भाजपा को चाहिये कि एक अच्छे विपक्ष की तरह सरकार पर दबाव बनाये रखे। पिछले दरवाजे से सत्ता नहीं मिलने वाली और अगर मिल भी जाये तो यह दलों की साख गिराती ही है। भारत के लोकतंत्र को स्वच्छ और विकसित बनाने के लिये राजनीतिक दलों को शातिर और कुटिल चालों के बजाय साफ-सुथरी और पारदर्शी राजनीति को स्थान देना ही पड़ेगा।

…जारी…

जून 8, 2011

भ्रष्टाचार विरोध को इंसाफ मिलेगा क्या?


बीते दिनों
सन्यासी, ठग, व्यपारी और
मसीहा के बीच
उलझे हुये
सत्य का
अजीब रूप देखने को मिला है।

खून-पसीने की चोरी का
हिसाब माँगने गए
निहत्थे आंदोलनकारियों पर
क्यों भांजी गयी लाठियाँ,
समझ से बाहर है।

फिर शुरू हो गया
आरोप प्रत्यारोप का दौर
बंदरों में होड़ मच गयी है
भ्रष्टाचार विरोध की सिकी
रोटी हथियाने की।

चक्की के दोनों बड़े पाट तैयार हैं
पिसे हुओं को और पीसने के लिए
जनसंवेदनाओं से मखौल कर
वोटों की राजनीती हुई है गर्म
कोयल के वेश में काग-राग से
असल मुद्दा–बेमुद्दा हो चला है।

हराम कमाई से हुए मुस्टंडे
नूरा-कुश्ती के माहिर
काले धन के बचाव का दाव
खेल गए हैं।

डर है डूबो न दी जाएँ
भ्रष्टाचार विरोधियों की नावें
इस गन्दी व्यवस्था के कीचड़ में
फिर धोखा खा न जाएँ
इन्साफ की बाट तकती
गीली आँखें।

(रफत आलम)

जून 6, 2011

बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमों ने भारत को हलचल से भर दिया है। कहीं कोलाहल है तो कहीं चुपचाप देखा जा रहा है कि आगे क्या होगा। कल, विजय, अशोक, हरि और सुनील, चार बुजुर्ग मित्रों की रोज़ाना होने वाली बैठक एक बहस-गोष्ठी में बदल गयी। बहुत समय बाद चारों के दिमाग और ज़ुबान दोनों ही राजनीतिक तेवरों से ओत-प्रोत हो रहे थे।

आम तौर पर चारों सुबह दस बजे किसी भी एक के घर मिल बैठ दुनिया जहान की बातें किया करते हैं। दोस्ताना माहौल में वक्त्त अच्छा बीत जाता है। सुख-दुख की बातें हो जाती हैं।

मजमा विजय के घर पर लगा। चारों के हाथों में अलग-अलग अखबार थे।

विजय बाबू ने गहरी साँस भ्रने के बाद गम्भीर स्वर में कहा,” घटनाक्रमों ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सारे मामले के बहुत सारे पहलू उजागर हुये हैं”।

हरि – विजय जी, एक बात तो तय है कि अनशन को तोड़ने के लिये आधी रात को पुलिस बल से जैसी हिंसक कारवाही करवायी गयी है उस निर्णय ने जैसी किरकिरी कांग्रेस पार्टी और सरकार की की है, उसका कलंक आसानी से हटने वाला है नहीं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत का इससे अच्छा उदाहरण हो नहीं सकता।

सुनील – ये तो सही कहा आपने हरि भाई। पर विजय बाबू आप कुछ सवाल और पहलुओं की बात कर रहे थे। कुछ बताओ।

अशोक – हाँ पहले आप ही बताओ आपको क्या दिखता है इस मामले में?

विजय – पहली बात तो यही है कि बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के अनशन के समय से ही सार्वजनिक रुप से मीडिया को दिये साक्षात्कारों में बार-बार कह रहे थे कि वे जून के पहले हफ्ते से अपने एक लाख समर्थकों के साथ भ्रष्टाचार और काले धन की विदेश से वापसी जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिये सरकार पर उचित कार्यवाही करने के लिये दबाव बनाने के लिये अनशन पर बैठेंगे। सरकार कहती है कि अनुमति सिर्फ योग-शिविर लगाने के लिये ली गयी थी। अगर ऐसा था तो दिल्ली में जब रामलीला मैदान में शिविर लगाये जा रहे थे तभी सरकार ने उचित कदम क्यों नहीं उठाये? बाबा रामदेव के दिल्ली पहुँचने के बाद भी उनसे स्पष्ट क्यों नहीं कहा कि शिविर की अनुमति के साथ वे शांतिपूर्ण ढ़ंग से भी वहाँ अनशन पर नहीं बैठ सकते।

हरि – सही कह रहे हो विजय बाबू, जब बाबा रामदेव और सरकार दोनों को पता था कि अनुमति सिर्फ योग शिविर लगाने की ली गयी है और सरकार अनशन के दूसरे या तीसरे दिन कानूनी कार्यवाही कर सकती है तो क्यों हजारों लोगों की जान को जोखिम में डाला गया? अनशन से पहले दिन टीवी पर ऐसी बातें भी उठ रही थीं कि रामलीला मैदान में योग शिविर ही रहेगा और अनशन जंतर-मंतर पर किया जायेगा। सरकार के चार बड़ी मंत्रियों ने हवाई-अड्डे पर ही बाबा रामदेव को पकड़ कर क्या इस बात की संभावना उनके दिमाग से हटा दी कि जंतर-मंतर पर अलग से अनशन करने की जरुरत नहीं है और सरकार से बातचीत से उचित हल निकल आयेगा, और बाबा रामदेव जंतर मंतर को भूलकर रामलीला मैदान में ही अनशन की लीला दिखाने लगे और उन्हे लगता था कि सब कुछ ठीक पटरी पर चल रहा है और सब ऐसे ही निबट जायेगा? हमें तो घपला लगता है मामले में।

सुनील – जब अनशन की पहली ही शाम आते आते सरकार और बाबा रामदेव में वार्ता टूट गयी तो क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता था कि अनशन स्थल पर बैठे हजारों लोगों की जान की सलामती की फिक्र करती? सरकार का बाबा रामदेव से कुछ भी रिश्ता हो, कोई भी सरकार हजारों लोगों की भीड़ की जान के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है? बहुत शोर मचाकर कहा जा रहा है कि सांसद संवैधानिक रुप से जनता द्वारा चुने गये हैं तो ऐसे समय में संविधान की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाते हुये इन्ही सांसदों से बनी सरकार ने हजारों लोगों की जान जोखिम में डालते हुये पुलिस को आधी रात को लोगों को वहाँ से हटाने के लिये भेजा? कैसे पुलिस को आदेश देने वाले मंत्रियों ने नहीं सोचा कि अगर पुलिस की लाठियों से लोग बच भी गये तो भगदड़ में महिलायें, बच्चे और वृद्ध अपनी जान बचा पायेंगे या घायल होने से बच पायेंगे? सरकार अनशन पर बैठे लोगों को दिन में नोटिस देकर कुछ घंटे का समय नहीं दे सकती थी जिससे लोगों को पता चल जाये कि सरकार की मंशा अब रामलीला मैदान से लोगों को हटाने की है। अगर अनशन अवैध था तो कोर्ट से नोटिस लाया जा सकता था। पर किसी तरह से भी संविधान का सम्मान न करते हुये लोगों को सबक सिखाने के लिये पुलिसिया कार्यवाही की गयी।

अशोक – अरे सरकार की बदमाशी है। यह सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास दिखावा है। इन्होने ही तो इमेरजैंसी लगवायी थी, तभी भाजपा राजघाट पर अनशन में बैठ गयी है इनकी करतूतों के विरोध में।

विजय – अशोक बाबू भाजपा भी दूध की धुली नहीं है। राजघाट में कब से उसकी श्रद्धा हो गयी? कल्याण सरकार के दिन भूल गये क्या? कैसे गांधी को पानी पी पी कोसा जाता था। गाँधी से इनका क्या लेना देना। बल्कि किसी भी दल का कुछ लेना देना नहीं है गाँधी से। उन्हे तो अलग ही रखें।

सुनील – कांग्रेस नियंत्रित सप्रंग सरकार की दूसरी पारी के आरम्भ से ही भाजपा निष्क्रिय स्थिति में पड़ी हुयी थी। उसे राजनीतिक जमीन नहीं मिल रही थी। पांच साल का इंतजार उसे और निष्क्रिय बना देता। कांग्रेस की सरकार ने भाजपा में जान डाल दी। उसे मुकाबले में खड़ा कर दिया। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को संघ की ओर धकेल दिया। सबको लगता था कि कांग्रेस नियंत्रित सरकार की दूसरी पारी आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और कहीं कई अड़चन नहीं आयेगी। ताजे घटनाक्रमों ने दिखा दिया है कि सरकार की आगे की राह मुश्किल हैं। सरदार जी ने माथे पर कलंक लगवा ही लिया। इतिहास तो उन्हे ऐसे प्रधानमंत्री के रुप में याद करेगा जिसकी सरकार ने रात में सोते हुये स्त्री-बच्चों, बूढ़ों और अनशनकारियों पर लाठियाँ बरसवायीं। उन्हे घायल किया और उनकी जान को जोखिम में डाला।

हरि- कांग्रेस की सरकार ने तो भाजपा को थाली में सजाकर मौका दे दिया है। इससे ज्यादा खुश भाजपा और अन्य विपक्षी दल कभी भी नहीं हुये होंगे, पिछले पांच-सात साल में।

अशोक- अजी भाजपा निष्क्रिय नहीं थी। उसी ने मुद्दा उठाया था काले धन की वापसी का, भ्रष्टाचार के खात्मे का।

विजय- अशोक जी भाजपा की ईमानदारी तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के मामलों में चमक ही रही है। गुजरात के मामले में उसकी नैतिकता भी जगजाहिर रही है!

सुनील – भाजपा की बात छोड़ो। मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार बार उठ रहा है – क्या शुरु में बाबा रामदेव से मीठी मीठी बातें करने के कुछ घंटो बाद सरकार को वस्तुस्थिति का एहसास हुआ कि अगर बाबा रामदेव के अनशन के कारण उनकी माँगें मानी गयीं तो यह बाबा रामदेव की जीत कहलायेगी और सरकार द्वारा उठाये गये कदम मजबूरी में उठाये गये कदम कहलायेंगे और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ नहीं मिल पायेगा।

हरि – सरकार के किन्ही भी सलाहकारों ने ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही करने की सलाह दी हो और उस पर दबाव डाला हो, क्या कांग्रेस को इस घटना के बाद किसी किस्म का राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? इसमें पूरा संदेह है।

विजय- कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस मायावाती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल में उ.प्र पुलिस द्वारा किसानों पर अत्याचार कराने को लेकर संघर्षरत थी। अब उसकी खुद की सरकार ने वैसा ही कर दिया है। कांग्रेस के पास अब नैतिक चेहरा है ही नहीं किसी अन्य सरकार द्बारा पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही कराये जाने की निंदा करने का। भारत की जनता हमेशा से ही शोषित के पक्ष में रही है और अब पुराना समय नहीं रहा जब किसी तरह की कोई भी खबर दबायी जा सकती थी। इस इलेक्ट्रानिक युग में कांग्रेस ने ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है और इसका राजनीतिक खामियाजा या तो अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देगा या फिर उसकी सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि वह बड़ी संख्या में दूसरे दलों पर निर्भर हो जाये।

सुनील- देश अगली बार फिर से कई दलों की मिली जुली सरकार के चंगुल में फंसता दिखायी दे रहा है। कांग्रेस का उ.प्र अभियान भी गड्ढ़े में पड़ा समझिये। दुख की बात है कि दो दशकों से ज्यादा समय से उ.प्र क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों द्वारा संचालित हो रहा है। विकास कार्य लगभग ठप रहे हैं। वैसे भी पाँच नहीं तो दस साल में सरकारें बदल जानी चाहियें। तभी संतुलन ठीक बना रहता है।

अशोक – कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव के अनशन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है। अगर ऐसा है भी तो जब हवाईअड्डे पर सरकार के बड़े मंत्री उनकी अगुवाई करने गये थे तब भी उन्हे इस बात का पता होगा। अगर पता था और उन्हे इस बात से परहेज था तो उन्होने अनशन को शुरु ही क्यों होने दिया?

सुनील- अशोक जी आपकी इस बात से सहमति है। अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो इस संगठन को कानून का सहारा लेकर प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो कांग्रेस और इसके द्वारा नियंत्रित सरकार आर.एस.एस द्वारा समर्थित और नियंत्रित भाजपा के सांसदों से परहेज क्यों नहीं करती? उन्हे संसद से बाहर का रास्ता दिखा दे। उन्हे किसी भी कमेटी में न रखे। आखिरकार भाजपा को तो आर.एस.एस का पूरा समर्थन है। ऐसा कैसी हो सकता है कि भाजपा के सांसद तो स्वीकार्य हैं पर जो सांसद नहीं हैं और जिन पर शक है कि आर.एस.एस उन्हे समर्थन देता है, वे स्वीकार्य नहीं हैं।

विजय- सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे, जो भारत को खाये जा रहे हैं, को लेकर जनता को ठोस हल चाहिये और उसे इस बात से क्या मतलब कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये जा रहे प्रयास को आर.एस.एस समर्थन दे रहा है या कोई अन्य संगठन।

हरि- अरे अगर ऐसा है तो आर.एस.एस को देशद्रोही साबित करके प्रतिबंधित कर दो, कानूनी राह पर चला दो और अगर ऐसा साबित हो जाता है तो जनता चूँ भी नहीं करेगी।

विजय- मेरी समझ में तो ऐसा पैरानोइया आता नहीं। आप ये जानो कि जब भाजपा राजनीतिक दौर के शिखर पर थी तब भी उसे केवल 26% मतों का समर्थन हासिल था और जो अब घटकर 20% के आसपास आ गया है। देश की कुल आबादी का 75-80% हिन्दुओं को माना जा सकता है तो ऐसा तो है नहीं कि सभी हिन्दु भाजपा को समर्थन देते हैं और मत देते हैं। फिर क्यों इतनी हायतौबा, क्यों इतना भय? यह देश मुख्यतः सेकुलर रहा है और रहेगा।

…जारी…

बतकही 2 -बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस

जून 4, 2011

बाबा रामदेव : भ्रष्टाचार मुर्दाबाद

उजाला करने के लिए
सलाम आपको बाबा!

करोड़ों आखों को
आज यही ईमान की रौशनी चाहिए
अन्यथा
गाँव का सबसे ईमानदार आदमी
शराब के ठेकेदार से
सरपंच का चुनाव हारता रहेगा
रातो-रात बदलती रहेंगी निष्ठाएं

माहौल की सड़न इसी तरह
सदा बिकने वाले को
मेले का खरीदार बना देती है
जड़ों में फैली गंद को
कमल ने सर पे रख लिया है.
यानी व्यवस्था की खराबी को
जनता आवश्यकता मानने लगी है

मन से रोती है परन्तु
खुश-खुश ‘सुविधा शुल्क’ दे रही है
ले रही है

आप बाखूब जानते हैं बाबा साहिब!
ये वह दुनिया है जहाँ
मसीहाओं के उजालों का
स्वागत सदा सियारों ने किया है
जो मौका पाते ही सूली में कीलें ठोकते हैं।

हमाम के ये ही नंगे
कल आपके साथ हो लेंगे
कुछ तो अभी से शेर की बोली बोल रहे हैं।

ये केवल सत्ता के दलाल हैं
इन्हें तख्ते नही तख़्त की है आरज़ू
इन्होने सदा ही संवदनाओं का शोषण किया है
इन्होने ही पनपाया है
भ्रष्टाचार को विष वृक्ष
इन बेईमानों को दूर रखना है ज़रूरी
कल हमें इन्ही के पास कैद
काले धन को आज़ाद कराना है।

शोषण से त्रस्त सारा देश
आपको आशा से देख रहा है
लाखों दीपक चल पड़ने को हैं आतुर
आपके उजाले के साथ।

कल कश्मीर से कन्याकुमारी तक
करोड़ों नारे लगने तय हैं
भ्रष्टाचार मुर्दाबाद!
कल ज़रूर मैली धूप उजली होगी।

(रफत आलम)

मई 21, 2011

वर्दी वाले गुंडे

रेल से नीचे धकेल दिये गये लोगों के समाचार गाहे-बेगाहे अखबारों की सुर्खियां बनने लगे हैं। एक महिला खिलाड़ी को रेल से नीचे फेंक दिये जाने की खबर छपी तो इस खबर को पढ़कर सुमीत को बरसों पहले की अपनी एक रेल यात्रा की याद हो आयी।
* * *

उस समय सुमीत को किसी भी यात्रा से पहले एक किस्म की बैचेनी होने लगती थी। बस की यात्रा तक तो गनीमत थी कि एक बस निकल जाये तो दूसरी मिल जायेगी पर रेल की यात्रा तो उसकी नींद उड़ा देती थी। घर से समय से निकलने के बावजूद उसे हमेशा संदेह लगा रहता कि वह रेल पकड़ भी पायेगा या नहीं। कई दिनों की छुट्टी अपने दोस्त के यहाँ व्यतीत करने के बाद उसे नौकरी पर वापिस जाना था और वह कोई रिस्क लेना नहीं चाहता था। रेल उसे पकड़नी थी सहारनपुर से तकरीबन सौ किमी दूर देहरादून जिले में एक छोटी सी जगह पर। इस भय से कि कहीं रेल न छूट जाये सुमीत ने अपनी यात्रा के नियत दिन से एक दिन पहले ही बस से सहारनपुर जाकर रिहर्सल कर ली। वह सही वक्त्त पर सहारनपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गया। उसके पहुँचने के बाद ही एक्स्प्रैस रेल वहाँ आयी। रेल को विदा करके ही वह वापिस लौटा। उसे थोड़ी राहत महसूस हुयी।

अगले दिन सही वक्क्त पर सुमीत सहारनपुर पहुँच गया और रेलवे स्टेशन पर पूछताछ वाली खिड़की से यह पूछ कर कि उसकी वाली एक्सप्रैस रेल किस प्लेटफार्म पर आयेगी वह नियत प्लेटफार्म पर जाकर खड़ा हो गया। रिज़र्वेशन उसके पास था ही।

प्लेटफार्म पर अच्छी खासी भीड़ थी। एक कुली से उसने पूछ लिया कि S5 बोगी कहाँ आकर रुकेगी।

कुली ने उसे बता दिया और साथ ही पूछा कि वह रेल में सामान चढ़ा दे क्या? यूँ तो सुमीत के पास एक सूट्केस और एक बैग ही था और वह खुद आराम से रेल में सामान सहित चढ़ सकता था पर शायद कुली से बोगी के बारे में पूछने के कारण या किसी अन्य कारण से उसने उसे हाँ कह दिया।

रेल एक घंटे की देरी से आयी। रेल में मौजूद लोगों की भीड़ देखकर तो सुमीत के हाथ-पाँव फूल गये। लोग दरवाजे तक खड़े थे। सहारनपुर उतरने वालों और वहाँ से रेल में चढ़ने वालों के बीच दरवाजे पर खड़े लोग दीवार बने खड़े थे। हर तरफ चिल्ल-पौं मची हुयी थी।

सुमीत को लगा कि ऐसे कैसे वह चढ़ पायेगा रेल में?

कुली ने सुमीत से कहा,” बाबू जी, भीड़ बहुत है आप अभी बीस रुपया दे दो, आपको अंदर चढ़ा देंगे। मेरा अंदर जाकर वापिस आना मुश्किल हो जायेगा। आप यहीं पैसे दे दो। आपको अंदर तो चढ़ा ही दूँगा। रास्ते में मौका देख आप अपनी सीट पर पहुँच जाना”।

सुमीत ने कुली को बीस रुपये दे दिये। उसे लग नहीं रहा था कि दरवाजे पर खड़ी भीड़ के अभेद लगते किले को भेदकर वह बोगी में अंदर प्रवेश कर पायेगा।

कुली ने सूटकेस और बैग उठाया और बोगी के दरवाजे पर खड़े लोगों को हटाने का प्रयास करते हुये सूटकेस अंदर उनके सिरों के ऊपर से अंदर फेक दिया। अंदर से गालियाँ सुनायी दीं, लोग इधर उधर हुये और समान के बोगी के फर्श पर पड़ जाने का अनुमान कुली को लग गया। अब उसने सुमीत को उसका बैग थमाया और उसे पीछे से इस तरह धकेलना शुरु किया जैसे किसी गाड़ी में धक्का लगा रहा हो। लोगों को अपनी बोली से चेतावनी देते हुये उसने जबरन सुमीत को बोगी के अंदर धकेल ही दिया।

सुमीत भीड़ में मूर्ति बना खड़ा हो गया। न पैर हिलते थे और न ही हाथ इधर उधर या ऊपर नीचे करने की ही गुंजाइश उसे दिखायी पड़ती थी। बैग उसके कंधे पर इस तरह से रखा हुआ था जैसे कैलेंडरों आदि में हनुमान जी को गदा लिये दिखाया जाता है। इस जड़ता में अपनी आरक्षित सीट तक जाने की बात सोचना भी दुस्साहस से बड़ी बात थी। उसका तो एक पैर भी फर्श पर पूरी तरह टिका हुआ नहीं था। भीड़ के कारण गरमी भी बहुत लग रही थी और साँस लेने के लिये हवा भी कम और कमजोर मालूम पड़ती थी। सुमीत समेत लोग रेल के चलने की दुआ कर रहे थे। रेल चलने से कम से कम हवा तो आयेगी।

रेल चली। जो बैग उसे पहले हल्का और बाद में ठीके-ठाक वजन वाला लग रहा था अब वही उसे  बेहद भारी लगने लगा था। हाथ और कंधें में दर्द की तरफ ध्यान जाता तो बार बार उसकी इच्छा होती कि बैग को उछालकर चलती रेल से नीचे फेंक दे। ऐसे ही कष्ट सहते-सहते अम्बाला कैंट तक की यात्रा पूरी हुयी। उसे अपनी सहन क्षमता पर कुछ गर्व भी हुआ। आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता से भरे हुये जैसे ही उसने पाया कि दो-तीन यात्रियों को अम्बाला कैंट स्टेशन पर उतरना है, उसने और दरवाजे पर खड़े लोगों ने उन यात्रियों को ऐसा स्वागत करते हुये नीचे उतारा जैसे बारातियों का स्वागत कर रहे हों। उन यात्रियों के उतरने के उपक्रम में सुमीत को जगह मिल गयी अपने कंधे पर सवार बैग को नीचे फर्श पर गिरा देने की।

बैग गिराते ही वह सूटकेस और बैग को लगभग भूल कर प्रभावित कंधे को गोल गोल घुमाने लगा। सामान को भूल जाने में ही राहत मिलनी थी हाल फिलहाल तो।

तभी रेलवे पुलिस के सिपाहियों के साथ टी.टी.ई महोदय बोगी के दरवाजे पर अवतरित हुये। वर्दीधारी सिपाहियों की अकड़ और लाठियों के तांडव ने दरवाजे पर जमे खड़े यात्रियों को गतिमान बनाया और गुंजाइश न दीखने वाली जगह में भी टी.टी.ई और चार सिपाही अंदर घुस आये।

सिपाहियों की लाठियों के सहारे बोगी में लोगों की भीड़ के चक्रव्यूह को भेदते हुये टी.टी.ई आगे बढ़ा तो सुमीत भी अपनी सीट तक पहुँचने के लिये किसी तरह वहाँ खड़े लोगों से सहायता की गुज़ारिश करके अपना सूटकेस और बैग उठाये हुये इस सरकारी कारवां की पूँछ पकड़कर खिसक-खिसक कर आगे बढ़ने लगा। किसी तरह अपनी सीट पर पहुँचा तो पाया कि वहाँ बगैर आरक्षण के एक परिवार धरना दिये हुये था। परिवार में बच्चों और महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। वे लोग भी हर तरफ खड़ी भीड़ में किसी तरह से सीटों पर जमे हुये थे। नैतिकता जोर मारने लगी और सुमीत का साहस नहीं हुआ कि उस परिवार से कहता कि वे लोग उसकी सीट खाली कर दें। उसने हालात से समझौता करते हुये अपने बैठने के लिये कोने में ज़रा सी जगह देने की गुज़ारिश की।

बैठकर शरीर को कुछ राहत मिली तो इधर उधर खड़े लोगों की भीड़ से पता चला कि एक राजनीतिक दल की रैली थी दिल्ली में और पंजाब लौटने वाले लोगों ने रेल की कई जनरल बोगियों के साथ-साथ आरक्षित बोगियों पर भी कब्जा कर लिया और मजबूरन लोगों को जिस बोगी में जगह मिली उसी में घुस जाना पड़ा।

कुछ ही देर बाद सिपाही लौटे। जिनके पास आरक्षण  नहीं था उनसे वे इस आरक्षित बोगी में यात्रा करने की अनुमति के बदले उनकी आगे तय की जाने वाली दूरी के अनुसार रुपये ले रहे थे। सुमीत की आरक्षित सीट पर बैठे परिवार को जम्मू जाना था अतः सिपाहियों ने प्रति सदस्य पचास रुपयों की मांग की। परिवार के लिये शायद मुश्किल था इतने रुपये देना। उन्होने सिपाहियों से प्रार्थना की तो सिपाहियों ने उन्हे नीचे उतारने की चेतावनी दी। परिवार की मुश्किल देख कर सुमीत ने सिपाहियों से कहा कि वे उसकी आरक्षित सीट पर यात्रा कर रहे हैं, इतनी भीड़ में कहाँ जायेंगे महिलायें और बच्चे। उन्हे परेशान न किया जाये।

एक सिपाही गुर्रा कर बोला,” बाबू तू जुर्माना देगा क्या। बुलाऊँ टी.टी.ई को, अभी चालान काटेगा, अपनी सीट पर बिना आरक्षण वाले लोगों को साथ ले जाने के लिये। और इन सबको ले जावेंगें जेल”।

परिवार बेचारा क्या करता? उन्होने सिपाहियों को रुपये दे दिये।

लोगों को उस बोगी में बने रहने के लिये पुलिस फोर्स की स्वीकृति खरीदनी पड़ी। जिन बोगियों पर राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं ने कब्जा कर लिया था वहाँ तो सिपाही घुस भी न पाये होंगे पर बाकी बोगियों से उन्होने हजारों के वारे न्यारे कर लिये होंगे।

सुमीत सोच रहा था कि अगर चोर डाकुओं को वर्दी पहना दी जाये तो शायद वे भी इस कुशलता से उगाही का काम न कर पायेंगे जैसा कि कानून के इन तथाकथित रखवालों ने अपने शौर्य से कर दिखाया है।

बोगी में जिस किसी ने रुपये देने में असमर्थता दिखायी या नियमों की दुहाई देने का दुस्साहस किया तो उसे सिपाहियों ने थप्पड़ों और घूँसों का प्रसाद देकर टॉयलेट के पास खड़ा होने के लिये भेज दिया। अगले स्टेशन पर उनके उतारने की बात सुनायी पड़ती रही।

रेल चली तो कुछ समय बाद टी.टी.ई टिकट चैक करता हुआ आया। सीट के आरक्षण के लिये लोग रुपये हाथ में लेकर उसे घेरे हुये थे। और वह भी किसी-किसी को उपकृत कर रहा था। शायद आदमी के हाथ की हरियाली देखकर वह निर्णय ले रहा था।

सिपाहियों के घमासान मचाने से लोग इधर उधर व्यवस्थित खड़े हो गये थे और गैलरी में इधर-उधर देखने लायक जगह दिखायी पड़ती थी।  टी.टी.ई टिकट चैक करके अपने लिये निर्धारित सीट पर पहुँचा तो पाया कि उससे पहले वहाँ पहुँच चुके सिपाहियों ने उसकी सीट का सौदा भी दो यात्रियों से कर लिया था। उसकी सीट पर जमे बैठे यात्रियों ने उठने से मना कर दिया। टी.टी.ई ने सिपाहियों से उन यात्रियों से अपनी सीट खाली करवाने की बात कही।

एक सिपाही ने खैनी मलते हुये कहा,” अरे अम्बाले में तो तू कह रिया था कि किसी तरह से बोगी में पहुँचा दो, अब कह रिया है कि सीट दिलवा दो, थोड़ी देर में कहेगा कि हिसाब भी समझा दो। हमारी तरह चुपचाप यहाँ टायलेट के पास खड़ा रह। बीड़ी-सिगरेट पी और ऐश कर। नहीं तो नीचे उतर जाइयो अगले स्टेशन पर। दूसरी बोगी में देख लियो, कहीं सीट मिल जावे बैठने की तो। हम भी तेरी तरह ड्यूटी पर हैं”।

सिपाही से दो टूक जवाब पाकर टी.टी.ई का चेहरा गुस्से और विवशता से अजीब सा हो गया।

पर कर भी क्या सकता था। अपमान का घूँट पीकर रह गया। सिपाहियों से चलती रेल में पंगा लेना खतरनाक था। इतनी भीड़ में कौन, कब, कैसे टपक गया चलती रेल से, बाद में कौन जान सकता है?

सरकारी अमले की आपसी मुठभेड़ को देखकर, सुमीत को अन्य यात्रियों, जो सिपाहियों और टी.टी.ई की धन-उगाही कार्यवाही के शिकार बने थे, की तरफ से भी कुंठा में कुछ राहत महसूस हुयी।

एक सिपाही टी.टी.ई से कहता सुनायी दिया,”अरे बाबू, ये रास्ता खोल दे दोनों बोगियों के बीच वाला। तू यहीं खड़ा रह आराम से, हमारा आदमी जावेगा दूसरी बोगी में और वहाँ से बिना आरक्षण वाले यात्रियों को यहाँ भेजेगा। तू भी कुछ कमा-धमा ले और हमें भी जेब भारी कर लेने दे। रोज़ रोज़ तो ऐसे मौके आते नहीं।”

सुमीत देख नहीं पाया कि टी.टी.ई पर इस प्रस्ताव की प्रतिक्रिया क्या हुयी।

कुछ समय बाद टॉयलेट की तरफ से गाली-गलौच और मार-पीट का शोर आने लगा। ऐसा लगा जैसे सिपाहियों का यात्रियों से झगड़ा हो रहा हो। या शायद यात्री ही आपस में लड़ रहे हों और सिपाही दोनों गुटों की ठुकाई में व्यस्त हों।

इस शोर-गुल में कई तरह की आवाजों के मध्य ऐसी पुकारें भी सुनायी दीं…अरे गिर गये… अरे कूद गये…अरे धकेल दिया।

बहुत देर तक शोर होता रहा।

अगले दिन सुमीत को अखबार में ही एक छोटी सी खबर पढ़ने को मिली कि जिस एक्स्प्रैस रेल में वह यात्रा कर रहा था उसमें बिना टिकट यात्रा करने वाले दो युवक टी.टी.ई से झगड़ा करने लगे और सुरक्षा बल के सिपाहियों के आने पर अफरातफरी में चलती रेल से बाहर कूद गये और अपनी जान गँवा बैठे।
* * *

इंसानी जान की कोई कीमत है नहीं इस देश में…- ठंडी सांस छोड़कर अपने आप से कहते हुये सुमीत ने अखबार सामने मेज पर रख दिया।

…[राकेश]

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