Archive for मई, 2010

मई 31, 2010

श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते

श्याम, कान्हा, कृष्ण… कुछ भी कह लो उन्हे, वे जीवन के मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि मनुष्य रुप में जीवन इससे बड़ा हो सकता है या इससे ऊपर जा सकता है। कृष्ण जीवन का उल्लास हैं, उत्सव हैं। उन्होने सिर्फ सैधान्तिक रुप में ही जीवनदर्शन नहीं उच्चारित किया वरन हरेक बात को खुद जीकर दिखाया। गीता तो एक बहुत छोटी सी कुंजी है उस विशालतम व्यक्तित्व द्वारा दिखायी लीला के दर्शन की।

मन में गहराई से भक्तिभाव से भरे एक आस्तिक को ऐसा बता दिया जाये कि ईश्वर नहीं है तो उस “विशेष” के न होने की कल्पनामात्र से ही उसका सारा अस्तित्व काँपने लगेगा। वह अपने को इतना निरीह पायेगा जितना उसने अपने को पहले कभी नहीं पाया था। जो उसके पास था सदा, जो उसकी पूँजी था, जिसके कारण उसे ऊर्जा मिलती थी आज वह नहीं है का अहसास किसी को भी हिला कर रख देगा।

जब विराट व्यक्तित्व पास में हो, सदा सुलभ हो, सहज ही जिस तक पहुँच हो तब उस विशाल उपस्थिति से भी कुछ शिकायतें हो जाना स्वाभाविक है। मानव का स्वभाव ही कुछ ऐसा है पर अगर वही विशाल अस्तित्व यकायक जीवन का भौतिक रुप छोड़ दे और शून्य में विलीन हो जाये तो उसके आसपास रहने वालों के जीवन में एकदम से शून्य आ जाता है। उनके प्रिय की अनुपस्थिति उन्हे उनकी निर्बलता का अहसास कराने लगती है। सारे गिले शिकवे एकदम से गायब हो जाते हैं और बस एक इच्छा सारे समय चीत्कार करने लगती है कि एक बार बस एक बार उससे मिलना हो जाये।
यह कह लूँ
वह कह लूँ
गले लग जाऊँ
पैर पकड़ माफी माँग लूँ
बस एक बार और मिल जाऊँ।

उस अभाव में आँसू थमते नहीं। ऐसा तो साधारण मनुष्य के जाने से भी हो जाता है और अगर बात कृष्ण जैसे व्यक्तित्व के धरा से विलीन होने की हो तो उनके पीछे रह जाने वाले उनके प्रिय जनों की स्थितियों का सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी जी ने अपने अदभुत उपन्यास “श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते” में कृष्ण के न रहने की इसी पर्वत सी ऊँची पीड़ा को दर्शाने का कठिन काम साधा है।

कृष्ण के पीछे छूट जाने वाले चरित्रों के दुख को, उनकी पुकार को शब्द देता है यह उपन्यास। अर्जुन, द्रौपदी, राधा, अश्वत्थामा, अक्रूर आदि व्यक्तियों की मनोदशा का जीवंत वर्णन करता है यह उपन्यास। यह उपन्यास पाठक को रुह की गहरायी तक भिगो जाता है।

एक अच्छी पुस्तक में उस देश में रची सब अच्छी रचनाओं का स्वाद आ जाता है। ऐसा अपने आप हो जाता है।

स्व. धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना अंधायुग में एक प्रसंग है जहाँ गांधारी कृष्ण को शाप देती है।

गांधारी :

तो सुनो कृष्ण
प्रभू हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को फाड़ खायेगा
तुम खुद उनका विनाश करके कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभू हो पर मारे जाओगे एक पशु की तरह

…………
कृष्ण :

माता!
प्रभू हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माता हो
…..
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं वरन मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
……..
जीवन हूँ मैं तो मृत्यू भी तो मैं ही हूँ माँ
शाप तुम्हारा स्वीकार है।

एक असहनीय दुख है उपरोक्त गांधारी कृष्ण संवाद में। दुख और क्रोध से भरी गांधारी कृष्ण को शाप तो दे देती हैं परन्तु कृष्ण के इस प्रकार शाप को स्वीकार करने से स्थितियाँ एकदम से बदल जाती हैं उनके लिये और गांधारी रोने लगती हैं।

गांधारी:

यह क्या किया तुमने
रोई नहीं मैं अपने सौ पुत्रों के लिये
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है
कर देते तुम शाप यह मेरा अस्वीकार
तो क्या मुझे दुख होता?
मैं थी निराश, मैं कटु थी
पुत्रहीना थी।

 

कृष्ण:

ऐसा मत कहो
माता!
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीन नहीं हो तुम।
प्रभू हूँ या परात्पर
पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो ।

जो दुख, जो भाव अंधायुग से लिये गये उपरोक्त प्रंसंग में है उसमें अगर ऐसा भी जोड़ दिया जाये कि कृष्ण वहाँ नहीं हैं और गांधारी को बाद में अपराध बोध होता है अपने द्वारा दिये गये शाप के कारण तो कृष्ण की अनुपस्थिति में गांधारी को हुयी छटपटाहट का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। गांधारी को तो साक्षात कृष्ण द्वारा ही संबल मिल गया पर बाकी चरित्र तो कृष्ण के बिना उनसे एक बार और मिलने के लिये छटपटाकर रह गये। और दिनकर जोशी जी की पुस्तक कृष्ण के पीछे छूट गये चरित्रों की विवशता का ही वर्णन करती है।

भावों को महत्व देने वाले जिस किसी भी भारतीय साहित्य प्रेमी ने इस पुस्तक को न पढ़ा हो उसके लिये इसका न पढ़ा जाना ऐसे ही है जैसे कि कोई बहुत मूल्यवान चीज थी हमारे आस पास और हम चूक गये उसके दर्शन करने से।

…[राकेश]

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मई 31, 2010

हफीज मेरठी : तीन मोती शायर की विरासत से

कुछ लोग शायद परिचित न हों उर्दू के शायर मरहूम हफीज मेरठी और उनकी शायरी से। मेरठ के रहने वाले हफीज साब ने जिन्दगी से जुड़ी हुयी शायरी की। उनकी शायरी को केवल समय बिताने का ख्याल लिये हुये नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि उनके शब्द पढ़ने वाले को अन्दर तक झकझोरते हैं। उनके शब्द पढ़ने वाले की नींद को तोड़ते हैं। अगर व्यक्ति किसी भी किस्म की खुमारी से घिरा हुआ अपना समय व्यतीत कर रहा है तो मरहूम शायर के शब्द उसकी खुमारी तोड़ कर उसे धरती पर जीते आदमी की जिन्दगी की असलियत से वाकिफ करा देते हैं।

जो लोग कभी भी उनकी शायरी से रुबरु नहीं हुये हैं ऐसे लोगों के लिये हफीज साब द्वारा अपने पीछे छोड़े गये शायरी के अनमोल खजाने से तीन रत्न यहाँ पेश किये जा रहे हैं।

दुआऐं तुमको न दूँगा ऐशो इशरत की,
कि जिन्दगी को जरुरत है सख्त मेहनत की।

बस यही दौड़ है इस दौर के इंसानों की,
तेरी दीवार से ऊँची मेरी दीवार बने

कहीं चमन में नई पौध को जगह न मिले
यह सोच असल में अहसासे कमतरी की है

मई 30, 2010

गुलजार साब ने चेतन भगत को सीख दी

लेखक चेतन भगत को वर्तमान समय के उन भाग्यशाली सितारों में गिना जा सकता है जिन्हे कला के क्षेत्र में उनकी योग्यता से कहीं ज्यादा सफलता मिल जाती है। फिल्मी दुनिया में ऐसा हमेशा से होता रहा है परन्तु गाहे बेगाहे लेखन की दुनिया में भी ऐसा देखने को मिल जाता है। उनके लेखन पर फिल्मों का असर बहुत ज्यादा है और वे इसी विचारधारा के साथ लिखते भी दिखाई देते हैं कि उनके लिखे हुये पर फिल्म बनेगी। अपने लिखे में विजुअल्स के तत्व का मुलम्मा चढ़ाने में कोई बुराई नहीं है। पर वे ऐसा कतई नहीं लिखते या अब तक ऐसा कतई नहीं लिख पाये हैं जिससे कि उन्हे मिली केवल आर्थिक सफलता और प्रसिद्धि के आधार पर ही अच्छे लेखकों और कवियों की जमात में शामिल कर लिया जाये।

ऊँट कभी कभी पहाड़ के नीचे आ भी/ही जाता है और ऐसा ही चेतन के साथ हो गया। आजकल कुछ भी कहीं भी कभी भी बोलने का फैशन हो गया है और चेतन को तो शशि थरुर जैसे लेखकों की संगत में भी देखा जा सकता है सो उन्हे इस बात की गलतफहमी हो जाना स्वाभाविक है कि वे विद्वान भी उच्च कोटि के हैं और अब वे कुछ भी कहीं भी और कभी भी कह सकते हैं और दुनिया उन्हे मौन होकर सुनेगी।

चेतन की प्रसिद्धि के कारण उन्हे आजकल कई कार्यक्रमों में देखा जाने लगा है। इस बार गलती से वे गुलजार साब को छेड़ बैठे। एक कार्यक्रम में चेतन गुलजार साब के बारे में बोलते हुये  कह गये,” मुझे गुलजार साब द्वारा लिखा गया गाना कजरारे कजरारे बहुत पसंद है, क्या पोएट्री है उसमें“।

उन्होने तो यह ऐसा दिखाने के लिये किया होगा कि वे पोएट्री की समझ रखते हैं या आजकल जैसा कि लोग एक दूसरे की तारीफ करके सम्बंध मधुर बनाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं और सोचते हैं कि ऐसा करके वे अपने लेखन आदि की स्वीकृति भी सबसे ले लेंगे, ऐसा ही कुछ उन्होने भी किया होगा। उन्होने सोचा होगा कि शशि थरुर आदि लेखकों को जीतने के बाद अब वे गुलजार साब के किले में भी प्रवेश कर सकते हैं। परन्तु उनका मिठास भरा प्रयास गुलजार साब को हत्थे से उखाड़ गया और नाराज होकर उन्होने माइक्रोफोन मांगा और उसी समय कहा,”चेतन मुझे खुशी है कि आपके जैसे लेखक को गाना पसंद आया पर मुझे नहीं लगता कि उसमें उपस्थित कवित्त भाव को आप समझ पाये हैं जैसा कि आप यहाँ सबके सामने दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं। पर अगर आप जोर देंगे तो मैं आपको उस गाने की दो पक्त्तियाँ सुनाता हूँ और आप मुझे उनका मतलब बता दें“।

तेरी बातों में किमाम की खुशबू है
तेरा आना भी गरमियों की लू है
“।

चेतन हक्के बक्के रह गये गुलजार साब की ऐसी स्पष्टवादिता का स्वाद चखकर। गुलजार साब ने आगे उनसे अनुरोध किया।
कृपया उसके बारे में बोलें जिसके बारे में आपको जानकारी है। जिस बात के बारे में आपको जानकारी नहीं है उसके बारे में बोलने का प्रयत्न न करें“।

आजकल हर बात मैनेजमेंट के अंतर्गत मानी जानी लगी है और ऐसा माना जाने लगा है कि सब चलता है और सब कुछ अपने प्रबंधन से मैनेज किया जा सकता है और कला का क्षेत्र भी इस बीमारी से अछूता नहीं रह पाया है।

आधी अधूरी जानकारी और कला के क्षेत्र में थोड़ी बहुत दखलअंदाजी के बलबूते लोग दुनिया इस आधार पर फ़तेह करने निकल पड़े हैं कि वे अपनी व्यवहारकुशलता और सामने वाले की तारीफ करके सब सम्भाल लेंगे।

ऐसा भी संभव है कि ज्यादातर लोग गुलजार साब को ही दोषी ठहरायें और कहें कि कि ऐसे चेतन भगत को टोका जाना गलत था पर उनका भड़क जाना एक सूक्ष्म किस्म के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रयास है

कोई दो तीन साल पहले लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप ने अपने एक ब्लॉग में गुलजार साब से जुड़ी एक रोचक घटना का जिक्र किया था।

सत्या बनाये जाते समय निर्देशक राम गोपाल वर्मा और उनकी टीम, जिसमें अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला आदि भी शामिल थे, ने महसूस किया कि गुलजार साब द्वारा लिखे गये एक गाने के दो प्रकारों में से पहले वाला ज्यादा उपयुक्त्त लगता है।

गुलजार साब ने पहले लिखा था “ग़म के नीचे बम लगा के ग़म उड़ा दे” और बाद में उन्हे लगा कि “गोली मार भेजे में” ज्यादा अच्छा है।

तय किया गया कि अनुराग ही गुलज़ार साब को यह बताने की जहमत उठायेंगें कि “ग़म के नीचे बम” वाला गीत ज्यादा अच्छा है।

अपनी नादानी में जैसे ही अनुराग ने कहा कि ” सर गम काम नहीं करता “ गुलजार साब ने उन्हे टोक दिया,” बरखुरदार पहले ग़म को ढ़ंग से बोलना तो सीख लो“।

अनुराग लिखते हैं कि बस मैं तो विचार विमर्श से एकदम बाहर ही हो गया उसके बाद। वे आगे लिखते हैं,” शुक्र है भगवान का कि उन्होने गोली मार भेजे वाले संस्करण पर जोर दिया। क्या गाना बना था वो“।

आशा है अनुराग कश्यप की तरह चेतन भी इस घटना को इसके सही परिपेक्षय में लेंगे और इसे अपनी मानहानि का मुद्दा न बना कर इससे कुछ सीखने की कोशिश करेंगे।

डिस्क्लेमर : गुलजार साब और चेतन भगत वाले मामले को छ्पी रिपोर्टस के आधार पर कोट किया गया है।

मई 29, 2010

गज़ल क्या है

सुबह के इन घंटों को गुरुदेव चौपाल काल कहा करते हैं। इन्ही घंटों में उनके तमाम शिष्य गण उनके दर्शन कर अपनी जो भी शंकाऐं होते हैं उनके सामने रखते हैं और गुरुदेव अपनी सामर्थ्य भर उनका निवारण करने की कोशिश करते हैं।

आज भी रोजाना उनके दरबार में हाजिरी लगाने वाला एक शिष्य वहाँ पहुंच गया।

गुरुदेव चाय पी रहे थे। आँखें उनकी बंद थीं और वे चाय की चुस्कियों के बीच संतूर वादन का आनंद ले रहे थे। शिष्य चुपचाप बैठ गया। यह तो स्पष्ट था कि उसे कुछ पूछने की जल्दी थी पर वह अपनी बैचेनी पर काबू पाने में सफल रहा। कुछ मिनटों बाद ट्रैक खत्म हुआ तो गुरुदेव ने आँखें खोलीं।

शिष्य ने लपक कर क्षण पकड़ लिये और अपना प्रश्न दाग दिया,” गुरुदेव एक बात बताइये, ये गज़ल क्या है। जिसे देखो गज़ल की बात करता दिखायी देता है“।

प्रिय मित्र, गजल को जानने के लिये कुछ शब्दों का जानना जरुरी है। शे’र नाम से तो तुम परिचित हो ही। चलों यूँ कर लेते हैं कि तुम थोड़ा गृहकार्य ले लो। हफ्ता दस दिन लग कर कुछ शब्दों को अंदर से बाहर तक पूरा निचोड़ कर पी जाओ। इन शब्दों को नोट कर लो”।
अशआर“, “मतला“, “मकता“, “बहर“, “काफिया” और “रदीफ

गुरुदेव मुझे नहीं लगता कि लोग इन बारीकियों  को समझते हैं। वे तो किसी भी गीत को गज़ल की श्रेणी में रख देते हैं“।

मित्रवर अपनी मेहनत के पसीने का एक कतरा बहाये बिना सभी कुछ जान लेने का प्रयत्न न करो। जल्दी क्या है। इन शब्दों को ढ़ंग से जानो तो पहले और उनका गज़ल से सम्बंध जानो पहचानो “। इस मुद्दे पर शास्त्रार्थ तो बाद में हो ही जायेगा और लोगों के सामने“।

ठीक है गुरुदेव मैं इन शब्दों को घोटता हूँ जम कर। पर यह तो बता दीजिये कि क्या गज़ल सिर्फ और सिर्फ उर्दू में बनती है “?

नहीं मित्र, ऐसा भ्रम जरुर फैला हुआ है लोगों में। गज़ल तो एक विद्या है और इसे किसी भी भाषा में गढ़ा और कहा जा सकता है“।

एक बात और बता दूँ कि अभी हमने जिन तकनीकी बातों का जिक्र किया, समय के साथ हरेक विद्या में परिवर्तन आते हैं और लोग ऐसी गज़लें भी कहते रहे हैं जो इन तकनीकी व्याकरणों की हदों से बाहर निकल कर कुलाँचें मारती दिखायी देती हैं“।

और अंत में एक बात कि तकनीक का जानना ही जरुरी नहीं है गज़ल कहने के लिये, उसे गढ़ने के लिये|  उसमें अपने समझे हुये का सत्य नहीं होगा, और उसकी बुनियाद दिल की गहराइयों से आती भावनाओं के मिश्रण से नहीं बनी होगी तो मामला जमेगा नहीं | और यह बात सारे काव्यशास्त्र पर लागू होती है“।

शिष्य को उत्सुकता से अपनी ओर देखता पाकर गुरुदेव बोले,” चलो तुम्हे दो गज़ब की चीजें सुनाते हैं। छोटी हैं पर अर्थ गहरे लिये हुये हैं“।

इश्क को दिल में जगह दे नासिख,
इल्म से शायरी नहीं आती
|

अब दूसरा सुनो


जिस्म की चोट से तो आँख सजल होती है,
रुह जब ग़म से कराहे तो गज़ल होती है
|

मई 29, 2010

पुनर्मिलन


दूर कहीं एक तारा टूटा
पास यहीं एक कोयल कूकी

पास यहीं किसी ने यादें उगायीं
दूर कहीं किसी ने हिचकी ली

दूर कहीं किसी के नयनों में अश्रु छलके
पास यहीं किसी ने आँखे पोंछी

पास यहीं किसी ने ऊपर उड़ता जहाज देखा
दूर कहीं किसी ने चाँद को आँखों से पिया

दूर कहीं किसी ने उपवास किया
पास यहीं किसी ने सालों बाद खट्टे बेर चखे

पास यहीं किसी ने नज़्म पढ़ी
दूर कहीं किसी ने सितार छुआ

दूर कहीं किसी से लिपट गया एक मासूम बालक
पास यहीं किसी के काँधे झूल गया एक नन्हा बालक

पास यहीं से कोई काँपता हुआ उठा, चला और सो गया
दूर कहीं से कोई काँपता हुया उठा, चला और सो गया

……………………………………………………………………

दूर कहीं से कोई दशकों और हजारों मीलों के फासले तय कर गया
पास यहीं से कोई दशकों और हजारों मीलों के फासले तय कर गया

……………………………………………………………………

महसूस सबको हुआ होगा
जब क्षण भर को बिजली कौंधी थी
जब क्षण भर को बादल गरजे थे
जब क्षण भर को पक्षी मौन हुये थे
जब क्षण भर को चंदा सूरज एक साथ थे
जब क्षण भर को पेड़ पौधे फूल सब सिहर उठे थे
जब क्षण भर को पानी बरसा था
दो आत्माओं का मिलन हुआ था बस तभी।

…[राकेश]

मई 28, 2010

ट्विटर मैनिया

“ सर आप भी ट्विटर ज्वाइन कर ही डालो अब “। सेक्रेटरी ने अपने बॉस से अनुरोध किया।
उसके बॉस को देश के टॉप के दस बारह बड़े फिल्मी सितारों में से एक माना जा सकता है।
“ अरे सब टाइम पास… टाइम बेकार करने का मामला है “।
“नहीं सर ऐसा नहीं है। फेसबुक की लहर के बाद ट्विटर ने एक आंधी तूफान की तरह आकर सबको अपनी गिरफ्त में ले लिया है । …सोशल नेट्वर्किंग का यह प्लैटफार्म फ्री की पब्लिसिटी ला देता है । लाखों फैन्स तक आप अपनी बात तुरन्त पहुँचा सकते हैं । इसके लिये मीडिया की बाट जोहने की जरुरत भी नहीं है ।
हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा आये की कहावत वाला  मामला समझ लीजिये“।
“पर यार मुझे तो कम्प्यूटर से बोरियत होती है “। सितारे ने कहा।
“सर कौन सा आपको कम्प्यूटर पर प्रोग्रामिंग करनी है। बड़ी बड़ी उम्र वाले लोग ट्विटर यूज कर रहे हैं। एक बार आप शुरु कर देंगे तो सब आसान लगने लगेगा। मेरी बात आप मानो, इससे अच्छा साधन और मौका नहीं मिलेगा फैन्स बनाये रखने का “।
“ पर बात क्या करेंगे रोज के रोज फैन्स से? ये बाकी लोग क्या बातें करते हैं अपने फैन्स से “?
“सर जी आप मानोगे नहीं आजकल तो हमारी इण्डस्ट्री वाले लोग अपने सम्बंधी और मित्रों के साथ भी ट्विटर पर ही सम्पर्क करते हैं। भले ही दिन में सौ बार उनसे फोन पर बात कर लेते हों परन्तु ट्विटर पर भी एक दो लाइन जरुर लिख डालते हैं। आम फैन्स लोग इन्ही बातों को पसंद करते हैं उन्हे लगता है कि सितारों की बेहद निजी बातचीत को वे सीधा पढ़ रहे हैं बिना किसी परदे के। सर जी प्रेमी प्रेमिका तक ट्विटर पर एक दूसरे से सम्पर्क करते दिखायी देते हैं “।
सितारे को अपनी ओर गौर से देखता पाकर सेक्रेटरी ने बात आगे बढ़ायी,” ट्विटर का इस्तेमाल अपनी मार्केटिंग करने में बहुत अच्छे ढ़ंग से हो सकता है और लोग ऐसा कर भी रहे हैं। ऐसे ऐसे सितारे, जिन्होने अपने बारे में ऐसा प्रसिद्ध कर रखा है या करवा रखा है कि वे हद दर्जे के प्राइवेट व्यक्ति हैं या उनकी प्रवृति या प्रकृति एक बहुत ही अंतर्मुखी किस्म के व्यक्ति की है और वे भीड़ से मिलने में या लोगों से खुलने में बहुत शर्म महसूस करते हैं, अपनी फिल्म रिलीज होने के मौके पर एकाएक फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लैट्फार्म्स पर सक्रिय हो जाते हैं “।
“ कौन कौन पहुँच गये हैं वहाँ “
“ लगभग सभी वहाँ पहुँच गये हैं बल्कि मैं तो कहुँगा कि आप ही रह गये हो “
सितारे को सोचने वाली मुद्रा में पाकर सेक्रेटरी ने आगे कहा,” सर, बाजार में छवि प्रशंसकों की संख्या पर निर्भर तो करती ही है। और आपस में प्रतियोगिता एक सत्य है जिसे नकारना बड़ा मुश्किल है। आजकल मीडिया द्वारा जबर्दस्ती खड़े किये गये भ्रम के कारण ऐसा माहौल बना दिया गया है जिससे लगे कि जिसके ट्विटर पर जितने ज्यादा फॉलोवर वह उतना ही बड़ा सितारा है। आज ट्विटर पर न होने को इस रुप में भी लिया जा सकता है कि आपकी मार्केट वल्यू कम हो गयी है। मुझे माफ करें पर कुछ लोग तो ऐसा प्रचार भी कर सकते हैं कि आपका मार्केट ही खत्म हो गया है। ट्विटर पर जाना तो बनता ही बनता है “।
“अच्छा ट्विटर पर गये भी और उतने फैन्स नहीं जुड़े जितने और सितारों के हैं तो और ज्यादा भद पिटेगी। अभी कम से कम वहाँ न होने से इस बात का खतरा तो नहीं है। मैं कोई बहुत ज्यादा ओपन तो हूँ नहीं अपने फैन्स के साथ “
“सर मेरे पास उसकी स्कीम है। और आप फैन्स के साथ रुबरु तो बैठे नहीं है। जैसे आप फिल्मों में एक्टिंग करते हो ऐसी ही ट्विटर पर अपने शब्दों के द्वारा भी कर सकते हो। मेरी बात मानो, यह बहुत अच्छा मौका है बाजार पर कब्जा करने का ”
“ पर फैन्स वाली स्कीम क्या है तुम्हारे पास “?
“सर आप नाराज मत होना। आप बस मन से तैयार हो जाओ ट्विटर पर आने को और वहाँ पर आपके छा जाने का सारा बंदोबस्त मैं कर लूंगा “
” तब भी कुछ तो बताओ “
“सर जो आपके फैन्स हैं वे तो आपके ट्विटर पर जाते ही आपको फालो करना शुरु कर देंगे। लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हे किसी भी सितारे को फालो करना है और कुछ ही दिन में वे आपको भी फालो करना शुरु कर देंगे पर…”
“पर “?
“पर मेरी योजना इन लोगों पर निर्भर रहने की नहीं है “।
“फिर ” सितारे की उत्सुकता बढ़ गयी थी।
“सर आपके ट्विटर ज्वाइन करने को मै इतनी बड़ी घटना बना दूँगा कि  बाकी  सब सितारे आपके सामने फीके लगने लगें। वहाँ तो सब नम्बरों का खेल है “।
सितारे को अपनी ओर देखता पाकर वह आगे बोला,” थोड़ा पैसा खर्च करना पड़ेगा। कम्प्यूटर सैंटर्स …, दूसरी जगहों पर। सब मेरे दिमाग में है कि कहाँ करना है और कैसे करना है “।
सितारा ऐसी उत्सुकता से भर गया था जैसे किसी जासूसी उपन्यास का प्लॉट सुन रहा हो।
” सर जी आपके ट्विटर पर आने के पहले दिन कोई एक लाख से भी ज्यादा लोग, मतलब ट्विटर एकाऊंट्स, आपको फालो करेंगे। दूसरे दिन और ज्यादा ट्विटर एकाऊंटस आपको फालो करना शुरु कर देंगे। …और सारा काम अलग अलग जगहों से करवायेंगे “।
“शुरु के दो दिन में सबसे ज्यादा फालोवर्स को आकर्षित करना मीडिया में न्यूज बनायेगा ही बनायेगा और जो भी आपको फालो नहीं कर रहा होगा वह महसूस करेगा कि वह पीछे छूट गया है और जल्दी से जल्दी इस मुहीम में जुट जायेगा। हमारे … ट्विटर एकाऊंट्स आपकी फैन्स लिस्ट में नम्बर बढ़ायेंगे  बाकी काम आपके फैन्स जो ट्विटर पर सक्रिय होंगे वे करेंगे ही करेंगे “।
“अरे यार स्कैंडल न हो जाये बाद में “
“सर कुछ नहीं होगा आप तो कहीं भी पिक्चर में नहीं आओगे। मैं भी कहीं से सीधे सीधे तौर पर इस सबसे सम्बंधित नहीं रहुँगा। मैने सब प्लान बना लिया है “।
सितारा सोच में पड़ गया।
“सर ज्यादा सोचो मत। आज से करीब 20  दिन या एक माह बाद आप ट्विटर पर अवतरित होओगे, तब तक हमारे काम के लिये ट्विटर एकाऊंटस बन चुके होंगे। और आप तो अपने किसी परिचित सितारे की मार्फत ट्विटर पर जाओगे, ज्वाइन करने से 1-2 दिन पहले आप ट्विटर का जिक्र छेड़ोगे और अपने दोस्तों से सीखोगे कैसे ट्विटर का इस्तेमाल किया जाये “|
सितारे ने पूछा,” क्या वाकई सितारे ट्विटर पर प्रशंसकों की संख्या को लेकर इतने गंभीर हैं “।
“सर हाल ही में घटा एक किस्सा सुनाता हूँ। कुछ दिन पहले किसी तकनीकी समस्या के कारण ट्विटर पर मौजूद सितारों के प्रोफाइल्स में प्रशंसकों की संख्या नगण्य हो गयी थी और एकदम से सितारे इस परिवर्तन के बारे में लिखने लगे थे। जाहिर है कि कहीं न कहीं ऐसी बात ने उन्हे परेशान तो किया ही था “।
सितारा किसी सोच में डूब गया।
“सर ज्यादा सोचो मत। इतना बड़ा काम नहीं है ये। रिस्क कतई नहीं है। मैं सब काम ऐसे तरीके से करुंगा कि किसी को कुछ खबर नहीं होगी“।
“ओ.के. देन लेट्स डू इट “

…[राकेश]

मई 27, 2010

कौन तो लिखता है, कौन तो रचता है

प्रतीत तो ऐसा ही होता है
कि यह लिखा मेरे द्वारा ही जा रहा है
पर क्या लिखने वाला वास्तव में “मैं” ही हूँ ?
मेरे देखे मेरे समझे तो,
कभी एक तीन से तेरह साल का बाल मन,
कभी चौदह से उन्नीस साल का किशोर मन,
कभी बीस से पचास साल का युवा मन,
कभी पचास से साठ साल का प्रौढ़ मन,
और कभी साठ से सौ साल का वृद्ध मन
यह सब लिखता है।
क्या यह वही “मैं” हूँ जो कि “मैं” वास्तव में हूँ?

आयु की बात को छोड़ भी दें तो
क्या यह जो मन जिसके द्वारा सब कुछ लिखा जा रहा है,
वह स्त्री है या पुरुष?
या कि वह निरपेक्ष है
इन दोनों ही जैविक अंतरों से,
इन दोनों ही भावों से,
या कि वह ऊपर उठ चुका है ऐसे किसी भी अंतर से?

यदि सब कुछ “मैं” के द्वारा ही लिखा जाता है
तो क्यों श्रद्धा भाव उमड़ता है प्रकृति के प्रति,
इस पूरी सृष्टि के प्रति
तब तब
जब जब कुछ भी बहुत अच्छा लिखा जा सकना संभव हो जाता है
और ऐसा लगता है कि मेरा तो
सारा अस्तित्व ही एक खोखली बासुंरी समान हो गया है
जिसमें कोई और ही फूँक भर कर
सुरीली तान छेड़ रहा है।

यदि सब “मैं” का भाव ही रचता है तो क्यों
एक अदभुत कृति की रचना के समय
शिल्प और शिल्पकार के बीच स्थित
द्वैत खो जाता है
और रह जाता है केवल
“एक” का भाव।
इस अद्वैत के भाव को या तो “मैं” कह लो या
“वह” कह लो
पर इस “मैं” में “वह” भी है
बल्कि “वह” ही महत्वपूर्ण है
और उस “वह” में “मैं” का भी समावेश है

पर एक बात विनीत भाव से सामने आती है
यह “मैं” वही नहीं है
जो कि यह बताता चलता है
कि अरे सब तुमने ही तो किया है।

बहुत कुछ ऐसा रचा जाता है
जो जन्म तो लेता है
पर उसे जन्माया नहीं जाता
उसे जन्माया नहीं जा सकता
वह तो बस ऐसे ही उतरता है
मानस की शुद्धतम अवस्था में
जैसे कि बाकी सब रचनायें उतर रही हैं
प्रकृति में
प्रकृति के द्वारा ही
यहाँ वहाँ
जल में, थल में, नभ में,
धूप में छाया में।

…[राकेश]

मई 27, 2010

मन के भय

समय कभी ऐसे भी रंग दिखाता है
कि खुशियों से भरे क्षण भी
पूरा सुकून नहीं ला पाते|


मन अन्दर ही अन्दर चौंकता रहता है,
एक भय सा बैठ जाता है मन में
ऐसा लगने लगता है
जाने कब ठंडी बयार के झौंके बहने बंद हो जायेंगे
और निराशाएं, कुंठाएं हमेशा की
सिर उठा सामने खड़ी हो जायेंगी।

ऐसा क्यों होता है?
इसका पता तो चल नहीं पाता।

शायद साहस खोजना होता है गहरे में
अंदर कहीं अपने ही वजूद में
ताकि
कठिन वक्त के दौर में
व्यक्ति सीधा खड़ा हो सके पैरों पर,
दौड़ न भी पाए तो
कम से कम
धीरे धीरे चल तो सके।

…[राकेश]

मई 25, 2010

स्वयं की बुराइयों का भय

मन डरता है

गुलाब के उस फूल की भाँति

जिसे भय हो कि

जब उसे चाहने वाला

उसे छूने लगेगा

तो उसके हाथों में

कहीं काँटे न चुभ जायें

…[राकेश]

मई 23, 2010

मन के फरेब

सच कुछ भी हो
पर मन माने तब ना।

वह तो विचार ढूँढे रखता है
अपने आप को बहला कर रखने के लिये।

अपने मुताबिक शब्दों की खुराक से
मन का पेट तो भर जाता है
पर वक़्त की कसौटी पर
ऐसे बहलाव
ऐसे छलावे
खतरनाक ही साबित होते हैं।

पर मन की ये खूबी कि
वह तमाम तरह की खुद ही की
असफलताओं, गलतियों को
यूँ संभालता है कि
जानते हुए भी कि ये सब झूठ है
व्यक्ति उन्हे सच मान बैठता है !

…[राकेश]

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