Posts tagged ‘Badan’

जून 4, 2014

प्रेम का वो अदभुत अनुभव

निमंत्रण akhiri-001

…………………..

आओ थोडा प्यार कर लें

चूम लें तुम्हे

आंसुओं से धुली आँखों की

पाक नज़रों में बसी उदासी को

विरह में जलते ह्रदय से उठती भाप

से सूखे पपडाए होंठो को

चूम ले तुम्हारे तपते माथे को

आओ रख दें होंठ अपने

जलते तुम्हारे बदन पे

ख़त्म कर दें खुद को

तुम्हारी तपिश मिटाने में

आओ ना!

… …. …. …. …. ….

प्रणय 

…………………………………………….

 

नीले  नीम अँधेरे उजाले में

आती हो जब दबे पाँव सकुचाई

डरी सहमी हिरनी सी

देखता रह जाता हूँ

तुम्हारे आभूषण जडित रक्तिम बदन को …

जैसे लाल आग  नीली लपटों में घिरी…

तुम्हारे बदन की  लालिमा

जैसे धीरे धीरे

उतरती है मेरी आँखों में…

ये कैसा नशा है?

ये किसका नशा है?

उस मदिरा का जो तुमने पिलाई थी सुराही से

या उस का जो टपक रही है तुम्हारी मद-भरी आँखों से?

 

moonlit-001बहक रहा है सारा आलम चारों ओर

पिरा रहा है बदन कि जैसे टूटना चाहता  हो

उफ़! ये तुम्हारी अंगड़ाई

आकार-प्रकार बदलता तुम्हारा जिस्म

जैसे चुनौती दे रहा हो कि आओ

समेट लो और भींच लो बाँहों में…

बढता ही जाता है शोर साँसों का

अपने आप मेरा बदन

ले  लेता है तुम्हारे बदन को अपने आगोश में

तुम विरोध भी करती हो और

समाती भी जाती हो

मेरे  आगोश में

मदहोश करती जाती है

तुम्हारे बदन की छुअन

दीवाना कर  रही  हैं  तुम्हारी  बाँहें

तुम्हारा  उन्नत  यौवन …

रेशमी  मखमली  बदन …

 

होश  कहाँ   अब  तुम्हे भी …

मैं पढ़ सकता हूँ तुम्हारी आँख के खिंचते डोरे

पता कहाँ चला

कब मेरे होठों ने

बात शुरू कर दी तुम्हारे होठों से

सच मानों

तुम्हारा आज का रूप कुछ और ही है

तोड़ती जाती हो वो बंध जो खुल नहीं पाते

डरी सहमी शर्मीली हिरनी की खाल से

निकल कर सामने आ रही है

कामोन्मत्त  सिंहनी…

जो निगल जाना चाह रही है यूँruhdark-001

समूचा मुझको पिघला के

समो लेना चाह रही मुझ को खुद में

हैरान हूँ मैं

कि कैसे पार कर दी तुमने

उन्मुक्तताओं की सीमाएं सारी

उफ़! ये तुम्हारा शीशे सा पिघलता जिस्म…

और  ये उठता  गिरता साँसों का ज्वार…

इस ज्वार में बह जाने को बेक़रार तुम और मैं…

हो जाते हैं एक …

एक तूफ़ान सा गुज़र जाता है जैसे

होश आता है तूफ़ान के बाद

जो अपने पीछे छोड़ जाता है…

एक डरी सकुचाई हिरनी

लेकिन तृप्त अहसासों से  भरी

मैं आज गवाह हुआ हूँ

हमारे एक सबसे उन्मुक्त देह-संगम का

हिरनी -सिंघनी-हिरनी परिवर्तन का

 

 अभिसार के बाद

………………………………………………………………..

अब जब सब बीत गया है तो मुझे अचरज होता है

न जाने क्या था जो मुझ पे छाया था….

नशा… खुमार…. उन्माद… जूनून…

गर्म अहसास तुम्हारे नर्म जिस्म का

अनावृत जिस्म

विवश करे दे रहा था मुझे

कि खूबसूरती के उदाहरणों को देखूं

या सुखद स्पर्शों का अहसास करूँ

मेरी दुविधाओं को बढ़ातीं

बंद हुयी कभी कभी खुल जाने वाली तुम्हारी आँखें

जो मेरी आँखों में झाँक कर मुझे आमंत्रित करतीं

और फिर मेरा जवाब पा

शर्मीले भावों से भर फिर से मुंद जातीं

सबसे बढ़titan-001कर मुझे मोह रहा था

मेरी ख़ुशी में सुख तलाशता

तुम्हारा समर्पण…

मेरी भावनाओं का ज्वालामुखी तो फटना ही था…

सच है मैंने कुछ किया नहीं था

सारे असर तुम्हारे थे

मैं तो जैसे जी गया था उन लम्हों में

जब तुम्हारे आगोश में सोया था

निश्चिन्त…

निर्द्वंद…

संतुष्ट…

Rajnish sign

 

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फ़रवरी 2, 2014

खूबसूरत रात…

कल रात बहुत खूबसूरत थीakhiri-001

आँखों में गुजरी

फिर भी  बहुत छोटी थी

कल रात

मेरा चाँद मेरी बाँहों में पिघला था

सुलगते बदन में

कैसे कोई कैसे रह सकता है?

सर्द चांदनी की अगन तब से तारी है हम पे

ये रात इतनी कम क्यों थी?

Rajnish sign

जनवरी 3, 2014

तुम आई थीं…इतना तो याद है मुझे

तुम आयीं थी पास मेरे…lovers-001
कल रात
याद  तुम्हे भी होगा इतना तो…
लब चूमे थे लबों से अपने
पलकों पे मोती बीने थे
पास खींच के गले लगाया
याद तुम्हे भी होगा…
इतना तो
आँखों के डोरों ने रंगत अपनी
लाल करी थी…
कुछ बात कही थी
दिल ने अपनी गति बढ़ाकर
हाथों को उकसाकर मेरे हाथ धरे थे
याद तुम्हे भी होगा…
इतना तो
तुमको याद तो होगा सब कुछ
लबों का मिलना…
साँसे बढ़ना
सीने का गिरना…
उठना
चुप रह कर के सब कुछ कहना
अपने मिलने की सीमा तक
रुकना, मिलना, चलना, बहना,
तुम को  क्या क्या और याद है?
मैं तो सब कुछ भूल गया था
तेरे आने से तेरे जाने तक
दिया बुझे से सहर हुए तक
रौशन मेरी रात रही बस
तिल तिल मेरा बदन जले तक
मुझको बस याद है इतना
मुझको तो बस याद है इतना…
तुम आई थीं!
Rajnish sign
दिसम्बर 1, 2013

टूट कर भी मुकम्मल रहूंगा

ख्वाब mirrorwoman-001

न चेहरा होता है

न बदन कभी

अगर

बिखरेगा भी तो

कितना बिखरेगा?

मैं  टूटा भी

सौ हिस्सों में गर

हर हिस्सा  मेरा मुकम्मल ही  रहेगा

मैं आइना नहीं

जो टूटा तो

अक्स  बाँटूगा तेरा टुकड़ों में

मेरे हर हिस्से में

तब भी

तुम पूरा का पूरा ही समा  सकोगी

Rajnish sign

नवम्बर 29, 2013

महकता चहकता फिरता हूँ

महकता बदनwoman-001

रेशम सी छुअन

नज़र भर शफक

शर्म की सिहरन

जिस के देखे को तरसते थे

आज संग चलती है…

रखता  है दहका  के मुझे

तुम्हारा  शीशे सा बदन…

आज कहे बिना रहा नहीं जाता

तुमने पूछा भी कि

मैं क्या सोचता हूँ

पूछा है तो सुनो

जिस किसी शाम

मेरे सपने उगते हैं तुम्हारे कंधो पे

उस शाम की महक में

तुम्हारी साँसे घुल जाती हैं

रात भर बूँद बूँद उतरती है

ये खुशबू मुझमे…

और फिर महकता चहकता रहता हूँ

मैं दिन भर…

Rajnish sign

नवम्बर 20, 2013

ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

रात की खुमारी,MB-001
तेरे बदन की खुशबू,
नथुनों में समाती मादक गंध
तेरे होठों से चूती शराब…
तेरे सांचे में ढले बदन की छुअन
रेशम में आग लगी हो जैसे
तराशे हुए जिस्म पे तेरे

फिरते मेरे हाथ
वो लरजना
वो बहकना
वो दहकना
वो पिघलना
हाय वो मिलना

अगर वो ख्वाब था तो इतना कम क्यूँ था
अगर वो ख्वाब था तो ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

(रजनीश)

नवम्बर 15, 2013

आओ शोलों की तरह जलें…

रातें काली ही होतीं मेरी nightfire-001

अगर

तेरे बदन की लौ उन्हें रौशन न करती…

हर रात तू जलती है साथ मेरे शमा की मानिंद

और सुलगता हूँ मैं  परवाने की तरह

ये रोज का धीमे-धीमे,

अधूरा अधूरा सा जलना

धुआँना गीली- सीली लकड़ी सा

हर रात,

पिछली गर्म रात को उतारना खूँटी से

और ओढ़ लेना कुछ देर भर को

छोड़ देता है कितने अरमानो को धुंआ धुंआ

कब तक यूँ भड़कने से रोकोगी बोलो…

आओ एक रात इन बेचैन दो जिस्मो को

लिपट जाने दो एक दूसरे से ऐसे

कि खूब शोलों की तरह जलें रात भर

सुबह होने न दें फिर…

आओ न एक बार…

(रजनीश)

नवम्बर 13, 2013

चांदनी शर्मा के ओट में छिप गई

moonlovers-001रोज यही एक सपना देखता हूँ मैं

जागी अधखुली आँखों से…

श्वेत  चाँदनी  में लिपटी तुम चल रही हो

साथ साथ मेरे…..

मैं थाम लेता हूँ हाथ तुम्हारा हौले से…

महसूस कर सकता हूँ तुम्हारी सिहरन को

सहलाता हूँ तुम्हारी उँगलियों को,

छूता हूँ  पोरों को…

दूर कहीं दूर…निर्जन में

बैठ जाते हैं हम तीनो…

तुम, मैं और तुम्हारे बदन से लिपटी चाँदनी…

बैठे रहते हैं चुपचाप पास-पास

एक दूसरे के सर से सर जोड़े

कभी चेहरा लिए हाथों में

एक दूसरे की आँखों में खोये

सुनते हैं साँसों की मौन भाषा को…

बस खोये से रहते हैं एक दूसरे में

मैं सहलाता रहता हूँ तुम्हारी अनावृत बाहें

और  महसूस करता रहता हूँ तुम में

उठते स्पंदन को

तुम कुछ और  सिमट आती हो नज़दीक मेरे

हमारे बीच की चाँदनी असहज होने लगती है

रहती है पर निशब्द…

कानों की लौ गर्म होने लगी है

किसी तीसरे से बेखबर हम बस एक दूजे में गुम…

साँसों की लय पे उठते गिरते सीने को आँखों में समेटते

एक दूसरे की नज़रों को नज़रों से चूमते

होंठ कांपते हैं मेरे

तुम्हारे भी…

थरथरा रहे हैं दोनों के बदन…

जैसे दे रहे हों  मौन आमंत्रण…

साँसे असंयमित होने लगती है…

और बहुत उष्ण भी

पिघलने लगती है चाँदनी हम दोनों के बीच की

दूर उतर कर खड़ी  हो जाती है तुम्हारे बदन से

रख देता हूँ कांपते होंठ तुम्हारे जलते होंठो पे

चाँदनी शर्मा के किसी ओट में छुप जाती है

तीन से दो होने के लिए

या फिर दो से एक होने के लिए…

रात की चादर के तले…

बस यही एक ख्वाब मैं हर वक़्त देखता रहता हूँ

जागी अधखुली आँखों से

(रजनीश)

नवम्बर 10, 2013

कितना कुछ ज़िंदा रहता

गाल पे गिर आई लट को तर्ज़नी से लपेटतेguru-001
अपनी आँखों की शफक से मेरी पलकों को झपकाते
पूछा था तुमने,
-बहुत दिनों से तुम्हारा लिखा कुछ पढ़ा नहीं
क्या हुआ?
लिखना बंद कर दिया क्या?
क्यों कर दिया?-
चाहा तो बहुत
कह  दूँ
तुम जो नहीं थी…
तुम मेरी प्रेरणा
तुम मेरी कविताओं की  धुरी
तुम जब गयी थी
तब ले गयी थी न
मेरे शब्द
मेरी कलम
मेरी जुबान
मेरे गर्म अहसास
मेरे जीवन का ताप
मेरी साँसों से अपनी महक
मेरे बदन से अपने बदन के  छुअन की दहक
एक बर्फ सी जमी है तब से मेरे वजूद पे
कौन लिख सकता है ठंडी अकड़ी हुयी उँगलियों से?
पिघला दो मुझे अपने आगोश में लेके
रख दो अपने गर्म होंठ मेरे होंठों पे
बदल दो रंग इन का
नीले पड़े होंठो से कविता नहीं निकलेगी
मेरे हाथों को अपने हाथों में लेके
इन्हें इन के ज़िंदा होने का अहसास लौटा दो
अब तुम हो लेकिन शायद
हम दोनों के बीच इस बर्फ के सिवा कोई और भी है
लेकिन सच ये भी है कि
अगर कह पाता तुमसे कुछ
तो ये बर्फ भी नहीं होती
ये तीसरे का अहसास भी न होता
मेरे होंठ नीले न होते
मेरी उंगलियाँ ज़िंदा होती…
(रजनीश)
नवम्बर 8, 2013

चलो एक बार फिर से मिल जाएँ हम

मेरी  सारी  हसरतें…  lovers-001

सारी तमन्नाएँ…

मेरे सारे अरमान…

मेरे सारे सपने

सिल गए हैं …

अस्तित्व से तुम्हारे ही

तुम मेरे शब्-ओ-रोज़ के हर लम्हे में

देखे अनदेखे

ख्वाबों की चलती फिरती तस्वीर हो…

कहे अनकहे लफ़्ज़ों की जिंदा तासीर हो…

मैं शुरू होता हूँ

हर सुबह तुम से…

ख़त्म हो जाता हूँ हर शब तुम में ही…

ढूंढता रहता हूँ तुम्हारे  होठों का स्पर्श…

अपनी उँगलियों  के पोरों  में

तलाशती  रहती हैं आँखें सीने पे

तुम्हारी गर्म साँसों के निशाँ हर लम्हा…

अहसास तुम्हारी छुअन का जिंदा रहता है

मुझमे हर पल…

रखता है मुझे जिंदा हर पल…

आओ

दूरियां समेट दें अपने जिस्मों की हम

संगम हो

मेरे  तुम्हारे वजूद का

ऐसे कि

बहे ज़िन्दगी लहू में फिर से…

वैसे भी तो तुम्हारा प्यार गरम लावे सा

समेटे रखता है मुझे अपने में

बन के चादर गर्म अहसासों  की बिछा रहता है

पूरी तरह मुझ पे …

पूरी पूरी रात …

पूरा पूरा दिन…

(रजनीश)

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