Posts tagged ‘Saans’

मई 22, 2016

मीना कुमारी …(गुलज़ार)

GulzarMeenaKumari-001शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लमहा-लमहा खोल रही है
पत्ता-पत्ता बीन रही है
एक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायन
एक-एक साँस को खोल के, अपने तन
पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की क़ैदी
रेशम की यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जाएगी।
(गुलज़ार)

मार्च 20, 2015

सूरज को नही डूबने दूंगा …(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा।
देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं
मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं
और ढलान पर एड़ियाँ जमाकर
खड़ा होना मैंने सीख लिया है।

घबराओ मत
मैं क्षितिज पर जा रहा हूँ।
सूरज ठीक जब पहाडी से लुढ़कने लगेगा
मैं कंधे अड़ा दूंगा
देखना वह वहीं ठहरा होगा।

अब मैं सूरज को नही डूबने दूँगा।
मैंने सुना है उसके रथ में तुम हो
तुम्हें मैं उतार लाना चाहता हूं
तुम जो स्वाधीनता की प्रतिमा हो
तुम जो साहस की मूर्ति हो
तुम जो धरती का सुख हो
तुम जो कालातीत प्यार हो
तुम जो मेरी धमनी का प्रवाह हो
तुम जो मेरी चेतना का विस्तार हो
तुम्हें मैं उस रथ से उतार लाना चाहता हूं।

रथ के घोड़े
आग उगलते रहें
अब पहिये टस से मस नही होंगे
मैंने अपने कंधे चौड़े कर लिये है।

कौन रोकेगा तुम्हें
मैंने धरती बड़ी कर ली है
अन्न की सुनहरी बालियों से
मैं तुम्हें सजाऊँगा
मैंने सीना खोल लिया है
प्यार के गीतो में मैं तुम्हे गाऊँगा
मैंने दृष्टि बड़ी कर ली है
हर आँखों में तुम्हें सपनों सा फहराऊँगा।

सूरज जायेगा भी तो कहाँ
उसे यहीं रहना होगा
यहीं हमारी सांसों में
हमारी रगों में
हमारे संकल्पों में
हमारे रतजगों में
तुम उदास मत होओ
अब मैं किसी भी सूरज को
नही डूबने दूंगा।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

दिसम्बर 20, 2014

हिंदुस्तानियों, बधाई तुम पाकिस्तानियों जैसे निकले

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई ?

वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गवाईं
आख़िर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई!

प्रेत धरम का नाच रहा है
क़ायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उलटे काज करोगे
अपना चमन तराज करोगे

तुम भी बैठे करोगे सोच
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी ?

होगा कठिन यहां भी जीना
दांतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
यहां भी सबकी सांस घुटेगी

कल दुख से सोचा करते थे
सोच के बहुत हंसी आ जाएगी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो क़ौम नहीं थे भाई

भाड़ में जाए शिक्षा- विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना
आगे गड्ढा है ये मत देखो
वापस लाओ गया ज़माना

मश्क करो तुम आ जाएगा
उल्टे पांव चलते जाना
ध्यान न मन में दूजा आये
बस पीछे ही नज़र जमाना

एक जाप सा करते जाओ
बारम्बार यही दोहराओ
कैसा वीर महान था भारत
कितना आलीशान था भारत

फिर तुम लोग पहुंच जाओगे
बस परलोक पहुंच जाओगे
हम तो हैं पहले से वहां पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहां से
चिट्ठी विट्ठी डालते रहना

(फहमीदा रियाज़)

जून 4, 2014

प्रेम का वो अदभुत अनुभव

निमंत्रण akhiri-001

…………………..

आओ थोडा प्यार कर लें

चूम लें तुम्हे

आंसुओं से धुली आँखों की

पाक नज़रों में बसी उदासी को

विरह में जलते ह्रदय से उठती भाप

से सूखे पपडाए होंठो को

चूम ले तुम्हारे तपते माथे को

आओ रख दें होंठ अपने

जलते तुम्हारे बदन पे

ख़त्म कर दें खुद को

तुम्हारी तपिश मिटाने में

आओ ना!

… …. …. …. …. ….

प्रणय 

…………………………………………….

 

नीले  नीम अँधेरे उजाले में

आती हो जब दबे पाँव सकुचाई

डरी सहमी हिरनी सी

देखता रह जाता हूँ

तुम्हारे आभूषण जडित रक्तिम बदन को …

जैसे लाल आग  नीली लपटों में घिरी…

तुम्हारे बदन की  लालिमा

जैसे धीरे धीरे

उतरती है मेरी आँखों में…

ये कैसा नशा है?

ये किसका नशा है?

उस मदिरा का जो तुमने पिलाई थी सुराही से

या उस का जो टपक रही है तुम्हारी मद-भरी आँखों से?

 

moonlit-001बहक रहा है सारा आलम चारों ओर

पिरा रहा है बदन कि जैसे टूटना चाहता  हो

उफ़! ये तुम्हारी अंगड़ाई

आकार-प्रकार बदलता तुम्हारा जिस्म

जैसे चुनौती दे रहा हो कि आओ

समेट लो और भींच लो बाँहों में…

बढता ही जाता है शोर साँसों का

अपने आप मेरा बदन

ले  लेता है तुम्हारे बदन को अपने आगोश में

तुम विरोध भी करती हो और

समाती भी जाती हो

मेरे  आगोश में

मदहोश करती जाती है

तुम्हारे बदन की छुअन

दीवाना कर  रही  हैं  तुम्हारी  बाँहें

तुम्हारा  उन्नत  यौवन …

रेशमी  मखमली  बदन …

 

होश  कहाँ   अब  तुम्हे भी …

मैं पढ़ सकता हूँ तुम्हारी आँख के खिंचते डोरे

पता कहाँ चला

कब मेरे होठों ने

बात शुरू कर दी तुम्हारे होठों से

सच मानों

तुम्हारा आज का रूप कुछ और ही है

तोड़ती जाती हो वो बंध जो खुल नहीं पाते

डरी सहमी शर्मीली हिरनी की खाल से

निकल कर सामने आ रही है

कामोन्मत्त  सिंहनी…

जो निगल जाना चाह रही है यूँruhdark-001

समूचा मुझको पिघला के

समो लेना चाह रही मुझ को खुद में

हैरान हूँ मैं

कि कैसे पार कर दी तुमने

उन्मुक्तताओं की सीमाएं सारी

उफ़! ये तुम्हारा शीशे सा पिघलता जिस्म…

और  ये उठता  गिरता साँसों का ज्वार…

इस ज्वार में बह जाने को बेक़रार तुम और मैं…

हो जाते हैं एक …

एक तूफ़ान सा गुज़र जाता है जैसे

होश आता है तूफ़ान के बाद

जो अपने पीछे छोड़ जाता है…

एक डरी सकुचाई हिरनी

लेकिन तृप्त अहसासों से  भरी

मैं आज गवाह हुआ हूँ

हमारे एक सबसे उन्मुक्त देह-संगम का

हिरनी -सिंघनी-हिरनी परिवर्तन का

 

 अभिसार के बाद

………………………………………………………………..

अब जब सब बीत गया है तो मुझे अचरज होता है

न जाने क्या था जो मुझ पे छाया था….

नशा… खुमार…. उन्माद… जूनून…

गर्म अहसास तुम्हारे नर्म जिस्म का

अनावृत जिस्म

विवश करे दे रहा था मुझे

कि खूबसूरती के उदाहरणों को देखूं

या सुखद स्पर्शों का अहसास करूँ

मेरी दुविधाओं को बढ़ातीं

बंद हुयी कभी कभी खुल जाने वाली तुम्हारी आँखें

जो मेरी आँखों में झाँक कर मुझे आमंत्रित करतीं

और फिर मेरा जवाब पा

शर्मीले भावों से भर फिर से मुंद जातीं

सबसे बढ़titan-001कर मुझे मोह रहा था

मेरी ख़ुशी में सुख तलाशता

तुम्हारा समर्पण…

मेरी भावनाओं का ज्वालामुखी तो फटना ही था…

सच है मैंने कुछ किया नहीं था

सारे असर तुम्हारे थे

मैं तो जैसे जी गया था उन लम्हों में

जब तुम्हारे आगोश में सोया था

निश्चिन्त…

निर्द्वंद…

संतुष्ट…

Rajnish sign

 

मार्च 15, 2014

छिल रहे हैं मेरे सपनो के नर्म अहसास

मत कहो तुम कुछ mirrorwoman-001

सुन तो हम तब भी लेंगे

रोक लो खुद को चाहे

कितना ही,

आँखे बोल देंगी तुम्हारी

होंठ मेरे सब खुद-ब-खुद  सुन लेंगे

आओ लो संभालो अपनी अमानत

बहुत दिनों से तुम्हारे लिए इसे

खाद पानी दे के बड़ा किया है

अब इसका क़द मुझसे ऊंचा हो रहा है

तुम्ही हो जो रख सकती हो इसे अपने साए में

बहुत बेचैन रहता है तुम्हारी नर्म बाहों को

संभालो कि इस से छिल रहे हैं

मेरे अपने ही सपनो के नर्म अहसास…

तुम्हारे प्रति मेरे प्यार की साँसे

उखड़ जाएँ

उससे पहले आ जाओ…

Rajnish sign

मार्च 4, 2014

तुझसे मुलाक़ात के बाद…

रात, कल रात बहुत तपी…silentlove-001

तुझसे उस मुलाक़ात के बाद!

भीतर मेरी  साँसों से निकल कर कहीं…

तेरी सदा आती  रही

दिल के नज़दीक कहीं…

तेरे सीने की नर्म छुअन गुदगुदाती रही

इक लहर सी उठती रही पाँव से सर तलक जैसे

मेरे सीने से होकर तेरी हर सांस जाती रही

जाने क्या जादू है तेरी आवाज़ में

जो न कैसा मेरे बदन में तूफ़ान उठा देती है…

बेचैन कर देता है…

मेरे बिस्तर कि सलवटें कह देंगी

कि रात भर मुझे किस की  याद आती रही

हर बूँद लहू में घुल कर

किस तरह तू मुझे सहलाती रही

Rajnish sign

फ़रवरी 5, 2014

काई जम गई इंतज़ार की मुंडेर पे

इस सावन में बरसी आँखें

काई जमी इंतज़ार की मुंडेर पे

रखे हाथ कंपकपाते हैं

सब कुछ छूट जाने को जैसे

पैरों के नीचे से ज़मीन

बहुत गहरी खाई हो गयी

आँखे पता नहीं किसके लिए

आकाश ताकती हैं…

साँसों की आदमरफ्त रोक के

जिसको फुर्सत दी सजदे के लिए

उस खुदा को और बहुत

एक मेरी निगहबानी के सिवा…

मुझे कोई गिला नहीं…

शिकवा कमज़र्फी है…

हाथ कंपकपाते ज़रूर हैं

अभी मगर फिसले नहीं हैं…

Rajnish sign

जनवरी 17, 2014

बहूँगा धमनियों में इश्क बन के…

मैं  गुज़र भी जाऊंगा अगर,

तो बीत  जाऊँगा  नहीं

रहूँगा यहीं हवाओ में आस पास घुल के

महसूस कर सकोगी मुझे

अपनी आती जाती साँसों में

ये बेनाम दर्द बहेगा

धमनियों में इश्क बन के…

Rajnish sign

जनवरी 13, 2014

पूर्णिमा का चाँद

पूर्णिमा का चाँद manmoon-001

लुका-छिपी खेलता है

जाने मुझसे

कि इन आते-जाते पहाड़ों से

(न, पहाड़ नहीं, अरावली की छोटी पहाडियों से)

पर, हर बार, अब वह झांकता है-

पहाडियों के पार

तुम्हारी कलाएं,

दिखाता है, हर बार-

कभी मासूम, कभी गुम-सुम,

कभी शोखी, कभी हँसी

कभी मोहक, कभी मादक

कभी स्नेह, कभी दुलार

कभी रूठना, कभी तकरार

कभी लाड, कभी प्यार

बाराहों पहाडियों के बीच

तुम्हारे रंग

आते हैं, जाते हैं-

इतने पास,

कि बस

अब छुआ

कि तब छुआ

इतना पास,

कि महसूस होती है साँस

और तपिश दहकते होठों की|

पर तभी,

ऊँची पहाड़ी सड़क से

अजमेर जगमगाता है

और चाँद

छिटक कर

जा बैठता है –

दूर आसमान पर

-शायद दिल्ली के-

बस ठीक उसी क्षण

फोन का बजना

उधर से तुम्हारा विभोर हो कहना

– आज का चाँद बेहद खूबसूरत निकला है!

Yugalsign1

जनवरी 3, 2014

तुम आई थीं…इतना तो याद है मुझे

तुम आयीं थी पास मेरे…lovers-001
कल रात
याद  तुम्हे भी होगा इतना तो…
लब चूमे थे लबों से अपने
पलकों पे मोती बीने थे
पास खींच के गले लगाया
याद तुम्हे भी होगा…
इतना तो
आँखों के डोरों ने रंगत अपनी
लाल करी थी…
कुछ बात कही थी
दिल ने अपनी गति बढ़ाकर
हाथों को उकसाकर मेरे हाथ धरे थे
याद तुम्हे भी होगा…
इतना तो
तुमको याद तो होगा सब कुछ
लबों का मिलना…
साँसे बढ़ना
सीने का गिरना…
उठना
चुप रह कर के सब कुछ कहना
अपने मिलने की सीमा तक
रुकना, मिलना, चलना, बहना,
तुम को  क्या क्या और याद है?
मैं तो सब कुछ भूल गया था
तेरे आने से तेरे जाने तक
दिया बुझे से सहर हुए तक
रौशन मेरी रात रही बस
तिल तिल मेरा बदन जले तक
मुझको बस याद है इतना
मुझको तो बस याद है इतना…
तुम आई थीं!
Rajnish sign
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