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फ़रवरी 10, 2017

शून्य और अशून्य … कुँवर नारायण

संबंध में शून्यता को प्रेम भर देता है, संसार से कर्म संबंध जोड़ देता है, अथाह अकेलेपन में आस्था ईश्वर रूपी बंधन से जोड़कर भराव कर देती है पर आतंरिक शून्यता का क्या किया जाए? वह तो रहती ही है, पर उसका भी एक परम उपयोग है जो कुँवर नारायण अपनी इस छोटी लेकिन अनूठी कविता में सुझाते हैं|

एक शून्य है

मेरे और तुम्हारे बीच

जो प्रेम से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और संसार के बीच

जो कर्म से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और अज्ञात के बीच

जो ईश्वर से भर जाता है|

 

एक शून्य है

मेरे ह्रदय के बीच

जो मुझे मुझ तक पहुँचाता है|

(कुँवर नारायण)

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दिसम्बर 12, 2016

थोड़ा सा … (अशोक वाजपेयी)

ashok vajpai-001एक संवेदनशील और जिम्मेदार कवि अपनी कविता में जीवन में जो कुछ अच्छा है उसकी देखरेख जरूर ही करता है और किसी भयानक दौर में उस अच्छे को बचाए रख पाने के आशावाद को भी अपनी कविता में समाहित करता चलता है|

वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी दवारा अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में लिखी कविता – थोड़ा-सा, मनुष्य जीवन में सत्य, संवेदना, और  ईमानदारी, जैसे तत्वों के महत्व को रेखांकित करती है और उन्हें संजोये रखने पर जोर देती है|

अगर बच सका

तो वही बचेगा

हम सबमें थोड़ा-सा आदमी…

जो रौब के सामने नहीं गिडगिडाता,

अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,

जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर

सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,

जो अपने सामने हुई वारदात की

गवाही देने से नहीं हिचकिचाता –

वही थोड़ा- सा आदमी –

जो धोखा खाता है पर प्रेम करते रहने से नहीं चूकता,

जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए

दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता-

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,

जो अपनी चुपड़ी खाते हुए

दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है –

वही थोड़ा-सा आदमी –

जो बूढों के पास बैठने से नहीं ऊबता

जो अपने घर को चीजों का गोदाम बनने से बचाता है,

जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है

और दुनिया को नरक बना देने के लिए

दूसरों को ही नहीं कोसता|

 

वही थोड़ा-सा आदमी-

जिसे खबर है कि

वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,

आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,

पक्षी आँगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण-

वही थोड़ा-सा आदमी

अगर बच सका

तो वही बचेगा|

(अशोक वाजपेयी)

अगस्त 16, 2016

प्रेम है सौंदर्य, वासना ही कुरूपता है!… ओशो

Oshoप्रश्न – किसी सुंदर युवती को देखकर जाने क्यों मन उसकी ओर आकर्षित हो जाता है, आंखें उसे निहारने लगती हैं! मेरी उम्र पचास हो गई है, फिर भी ऐसा क्यों होता है? क्या यह वासना है, या प्रेम, या सुंदरता की स्तुति? कृपया मेरा मार्ग-निर्देश करें।

ओशो

ऐसा होता है निरंतर; क्योंकि जब दिन थे तब दबा लिया। तो रोग बार-बार उभरेगा। जब जवान थे, तब ऐसी किताबें पढ़ते रहे जिनमें लिखा है: ब्रह्मचर्य ही जीवन है। तब दबा लिया।
जवानी के साथ एक खूबी है कि जवानी के पास ताकत है–दबाने की भी ताकत है। वही ताकत भोग बनती है, वही ताकत दमन बन जाती है। लेकिन जवान दबा सकता है।
मेरे अनुभव में अकसर ऐसी घटना घटती रही है, लोग आते रहे हैं, कि चालीस और पैंतालीस साल के बाद बड़ी मुश्किल खड़ी होती है, जिन्होंने भी दबाया। क्योंकि चालीस-पैंतालीस साल के बाद, वह ऊर्जा जो दबाने की थी वह भी क्षीण हो जाती है। तो वह जो दबाई गई वासनाएं थीं, वे उभरकर आती हैं। और जब बे-समय आती हैं तो और भी बेहूदी हो जाती हैं।
जवान स्त्रियों के पीछे भागता फिरे, कुछ भी गलत नहीं है; स्वाभाविक है; होना था, वही हो रहा है। बच्चे तितलियों के पीछे दौड़ते फिरें, ठीक है। बूढ़े दौड़ने लगें–तो फिर जरा रोग मालूम होता है। लेकिन रोग तुम्हारे कारण नहीं है, तुम्हारे तथाकथित साधुओं के कारण है–जिनने तुम्हें जीवन को सरलता से जीने की सुविधा नहीं दी है। बचपन से ही जहर डाला गया है: कामवासना पाप है! तो कामवासना को कभी पूरे प्रफुल्ल मन से स्वीकार नहीं किया। भोगा भी, तो भी अपने को खींचे रखा। भोगा भी, तो कलुषित मन से, अपराधी भाव से; यह मन में बना ही रहा कि पाप कर रहे हैं। संभोग में भी उतरे तो जानकर कि नर्क का इंतजाम कर रहे हैं।
अब तुम सोचो, जब तुम संभोग में उतरोगे और नर्क का भाव बना रहेगा, क्या खाक उतरोगे? संभोग की सुरभि तुम्हें क्या घेरेगी? वह नृत्य पैदा न हो पायेगा। तो तुम बिना उतरे वापिस लौट आओगे। शरीर के तल पर संभोग हो जायेगा; मन के तल पर वासना अधूरी अतृप्त रह जायेगी। मन के तल पर दौड़ जारी रहेगी। तो जब बूढ़े होने लगोगे और शरीर कमजोर होने लगेगा और शरीर की दबाने की पुरानी शक्ति क्षीण होने लगेगी और मौत दस्तक देने लगेगी दरवाजे पर और लगेगा कि अब गये, अब गये–तब ऐसा लगेगा, यह तो बड़ा गड़बड़ हुआ; भोग भी न पाये और चले! डोली तो उठी नहीं, अर्थी सज गई! तो मन बड़े वेग से स्त्रियों की तरफ दौड़ेगा, पुरुषों की तरफ दौड़ेगा।
यह तथाकथित समाज के द्वारा पैदा की गई रुग्ण अवस्था है। बच्चे को उसके बचपन को पूरा जीने दो, ताकि जब वह जवान हो जाये तो बचपन की रेखा भी न रह जाये; ताकि वह पूरा-पूरा जवान हो सके। जवान को पूरा जीने दो, उसे अपने अनुभव से ही जागने दो; ताकि जवानी के जाते-जाते वह जो जवानी की दौड़-धूप थी, आपाधापी थी, मन का जो रोग था, वह भी चला जाये; ताकि बूढ़ा शुद्ध बूढ़ा हो सके। और जब कोई बूढ़ा शुद्ध बूढ़ा होता है तो उससे सुंदर कोई अवस्था नहीं है। लेकिन जब बूढ़े में जवान घुसा होता है, तब एक भूत तुम्हारा पीछा कर रहा है। तब तुम एक प्रेतात्मा के वश में हो। तब तुम्हें बड़ा भटकायेगा। तब तुम्हें बड़ा बेचैन करेगा। और जैसे-जैसे शरीर अशक्त होता जायेगा वैसे-वैसे तुम पाओगे, वेग वासना का बढ़ने लगा।
एक स्त्री के संबंध में मैंने सुना है। वह चालीस से ऊपर की हो चुकी थी। मोटी हो गई थी, बेहूदी हो गई थी, कुरूप हो गई थी। फिर भी बनती बहुत थी। दावत में पास बैठा युवक उसकी बातों से उकता गया था और भाग निकलने के लिए बोला, “क्या आपको वह बच्चा याद है जो स्कूल में आपको बहुत तंग करता था…?’ उसका हाथ पकड़कर स्त्री ने कहा, “अच्छा, तो वह तुम थे?’
उसने कहा, “नहीं, जी नहीं, मैं नहीं। वे मेरे पिताजी थे।’
एक उम्र है तब चीजें शुभ मालूम होती हैं। एक उम्र है तब चीजों को जीना जरूरी है। उसे अगर न जी पाये तो पीछा चीजें करेंगी। और तब चीजें बड़ी वीभत्स हो जाती हैं।
एक सिनेमा-गृह में ऐसा घटा। एक महिला पास में बैठे एक बदतमीज बूढ़े से तंग आ गई थी, जो आधे घंटे से सिनेमा देखने की बजाय उसे ही घूरे जा रहा था।
आखिर उसने फुसफुसाकर उस आदमी से कहा, “सुनिए, आप अपना एक फोटो मुझे देंगे?’
आदमी बाग-बाग हो गया: “जरूर जरूर! एक तो मेरी जेब में ही है। लीजिए! हां, क्या कीजिएगा मेरे फोटो का?’
उसने कहा, “अपने बच्चों को डराऊंगी।’
सावधान रहना। वही जो एक समय में शुभ है, दूसरे समय में अशुभ हो जाता है। वही जो एक समय में ठीक था, सम्यक था, स्वभाव के अनुकूल था, वही दूसरे समय में अरुचिपूर्ण हो जाता है, बेहूदा हो जाता है।
जिन मित्र ने पूछा है, उनको थोड?ा जागकर अपने मन में पड़ी हुई, दबी हुई वासनाओं का अंतर्दर्शन करना होगा। अब मत दबाओ! कम से कम अब मत दबाओ! अभी तक दबाया और, उसका यह दुष्फल है। अब इस पर ध्यान करो। क्योंकि अब उम्र भी नहीं रही कि तुम स्त्रियों के पीछे दौड़ो या मैं तुमसे कहूं कि उनके पीछे दौड़ो। वह बात जंचेगी नहीं। वे तुमसे फोटो मांगने लगेंगी। अब जो जीवन में नहीं हो सका, उसे ध्यान में घटाओ।
अब एक घंटा रोज आंख बंद करके, कल्पना को खुली छूट दो। कल्पना को पूरी खुली छूट दो। वह किन्हीं पापों में ले जाये, जाने दो। तुम रोको मत। तुम साक्षी-भाव से उसे देखो कि यह मन जो-जो कर रहा है, मैं देखूं। जो शरीर के द्वारा नहीं कर पाये, वह मन के द्वारा पूरा हो जाने दो। तुम जल्दी ही पाओगे कुछ दिन के…एक घंटा नियम से कामवासना पर अभ्यास करो, कामवासना के लिए एक घंटा ध्यान में लगा दो, आंख बंद कर लो और जो-जो तुम्हारे मन में कल्पनाएं उठती हैं, सपने उठते हैं, जिनको तुम दबाते होओगे निश्चित ही–उनको प्रगट होने दो! घबड़ाओ मत, क्योंकि तुम अकेले हो। किसी के साथ कोई तुम पाप कर भी नहीं रहे। किसी को तुम कोई चोट पहुंचा भी नहीं रहे। किसी के साथ तुम कोई अभद्र व्यवहार भी नहीं कर रहे कि किसी स्त्री को घूरकर देख रहे हो। तुम अपनी कल्पना को ही घूर रहे हो। लेकिन पूरी तरह घूरो। और उसमें कंजूसी मत करना।
मन बहुत बार कहेगा कि “अरे, इस उम्र में यह क्या कर रहे हो!’ मन बहुत बार कहेगा कि यह तो पाप है। मन बहुत बार कहेगा कि शांत हो जाओ, कहां के विचारों में पड़े हो!
मगर इस मन की मत सुनना। कहना कि एक घंटा तो दिया है इसी ध्यान के लिए, इस पर ही ध्यान करेंगे। और एक घंटा जितनी स्त्रियों को, जितनी सुंदर स्त्रियों को, जितना सुंदर बना सको बना लेना। इस एक घंटा जितना इस कल्पना-भोग में डूब सको, डूब जाना। और साथ-साथ पीछे खड़े देखते रहना कि मन क्या-क्या कर रहा है। बिना रोके, बिना निर्णय किये कि पाप है कि अपराध है। कुछ फिक्र मत करना। तो जल्दी ही तीन-चार महीने के निरंतर प्रयोग के बाद हलके हो जाओगे। वह मन से धुआं निकल जायेगा।
तब तुम अचानक पाओगे: बाहर स्त्रियां हैं, लेकिन तुम्हारे मन में देखने की कोई आकांक्षा नहीं रह गई। और जब तुम्हारे मन में किसी को देखने की आकांक्षा नहीं रह जाती, तब लोगों का सौंदर्य प्रगट होता है। वासना तो अंधा कर देती है, सौंदर्य को देखने कहां देती है! वासना ने कभी सौंदर्य जाना? वासना ने तो अपने ही सपने फैलाये।
और वासना दुष्पूर है; उसका कोई अंत नहीं है। वह बढ़ती ही चली जाती है।
एक बहुत मोटा आदमी दर्जी की दुकान पर पहुंचा। दर्जी ने अचकन के लिए बड़ी कठिनाई से उसका नाप लिया। फिर एक सौ रुपये की सिलाई मांगी। वे महाशय बोले, “टेलीफोन पर तो तुमने पच्चीस रुपये सिलाई कही थी, अब सौ रुपये? हद्द हो गई! बेईमानी की भी कोई सीमा है!’
दर्जी ने कहा, “महाराज! वह अचकन की सिलाई थी, यह शामियाने की है।’
अचकनें शामियाने बन जाती हैं। वासना फैलती ही चली जाती है। तंबू बड़े से बड़ा होता चला जाता है। अचकन तक ठीक था, लेकिन जब शामियाना ढोना पड़े चारों तरफ तो कठिनाई होती है।
मैं अड़चन समझता हूं। लेकिन अड़चन का तुम मूल कारण खयाल में ले लेना: तुमने दबाया है। तुमने दमन किया है। तुम गलत शिक्षा और गलत संस्कारों के द्वारा अभिशापित हुए हो। तुमने जिन्हें साधु-महात्मा समझा है, तुमने जिनकी बातों को पकड़ा है–न वे जानते हैं, न उन्होंने तुम्हें जानने दिया है।
मेरे पास साधु संन्यासी आते हैं तो कहते हैं, “एकांत में आपसे कुछ कहना है।’ मैं कहता हूं, सभी के सामने कह दो; एकांत की क्या जरूरत है? वे कहते हैं कि नहीं, एकांत में। अब तो मैंने एकांत में मिलना बंद कर दिया है। क्योंकि एकांत में…जब भी साधु-संन्यासी आयें तो वे एकांत ही मांगते हैं। और एकांत में एक ही प्रश्न है उनका कि यह कामवासना से कैसे छुटकारा हो! कोई सत्तर साल का हो गया है, कोई चालीस साल से मुनि है–तो तुम क्या करते रहे चालीस साल? कहते हैं, क्या बतायें, जो-जो शास्त्र में कहा है, जो-जो सुना है–वह करते रहे हैं। उससे तो हालत और बिगड़ती चली गई है।
मवाद को दबाया है, निकालना था। घाव पर तुमने ऊपर से मलहम-पट्टी की है; आपरेशन की जरूरत थी। तो जिस मवाद को तुमने भीतर छिपा लिया है, वह अब तुम्हारी रग-रग में फैल गई है; अब तुम्हारा पूरा शरीर मवाद से भर गया है।
तो थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ेगी। आपरेशन से गुजरना होगा। और तुम्हीं कर सकते हो वह आपरेशन; कोई और कर नहीं सकता। तुम्हारा ध्यान ही तुम्हारी शल्यक्रिया होगी। तब एक घंटा रोज…। तुम चकित होओगे, अगर तुमने एक-दो महीने भी इस प्रक्रिया को बिना किसी विरोध के भीतर उठाये, बिना अपराध भाव के निश्चिंत मन से किया, तो तुम अचानक पाओगे: धुएं की तरह कुछ बातें खो गईं! महीने दो महीने के बाद तुम पाओगे: तुम बैठे रहते हो, घड़ी बीत जाती है, कोई कल्पना नहीं आती, कोई वासना नहीं उठती। तब तुम अचानक पाओगे: अब तुम चलते हो बाहर, तुम्हारी आंखों का रंग और! अब तुम्हें सौंदर्य दिखाई पड़ेगा! क्योंकि सब सौंदर्य परमात्मा का सौंदर्य है। स्त्री का, पुरुष का कोई सौंदर्य होता है? फूल का, पत्ती का, कोई सौंदर्य होता है? सौंदर्य कहीं से भी प्रगट हो; सौंदर्य परमात्मा का है, सौंदर्य सत्य का है। लेकिन सौंदर्य को देख ही वही पाता है, जिसने वासना को अपनी आंख से हटाया। वासना का पर्दा आंख पर पड़ा रहे, तुम सौंदर्य थोड़े ही देखते हो! सौंदर्य तुम देख ही नहीं सकते।
वासना कुरूप कर जाती है सभी चीजों को। इसलिए तुमने जिसको भी वासना से देखा, वही तुम पर नाराज हो जाता है। कभी तुमने खयाल किया? किसी स्त्री को तुम वासना से देखो, वही बेचैन हो जाती है। किसी पुरुष को वासना से देखो, वही थोड़ा उद्विग्न हो जाता है। क्योंकि जिसको भी तुम वासना से देखते हो, उसका अर्थ ही क्या हुआ? उसका अर्थ हुआ कि तुमने उस आदमी या उस स्त्री को कुरूप करना चाहा। जब भी तुम किसी को वासना से देखते हो, उसका अर्थ हुआ कि तुमने किसी का साधन की तरह उपयोग करना चाहा; तुम किसी को भोगना चाहते हो। और प्रत्येक व्यक्ति साध्य है, साधन नहीं है। तुम किसी को चूसना चाहते हो? तुम किसी को अपने हित में उपयोग करना चाहते हो? तुम किसी के व्यक्तित्व को वस्तु की तरह पद-दलित करना चाहते हो?
वस्तुओं का उपयोग होता है, व्यक्तियों का नहीं। लेकिन जब तुम वासना से किसी को देखते हो, व्यक्ति खो जाता है, वस्तु हो जाती है। इसलिए वासना की आंख को कोई पसंद नहीं करता। जब वासना खो जाती है तो सौंदर्य का अनुभव होता है। और जब सौंदर्य का अनुभव होता है, तो तुम्हारे भीतर प्रेम का आविर्भाव होता है।
प्रेम उस घड़ी का नाम है, जब तुम्हें सब जगह परमात्मा और उसका सौंदर्य दिखाई पड़ने लगता है। तब तुम्हारे भीतर जो ऊर्जा उठती है, जो अहर्निश गीत उठता है–वही प्रेम है। अभी तो तुमने जिसे प्रेम कहा है, उसका प्रेम से कोई दूर का भी संबंध नहीं है। वह प्रेम की प्रतिध्वनि भी नहीं है। वह प्रेम की प्रतिछाया भी नहीं है। वह प्रेम का विकृत रूप भी नहीं है। वह प्रेम से बिलकुल उलटा है।
इसलिए तो तुम्हारे प्रेम को घृणा बनने में देर कहां लगती है! अभी प्रेम था, अभी घृणा हो गई। एक क्षण पहले जो मित्र था, क्षणभर बाद दुश्मन हो गया। क्षणभर पहले जिसके लिए मरते थे, क्षणभर बाद उसको मारने को तैयार हो गये।
तुम्हारा प्रेम प्रेम है? घृणा का ही बदला हुआ रूप मालूम पड़ता है। प्रेम सिर्फ तुम्हारी बातचीत है। प्रेम तो उनका अनुभव है जिनकी आंख से वासना गिर गई; जिन्हें सौंदर्य दिखाई पड़ा; जिसे सब तरफ उसके नृत्य का अनुभव हुआ; जिसे सब तरफ परमात्मा की पगध्वनि सुनाई पड़ने लगी। फिर प्रेम का आविर्भाव होता है। प्रेम यानी प्रार्थना। प्रेम यानी पूजा। प्रेम यानी अहोभाव, धन्यता, कृतज्ञता।
नहीं, अभी तुम्हें प्रेम का अनुभव नहीं हुआ। अभी तो तुमने वासना को भी नहीं जाना, प्रार्थना को तुम जानोगे कैसे? वासना को जानो, ताकि वासना से मुक्त हो जाओ। जब मैं निरंतर तुमसे कहता हूं, वासना को जानो, तो मैं यही कह रहा हूं कि वासना से मुक्त होने का एक ही उपाय है: उसे जान लो। जिसे हम जान लेते हैं, उसी से मुक्ति हो जाती है।
सत्य बड़ा क्रांतिकारी है। जान लेने के अतिरिक्त और कोई रूपांतरण नहीं है।
आज इतना ही।

ओशो – जिनसूत्र-(भाग–1)

दिसम्बर 3, 2015

प्रेम – एक थीसिस

shashisimi-001मैत्री,सख्य, प्रेम – इन का विकास धीरे-धीरे होता है ऐसा हम मानते हैं: ‘प्रथम दर्शन से ही प्रेम’ की सम्भावना स्वीकार कर लेने से भी इस में कोई अन्तर नहीं आता| पर धीरे-धीरे होता हुआ भी यह सम गति से बढ़ने वाला विकास नहीं होता, सीढ़ियों की तरह बढ़ने वाली उस की गति होती है, क्रमश: नये-नये उच्चतर स्तर पर पहुँचने वाली|

कली का प्रस्फुटन उस की ठीक उपमा नहीं है, जिस का क्रम-विकास हम अनुक्षण देख सकें: धीरे-धीरे रंग भरता है, पंखुड़ियाँ खिलती हैं, सौरभ संचित होता है, और डोलती हवाएँ रूप को निखार देते जाती हैं|

ठीक उपमा शायद सांझ का आकाश है : एक क्षण सूना, कि सहसा हम देखते हैं, अरे वह तारा! और जब तक हम चौंक कर सोचें कि यह हम ने क्षण-भर पहले क्यों न देखा – क्या तब नहीं था? तब तक इधर-उधर, आगे, ऊपर कितने ही तारे खिल आए, तारे ही नहीं, राशि-राशि नक्षत्र-मंडल, धूमिल उल्कान्कुल, मुक्त्त-प्रवाहिनी नभ-पयम्बिनी- अरे, आकाश सूना कहाँ है, यह तो भरा हुआ है रहस्यों से, जो हमारे आगे उद्घाटित है…प्यार भी ऐसा ही है; एक समोन्नत ढलान नहीं, परिचिति के, आध्यात्मिक संस्पर्श के, नये-नये स्तरों का उन्मेष…उस की गति तीव्र हो या मंद, प्रत्यक्ष हो या परोक्ष, वांछित हो य वान्छातीत| आकाश चन्दोवा नहीं है कि चाहे तो तान दें, वह है तो है, और है तो तारों-भरा है, नहीं है तो शून्य-शून्य ही है जो सब-कुछ को धारण करता हुआ रिक्त बना रहता है…

(अज्ञेय : उपन्यास ‘नदी के द्वीप‘ में)

फ़रवरी 2, 2015

धीरे- धीरे तुम मरने लगते हो …

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम यात्राएं नहीं करते

अगर तुम पढते नहीं

अगर तुम जीवन की आवाज को नहीं सुनते

अगर तुम अपने से सामंजस्य बिठाकर,

अपनी उचित सराहना नहीं करते |

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

जब तुम अपने आत्म-सम्मान को मार देते हो;

जब तुम दूसरों को तुम्हरी सहायता नहीं करने देते|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम अपनी आदतों के दास बन जाते हो,

अगर तुम रोजाना एक ही पथ पर चलने लगते हो…

अगर तुम ढर्रे पर चल रहे दैनिक जीवन में परिवर्तन नहीं लाते,

अगर तुम भिन्न भिन्न रंगों के कपड़े नहीं पहनते

अगर तुम उनसे बात नहीं करते जिन्हें तुम पहले से नहीं जानते|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम उत्साह और जूनून के भावों को नजरंदाज करने लगते हो

और उन भावनाओं के विचलन से डर जाते हो

जो तुम्हारी आँखों में चमक लाती रही हैं,

और तुम्हारे ह्रदय की धडकनों को बढाती रही हैं|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम अपने जीवन में उस समय परिवर्तन नहीं लाते

जब तुम अपनी नौकरी से पूर्णतया असंतुष्ट हो गये हो,

या तुम अपने वर्त्तमान प्रेम से ऊब गये हो,

जब तुम अंजाने के भय की खातिर उसे

कसौटी पर रखने का जोखिम नहीं उठाते

जिसे तुम सुरक्षित मान कर जिससे चिपक गये हो,

अगर तुम अपने सपने का पीछा नहीं करते,

अगर तुम अपने को,

जीवन में कम से कम एक बार,

अच्छी लगने वाली सलाह से दूर भागने के लिए

तैयार नहीं करते…

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो|

(You start dying slowly – Martha Medeiros, Brazil)

हिंदी अनुवाद – …[राकेश]

दिसम्बर 18, 2014

क्रूरता…

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगाkidcartoon
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अम्बुज)

अक्टूबर 26, 2014

प्रेम भरे दो जीवन…

LoveStoryदोस्तों के आने से काफी पहले ही विक्टर रेस्त्रां पहुँच गया था| अंदर प्रवेश किया तो पाया कि पूरे रेस्त्रां में सिर्फ एक वृद्ध एक कोने में बैठा अकेले ही खा रहा था| थोड़ा नजदीक गया तो पाया कि उसने सामने मेज पर एक महिला की तस्वीर रखी हुयी थी और वह उस तस्वीर को लगातार देखते हुए खा रहा था|

विक्टर को लगा कि वृद्ध अवसाद से ग्रस्त है और तस्वीर में मौजूद महिला उसकी कोई खास रही होगी और शायद अब इस दुनिया में नहीं है और उसकी याद में वृद्ध दुखी है| उसने सोचा कि जब तक उसके दोस्त नहीं आते वह वृद्ध से बातें करके उसका मूड ठीक कर सकता है|

विक्टर वृद्ध के पास चला गया|

“माफ कीजिये, मैं थोड़ी देर आपके पास बैठ सकता हूँ?”

वृद्ध ने उसकी तरफ देखा, कुछ पल सोचा और कहा, “आओ बैठो यंगमैन”|

विक्टर ने तस्वीर की ओर इशारा करते हुए पूछा,” मेरा नाम विक्टर है| आप बड़े प्यार और दुख के साथ इस तस्वीर को निहार रहे थे, क्या यह  आपकी…?”

वृद्ध ने एक गहरी साँस लेते हुए कहा,” यह मेरी पत्नी की तस्वीर है| जेनिफर”|

“क्या अब वे आपके साथ नहीं हैं?”

“है तो साथ| मैं उसी के साथ हूँ”|

फिर आप इतने दुख से क्यों इस तस्वीर को देख रहे थे?

वृद्ध जैसे समय में कहीं खो गया|

“हम दोनों सत्रह साल के थे जब हम मिले| हमें एक दूसरे से प्यार हो गया| पर समय की करनी| युद्ध छिड़ गया था और मैं सेना में भर्ती हो गया| युद्ध के दौरान भी मैं उसी के बारे में सोचता रहता था| युद्ध के बाद मैं वापिस आया तो पाया कि उसका परिवार कहीं और चला गया था| मैंमें उसे तलाशने की बहुत कोशिश की पर किसी को उसके और उसके परिवार के बारे में नहीं पता था| दस साल मैं उसे खोजता रहा, किसी दूसरी युवती की और कभी आँख भर कर नहीं देखा, मिल कर बात करना तो दूर की बात है| लोग मुझे पागल कहने लगे| मैं उनसे कहता कि मैं वाकई पागल हो गया हूँ जेनिफर के प्यार में पागल!”

वृद्ध कुछ देर खामोश रहा तो विक्टर ने कुरेदा,”फिर?”

“मैं शहर शहर उसे खोजता रहा, जिस भी जगह जाता उसे खोजता| एक दौरे पर मैं केलिफोर्निया गया वहाँ एक सेलून में बाल कटवाते हुए मैं नाई से अपनी प्रेम कहानी और जेनिफर की खोज के बारे में बता बैठा| नाई सेलून में एक कोने में रखे फोन की तरफ गया और फोन पर अपनी बेटी से सेलून में आने को कहा|”

विक्टर के लिए वृद्ध की खामोशी एक पल के लिए भी अखर रही थी| उत्तेजना से भर उसने पूछा,” वही?”

वृद्ध की आँखों में चमक आ गई,” जेनिफर मेरे सामने खड़ी थी| उसने भी दस साल किसी युवक के साथ डेटिंग नहीं की| वह मेरा इंतजार करती रही| उसने अपने पिता और परिवार की एक नहीं सुनी और मेरा इंतजार किया|”

विक्टर को अपनी ओर उत्सुकता से देखता हुआ पाकर वृद्ध ने कहा'” मैंने वहीं जेनिफर के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और उसके सहमति देने पर उसके पिता से अनुमति ली| अगले ही दिन हमने विवाह कर लिया| पचपन साल हम लोग विवाह के बाद साथ रहे| ”

“अब कहाँ हैं जेनिफर”|

“पांच बरस हुए, उसे अपना शरीर छोड़े| पर मेरे साथ वह हरदम बनी रहती है|  मैं विवाह की वर्षगाँठ और जेनिफर का जन्मदिन हमेशा सेलिब्रेट करता हूँ| मैं हमेशा उसकी तस्वीर अपने साथ रखता हूँ| रत को उसकी तस्वीर को चूमकर उसे शुभरात्री कह कर सोता हूँ|”

“दस साल आप दोनों ने एक दूसरे का इंतजार किया? अगर केलिफोर्निया में भी आपको जेनिफर न मिलती और दस साल और गुजर जाते तो?”

तो क्या? मैं तो सारी उम्र उसे तलाशता| वह भी मेरा इंतजार करती”|

“वाह! मैंने आज तक ऐसी प्रेम कहानी नहीं सुनी”|

“ये कहानी नहीं है यंगमैन| हमारा जीवन है”|

अब तो लोग दो चार साल भी विवाह के बंधन में नहीं ठहर पाते| तलाक ले लेते हैं|

“हम दोनों के बीच बहुत बहसें होती थीं पर कभी भी कुतर्क नहीं चले| मैं कुछ बातें कहूँ तुमसे यंगमैन”|

“जी कहिये”|

“मैं बहुत धनी रहा, पैसे के कारण नहीं बल्कि प्रेम के कारण| अपनी पत्नी से रोज इस बात को जाहिर करो कि तुम उससे प्रेम करते हो| लोग जलती हुयी मोमबत्ती की तरह होते हैं| हवा का झोंका आकर लौ बुझा सकता है इसलिए जब तक प्रकाश है उसका भली भांति आनंद लो, उसका सम्मान करो|”

वृद्ध ने अपनी पत्नी की तस्वीर उठाते हुए कहा,” अब मैं चलता हूँ|  मेरी बातें याद रखना|”

 

 

 [ एक सच्ची कथा – परिवर्तित रूप में ]

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जून 4, 2014

प्रेम का वो अदभुत अनुभव

निमंत्रण akhiri-001

…………………..

आओ थोडा प्यार कर लें

चूम लें तुम्हे

आंसुओं से धुली आँखों की

पाक नज़रों में बसी उदासी को

विरह में जलते ह्रदय से उठती भाप

से सूखे पपडाए होंठो को

चूम ले तुम्हारे तपते माथे को

आओ रख दें होंठ अपने

जलते तुम्हारे बदन पे

ख़त्म कर दें खुद को

तुम्हारी तपिश मिटाने में

आओ ना!

… …. …. …. …. ….

प्रणय 

…………………………………………….

 

नीले  नीम अँधेरे उजाले में

आती हो जब दबे पाँव सकुचाई

डरी सहमी हिरनी सी

देखता रह जाता हूँ

तुम्हारे आभूषण जडित रक्तिम बदन को …

जैसे लाल आग  नीली लपटों में घिरी…

तुम्हारे बदन की  लालिमा

जैसे धीरे धीरे

उतरती है मेरी आँखों में…

ये कैसा नशा है?

ये किसका नशा है?

उस मदिरा का जो तुमने पिलाई थी सुराही से

या उस का जो टपक रही है तुम्हारी मद-भरी आँखों से?

 

moonlit-001बहक रहा है सारा आलम चारों ओर

पिरा रहा है बदन कि जैसे टूटना चाहता  हो

उफ़! ये तुम्हारी अंगड़ाई

आकार-प्रकार बदलता तुम्हारा जिस्म

जैसे चुनौती दे रहा हो कि आओ

समेट लो और भींच लो बाँहों में…

बढता ही जाता है शोर साँसों का

अपने आप मेरा बदन

ले  लेता है तुम्हारे बदन को अपने आगोश में

तुम विरोध भी करती हो और

समाती भी जाती हो

मेरे  आगोश में

मदहोश करती जाती है

तुम्हारे बदन की छुअन

दीवाना कर  रही  हैं  तुम्हारी  बाँहें

तुम्हारा  उन्नत  यौवन …

रेशमी  मखमली  बदन …

 

होश  कहाँ   अब  तुम्हे भी …

मैं पढ़ सकता हूँ तुम्हारी आँख के खिंचते डोरे

पता कहाँ चला

कब मेरे होठों ने

बात शुरू कर दी तुम्हारे होठों से

सच मानों

तुम्हारा आज का रूप कुछ और ही है

तोड़ती जाती हो वो बंध जो खुल नहीं पाते

डरी सहमी शर्मीली हिरनी की खाल से

निकल कर सामने आ रही है

कामोन्मत्त  सिंहनी…

जो निगल जाना चाह रही है यूँruhdark-001

समूचा मुझको पिघला के

समो लेना चाह रही मुझ को खुद में

हैरान हूँ मैं

कि कैसे पार कर दी तुमने

उन्मुक्तताओं की सीमाएं सारी

उफ़! ये तुम्हारा शीशे सा पिघलता जिस्म…

और  ये उठता  गिरता साँसों का ज्वार…

इस ज्वार में बह जाने को बेक़रार तुम और मैं…

हो जाते हैं एक …

एक तूफ़ान सा गुज़र जाता है जैसे

होश आता है तूफ़ान के बाद

जो अपने पीछे छोड़ जाता है…

एक डरी सकुचाई हिरनी

लेकिन तृप्त अहसासों से  भरी

मैं आज गवाह हुआ हूँ

हमारे एक सबसे उन्मुक्त देह-संगम का

हिरनी -सिंघनी-हिरनी परिवर्तन का

 

 अभिसार के बाद

………………………………………………………………..

अब जब सब बीत गया है तो मुझे अचरज होता है

न जाने क्या था जो मुझ पे छाया था….

नशा… खुमार…. उन्माद… जूनून…

गर्म अहसास तुम्हारे नर्म जिस्म का

अनावृत जिस्म

विवश करे दे रहा था मुझे

कि खूबसूरती के उदाहरणों को देखूं

या सुखद स्पर्शों का अहसास करूँ

मेरी दुविधाओं को बढ़ातीं

बंद हुयी कभी कभी खुल जाने वाली तुम्हारी आँखें

जो मेरी आँखों में झाँक कर मुझे आमंत्रित करतीं

और फिर मेरा जवाब पा

शर्मीले भावों से भर फिर से मुंद जातीं

सबसे बढ़titan-001कर मुझे मोह रहा था

मेरी ख़ुशी में सुख तलाशता

तुम्हारा समर्पण…

मेरी भावनाओं का ज्वालामुखी तो फटना ही था…

सच है मैंने कुछ किया नहीं था

सारे असर तुम्हारे थे

मैं तो जैसे जी गया था उन लम्हों में

जब तुम्हारे आगोश में सोया था

निश्चिन्त…

निर्द्वंद…

संतुष्ट…

Rajnish sign

 

जून 3, 2014

मृग मरीचिका

मृग मरीचिका…dreamwo-001

बस नज़र की हद के आगे ही…

बस यहीं मिलेगा जीवन

लेकिन…

प्यासे को मरना…

जल बिन…

जल के प्यासे को…

प्रेम बिन…

प्रेम पिपासु को…

Rajnish sign

मई 20, 2014

कैसे हो द्वारकाधीश?… बोली राधा

radhakrishnaस्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण,
प्रसन्नचित सी राधा…

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई…

इससे पहले
कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल उठी…

कैसे हो द्वारकाधीश?

जो राधा
उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से
द्वारकाधीश का संबोधन
कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी
किसी तरह
अपने आप को संभाल लिया…

और बोले राधा से,
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है…
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो…

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी…

बोली राधा,
मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई
ना कोई आंसू बहा…
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते…

इन आँखों में
सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे…

प्रेम के
अलग होने पर
तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको?

कुछ कडवे सच,
प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा
इस तरक्की में
तुम कितने पिछड़ गए?

यमुना के
मीठे पानी से
जिंदगी शुरू की
और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए?

एक ऊँगली पर
चलने वाले सुदर्शन चक्र पर
भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए?

कान्हा
जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी,
प्रेम से अलग होने पर
वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी?

सुदर्शन चक्र उठाकर
विनाश के काम आने लगी!

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ?

कान्हा होते
तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता!

युद्ध में और प्रेम में
यही तो फर्क होता है!

युद्ध में
आप मिटाकर जीतते हैं
और
प्रेम में
आप मिटकर जीतते हैं!

कान्हा
प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है,
पर किसी को दुःख नहीं देता !

आप तो
कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया ?
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया !

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था
जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे!

आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर, हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे !

आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं !

गीता में
मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर

” राधे राधे” करते है..!

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