Archive for फ़रवरी, 2013

फ़रवरी 27, 2013

बस ऐसे जीवन बीत गया

कितने तूफानों से गुजरा

कितनी गहराई में उतरा

दोनों का ही कुछ पता नहीं

बस ऐसे जीवन बीत गया |

राजीव-नयन तो नहीं मगर मद भरे नयन कुछ मेरे थे

इन उठती-गिरती पलकों में खामोश सपन कुछ मेरे थे |

कुछ घने घनेरे से बादल

कब बने आँख का गंगाजल

दोनों का ही कुछ पता नहीं

बस ऐसे जीवन बीत गया

कब कैसे यह घट रीत गया|

जगती पलकों पर जब तुमने अधरों की मुहर लगाईं थी

तब दूर क्षितिज पर मैंने भी यह दुनिया एक बसाई थी |

कितनी कसमें कितने वादे

आकुल-पागल कितनी यादें

दोनों का ही कुछ पता नहीं

किस भय से मन का मीत गया

मैं  हार गया वह जीत गया|

तुम जब तक साथ सफर में थे, मंजिल क़दमों तक खुद आई

अब मंजिल तक ले जाती है मुझको मेरी ही तन्हाई|

कब कम टूटा कब धूप ढली

उतरी कब फूलों से तितली

दोनों का ही कुछ पता नहीं

कब मुझसे दूर अतीत गया

बस ऐसे जीवन बीत गया

{कृष्ण बिहारी}

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फ़रवरी 22, 2013

ये दर्द जो तुमने दे दिया है

ये दर्द तुमने जो दे दिया है

इसे में उम्र भर ढो तो पाऊं

तो देखना क्या कहेगी दुनिया

क़यामत तक तो रहेगी दुनिया |

मेरे मन को सूना पाकर

पहले तुमने डेरा डाला

फिर छोड़ा, यों नाता तोड़ डाला

टूट गई सपनों की माला|

ये शून्य तुमने जो दे दिया है

इसी को पूरा जो कर दिखाऊं

तो देखना क्या कहेगी दुनिया

अंगारों में ही दहेगी दुनिया |

देवालय का देव बताकर

तुमने ही पत्थर कह डाला

जिसको चाहा मधुरित माना

उसको ही पतझर कह डाला |

यही अगर हो मेरी हकीकत

कसम तुम्हारी, जो मान जाऊं

तो देखना क्या कहेगी दुनिया

अभी तो कल तक रहेगी दुनिया |

शायद यह मन का पागलपन

जो तुम में ही रमा हुआ है

लेकिन इसको ज्ञात नहीं है

किसका कब चन्द्रमा हुआ है |

ये गीत जो तुमने दे दिया है

इसको जन्म-भर यदि  गुनगुनाऊं

तो देखना क्या कहेगी दुनिया

ये पीर कैसे सहेगी दुनिया |

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 20, 2013

इतने मुझको प्यारे हो तुम

जितना चिंतन कोई कुंआरा

जितना भोला कोई इशारा

जितना बंधन कोई दुलारा

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितनी बारिश कोई सुहानी

जितनी प्यारी कोई कहानी

जितनी डगर कोई अनजानी

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितना सपन कोई सीने में

जितना नशा है गम पीने में

जितना दर्द है चुप जीने में

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 19, 2013

आवाजों का इंतजार

आवासीय समिति के सचिव महोदय आज घर में अकेले रह गये थे। बेहद जरुरी काम से उनकी पत्नी, बच्चों के साथ मायके चली गयी थीं। अकेले उन्हे नींद आने में परेशानी आ रही थी।
सर्दी भी बला की पड़ रही थी इस बार।

मन ही मन उन्होने सर्दी को कोसा…जाने कब यह मनहूस सर्दी खत्म होगी?
फरवरी तक शायद कुछ राहत आ जाये पर अभी तो लगभग सोलह दिन बाकी हैं इस कमबख्त जनवरी के।
उन्हे छत से कुछ आवाज आयी और वे चौकन्ने होकर बैठ गये। पर आवाज दोबारा नहीं आयी।
शायद बिल्ली होगी।… उन्होने सोचा।
कमरे के बगल में बने स्टोर की छत पर टीन की चादरें पड़ी हुयी थीं और हो सकता है बिल्ली उसी छत से गुजर कर गयी हो।
कुछ और देर वे बिस्तर पर ऐसे ही बैठे रहे। फिर उन्हे याद आया कि अभी तक कालोनी के चौकीदार की न तो सीटी सुनायी दी और न ही उसकी लाठी की ठक ठक की आवाज।
वे मन को कड़ा करके कम्बल में अपने को पूरी तरह से ढ़क कर ड्राइंग रुम में आ गये। उन्होने खिड़की के शीशे से बाहर देखने की कोशिश की पर कोहरा इतना ज्यादा था कि सड़क पर कुछ दिखायी नहीं दिया।
बाहर निकल कर देखने की हिम्मत वे कर नहीं पाये।
अभी कुछ दिन पहले ही कालोनी में दो घरों में चोरी हो चुकी थी और उन्होने इसी संदर्भ में अगामी रविवार को आवासीय समिति की बैठक बुलायी थी।
उन्होने घड़ी देखी। ग्यारह पैंतालिस बज चुके थे।
शायद चौकीदार गली के दूसरे किनारे पर हो। … या हो सकता है बाइस नम्बर वाले के साथ बैठकर चाय पी रहा हो। बाइस नम्बर वाले ने दिमाग खराब कर रखा है चौकीदार का। रिटायर्ड लोगों के साथ यह दिक्कत है तो है ही उन्हे नींद नहीं आती।
और कालोनी की सड़कों पर रहने वाले कुत्ते और पिल्ले आदि भी बाइस नम्बर वाले के यहाँ ही पड़े रहते हैं। कुत्तों के भौंकने की आवाजे भी नहीं आ रही…।
एक बार को उन्होने सोचा कि बाइस नम्बर वाले के यहाँ फोन करके पूछा जाये कि क्या चौकीदार उनके घर तो नहीं बैठा।
पर वे फोन करने की हिम्मत नहीं कर सके। काफी लेट हो गया है। अगर कहीं सो गये होंगे तो ऐसे समय पर फोन करने पर कहीं उन्हे लेक्चर न पिलाने लग जायें।
वे मन मसोस कर बैठ गये।
उन्होने टीवी चला दिया। बीच बीच में उसकी आवाज बंद करके वे चौकीदार की तरफ से आने वाली किसी आवाज को सुनने का प्रयास करते रहे।
उन्हे चौकीदार पर गुस्सा आने लगा।
कैसे आज सुबह घर जाने से पहले उनके पास आया था।
साब ठंड बहुत पड़ रही है। कुछ लकड़ियों आदि का इंतजाम करवा देते। एक कुछ अच्छे ढ़ंग का कम्बल दिलवा दो। इतनी सर्दी में तो चक्कर ही नहीं लग नहीं पाता। और इस खुली कोठरी में बैठना भी मुश्किल है आजकल। सारा शरीर अकड़ जाता है सुबह तक। कल तो घर जाते समय पैर साइकिल के पैडल भी नहीं चला पाये। काफी दूर तक तो पैदल ही चलना पड़ा। चलना क्या साब बस साइकिल पर लदा हुआ घिसटता रहा।
उन्होने चौकीदार से कह दिया था कि रविवार को समिति की बैठक के बाद ही कुछ हो पायेगा। चौकीदार मन मसोस कर चला गया था।
अब सचिव महोदय को कालोनी में रहने वालों पर भी गुस्सा आने लगा। चोरी चोरी के भय का इतना हल्ला मचाते हैं पर जेब से थोड़े से पैसे निकलाते हुये सबके पेट में दर्द होना शुरु हो जाता है। कितनी बार प्रस्ताव रखा गया है कि हर गली के दोनों सिरों पर लोहे के गेट लगवा दिये जायें जो कि रात में दस बजते ही बंद कर दिये जायें और हर गली में एक चौकीदार बैठा दिया जाये।
पर पैसा तो निकलता ही नहीं लोगो की जेब से।
इन्ही सब विचारों में खोये वे बैठे रहे। उन्होने फिर से समय देखा तो सवा दो बज गये थे।
चौकीदार आ तो गया था समय पर क्योंकि उन्होने करीब साढ़े आठ बजे उसे बगल के घर में रहने वाले वृद्ध दम्पति से बात करते सुना था। शायद उनके लिये बाजार से कुछ लाया होगा। वे अक्सर उसे सुबह के समय कुछ जरुरत का सामान लाने के लिये पैसे दे देते थे और वह दिन में सामान को खरीद कर शाम को उन्हे लाकर दे देता था।
क्या हो गया चौकीदार को आज? आवाज क्यों नहीं कर रहा?
उनका धैर्य खत्म होता जा रहा था। एक तो नींद न आने के कारण मूड वैसे ही खराब हो चला था ऊपर से उन्हे चौकीदार की तरफ से कुछ आवाज सुने जाने की जबर्दस्त इच्छा हो गयी थी।
कहीं सो तो नहीं गया?
या ऐसा तो नहीं कि चोरों बदमाशों ने उसे अपने काबू में कर लिया हो और किसी घर में चोरी हो रही हो आज की रात?
उन्हे भय लगा कि वे भी तो घर में अकेले हैं अगर बदमाश उनके घर आ धमके तो वे कैसे उनका मुकाबला करेंगे।
उन्होने सोचना शुरु कर दिया कि वे पहले तो तुरन्त पुलिस को फोन कर देंगे।
पर अगर उन्होने पहले ही टेलीफोन का तार काट दिया तो…?
वे बैचेन हो उठे और उठकर उन्होने रसोई में से एक बड़ा सा साग आदि काटने वाला चाकू लाकर अपने पास रख लिया। सुबह दूध लेने जाते हुये वे कुत्तों से बचने के लिये अक्सर वे एक छ्ड़ी लेकर चलते थे और वे उसे भी अपने पास लेकर बैठ गये।
पूरा तो नहीं पर कुछ हद तक वे आश्वस्त हो गये।
पर उनका ध्यान पूरी तरह से चौकीदार पर लगा हुआ था| आज उन्हे महसूस हुआ कि चौकीदार की वजह से कैसे लोग शांति से सोते हैं।
उन्होने तय किया कि रविवार की बैठक में वे इस बात को उठायेंगे कि चौकीदार की बैठने वाली कोठरी के तीन तरह दीवारें करवा दी जायें और उसे एक कम्बल आदि दिया जाये और जब तक कि सर्दी बहुत ज्यादा पड़ रही है, तब तक उसके लिये लकड़ी जलाने का प्रबंध किया जाये। अगर वह जागता है तो कालोनी के लोग शांति से सो सकते हैं।

उन्हें वास्तविकता का बोध भी हुआ कि सामान्यतः लोग अपनी अपनी जिंदगी, अपनी अपनी जरुरतों और अपने अपने सरोकारों से घिरे हुये हैं। समिति की रविवार की बैठक में हो सकता है नये चौकीदार का चयन, उसके लिये कुछ सुविधाओं का आवंटन हुआ हो जाये या हो सकता है कि ताल-मटोल की जाए  कि अब अगली सर्दी में देखा जायेगा और इस बार तो अब सर्दी कम होने लगेगी सो चौकीदार इन्ही सुविधाओं से अपना काम चला सकता है और कालोनी की सुरक्षा कर सकता है।
ऐसे ही विचारों में खोये हुए वे चौकीदार की तरफ से कुछ आवाज आने का इंतजार करने लगे।
रोज तो वह कुछ कुछ देर में सड़कों का चक्कर लगाते हुये या तो सीटी मारता था या लाठी से जमीन ठोकता था और हरेक घंटे पर बिजली के खम्बे पर उतनी चोटें मारता था जितने बजे होते थे। कभी कभी वे इन आवाजों को पसंद भी नहीं करते थे।
पर आज उन्ही आवाजों को सुनने के लिये वे बैचेन बैठे थे।

उसकी सीटी बोलती क्यों नहीं आज रात ?
उसकी लाठी जमीन क्यों नहीं ठोक रही ?
वह बिजली के खम्बे को पीट कर लोगों को समय क्यों नहीं बता रहा ?

उन्हें शक हुआ कि हो न हो चौकीदार सो गया है |
ऐसे ही आवाजों के इंतजार में कब बैठे बैठे उनकी आँख लग गयी उन्हे पता नहीं चला।
सुबह अखबार वाले की आवाज से उनकी आँख खुली।
रोज तो वह अखबार फेंक कर चला जाता था पर आज वह उनका गेट खड़का कर उन्हे पुकार रहा था।
अपने थके, टूटे और अलसाये शरीर के साथ बमुश्किल वे सोफे से उठ पाये। दरवाजा खोलकर बाहर आये तो अखबार वाले ने उनसे कहा।
साब जरा बाहर तो आकर देखो, चौकीदार…
उन्होने सड़क पर बाहर आकर देखा।
बूढ़े चौकीदार का शरीर उसकी खुली कोठरी में बनी सीमेंट की बेंच पर अकड़ा हुआ पड़ा था। उसकी लाठी जमीन पर पड़ी थी। पुराना कुछ कुछ फटा कम्बल उसके शरीर पर ही पड़ा था।

 

— […राकेश] …

फ़रवरी 17, 2013

सारा सावन पिघल न जाए

वही कहानी मत दुहराओ

मेरा मन हो विकल न जाए

भावुकता की बात और है

प्रीत निभाना बहुत कठिन है

यौवन का उन्माद और है

जनम बिताना बहुत कठिन है

आँचल फिर तुम मत लहराओ

पागल मन है मचल न जाए

दर्पण जैसा था मन मेरा

जिसमें तुमने रूप संवारा

तुम्हे जिताने की खातिर में

जीती बाजी हरदम हारा

मेघ नयन में मत लहराओ

सारा सावन पिघल न जाए

तोड़ा तुमने ऐसे मन को

पुरवा जैसे तोड़े तन को

सोचो मौसम का क्या होगा

बादल यदि छोड़े सावन को

मन चंचल है मत ठहराओ

अमरित ही हो गरल न जाए

कदम कदम पर वंदन करके

यदि में तुमको जीत न पाया

कमी रही होगी कुछ मुझमे

जो तुमने संगीत न पाया

तान मगर अब मत गहराओ

जीवन हो फिर तरल न जाए

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 12, 2013

पर तुम तो घबराए बहुत …

रिमझिम-रिमझिम बरसा सावन

याद मुझे तुम आये बहुत

मन के सूने से आँगन में

गीत तुम्हारे गाये बहुत …

खुली-खुली वे जुल्फें तेरी

नभ में जैसे छाई बिजली

साफ़ चमकती दंत-पंक्तियाँ

चमक उठी हो जैसे बिजली

मैंने दृष्टि रोक दी तुम पर

तुम मन में शरमाये बहुत …

पहली बार हुआ कुछ ऐसा

जब मैं पहुंचा पास तुम्हारे

आहट-आहट में सिहरन थी

नयनों में थे आंसू खारे

मैंने हाथ बढ़ाया ही था

पर तुम तों घबराये बहुत …

शायद रात न भूलेगी वो

संग-संग जब चन्दा देखा

एक दूसरे के नयनों में

हमने गंगा-जमुना देखा

पावन संगम की तृष्णा में

दृग अपने भर आये बहुत …

रिमझिम-रिमझिम बरसा सावन

याद मुझे तुम आये बहुत

{कृष्ण  बिहारी}

फ़रवरी 11, 2013

उससे अधिक कुंआरे हो तुम

जितनी बाल्मिकी की कविता

जितनी उद्गम पर हो सरिता

जितनी किरन चांदनी

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी पावन यहाँ प्रकृति है

जितनी सुन्दर धवल कृति है

जितनी घड़ी सावनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी सिहरन सीधी सीधी

जितनी मनहर कोई वादी

जितनी मधुर रागिनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी क्षमाशील है धरती

जितनी शमा हवा से डरती

जितनी नरम रोशनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

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