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मार्च 1, 2015

भूख – हरिओम पंवार

मेरा गीत चाँद है ना चांदनी है आजकल
ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल
मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
मैं गरीब के रुदन के आंसुओं की आग हूँ
भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ।

मेरा गीत आरती नहीं है राजपाट की
कसमसाती आत्मा है सोये राजघाट की
मेरा गीत झोपडी के दर्दों की जुबान है
भुखमरी का आइना है आँसू का बयान है
भावना का ज्वार भाटा जिए जा रहा हूँ मैं
क्रोध वाले आँसुओं को पिए जा रहा हूँ मैं
मेरा होश खो गया है लोहू के उबाल में
कैदी होकर रह गया हूँ मैं इसी सवाल में
आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को
नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को।

सोचकर ये शोक शर्म से भरा हुआ हूँ मैं
और अपने काव्य धर्म से डरा हुआ हूँ मैं
मैं स्वयम् को आज गुनहगार पाने लगा हूँ
इसलिये मैं भुखमरी के गीत गाने लगा हूँ
गा रहा हूँ इसलिए कि इंकलाब ला सकूं।
झोपडी के अंधेरों में आफताब ला सकूं।।

इसीलिए देशी औ विदेशी मूल भूलकर
जो अतीत में हुई है भूल, भूल-भूल कर
पंचतारा पद्धति का पंथ रोक टोक कर
वैभवी विलासिता को एक साल रोक कर
मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए
झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए

मेहरबानों भूख की व्यथा कथा सुनाऊंगा
महज तालियों के लिए गीत नहीं गाऊंगा
चाहे आप सोचते हो ये विषय फिजूल है
किंतु देश का भविष्य ही मेरा उसूल है
आप ऐसा सोचते है तो भी बेकसूर हैं
क्योकिं आप भुखमरी की त्रासदी से दूर हैं

आपने देखी नहीं है भूखे पेट की तड़प
काल देवता से भूखे तन के प्राण की झड़प
मैंने ऐसे बचपनों की दास्तान कही है
जहाँ माँ की सूखी छातियों में दूध नहीं है
यहाँ गरीबी की कोई सीमा रेखा ही नहीं
लाखों बच्चे हैं जिन्होंने दूध देखा ही नहीं
शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते हैं वे
कुत्ते जिसे चाट चुके झूठन चाटते हैं वे

भूखा बच्चा सो रहा है आसमान ओढ़कर
माँ रोटी कमा रही है पत्थरों को तोड़कर
जिनके पाँव नंगे हैं लिबास तार-तार हैं
जिनकी साँस-साँस साहुकारों की उधार है
जिनके प्राण बिन दवाई मृत्यु की कगार हैं
आत्महत्या कर रहे हैं भूख के शिकार हैं

बेटियां जो शर्मो-हया होती हैं जहान की
भूख ने तोड़ा तो वस्तु बन बैठी दुकान की
भूख आस्थाओं का स्वरूप बेच देती है
निर्धनों की बेटियों का रूप बेच देती है
भूख कभी-कभी ऐसे दांव-पेंच देती है
सिर्फ दो हजार में माँ बेटा बेच देती है

भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देती है
आन-बान-शान का गुमान तोड़ देती है
भूख सुदामाओं का भी मान तोड़ देती है
महाराणा प्रताप की भी आन तोड़ देती है
भूख तो हुजूर सारा नूर छीन लेती है
मजूरन की मांग का सिन्दूर छीन लेती है

किसी-किसी मौत पर धर्म-कर्म भी रोता है
क्योंकि क्रिया कर्म का भी पैसा नहीं होता है
घर वाले गरीब आँसू गम सहेज लेते हैं
बिना दाह संस्कार मुर्दा बेच देते हैं
थूक कर धिक्कारता हूँ मैं ऐसे विकास को
जो कफ़न भी दे ना सके गरीबों की लाश को।

कहीं-कहीं गोदामो में गेहूं सड़ा हुआ है
कहीं दाने-दाने का अकाल पड़ा हुआ है
झुग्गी-झोपड़ी में भूखे बच्चे बिलबिलाते हैं
जेलों में आतंकियों को बिरयानी खिलाते हैं
पूजा पाठ हो रहे हैं धन्ना सेठों के लिए
कोई यज्ञ हुआ नहीं भूखे पेटों के लिए

कोई सुबह का उजाला रैन बना देता है
कोई चमत्कार स्वर्ण चैन बना देता है
कोई स्वर्ग जाने की भी दे रहा है बूटियां
कोई हवा से निकाल देता है अंगूठियां
पर कोई गरीब की लंगोटी न बना सका
कभी कोई साधू बाबा रोटी न बना सका

भूख का सताया मन प्राण बीन लेता है
राजाओं से तख्त और ताज छीन लेता है
भूख जहाँ बागी होना ठानेगी अवाम की
मुँह की रोटी छीन लेगी देश के निजाम की

देश में इससे बड़ा कोई सवाल होगा क्या ?
भूख से भी बड़ा कोई महाकाल होगा क्या ?
फिर भी इस सवाल पर कोई नहीं हुंकारता
कहीं अर्जुन का गांडीव भी नहीं टंकारता
कोई भीष्म प्रतिज्ञा की भाषा नहीं बोलता
कहीं कोई चाणक्य भी चोटी नहीं खोलता

इस सवाल पर कोई कहीं क्यों नहीं थूकता।
कहीं कोई कृष्ण पाञ्चजन्य नहीं फूंकता।।

भूख का निदान झूठे वायदों में नहीं है
सिर्फ पूंजीवादियों के फायदों में नहीं है
भूख का निदान जादू टोनों में भी नहीं है
दक्षिण और वामपंथ दोनों में भी नहीं है
भूख का निदान कर्णधारों से नहीं हुआ
गरीबी हटाओ जैसे नारों से नहीं हुआ

भूख का निदान प्रशासन का पहला कर्म है
गरीबों की देखभाल सिंहासन का धर्म है
इस धर्म की पालना में जिस किसी से चूक हो
उसके साथ मुजरिमों के जैसा ही सुलूक हो

भूख से कोई मरे ये हत्या के समान है
हत्यारों के लिए मृत्युदण्ड का विधान है
कानूनी किताबों में सुधार होना चाहिए
मौत का किसी को जिम्मेदार होना चाहिए

भूखों के लिए नया कानून मांगता हूँ मैं
समर्थन में जनता का जुनून मांगता हूँ मैं
खुदकशी या मौत का जब भुखमरी आधार हो
उस जिले का जिलाधीश सीधा जिम्मेदार हो
वहां का एमएलए, एमपी भी गुनहगार है
क्योंकि ये रहनुमा चुना हुआ पहरेदार है
चाहे नेता अफसरों की लॉबी आज क्रुद्ध हो
हत्या का मुकद्दमा इन्ही तीनों के विरुद्ध हो

अब केवल कानून व्यवस्था को टोक सकता है
भुखमरी से मौत एक दिन में रोक सकता है
आज से ही संविधान में विधान कीजिये।
एक दो कलक्टरों को फाँसी टांग दीजिये।।
डॉ. हरिओम पंवार

जनवरी 8, 2015

नये गीत लाता रहा…साहिर लुधियानवी

साथियों ! मैंने बरसों तुम्हारे लिए
चाँद तारों बहारों के सपने बुने
हुस्न और इश्क का गीत गाता रहा
आरजुओं के ऐवां सजाता रहा
मैं तुम्हारा मुगन्नी तुम्हारे लिए
जब भी आया नए गीत लाता रहा

आज लेकिन मेरे दामने चाक में
गर्दे राहे सफ़र के सिवा कुछ नहीं
मेरे बरबत के सीने में नगमों का दम घुट गया है
तानें चीखों के अंबार में दब गयी हैं
और गीतों के सुर हिचकियाँ बन गए हैं

मैं तुम्हारा मुगन्नी हूँ, नगमा नहीं हूँ
और नगमे की तखलीक का साज़ो सामां
साथियों आज तुमने भसम कर दिया है
और मैं अपना, टूटा हुआ साज़ थामे
सर्द लाशों के अम्बार को तक रहा हूँ

मेरे चारों तरफ मौत की वह्शतें नाचती हैं
और इंसान की हैवानियत जाग उठी है
बरबरियत के खूंख्वार अफरीत
अपने नापाक जबड़ों को खोले हुए
खून पीपी के गुर्रा रहे हैं

बच्चे माओं की गोदों में सहमे हुए हैं
इस्मतें सर बरहना परेशान हैं
हर तरफ शोरे आहो बुका है
और मैं इस तबाही के तूफ़ान में
आग और खून के हैजान में
सरनिगूं और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों पर
अपने नगमों की झोली पसारे
दर ब दर फिर रहा हूँ

मुझको अमन-ओ-तहजीब की भीख दो
मेरे गीतों की लैय, मेरे सुर मेरे नै
मेरे मजरूह होंठों को फिर सौंप दो

साथियों! मैंने बरसों तुम्हारे लिए
इंक़लाब औ बगावत के नगमे अलापे
अजनबी राज के ज़ुल्म की छाँव में
सरफरोशी के ख्वाबीदा जज्बे उभारे
इस सुबह की राह देखी
जिसमें मुल्क की रूह आज़ाद हो
आज जंजीरे मह्कूमियत कट चुकी है
और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर
अजनबी कौम के ज़ुल्मत अफशां फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं

खेत सोना उगलने को बेचैन हैं
वादियाँ लहलहाने को बेताब हैं
कोहसारों के सीने में हैजान है
संग और खिश्त बेख्वाबो बेदार हैं
इनकी आँखों में तामीर के ख्वाब हैं
इनके ख़्वाबों को तकमील का रूप दो

मुल्क की वादियाँ, घाटियाँ, खेतियाँ
औरतें, बच्चियां
हाथ फैलाए, खैरात की मुन्तजिर हैं
इनको अम्न-ओ-अमन तहजीब की भीख दो

माओं को उनके होंठों की शादाबियाँ
नन्हे बच्चों को उनकी ख़ुशी बख्श दो
मेरे सुर बख्श दो, मेरी लय बख्श दो

आज सारी फिजा भिखारी खड़ी है
और मैं इस भिखारी फिज़ा में
अपने नगमों की झोली पसारे
दर-ब-दर फिर रहा हूँ

मुझको मेरा खोया हुआ साज़ दो
मैं तुम्हारा मुगन्नी तुम्हारे लिए
जब भी आया, नए गीत लाता रहूँगा|

(साहिर लुधियानवी)

(बंटवारे के वक्त क्षुब्ध होकर 1947 में)

दिसम्बर 18, 2014

बच्चे स्कूल जा रहे हैं…

हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब से
आकाश अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करके सूरज
सुनहरी मलमल की पगडी बाँधे
सड़क किनारे खड़ा हुआ
मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
हवाएँ सर-सब्ज़ डालियों में
दुआओं के गीत गा रही हैं
महकते फूलों की लोरियाँ
सोते रास्तों को जगा रही हैं
घनेरा पीपल गली के कोने से
हाथ अपने हिला रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
फ़रिश्ते निकले हैं रोशनी के
हर एक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर एक ज़र्रा
माँ के दिल सा धड़क रहा है
पुरानी इक छत पे वक़्त बैठा
कबूतरों को उड़ा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
(निदा फाजली)

मार्च 30, 2014

वह जो है सबसे महान माँ…

सब माताएं महान होती हैं womanchildlabour

अपने बच्चों के लिए

वे नाना प्रकार के त्याग करती हैं

अपने बच्चों के लिए

वे अपने जीवन को

अपनी अभिलाषाओं को

काट-छांट कर सीमित बना देती हैं

अपने बच्चों के लिए

बहुत सी माताएं

छोड़ देती हैं

लाखों-करोड़ों की नौकरियां और व्यवसाय

अपने बच्चों के लिए

अपने तमाम शौक और जूनून की हद तक पाले गये शौक

भी छोड़ देती हैं कुछ अरसे के लिए

अपने बच्चों के लिए

जो कुछ भी आड़े आता है बच्चों के

सही ढंग से लालन पोषण में

वे उसे छोड़ देती हैं

पर सुरक्षित माहौल में

रहने वाली स्त्रियाँ

बेहतरीन माएँ होते हुए भी

उतनी महान नहीं होती

जितनी होती है एक कामगार गरीब माँ

वह स्त्री जो बांधकर

अपनी पीठ पर दूधमुयें बच्चे को

काम पर जाती है

पत्थर तोडती है

ईंटें धोती हैं

भांति भांति के परिश्रम करती है

ताकि अपने और बच्चे के लिए

जीविका कमा सके,

और यह कठोर परिश्रम उसे

रोज करना पड़ता है

अगर रहने का कुछ ठिकाना है तो

वहाँ से वह रोज सुबह निकलती है

 बच्चे को पीठ पर कपड़े से बाँध कर

ठेकेदार की चुभती निगाहों से गुजर कर

उस रोज की जीविका के लिए काम पाती है

बच्चे को कार्यस्थल के पास ही कहीं लिटा देती है

और काम पर जुट जाती है

और इस स्थल पर न उसकी सुरक्षा का कोई प्रबंध है

labour motherन उसके बच्चे की

पर इन् सब मुसीबतों से लड़ती हुयी

वह जीविकोपार्जन के लिए हाड तोड़ मेहनत करती रहती है

कुछ देर रोते बच्चे के पास जाती है तो

सुपरवाइजर से झिडकी सुनती है

चुनाव का वक्त होता है तो

देखती है पास से गुजरते वाहनों पर लदे नेताओं को

और सुनती है उनके नारों को

– वे उस जैसे गरीब लोगों के लिए बहुत कुछ करेंगे|

शायद उसे आशा भी बंधती हो

पर वह सब तो भविष्य की बातें होती है

वर्तमान में तो उसे रोज

जीने के लिए लड़ना है

इसलिए रोज सुबह वह अपने बच्चे को पीठ पर लाद

काम पर निकलती है

उसे जीना है

अपने बच्चे के लिए

और अपने बच्चे को जिंदा रखना है

खुद को जिंदा रखने के लिए|

उसे बीमार पड़ने तक की न तो सहूलियत है और न ही इजाज़त

चारों तरफ निराशा से भरे माहौल में भी

वह रोजाना कड़ी मेहनत करके जिए चली जाती है

घर-परिवार में रहने वाली तमाम माओं से

जिनके पास सहयोग होते हैं

तमाम तरह के

कहीं ज्यादा बड़े कद होते हैं ऐसी माओं के

यही हैं धरती पर सबसे महान माएँ!

…[राकेश]

 

 

 

 

जनवरी 17, 2014

आंसू…

बहुत बड़ी सी भीड़ थी

दोनों पार्श्व में

मंत्रोच्चार करती, जय-जयकार करती!

कान्हा के सामने बैठे थे,

हम तीन

माँ, पिताजी और मैं|

आह्लाद नहीं था

कि कहीं हो रहा था

ईश्वर से मेरा संयोग

वरन,

मैं जार-जार रोया था

सिर्फ इस खुशी को जीकर

कि, आज इस क्षण में

मैं शांत होकर

बैठ सका हूँ

इन् दोनों के साथ

और कि,

कहीं तो ईश्वर मुझ पर मुस्कराया है|

Yugalsign1

दिसम्बर 3, 2013

बंद का समय

सूखी पत्तियों की फिसलन भरी डगर के पारblueumb-002

हरियाली के आँचल में

झुरमुटों के पास से

शाम का धुआँ निकल रहा है

कोई माँ, खाना बना रही है

छौनों के घर लौटने का समय हो गया है|

सड़क के किनारे बनीं छोटी-छोटी फड़ें

बाहर सजा सामान अब समेटा जा रहा है

मैले से सफ़ेद कुर्ते-पाजामे में

कैद छुटा बच्चा

पिता को सामान पकड़ा रहा है

दुकान को बंद करने का समय हो गया है|

Yugalsign1

जुलाई 26, 2011

प्यार की बात

मत करो मुझसे इस समय
प्यार की बात,
बहुत मजबूरियाँ हैं,
पिता नहीं हैं
माँ बूढ़ी है
सबसे छोटी बहन फलाँगते हुये
चढ़ गयी है सीढ़ियाँ उम्र की
और छोटा भाई
डिग्रियों का बोझ लादे
बेकार है।

करनी है बहन की शादी
लगाना है भाई को
रास्ते पर
देखना है घर-परिवार,
ऐसे में
क्या करुँ मैं तुमसे
प्यार की बात
ज़िंदगी में बहुत कुछ है
प्यार से ऊपर,
जिन्हे जिम्मेदारियाँ कहते हैं!

मैं भी चाहता हूँ
कुंतला,
येलोकेशी,
जिसके अंग सुते हुये हों साँचें में
एक गौरांगी प्रिया
जो लम्बी हो,
स्लिम हो
गहरी नाभी और सपाट पेट वाली हो
जिसकी कमर मेरी बाहोँ के घेरे में आने से शरमाए
जो मुझे चाहे मेरी तरह।
हर भारतीय नौजवान की तरह
मुझे भी लुभाती है हर यौवना।

मगर यह संभव नहीं है
हकीकतें ज़िंदगी से बड़ी हैं।
देश में
जिस वक्त्त हर मोर्चे पर
हो रहा हो अनवरत भ्रष्टाचार
और जहाँ घर में
बैठी हो जवान बहन
भाई बेकार
वहाँ मैं कर सकता हूँ
केवल
क्रांति
पर नहीं कर सकता प्यार
फिलहाल इस समय एक युवती से।

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 24, 2011

माँ के ये लाल

बचपन में
माँ का दुलार छला

जवानी में
छाती पर मूंग दली

चिता का सामान बनी
जो होनी चाहिए थी
बुढापे की लकड़ी।

(रफत आलम)

जुलाई 23, 2011

कल और आज

अब कोई चरवाहा
बाँसुरी की सुरीली तान पर
प्रेम गीत नहीं गाता
और न ही कोयल कूकती
चिड़िया भी बहुत कम चहचहाती है
घर की चहेती गाय
जिसका दूध कई पीढ़ियों तक
अमृत पान की तरह पिया
उसके  ढूध न देने के बाद
उसे बेकार समझकर
सडकों पर आवारा घूमने
धक्के और डंडे खाने के लिए
बेसहारा छोड़ दिया
अब कोई बच्चा भावुकता भरे स्वर में
माँ को
अम्मा कहकर नहीं पुकारता
अब खेत में स्वस्थ लहलहाती फसलें नहीं
कीटनाशकों को पीने वाली
नशीली फ़सलें उगती हैं
गांव में बड़े बूढ़ों की
अब कोई चौपाल नहीं बैठती
जिसमे कभी
सुख दुःख की बातें हुआ करती थीं
अब तो घर में
बूढ़ों को बोझ समझकर
बच्चे भी उनको धक्के मारते हैं
और कुत्ते की तरह
उनको दूर से रोटी फेंकते हैं
और जवान ये सब
मौन होकर देखतें हैं
ये सब देखकर
मेरे मन में
बस रोज यही सवाल
घूमता है कि
ये इन्सानियत की नयी उन्नति है
या फिर
उपभोक्तावाद की लादी हुयी बेबसी
कुछ भी हो
मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं कि
शरीर ढ़ोया जा रहा है
या फिर
जीवन धीरे धीरे बेमौत मर रहा है
यदि उपभोक्तावाद से बेबस व्यक्ति
केवल शरीर ढ़ो रहा है
और चेतना कहीं
अंधकार के गर्त में खो गयी है
तो यही कहना होगा कि
उपभोक्तावाद की इस भयानक आंधी में
यदि तुम चेतना के
दीपक की लौ अपने घर के अंदर भी
जलाए रख सको तो भी
सत्य तुम्हे इस साहस के लिए भी
दुगुनी हिम्मत, ताकत देगा
और तुम यह हिम्मत कर बैठोगे कि
तुम्हे शरीर ढोने वाली
उधार की ज़िंदगी नहीं
बेशक दिन में कुछ पलों के लिए ही सही
मानवीय संवेदना वाली
कुदरत की दी हुई
स्वाभाविक ज़िंदगी जीनी है!

(अश्विनी रमेश)

जुलाई 15, 2011

संस्कार

हमेशा
हर बार की तरह
आज भी मैं
अपनी माटी और माँ
की शरण में
अपने गांव और घर पहुंचा हूँ
पुनः अपने भीतर
वही जान फूंकने
जिसे मैंने अपनी माटी
और
माँ के सहारे
अपने संघर्षमयी जीवनपथ पर
चलते हुए
अटूट साहस और धैर्य से
अर्जित करके
जीवन के कठिनतम क्षणों को भी
बड़े धैर्य और शालीनता से
जिया है
पहाड़ों की कोख में बसी
माँ का शरीर
उम्रदराज हुआ तो क्या
हिमालय सा मजबूत
इरादे वाला उसका दिलों-दिमाग
अभी भी डगमगाया नहीं
थका नहीं
पहले की तरह
मुझमे अभी भी
माँ का वही अदब है
इस बार भी थोड़ा
बतियाने के बाद
माँ कह रही है
शाम को खेतों का चक्कर काट आना
फसल देख लेना
कैसी उगी है|

मुझे याद है
बचपन में जब माँ
हम सब बच्चों को
स्कूल की छुटी के बाद
खेत में मक्की काटने
और
आलू खोदने ले जाया करती थी
और जब स्कूल छूटा तो
दोपहर में आराम के बाद
यह अदब कि
माँ अभी आवाज़ देगी
तीन बज गए
क्या सोकर जीवन कट जाएगा
अब उठ जा
खेत जाना होगा

माँ के ये शब्द
हमेशा मुझे
आलस्य की नींद से
जगाते रहें हैं
अपनी माटी और माँ के
एक अटूट संस्कार को
जीने के लिए
सोचता हूँ
गर में अपनी माटी और माँ के
इस संस्कार को न जीता
तो शायद मैं
एक संस्कार रहित
अधूरा व्यक्ति होता
जिसे यह मालूम न होता कि
माटी के अन्न
और माँ के संस्कार का
संघर्षमयी जीवन में
एक व्यक्ति को
सार्थक व्यक्ति बनाने में
कितना अर्थपूर्ण
और
अद्वितीय
योगदान होता है !

(अश्विनी रमेश)

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