Archive for दिसम्बर, 2010

दिसम्बर 29, 2010

हरामखोरी … (ग़ज़ल – रफत आलम)

 

बेईमान शाहों से सीनाज़ोरी करें
क्यों ना हम भी टैक्स चोरी करें

घोटाला सरकार की नसीहत है
जैसे हो सब रिश्वतखोरी करें

कमीशन पक्का है मीडिया वालो
बेईमान की हिमायत फोरी करें

सफाई फंड को पूरा डकार कर
पावन गंगा को गन्दी मोरी करें

यूँ भी तो लूटा जा रहा है देश
आओ हम भी हरामखोरी करें

खाकर पीकदान बना दें देश को
चबा के पान की गिलोरी करें

इन देशखोरों से उनकी तौबा
बराबरी इनसे क्या अघोरी करें

चुनाव जीतें हम लूटे  माल से
काली करतूतें अपनी गोरी करें

सज़ा यहाँ किसी को मिलती नहीं
सब बेरोजगारों से कहो चोरी करें

बकवास अपनी बंद कर ’आलम
या खोपड़ी हम तेरी कोरी करें

(रफत आलम)

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दिसम्बर 27, 2010

प्याज रोटी का कफन ओढ़ाती मंहगाई

प्याज़ रोटी वाले सपनों के लिए
सौ का नोट बड़ी हकीकत है|

साठ की प्याज़ चालीस का आटा
शाम का चूल्हा जल जायेगा|

सौ का नोट बड़ा ख़वाब है
जिसकी ताबीर के लिए
दिनभर ढोना पड़ता है हाथरिक्शा
या जर्जर काया से दुगना कोई बोझ|

पांच सौ के नोट पर जल कर
रईसजादे की दस हज़ारी स्मैक डोज़
चंद कशों में धुआं हो जाती है
क्या गम?
बेईमान बाप के बैंक खाते में
लाख गुना काली रकम जमा है।

देश के गोश्त की औनी-पौनी कीमत वसूलकर
जयचंद ने जाम खनकाए हैं आज भी
आज भी हजारों जगह क़र्ज़ ने ज़हर खाया है
प्याज़ रोटी का कफ़न ओढ़े
कल के अखबार में महंगाई निकलेगी।

अबला के साथ सामूहिक बलात्कार की बात
चटखारे लेकर पढ़ने वाले
ज़मीरफरोश लोगों को
शर्म से गाड़ती- लहू रुलाती हकीकते
रोज़ की आम बात लगने लगी हैं।

(रफत आलम)

दिसम्बर 23, 2010

अनस्तित्व … (कविता – कृष्ण बिहारी)

 

खेत की मेंड़ से
सटे हुये अपने आम के पेड़ के नीचे
बैठकर सुस्ताते हुये
रामअधार ने अपनी बीवी से कहा –
तुम्हारे आँचल की हवा से
सुखाते अपने पसीने को देखता हुआ मैं
अपने और तुम्हारे
श्रम के निहितार्थ सोच रहा हूँ।

भूल गया हूँ इस समय
खेती-बारी और दुनिया के झमेले
और चिंताएं कि
यदि आ गई बाढ़
या पढ़ गया सूखा तो
जीयेंगे किस तरह हम और हमारे बच्चे।

फिलहाल तो तुम हो
और तुम्हारे आँचल की हवा है
मैं हूँ
और सूखता पसीना है
इन पलों के शीतल सुख के आगे
आगत की चिंता
वर्तमान को खोना है
साली बाढ़…जब आयेगी…तब आयेगी
सूखा… जब पड़ेगा… तब पड़ेगा…
अभी तो तुम्हे और मुझे
हम होना है।

{कृष्ण बिहारी}

दिसम्बर 23, 2010

जॉन एलिया : कहते हैं कि उनका था अंदाजे बयां और

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और

यह शेर कहा तो हजरत ग़ालिब ने खुद के लिये था पर जॉन साब को मंच से शायरी करते देखना और सुनना बखूबी जता देता है कि यह शेर जॉन साब पर भी उतना ही मौजूँ है जितना कि हजरत ग़ालिब के लिये था। जॉन साब द्वारा पिरोये गये अल्फाज़ गहरे मायने बिखेर देते हैं अगर उन्हे खुद जॉन साब की आवाज में ही सुना जाये और अगर उन्हे कलाम कहते देख लिया जाये तो साफ साफ पता चलता है कि वे मंच की दुनिया के बादशाह थे।

कतात

—————

मेरी अक्लो होश की सब हालते
तुमने साँचे में जुनु के ढाल दी

कर लिया था मैंने एहदे तर्के-इश्क
तुमने फिर बाहें गले में ड़ाल दी

—————————–

किसी लिबास की खुशबू जब उड़ के आती है
तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है

तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी खुशबू को
तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है

तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं
मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

————

कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग होंगे जो उसको भाते होंगे

उसकी याद की बादेसबा और तो क्या होता होगा
यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे

यारो कुछ तो जिक्र करो तुम उसकी क़यामत बाहों का
वो जो सिमटते होंगे उनमे वो तो मर जाते होंगे

————————–

गज़ल
………….

हालतेहाल के सबब हालतेहाल ही गयी
शोक में कुछ नहीं गया शोक की जिंदगी गयी

एक ही हादसा तो है और वो यह की आज तक
बात नहीं कही गयी बात नहीं सुनी गयी

बाद भी तेरे जानेजा दिल में रहा जब समां
याद रही तेरी यहाँ फिर तेरी याद भी गयी

उसकी उम्मिदेनाज़ का हमसे यह मान था के आप
उम्र गुजार दीजिए उम्र गुजार दी गयी

उसके विसाल के लिए अपने कमाल के लिए
हालतेदिल थी खराब और खराब की गयी

तेरा फिराक जानेजा ऐश था क्या मेरे लिए
तेरे फ़िराक में खूब शराब पी गयी

उसकी गली से उठ के में आन पड़ा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गयी

…………………………………………………………

नज्म

………….

मुझ से पहले के दिन
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे

ख्वाब ओ ताबीर के गुमशुदा सिलसिले
बारह अब सताने लगे हैं तुम्हे

दुःख जो पुहंचे थे तुमसे किसी को कभी
देर तक अब जगाने लगे हैं तुम्हे

अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे
अपने वो अहद ओ पेमा मुझे से जो न थे

क्या तुम्हे मुझसे कुछ भी कहना नहीं

 

प्रस्तुती – (रफत आलम)

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दिसम्बर 21, 2010

जॉन एलिया : तन्हा शायर, बेशकीमती अश’आर

सालहा साल और एक लम्हा
कोई भी तो ना इनमे बल आया

खुद ही एक दर पर मैंने दस्तक दी
खुद ही लड़का सा मैं निकल आया

उर्दू शायरी के गुलशन में हज़ारों फूलों ने अहसास की अमिट खुशबू बिखेरी है जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलोदिमाग को आल्हादित करती रही है। वर्तमान लबो-लहजे में अशआर की यह खु्शबु इस कदर समायी हुई है कि शायद ही कोई दिन जाता हो जब हम बोलचाल में कोई न कोई उर्दू शेर का सहारा, अपनी बात को पुख्ता करने में नहीं लेते हों।

इसी गुलशन के एक महकते फूल का नाम जॉन एलिया है। वर्तमान दोर के इस मकबूल शायर का जन्म 14 दिसम्बर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में रहने वाले एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। जॉन साब के पिता का नाम अल्लामा शफीक हसन एलिया था, जो जाने माने विद्वान, शायर और भविष्यद्रष्टा थे। अल्लामा की सबसे छोटी औलाद जॉन एलिया साब के अतिरिक्त इनके बड़े भाई रईस अमरोही जाने माने शायर, पत्रकार और डॉक्टर थे तथा मानव मूल्यों के बड़े हिमायती थे। बाद में रईस साब की पाकिस्तान में किसी सरफिरे धार्मिक कट्टरपंथी द्वारा हत्या कर दी गयी। जॉन साब के दूसरे भाई सय्यद मोहम्मद तकी विश्व प्रसिद्ध अहमदिया चिन्तक रहे हैं। जॉन एलिया साब की पूर्व पत्नी जाहिदा हिना इंडो- पाक की सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामायिक एवं सामाजिक घटनाओं पर आज भी सक्रीय लेखन कर रही हैं। इनके लेख, विशेष रूप से – पाकिस्तान की डायरी, भारत में भी सुधि पाठक चाव से पढते हैं। जॉन एलिया साब की हिना जी से मुलाकात उर्दू साहित्यिक पत्रिका ’इंशा’ निकालने  के दोरान हुई थी, जो बाद में विवाह में तब्दील हो गई। इस विवाह से जॉन साब को दो पुत्रियां और एक पुत्ररत्न प्राप्त हुए, परन्तु बाद में अप्रिय परिस्थतियों के चलते दोनों के बीच 1984 में विवाह विच्छेदन हो गया। तलाक के बाद तबियत से ही सारे जहाँ से खफा जॉन एलिया अवसाद में रहने लगे। उर्दू शायरी का यह देवदास अत्याधिक सुरापान करने और खुद को बर्बाद करने के नए-नए बहाने तलाशने लगा।

जॉन साब ने पैदाइशी रूप में संवेदनशील होने के अतिरिक्त, घर में सुसंस्कृत और सभ्य माहोल होने के कारण आठ साल की उम्र में ही पहला शेर कह लिया था। किशोर अवस्था आते आते जैसा कि अक्सर होता बाली उम्र में होता है वे एक ख्याली प्रेमिका सोफिया के सपने देखने लगे और उसी में जीने लगे। इसी दौर में देश के शासक अंग्रेजों से उनकी नफरत भी उभरने लगी और साम्यवादी विचारधारा उन्हें खासी प्रभावित करने लगी थी। उनके नजदीकी रिश्तेदार सईद मुमताज़ के अनुसार जॉन एलिया की भाषाओँ में खासी रूचि थी। बचपन में मदरसे से जहाँ उन्होंने अरबी फारसी का ज्ञान प्राप्त किया, आगे अध्यन के दौरान अंग्रेजी वे धारा प्रवाह बोलने लगे और हिब्रू और संस्कृत भी चलती फिरी सीख ली।

1947 में देश के टुकड़े होने पर जॉन का दिल भी खासा टूटा। वे साम्यवादी विचारधारा के पोषक होने के कारण धर्म के आधार पर बंटवारे के घोर विरोधी थे और हर हाल भारत में ही रहना चाहते थे। अंत में अधिकांश परिवार के पाकिस्तान चले जाने के फलस्वरूप १९५६ में कराची में जाकर बस गए। अपने आखरी समय आने तक वे अपने जन्म के शहर अमरोहा को बहुत प्यार से याद करते रहे। अपनी अर्थपूर्ण शायरी और मुशायरों में दिलफरेब अंदाज़ से प्रस्तुति के कारण जॉन एलिया पाकिस्तान में भी काफी लोकप्रिय और ख्यात नाम हो गए।

विधा के गंभीर जानकारों के अनुसार परम्परागत उर्दू शायरी की ज़मीन पर रहते हुए जॉन एलिया को सदा जीवन में आदर्श की तलाश रहती थी। वास्तविक जीवन में आदर्श कहाँ? लोगों की मक्कारी और बनावट पर उन्हें गुस्सा आता था जिसके चलते उन्होंने अपने ही अंदाज़ से नए मूल्य शायरी में स्थापित किए हैं। उनकी शायरी क्लासिक आशिक-माशूक की शायरी न होकर धरती पर रहते औरत-आदमी के प्रेम/नफरत  की खुरदरी ज़मीन पर लिखी गयी शायरी है। जॉन एलिया का विरह भी आज के आदमी का है जो बादलों को संदेशवाहक बनाने के बदले माशूक से सीधा मुखातिब होता है। उनका कलाम समाज द्वारा स्थापित मूल्यों के विरुद्ध गुस्से और अपनी जिद के आगे न झुकने की शायरी है। अंतत उनकी यही हट्धर्मी उनके टूटने का कारण भी बनी लगती है। तल्ख़ हालात और अपनी तबियत की संवेदना के कारण जॉन एलिया  साब खुले अराजकतावादी – शून्यवादी हो गए थे, जिनकी सदा अपने परिवेश से लड़ाई रहने लगी थी। अपने अच्छे समय में शायरी के अतिरिक्त उनके द्वारा इस्माइलिया सेक्ट पर बहुत शोधपूर्ण कार्य के साथ अन्य साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद भी किया गया है।

जॉन एलिया साब खूब लिखते थे पर अपनी फक्कड तबियत, अलमस्तजीवन शैली और हालत से समझौता न करने की आदत के कारण इनकी पहली पुस्तक ’शायद’ मंज़र-ए-आम तक 1991 में ही आ सकी। इसके प्रकाशन में खुद जॉन एलिया साब ने खूब ढ़िलाई की और रचनाओं के चयन में ही दस से अधिक और संकलन की एडिटिंग में ही पांच वर्ष लगा दिए। खुद जॉन एलिया साब का अपने कलाम के बारे में क्या नजरिया था, देखिये -..

अपनी शायरी का जितना मुन्किर मैं हूँ, उतना मुन्किर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी ना होगा। कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी ……. बुरी, बेतुकी …… लगती है… इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मूआ शाये नहीं हुआ.. और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं…।

नजदीकी मित्रों की काफी समझाइश से ही जॉन साब ने पुस्तक का मसौदा फाइनल किया। यह दिलजला शायर तब तक तिल-तिल मरता हुआ ज़िदा लाश बन चुका था। इस अनूठे शायर, विद्वान और मनीषी को तल्ख़ हालत ने पहले ही घायल किया हुआ था उस पर हद दर्जे के  मदिरापान ने कोढ़ पर खाज का काम कर उन्हे अर्धविशिप्त सा बना दिया था। मुशायरों और काव्यगोष्ठियों में जाना लगभग बंद करके यह शायर अपने आप में ही सिमट कर रह गया था। अगर किसी महफ़िल में पहुंचे भी तो नशे में चूर बेहाल खुद ही अपने मेंटल होने का ऐलान करते हुए। उनकी पुस्तक ’शायद’ को लोगों ने हाथों हाथ लिया, पढ़ा और सराहा। किताब के नौ संस्करण जल्द ही निकल गए। इससे जॉन एलिया साब की लोकप्रयता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पर जॉन एलिया से तो किस्मत नाराज़ सदा से थी, शायद इसी लिए इस मुमताज़ शायर, विद्वान और अत्याधिक संवेदनशील इंसान ने 8 नवम्बर 2002 को अपने सभी प्यारों से दूर एक दोस्त के घर लंबी बीमारी के बाद, इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया।

जॉन साब की कविताओं का अगला संकलन ’यानि’ उनके मरणोपरांत सन 2003 में प्रकाशित हुआ। तदुपरांत उनके नजदीकी मित्र खालिद अंसारी द्वारा उनकी कविताएँ गुमान (2004), लेकिन (2006) और गोया (2008) नाम से पुस्तकों के रूप प्रकाशित की गईं और इन किताबों ने साहित्यिक हलकों में खासी लोकप्रिय पायी। जॉन एलिया साब ने शायरी विधा के लगभग सभी घटक ग़ज़ल, नज़्म, और कते आदि बहुत खूब लिखे हैं। जॉन एलिया  जीवन की बिसात पर तो नाकामयाब इंसान थे ही साहित्यिक दुनिया में भी गुटबंदी और अलमस्त तबियत के चलते उन्हें वो मुकाम हासिल नहीं जिसके वे हकदार थे। जॉन साब के विशाल खजाने से कुछ रचनायें सुधि पाठकों के समक्ष पेश करने की एक अदना सी कोशिश की जा रही है।

गज़ल
………….

गाहे गाहे बस अब यही हो क्या
तुमसे मिल कर बहुत खुशी हो क्या

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ
मुझको यक्सर भुला चुकी हो क्या

याद हैं अब भी अपने ख्वाब तुम्हे
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या

बस मुझे यूँही एक ख्याल आया
सोचती हो तो सोचती हो क्या

अब मेरी कोई जिंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी जिंदगी हो क्या

क्या कहा इश्क जाविदानी है
आखरी बार मिल रही हो क्या

हाँ फज़ा यहां की सोई सोई सी है
तो  बहुत तेज रौशनी हो क्या

मेरे सब तंज बेअसर ही रहे
तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या

दिल में अब सोजे इंतज़ार नहीं
शमे उम्मीद बुझ गयी हो क्या

…………………………………………………………………………………..

नज्म
……………….

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तनहाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं

मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं

इन किताबों ने बडा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन-में एक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़हन

मुज़दा-ए-इशरत अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

[ रम्ज़=जादू ,रहस्य ,मुज़्दा =अच्छी खबर ,इशरत= खुश जिंदगी ]

…………………………………………………………………………………………………..

कता
……….

शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेती

आप, वो, जी, मगर यह सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेती

………………………………………………………………………

 

जॉन एलिया साब के बारे में और पढ़ने के लिये उनके ऊपर बने विकीपीडिया पेज पर दिये लिंक्स सहायक होंगे।

प्रस्तुती – (रफत आलम)

दिसम्बर 19, 2010

कैप्टन विक्रमादित्य की शादी और हिम्मत सिंह के कारनामे

साधारण जवान से लेकर सीओ साहब तक पूरी कमान में कैप्टन विक्रमादित्य और उनके सहायक हिम्मत सिंह की जोड़ी वीएचएस के नाम से मशहूर है और उनके किस्से अक्सर क्लब को सेना के जांबाजों के ठहाकों से गुंजा दिया करते हैं। विक्रमादित्य को उनके साथी और अफसर विक्रम के नाम से सम्बोधित करते हैं और हिम्मत सिंह को ऊपर से नीचे तक सभी एच एस के नाम से सम्बोधित करते हैं। खुद विक्रम भी हिम्मत सिंह को एच एस ही कहते हैं। जब से विक्रम कमीशन लेकर सेना में भर्ती हुये एच एस उन्ही के साथ हैं।

वीएचएस की जोड़ी कमाल की है और उन्हे देखकर ऐसा ही लगता है कि अगर सेना ने उन्हे न भी मिलाया होता तब भी कायनात किसी तरह उनका मिलन करा ही देती। शुरु से ही ऐसा रहा कि सुबह सवेरे उठते ही विक्रम एच एस का मुँह देखते थे जो उनकी वर्दी आदि को तैयार करके चाय बनाकर उन्हे उठा देते थे।

बैचलर जीवन में विक्रम पूरी तरह से एचएस पर ही निर्भर थे। उन दोनों की जोड़ी के तमाम किस्से प्रसिद्ध हैं, इस वक्त्त विक्रम की शादी के बाद की घटनायें याद आती हैं।

विक्रम नये नये कैप्टन बने थे और घरवालों ने उनकी शादी करा दी। शादी के दो-तीन दिन बाद ही विक्रम को वापिस आना था। वे अपनी पत्नी, चित्रांगदा, को लेकर छावनी स्थित अपने घर पहुँचे तो रात हो चुकी थी। एच एस ने उनका स्वागत किया। विक्रम ने एच एस को हिदायत दी कि रोज की तरह वह सुबह छ्ह बजे उनके बैडरूम में न पँहुच जाये और न ही दरवाजा खटखटाकर उन्हे उठाये। पर सुबह नौ बजे उनकी मीटिंग है सो उनकी वर्दी आदि सभी तैयार करके रखे।

अगले दिन सुबह अस्तव्यस्त सो रहे विक्रम और चित्रा को कमरे में कुछ आवाज सुनायी दी। विक्रम को रोज की आदत थी सो वे सोते रहे पर चित्रा ने मुँह उठाकर देखा तो उनकी लगभग चीख निकलते निकलते रह गयी। उन्होने विक्रम को हिलाकर उठाया तो वे ऊँघते हुये अंगड़ाई लेते हुये उठकर बैठे। चित्रा ने इशारा किया तो उन्होने पाया कि एच एस उनके बिस्तर की तरफ पीठ करे हुये, जूतों की रैक के पास बैठे जूतों पर पालिश कर रहे थे। वर्दी उन्होने सम्भालकर कुर्सी पर रखी हुयी थी। गनीमत थी कि विक्रम और चित्रा मच्छरदानी के अंदर सो रहे थे।

गाऊन पहनकर विक्रम मच्छरदानी से बाहर निकले। उन्होने देखा कि कमरे का दरवाजा तो अंदर से बंद है।

उन्होने एच एस से पूछा,” एच एस क्या कर रहे हो?”

एच एस ने उठकर उन्हे सेल्यूट मारा और कहा,” साब, वर्दी तैयार कर दी है, जूते चमका रहा हूँ”।

रात को तुमसे मना किया था न कि अंदर मत आना और दरवाजा तो बंद है अंदर कैसे आये?

साब, सुबह जब आया तो याद आया कि वर्दी और जूते तो आपके कमरे में ही रखे हैं, दरवाजा खटखटाने को आपने मना किया था सो दरवाजा खुलवा नहीं सकता था, फिर बाद में मैं खिड़की से अंदर आ गया।

विक्रम की समझ में नहीं आया कि वे एच एस को क्या कहें?

बहरहाल विक्रम तैयार होकर ऑफिस जाते हुये चित्रा से कह गये कि वे लंच के समय घर नहीं आ पायेंगे और एच एस लंच लेने आ जायेंगे, उनके हाथ लंच भिजवा दें।

लंच के समय एच एस घर पंहुच गये, चित्रा ने भोजन तैयार किया हुआ था। उन्होने टिफिन तैयार करके मेज पर रख दिया और एच एस से कहा कि मिनरल वॉटर की बॉटल साथ ले ले।

कुछ देर बाद उन्होने देखा कि एच एस मिनरल वॉटर की बॉटल को सिंक में खाली करके उसमें नल से पानी भर रहे हैं। उन्होने पूछा कि ये आप क्या कर रहे हैं?

मैडम, देखिये कितना पुराना पानी है, छह महीने पहले भरा गया था। मैंने ताजा पानी भर दिया है। साहब तो हमेशा ऐसा ही पुराना पानी बाजार से ले आते हैं, मैं ही तारीख देखकर उसमें ताजा पानी भर देता हूँ। साहब बिल्कुल ख्याल नहीं रखते इन बातों का, आप ध्यान रखना।

उस समय तो चित्रा को लगा कि या तो वे अपने बाल नोंच लें या एच एस का मुँह नोंच दें, पर किसी तरह उन्होने गुस्से को शांत किया।

बाद में तो उन्हे शादी के बाद छावनी में बिताये पहले ही दिन के दोनों किस्से हँसी ही दिलाते रहे हैं। शाम को विक्रम आये तो उनके सामने भी पहली ही बार रहस्योदघाटन हुआ कि मिनरल वॉटर के नाम पर वे नल का सादा पानी ही पीते आ रहे हैं।

एच एस का वे क्या करते? एच एस उनके जीवन का आवश्यक अंग बन चुके थे। फौजी तरीके से सोचने के अलावा एच एस एकदम खरे इंसान हैं।

बाद में तो चित्रा की भी एच एस से खूब छनने लगी।

दिसम्बर 18, 2010

ना होने तक…(कविता – रफत आलम)

वक्त की डोर में
गुच्छा है जिंदगी
एक सिरा मिले अगर
दूसरे का पता नहीं

कश्मकश दर कश्मकश
टूटन ही टूटन
जोड़ने की कोशिश में
लगती अनगिनत गांठें

हासिल क्या
छोटा – बडा होता
बस उलझन का दायरा
वक्त भी आखिर
जाने झुंझलाकर
फ़ेंक देता है जाने कहाँ
जिंदगी का अनसुलझा गुच्छा!

(रफत आलम)

दिसम्बर 14, 2010

मसीहा कोई नहीं …(गज़ल – रफत आलम)

कहने को बहुत कुछ है सुनने वाला कोई नही
खामोश रहने के सिवा और रास्ता कोई नहीं।

ये नहीं के कोई गिला ही नहीं है मेरे दिल में
चुप हूँ के शिकायतों से अब हिलता कोई नहीं

कैसे कैसे लोग हैं जिनसे प्यारे प्यारे रिश्ते हैं
दिल की राह पर आकर पर मिलता कोई नहीं

अब कहाँ जाऊँ रौशनी का पता पूछने के लिए
बुझे चुके  चरागों का शायद मसीहा कोई नहीं

स्वांग की इस बस्ती का बडा बहरूपिया हूँ मैं
मुखौटे ही मुखौटे हैं हम यहाँ चेहरा कोई नहीं

मुस्कानों का बंटवारा करके तू भी खुश मैं भी
कितने लगे हैं ज़ख्म सीने में खोलता कोई नहीं

मुस्कानों में बतियाने वाले हैं सब यहाँ ’आलम
सूनी आँखों की भाषा अब समझता कोई नहीं

(रफत आलम)

दिसम्बर 13, 2010

तुम्हारे बाद स्मिता…(स्मिता पाटिल को श्रद्धांजलि – कृष्ण बिहारी)

13 दिसम्बर 1986 को स्मिता पाटिल की याद में लिखी गयी कविता

स्मिता !
कैसी मजबूरी है
कि आज जब मैं यह लिख रहा हूँ
तुम सो गयी हो।
तुम्हारा शरीर सो चुका है
तुम सिर्फ शरीर रह गई हो…
दुनिया में इस वक्त्त जिसे लोग
लाश कहते होंगे।
तुम्हारे आस-पास जमघट होगा
जिससे तुम्हे नफरत थी।
फिर भी बिना प्रतिवाद के बगैर किसी खीज के
आज तुम जमघट के
चारों तरफ मुस्कुराती हुई पूछ रही होगी
कि मुझसे कोई शिकायत तो नहीं रही…
कोई भी…कभी भी…या फिर अब…?

काश !
मेरे स्वर, मेरे शब्द ताकतवर होते और
मेरा शोर तुम्हे जगा पाता
नींद से !
तुम्हारी मौत एक हादसा है मेरे लिये
अखबार में छपी
इस ख़बर पर आँखें फाड़े, दिल थामे
यकीन करना होगा…जबरन !
क्योंकि हादसे
सच्चाई के सिवा और कुछ नहीं होते
और सच पर जल्दी यकीन नहीं होता।

हर किसी की आँख के
खुलने और बंद होने का
दुनिया की गतिविधि पर
कुदरत की धड़कन पर
कोई फर्क नहीं पड़ता
लेकिन कुछ पलकों पर नींद का छा जाना
पल भर के लिये ही सही
दुनिया को वजनी बना जाता है
धरती की गति हो जाती है मद्धम।
शायद… इसीलिये कभी-कभी दिन हो जाते हैं बड़े !
लोग कहते हैं कि यह वक्त्त भारी होता है
ऐसे दिन आसानी से नहीं कटते।
तुम्हारी मौत की ख़बर ने
सुबह से मेरा दिन बढ़ा दिया है।

लगता है … जल्दी मुरझाने वाले खुश्बूदार फूलों की तरह
तुममें भी धैर्य नहीं था
या फिर … एक-एक सीढ़ी चढ़कर
ऊपर पहुँचने में ही
सारा धीरज चुक गया।
तुम जिस जगह पहुँची थी…
वहाँ से हर ऊँचाई साफ नज़र आती थी।
कुछ देर ठहरना था उस ऊँचाई पर
दुनिया की हकीकत
ऐसी जगहों से ही पकड़ में आती है
जहाँ से दृष्टि निर्बाध
हर तरफ जाती है।

स्मिता !
इस बढ़े दिन को मैं
तुम्हारे नाम करता हूँ…
सिर्फ तुम्हारे नाम
और सोचना चाहता हूँ सिर्फ तुम्हारे बारे में।

पलों के साथ ने
किस कदर तुम्हारे करीब कर दिया है मुझे
यह पास आना भी कितना कष्टदायक है
सारा जीवन निरर्थकता को जीते हुये लोग
पास आने की कोशिश में कितना दूर हो जाते हैं!
और-
कभी -कभी कुछ पल…कुछ घड़ियाँ
दूरस्थ लोगों को कितना करीब कर जाती हैं।

याद है वह शाम…वह रात…
वह बादलों से ढ़की दोपहर
और भीगता मौसम…बातें…बातें…और बातें
मित्र और मैं…और तुम…और तुम्हारा मित्र राज बब्बर
सब कुछ याद है मुझे
क्योंकि अब इस याद को ही तो मेरे साथ रहना है…
जिस्म का क्या है
उसे तो धुआं – धुआं होना है
चटक – चटक जलना है।

{कृष्ण बिहारी}


दिसम्बर 11, 2010

जिंदगी का मेला … गज़ल (रफत आलम)

 

शहर में भीड़ का रेला चल रहा है,
पर हर आदमी अकेला चल रहा है|

किस रिश्ते को अपना कहा जाये,
भाइयों में भी झमेला चल रहा है|

देखिए लम्हे हलाहल बनते हैं कब,
वक्त मेरा भी कसेला चल रहा है|

दौर ऐ तरक्की क्या यही है यारो,
आदमी बना हाथठेला चल रहा है|

मौत के सकूत की तरफ ऐ “ आलम
ये जिंदगानी का मेला चल रहा है।

(रफत आलम)

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