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जून 6, 2011

बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमों ने भारत को हलचल से भर दिया है। कहीं कोलाहल है तो कहीं चुपचाप देखा जा रहा है कि आगे क्या होगा। कल, विजय, अशोक, हरि और सुनील, चार बुजुर्ग मित्रों की रोज़ाना होने वाली बैठक एक बहस-गोष्ठी में बदल गयी। बहुत समय बाद चारों के दिमाग और ज़ुबान दोनों ही राजनीतिक तेवरों से ओत-प्रोत हो रहे थे।

आम तौर पर चारों सुबह दस बजे किसी भी एक के घर मिल बैठ दुनिया जहान की बातें किया करते हैं। दोस्ताना माहौल में वक्त्त अच्छा बीत जाता है। सुख-दुख की बातें हो जाती हैं।

मजमा विजय के घर पर लगा। चारों के हाथों में अलग-अलग अखबार थे।

विजय बाबू ने गहरी साँस भ्रने के बाद गम्भीर स्वर में कहा,” घटनाक्रमों ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सारे मामले के बहुत सारे पहलू उजागर हुये हैं”।

हरि – विजय जी, एक बात तो तय है कि अनशन को तोड़ने के लिये आधी रात को पुलिस बल से जैसी हिंसक कारवाही करवायी गयी है उस निर्णय ने जैसी किरकिरी कांग्रेस पार्टी और सरकार की की है, उसका कलंक आसानी से हटने वाला है नहीं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत का इससे अच्छा उदाहरण हो नहीं सकता।

सुनील – ये तो सही कहा आपने हरि भाई। पर विजय बाबू आप कुछ सवाल और पहलुओं की बात कर रहे थे। कुछ बताओ।

अशोक – हाँ पहले आप ही बताओ आपको क्या दिखता है इस मामले में?

विजय – पहली बात तो यही है कि बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के अनशन के समय से ही सार्वजनिक रुप से मीडिया को दिये साक्षात्कारों में बार-बार कह रहे थे कि वे जून के पहले हफ्ते से अपने एक लाख समर्थकों के साथ भ्रष्टाचार और काले धन की विदेश से वापसी जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिये सरकार पर उचित कार्यवाही करने के लिये दबाव बनाने के लिये अनशन पर बैठेंगे। सरकार कहती है कि अनुमति सिर्फ योग-शिविर लगाने के लिये ली गयी थी। अगर ऐसा था तो दिल्ली में जब रामलीला मैदान में शिविर लगाये जा रहे थे तभी सरकार ने उचित कदम क्यों नहीं उठाये? बाबा रामदेव के दिल्ली पहुँचने के बाद भी उनसे स्पष्ट क्यों नहीं कहा कि शिविर की अनुमति के साथ वे शांतिपूर्ण ढ़ंग से भी वहाँ अनशन पर नहीं बैठ सकते।

हरि – सही कह रहे हो विजय बाबू, जब बाबा रामदेव और सरकार दोनों को पता था कि अनुमति सिर्फ योग शिविर लगाने की ली गयी है और सरकार अनशन के दूसरे या तीसरे दिन कानूनी कार्यवाही कर सकती है तो क्यों हजारों लोगों की जान को जोखिम में डाला गया? अनशन से पहले दिन टीवी पर ऐसी बातें भी उठ रही थीं कि रामलीला मैदान में योग शिविर ही रहेगा और अनशन जंतर-मंतर पर किया जायेगा। सरकार के चार बड़ी मंत्रियों ने हवाई-अड्डे पर ही बाबा रामदेव को पकड़ कर क्या इस बात की संभावना उनके दिमाग से हटा दी कि जंतर-मंतर पर अलग से अनशन करने की जरुरत नहीं है और सरकार से बातचीत से उचित हल निकल आयेगा, और बाबा रामदेव जंतर मंतर को भूलकर रामलीला मैदान में ही अनशन की लीला दिखाने लगे और उन्हे लगता था कि सब कुछ ठीक पटरी पर चल रहा है और सब ऐसे ही निबट जायेगा? हमें तो घपला लगता है मामले में।

सुनील – जब अनशन की पहली ही शाम आते आते सरकार और बाबा रामदेव में वार्ता टूट गयी तो क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता था कि अनशन स्थल पर बैठे हजारों लोगों की जान की सलामती की फिक्र करती? सरकार का बाबा रामदेव से कुछ भी रिश्ता हो, कोई भी सरकार हजारों लोगों की भीड़ की जान के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है? बहुत शोर मचाकर कहा जा रहा है कि सांसद संवैधानिक रुप से जनता द्वारा चुने गये हैं तो ऐसे समय में संविधान की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाते हुये इन्ही सांसदों से बनी सरकार ने हजारों लोगों की जान जोखिम में डालते हुये पुलिस को आधी रात को लोगों को वहाँ से हटाने के लिये भेजा? कैसे पुलिस को आदेश देने वाले मंत्रियों ने नहीं सोचा कि अगर पुलिस की लाठियों से लोग बच भी गये तो भगदड़ में महिलायें, बच्चे और वृद्ध अपनी जान बचा पायेंगे या घायल होने से बच पायेंगे? सरकार अनशन पर बैठे लोगों को दिन में नोटिस देकर कुछ घंटे का समय नहीं दे सकती थी जिससे लोगों को पता चल जाये कि सरकार की मंशा अब रामलीला मैदान से लोगों को हटाने की है। अगर अनशन अवैध था तो कोर्ट से नोटिस लाया जा सकता था। पर किसी तरह से भी संविधान का सम्मान न करते हुये लोगों को सबक सिखाने के लिये पुलिसिया कार्यवाही की गयी।

अशोक – अरे सरकार की बदमाशी है। यह सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास दिखावा है। इन्होने ही तो इमेरजैंसी लगवायी थी, तभी भाजपा राजघाट पर अनशन में बैठ गयी है इनकी करतूतों के विरोध में।

विजय – अशोक बाबू भाजपा भी दूध की धुली नहीं है। राजघाट में कब से उसकी श्रद्धा हो गयी? कल्याण सरकार के दिन भूल गये क्या? कैसे गांधी को पानी पी पी कोसा जाता था। गाँधी से इनका क्या लेना देना। बल्कि किसी भी दल का कुछ लेना देना नहीं है गाँधी से। उन्हे तो अलग ही रखें।

सुनील – कांग्रेस नियंत्रित सप्रंग सरकार की दूसरी पारी के आरम्भ से ही भाजपा निष्क्रिय स्थिति में पड़ी हुयी थी। उसे राजनीतिक जमीन नहीं मिल रही थी। पांच साल का इंतजार उसे और निष्क्रिय बना देता। कांग्रेस की सरकार ने भाजपा में जान डाल दी। उसे मुकाबले में खड़ा कर दिया। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को संघ की ओर धकेल दिया। सबको लगता था कि कांग्रेस नियंत्रित सरकार की दूसरी पारी आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और कहीं कई अड़चन नहीं आयेगी। ताजे घटनाक्रमों ने दिखा दिया है कि सरकार की आगे की राह मुश्किल हैं। सरदार जी ने माथे पर कलंक लगवा ही लिया। इतिहास तो उन्हे ऐसे प्रधानमंत्री के रुप में याद करेगा जिसकी सरकार ने रात में सोते हुये स्त्री-बच्चों, बूढ़ों और अनशनकारियों पर लाठियाँ बरसवायीं। उन्हे घायल किया और उनकी जान को जोखिम में डाला।

हरि- कांग्रेस की सरकार ने तो भाजपा को थाली में सजाकर मौका दे दिया है। इससे ज्यादा खुश भाजपा और अन्य विपक्षी दल कभी भी नहीं हुये होंगे, पिछले पांच-सात साल में।

अशोक- अजी भाजपा निष्क्रिय नहीं थी। उसी ने मुद्दा उठाया था काले धन की वापसी का, भ्रष्टाचार के खात्मे का।

विजय- अशोक जी भाजपा की ईमानदारी तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के मामलों में चमक ही रही है। गुजरात के मामले में उसकी नैतिकता भी जगजाहिर रही है!

सुनील – भाजपा की बात छोड़ो। मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार बार उठ रहा है – क्या शुरु में बाबा रामदेव से मीठी मीठी बातें करने के कुछ घंटो बाद सरकार को वस्तुस्थिति का एहसास हुआ कि अगर बाबा रामदेव के अनशन के कारण उनकी माँगें मानी गयीं तो यह बाबा रामदेव की जीत कहलायेगी और सरकार द्वारा उठाये गये कदम मजबूरी में उठाये गये कदम कहलायेंगे और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ नहीं मिल पायेगा।

हरि – सरकार के किन्ही भी सलाहकारों ने ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही करने की सलाह दी हो और उस पर दबाव डाला हो, क्या कांग्रेस को इस घटना के बाद किसी किस्म का राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? इसमें पूरा संदेह है।

विजय- कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस मायावाती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल में उ.प्र पुलिस द्वारा किसानों पर अत्याचार कराने को लेकर संघर्षरत थी। अब उसकी खुद की सरकार ने वैसा ही कर दिया है। कांग्रेस के पास अब नैतिक चेहरा है ही नहीं किसी अन्य सरकार द्बारा पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही कराये जाने की निंदा करने का। भारत की जनता हमेशा से ही शोषित के पक्ष में रही है और अब पुराना समय नहीं रहा जब किसी तरह की कोई भी खबर दबायी जा सकती थी। इस इलेक्ट्रानिक युग में कांग्रेस ने ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है और इसका राजनीतिक खामियाजा या तो अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देगा या फिर उसकी सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि वह बड़ी संख्या में दूसरे दलों पर निर्भर हो जाये।

सुनील- देश अगली बार फिर से कई दलों की मिली जुली सरकार के चंगुल में फंसता दिखायी दे रहा है। कांग्रेस का उ.प्र अभियान भी गड्ढ़े में पड़ा समझिये। दुख की बात है कि दो दशकों से ज्यादा समय से उ.प्र क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों द्वारा संचालित हो रहा है। विकास कार्य लगभग ठप रहे हैं। वैसे भी पाँच नहीं तो दस साल में सरकारें बदल जानी चाहियें। तभी संतुलन ठीक बना रहता है।

अशोक – कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव के अनशन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है। अगर ऐसा है भी तो जब हवाईअड्डे पर सरकार के बड़े मंत्री उनकी अगुवाई करने गये थे तब भी उन्हे इस बात का पता होगा। अगर पता था और उन्हे इस बात से परहेज था तो उन्होने अनशन को शुरु ही क्यों होने दिया?

सुनील- अशोक जी आपकी इस बात से सहमति है। अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो इस संगठन को कानून का सहारा लेकर प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो कांग्रेस और इसके द्वारा नियंत्रित सरकार आर.एस.एस द्वारा समर्थित और नियंत्रित भाजपा के सांसदों से परहेज क्यों नहीं करती? उन्हे संसद से बाहर का रास्ता दिखा दे। उन्हे किसी भी कमेटी में न रखे। आखिरकार भाजपा को तो आर.एस.एस का पूरा समर्थन है। ऐसा कैसी हो सकता है कि भाजपा के सांसद तो स्वीकार्य हैं पर जो सांसद नहीं हैं और जिन पर शक है कि आर.एस.एस उन्हे समर्थन देता है, वे स्वीकार्य नहीं हैं।

विजय- सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे, जो भारत को खाये जा रहे हैं, को लेकर जनता को ठोस हल चाहिये और उसे इस बात से क्या मतलब कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये जा रहे प्रयास को आर.एस.एस समर्थन दे रहा है या कोई अन्य संगठन।

हरि- अरे अगर ऐसा है तो आर.एस.एस को देशद्रोही साबित करके प्रतिबंधित कर दो, कानूनी राह पर चला दो और अगर ऐसा साबित हो जाता है तो जनता चूँ भी नहीं करेगी।

विजय- मेरी समझ में तो ऐसा पैरानोइया आता नहीं। आप ये जानो कि जब भाजपा राजनीतिक दौर के शिखर पर थी तब भी उसे केवल 26% मतों का समर्थन हासिल था और जो अब घटकर 20% के आसपास आ गया है। देश की कुल आबादी का 75-80% हिन्दुओं को माना जा सकता है तो ऐसा तो है नहीं कि सभी हिन्दु भाजपा को समर्थन देते हैं और मत देते हैं। फिर क्यों इतनी हायतौबा, क्यों इतना भय? यह देश मुख्यतः सेकुलर रहा है और रहेगा।

…जारी…

बतकही 2 -बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस

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अप्रैल 14, 2011

जनता से ठगी की विरासत

तुम सदा से
रहे हो मेरे खून के प्यासे
बैल के स्थान पर
मुझे जुता हुआ देख कर
आँखे चमक उठती थी तुम्हारी
सूद में ही ले जाते थे
पसीने से सिंची फसलें।

फाके थे मेरी भूखी मेहनत का हासिल
आज भी
उन्ही विदेशी लुटेरों के साथ
कितनी ही ईस्ट इण्डिया कम्पनियों के
यानी मल्टीनेशनलों के
पैरोकार हो तुम!

मेरे खेत कल की बात हुए
शहर-कारखानों ने निगल लिए
फिर किस्तों में सूद का बाजार है गर्म
फ्लैट, कार, जींस, मोबाइल और व्हिस्की के जाल में
छटपटाने को मजबूर हूँ मैं।

राजा, मंत्री और कारिन्दे
बेखौफ भ्रष्टाचार की फसल काट रहे हैं
वही बेईमान अँधेरा है जो के था
यहाँ कोई मसीहा रौशनी भी लाए तो क्या हासिल?

सूली उठाये साथ चलने वाले
सयाने गीदड़ हैं शेर की खाल में
संवेदनाओं की नीव पर
सत्ता का महल खड़ा करने वाले।

मुझे ठोकरों के सिवा
न कुछ मिला है न मिलेगा
गरीब का लहू-पसीना सदा से
मुफलिसी की विरासत है और रहेगा।

(रफत आलम)

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