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सितम्बर 5, 2016

शिक्षक हो तो ऐसा!

Teacher@UPयह घटना उत्तर प्रदेश के रामपुर के शाहबाद स्थित रामपुरा गांव के एक प्राइमरी स्कूल मास्टर ने अपने छात्रों में शिक्षा की ऐसी अलख जगाई कि मिसाल कायम कर दी और मौजूदा दौर में एक अनूठी कहानी रच दी| एक ऐसे वक्त में जब प्राथमिक शिक्षा का स्तर न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में बुरी स्थिति में हैं और शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बावजूद लाखों करोड़ों बच्चे प्राथमिक स्तर की स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते हैं और जहां प्राथमिक शिक्षा में सुविधाओं का बेहद अकाल है, यह घटना बहुत ज्यादा महत्व की बन जाती है| प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर भारतीय को इस घटना के बारे में जानना चाहिए और सम्बंधित संस्थाओं एवं सरकारों को ऐसे आदर्श शिक्षक को पुरस्कृत करना चाहिए जिसने शिक्षा का ज्ञान से संबंध अपने उच्चतम आदर्श रूप में कायम रखा है|

रामपुरा के स्कूल में जब अध्यापक मुनीश  कुमार की तैनाती बतौर प्राथमिक शिक्षक हुई तो उस  इलाके में बहुत से बच्चे स्कूल नहीं आते थे| ऐसे बच्चों के माँ-बाप के लिए उनके बच्चे उनके कामकाज में हाथ बंटाने वाले जीव थे| जितने ज्यादा हाथ उतनी ज्यादा घर की कमाई!

मुनीश कुमार ने गांव में घर-घर जाकर लोगों से सम्पर्क किया| उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी पर धीरे धीरे मुनीश की मेहनत रंग लाई और सभी ग्रामीण  अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे|
स्कूल में विधार्थी लाने के बाद मुनीश कमरतोड मेहनत करके दिन रात एक करके अपने स्कूल के बच्चों को शिक्षित बनाने के काम में जुट गये|

मुनीश का तबादला हुआ तो स्थानीय लोगों को ऐसा लगा मानों उनके बच्चों से उनका अध्यापक और गाइड और उनसे दूर जा रहे हों|

मुनीश  अपने पीछे ज्ञान की ऐसी ज्योति जलती छोड़ गये जो उस इलाके से अज्ञानता के अँधेरे को बहुत सालों तक रोशन करती रहेगी|शिक्षक हो तो ऐसा!

सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस – भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

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