Posts tagged ‘Ghazal’

अगस्त 11, 2011

गम का आसरा : नरेश कुमार ’शाद’

दिले बेमुददाआ दिया है मुझे
देने वाले ने क्या दिया है मुझे

दोस्तों ने दिए हैं ज़ख्म कहाँ
दोस्ती का सिला दिया है मुझे

मुझको दुनिया का तजुर्बा ही नहीं
तजुर्बे ने बता दिया है मुझे

जिंदगी से तो क्या शिकायत हो
मौत ने भी भुला दिया है मुझे

जब भी घबरा गया हूँ मैं गम से
गम ने खुद आसरा दिया है मुझे

…………..
प्रस्तुती : रफत आलम

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अगस्त 10, 2011

शोला बन न भड़के तो शेर कैसा: नरेश कुमार ’शाद’

दिमाग सोख्तासा दिल पे गर्द सी क्या है
यह जिंदगी का तमस्खर है जिंदगी क्या है

कदम बढ़ा के नई मंजिलें बुलाती हैं
ये बेहिसी, ये थकन ये शिकस्तगी क्या है

न देख चश्में-हिकारत से खुश्क काँटों को
गुलों से पूछ मआले शागुफ्त्गी क्या है

सुखनवरी नहीं बे गर्मिए सुखन ए  शाद
जो शोला बन के न भड़के वो शेर ही क्या है

(सोख्तासा : जलता, तमस्खर : मजाक, बेहिसी : सुस्ती, शिकस्तगी : पराजय,

चश्में-हिकारत :नफ़रत भरी निगाह, मआले शागुफ्त्गी : हँसने का परिणाम,

सुखनवरी : शायरी, बे गर्मिए सुखन : जोशीले शब्दों बिना)

…………..
प्रस्तुती : रफत आलम

जुलाई 13, 2011

दिल की लगी

फ़िक्र बहुत थी हमें दुनिया जहान की
सर पे गिरी छत अपने ही मकान की

दिल से दुआ हो हर एक मेहमान की
अल्लाह इज़्ज़त रखे मेरे मेज़बान की

किसी ने कुत्तों में खोजी वफ़ा की बू
वो समझ गया था फितरत इंसान की

कौन समझा दिल की कतरनों का दर्द
लोग तो कैंचियाँ चला गए ज़बान की

रिश्ते बहुत थे मगर कौन से रिश्ते थे
हमने जिनके वास्ते दुनिया वीरान की

मुस्कानों का बहरूप धरे अपनी काया
असल में बस्ती है जंगल बयाबान की

गुलशन के उजड़ने में किसका है दोष
मौसम का फरेब के भूल बागबान की

दीवाने तो तिरछी चितवन पे मर मिटे
ज़रूरत कहाँ पड़ी प्यारे, तीर-कमान की

सर इबादत से उठे ही कब दीवानों के
सजदों को ज़रूरत कहाँ थी अज़ान की

यूँ तो ज़मीन माटी का गोला है मगर
उठाए फिर रही है बुलंदी आसमान की

हमने कब कहा ये है गज़ल ऐ आलम
है दिल की लगी जो दिल ने बयान की

(रफत आलम)

जुलाई 7, 2011

कहीं मकान बनाएँ क्या?

तकदीर की तह में उतर जाएँ क्या,
घर जलाके रौशनी को मनायें क्या?

होंटों पर ताले लगे हैं सुनायें क्या,
छुरी तले हैं ज़बाने तो गायें क्या?

बेकसी बता हद से गुजर जाएँ क्या,
जिंदगी के मारे हैं ज़हर खाएं क्या?

वहाँ भी कहीं मौत खड़ी मिलनी है,
जिंदगी तेरे रास्ते पर आयें क्या?

किस्मत कौन सी अपने हाथ में है,
किस्मत के मिले पर पछताएं क्या?

आज तो ज़रा भी दिल में नहीं दर्द,
किसी दोस्त को गले से लगाएं क्या?

कोई तो सूरत हो दिल बहलाने की
जिंदगी बता ताज़ा फरेब खाएं क्या?

हमने सरों पर छतें गिरती देखी हैं,
सोचते हैं कहीं मकान बनाएँ क्या?

(रफत आलम)

मई 23, 2011

बूँद में समंदर

सौ परिक्षाओं से गुजरोगे हर जीत हार में
प्रयास करना के रहो सदा अव्वल कतार में

उजाले नज़र आये भिखारियों की कतार में
सुना था रौशनी बंटेगी अंधों के दरबार में

गुमराही के सिवा अपने को मिलना है क्या
रहनुमाँ सच्चे हैं ना आचार में ना विचार में

ध्यान से देखो तो इसमें समंदर हैं समाये
ये बूँद जो नन्ही नज़र आ रही है आकार में

हर रास्ते सौदा हो रहा है काली कमाई का
खुले बिका करता है ज़मीर आज बाज़ार में

मंजिलों के सफर चल दिए कारवाँ के साथ
अपना नसीब देखिये हम खो गए गुबार में

नफरत की क्या कहें घाव प्रीत के थे गहरे
दिखे तक भी नहीं और मार गए प्यार में

फूलों से तो ज़ख्मों के सिवा कुछ ना मिला
काँटों का खलूस आजमाएंगे अबके बहार में

अपनों ने वो चोट दी के दुश्मन लगे शर्माने
बहुत फरेब खाए हैं आलम हमने एतबार में

(रफत आलम)

मई 20, 2011

जो कर न सकूँ

मिल ना पाऊँ और उसको भुला भी ना सकूँ
वो छुपा है मुझ ही में जिसे पा भी ना सकूँ

एक घाव है जिसे दिल से भुला भी ना सकूँ
और चोट दी है किसने ये बता भी ना सकूँ

खून दिल का नज़र आता है कहाँ दामन पर
ज़ख्म अपनों ने दिए हैं जो बता भी ना सकूँ

खो गए ख़्वाबों की किसी राह से पुकार मुझे
इतना दूर तो नहीं तुझसे के आ भी ना सकूँ

बह गए हैं ना चाहते हुए भी आँखों से आंसू
ऐसा बोझ तूने दिया है जो उठा भी ना सकूँ

सितारों की महफ़िल में रोज तलाशता हूँ उसे
इतना दूर चला गया वो के बुला भी ना सकूँ

तका करता हूँ बेबसी से रोज आकाश को मैं
ऐसा रूठ कर गया कोई के मना भी ना सकूँ

मैं तड़पता रहूं तड़प कर तुझी को याद करूँ
इतना गम मुझे ना दे जो छुपा भी ना सकूँ

तू उन्ही कातिल अदाओं से आजमा तो सही
ऐसा कब हूँ मैं के फिर फरेब खा भी ना सकूँ

फल लदे पेड़ों से मैंने झुकने की ली है सीख
खड़ा बांस नहीं के खुद को झुका भी ना सकूँ

मेरा ज़र्फ झुकने से टूटना समझता है बेहतर
सर तो दे आऊं, सर कहीं  झुका भी ना सकूँ

बह  गए हैं ना चाहते हुए भी आँखों से आंसू
ऐसा बोझ तूने दिया है जो उठा भी ना सकूँ

चंद कागजों पर लव्ज़ आसुंओं में बिखरे हुए
क्या खजाने हैं ये खत जो जला भी ना सकूँ

खामोशी की सदाओं में जो जन्मते हैं आलम
सुना भी ना सकूं, वो नगमे गा भी ना सकूँ

(हज़रत मिर्जा ग़ालिब और हज़रत अमीर मिनाई के क़दमों की धूल को नज़र)

(रफत आलम)

मई 19, 2011

पानी मयस्सर नहीं, और कहीं जाम छलकते हैं

कारीगरों के हिस्से में इनाम आ गये
हम औजारों का क्या था काम आ गए

वो खेल तो शाहों की शह-मात का था
मजबूर प्यादे बेगार में काम आ गए

प्रजा को बेच रहे हैं ज़मीर-फरोश शाह
ये कैसा दौर है कैसे निज़ाम आ गए

सियाहकारों के गुनाहों के चश्मदीद थे
मुल्जिमों की फ़ेहरिस्त में नाम आ गए

साकी तेरे मयकदे का खुदा ही हाफिज
कमज़र्फ रिन्दों के हाथों जाम आ गए

बस्तियों में तो पीने का पानी भी नहीं
नेता के वास्ते छलकते जाम आ गए

अंधेरनगरी में अवाम ने चुने थे शाह
मालायें ले के चाटुकार तमाम आ गए

हम अपना पता भूले हुए थे ए आलम
गनीमत जानिये घर सरे शाम आ गए

(रफत आलम)

ज़मीर्फारोश -अंतरात्मा विक्रेता,
निजाम -सत्ता,
सियाहकारों – काले कार्य करने वाले (बेईमान ),
फेहरिस्त -सूची,
चश्मदीद – प्रत्यक्षदर्शी,
रिंद – शराबी

मई 11, 2011

हुस्नेमुजस्सम

खुशबू कहाँ हूँ मैं जो गुलाब छू लूँ
चाह थी पलकों से तेरे ख्वाब छू लूँ

जिंदगी सकून देने का वादा तो कर
तौबा मेरी जो फिर जामेशराब छू लूँ

बिन पढ़े ही सीख जाऊँ सबके इश्क
आँखों से जो हुस्न की किताब छू लूँ

इश्क की आग में शमा पर जलता हूँ
पतंगा बोला चाहूँ तो अफताब छू लूँ

तुम्हारी याद के सहारे नींद आ जाए
ख्वाब में आओ तुम तो ख्वाब छू लूँ

सहरा की दरियादिली भी परखी जाए
प्यास की जिद है आज सराब छू लूँ

किस्मत में काँटों की चुभन लिखी है
दिल फिर भी चाहता है गुलाब छू लूँ

कौन देख सका हुस्नेमुजस्सम आलम
मेरी कहाँ है मजाल जो नकाब छू लूँ

(रफत आलम)

अफताब                   – सूर्य,
सहरा                       – मरुस्थल,
सराब                       – मरीचिका,
हुस्नेमुजस्सम         – साक्षातसौंदर्य (ईश्वर)

मई 9, 2011

देखा है नहीं और खुदा कहते हो

मेरी आँखों को कुछ सूझता ही नहीं
या अब इस शहर में उजाला ही नहीं

आखरी सांस तक एक लापता सफर
जिंदगी तेरा ठिकाना मिलता ही नहीं

पहली साँस से पहली है ये अस्तित्व
लाख तलाशिये हल निकलता ही नहीं

उमँगों का लहू पिया जाता कब तक
इन लबों पर अब कोई दुआ ही नहीं

पाल बैठे आदत तब हमने ये जाना
शराब रोग भी है सिर्फ दवा ही नहीं

खुदा से हार कर आँखों देखे सच ने
उसको मान लिया जिसे देखा ही नहीं

आलम तेरी बात पर किसे हो यकीन
तेरे पास झूठ गढने की कला ही नहीं

(रफत आलम)

अप्रैल 29, 2011

खौफ है बरपा

राह बेताब मुसाफिर है तैयार भी
खत्म हुआ अब हर इन्तेज़ार भी

पत्थर बन गए सारे सरोकार भी
गूंगी बहरी अंधी हुई सरकार भी

मंत्री गुंडा ही नहीं है चाटूकार भी
प्रजा त्रस्त बहरा हुआ दरबार भी

बिकने वाला ही यहाँ खरीदार भी
अजब है दुनिया का कारोबार भी

गरमी में खाली मटकी प्यासी है
और जान लेवा भूख की मार भी

शेख साहब आप की करतूतों से
शर्मिंदा है मुझ सा गुनहगार भी

मंदिरों मस्जिदों के झगडे यानी
नफ़े का है बन्दों ये कारोबार भी

अज़ान आरती की पाक सदा में
सुन सको तो सुन लो चीत्कार भी

पीने गए थे बंदगी की मय लोग
साथ लाये खुदाई का खुमार भी

अक्ल का कहा तो सदा माना है
कभी सुनना दिल की पुकार भी

हमें मालूम है फैसला क्या होगा
वही कातिल है जो के पैरोकार भी

कटने के खौफ से चुप हैं ज़बाने
और तेज है खंजरों की धार भी

ईमान की चिता जली थी आलम
उजाला ले आया सियाहकार भी

(रफत आलम)

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