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मई 30, 2014

योगेन्द्र यादव : 21वीं सदी में नहीं चल सकती 20वीं सदी की राजनीति

Yogendra Yadav‘प्रभात खबर’ के रंजन राजन ने राजनीतिक विश्‍लेषक व ‘आप’ नेता योगेंद्र यादव से लंबी बातचीत की|

रंजन – 2014 के जनादेश को आप कैसे देखते हैं? क्या इसे आप ‘मोदी लहर’ का परिणाम मानते हैं?

योगेन्द्र – ‘चुनावी लहर’ का मतलब है चुनाव क्षेत्रों और राज्यों की सीमाओं को लांघ कर देश के बड़े इलाके में एक जैसा रुझान दिखना. नतीजे में जब भी ऐसी स्थिति दिखे, तो उसे हम ‘चुनावी लहर’ का नाम दे सकते हैं. जैसे 1971 में हुआ, 1977 में हुआ, 1984 में हुआ. इस लिहाज से 2014 के जनादेश को ‘चुनावी लहर’ कहना बिल्कुल सही होगा. यह सही है कि इस लहर में नरेंद्र मोदी की भी भूमिका है, लेकिन इसे ‘मोदी लहर’ मान लेना या ‘मोदी लहर’ की संज्ञा देना, इस चुनावी लहर के चरित्र को समझने में चूक होगी|
दरअसल, 2014 की ‘चुनावी लहर’ के तीन प्रमुख कारक हैं. पहला, जो शायद सबसे बड़ा कारक था, यूपीए-2 के राज ने देश में एक तरह का नैतिक और राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया था. इसलिए जनता के मन में असंतोष नहीं, बल्कि गुस्सा घर कर गया था. लोग कह रहे थे कि यूपीए को छोड़ कर जो मर्जी सत्ता में आ जाये. दूसरा, इस गुस्से में लोग एक पुख्ता और जाना-पहचाना विकल्प भी ढूंढ रहे थे. इस लिहाज से भारतीय जनता पार्टी एक जानी-पहचानी पार्टी थी, पायदार दिखाई दे रही थी और लोगों को भरोसा था कि यह पार्टी देशभर में जीत हासिल कर सकती है, 272 के आंकड़े को छू सकती है, केंद्र में सरकार बना सकती है|

नरेंद्र मोदी इस चुनावी लहर के तीसरे कारक थे. उनका योगदान यह था कि उन्हें देश में एक मजबूत नेता के रूप में पेश किया गया. ऐसे में मोदी की छवि ने चुनावी रुझान को एक लहर में तब्दील कर दिया. मोदी की छवि में लोगों को वह शून्य भरने की संभावना दिखाई देने लगी. मनमोहन सिंह के लचर एवं कमजोर व्यक्तित्व के सामने लोग अगर एक मजबूत एवं निर्णायक व्यक्तित्व देखना चाह रहे थे, तो नरेंद्र मोदी की छवि ने उस कमी को पूरा किया. मोदी की छवि में लोगों को भविष्य के लिए आशा दिखाई दी. जिन-जिन बातों को लेकर लोगों के मन में एक कसक थी, वह पूरी होती दिखायी दी. ऐसा अकसर होता है कि इस तरह की किसी छवि में जो कोई व्यक्ति जो कुछ भी ढूंढ़ना चाहता है, ढूंढ़ लेता है|

रंजन – नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे किये हैं, उसके आधार पर बहुत से लोगों को लग रहा है कि देश में ‘अच्छे दिन’ बस आने ही वाले हैं. आप कितने आशान्वित हैं?

योगेन्द्र – सपने देखना अच्छी बात है. जब कोई समूह या देश सपने देखता है, तो उससे उसका मनोबल बढ़ता है. उसकी ऊर्जा बढ़ती है. उसका मन बड़ा होता है. इसलिए अगर आज देश के एक बड़े वर्ग में आशा है, तो मैं न तो उस आशा से झगड़ना चाहूंगा और न ही उस आशा को पंचर करना चाहूंगा. अगर आज इस देश के लोगों को नरेंद्र मोदी में आस्था है, तो जनता में आस्था रखने के नाते मुङो उन लोगों का सम्मान करना सीखना चाहिए. हालांकि मुङो यह डर भी है कि लोगों की आशाएं कहीं खोखली न साबित हो. मुङो डर है कि कहीं नरेंद्र मोदी के कई दावे महज लफ्फाजी न साबित हों. हालांकि मैं चाहूंगा कि मैं इसमें गलत साबित होऊं|

मैं समझता हूं कि देश में अगर अच्छे दिन आ सकते हैं और हमारी पार्टी उसकी वाहक नहीं बनती है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है. जो भी पार्टी वाहक बने, देश का भला हो यह बड़ी बात है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी एवं अप्रत्याशित पराजय के प्रमुख कारक क्या-क्या रहे?

योगेन्द्र – इस बार के जनादेश को सिर्फ कांग्रेस की हार कहना अपर्याप्त होगा. उसकी यह हार अप्रत्याशित और बहुत गहरी ही नहीं थी, बल्कि साथ-ही-साथ यह दीर्घ काल में कांग्रेस के पतन का संकेत देती है. यूपीए की सरकार को दो मौके मिले. चूकि उसकी पहली बार की जीत भी अप्रत्याशित थी, इसलिए उस सरकार के विरुद्ध असंतोष उभरते-उभरते भी समय लगा. चूंकि यूपीए-1 की जीत अप्रत्याशित थी, इसलिए उसका आशा-निराशा का चक्र सामान्य सरकार की तरह नहीं चला. उस सरकार से आशा बंधनी देर से शुरू हुई और यूपीए की पहली सरकार खत्म होने तक भी आशा का माहौल बना ही रहा. लेकिन यूपीए-2 की शुरुआत होते ही निराशा आरंभ हो गयी. यह निराशा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते चरम सीमा पर पहुंची और 2014 का चुनाव आते-आते नैराश्य में बदल गया|

जनता कांग्रेस से निराश ही नहीं थी, जनता को कांग्रेस से असंतोष ही नहीं था, बल्कि उसमें गुस्सा घर कर गया था. लोग किसी भी सूरत में कांग्रेस से छुटकारा पाना चाह रहे थे. सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की ईमानदारी की चमक उतर चुकी थी. लोग इन्हें एक भ्रष्ट सरकार के मुखौटे के रूप में देखने लगे थे. राजनीतिक रूप से इस सरकार में किसी दिशा बोध का सर्वथा अभाव था. वह चाहे कश्मीर का मसला हो या तेलंगाना का, कांग्रेस सरकार एक के बाद एक आत्मघाती कदम उठाती चली गयी. सरकारी कामकाज के मामले में भी सबकुछ ठहर गया था. एक तरफ आम आदमी परेशान था, तो दूसरी तरफ उद्योगपति और पूंजीपति भी निराश हो गये थे. ऐसे में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार अप्रत्याशित नहीं थी. लेकिन कांग्रेस का आंकड़ा 50 से भी नीचे गिर जायेगा, इसकी कल्पना मैंने भी नहीं की थी|

कांग्रेस की यह अभूतपूर्व हार एक सामान्य चुनावी हार नहीं है, कि पार्टी इससे पांच साल में उबर जायेगी. यह कांग्रेस के पतन का एक नया दौर हो सकता है. 1989-91 के दौरान कांग्रेस इस देश में राजनीति की धुरी की जगह कई राष्ट्रीय पार्टियों में से एक पार्टी बन गयी थी. उसके बाद से जिस-जिस राज्य में कांग्रेस एक बार बैठ गयी, वहां वापस खड़ी नहीं हो पायी. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु इसके बड़े उदाहरण हैं. मुङो लगता है कि इस चुनाव के बाद देश की जो मध्य पट्टी है, कांग्रेस उसमें बहुत बड़े संकट में आ सकती है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में कांग्रेस बीते 15 साल से विपक्ष में रही है, लेकिन किसी भी तरह का विपक्ष देने में असमर्थ रही है. इस बार कांग्रेस का इस सारी पट्टी से सफाया होने के बाद संभव है कि कांग्रेस इस इलाके में बैठ जाये और फिर कभी उबर नहीं पाये. यही दिल्ली और हरियाणा में भी संभव है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस विपक्ष में तो है, लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़क पर विपक्ष की भूमिका निभा पायेगी, इसमें मुङो संदेह है. और अगर ऐसा हुआ तो राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के अप्रासंगिक होने की संभावना पैदा हो गयी है|

रंजन – कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि ‘आप’ के चुनाव मैदान में उतरने से भाजपा विरोधी मतों का बिखराव बढ़ा, जिससे भाजपा को बहुमत पाने में सुविधा हुई. दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि आप ने कांग्रेस के मुसलिम वोट बैंक में सेंध लगायी, जिससे उसकी सबसे बड़ी हार हुई. आप इन विचारों को कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – यह बहुत ही सतही समझ है. कौन किसके वोट काट रहा है, यह समझने के लिए हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि उस वोटर ने पिछले चुनावों में किसे वोट दिया था. हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि वह वोटर अगर आम आदमी पार्टी मैदान में नहीं होती तो किसे वोट देता. यह कांग्रेस की खुशफहमी है कि जिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, वे ‘आप’ के नहीं रहने पर कांग्रेस को वोट देते. हकीकत यह है कि उनमें से काफी लोगों ने पिछली बार कांग्रेस को भले ही वोट दिया हो, लेकिन उनमें से एक बड़ा वर्ग इस बार के चुनाव में कोई विकल्प नहीं होने पर झक मार कर भाजपा को ही वोट देता. इसीलिए आम आदमी पार्टी से भाजपा जितनी बौखलायी हुई थी, उतनी तो कांग्रेस भी नहीं बौखलायी थी|

दिल्ली विधानसभा चुनाव पर गौर करें. अगर उसमें आम आदमी पार्टी चुनाव नहीं लड़ती, तो जाहिर है भाजपा को बहुत बड़ी सफलता मिलती. अब तो दिल्ली का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया है और कम-से-कम दिल्ली के बारे में तो हमें यही कहना चाहिए कि वहां कांग्रेस ही आम आदमी पार्टी के वोट काट रही है. अगर कांग्रेस ने एक-दो संसदीय क्षेत्रों में वोट न काटा होता, तो शायद लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली में ‘आप’ को एक-दो सीटें मिल जाती. लेकिन राजनीति का गुणा-भाग केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता. मैं समझता हूं कि अगर आम आदमी पार्टी चुनाव में नहीं होती, तो देश के लिए, देश के भविष्य की दिशा ढूंढनेवाले काफी लोगों का मन नैराश्य में डूब जाता. नरेंद्र मोदी में देश का भविष्य न देखनेवाले लोगों को इस चुनाव में देश के भविष्य के लिहाज से कुछ नजर ही नहीं आता. आम आदमी पार्टी ने इस देश के आदर्शवादियों, और खास कर देश के युवाओं, के मन में देश के भविष्य के प्रति एक उम्मीद जगायी है. यह किसी भी चुनावी गणित से बड़ी बात है|

रंजन – इस बार के जनादेश में वामपंथी दलों की जमीन और खिसकी है. अब वाम दलों की राजनीति की दशा-दिशा और भविष्य की चुनौतियों को आप कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – पिछले दो-तीन दशकों से लेफ्ट की राजनीति धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है. लेफ्ट राष्ट्रीय ताकत की जगह पर एक क्षेत्रीय ताकत में तो पहले ही बदल चुका था, अब उन क्षेत्रों से भी धीरे-धीरे फेल होता जा रहा है. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट खत्म भले ही न हो रहा हो, लेकिन ममता बनर्जी से हार के बाद पहले जैसा दबदबा कायम नहीं कर सकता. केरल में तो एलडीएफ एक वामपंथी शक्ति बचा ही नहीं. उधर, मानिक सरकार पुरानी राजनीतिक पूंजी और अपने व्यक्तिगत प्रताप से चुनाव जीत रहे हैं|

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जनाभिमुखी और गरीब व्यक्ति के सपनों की राजनीति की जगह नहीं बची है. मैं मानता हूं कि ऐसी राजनीति भारत के लोकतंत्र के केंद्र में है और रहेगी. लेकिन मैं मानता हूं कि लेफ्ट की ‘ऑर्थोडॉक्स राजनीति’ आज जन आकांक्षाओं का वाहक नहीं बन पा रही है. जनता की आकांक्षाओं को एक नयी राजनीति की तलाश है. पिछले दो-तीन दशकों के जनांदोलन इसी तलाश का परिणाम हैं. और मैं चाहता हूं कि आम आदमी पार्टी भी इसी तलाश का वाहक बने|

रंजन – आप विकल्प की बात करते हैं, तो आपकी आर्थिक नीतियां कांग्रेस और भाजपा से किस तरह अलग हैं? क्या इस चुनाव में वामपंथी दलों की ओर से खाली हुई राजनीतिक जमीन को भरने की दिशा में आपकी पार्टी बढ़ेगी?

योगेन्द्र – किसी भी नयी राजनीति की यह नियति होती है कि उसे शुरुआत में पुराने चश्मे से ही देखा जाता है. हमारे साथ भी यही हो रहा है. हम स्थापित राजनीतिक खांचों के बाहर अपनी राजनीति स्थापित कर रहे हैं, लेकिन हमारे हर कदम को अब भी उन्हीं पुराने राजनीतिक खांचों में फिट करने की कोशिश की जाती है. मैंने बार-बार कहा है कि हमारी राजनीति न तो लेफ्ट की है, न ही राइट की|

आर्थिक नीतियों को लेकर इस देश में जो जड़ता आयी है, आर्थिक नीतियों के बारे में सोच जिस तरह से दो खांचों में बंध गयी है, हम उससे बाहर निकलना चाहते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हम सामाजिक न्याय या आर्थिक समता के विरुद्ध हैं. इस देश का संविधान समता, न्याय और बंधुत्व की बुनियाद पर ही खड़ा है. लेकिन हम अंतिम व्यक्ति की भलाई को किसी पुराने वैचारिक खांचे से बांध कर नहीं देखते. हमारा साध्य है अंतिम व्यक्ति के हाथ में संसाधन पहुंचना, लेकिन हमारे साधन और औजार किसी बने-बनाये मॉडल से नहीं आते. अंतिम इनसान की खुशहाली अगर सरकार के दखल देने से बेहतर होती है, तो हम दखल के पक्ष में हैं और अगर सरकार के हाथ खींचने से बेहतर होती है, तो हम हाथ खींचने के पक्ष में हैं|

कुछ सेक्टर हैं- जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य-जहां हम सरकार की पहले से ज्यादा दखल चाहते हैं, लेकिन व्यापार और उद्योग में हम चाहेंगे कि सरकार कुछ न्यूनतम नियमन के अलावा बहुत ज्यादा दखलंदाजी न करे. यह बात चूंकि नयी है, इसलिए लोगों को अटपटी लगती है और वे कहते हैं कि हमारे विचार स्पष्ट नहीं हैं. लेफ्ट के साथी सोचते हैं कि हम अभी उनकी तरह हो नहीं पाये हैं. सच यह है कि हम उस तरह के वैचारिक ढांचे से बंधना ही नहीं चाहते. बीसवीं सदी की विचारधाराओं के गिरफ्त से मुक्त हुए बिना इक्कीसवीं सदी के विचारों को, इक्कीसवीं सदी की राजनीति को स्थापित नहीं किया जा सकता|

रंजन – इस जनादेश के बाद विरोध की राजनीति को आप गैर-कांग्रेसवाद से गैर-भाजपावाद में शिफ्ट होते देख रहे हैं? क्या विरोध की राजनीति को दिशा देने के लिए आम आदमी पार्टी अन्य दलों के बीच तालमेल का प्रयास करेगी, या चुनाव से पहले की एकला चलो की नीति पर ही चलती रहेगी?

योगेन्द्र – नरेंद्र मोदी की राजनीति के विरोध के दो अलग-अलग स्वरूप होंगे और इसकी दो अलग-अलग जमीन होगी. इसमें कोई शक नहीं है कि संसद के भीतर गैर-भाजपाई ताकतें किसी न किसी किस्म का गैर-भाजपावाद चलाने की कोशिश करेंगी. यह कोई नयी चीज नहीं है. पिछले तीस साल में कांग्रेस, वामपंथी दलों और कुछ अन्य संगठनों ने मिल कर इस तरह की कोशिशें कई बार की है|

लेकिन इसके अनुभव ने हमें सिखाया है कि भाजपा के विरोध के लिए मतलबी गंठजोड़ बनाने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि इससे भाजपा और ज्यादा मजबूत होती है. इस प्रयोग ने यह भी सिखाया है कि भाजपा विरोध के नाम पर सेक्युलर खेमा बनाने की कोशिश भी एक ढकोसला बन कर रह जाती है. कांग्रेस, राजद, सपा सरीखे पार्टियों का सेक्युलरिज्म मुसलमानों को बंधक बनाये रखने का षड्यंत्र है. जनता इसे खारिज कर चुकी है. मुङो नहीं लगता कि इस तरह के किसी प्रयास से भाजपा का विकल्प बनाने में कोई मदद मिलेगी. संसद के भीतर एकाध बार कुछ छोटी सफलता मिल सकती है, लेकिन इससे भाजपा की राजनीति का मुकाबला करने की ऊर्जा खड़ी नहीं हो सकती|

आम आदमी पार्टी कांग्रेस विरोध या भाजपा विरोध के नाम पर अवसरवादी गंठबंधनों के खिलाफ रही है. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब संसद में भाजपा के खिलाफ कभी-कभार बोल देना या उसके कुछ कानूनों का विरोध करना भर नहीं होगा. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब होगा उस तरह की राजनीति का विरोध करना, जिसकी प्रतीक आज भाजपा है. हमारे लिए भाजपा के विरोध का मतलब होगा हर किस्म के भ्रष्टाचार का विरोध करना, हर किस्म की सांप्रदायिकता का विरोध करना, देश में लोकतंत्र के हनन का विरोध करना और एक नंगे किस्म के पूंजीवाद का विरोध करना. आज भाजपा इन खतरों का प्रतीक है, लेकिन सिर्फ भाजपा इस अपराध की दोषी नहीं है|

इसमें देश का पूरा सत्ता प्रतिष्ठान शामिल रहता है. इसलिए विपक्ष की राजनीति हमारे लिए ऐसी राजनीति नहीं हो सकती कि हम सिर्फ भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में बोलें, और कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर चुप हो जायें. सिर्फ भाजपा की सांप्रदायिकता के बारे में बोलें और सपा या एमआइएम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन) की सांप्रदायिकता पर मौन साध लें. विपक्ष की राजनीति हमारे लिए केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगी. मैं समझता हूं कि अगले पांच साल तक मोदीमय भाजपा के विरोध का असली मंच संसद नहीं होगा, बल्कि इस लड़ाई को सड़क और मैदान पर लड़ना होगा. मुङो नहीं लगता कि यह कांग्रेस के बस की बात है|

इसलिए आम आदमी पार्टी को यह बीड़ा उठाना पड़ेगा. संसद में भले ही हम एक छोटी विपक्षी पार्टी के रूप में गिने जायेंगे, लेकिन अगले पांच साल में आम आदमी पार्टी जमीन पर इस देश की प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में उभरेगी. जहां तक दूसरी पार्टियों के बीच तालमेल का सवाल है, मेरे अब तक के जवाब में ही इसका उत्तर अंतर्निहित है, यानी कि भाजपा विरोध के नाम पर भानुमति का कुनबा जोड़ने की राजनीति में हमारा विश्वास नहीं है|

रंजन – भाजपा के कुछ नेताओं ने कहा है कि इस वक्त भाजपा विरोध की बात करना 2014 के जनादेश का अपमान होगा?

योगेन्द्र – मैं समझता हूं कि लोकतंत्र में यह कहना ही लोकतंत्र का अपमान है, कि किसी भी दल का विरोध करना जनादेश का अपमान होगा. मैं समझता हूं कि अगर कोई पार्टी इतना बड़ा जनादेश लेकर सत्ता में पहुंची है, तो उसे स्वयं इस बात की चिंता होनी चाहिए कि उसके किसी गलत कदम का अच्छा विरोध हो पायेगा या नहीं. विपक्ष तो लोकतंत्र की आत्मा है. उससे डरना लोकतंत्र से डरना होगा|

रंजन – यह भी कहा जा रहा है कि इस बार के जनादेश में यूथ फैक्टर काफी अहम रहा है. देश के करोड़ों युवा मतदाताओं की आकांक्षाएं अलग तरह की हैं और उनमें बड़ी उम्मीद है नरेंद्र मोदी को लेकर, इसलिए उन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ कर विकास के नाम पर, मोदी सरकार बनाने के लिए मतदान किया है. इस संबंध में आपकी क्या राय है?

योगेन्द्र – मैंने इस बार के चुनाव के आंकड़े ठीक से देखे नहीं हैं, क्योंकि मैं किसी भी सव्रेक्षण की टीम में शामिल नहीं था. इसलिए मैं प्रमाण के साथ तो नहीं कह पाऊंगा, लेकिन मुङो इस तरह के दावों में अतिशयोक्ति नजर आती है. इसमें कोई शक नहीं कि भारत में युवाओं और युवा मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. और इसमें भी कोई शक नहीं कि बाकी मतदाता-समूहों की तुलना में युवाओं में भाजपा के लिए आकर्षण अपेक्षाकृत ज्यादा है, लेकिन इतना भर से युवा वोट या युवा शक्ति का भाजपामय हो जाना जैसे निष्कर्षो पर हम नहीं पहुंच सकते. हमें अभी देखना है कि युवाओं का यह रुझान झणिक है या दीर्घकालिक. इसके बाद ही किसी बड़े निष्कर्ष पर हम पहुंच सकते हैं|

रंजन – पहले माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का जाति आधारित मजबूत जनाधार है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि खासकर हिंदी पट्टी में यूथ फैक्टर इतना कारगर रहा कि क्षेत्रीय दलों के किले ध्वस्त हो गये. इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का जनाधार क्यों खिसक गया और इसके बाद क्षेत्रीय दलों की राजनीति के समक्ष क्या प्रमुख चुनौतियां हैं?

योगेन्द्र – इस चुनावी लहर में भाजपा या भाजपा समर्थक दलों को छोड़ कर बाकी ज्यादातर दलों को भारी नुकसान हुआ है. खास कर उत्तर भारत के क्षेत्रीय दल इसी का शिकार हुए हैं. हालांकि यह बात दक्षिण और पूर्वी भारत के क्षेत्रीय दलों पर पूरी तरह लागू नहीं होती है. अन्ना द्रमुक, द्रमुक, वाइएसआर की पार्टी, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति, बीजेडी और ममता बनर्जी की पार्टी को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. अगर नुकसान हुआ तो मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के क्षेत्रीय दलों को. इसलिए यहां उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रीय दलों की हार पर अलग से गौर करना बेहतर होगा|

मैं समझता हूं कि इन दोनों राज्यों में मंडलीकरण के बाद की जातीय राजनीति अपने एक चरम बिंदु पर पहुंच कर अप्रासंगिक होने लगी थी. जातिगत राजनीति की यही नियति है कि एक जाति आधारित वोट बैंक मजबूत होते-होते एक ऐसे बिंदु तक पहुंच जाती है, जहां राजनीतिक जड़ता आ जाती है और जहां लोगों को समझ आने लगता है कि इस जड़ता से बाहर निकलने की जरूरत है. खासकर उत्तर प्रदेश में लोगों ने पिछले दस-पंद्रह वर्षो में सभी मुमकिन राजनीतिक समीकरण इस्तेमाल कर लिये थे- अगड़ों का, पिछड़ों का, दलित, यादव, मुसलिम आदि सभी इस्तेमाल हो चुके थे. और यह यात्रा एक ठहराव के बिंदु पर पहुंच गयी थी|

इस बार भाजपा की बड़ी विजय उसके परंपरागत सामाजिक समीकरण की विजय नहीं है. वह सभी जाति-समुदायों के एक बड़े हिस्से को जोड़ कर बेहतर सरकार बनाने की राजनीति की विजय है. इस लिहाज से नरेंद्र मोदी की विजय में कहीं जातिवादी राजनीति से मुक्त होकर एक बेहतर सरकार और बेहतर राजकाज की इच्छा शामिल थी. मुङो नहीं लगता कि भाजपा या नरेंद्र मोदी वास्तव में इस इच्छा को पूरा कर पायेंगे, लेकिन इस इच्छा का होना दोनों राज्यों में, खास तौर पर उत्तर प्रदेश में एक सार्थक राजनीतिक संभावना की ओर इशारा कर रहा है|

रंजन – यदि जातीय राजनीति अप्रासंगिक हो जायेगी, तो कई क्षेत्रीय दलों का ‘वोट बैंक’ ही खत्म हो जायेगा. ऐसे में इस जनादेश के बाद क्षेत्रीय दलों को अपनी राजनीति को किस तरह से आगे बढ़ाना होगा?

योगेन्द्र – इस विषय में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय, सभी सभी दलों को विचार करने की जरूरत है. खास कर उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति एक खास दौर से गुजर चुकी है. सामाजिक न्याय के नारे के तहत हुई राजनीति के इस दौर में लोगों के जीवन के, रोजमर्रा के, मुद्दों में बेहतरी के सवाल गौण हो गये थे. मोदी की जीत इस ओर इशारा करती है कि इन सवालों को दबाया नहीं जा सकता. यानी क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, सभी दलों को खुद को आम लोगों की जिंदगी में खुशहाली के सपने से जोड़ना होगा. मैं नहीं मानता कि नरेंद्र मोदी इस काम को पूरा कर पायेंगे. हालांकि वे इस सपने के वाहक बनते हुए दिखाई दे रहे हैं, इस बात से मैं इनकार नहीं कर सकता|

रंजन – क्षेत्रीय दलों की ओर से सामाजिक न्याय का नारा भी तो इसी तर्क के साथ दिया जाता है कि संसाधनों के बंटवारे में जो लोग अपना हिस्सा पाने से वंचित रह गये हैं, उन्हें उनका हक दिलायेंगे. तो इस जनादेश से क्षेत्रीय दलों को क्या सबक लेने की जरूरत है|

योगेन्द्र – सामाजिक न्याय की राजनीति ने इस प्रकार के नारे तो दिये, लेकिन व्यवहार में वह राजनीति केवल प्रतीकात्मक हिस्सेदारी की राजनीति बन गयी. इसमें चेहरों में तो हिस्सेदारी हुई, यानी कितने एमएलए किस समुदाय के बनेंगे, कितने मिनिस्टर किसके बनेंगे; लेकिन विकास के फल में हिस्सेदारी का माहौल नहीं बन पाया|

मैं समझता हूं कि बिहार में शुरू में यह सबक नीतीश कुमार सरकार ने सीखा, कि लोगों को सिर्फ सामाजिक न्याय का नारा नहीं चाहिए, उसे सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार आदि में हिस्सेदारी भी चाहिए, हालांकि बाद में वे भी इस पर पूरी तरह कायम नहीं रह पाये. मुङो लगता है कि इस बार के जनादेश से खास कर उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा और बिहार में राजद को यह सबक सीखना होगा कि जब तक वे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के सवालों पर कुछ करेंगे नहीं, तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक सामाजिक न्याय की बात करने से उनकी राजनीति बहुत दिन तक टिकनेवाली नहीं है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से काफी कम क्यों रहा?

योगेन्द्र – आम आदमी पार्टी के लिए यह जनादेश न तो निराशाजनक रहा है और न ही बहुत अप्रत्याशित. संभव है कि हमारे कुछ समर्थकों, शुभचिंतकों के मन में बड़ी उम्मीदें बंध गयी थीं. लेकिन दरअसल अपने पहले लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी से इससे ज्यादा अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए. पिछले तीस-चालीस साल में केवल दो नयी राष्ट्रीय पार्टियां इस देश में स्थापित हुईं- भाजपा और बसपा. उन दोनों पार्टियों के पहले लोकसभा चुनाव पर आप गौर कीजिए. 1984 में भाजपा ने अपना पहला राष्ट्रीय चुनाव लड़ा था, उसे सिर्फ दो सीटें आयी थीं. लेकिन चूंकि उसमें एक पुरानी पार्टी का अंश शामिल था, इसलिए उसे सात फीसदी वोट हासिल हो गये थे. 1989 में बसपा ने पहली बार राष्ट्रीय चुनाव लड़ा, उसे दो सीटें आयीं और दो प्रतिशत वोट हासिल हुए. इस तरह पहले चुनाव के लिहाज से हमारा प्रदर्शन बुरा नहीं है|

हां, हमें दिल्ली में निराशा जरूर हुई. दिल्ली में हमारा वोट प्रतिशत भले ही बढ़ा हो, लेकिन हमें कोई सीट नहीं मिली और भाजपा का फासला हमसे बढ़ा. हमें वाराणसी में भी निराशा हुई. मैंने सोचा था कि दिल्ली के बाद हमें हरियाणा में एक नयी शुरुआत मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. लेकिन इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को जो हासिल हुआ है, वह कम नहीं है. चार सीटें अपने-आप में कम जरूर लगती हैं, लेकिन दिल्ली से बाहर एक नये राज्य-पंजाब-में हमें कामयाबी मिली है|

रंजन – इस चुनाव में ‘आप’ को उम्मीद से काफी कम सीटें मिलने पर कुछ विश्लेषक दो बड़े कारण गिना रहे हैं. पहला, दिल्ली में 49 दिनों में ही सरकार चलाने से इनकार कर देना और दूसरा, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव तथा ज्यादातर फैसले अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया जैसे कुछेक नेताओं द्वारा मनमाने तरीके से लिया जाना. आप क्या कहेंगे?

योगेन्द्र – जहां तक दिल्ली सरकार के इस्तीफा देने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इस्तीफा देने से दिल्ली में भी और दिल्ली के बाहर भी बड़े तबके को धक्का लगा. उन्हें लगा कि कोई सरकार, जो उनके लिए बहुत सारे काम कर सकती थी, अचानक चली गयी. और पूरे चुनाव में यह बात हमें हर जगह और बार-बार सुनने को मिली. हम पर भगोड़े का आरोप कहीं चिपक गया. हम तर्क देते रह गये, लेकिन जनता हमारी बात को नहीं मानी. राजनीति का काम है जनता से सबक लेना. और मैं समझता हूं कि यह एक सबक हमारे लिए है कि हमें दिल्ली सरकार को छोड़ने का फैसला भी हमें जनता के साथ किसी राय-मशविरे के बाद लेना चाहिए था, जैसा कि हमने सरकार बनाने के वक्त किया था. और अगर जनता कहती कि छोड़ना नहीं चाहिए, तो हमें जनता की बात माननी चाहिए थी. उसमें हमारी राजनीतिक समझ की एक चूक हुई, यह मानने में हमें कोई संकोच नहीं है|

रही बात पार्टी की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया की, तो मैं समझता हूं कि आम आदमी पार्टी देश की अन्य पार्टियों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक है और पूरी तरह से लोकतांत्रिक बनना अपने आप में एक प्रक्रिया है, जिसमें तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं. और मुङो यकीन है कि स्वराज के जिस विचार को लेकर यह पार्टी बनी है, उसे यह अपनी कार्यप्रणाली में भी समाहित कर पायेगी|

रंजन – इस जनादेश के बाद आपलोगों ने इस पर मंथन किया होगा. आम आदमी पार्टी ने इस जनादेश से क्या-क्या प्रमुख सबक लिये हैं और उनके आधार पर पार्टी आगे अपनी रणनीति में किस तरह की तब्दीली करने जा रही है?

योगेन्द्र – अभी हमारी बैठकों का सिलसिला पूरा नहीं हुआ है और हमारी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होनी अभी बाकी है. इसलिए मैं अपनी समझ के बारे में ज्यादा कह पाऊंगा, पार्टी की सामूहिक समझ के बारे में अभी ज्यादा नहीं कह पाऊंगा|

मुङो लगता है कि हमारे लिए बड़ा सबक यह है कि लोग हमारी ईमानदारी पर तो भरोसा करते हैं, लेकिन हमारी समझदारी के बारे में अभी आश्वस्त नहीं हैं. हमें लोगों के बीच यह साबित करना है कि हम सरकार बनाने और चलाने के बारे में गंभीर हैं. हममें सरकार चलाने की काबिलियत है और हम रोजमर्रा के मुद्दों को हल करने के लिए धैर्य के साथ काम कर सकते हैं|

दूसरा सबक यह है कि पोलिंग बूथ के स्तर पर संगठन बना कर पोलिंग बूथ मैनेजमेंट किये बिना बड़ी पार्टियों के मुकाबले में चुनाव लड़ना और जीतना संभव नहीं है|

तीसरा सबक कह लीजिये या चुनौती, बड़े मीडिया और बड़ी पूंजी का जो सम्मिलित हमला है, उसके सामने टिकना आसान काम नहीं है. इस बार के चुनाव में जिस तरह से इस देश का बड़ा पूंजीपति वर्ग और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा नरेंद्र मोदी के प्रचार-प्रसार में लग गया, उसके सामने खड़ा होने की रणनीति अभी हमारे पास नहीं है. इसकी रणनीति हमें बनानी पड़ेगी|

इसका मतलब है कि आम आदमी के लिए आगे का रास्ता है संगठन का निर्माण करना. हमें नीचे से ऊपर तक, यानी पोलिंग बूथों से लेकर संसदीय क्षेत्रों तक, राज्यों से राष्ट्र स्तर तक अपना संगठन बनाना होगा और आनेवाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से जनता को समझाना होगा कि हम गंभीर और सफल सरकार बनाने में सक्षम हैं. यह काम असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए बहुत धीरज की जरूरत है|

रंजन – एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक से एक संसद सदस्य बनने की दिशा में आपके द्वारा उठाये गये कदम का एक उम्मीदवार के रूप में व्यक्तिगत अनुभव कैसा रहा और इससे आपको क्या-क्या नयी चीजें सीखने को मिलीं?

योगेन्द्र – मेरे लिए पूर्णकालिक राजनीति में आना उतना बड़ा बदलाव नहीं था, जितना बाहर से दिखाई दे रहा था. पिछले तीन दशकों से मैं देश के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूं, देश भर की खाक छानता रहा हूं, तमाम जनांदोलनों का हमसफर रहा हूं. इसलिए मेरे लिए राजनीति में या जमीन पर काम करना उतनी नयी चीज नहीं थी. लेकिन फिर भी बदलाव तो था और बहुत बड़ा बदलाव था. खास तौर पर जमीन पर चुनाव लड़ना और जीतने के इरादे से चुनाव लड़ना एकदम नया अनुभव था. इसने मुङो बहुत कुछ सिखाया. पहला तो यह सीखा कि मैं राजनीति के बारे में कितना कम जानता हूं. दुनिया मुङो विशेषज्ञ होने का तगमा जरूर देती रही है, लेकिन सच बात यह है कि राजनीति का वह किताबी ज्ञान धरातल पर चुनाव लड़ने के वक्त बहुत काम नहीं आया|

दूसरा यह कि जिस इलाके को मैं अपनी मातृभूमि और कर्मभूमि मानता रहा हूं, उस इलाके को भी मैं कितना कम जानता हूं. मेरे लोकसभा क्षेत्र के कितने गांव, इलाके, क्षेत्र ऐसे थे, जिन्हें मैंने कभी देखा भी नहीं था, जिनके दुख-तकलीफ को मैं समझता भी नहीं था. इसलिए चुनाव में असफल होने पर पहला विचार मेरे मन में यही आया कि शायद अभी मैं इसके काबिल ही नहीं था. मुङो तो अभी अपने इलाके के बारे में बहुत कुछ जानना है, समझना है|

तीसरा, कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए. कुछ इस किस्म के अनर्गल और व्यक्तिगत आरोप लगे, जो तीखे तो थे ही, बहुत छिछले भी थे और मेरी चमड़ी अभी इतनी मोटी नहीं है कि इन बातों का कोई असर नहीं पड़े. जाहिर है, दिल को चोट भी पहुंची और मैं अभी समझ नहीं पाया हूं कि उस किस्म की घटिया हरकतों से कैसे निपटा जाये, जिससे मानसिक द्वेष न हो|

लेकिन सबसे बड़ा अनुभव यह रहा कि आम लोगों का इतना प्यार मिला, जितना पहले न तो कभी मुङो मिला था और न ही जिसके मैं काबिल हूं. केवल अपने गांव के इर्द-गिर्द नहीं, केवल स्वजातीय लोगों में नहीं, बल्कि तमाम इलाकों में वोट मिला या न मिला हो, लेकिन मुङो लोगों का भरपूर स्नेह मिला. क्षेत्र के भीतर से और बाहर से इतने सारे कार्यकर्ताओं ने खुद आकर धन दिया, ऊर्जा दी और इस चुनाव अभियान को अपना अभियान बना दिया|

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मई 18, 2014

हाथी-घोड़ा-पालकी : कहानी भाजपा की जीत, और कांग्रेस के Fall की!

कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण की। जनता भी कभी छप्पर फाड़ कर देती है। पहली बार भाजपा को अपने बूते पूर्ण बहुमत मिला है। और कांग्रेस को अपूर्व विमत। पंद्रह साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं। पार्टी के इतिहास में उसकी वह न्यूनतम उपलब्धि थी। इस दफा, जब चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में रही, कांग्रेस को 43 सीटें मिली हैं। यारो, कैसा गिरने में गिरना है!

भाजपा ने राजग गठबंधन में चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने राजग की 336 सीटों में भाजपा को 282 सीटें दे दी हैं। यानी अब सरकार चलाने को गठबंधन की बैसाखी की जरूरत नहीं, न काम करने या न करने के पीछे गठबंधन को जिम्मेदार ठहराने के बहाने ढूंढ़ने की गुंजाइश। पिछले पच्चीस बरसों में सबसे ज्यादा 244 सीटें कांग्रेस को मिली थीं, 1991 में। खरीदफरोख्त के बाद गठबंधन सरकार बनी, घोटाले हुए। फिर गठबंधन का युग चल निकला। मनमोहन सिंह जैसे भले मगर नाकारा प्रधानमंत्री की नाक नीचे विराट घोटाले हुए , ठीकरा फिर गठबंधन के मत्थे फोड़ा गया। क्या इसी सब के चलते जनता जनार्दन ने नरेंद्र मोदी की ‘अच्छे’ दिनों या सुशासन की पुकार सुनी। और उन्हें प्रचण्ड बहुमत अता फरमाया है?

हम जानते हैं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संदेह का लाभ देते हुए जनता ने पांच साल पहले दुबारा चुना था। एक भले और अर्थशास्त्र के विद्वान प्रधानमंत्री को पूरे दस बरस राज करने का मौका मिला। लेकिन प्रगति की जगह बंटाढार हुआ। भले ही क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो की तर्ज पर मनमोहन सिंह ने कहा कि भविष्य में इतिहास उन्हें सही समझेगा। उनके एक सलाहकार ने चुनाव के बीच मुनादी की कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई है, उतनी मानव जाति के इतिहास में किसी देश में कभी न हुई होगी। लेकिन ऐसे दावे इतिहास की प्रविष्टियों से अर्थवत्ता नहीं पाते। लोग देखते हैं कि उनके दैनंदिन जीवन में क्या प्रगति हुई है। देश की अर्थव्यवस्था कहां पहुंची है। आटे-दाल का भाव कम हुआ है या ज्यादा। रुपया कितना चढ़ा या लुढ़का है। देश में हिंसा बढ़ी है या घटी है। खेती, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, कानून-व्यवस्था, पर्यावरण या हवा-पानी आदि जीवन से सीधे जुड़े क्षेत्रों में हम कितना आगे बढ़े हैं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों का सचमुच कितना उद्धार हुआ है। दूसरे देशों की नजरों में हमारी साख ऊंची हुई है या गिरी है।

कहना न होगा, इन सवालों के जवाब में हाथ मलता भारतवासी चुनाव नजदीक आते-न-आते अपने सबसे ताकतवर हथियार- मताधिकार- की धार तेज करने में लग गया था। जिस कारपोरेट जगत यानी बड़ी पूंजी के जमावड़े ने कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह उसे उखाड़ फेंकने में जुट गया। गुजरात में विकास के नारे उछालने वाले नरेंद्र मोदी से उसका इश्क पहले से परवान पर था। हालांकि कांग्रेस ने चुनिंदा मंत्री तक कारपोरेट घरानों की मरजी मुताबिक नियुक्त किए थे। राडिया टेप याद करें तो यह दास्तान याद आएगी। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का बेदाग ‘परसोना’ थे, मगर कारपोरेट को उनसे बाजार को संभाल लेने की उम्मीदें थीं। मोहभंग होने पर कमान उनके हाथ से खिंचने लगी। मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब के हवाले खयाल करें तो वित्त मंत्री तक प्रधानमंत्री की जानकारी के बगैर तय होने लगे। खुद को सत्ता का निर्मोही जाहिर कर सोनिया गांधी ने आखिर मनमोहन सिंह को भोलेपन में आगे नहीं किया था। वे तन कर खड़े नहीं हो सकते थे। क्वात्रोकी की मुक्ति जैसे मामले तो बहुत मामूली थे। एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते जितने बड़े आर्थिक घोटाले सरकार में हुए , पहले कब हुए होंगे? मगर सोनिया-मनमोहन भी सब उद्यमियों की इच्छाएं पूरी न कर सके। नतीजतन ताकतवर कारपोरेट का नरेंद्र मोदी के पाले में जा खड़े होना कांग्रेस के लिए खतरे की खुली घंटी बन गया।

जो इस खेल को समझने से आंख चुराएगा, उसे सब मोदी का जलवा दिखाई देगा। ‘मोदी-मोदी’ या ‘हर-हर मोदी’ का रंग-रोगन बाद का है। इतना तो गाफिल भी कहता मिलेगा कि ऐसा खर्चीला चुनाव पहले नहीं देखा। पैसा पानी का तरह नहीं बहा, हवा की तरह उड़ा। सिर्फ इसलिए नहीं कि रोज के दो-तीन लंबे दौरों-सभाओं के बाद शाम को मोदी को अपने घर गांधीनगर लिवा लाने के लिए दो गुजराती उद्योगपतियों के तीन हवाई जहाज तैनात रहते थे। आधुनिक तकनीक वाले तमाम प्रचार माध्यमों और पेशेवर प्रतिभाओं की मदद से प्रधानमंत्री पद के दावेदार का सुनियोजित रूपक गढ़ा गया। मीडिया का एक हिस्सा मिलीभगत में अभियान का हिस्सा बन गया। साबुन-तेल के प्रचार की मानिंद मॉडलिंग करते ‘मोदीजी’ का रूपक गली-गली हर जुबान पर पहुंचाया गया। कोई अखबार, टीवी, रेडियो, सड़क, दीवार, यहां तक कि सोशल मीडिया पर बेनामी षड्यंत्रकारी भी खाली न रहे। जरा सोचें कि इतने संसाधनों, तैयारी के साथ प्रचार अभियान की कमान अगर सुषमा स्वराज के हाथ होती तब भी परिणाम क्या बहुत भिन्न होते?

पर प्रचार के ऊपर मोदी की ऊर्जा, और नाटकीय सही, वक्तृता अलबत्ता असरदार ज्यादा रही। चरमराई अर्थव्यवस्था, महंगाई, असंतुलित विकास, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को उन्होंने सबसे अहम मुद्दा बनाया। युवा वर्ग, खास कर नए मतदाता को रोजगार का झुनझुना थमाया। गुजरात का सच्चा-झूठा विकास का मिथक उनकी स्थायी टेक बन गया। आखिरी दौर में उन्होंने जातिवादी पत्ता भी चलाया, मुसलमान बस्तियों में घूमे, मुसलिम बुजुर्गों के पांव छुए। तूफानी दौरों में अपने सीमित या फिसलते ज्ञान (अंडमान में भगत सिंह, बिहार में तक्षशिला, गंगा किनारे सिकंदर, मौर्य नहीं गुप्त साम्राज्य के चंद्रगुप्त, श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अस्थियां आदि) के बावजूद कांग्रेस से ऊबे मतदाताओं में मोदी यह उम्मीद जगाने में सफल रहे कि वे परिवर्तन ला सकते हैं। प्रचार प्रबंधकों के गढ़े नारे और गाने (मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट… हम मोदीजी को लाने वाले हैं… अच्छे दिन आने वाले हैं!)  पुरउम्मीद और आहत मतदाता के लिए मरहम का काम करते दिखाई दिए। अनेक राजनीतिक दल हाशिए पर जाने लगे। उत्तर प्रदेश में बसपा पता नहीं कहां धंस गई। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों ने अपनी जमीन खो दी। कारण कांग्रेस वाला ही था। लोग उन्हें आजमा चुके थे और मोहभंग से त्रस्त थे।

इसे प्रचार अभियान का एक अंग कहना ही मुनासिब होगा कि कांग्रेस केंद्रित गठबंधन से उकताए लोगों की परिवर्तन की चाह को चौतरफा ‘मोदी लहर’ के रूप में देखा गया। सच्चाई यह है कि ‘मोदी लहर’ के प्रादुर्भाव के बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे। लोगों ने पंद्रह साल पुरानी कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद हार गईं। चुनाव से पहले रोहिणी में नरेंद्र मोदी विराट जनसभा में अपनी रणभेरी बजा गए थे। लेकिन लोगों ने दुबले-पतले मफलर-शुदा अरविंद केजरीवाल की नई-नवेली आम आदमी पार्टी को ज्यादा उम्मीद से देखा।

दिल्ली की सफलता ने केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर पंख पसारने को प्रेरित किया। पर यह फैसला जल्दबाजी का साबित हुआ। फिर बड़े पूंजीपतियों पर हाथ डालते हुए केजरीवाल ने उनको मोदी के हक में पूरी ताकत से एकजुट होने को ही प्रेरित किया। बहरहाल, केजरीवाल पार्टी से ज्यादा एक विचार के रूप में सामने आए थे। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और राहुल गांधी के साथ वे ही केंद्र में नजर आए। जीते ज्यादा नहीं, पर कई जगह उनके उम्मीदवार पार्टी की पहचान बनाने में सफल रहे। मतों का अहम हिस्सा उनकी झोली में भी आया है। दिल्ली में उनके मतों का प्रतिशत बढ़ा है। खुद नरेंद्र मोदी को बनारस में केजरीवाल ने नाकों चने चबाने वाली टक्कर दी। एक नई पार्टी के लिए अपनी पहचान को इतने कम समय में इतना विस्तार देना मामूली बात नहीं। हैरानी नहीं होनी चाहिए जो आने वाले दिनों में मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, करुणानिधि आदि दिग्गज नेताओं के बरक्स उनकी पहचान और पुख्ता हो।

इस घटाटोप में कांग्रेस के खेवनहार बनने वाले राहुल गांधी तो पार्टी के लिए बोझ ही साबित हुए हैं। वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने, चुनाव समिति की कमान भी संभाली। वे पार्टी में साफ छवि के उम्मीदवारों के साथ नई बयार लाना चाहते थे। पर खूसट नेताओं के सामने उनकी शायद ज्यादा न चली। मोदी से कम, पर खर्चीले चुनाव प्रचार को निकले। भाषणों में उनके पास ठोस मुद्दे न थे। पार्टी के पुराने मुसलिम-आदिवासी ‘वोट बैंक’ में भी पराए सेंध मार गए। खुद के चुनाव क्षेत्र में बेड़ा पार लगाने के लिए उन्हें छोटी बहन- और पूर्णकालिक राजनीति में अनिच्छुक- प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर देखना पड़ा। ऊंच-नीच की राजनीति के जुमले छेड़ प्रियंका खबरों में रहीं, पर दोनों मिलकर भी मतदाताओं में एक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर सके।

इस सब के बीच यह घड़ी अंतत: नरेंद्र मोदी को शिखर पर ले आई है। इसके श्रेय पर भाजपा का अपना दावा भले हो। पर पुरजोर दावा संघ ने किया है, जिसके स्वयंसेवकों ने पहली बार इस कदर जी-जान एक की। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी। वजह साफ थी कि पहली बार उनके भरोसे का स्वयंसेवक (वाजपेयी पर इतना भरोसा संघ बाद में कब करता था!) देश की कमान का दावेदार था, विशुद्ध रूप से संघ परिवार के काडर के भरोसे। इसी ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपने ही लोगों के बीच इतना शक्तिमान बनाया कि आडवाणी घर जा बैठे, मुरली मनोहर जोशी की सीट मोदी ने हथिया ली, सुषमा स्वराज राष्ट्रीय पटल से अपने चुनाव क्षेत्र भेज दी गईं, वेंकैया नायडू अंतर्धान मुद्रा में चले गए, जसवंत सिंह पार्टी से बाहर कर दिए गए। गडकरी-जेटली रास्ते पर चले। राजनाथ सिंह ने संघ की बंसी के सुर मोदी के इशारों के अनुरूप रखे। गुजरात के सबसे विवादास्पद नेता अमित शाह ‘साहेब’ की कृपा से और सबों से आगे जा बैठे। इसी के चलते मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता के रूप में सामने आए हैं। यह मोदी की जीत है, मगर कहीं गहरे पार्टी की हार है।

मोदी का मानस कट्टर पहचान देता आया है। सेकुलर विचार उनके घेरे में शायद ही किसी को भाता हो। गोधरा के बाद का खूनखराबा अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। ‘मियां मुशर्रफ’ जैसे संबोधनों की शैली और राममंदिर उनकी विचार-पद्धति का अंग माने जाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने आप को संभाला है। क्या इनसे वे अपने आपको हमेशा के लिए ऊंचा उठा पाएंगे? बाजार को भी उनसे बड़ी आशाएं हैं। मनमोहन सिंह सरकार ढीली थी। दो-दो मंत्री बदलकर भी अंबानी को गैस के मनचाहे दाम न दे सकी। क्या मोदी देंगे? गैस महज एक कसौटी है। कारपोरेट की तो बहुत बड़ी झोली उनके सामने पसरी है।

लेकिन उससे बड़ा फलक जनता की उम्मीदों का है। महंगाई से लोग त्रस्त हैं। पड़ोसियों से तनाव के रिश्ते हैं। आतंकवाद रह-रह कर सिर उठाता है। विभिन्न समुदायों में आपसी सौहार्द वक्त की जरूरत है। इन सब मामलों में कुछ को चाहे मोदी से बहुत कम आशाएं हों, पर देश को उन्होंने बड़े सपनों में बांधा है। पर लोगों को बुलेट ट्रेन से ज्यादा अमन-चैन का जीवन यानी सांप्रदायिक सौहार्द चाहिए। आजाद भारत में अल्पसंख्यक भयभीत होकर कैसे जी पाएंगे। जीत के गाजे-बाजे और हाथी-घोड़ा-पालकी के बीच लाख टके का सवाल यह है कि क्या  इस विराट विजय के बाद मोदी अपना मानस बदलने को तैयार हैं? कमजोर विपक्षके बीच यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है। लोग उनसे रामराज्य यानी सुशासन की उम्मीद रखते हैं। मगर माईबाप संघ अभी से उन्हें राममंदिर और ऐसे ही संकीर्ण लक्ष्यों की याद दिलाने लगा है। देखते हैं देश को रामराज्य हासिल होता है या राममंदिर। या दोनों नहीं।

साभार : श्री ओम थानवी, संपादक – जनसत्ता

मई 5, 2014

मोदी और दलित : प्रो. तुलसी राम

 Modi IT Senaसैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- ‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।

मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।

गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है।

इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है।

मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं।

सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया।

नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।

इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।

Modi media ambaniइस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है।

गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- ‘भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस

हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है।उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।

इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा।

इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी।ModiVsUPA

मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है।

अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए।

उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं।

इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

प्रसिद्द  दलित चिंतक प्रो. तुलसी राम, अपनी आत्मकथा “मुर्दहिया” के कारण भी सर्वत्र जाने जाते हैं|

साभार : जनसत्ता (4 मई, 2014)

अप्रैल 12, 2014

अरविंद केजरीवाल का मूल्याँकन सीटों से नहीं (रवीश कुमार – NDTV)

AKej@homeहार जायें या हवा हो जायें या जीत जायें । इन तीनों स्थितियों को छोड़ दें तो अरविंद केजरीवाल ने राजनीति को बदलने का साहसिक प्रयास तो किया ही । हममें से कई राजनीतिक व्यवस्था को लेकर मलाल करते रहते हैं लेकिन अरविंद ने कुछ कर के देखने का प्रयास किया । कुछ हज़ार लोगों को प्रेरित कर दिया कि राजनीति को बदलने की पहली शर्त होती है इरादे की ईमानदारी । अरविंद ने जमकर चुनाव लड़ा । उनका साथ देने के लिए कई लोग विदेश से आए और जो नहीं आ पाये वो इस बदलाव पर नज़रें गड़ाए रहें । आज सुबह जब मैं फ़ेसबुक पर स्टेटस लिख रहा था तब अमरीका से किन्हीं कृति का इनबाक्स में मैसेज आया । पहली बार बात हो रही थी । कृति ने कहा कि वे जाग रही हैं । इम्तहान की तरह दिल धड़क रहा है । ऐसे कई लोगों के संपर्क में मैं भी आया ।

अरविंद ने बड़ी संख्या में युवाओं को राजनीति से उन पैमानों पर उम्मीद करने का सपना दिखाया जो शायद पुराने स्थापित दलों में संभव नहीं है । ये राजनीतिक तत्व कांग्रेस बीजेपी में भी जाकर अच्छा ही करेंगे । कांग्रेस और बीजेपी को भी आगे जाकर समृद्ध करेंगे । कौन नहीं चाहता कि ये दल भी बेहतर हों । मैं कई लोगों को जानता हूँ जो अच्छे हैं और इन दो दलों में रहते हुए भी अच्छी राजनीति करते हैं । ज़रूरी है कि आप राजनीति में जायें । राजनीति में उच्चतम नैतिकता कभी नहीं हो सकती है मगर अच्छे नेता ज़रूर हो सकते हैं ।
एक्ज़िट पोल में आम आदमी पार्टी को सीटें मिल रहीं हैं । लेकिन आम आदमी पार्टी चुनाव के बाद ख़त्म भी हो गई तब भी समाज का यह नया राजनीतिक संस्करण राजनीति को जीवंत बनाए रखेगा । क्या कांग्रेस बीजेपी चुनाव हार कर समाप्त हो जाती है ? नहीं । वो बदल कर सुधर कर वापस आ जाती है । अरविंद से पहले भी कई लोगों ने ऐसा प्रयास किया । जेपी भी हार गए थे । बाद में कुछ आई आई टी के छात्र तो कुछ सेवानिवृत्त के बाद जवान हुए दीवानों ने भी किया है । हममें से कइयों को इसी दिल्ली में वोट देने के लिए घर से निकलने के बारे में सोचना पड़ता है लेकिन अरविंद की टोली ने सोचने से आगे जाकर किया है ।  वैसे दिल्ली इस बार निकली है । जमकर वोट दिया है सबने ।
राजनीति में उतर कर आप राजनीतिक हो ही जाते हैं । अरविंद बार बार दावा करते हैं कि वे नहीं है । शायद तभी मतदान से पहले कह देते हैं कि किसी को भी वोट दीजिये मगर वोट दीजिये । तब भी मानता हूँ कि अरविंद नेता हो गए हैं । आज के दिन बीजेपी और कांग्रेस के विज्ञापन दो बड़े अंग्रेज़ी दैनिक में आए हैं आम आदमी पार्टी का कोई विज्ञापन नहीं आया है । अरविंद के कई क़दमों की आलोचना भी हुई, शक भी हुए और सवाल भी उठे । उनके नेतृत्व की शैली पर सवाल उठे । यही तो राजनीति का इम्तहान है । आपको मुफ़्त में सहानुभूति नहीं मिलती है । कांग्रेस बीजेपी से अलग जाकर एक नया प्रयास करना तब जब लग रहा था या ऐसा कहा जा रहा था कि अरविंद लोकपाल के बहाने बीजेपी के इशारे पर हैं तो कभी दस जनपथ के इशारे पर मनमोहन सिंह को निशाना बना रहे हैं । मगर अरविंद ने अलग रास्ता चुना । जहाँ हार उनके ख़त्म होने का एलान करेगी या मज़ाक़ का पात्र बना देगी मगर अरविंद की जीत हार की जीत होगी । वो जितना जीतेंगे उनकी जीत दुगनी मानी जायेगी । उन्होंने प्रयास तो किया । कई लोग बार बार पूछते रहे कि बंदा ईमानदार तो है । यही लोग लोक सभा में भी इसी सख़्ती से सवाल करेंगे इस पर शक करने की कोई वजह नहीं है । अरविंद ने उन मतदाताओं को भी एक छोटा सा मैदान दिया जो कांग्रेस बीजेपी के बीच करवट बदल बदल कर थक गए थे ।
इसलिए मेरी नज़र में अरविंद का मूल्याँकन सीटों की संख्या से नहीं होना चाहिए । तब भी नहीं जब अरविंद की पार्टी धूल में मिल जाएगी और तब भी नहीं जब अरविंद की पार्टी आँधी बन जाएगी । इस बंदे ने दो दलों से लोहा लिया और राजनीति में कुछ नए सवाल उठा दिये जो कई सालों से उठने बंद हो गए थे । राजनीति में एक साल कम वक्त होता है मगर जब कोई नेता बन जाए तो उसे दूर से परखना चाहिए । अरविंद को हरा कर न कांग्रेस जीतेगी न बीजेपी । तब आप भी दबी ज़ुबान में कहेंगे कि राजनीति में सिर्फ ईमानदार होना काफी नहीं है । यही आपकी हार होगी ।
जनता के लिए ईमानदारी के कई पैमाने होते हैं ।
इस दिल्ली में जमकर शराब बंट गई मगर सुपर पावर इंडिया की चाहत रखने वाले मिडिल क्लास ने उफ्फ तक नहीं की । न नमो फ़ैन्स ने और न राहुल फ़ैन्स ने । क्या यह संकेत काफी नहीं है कि अरविंद की जीत का इंतज़ार कौन कर रहा है । हार का इंतज़ार करने वाले कौन लोग हैं ? वो जो जश्न मनाना चाहते हैं कि राजनीति तो ऐसे ही रहेगी । औकात है तो ट्राई कर लो ।
कम से कम अरविंद ने ट्राई तो किया ।
शाबाश अरविंद ।
यह शाबाशी परमानेंट नहीं है । अभी तक किए गए प्रयासों के लिए है । अच्छा किया आज मतदान के बाद अरविंद विपासना के लिए चले गए । मन के साथ रहेंगे तो मन का साथ देंगे।
साभार कस्बा
जून 6, 2011

बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमों ने भारत को हलचल से भर दिया है। कहीं कोलाहल है तो कहीं चुपचाप देखा जा रहा है कि आगे क्या होगा। कल, विजय, अशोक, हरि और सुनील, चार बुजुर्ग मित्रों की रोज़ाना होने वाली बैठक एक बहस-गोष्ठी में बदल गयी। बहुत समय बाद चारों के दिमाग और ज़ुबान दोनों ही राजनीतिक तेवरों से ओत-प्रोत हो रहे थे।

आम तौर पर चारों सुबह दस बजे किसी भी एक के घर मिल बैठ दुनिया जहान की बातें किया करते हैं। दोस्ताना माहौल में वक्त्त अच्छा बीत जाता है। सुख-दुख की बातें हो जाती हैं।

मजमा विजय के घर पर लगा। चारों के हाथों में अलग-अलग अखबार थे।

विजय बाबू ने गहरी साँस भ्रने के बाद गम्भीर स्वर में कहा,” घटनाक्रमों ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सारे मामले के बहुत सारे पहलू उजागर हुये हैं”।

हरि – विजय जी, एक बात तो तय है कि अनशन को तोड़ने के लिये आधी रात को पुलिस बल से जैसी हिंसक कारवाही करवायी गयी है उस निर्णय ने जैसी किरकिरी कांग्रेस पार्टी और सरकार की की है, उसका कलंक आसानी से हटने वाला है नहीं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत का इससे अच्छा उदाहरण हो नहीं सकता।

सुनील – ये तो सही कहा आपने हरि भाई। पर विजय बाबू आप कुछ सवाल और पहलुओं की बात कर रहे थे। कुछ बताओ।

अशोक – हाँ पहले आप ही बताओ आपको क्या दिखता है इस मामले में?

विजय – पहली बात तो यही है कि बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के अनशन के समय से ही सार्वजनिक रुप से मीडिया को दिये साक्षात्कारों में बार-बार कह रहे थे कि वे जून के पहले हफ्ते से अपने एक लाख समर्थकों के साथ भ्रष्टाचार और काले धन की विदेश से वापसी जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिये सरकार पर उचित कार्यवाही करने के लिये दबाव बनाने के लिये अनशन पर बैठेंगे। सरकार कहती है कि अनुमति सिर्फ योग-शिविर लगाने के लिये ली गयी थी। अगर ऐसा था तो दिल्ली में जब रामलीला मैदान में शिविर लगाये जा रहे थे तभी सरकार ने उचित कदम क्यों नहीं उठाये? बाबा रामदेव के दिल्ली पहुँचने के बाद भी उनसे स्पष्ट क्यों नहीं कहा कि शिविर की अनुमति के साथ वे शांतिपूर्ण ढ़ंग से भी वहाँ अनशन पर नहीं बैठ सकते।

हरि – सही कह रहे हो विजय बाबू, जब बाबा रामदेव और सरकार दोनों को पता था कि अनुमति सिर्फ योग शिविर लगाने की ली गयी है और सरकार अनशन के दूसरे या तीसरे दिन कानूनी कार्यवाही कर सकती है तो क्यों हजारों लोगों की जान को जोखिम में डाला गया? अनशन से पहले दिन टीवी पर ऐसी बातें भी उठ रही थीं कि रामलीला मैदान में योग शिविर ही रहेगा और अनशन जंतर-मंतर पर किया जायेगा। सरकार के चार बड़ी मंत्रियों ने हवाई-अड्डे पर ही बाबा रामदेव को पकड़ कर क्या इस बात की संभावना उनके दिमाग से हटा दी कि जंतर-मंतर पर अलग से अनशन करने की जरुरत नहीं है और सरकार से बातचीत से उचित हल निकल आयेगा, और बाबा रामदेव जंतर मंतर को भूलकर रामलीला मैदान में ही अनशन की लीला दिखाने लगे और उन्हे लगता था कि सब कुछ ठीक पटरी पर चल रहा है और सब ऐसे ही निबट जायेगा? हमें तो घपला लगता है मामले में।

सुनील – जब अनशन की पहली ही शाम आते आते सरकार और बाबा रामदेव में वार्ता टूट गयी तो क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता था कि अनशन स्थल पर बैठे हजारों लोगों की जान की सलामती की फिक्र करती? सरकार का बाबा रामदेव से कुछ भी रिश्ता हो, कोई भी सरकार हजारों लोगों की भीड़ की जान के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है? बहुत शोर मचाकर कहा जा रहा है कि सांसद संवैधानिक रुप से जनता द्वारा चुने गये हैं तो ऐसे समय में संविधान की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाते हुये इन्ही सांसदों से बनी सरकार ने हजारों लोगों की जान जोखिम में डालते हुये पुलिस को आधी रात को लोगों को वहाँ से हटाने के लिये भेजा? कैसे पुलिस को आदेश देने वाले मंत्रियों ने नहीं सोचा कि अगर पुलिस की लाठियों से लोग बच भी गये तो भगदड़ में महिलायें, बच्चे और वृद्ध अपनी जान बचा पायेंगे या घायल होने से बच पायेंगे? सरकार अनशन पर बैठे लोगों को दिन में नोटिस देकर कुछ घंटे का समय नहीं दे सकती थी जिससे लोगों को पता चल जाये कि सरकार की मंशा अब रामलीला मैदान से लोगों को हटाने की है। अगर अनशन अवैध था तो कोर्ट से नोटिस लाया जा सकता था। पर किसी तरह से भी संविधान का सम्मान न करते हुये लोगों को सबक सिखाने के लिये पुलिसिया कार्यवाही की गयी।

अशोक – अरे सरकार की बदमाशी है। यह सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास दिखावा है। इन्होने ही तो इमेरजैंसी लगवायी थी, तभी भाजपा राजघाट पर अनशन में बैठ गयी है इनकी करतूतों के विरोध में।

विजय – अशोक बाबू भाजपा भी दूध की धुली नहीं है। राजघाट में कब से उसकी श्रद्धा हो गयी? कल्याण सरकार के दिन भूल गये क्या? कैसे गांधी को पानी पी पी कोसा जाता था। गाँधी से इनका क्या लेना देना। बल्कि किसी भी दल का कुछ लेना देना नहीं है गाँधी से। उन्हे तो अलग ही रखें।

सुनील – कांग्रेस नियंत्रित सप्रंग सरकार की दूसरी पारी के आरम्भ से ही भाजपा निष्क्रिय स्थिति में पड़ी हुयी थी। उसे राजनीतिक जमीन नहीं मिल रही थी। पांच साल का इंतजार उसे और निष्क्रिय बना देता। कांग्रेस की सरकार ने भाजपा में जान डाल दी। उसे मुकाबले में खड़ा कर दिया। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को संघ की ओर धकेल दिया। सबको लगता था कि कांग्रेस नियंत्रित सरकार की दूसरी पारी आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और कहीं कई अड़चन नहीं आयेगी। ताजे घटनाक्रमों ने दिखा दिया है कि सरकार की आगे की राह मुश्किल हैं। सरदार जी ने माथे पर कलंक लगवा ही लिया। इतिहास तो उन्हे ऐसे प्रधानमंत्री के रुप में याद करेगा जिसकी सरकार ने रात में सोते हुये स्त्री-बच्चों, बूढ़ों और अनशनकारियों पर लाठियाँ बरसवायीं। उन्हे घायल किया और उनकी जान को जोखिम में डाला।

हरि- कांग्रेस की सरकार ने तो भाजपा को थाली में सजाकर मौका दे दिया है। इससे ज्यादा खुश भाजपा और अन्य विपक्षी दल कभी भी नहीं हुये होंगे, पिछले पांच-सात साल में।

अशोक- अजी भाजपा निष्क्रिय नहीं थी। उसी ने मुद्दा उठाया था काले धन की वापसी का, भ्रष्टाचार के खात्मे का।

विजय- अशोक जी भाजपा की ईमानदारी तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के मामलों में चमक ही रही है। गुजरात के मामले में उसकी नैतिकता भी जगजाहिर रही है!

सुनील – भाजपा की बात छोड़ो। मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार बार उठ रहा है – क्या शुरु में बाबा रामदेव से मीठी मीठी बातें करने के कुछ घंटो बाद सरकार को वस्तुस्थिति का एहसास हुआ कि अगर बाबा रामदेव के अनशन के कारण उनकी माँगें मानी गयीं तो यह बाबा रामदेव की जीत कहलायेगी और सरकार द्वारा उठाये गये कदम मजबूरी में उठाये गये कदम कहलायेंगे और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ नहीं मिल पायेगा।

हरि – सरकार के किन्ही भी सलाहकारों ने ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही करने की सलाह दी हो और उस पर दबाव डाला हो, क्या कांग्रेस को इस घटना के बाद किसी किस्म का राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? इसमें पूरा संदेह है।

विजय- कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस मायावाती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल में उ.प्र पुलिस द्वारा किसानों पर अत्याचार कराने को लेकर संघर्षरत थी। अब उसकी खुद की सरकार ने वैसा ही कर दिया है। कांग्रेस के पास अब नैतिक चेहरा है ही नहीं किसी अन्य सरकार द्बारा पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही कराये जाने की निंदा करने का। भारत की जनता हमेशा से ही शोषित के पक्ष में रही है और अब पुराना समय नहीं रहा जब किसी तरह की कोई भी खबर दबायी जा सकती थी। इस इलेक्ट्रानिक युग में कांग्रेस ने ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है और इसका राजनीतिक खामियाजा या तो अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देगा या फिर उसकी सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि वह बड़ी संख्या में दूसरे दलों पर निर्भर हो जाये।

सुनील- देश अगली बार फिर से कई दलों की मिली जुली सरकार के चंगुल में फंसता दिखायी दे रहा है। कांग्रेस का उ.प्र अभियान भी गड्ढ़े में पड़ा समझिये। दुख की बात है कि दो दशकों से ज्यादा समय से उ.प्र क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों द्वारा संचालित हो रहा है। विकास कार्य लगभग ठप रहे हैं। वैसे भी पाँच नहीं तो दस साल में सरकारें बदल जानी चाहियें। तभी संतुलन ठीक बना रहता है।

अशोक – कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव के अनशन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है। अगर ऐसा है भी तो जब हवाईअड्डे पर सरकार के बड़े मंत्री उनकी अगुवाई करने गये थे तब भी उन्हे इस बात का पता होगा। अगर पता था और उन्हे इस बात से परहेज था तो उन्होने अनशन को शुरु ही क्यों होने दिया?

सुनील- अशोक जी आपकी इस बात से सहमति है। अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो इस संगठन को कानून का सहारा लेकर प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो कांग्रेस और इसके द्वारा नियंत्रित सरकार आर.एस.एस द्वारा समर्थित और नियंत्रित भाजपा के सांसदों से परहेज क्यों नहीं करती? उन्हे संसद से बाहर का रास्ता दिखा दे। उन्हे किसी भी कमेटी में न रखे। आखिरकार भाजपा को तो आर.एस.एस का पूरा समर्थन है। ऐसा कैसी हो सकता है कि भाजपा के सांसद तो स्वीकार्य हैं पर जो सांसद नहीं हैं और जिन पर शक है कि आर.एस.एस उन्हे समर्थन देता है, वे स्वीकार्य नहीं हैं।

विजय- सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे, जो भारत को खाये जा रहे हैं, को लेकर जनता को ठोस हल चाहिये और उसे इस बात से क्या मतलब कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये जा रहे प्रयास को आर.एस.एस समर्थन दे रहा है या कोई अन्य संगठन।

हरि- अरे अगर ऐसा है तो आर.एस.एस को देशद्रोही साबित करके प्रतिबंधित कर दो, कानूनी राह पर चला दो और अगर ऐसा साबित हो जाता है तो जनता चूँ भी नहीं करेगी।

विजय- मेरी समझ में तो ऐसा पैरानोइया आता नहीं। आप ये जानो कि जब भाजपा राजनीतिक दौर के शिखर पर थी तब भी उसे केवल 26% मतों का समर्थन हासिल था और जो अब घटकर 20% के आसपास आ गया है। देश की कुल आबादी का 75-80% हिन्दुओं को माना जा सकता है तो ऐसा तो है नहीं कि सभी हिन्दु भाजपा को समर्थन देते हैं और मत देते हैं। फिर क्यों इतनी हायतौबा, क्यों इतना भय? यह देश मुख्यतः सेकुलर रहा है और रहेगा।

…जारी…

बतकही 2 -बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस

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