Archive for दिसम्बर, 2013

दिसम्बर 31, 2013

16 दिसम्बर की सर्द रात…

oldman-001बर्फ गिरती है हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में, और दांत किटकिटाने लगते हैं दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के इलाके में रहने वाले जीवों के| इस बरस भी दिसम्बर की दस तारीख क्या निकली सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया था| मजबूरी न हो तो कौन सर्दी की रातों में घर की नर्म-गर्म शरण छोड़कर बाहर सडकों पर ख़ाक छानेगा?

‘समय से मीटिंग खत्म हो जाती तो घर पहुँच जाता’|  बस से उतर कर बस स्टॉप पर चढ़ते हुए अमित भुनभुनाया|

भूख अलग परेशान कर रही थी| उसने समय देखा|

साढ़े नौ बजने ही वाले थे| दुकानदार दुकानें बंद कर अपने अपने घर जाने लगे थे| कुछ ही मिनटों में बस स्टॉप सुनसान लगने लगा| अमित को एहसास हुआ कि वह अकेला ही बस स्टॉप पर मौजूद था| यही तो वक्त रहा होगा पिछले बरस की 16 दिसंबर की रात जब ऐसे ही एक बस स्टॉप से दामिनी और उसके मित्र को कुछ वहशी दरिंदों ने भुलावा देकर अपनी बस में बैठा लिया था और हैवानियत की सभी हदें पार करके एक खिल उठने की भरपूर संभावना लिए हुए जीवन को कुचल दिया था| उस रात भी वह सड़क पर ही था और उस हादसे की खबर उसे सुबह उठने पर टीवी पर आ रहे समाचारों के जरिये ही हुयी थी|

बस स्टॉप पर हल्की सी आहट से उसकी विचार श्रंखला टूटी| उसने देखा कोट पहने और मंकी कैप और मफलर में ढके हुए एक बुजुर्गवार बस स्टॉप पर आ पहुंचे थे| उन्होंने कोट की जेब से एक मोमबत्ती और माचिस की एक डिबिया निकाली और माचिस की एक तिल्ली निकाल कर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करने लगे, पर हवा चलने के कारण मोमबत्ती जल पाती उससे पहले ही माचिस की तिल्ली बुझ गई| उन्होंने दूसरी तिल्ली जलाई, इस बार मोमबत्ती जल गई और वे उसे बस स्टॉप के एक कोने पर लगाने लगे पर हवा ने इस बार भी काम दिखा दिया और मोमबत्ती बुझ गई|

अमित ने देखा कि कोई पिज्ज़ा खाकर उसका डिब्बा बस स्टॉप में लगी एकमात्र बैंच पर छोड़ गया था| उसने डिब्बा उठाकर बुजुर्गवार से कहा,” सर, इसकी ओट में जलाइए मोमबत्ती शायद काम बन जाए|”

कैप और मफलर से लगभग पूरी तरह ढके बुजुर्गवार के चेहरे से झांकती उनकी आँखों में मुस्कान की झलक सी दिखाई दी|

‘ले आओ बेटा इसे इधर ले आओ, यहाँ कोने में लगा देता हूँ’

अमित गत्ते का डिब्बा लेकर बस स्टॉप के एक कोने पर खड़े बुजुर्गवार के पास चला गया| उसने डिब्बे को खोल दिया और अब वह काफी बड़े हिस्से को गत्ते की दीवारों से रोक सकता था| उसे एहसास हो गया था कि बुजुर्गवार दामिनी की याद में मोमबत्ती जला रहे हैं|

बुजुर्गवार ने मोमबत्ती जलाई और एक कोने में थोड़ा मोम टपका कर फर्श पर टिका दी और आँखें बंद करके हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाने लगे| मिनट भर ऐसे ही प्रार्थना जैसा कुछ करके वे पीछे हटे तो अमित ने गत्ते के डिब्बे को मोमबत्ती के सामने इस तरह टिका दिया जिससे हवा का प्रवाह रोका जा सके|

बुजुर्गवार ने बैंच पर बैठ हल्की आवाज में कहा,” बहुत बुरा हुआ था उसके साथ”|

“जी”, अमित के मुँह से सिर्फ इतना ही निकल सका|

बुजुर्गवार कुछ देर सड़क पर दूर कुछ देर देखते रहे| अमित को अब तक बस आने का इन्तजार था पर अब बुजुर्गवार के आने से अकेलेपन का एहसास खत्म हो चला था|

‘बहुत साल हो गये…ऐसी ही एक रात थी…पर सर्दी अभी आने को थी| नवंबर के शुरुआती दिन होंगे|’

बुजुर्ग ने धीमे स्वर में मानों अपने आप से कहा हो| अमित ने उनकी तरफ ध्यान से देखा तो उन्हें कहीं खोया हुआ पाया| उसकी समझ में नहीं आया कि वे उससे कह रहे थे या खुद से ही बुदबुदा कर बात कर रहे थे|

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा,” तीसरी मंजिल पर स्थित घर में अकेला था, बीमार भी था,  रात का खाना खाकर बालकनी में टहल रहा था| रात के कोई साढ़े नौ बजे होंगे| कमरे और बालकनी की बत्तियाँ बंद करके घूम रहा था| नीचे कुछ दूर स्ट्रीट लाईट जल रही थी| एक कार आकर रुकी और उसमें से दो नौजवान उतरे| उन्होंने देखा उनकी पार्किंग की जगह कोई कार खड़ी हुयी थी| पार्किंग को लेकर झगडा होना लगभग रोजमर्रा की बात थी वहाँ| उन्होंने कुछ देर अपनी कार का हार्न बजाया जिससे कि जो भी वहाँ कार खड़ी करके गया हुआ है वह झाँक कर देख सके| पर कहीं कोई हलचल न देख कर उन्होंने वहाँ खड़ी कार को धक्का लगाकर हटाना चाहा पर उसमें हेण्ड ब्रेक लगा हुआ था| क्रोधित होकर उन्होंने आपस में कुछ बात की और एक नौजवान अपने घर में अंदर चला गया| वापिस आया तो उसके हाथ में गुप्ती, या बर्फ तोड़ने वाले सुए जैसा कुछ चमक रहा था| उन्होंने इधर उधर देखा, ऊपर आसपास के सब घरों की ओर देखा| अन्धेरा होने के कारण वे मुझे नहीं देख सकते थे पर मैं उनकी सभी हरकतें देख सकता था|’

अमित को उनके वृतांत में रस आने लगा था| वह उत्सुकता से उनकी बातें सुनने लगा| आखिर पार्किंग की समस्या तो शहर में ज्यों की त्यों बनी हुयी थी, बल्कि हालात पहले से बदतर ही हो रहे थे| स्कूटर खड़े करने वाले फ्लैटों में एक एक घर में रहने वाले लोग दो से चार कारें  रखने लगे थे|

‘एक युवक ने अपनी पार्किंग की जगह खड़ी कार की ड्राइविंग सीट की तरफ वाले दरवाजे में खिड़की के कांच के पास अपना हथियार घुसा दिया और कुछ पल बाद ही उसने कार का दरवाजा खोल दिया| उसने हेण्ड ब्रेक खोला और दोनों युवकों ने कार को आगे धकेल कर बाड़ के पास लगे पाइप से सटाकर खड़ा कर दिया और हेण्ड ब्रेक पहले की तरह लगा कर दरवाजा बंद कर दिया| एक युवक ने कार के दोनों साइड मिरर हाथ मारकर तोड़ दिए|  दूसरे युवक ने उस कार के पीछे अपनी कार पार्क कर दी| अब आगे वाली कार न पीछे निकल सकती थी और न ही आगे जा सकती थी| युवकों ने कार को अपनी कार और बाड़ के बीच ट्रैप कर दिया था|

दोनों युवक अपने घर के अंदर चले गये|

सब तरफ शान्ति थी| सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था| मैं भी घर में चला गया| टीवी देखने लगा| पर मन नीचे सड़क पर ही लगा हुआ था| किसकी कार होगी, कैसे निकालेगा? क्या इन् लोगों में झगडा होगा…जैसे प्रश्न दिमाग में उठ रहे थे| बीच बीच में बालकनी में जाकर नीचे झाँक लेता था| कार अभी भी सेंडविच बनी खड़ी थी| तकरीबन चालीस-पैंतालीस मिनट बाद बाहर गया तो देखा कि एक युवती उस कार के पास खड़ी इधर उधर देख रही थी| उसने देख ही लिया था कि उसकी कार के साइड मिरर तोड़ दिए गये थे और कार को खिसका कर आगे कर दिया गया था| ऐसा लगता था कि वह किसी से मिलने वहाँ आयी थी और खाली जगह देख कर कार यहाँ खड़ी कर गई थी| सड़क पर अब भी कोई नहीं था| लगभग निश्चित था कि जिस घर में वह मिलने आई थी वह उस ब्लॉक में न होकर पास वाले किसी ब्लॉक में था| तभी उसे छोड़ने कोई नहीं आया था, वह अकेली ही वहाँ आई होगी, अपने मेजबानों से उनके घर के बाहर ही विदा लेकर|

युवती ने अपनी कार के पीछे खड़ी कार का मुयायना करना शुरू किया| उसे पीछे वाले शीशे पर मकां नंबर वाला स्टीकर दिख गया होगा| उसने अपने पर्स से छोटी से टार्च निकाल कर उसे पढ़ा और इधर – उधर  मकानों के नंबर पढकर वह युवकों के घर की तरफ चल पड़ी|

मेरी बालकनी के एकदम नीचे ग्राउंड फ्लोर पर युवकों के घर का दरवाजा होने की वजह से मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था| पर दरवाजा खुलने और कुछ पल के बाद ऐसी अस्पष्ट आवाजें आईं जिससे लगा कि युवती और उन युवकों के बीच बहस जैसा कुछ घटित होता प्रतीत हो रहा था| कुछ पल ऐसी ही अस्पष्ट आवाजें आती रहीं और फिर दरवाजा बंद होने की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया| युवती वापिस अपनी कार के पास नहीं आई| मैं काफी देर वहाँ खड़ा रहा पर युवती को आते नहीं देखा|

एक घंटे बाद भी युवती की कार वहीं फंसी खड़ी थी| रात के लगभग बारह तक भी कार वहीं खड़ी थी| मैं टीवी देखते देखते किसी समय सो गया| सुबह पांच बजे नींद खुली तो सबसे पहले बालकनी में जाकर नीचे झांका तो देखा कार वहाँ नहीं थी| युवकों की कार भी वहाँ नहीं थी| मतलब वे भी या तो रात में ही या सुबह सुबह ही कहीं चले गये थे|  पर अगर युवकों ने बारह बजे के आसपास भी अगर युवती को कार निकालने दी होगी तब भी एक घंटे से ज्यादा समय वह उनके घर में उपस्थित रही होगी| मुझे ऐसा ख्याल आया कि युवती के साथ कुछ न कुछ गलत तो कल रात हुआ था|

दिन में नीचे सड़क पर गया तो ऐसे ही युवकों के घर की तरफ झाँक लिया पर वहाँ ताला लगा था| शाम को और फिर रात को भी उनकी कार नीचे नहीं दिखाई दी| इसका मतलब था वे घर नहीं लौटे थे| उससे अगले रोज भी उनकी कार नहीं दिखाई दी|

तीन-चार दिन बाद मैं शहर से बाहर चला गया पर उस रात की घटना मेरे जेहन में समाई रही| दस-बारह दिन बाद लौटा तो पता चला कि चार-पांच दिन पहले एक रोड एक्सीडेंट में ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले युवक मर गये|

मुझे हमेशा लगता रहा कि उस रात कुछ न कुछ गडबड तो युवकों ने उस युवती के साथ की थी और शायद उस एक्सीडेंट के पीछे भी उस रात की घटना का कोई हाथ हो| घर आकर मैंने उस रात के बाद के दिनों के सारे अखबार खंगाल डाले…क्योंकि मुझे आशंका थी कि कहीं न कहीं शायद किसी युवती की आत्महत्या या ह्त्या की कोई खबर जरुर छपी होगी| खबर मुझे पढ़ने को मिली उस रात के बाद वाले पांचवे दिन के अखबार में जिसमें जिक्र था एक सभ्रांत परिवार की युवती की आत्महत्या का| खबर के मुताबिक़ पिछले कुछ दिनों से वह बेहद परेशान थी|

इतने सालों में मैंने कभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया| पर पिछले साल निर्भया कांड के बाद उस रात की स्मृतियाँ मेरे दिमाग में बार बार उथल पुथल मचाने लगीं| आज जाने क्यों तुमसे सब कह दिया|’

अमित उनकी कहानी में खोया हुआ था कि बस आकर रुकी और उसका ध्यान बस की ओर गया| वह बस में चढ़ने के लिए बैंच से उठा तो देखा कि बुजुर्ग बस स्टैंड से उतर कर सड़क पर चलने लगे थे| वह बस में चढ़ गया और पीछे देखा तो अँधेरे में एक साया जाता हुआ दिखाई दिया|

“हैलो, भाईसाहब उतरना नहीं है क्या| बस इससे आगे नहीं जायेगी|”

अमित हडबडा कर उठा तो पाया कि वह बस में बैठा हुआ था और कंडक्टर उसे झिंझोड कर उठा रहा था| वह पसीने से तरबतर था|

ओ माई गॉड!

तो क्या वह सो गया था? सपना देख रहा था? यह सब कुछ सपने में घटा? बस से उतर कर उसने इधर उधर देखा मानो अभी भी महसूस करने की कोशिश कर रहा हो कि बुजुर्गवार सपने में नहीं वास्तव में उससे मिले थे|

  …[राकेश]

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दिसम्बर 24, 2013

अंत भी हो प्रकाशमान…

manbird-001उठकर

छू ले गगन

विहग के ले कर पर

भर ऊंची उड़ान

हो जा मगन!

विधाता का अंश है यात्रा

यात्रा का चरम उड़ान

मन खोजता रहेगा

गति से और गतिमान!

प्रहार कर

मन पर, तन पर

संवेगों और प्रतिक्रियाओं का पा बल

कूद पड़ समर-तम पर!

छांह की खोज

ईश्वर के उलट है

यदि है प्रकाश ही रचियता

तो अंत भी हो प्रकाशमान !

Yugalsign1

दिसम्बर 23, 2013

शीशे से पत्थर तोड़ते ‘अरविन्द केजरीवाल’ और ‘आप’

arvind kejriwal-001पत्थर से शीशा तोडना तो रोजमर्रा की बात है, पर बात तो तभी जमती है जब कोई शीशे से पत्थर को तोड़कर उसे तराश कर दिखाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ और उनके दल ‘आप‘ ने विगत में यह करिश्मा करके दिखाया जब उन्होंने पारदर्शी तरीके से चन्दा जुटाया और 20 करोड़ रुपयों में 70 सीटों पर चुनाव लड़कर 28 सीटें जीतीं, जबकि ऐसा कहा जाता है कि जमे जमाये दल एक विधायक की सीट के लिए भी करोड़ो रूपये खर्च कर देते हैं और यह तो सर्वविदित है ही कि पिछले साढ़े छः दशकों में किसी भी दल ने कभी भी अपने को मिले धन के बारे में पारदर्शिता नहीं दिखाई और कोई नहीं जानता कहाँ से उन्हें सैंकडों करोड़ रूपये मिलते रहे हैं| ‘आप‘ ने भारतीय राजनीति को स्वच्छ बनाने की ओर एक कदम उठा दिया है और अब जनता के हाथ में है कि वह बाकी दलों को भी मजबूर करे कि वे अपने आर्थिक स्रोतों का खुलासा करें और अपनी चन्दा व्यवस्था को पारदर्शी बनाएँ| वरना तो सभी को पता है कि जो धन कुबेर उन्हें करोड़ों दे रहे हैं वे उन्हें मुफ्त में धन नहीं देते रहे और उनकी अपेक्षायें चुनाव में जीतने के बाद उनकी आर्थिक कृपादृष्टि से लाभ पाए दल पूरा करते रहे होंगे| यह विशुद्ध लेन देन वाला व्यापार रहा है| इसी लेन देन की भारतीय राजनीतिक अर्थशास्त्र की प्रक्रिया ने भारत की तरक्की को असमानता वाला बनाया है क्योंकि धन कुबेरों ने कोई धर्मखाता तो खोल नहीं रखा है| राजनीतिक दलों ने ऐसे ही निर्णय लिए होंगे जिससे धन का लाभ लेने वाले दल उन्ही प्रोजेक्टों को पास करते रहे हैं जिससे उन्हें धन देने वाले कुबेरों का लाभ होता रहे| काले धन की बुनियाद पर खड़ी राजनीतिक व्यवस्था ने भारतीय समाज को आकंठ भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया है|

दूसरी बार पत्थर को शीशे से ‘आप‘ ने तोड़ा जब उसने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि बड़े दलों की जातीय, साम्प्रदायिक और तमाम तरह के भेदों वाली राजनीति से परे जाकर चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है| ‘आप‘ के उम्मीदवारों की न मतदाताओं ने जाति देखी, न क्षेत्रीयता और न ही उनका संप्रदाय|

तीसरी बार शीशे से पत्थर को तोड़ने और तराशने का काम ‘आप‘ ने तब किया जब भाजपा और कांग्रेस ने जाल बिछाकर ‘आप‘ को बदनाम करना चाहा कि वे लोगों से झूठे वादे करके चुनाव में इतनी सीटें जीते हैं और अब सरकार न बना कर अपनी खाल बचाना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वे अपने वादे पूरे नहीं कर पायेंगे|

कर्मठ और ईमानदार आदमी अगर बुद्धिमान भी हो तो भविष्य में बसे संभावित परिणामों में से सबसे बेहतर को हाथ बढ़ा अपने लिए पकड़ लेता है| ताजे दिमाग की भांति ‘आप‘ ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बैकफुट पर भेज दिया सरकार बनाने के लिए दिल्ली की जनता की राय जानने के लिए लोगों से दुबारा समपर्क स्थापित करके| यह बुद्धिमत्ता भरा पूर्ण कदम था जिसने कांग्रेस को थोड़ा कम (क्योंकि उसकी तो केवल आठ ही  सीटें आयी हैं), पर भाजपा को बौखलाहट के स्तर तक दहका दिया और कल तक ‘आप’ को रोज चुनौती दे रही भाजपा के सुर ही बदल गये| वे सीधे सीधे ‘आप‘ पर किस्म किस्म के उलजलूल आरोप मढने लगे|

अब जबकि यह तय हो गया है कि ‘अरविन्द केजरीवालदिल्ली के अगले मुख्यमंत्री बन रहे हैं, भाजपा के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक गयी है| उसकी सरकार किसी भी हालत में नहीं बन पा रही थी| ‘आप‘ द्वारा रचे गये नैतिक माहौल के कारण वह ‘आप‘ के नवनिर्वाचित विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती भी नहीं दिखना चाहती थी और कांग्रेस और ‘आप’ दोनों में से कोई भी दल उसे समर्थन दे नहीं सकता था| उसकी हालत देख पुरानी कहावत “खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे” चिरतार्थ होती दिखाई दे रही है| भाजपा के नेता ‘आप‘ के बारे में केवल तीन चार दिन पहले दिए गये बयानों से उलट वाणी बोल उस पर आक्रमण कर रहे हैं|

यह ‘आप‘ की राजनीति की ही सूक्ष्म कला है कि ‘आप‘ एकदम स्पष्ट शब्दों में बोल रही है कि उसने कांग्रेस से समर्थन नहीं लिया है और कांग्रेस उसकी  या वह कांग्रेस की सहायक पार्टी नहीं है| वह अपनी 28 सीटों के बलबूते सरकार बनाने जा रही है और बिलकुल मुमकिन है कि विधानसभा में पहले ही दिन ‘आप‘ की सरकार विश्वास मत हासिल न कर पाए| वैसे ऐसा लगता नहीं है कि समर्थन की घोषणा करके कांग्रेस पहले ही दिन सरकार गिराने की बदनामी अपने सिर लेना चाहेगी| पूंजीपतियों की नीतियों के हितों की परवाह कर करके कांग्रेस और भाजपा को इस बात की उत्सुकता भी है कैसे ‘आप‘ उन वादों को पूरा कर सकती है जो उसने अपने 70 घोषणापत्रों में किये थे|

सरकार बनाने के बाद ‘आप‘ का अगला कारनामा होगा दिल्ली में बिजली की दरों के मामले में दिल्ली वासियों को बड़ी राहत देना| ‘आप‘ ने भली भांति अध्ययन करके ही इतनी बड़ी घोषणा की है और इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए आगामी दिनों में दिल्लीवासियों को बिजली के मामले में एक बड़ी राहत मिलने वाली है और देश में पहली बार कोई ऐसा मुख्यमंत्री सत्ताधीन होगा जो केवल मुनाफे के लिए जोड़तोड़ करने वाली कंपनियों की हाँ में हाँ नहीं मिलाएगा| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ के लिए ऐसा कर पाना मुमकिन होगा क्योंकि उन्होंने किसी कम्पनी से धन लेकर चुनाव नहीं लड़ा है और उन पर किसी किस्म का दबाव नहीं है कि वे जनता के हितों को कंपनियों के आलीशान दफ्तरों में गिरवी रख दें|

रोजाना ‘700 लीटर‘ पानी इस्तेमाल करने वाले परिवार को ‘जलमित्र‘ घोषित करना निस्संदेह बेहद बुद्धिमानी का कदम होगा| 701 और उससे ऊपर पानी की मात्रा इस्तेमाल करने वाले परिवार पूरे पानी का धन देंगे और जब वे देखेंगे कि उनसे केवल 1-2 लीटर काम पानी इस्तेमाल करने वाला परिवार मुफ्त में पानी का उपयोग कर पा रहा है तो उसमें अपने आप चेतना आयेगी कि वह भी 700 लीटर पानी में ही गुजारा करे| शुरू में इस कदम के आलोचक इसका अर्थ भले ही न समझ पायें पर अगर यह योजना चल निकली तो एक साल के आंकडें जल सरंक्षण और जल वितरण की दिशा में काम करने वाले लोगों के लिए आँखें खोलने वाले सिद्ध हो सकते हैं| जो छोटे परिवार रोजाना 300-400 लीटर पानी से ही गुजारा करते रहे हैं वे इस योजना के सीधे लाभार्थी होंगे| यहाँ यह जिक्र करना निरर्थक न होगा कि भाजपा और कांग्रेस, जिन्होने ‘आप‘ का घोषणापत्र गहराई से पढ़ने की जहमत नहीं उठाई है और सतही तौर पर पढ़ कर इसकी आलोचना करते रहे हैं, पानी वाले मुद्दे पर ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाकर दरअसल अपने को ही हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा चुके हैं| अगर उन्होंने ढंग से पानी वाला मुद्दा पढ़ा होता तो ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाने के बारे में सोचते भी नहीं|

दिल्ली पुलिस को जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने एक नई परिपाटी की शुरुआत की है| छुटभैये नेता भी इसी जुगाड में लगे रहते हैं कि उन्हें एक दो सरकारी गनर मिल जाएँ जिससे कि वे अपने रुतबे को समाज में दिखा सकें और बाबा रामदेव जैसे अतिमहत्वाकांक्षी योग गुरु और दवा व्यापारी ने तो जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए जी तोड कोशिश की थी| यही हाल भाजपा के प्रधानमंत्री पड़ के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का है जिनके लिए जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए भाजपा ने जमीन आसमान एक कर दिया था| जहां सड़क दुर्घटनाएं आम हों और राजनीतिक विरोधियों को आसानी से ठिकाने लगा दिया जाता रहा हो वहाँ सुरक्षा लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने खतरा उठाया है पर सत्य यह भी है कि अगर गांधी जिंदा होते, सुभाष बोस जिंदा होते या भगत सिंह जिंदा होते और देश के नेता होते तो वे भी कभी सुरक्षा के नाम पर जनता से दूरी न बनाते|

यह भी आज का बहुत बड़ा सत्य है जनता का वह तबका जिसका जमीर राजनीतिक दलों के यहाँ बंधक नहीं है, मौजूदा राजनीतिक माहौल से इस कदर उकता चुका है कि अगर ‘अरविन्द केजरीवाल‘ जैसी नई आशा को खरोंच भी आती है तो पूरा विश्व इस बात का गवाह बन सकता है कि जब आम जनता का गुस्सा फूटता है तो बड़े बड़े तख़्त हिल जाते हैं और बाद एबदे सूरमा धराशायी हो जाते हैं| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब हर राजनीतिक दल की है क्योंकि अरविन्द केजरीवाल को कुछ भी होने की अवस्था में नुकसान राजनीतिक दलों का ही होना है| हो सकता है बहुत से दलों का राजनीतिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाए और उन्हें हमेशा के लिए निर्वासन पर जाना पड़ जाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ का यह कदम वी.आई.पी संस्कृति से बुरी तरह से ग्रसित और दूषित दिल्ली के सामाजिक और राजनीतिक के सुधार की ओर एक बड़ा कदम है| और उनका और उनके मंत्रियों और विधायकों की साधारण जीवन शैली आने वाले दिनों में राजसी जीवन जीने के आदि हो चुके नेताओं के लिए खतरे का सबब बनने वाली है| |

अरविन्द केजरीवाल‘ को अभी बहुत से पत्थरों को शीशे से तोड़ कर तराश कर उन्हें खूबसूरत बुतों का आकार प्रदान करना है|  पर ईमानदारी, सच्चाई का साथ और हौसला उन्हें कामयाबी दिलाएगा बड़े से बड़े मुकाम पाने में|

जान हथेली पर रख निडर होकर आगे बढ़ने वाले सूरमाओं के लिए ही कहा गया है :-

हयाते- जाविदां आई है जां-बाजों के हिस्से में

हमेशा जीने वाले है ये जितने मरने वाले हैं

दिसम्बर 22, 2013

मेरा ये नशा…

नशाlovers-001

चढ़ता है जब हौले हौले

सब कुछ रंगीन लगता है

मन में तरंग

तन में उमंग

आँखों में सपने

लाल डोरे खिंचते से

रक्त-शिराएँ तनती सी

उष्ण उत्तप्त कल्पनाएँ…

सब कुछ अपना

खुद जहाँपनाह

केवल मैं…

और केवल मैं….

अपने में ग़ुम…

सुबह से शाम

बस…नशा… नशा

और नशा…

नशा और उसका असर…

जब हो तो…

और जब ना हो तो

टूटने लगता है…

ऐंठने लगता है…

ये तन…ये मन…

बिखरने लगता है अपना साम्राज्य

शीशमहल जैसे चूर…

किरच किरच…

चुभता है सब कुछ…

धूप भी…

अँधेरा भी…

जलाता है सब कुछ

तपता दिन भी…

ठंडी रात भी

शराब मगर बेखबर…

कोई जिए

कि कोई मरे…

कोई जले

कि कोई फूंके…

कोई बिखरे

कि कोई तडपे…

बहुत कुछ तोड़ जाता है मगर ..Rajnish sign

दिसम्बर 21, 2013

बंद हूँ तेरे ही प्राणों के मद में…

मेरे मन ने देह को त्याग दिया हैavishkar-001

और वह

बिस्तरे के सामने

ठीक सामने तस्वीर टांगने वाली

खूंटी पर जा बैठा है |

करवट पड़ी तुम्हारी आँखें

अब भी खुली हैं

जिनमें मेरे मन के ही प्रश्न हैं

सखे, सुन

मेरी देह से मेरे मन का न ले भान

जब तू मुझमें निमग्न हो

छूएगी अपने ही प्रान

तो पायेगी,

मन तो मेरा चिर तेरा कामी

पर देह अभ्यासी दुनियावी अनुगामी

मैं तो जब तुझमें डूबा था,

उस रात्री प्रथम

तब से,

बंद वहीं हूँ,

डूबता, तिरता, उतराता

तेरी ही साँसों की लय में,

तेरे ही प्राणों के मद में!

Yugalsign1

दिसम्बर 19, 2013

चश्म मीठे पानी का रेगिस्तानी सफ़र में आएगा

रात भर नज़र में सपने भीगते रहे desert-001
हर आती जाती सांस में तुम थे
खुश थे हम

के…

इंतज़ार मक़ाम पायेगा…
जिसके अरमां में नींदें कुर्बान की
वो रुख बा-नकाब सही…

आएगा,
नज़र झुकाए शरमाया शरमाया सा
ज़ुल्फ़ चेहरे पे गिराए हुए आएगा
अल-सुबह से दिल में सुकून सा था
हर आहट ने कहा “लो आ गए वो”
थक गए तो मेरे ही कन्धों पे सो गए
तारे तमाम रात मेरे साथ जागे थे
आ भी जा के यकीन हो चले…
इंतज़ार के बाद सही
एक चश्म मीठे पानी का

रेगिस्तान के इस सफ़र में आएगा

Rajnish sign

दिसम्बर 18, 2013

एक रात की दो चिंताएँ…

उसकी बड़ी सी akhiri-001

कटोरेदार आँखों में

तरलायित सपने हैं

हर करवट पर

जब ऊपर नीचे होती है

आँख की पुतली

बदल जाता है रंग,

सपनों का|

घर- सुंदर सा छोटा घर

उमंगें-

प्रियतम के साथ

जीना -मरना,

सांसों की लय

सब कुछ साझा बाँट लेना चाहती है वह|

दूसरी चिंता अबूझ है

चटक रंग है

गोया कैनवास में अमूर्त रंग

दिन भर की भागदौड

थकन से चूर

बिस्तर पर करवटों से

पहली ही नींद का डेरा

काम, यश-कीर्ति के स्वपनों का घेरा

पहली चिंता की चिंता पर

घर से जुडी

स्नेह की डोर

भारी है

अधिक सोच से पहले ही

भारी हो चली हैं, आँखें

नींद समेट लेती है,

सब-कुछ !

Yugalsign1

दिसम्बर 17, 2013

ज़िंदगी…रूमानी हसरतों का पलना

ज़िन्दगी…Dk-001

कुछ तल्ख़ हकीक़तें

कुछ नर्म खयालात

गर्म रेत पे नंगे पाँव चलने जैसा

बादलों पे तैरना जैसे कभी

रूमानी हसरतों का पलना

परवान चढ़ना

किसी के होने का अहसास

कंधे पे सर रखना

गुलाबी ख्वाब बुनना

उगते डूबते दिन लिखना

चांदनी रात भर तपना

जेठ दुपहरी का गलना

ज़िन्दगी…

मिलना किसी का

ज़िन्दगी…

न रखना खुद को जिंदा

ज़िन्दगी…

ढूंढना ख़ुशी किसी के चेहरे में

रहना डूबे कभी उदासी में

ज़िन्दगी…

आह! ज़िंदगी…

Rajnish sign

दिसम्बर 16, 2013

प्रेम यदि है प्रेम तो फिर…

प्रेम यदि है नाम silsila-001

जीवन के सर्वाधिक उजले रूप का

तो फिर,

लदी क्यों है मन पर

संशयों की टोकरी?

प्रेम यदि है पावनता

है यदि प्रेम,

एक निश्छल सरलता

तो चक्र क्यों हैं, संशयों के?

प्रेम यदि है पूर्णता

प्रेम यदि है प्रेम

तो फिर,

भंवर क्यों हैं, उलझनों के?

Yugalsign1

दिसम्बर 15, 2013

‘आम आदमी पार्टी’ : सिर्फ हंगामा खड़ा करना मकसद…

aap

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

कहते हैं कुछ कवितायें कालजयी होती हैं क्योंकि स्वयं सत्य के अनुरोध पर प्रकृति स्वयं उन्हें जन्मा देती है और माध्यम उस भाव को जन्माने के लिए सुयोग्य एक कवि बन जाता है| दुष्यंत कुमार की इस कविता का उपयोग योग्य और षड्यंत्रकारी, दोनों किस्मों के लोगों ने बरसों से किया है| आपातकाल में और उसके बाद भी भिन्न किस्म के नेताओं ने भी इस कविता का उपयोग अपने हित में किया होगा, पर ऐसा ही पाया गया कि उनके द्वारा किया गया उपयोग दरअसल दुरुपयोग ही बन कर रह गया|

अब ‘आप‘ (आम आदमी पार्टी) के भारत के राजनीतिक पटल पर उदय के बाद और उसके बाद उनके तौर तरीकों से लग रहा है कि इस कविता को सही हाथ, सही मुख और सही वजूद मिल गये हैं|

आप‘ ने दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा ही नहीं बल्कि देश भर में बरसों से जमे जमाये विभिन्न  राजनीतिक दलों के पैरों तले से सुखपूर्ण राजनीति का वैभवपूर्ण कालीन खींच लिया है| सबकी परेशानी एक ही है कि अगर ‘आप’ और इसकी किस्म की मूल्यों आधारित राजनीति चली तो यह शत-प्रतिशत तय है कि उनकी पुरानी किस्म की राजनीति , जो सड़ कर घाव बन चुकी है और देश को नासूर की तरह खाए जा रही है, या तो मृत्यु को प्राप्त होगी या उसे मजबूरन निर्वासन पर जाना होगा|

कांग्रेस और भाजपा जैसे दल, जो विगत में अनेकों बार अस्पष्ट तरीकों से बहुमत जुटा कर सरकारें बना चुके हैं, इस बार ‘आप‘ के पीछे पड़ गये हैं कि ‘आप‘ को दिल्ली में सरकार बनानी चाहिए जबकि ‘आप‘ के पास सरकार बना सकने लायक विधायक नहीं हैं| ‘आप’ की वजह से भाजपा मजबूर है कि बहुमत से केवल 4-5 सीटें दूर रहने के बावजूद भी वह सरकार नहीं बना सकती क्योंकि अगर उसने विगत की भांति अस्पष्ट तरीके अपनाए सरकार बनाने के लिए तो कुछ माह बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में उसे जबरदस्त हानि उठानी पड़ सकती है| भाजपा ने उपराज्यपाल महोदय के बुलाने पर उन्हें सरकार बना पाने में अपनी असमर्थता जता दी और गेंद को ‘आप‘ के पाले में यह कह कर फेंक दिया कि ‘आप’ को अब सरकार बनानी चाहिए और भाजपा एक भले और जिम्मेदार विपक्ष की भांति उनके जनहित में किये सारे कार्यों का समर्थन करेगी| |

‘आप’ उप राज्यपाल महोदय से मिल पाती उसके एक दन पहले ही कांग्रेस ने अपनी तरफ से अति-राजनीतिक चतुराई दिखाते हुए ‘आप’ को बिना शर्त बाहरी समर्थन देने की चिट्ठी उप-राज्यपाल महोदय को भिजवा दी| कांग्रेस ने भाजपा की तर्ज पर ‘आप’ को अपने अनुभवी राजनीतिक कौशल से परास्त करने के लिए एक दुष्टता भरा दांव चला और उसे लगा होगा कि बस अब ‘आप’ फंस गई है और वह और भाजपा सरीखी पुरानी पार्टियां मिलकर ‘आप’ का दम निकाल देंगीं और राजनीति फिर से कीचड़ में खींच लेंगीं| पर वह भूल गई कि नया होने का मतलब मूर्ख होना नहीं होता और जो लोग मूल्यों पर आधारित राजनीति करने निकले हैं वे उनके घिसे पिटे दांवपेंचों के घेरे में आकर हार मानने वाले नहीं|

अरविन्द केजरीवाल ने ‘आप‘ की तरफ से सोनिया गांधी (कांग्रेस), और राजनाथ सिंह (भाजपा) महोदय को पत्र लिख कर कांग्रेस और भाजपा द्वारा बिछाए राजनीतिक चक्रव्यूह को छिन्न- भिन्न कर दिया है और उन्हें एक बार फिर से जनता के सामने बेनकाब कर दिया है|

देखें अरविन्द केजरीवाल द्वारा

(1) –सोनिया गांधी को लिखा पत्र
(2) राजनाथ सिंह को लिखा पत्र
(3) उपराज्यपाल महोदय को लिखा पत्र

कांग्रेस क्यों ‘आप‘ को बिना मांगे समर्थन दे रही है?

समर्थन तो तब दिया जाता है जब या तो विचारधारा समान हो या किन्ही मुद्दों पर समानता हो| ‘आप’ का तो जन्म ही कांग्रेस, भाजपा, क्षेत्रीय दलों और वामपंथियों द्वारा पोषित राजनीति का विरोध करने के लिए हुआ है|

‘आप’ ने सही ही कांग्रेस और भाजपा से आप के 17 संकल्पों को पढ़ने के बाद समर्थन पर विचार करने की बात की है| अगर ‘आप’ के मेनिफेस्टो और इन 17 संकल्पों को कांग्रेस और भाजपा समर्थन दे सकती है तभी उन्हें ‘आप’ को समर्थन देने जैसे बात करनी चाहिए वरना जनता उन्हें अग्माई लोकसभा चुनाव में दर्शा देगी कि समर्थन का दिखावा करना उन्हें राजनीतिक रूप से बहुत भारी पड़ा है| अब ये चालबाजी वाली  राजनीति नहीं चल पायेगी भारत में|

मजेदार बात यह है कि कांग्रेस और भाजपा की एक समान विचार यह भी है कि दिल्ली में ‘आप’ को अल्पमत वाली सरकार बनाकर मजबूर करके उसे दिल्ली में ही सीमित करके बाद में उसे हर मोर्चे पर कठिनाइयों में डाल कर उसका भंडाफोड किया जाए| कैसा दुर्भाग्य देश का है कि अपने हितों पर कुठाराघात होता देख ऐसा भी राजनीतिक पार्टियां सोच सकते हैं| दिल्ली की जनता केएक बड़े तबके ने दिखा दिया है कि अहंकारपूर्ण राजनीति का अक्या हश्र हो सकता हैऔर अब देश भर में जागरूक मतदाता यही सब लोकसभा चुनाव में कर दिखायेंगे|

‘आप’ के पास पूर्ण बहुमत होता तो वह न केवल सरकार बनाती बल्कि अपने वादों को पूरा करके भी दिखाती और दिल्ली में व्यस्तता के बावजूद भी देश भर में अलख जगाती स्वच्छ राजनीति के उदय की|

स्वच्छ राजनीति को स्थापित करने का लक्ष्य तो हर हालत में पूरा होना ही है|

राजनीति सत्तासुख भोगने से हटकर पुनः सडकों पर पहुँच रही है और जिसे जनता के बीच उन जैसा बन कर उनके लिए कुछ करना है वही राजनीति में रह पायंगे बाकियों को अपनी मन पसंद जगह अब तक कमाए पैसों से ऐश्वर्यपूर्ण बंगले बनवाकर अवकाश प्राप्त जीवन जीने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए|

क्योंकि जैसा कि दुष्यंत कुमार की प्रसिद्द कविता की दो अन्य पंक्तियाँ कहती हैं :-

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

आप व्यक्ति आधारित आंदोलन नहीं है, यह जनता के हृदयों में बरसों से देश के साथ किये गये राजनीतिक छल के प्रति आक्रोश से मचे मंथन से निकला अमृत है जो देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र स्वच्छ राजनीति के  अस्तित्व को स्थापित करेगा|

दुष्यंत कुमार की कविता की दो अन्य पंक्तियाँ हैं

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

अब सड़-गल चुकी सत्ता आधारित राजनीतिक व्यवस्था की बुनियाद ही गिरने का वक्त्त आ रहा है| बेहतर यही होगा कि विभिन्न दलों में भले लोग, जो दलाल किस्म के नेताओं के कर्मों के कारण घुटा हुआ महसूस करते थे, डूबते हुए जहाज़ों को छोड़ कर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करें| और अगर यह संभव न हो तो अपने अपने दलों में रहकर सुधार की क्रान्ति का आह्वान करें और अपने अपने राजनीतिक दलों को, पारदर्शी और देश के प्रति जिम्मेदार और ईमानदारी को सम्मान देने वाला बनाएँ|

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