Archive for दिसम्बर, 2013

दिसम्बर 31, 2013

16 दिसम्बर की सर्द रात…

oldman-001बर्फ गिरती है हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में, और दांत किटकिटाने लगते हैं दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक के इलाके में रहने वाले जीवों के| इस बरस भी दिसम्बर की दस तारीख क्या निकली सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया था| मजबूरी न हो तो कौन सर्दी की रातों में घर की नर्म-गर्म शरण छोड़कर बाहर सडकों पर ख़ाक छानेगा?

‘समय से मीटिंग खत्म हो जाती तो घर पहुँच जाता’|  बस से उतर कर बस स्टॉप पर चढ़ते हुए अमित भुनभुनाया|

भूख अलग परेशान कर रही थी| उसने समय देखा|

साढ़े नौ बजने ही वाले थे| दुकानदार दुकानें बंद कर अपने अपने घर जाने लगे थे| कुछ ही मिनटों में बस स्टॉप सुनसान लगने लगा| अमित को एहसास हुआ कि वह अकेला ही बस स्टॉप पर मौजूद था| यही तो वक्त रहा होगा पिछले बरस की 16 दिसंबर की रात जब ऐसे ही एक बस स्टॉप से दामिनी और उसके मित्र को कुछ वहशी दरिंदों ने भुलावा देकर अपनी बस में बैठा लिया था और हैवानियत की सभी हदें पार करके एक खिल उठने की भरपूर संभावना लिए हुए जीवन को कुचल दिया था| उस रात भी वह सड़क पर ही था और उस हादसे की खबर उसे सुबह उठने पर टीवी पर आ रहे समाचारों के जरिये ही हुयी थी|

बस स्टॉप पर हल्की सी आहट से उसकी विचार श्रंखला टूटी| उसने देखा कोट पहने और मंकी कैप और मफलर में ढके हुए एक बुजुर्गवार बस स्टॉप पर आ पहुंचे थे| उन्होंने कोट की जेब से एक मोमबत्ती और माचिस की एक डिबिया निकाली और माचिस की एक तिल्ली निकाल कर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करने लगे, पर हवा चलने के कारण मोमबत्ती जल पाती उससे पहले ही माचिस की तिल्ली बुझ गई| उन्होंने दूसरी तिल्ली जलाई, इस बार मोमबत्ती जल गई और वे उसे बस स्टॉप के एक कोने पर लगाने लगे पर हवा ने इस बार भी काम दिखा दिया और मोमबत्ती बुझ गई|

अमित ने देखा कि कोई पिज्ज़ा खाकर उसका डिब्बा बस स्टॉप में लगी एकमात्र बैंच पर छोड़ गया था| उसने डिब्बा उठाकर बुजुर्गवार से कहा,” सर, इसकी ओट में जलाइए मोमबत्ती शायद काम बन जाए|”

कैप और मफलर से लगभग पूरी तरह ढके बुजुर्गवार के चेहरे से झांकती उनकी आँखों में मुस्कान की झलक सी दिखाई दी|

‘ले आओ बेटा इसे इधर ले आओ, यहाँ कोने में लगा देता हूँ’

अमित गत्ते का डिब्बा लेकर बस स्टॉप के एक कोने पर खड़े बुजुर्गवार के पास चला गया| उसने डिब्बे को खोल दिया और अब वह काफी बड़े हिस्से को गत्ते की दीवारों से रोक सकता था| उसे एहसास हो गया था कि बुजुर्गवार दामिनी की याद में मोमबत्ती जला रहे हैं|

बुजुर्गवार ने मोमबत्ती जलाई और एक कोने में थोड़ा मोम टपका कर फर्श पर टिका दी और आँखें बंद करके हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाने लगे| मिनट भर ऐसे ही प्रार्थना जैसा कुछ करके वे पीछे हटे तो अमित ने गत्ते के डिब्बे को मोमबत्ती के सामने इस तरह टिका दिया जिससे हवा का प्रवाह रोका जा सके|

बुजुर्गवार ने बैंच पर बैठ हल्की आवाज में कहा,” बहुत बुरा हुआ था उसके साथ”|

“जी”, अमित के मुँह से सिर्फ इतना ही निकल सका|

बुजुर्गवार कुछ देर सड़क पर दूर कुछ देर देखते रहे| अमित को अब तक बस आने का इन्तजार था पर अब बुजुर्गवार के आने से अकेलेपन का एहसास खत्म हो चला था|

‘बहुत साल हो गये…ऐसी ही एक रात थी…पर सर्दी अभी आने को थी| नवंबर के शुरुआती दिन होंगे|’

बुजुर्ग ने धीमे स्वर में मानों अपने आप से कहा हो| अमित ने उनकी तरफ ध्यान से देखा तो उन्हें कहीं खोया हुआ पाया| उसकी समझ में नहीं आया कि वे उससे कह रहे थे या खुद से ही बुदबुदा कर बात कर रहे थे|

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा,” तीसरी मंजिल पर स्थित घर में अकेला था, बीमार भी था,  रात का खाना खाकर बालकनी में टहल रहा था| रात के कोई साढ़े नौ बजे होंगे| कमरे और बालकनी की बत्तियाँ बंद करके घूम रहा था| नीचे कुछ दूर स्ट्रीट लाईट जल रही थी| एक कार आकर रुकी और उसमें से दो नौजवान उतरे| उन्होंने देखा उनकी पार्किंग की जगह कोई कार खड़ी हुयी थी| पार्किंग को लेकर झगडा होना लगभग रोजमर्रा की बात थी वहाँ| उन्होंने कुछ देर अपनी कार का हार्न बजाया जिससे कि जो भी वहाँ कार खड़ी करके गया हुआ है वह झाँक कर देख सके| पर कहीं कोई हलचल न देख कर उन्होंने वहाँ खड़ी कार को धक्का लगाकर हटाना चाहा पर उसमें हेण्ड ब्रेक लगा हुआ था| क्रोधित होकर उन्होंने आपस में कुछ बात की और एक नौजवान अपने घर में अंदर चला गया| वापिस आया तो उसके हाथ में गुप्ती, या बर्फ तोड़ने वाले सुए जैसा कुछ चमक रहा था| उन्होंने इधर उधर देखा, ऊपर आसपास के सब घरों की ओर देखा| अन्धेरा होने के कारण वे मुझे नहीं देख सकते थे पर मैं उनकी सभी हरकतें देख सकता था|’

अमित को उनके वृतांत में रस आने लगा था| वह उत्सुकता से उनकी बातें सुनने लगा| आखिर पार्किंग की समस्या तो शहर में ज्यों की त्यों बनी हुयी थी, बल्कि हालात पहले से बदतर ही हो रहे थे| स्कूटर खड़े करने वाले फ्लैटों में एक एक घर में रहने वाले लोग दो से चार कारें  रखने लगे थे|

‘एक युवक ने अपनी पार्किंग की जगह खड़ी कार की ड्राइविंग सीट की तरफ वाले दरवाजे में खिड़की के कांच के पास अपना हथियार घुसा दिया और कुछ पल बाद ही उसने कार का दरवाजा खोल दिया| उसने हेण्ड ब्रेक खोला और दोनों युवकों ने कार को आगे धकेल कर बाड़ के पास लगे पाइप से सटाकर खड़ा कर दिया और हेण्ड ब्रेक पहले की तरह लगा कर दरवाजा बंद कर दिया| एक युवक ने कार के दोनों साइड मिरर हाथ मारकर तोड़ दिए|  दूसरे युवक ने उस कार के पीछे अपनी कार पार्क कर दी| अब आगे वाली कार न पीछे निकल सकती थी और न ही आगे जा सकती थी| युवकों ने कार को अपनी कार और बाड़ के बीच ट्रैप कर दिया था|

दोनों युवक अपने घर के अंदर चले गये|

सब तरफ शान्ति थी| सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था| मैं भी घर में चला गया| टीवी देखने लगा| पर मन नीचे सड़क पर ही लगा हुआ था| किसकी कार होगी, कैसे निकालेगा? क्या इन् लोगों में झगडा होगा…जैसे प्रश्न दिमाग में उठ रहे थे| बीच बीच में बालकनी में जाकर नीचे झाँक लेता था| कार अभी भी सेंडविच बनी खड़ी थी| तकरीबन चालीस-पैंतालीस मिनट बाद बाहर गया तो देखा कि एक युवती उस कार के पास खड़ी इधर उधर देख रही थी| उसने देख ही लिया था कि उसकी कार के साइड मिरर तोड़ दिए गये थे और कार को खिसका कर आगे कर दिया गया था| ऐसा लगता था कि वह किसी से मिलने वहाँ आयी थी और खाली जगह देख कर कार यहाँ खड़ी कर गई थी| सड़क पर अब भी कोई नहीं था| लगभग निश्चित था कि जिस घर में वह मिलने आई थी वह उस ब्लॉक में न होकर पास वाले किसी ब्लॉक में था| तभी उसे छोड़ने कोई नहीं आया था, वह अकेली ही वहाँ आई होगी, अपने मेजबानों से उनके घर के बाहर ही विदा लेकर|

युवती ने अपनी कार के पीछे खड़ी कार का मुयायना करना शुरू किया| उसे पीछे वाले शीशे पर मकां नंबर वाला स्टीकर दिख गया होगा| उसने अपने पर्स से छोटी से टार्च निकाल कर उसे पढ़ा और इधर – उधर  मकानों के नंबर पढकर वह युवकों के घर की तरफ चल पड़ी|

मेरी बालकनी के एकदम नीचे ग्राउंड फ्लोर पर युवकों के घर का दरवाजा होने की वजह से मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था| पर दरवाजा खुलने और कुछ पल के बाद ऐसी अस्पष्ट आवाजें आईं जिससे लगा कि युवती और उन युवकों के बीच बहस जैसा कुछ घटित होता प्रतीत हो रहा था| कुछ पल ऐसी ही अस्पष्ट आवाजें आती रहीं और फिर दरवाजा बंद होने की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया| युवती वापिस अपनी कार के पास नहीं आई| मैं काफी देर वहाँ खड़ा रहा पर युवती को आते नहीं देखा|

एक घंटे बाद भी युवती की कार वहीं फंसी खड़ी थी| रात के लगभग बारह तक भी कार वहीं खड़ी थी| मैं टीवी देखते देखते किसी समय सो गया| सुबह पांच बजे नींद खुली तो सबसे पहले बालकनी में जाकर नीचे झांका तो देखा कार वहाँ नहीं थी| युवकों की कार भी वहाँ नहीं थी| मतलब वे भी या तो रात में ही या सुबह सुबह ही कहीं चले गये थे|  पर अगर युवकों ने बारह बजे के आसपास भी अगर युवती को कार निकालने दी होगी तब भी एक घंटे से ज्यादा समय वह उनके घर में उपस्थित रही होगी| मुझे ऐसा ख्याल आया कि युवती के साथ कुछ न कुछ गलत तो कल रात हुआ था|

दिन में नीचे सड़क पर गया तो ऐसे ही युवकों के घर की तरफ झाँक लिया पर वहाँ ताला लगा था| शाम को और फिर रात को भी उनकी कार नीचे नहीं दिखाई दी| इसका मतलब था वे घर नहीं लौटे थे| उससे अगले रोज भी उनकी कार नहीं दिखाई दी|

तीन-चार दिन बाद मैं शहर से बाहर चला गया पर उस रात की घटना मेरे जेहन में समाई रही| दस-बारह दिन बाद लौटा तो पता चला कि चार-पांच दिन पहले एक रोड एक्सीडेंट में ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले युवक मर गये|

मुझे हमेशा लगता रहा कि उस रात कुछ न कुछ गडबड तो युवकों ने उस युवती के साथ की थी और शायद उस एक्सीडेंट के पीछे भी उस रात की घटना का कोई हाथ हो| घर आकर मैंने उस रात के बाद के दिनों के सारे अखबार खंगाल डाले…क्योंकि मुझे आशंका थी कि कहीं न कहीं शायद किसी युवती की आत्महत्या या ह्त्या की कोई खबर जरुर छपी होगी| खबर मुझे पढ़ने को मिली उस रात के बाद वाले पांचवे दिन के अखबार में जिसमें जिक्र था एक सभ्रांत परिवार की युवती की आत्महत्या का| खबर के मुताबिक़ पिछले कुछ दिनों से वह बेहद परेशान थी|

इतने सालों में मैंने कभी इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया| पर पिछले साल निर्भया कांड के बाद उस रात की स्मृतियाँ मेरे दिमाग में बार बार उथल पुथल मचाने लगीं| आज जाने क्यों तुमसे सब कह दिया|’

अमित उनकी कहानी में खोया हुआ था कि बस आकर रुकी और उसका ध्यान बस की ओर गया| वह बस में चढ़ने के लिए बैंच से उठा तो देखा कि बुजुर्ग बस स्टैंड से उतर कर सड़क पर चलने लगे थे| वह बस में चढ़ गया और पीछे देखा तो अँधेरे में एक साया जाता हुआ दिखाई दिया|

“हैलो, भाईसाहब उतरना नहीं है क्या| बस इससे आगे नहीं जायेगी|”

अमित हडबडा कर उठा तो पाया कि वह बस में बैठा हुआ था और कंडक्टर उसे झिंझोड कर उठा रहा था| वह पसीने से तरबतर था|

ओ माई गॉड!

तो क्या वह सो गया था? सपना देख रहा था? यह सब कुछ सपने में घटा? बस से उतर कर उसने इधर उधर देखा मानो अभी भी महसूस करने की कोशिश कर रहा हो कि बुजुर्गवार सपने में नहीं वास्तव में उससे मिले थे|

  …[राकेश]

दिसम्बर 24, 2013

अंत भी हो प्रकाशमान…

manbird-001उठकर

छू ले गगन

विहग के ले कर पर

भर ऊंची उड़ान

हो जा मगन!

विधाता का अंश है यात्रा

यात्रा का चरम उड़ान

मन खोजता रहेगा

गति से और गतिमान!

प्रहार कर

मन पर, तन पर

संवेगों और प्रतिक्रियाओं का पा बल

कूद पड़ समर-तम पर!

छांह की खोज

ईश्वर के उलट है

यदि है प्रकाश ही रचियता

तो अंत भी हो प्रकाशमान !

Yugalsign1

दिसम्बर 22, 2013

मेरा ये नशा…

नशाlovers-001

चढ़ता है जब हौले हौले

सब कुछ रंगीन लगता है

मन में तरंग

तन में उमंग

आँखों में सपने

लाल डोरे खिंचते से

रक्त-शिराएँ तनती सी

उष्ण उत्तप्त कल्पनाएँ…

सब कुछ अपना

खुद जहाँपनाह

केवल मैं…

और केवल मैं….

अपने में ग़ुम…

सुबह से शाम

बस…नशा… नशा

और नशा…

नशा और उसका असर…

जब हो तो…

और जब ना हो तो

टूटने लगता है…

ऐंठने लगता है…

ये तन…ये मन…

बिखरने लगता है अपना साम्राज्य

शीशमहल जैसे चूर…

किरच किरच…

चुभता है सब कुछ…

धूप भी…

अँधेरा भी…

जलाता है सब कुछ

तपता दिन भी…

ठंडी रात भी

शराब मगर बेखबर…

कोई जिए

कि कोई मरे…

कोई जले

कि कोई फूंके…

कोई बिखरे

कि कोई तडपे…

बहुत कुछ तोड़ जाता है मगर ..Rajnish sign

दिसम्बर 21, 2013

बंद हूँ तेरे ही प्राणों के मद में…

मेरे मन ने देह को त्याग दिया हैavishkar-001

और वह

बिस्तरे के सामने

ठीक सामने तस्वीर टांगने वाली

खूंटी पर जा बैठा है |

करवट पड़ी तुम्हारी आँखें

अब भी खुली हैं

जिनमें मेरे मन के ही प्रश्न हैं

सखे, सुन

मेरी देह से मेरे मन का न ले भान

जब तू मुझमें निमग्न हो

छूएगी अपने ही प्रान

तो पायेगी,

मन तो मेरा चिर तेरा कामी

पर देह अभ्यासी दुनियावी अनुगामी

मैं तो जब तुझमें डूबा था,

उस रात्री प्रथम

तब से,

बंद वहीं हूँ,

डूबता, तिरता, उतराता

तेरी ही साँसों की लय में,

तेरे ही प्राणों के मद में!

Yugalsign1

दिसम्बर 19, 2013

चश्म मीठे पानी का रेगिस्तानी सफ़र में आएगा

रात भर नज़र में सपने भीगते रहे desert-001
हर आती जाती सांस में तुम थे
खुश थे हम

के…

इंतज़ार मक़ाम पायेगा…
जिसके अरमां में नींदें कुर्बान की
वो रुख बा-नकाब सही…

आएगा,
नज़र झुकाए शरमाया शरमाया सा
ज़ुल्फ़ चेहरे पे गिराए हुए आएगा
अल-सुबह से दिल में सुकून सा था
हर आहट ने कहा “लो आ गए वो”
थक गए तो मेरे ही कन्धों पे सो गए
तारे तमाम रात मेरे साथ जागे थे
आ भी जा के यकीन हो चले…
इंतज़ार के बाद सही
एक चश्म मीठे पानी का

रेगिस्तान के इस सफ़र में आएगा

Rajnish sign

दिसम्बर 18, 2013

एक रात की दो चिंताएँ…

उसकी बड़ी सी akhiri-001

कटोरेदार आँखों में

तरलायित सपने हैं

हर करवट पर

जब ऊपर नीचे होती है

आँख की पुतली

बदल जाता है रंग,

सपनों का|

घर- सुंदर सा छोटा घर

उमंगें-

प्रियतम के साथ

जीना -मरना,

सांसों की लय

सब कुछ साझा बाँट लेना चाहती है वह|

दूसरी चिंता अबूझ है

चटक रंग है

गोया कैनवास में अमूर्त रंग

दिन भर की भागदौड

थकन से चूर

बिस्तर पर करवटों से

पहली ही नींद का डेरा

काम, यश-कीर्ति के स्वपनों का घेरा

पहली चिंता की चिंता पर

घर से जुडी

स्नेह की डोर

भारी है

अधिक सोच से पहले ही

भारी हो चली हैं, आँखें

नींद समेट लेती है,

सब-कुछ !

Yugalsign1

दिसम्बर 17, 2013

ज़िंदगी…रूमानी हसरतों का पलना

ज़िन्दगी…Dk-001

कुछ तल्ख़ हकीक़तें

कुछ नर्म खयालात

गर्म रेत पे नंगे पाँव चलने जैसा

बादलों पे तैरना जैसे कभी

रूमानी हसरतों का पलना

परवान चढ़ना

किसी के होने का अहसास

कंधे पे सर रखना

गुलाबी ख्वाब बुनना

उगते डूबते दिन लिखना

चांदनी रात भर तपना

जेठ दुपहरी का गलना

ज़िन्दगी…

मिलना किसी का

ज़िन्दगी…

न रखना खुद को जिंदा

ज़िन्दगी…

ढूंढना ख़ुशी किसी के चेहरे में

रहना डूबे कभी उदासी में

ज़िन्दगी…

आह! ज़िंदगी…

Rajnish sign

दिसम्बर 16, 2013

प्रेम यदि है प्रेम तो फिर…

प्रेम यदि है नाम silsila-001

जीवन के सर्वाधिक उजले रूप का

तो फिर,

लदी क्यों है मन पर

संशयों की टोकरी?

प्रेम यदि है पावनता

है यदि प्रेम,

एक निश्छल सरलता

तो चक्र क्यों हैं, संशयों के?

प्रेम यदि है पूर्णता

प्रेम यदि है प्रेम

तो फिर,

भंवर क्यों हैं, उलझनों के?

Yugalsign1

दिसम्बर 15, 2013

कौन समझेगा तेरे सिवा?

इस घर की हरेक दीवार पे home-001

तेरी ही उँगलियों के निशां चस्पा हैं

हरेक ईंट में सिहरन है अभी भी

तेरे छूने की…

तेरी ही रिहायश से मकां घर हुआ

दिल तो वैसे मेरा

कुछ क़तरा खूँ ‘औ

कुछ वज़न ग़ोश्त

ही ठहरा

तेरे रहने फकत ने इसे इस काबिल किया

कायनात समेटे फिरता हूँ मैं

कई तूफ़ान

कई समंदर

कई साहिल

बस एक तेरे रहने से

कौन समझेगा तेरे सिवा?

Rajnish sign

दिसम्बर 13, 2013

तुम्हारी पीड़ा

morgan-001तुम्हारी पीड़ा

आसुंओं को अंतर में पी लेने की विवशता है

कायरता का श्राप पाए पुरुष में

अनिश्चय के भंवर में डूबते नर में,

कोमल ह्रदय के स्वामी मानव में

अपनी सार्थकता तलाशने की पीड़ा है|

शब्दों को छल के लिए उगालना

योग-संयोगों से अर्थ बदलना

आत्मसंतुष्टि हेतु ओढें कर्त्तव्य

तुम्हारी पीड़ा

गहनतम भाव समझ कर अंजान बनने की पीड़ा है|

क्या देता है जगत जीव को

क्या लेता है जगत जीव से

क्या सार्थकता, क्या श्रेष्ठता

आखिर क्या है, पराकाष्ठा?

तुम्हारी पीड़ा

चादर के चारों कोने तलाश न कर पानी की पीड़ा है|

सहज सजीली राह छोड़कर

ऊंचे – नीचे,

दुर्गम पथ की चोटी को तकना

तकना, उतरना, चढ़ना सबकी भूलभुलैया

तुम्हारी पीड़ा,

भीड़ में गुम होने के डर की

पीड़ा है!

राग-मोह-शान्ति-खुशी-द्वेष-दर्प

क्रोध-स्नेह-प्रलाप-जीवट-विवशता

चक्रव्यूह पर चक्रव्यूह से घिरे हुए

तुम्हारी पीड़ा

द्वार न तोड़ पाने की

पीड़ा है!

Yugalsign1

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