Archive for अप्रैल, 2013

अप्रैल 30, 2013

अनउगी झील शरद की

आज फिर से उग आयी है एक शाम

आसपास हिरण्यमय वृत्त लिए

कंधे पर घटाएं फैलाए|

दो  तृषित हाथों से

एक चाँद

अमृत बरसा रहा है |

एक अनउगी सपनीली झील के

आँगन में खिले कमल से

पंख पसारे

खेलता है कोई जलपांखी लहरों के खेल

पानी के सुमेरु उछालता

जगाता सहस्त्रों अनगाये गीत|

आज कोई एक

मन-सा मन

पलों और क्षणों को तराशता

समय को बाहों में भींचता

धरती से पवन और पवन से

धरती को गंधमान करता

पोर बना,

सेतु बना,

बैठा रहेगा|

अंधेरी रात में,

चाह ने

राह भूलने की आशंका ने

आँख के अलावा

आसमान पर

हजारों दिए जला दिए हैं|

अलभ्य स्वर पास नहीं

अरण्य कथा कैसे गाये

भागवत स्वर में |

ओ  अनागत

अनंत प्रतीक्षा सहेजता

कोई

कितनी रातें लिखता रहेगा तुम्हारे नाम

इस अनउगी झील के किनारे?

सुबह चम्पा – सी संध्या |

और दोपहर अकेलीदूर कहीं बांसुरी की धुन पर

अलसाई बीन पर बजती

मेरी

तुम्हारी

सब की ही

एक-सी परेशानियां

जीवन पहेली|

(डा. कृष्णा चतुर्वेदी )

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अप्रैल 30, 2013

प्रेम में आकाश

जब हम नहीं करते थे प्रेम

तब कुछ नहीं था हमारे पास

फटी हथेलियों

और थके पैरों से

हल लगाते थे हम

कोहरे में घाम को देते थे

आवाज

हम देखते थे आकाश

जिसका मतलब

आकाश के सिवाय

कुछ नहीं था हमारे लिए

जब हम प्रेम में गिरे

हम यादों में गिरे

जब यादों में बहे

प्रेम में डूब गये हम

घाटी से चलकर

हमारे घर तक आने वाली

पगडंडी था तब आकाश

हमारे खेतों में

आँख ले रहे होते अंकुर

आकाश में हम सुनते रहते

हवा की गूँज

जो हमारी सांस थी दरअसल

प्रेम में आकाश

आकाश जितना ही दूर था

उसे ज़रा सा उठाकर

हम अपने

मवेशियों को देते थे आवाज

उसकी आँखों में

हम देखते थे अपनी दुनिया

पहाड़ों को काटकर बने घर

जो हमारे थे

हम जो रहते थे एक गाँव में

प्रेम करते हुए|

(हेमंत कुकरेती)

अप्रैल 29, 2013

आंसू एक न गिरने दूंगा…

चाहे घड़ी विदा की आये

दुनिया ठुकुरसुहाती गाये

मेरा धैर्य नहीं टूटेगा

मैं खुद को न ढहने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

युगों युगों से रोज संजोया

अंतर्मन ने खूब भिगोया

फिर भी कसम यही खाई है

मैं इनको न बहने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

दुनिया ने खेती की धन की

मेरी धरती यही नयन की

इसमें फसल उगाई है

जो वह न सबको चरने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

मुझे जरुरत नहीं दया की

मुझमे मूरत है ममता की

तुम जो चाहो हाथ धरो

तो यह न तुमको करने दूंगा

आंसू एक न बहने दूंगा…

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 20, 2013

दिल्ली है सांडों की, बलात्कारियों की!

ये दिल्ली है!
भारत देश की राजधानी|

यहाँ रहते हैं
प्रधानमंत्री से लेकर तमाम केन्द्रीय मंत्री,
तमाम बड़े बड़े नेता
यहाँ रहते हैं देश के प्रथम नागरिक|

कहा जाता रहा है –
– दिल्ली है दिल वालों की –
ज़रा सामने तो आओ और कहो कि –
दिल्ली है दिल वालों की?

नहीं हुजूर!
दिल्ली दिल वालों की नहीं हो सकती!
दिल्ली तो है अब सांडों की!
कामुक जानवरों की!
जो देश के कोने कोने
से यहाँ आकर,
अपने विकृत दिमाग को लाकर
नारी से बलात्कार करने में मशगूल हैं|

ये बलात्कारी सांड
अपने मनोविज्ञान में
किसी नारी से कोई भेद भाव नहीं करते
इनके लिए
स्त्री चाहे एक साल से छोटी शिशु हो
या साठ से ऊपर की वृद्धा
सब बलात्कार के योग्य हैं|

ये मानसिक रोगी
हरेक उम्र की,
हरेक रंग रूप की,
नारी को रौंदने का
बीडा उठाये
घूम रहे हैं
दिल्ली की गलियों में
दिल्ली के कूचों में
ये वही गलियाँ हैं
जिनमें से किन्ही में
ग़ालिब जैसी आत्माएं घूमा करती थीं
और आज कामुक सांड घुमा करते हैं|

ये जानवर घरों में,
बसों में,
कारों में
लगभग हरेक जगह
नारी को शिकार बनाते
घूम रहे हैं
और जिन्हें सडकों पर
नारी को सुरक्षा देने के लिए
घूमना चाहिए
वे वर्दी वाले
नारियों पर ही लात-घूसे-लाठी और गालियों
की बौछार कर रहे हैं|

हवा में हर तरफ
दहशत है
बच्चियों की चीख पुकार है
ये नेता, सत्ता और विपक्ष के,
ये हाकिम,
ये वर्दी वाले,
ये सोते कैसे हैं?
ये किस चक्की का पिसा
आटा खाते हैं
जो इन्हें नींद आ जाती है?

इनमें कुछ ऐसे भी हैं
जो ऐसे हर मामले के बाद
संवाद बोलने लगते हैं
कि वे पिता हैं
दो-दो, तीन-तीन बेटियों के
अतः वे स्त्री के दुख को समझते हैं भली भांति|

क़ानून उनके हाथ में है
नये क़ानून बनाना उनके हाथ में है
क़ानून का पालन करवाना उनकी जिम्मेदारी है
पर दिल्ली है कि
भरी पडी है बलात्कारियों से|

कुछ बलात्कारी नेता हैं
कुछ बलात्कारी नेताओं के बेटे, या नाते रिश्तेदार
कुछ बड़े अफसरों के बेटे
कुछ छोटे अफसरों के बेटे
कुछ बिना लाग लपेट के
सीधे सीधे गुंडे हैं
या गुंडों के बेटे हैं
ये सब बलात्कारी
बहुत शक्तिशाली हैं
इन्हें किसी भी हालत में बलात्कार करना ही करना है
क़ानून इनके नौकर की तरह काम करता है|

अगर इन सबके रहते
दिल्ली अब भी दिल वालों की है
तो नारी क्या करे?
दुनिया तो छोड़ नहीं सकती
तो क्या दिल्ली छोड़ दे?

 

अप्रैल 19, 2013

पकड़ो मत! जकड़ो मत!

या तो पकडे बैठे रहो,
जकड़े बैठे रहो,
पर तब
हर पल का,
हर कदम का,
हर गति का,
हर इशारे का,
हिसाब लगाते रहना होगा|

और तय है यह भी कि
इस पकडन में,
इस जकडन में,
ऐठन भी होगी,
तनाव भी होगा,
तंगी का अहसास भी होगा|

समय लाएगा ही लाएगा
घुटन भी,
विचलन भी,
विवशता भी,
और असली अलगाव भी|

असली मुक्ति,
पकड़ने से मुक्त रहने में है,
स्वतंत्रता,
जकड़ने से दूर रहने में है,
स्वायत्ता,
अपने साथ बंधी
पकडन,
और जकडन से
भी परहेज करने में है|

विकल्प हमेशा है-
या तो जकडन और पकडन
के रास्ते हैं –
जहां भीड़ है,
सबके साथ खड़े होने,
सबके साथ होने
के अहसास हैं,
पर समय ही
यह अहसास भी कराता है
कि ये साथ झूठे हैं,
नकली हैं,
तनाव और दुख के जन्मदाता हैं,
या फिर रास्ते हैं
आनंद के,
पर इन पर चलने की शर्त वही –
पकड़ो मत!
जकड़ो मत!

[राकेश]…

अप्रैल 15, 2013

मेरे गीत तुम्ही गाओगे

नयन के बादल घने हो गये

क्यों इतने अनमने हो गये

सुनो सुनो ऐ बंधु!

न रूठो, मुझको जीत तुम्ही पाओगे,

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

छोडो तुम यह रोना-धोना

चलो सजाओ स्वप्न सलोना

इतना तो विश्वास करो तुम

मेरी प्रीत तुम्ही पाओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

यह मौसम तूफानी देखो

कितना रेगिस्तानी देखो

ऐसे में मालूम मुझे था

मेरे मीत तुम्ही आओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

तुमने जीवन दान दिया है

गीतों का वरदान दिया है

इन्हें अमर भी कर जाए जो

वह संगीत तुम्ही लाओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 12, 2013

दिल का हाल सुनाओ तो सही

सूरज डूबेगा तो रात भी हो जायेगी ,

बाजी लगेगी तो मात भी हो जायेगी ,

धीरज खाना महज भूल है बड़ी

प्यार होगा तो मुलाक़ात भी हो जायेगी|

मुझे ज़िंदगी का फटा कफ़न सी लेने दो,

न बहलाओ उन्ही की आस पे जी लेने दो,

पीऊँगा न कल एक भी घूँट तुम्हारी ही कसम,

मगर आज तो जी भर के पी लेने दो|

आकर पास ज़रा, आँख मिलाओ तो सही,

दिल की बात को ओठों पे लाओं तो सही,

मालूम नहीं है पर मेरे दिल का हाल,

न हो, अपने दिल का हाल सुनाओ तो सही|

– ‘जगत्प्रसाद ‘सारस्वत

अप्रैल 8, 2013

मिटाने वाले …गजल (हंसराज ‘रहबर’)

ज़ख्म हंस हंस के उठाने वाले
फन है जीने का सिखाने वाले
आज जब हिचकी अचानक आई
आ गये याद भुलाने वाले

बात को तूल दिए जाते हैं
झूठ का जाल बिछाने वाले
रहनुमा जितने मिले जो भी मिले
हाथ पर सरसों उगाने वाले

लो चले नींद की गोली देकर
वो जो आये थे जगाने वाले
वे जो मासूम नज़र आते हैं
आग भुस में हैं लगाने वाले

सांच को आंच नहीं है ‘रहबर’
मिल गये हमको मिटाने वाले|

हंसराज ‘रहबर’

अप्रैल 7, 2013

मैं फिर भी उठ खड़ी होऊँगी – MAYA ANGELOU

तुम मुझे पराजित हुआ
साबित कर सकते हो इतिहास के पन्नों में
अपनी कड़वाहट और तोड़े मरोड़े झूठों के जरिये
तुम मुझे धूल -धूसरित कर सकते हो
पर मैं तब भी धूल की तरह ही उठ जाउंगी|

क्या मेरी जीवंतता तुम्हे विचलित करती है?
तुम निराशा के गर्त में क्यों गिरे हुए हो?
क्योंकि मैं ऐसे चलती हूँ
मानों मेरे पास तेल के कुएँ हों,
जो मेरे ड्राइंगरूम में तेल उगलते हैं,
चाँद और सूरज की तरह,
ज्वार की निश्चितता के साथ,
जैसे आशाओं का बसंत खिल आया हो,
मैं फिर भी उठ जाऊँगी|

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?
झुके हुए सिर और नीची निगाहों के साथ खड़ा हुआ?
कंधे ऐसे गिरे हुए जैसे आंसूं की बूँदें,
ह्रदयविदारक विलाप से कमजोर हुयी?
क्या मेरे गर्वीले दावे तुम्हे अपमानजनक लगते हैं?
क्या तुम्हे घोर परेशानी नहीं होती मेरे वजूद को स्वीकार करने में,
क्योंकि मैं ऐसे हँसती हूँ
मानो मेरे पास सोने की खाने हों,
मेरे घर के पिछवाड़े में|

तुम मुझे अपने शब्दों से मार सकते हो,
तुम मुझे अपनी आँखों से काट सकते हो,
तुम मुझे अपनी घृणा से मार सकते हो,
पर तब भी, हवा की तरह, मैं फिर से उठ जाऊँगी |

क्या मेरा आकर्षक और कामुक व्यक्तित्व तुम्हे
विचलित करता है,
क्या यह एक आश्चर्य के रूप में तुम्हारे सम्मुख आता है
कि मैं ऐसे नृत्य करती हूँ
मानों मेरे पास हीरे हैं,
मेरी जंघाओं के मिलने की जगह पर|

मैं इतिहास की लज्जाजनक झोंपडियों से
उठ जाऊँगी,
मैं दुख से भरे बीते समय से
उठ जाऊँगी,
मैं एक काला महासागर हूँ,
चौड़ा और ऊँची उछाल लगाता हुआ,
ज्वार से उत्पन्न थपेडों को सहन करता हुआ|

मैं आतंक और भय की रातों को पीछे छोड़कर
उठ जाऊँगी
आश्चर्यजनक रूप से चमचमाते दिवस के रूप में
मैं उठ जाउंगी
अपने पूर्वजों द्वारा दिए गये उपहारों को लिए हुए
मैं गुलाम का स्वप्न हूँ,
उसकी आशा हूँ,
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी
मैं उठ जाऊँगी

[ Still I Rise by Maya Angelou ]

 

अप्रैल 6, 2013

असाध्य वीणा : अज्ञेय

महान कवि अज्ञेय की जयन्ती (जन्म – 7 March 1911) के अवसर पर उनकी एक लम्बी कविता प्रस्तुत है| कविता – असाध्य वीणा, विचार, कल्पना, और भाषा तीनों के स्तर पर एक अनूठी कविता है| कविता बेहद खूबसूरत विम्ब रचते हुए आगे बढ़ती है और पाठक को सम्मोहित करके अपने खूबसूरत संसार में खींच ले जाती है और जब तक कविता पाठक की आँखों के सामने रहती है शब्द चित्र गढते रहते हैं| ऐसी दृश्यात्मक कवितायेँ बहुत नहीं होतीं|

आ गये प्रियंवद!  केशकंबली! गुफा-गेह !

आ गये प्रियंवद!  केशकंबली! गुफा-गेह !

राजा ने आसन दिया।

कहा ,”कृतकृत्य हुआ मैं तात ! पधारे आप।
भरोसा है अब मुझ को ,
साध आज मेरे जीवन की पूरी होगी !”

लघु संकेत समझ राजा का,
गण दौड़े ,  लाये असाध्य वीणा|
साधक के आगे रख उसको,  हट गये।

सभा की उत्सुक आँखें
एक बार वीणा को लख, टिक गयीं
प्रियंवद के चेहरे पर।

“यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रान्तर से,
घने वनों में, जहाँ तपस्या करते हैं व्रतचारी,
बहुत समय पहले आयी थी।
पूरा तो इतिहास न जान सके हम,
किन्तु सुना है
वज्रकीर्ति ने

मंत्रपूत जिस  अति-प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढा़ था,
उसके कानों में हिम-शिखर रहस्य कहा करते थे अपने,
कंधों पर बादल सोते थे उसकी करि-शुंडों-सी डालें,

हिम-वर्षा से पूरे वन-यूथों का कर लेती थीं परित्राण,
कोटर में भालू बसते थे,
केहरि उसके वल्कल से कंधे खुजलाने आते थे।
और सुना है,

जड़ उसकी जा पँहुची थी पाताल-लोक,
उसकी गंध-प्रवण शीतलता से फण टिका नाग वासुकि सोता था।
उसी किरीटी-तरु से वज्रकीर्ति ने
सारा जीवन इसे गढा़ ,
हठ-साधना यही थी उस साधक की.
वीणा पूरी हुई,

साथ साधना,

साथ ही जीवन-लीला।”

राजा रुके, साँस लम्बी लेकर फिर बोले ,
“मेरे हार गये सब जाने-माने कलावन्त,
सबकी विद्या हो गई अकारथ, दर्प चूर,
कोई ज्ञानी- गुणी आज तक इसे न साध सका,
अब यह, असाध्य वीणा ही, ख्यात हो गयी।
पर मेरा अब भी है विश्वास
कृच्छ्र-तप वज्रकीर्ति का व्यर्थ नहीं था,
वीणा बोलेगी अवश्य,

पर तभी,  इसे जब सच्चा स्वर-सिद्ध गोद में लेगा।
तात! प्रियंवद!

लो, यह सम्मुख रही तुम्हारे
वज्रकीर्ति की वीणा,
यह मैं, यह रानी, भरी सभा यह
सब उदग्र, पर्युत्सुक,
जन मात्र प्रतीक्षमाण !”
केशकंबली गुफा-गेह ने खोला कंबल,
धरती पर चुपचाप बिछाया,
वीणा उस पर रख, पलक मूँद कर प्राण खींच,
करके प्रणाम,
अस्पर्श छुअन से छुए तार।

धीरे बोला , “राजन !

पर मैं तो कलावन्त हूँ नहीं,

शिष्य, साधक हूँ,
जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी।
वज्रकीर्ति!,
प्राचीन किरीटी-तरु!
अभिमन्त्रित वीणा!,
ध्यान-मात्र इनका तो गदगद विह्वल कर देने वाला है।”

चुप हो गया प्रियंवद।
सभा भी मौन हो रही।

वाद्य उठा साधक ने गोद रख लिया,
धीरे-धीरे झुक उस पर, तारों पर मस्तक टेक दिया।

सभा चकित थी – अरे, प्रियंवद क्या सोता है?
केशकंबली अथवा होकर पराभूत
झुक गया वाद्य पर?
वीणा सचमुच क्या है असाध्य?

पर उस स्पन्दित सन्नाटे में
मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा,
नहीं,

स्वयं अपने को शोध रहा था।
सघन निविड़ में वह अपने को,

सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को
कौन प्रियंवद है कि दंभ कर
इस अभिमन्त्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?
कौन बजावे  यह वीणा जो स्वंय एक जीवन-भर की साधना रही?
भूल गया था केशकंबली, राज-सभा को ,
कंबल पर अभिमन्त्रित एक अकेलेपन में डूब गया था ,
जिसमें साक्षी के आगे था
जीवित वही किरीटी-तरु
जिसकी जड़ वासुकि के फण पर थी आधारित,
जिसके कन्धों पर बादल सोते थे
और कान में जिसके हिमगिरी कहते थे अपने रहस्य।
सम्बोधित कर उस तरु को,

करता था
नीरव एकालाप प्रियंवद।

“ओ विशाल तरु!
शत-सहस्त्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा,
कितनी बरसातों, कितने खद्योतों ने आरती उतारी,
दिन, भौंरे कर गये गुंजरित,
रातों में झिल्ली ने
अनथक मंगल-गान सुनाये,
साँझ सवेरे अनगिन
अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा काकलि
डाली-डाली को कँपा गयी|

ओ दीर्घकाय!
ओ पूरे झारखंड के अग्रज,
तात, सखा, गुरु, आश्रय, त्राता, महच्छाय,
ओ व्याकुल मुखरित वन-ध्वनियों के
वृन्दगान के मूर्त रूप,
मैं तुझे सुनूँ,
देखूँ,  ध्याऊँ
अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक ,
कहाँ साहस पाऊँ
छू सकूँ तुझे !
तेरी काया को छेद,

बाँध कर रची गयी वीणा को
किस स्पर्धा से
हाथ करें आघात
छीनने को तारों से
एक चोट में वह संचित संगीत,

जिसे रचने में
स्वंय न जाने कितनों के स्पन्दित प्राण रच गये?

“नहीं, नहीं !

वीणा यह मेरी गोद रखी है,  रहे,
किन्तु मैं ही तो
तेरी गोदी बैठा मोद-भरा बालक हूँ,
ओ तरु-तात !

सँभाल मुझे,
मेरी हर किलक
पुलक में डूब जाये,

मैं सुनूँ,
गुनूँ,
विस्मय से भर आँकू
तेरे अनुभव का एक-एक अन्त:स्वर
तेरे दोलन की लोरी पर झूमूँ मैं तन्मय,
गा तू ,
तेरी लय पर मेरी साँसें
भरें, पुरें, रीतें, विश्रान्ति पायें।
गा तू !
यह वीणा रखी है – तेरा अंग-अपंग।
किन्तु अंगी, तू अक्षत, आत्म-भरित,
रस-विद,
तू गा ,
मेरे अंधियारे अंतस में आलोक जगा
स्मृति का
श्रुति का –
तू गा, तू गा, तू गा, तू गा !

” हाँ मुझे स्मरण है –
बदली – कौंध – पत्तियों पर वर्षा बूँदों की पटपट।
घनी रात में महुए का चुपचाप टपकना।
चौंके खग-शावक की चिहुँक।
शिलाओं को दुलराते वन-झरने के
द्रुत लहरीले जल का कल-निनाद,
कोहरे में छन कर आती
पर्वती गाँव के उत्सव-ढोलक की थाप,
गड़रिये की अनमनी बाँसुरी,
कठफोड़े का ठेका,

फुलसुँघनी की आतुर फुरकन ,
ओस-बूँद की ढरकन-इतनी कोमल, तरल,

कि झरते-झरते

मानो हरसिंगार का फूल बन गयी,
भरे शरद के ताल,

लहरियों की सरसर-ध्वनि,
कूँजो का क्रेंकार,

काँद लम्बी टिट्टिभ की,
पंख-युक्त सायक-सी हंस-बलाका,
चीड़-वनो में गन्ध-अंध, उन्मद पतंग की जहाँ-तहाँ टकराहट
जल-प्रपात का प्लुत एकस्वर,
झिल्ली-दादुर, कोकिल-चातक की झंकार पुकारों की यति में
संसृति की साँय-साँय।

“हाँ, मुझे स्मरण है –
दूर पहाड़ों-से काले मेघों की बाढ़
हाथियों का मानों चिंघाड़ रहा हो यूथ।
घरघराहट चढ़ती बहिया की।
रेतीले कगार का गिरना छ्प-छड़ाप।
झंझा की फुफकार –  तप्त,
पेड़ों का अररा कर टूट-टूट कर गिरना।
ओले की कर्री चपत।
जमे पाले- से तनी कटारी-सी सूखी घासों की टूटन,
ऐंठी मिट्टी का स्निग्ध घाम में धीरे-धीरे रिसना,
हिम-तुषार के फाहे धरती के घावों को सहलाते चुपचाप।
घाटियों में भरती
गिरती चट्टानों की गूँज,
काँपती मन्द्र गूँज- अनुगूँज,

साँस खोयी-सी,
धीरे-धीरे नीरव।

“मुझे स्मरण है-
हरी तलहटी में, छोटे पेडो़ की ओट

ताल पर बँधे समय वन-पशुओं की नानाविध आतुर-तृप्त पुकारें ,
गर्जन, घुर्घुर, चीख, भूख, हुक्का, चिचियाहट,
कमल-कुमुद-पत्रों पर चोर-पैर द्रुत धावित
जल-पंछी की चाप,
थाप दादुर की चकित छलांगों की,
पन्थी के घोडे़ की टाप अधीर।,
अचंचल धीर थाप भैंसो के भारी खुर की।

मुझे स्मरण है
उझक क्षितिज से
किरण भोर की पहली
जब तकती है ओस-बूँद को
उस क्षण की सहसा चौंकी-सी सिहरन,
और दुपहरी में जब
घास-फूल अनदेखे खिल जाते हैं
मौमाखियाँ असंख्य झूमती करती हैं गुंजार,
उस लम्बे विलमे क्षण का तन्द्रालस ठहराव।
और साँझ को
जब तारों की तरल कँपकँपी
स्पर्शहीन झरती है –
मानो नभ में तरल नयन ठिठकी
नि:संख्य सवत्सा युवती माताओं के आशीर्वाद-,
उस सन्धि-निमिष की पुलकन लीयमान।

मुझे स्मरण है –
और चित्र प्रत्येक
स्तब्ध, विजड़ित करता है मुझको।
सुनता हूँ मैं
पर हर स्वर-कम्पन लेता है मुझको मुझसे सोख,
वायु-सा नाद-भरा मैं उड़ जाता हूँ।
मुझे स्मरण है –
पर मुझको मैं भूल गया हूँ
सुनता हूँ मैं
पर मैं मुझसे परे, शब्द में लीयमान।

“मैं नहीं, नहीं , मैं कहीं नहीं !
ओ रे तरु !

ओ वन !
ओ स्वर-सँभार,
नाद-मय संसृति !
ओ रस-प्लावन !
मुझे क्षमा कर,

भूल अकिंचनता को मेरी,
मुझे ओट दे, ढँक ले, छा ले|
ओ शरण्य !
मेरे गूँगेपन को तेरे स्वर-सागर का ज्वार डुबा ले !
आ,  मुझे भुला,
तू उतर वीण के तारों में
अपने से गा ,
अपने को गा,
अपने खग-कुल को मुखरित कर,

अपनी छाया में पले मृगों की चौकड़ियों को ताल बाँध,
अपने छायातप, वृष्टि-पवन, पल्लव-कुसुमन की लय पर,
अपने जीवन-संचय को कर छंदयुक्त,
अपनी प्रज्ञा को वाणी दे !
तू गा, तू गा,
तू सन्निधि पा,

तू खो ,
तू आ,

तू हो,

तू गा ! तू गा !”

राजा जागे
समाधिस्थ संगीतकार का हाथ उठा था –
काँपी थी उँगलियाँ।
अलस अँगड़ाई ले कर मानो जाग उठी थी वीणा
किलक उठे थे स्वर-शिशु।
नीरव पद रखता जालिक मायावी
सधे करों से धीरे- धीरे- धीरे
डाल रहा था जाल हेम तारों-का।
सहसा वीणा झनझना उठी –
संगीतकार की आँखों में ठंडी पिघली ज्वाला-सी झलक गयी,
रोमांच एक बिजली-सा सबके तन में दौड़ गया।
अवतरित हुआ संगीत
स्वयम्भू
जिसमें सोता है अखंड
ब्रह्मा का मौन
अशेष प्रभामय।
डूब गये सब एक साथ।
सब अलग-अलग एकाकी पार तिरे।

राजा ने अलग सुना,

“जय देवी यश:काय
वरमाल लिये
गाती थी मंगल-गीत,
दुन्दुभी दूर कहीं बजती थी|
राज-मुकुट सहसा हल्का हो आया था,

 मानो हो फल सिरिस का
ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष, चाटुता
सभी पुराने लुगड़े-से झर गये,

निखर आया था जीवन-कांचन
धर्म-भाव से जिसे निछावर वह कर देगा”।

रानी ने अलग सुना –
छँटती बदली में एक कौंध कह गयी,
“तुम्हारे ये मणि-माणिक, कंठहार, पट-वस्त्र,
मेखला किंकिणि,
सब अंधकार के कण हैं ये !

 आलोक एक है
प्यार अनन्य !

उसी की
विद्युल्लता घेरती रहती है रस-भार मेघ को,
थिरक उसी की छाती पर उसमें छिपकर सो जाती है
आश्वस्त, सहज विश्वास भरी।
रानी,
उस एक प्यार को साधेगी।“

सबने भी अलग-अलग संगीत सुना।
इसको-
वह कृपा-वाक्य था प्रभुओं का,
उसको-
आतंक-मुक्ति का आश्वासन ,
इसको –
वह भरी तिजोरी में सोने की खनक,
उसे –
बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुदबुद,
किसी एक को नयी वधू की सहमी-सी पायल-ध्वनि,
किसी दूसरे को शिशु की किलकारी,
एक किसी को जाल-फँसी मछली की तड़पन,
एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की,
एक तीसरे को मंडी की ठेलमठेल, गाहकों की आस्पर्धा-भरी बोलियाँ
चौथे को मन्दिर मी ताल-युक्त घंटा-ध्वनि।
और पाँचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोटें,
और छठे को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक,
बटिया पर चमरौंधे की रूधी चाप सातवें के लिये ,
और आठवें को कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल ,
इसे गमक नट्टिन की एड़ी के घुँघरू की ,
उसे युद्ध का ढोल ,

इसे संझा-गोधूली की लघु टुन-टुन,
उसे प्रलय का डमरू-नाद,
इसको जीवन की पहली अँगड़ाई,
पर उसको महाजृम्भ विकराल काल !
सब डूबे, तिरे, झिपे, जागे,
हो रहे वशम्बद,  स्तब्ध ,
इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी,
संधीत हुई,
पा गयी विलय।

वीणा फिर मूक हो गयी!

साधु ! साधु !
राजा सिंहासन से उतरे,
रानी ने अर्पित की सतलड़ी माल,
जनता विह्वल कह उठी, “
धन्य हे स्वरजित ! धन्य ! धन्य ! “

संगीतकार
वीणा को धीरे से नीचे रख, ढँक – मानो
गोदी में सोये शिशु को पालने डाल कर मुग्धा माँ
हट जाय, दीठ से दुलराती –
उठ खड़ा हुआ ।
बढ़ते राजा का हाथ उठा करता आवर्जन,
बोला ,
“श्रेय नहीं कुछ मेरा
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में
वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
सब कुछ को सौंप दिया था,
सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
न वीणा का था,

वह तो सब कुछ की तथता थी
महाशून्य
वह महामौन
अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय
जो शब्दहीन
सबमें गाता है।

नमस्कार कर मुड़ा प्रियंवद- केशकंबली।

लेकर कंबल गेह-गुफा को चला गया।

उठ गयी सभा । सब अपने-अपने काम लगे।
युग पलट गया।

प्रिय पाठक !

यों मेरी वाणी भी
मौन हुई ।

अज्ञेय

अज्ञेय ‘ के स्वर में इस कविता का पाठ सुनना आनंदित करने वाला अनुभव है|

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