Archive for जून, 2010

जून 30, 2010

अहिंसा हिंसा वाया गाँधी टैगोर

महात्मा गाँधी और गुरुदेव टैगोर एक साथ ठहरे थे और किसी कार्यक्रम में उन्हे एक साथ जाना था।

कार्यक्रम में जाने के लिये उन्हे देरी नहीं हो रही थी पर तब भी निकलने के वक्त से पहले ही गाँधी जी झटपट तैयार होकर गुरुदेव के अपने कमरे से बाहर आने का इंतजार करने लगे।

जब उन्हे इंतजार करते कुछ समय हो गया और गुरुदेव बाहर नहीं आये तो गाँधी जी गुरुदेव के कमरे में चले गये, कुछ तो इस उत्सुकता से कि गुरुदेव को इतना समय क्यों लग रहा है और कुछ इस भाव से कि कहीं देर न हो जाये नियत समय पर पहुँचने में।

वहाँ जाकर देखते हैं कि गुरुदेव बड़े इत्मिनान से शीशे के सामने बैठे बड़ी ही तल्लीनता से अपने लम्बे केशों और लहराती दाढ़ी को संवार रहे हैं।

गाँधी जी के लिये तो ऐसी शारीरिक साज सज्जा का कोई मतलब था नहीं और ऐसे मामलों में समय व्यतीत करना उन्हे समय नष्ट करने के बराबर लगता।

वे गुरुदेव से भी यही बोले,”आप भी क्या समय बेकार कर रहे हैं इन कामों में “।

सौंदर्य बोध से पूरी तरह जाग्रत कवि और कलाकर गुरुदेव अपने काम को जारी रखते हुये मुस्कुराते हुये बोले,” मैं तो अहिंसा के नियमों का पालन कर रहा हूँ “।

गाँधी जी कुछ चकित हो जाने के भाव से प्रश्नात्मक दृष्टि से गुरुदेव को देखने लगे।

गुरुदेव अपना श्रंगार खत्म कर चुके थे।

उन्होने कहा,”सभी लोग खूबसूरत चीज को देखकर अच्छा महसूस करते हैं जबकि बेतरतीब और अस्त व्यस्त माहौल सभी को परेशानी दे जाता है। अब आप ही बताइये कि किसी को नापसंदगी के भाव देना एक तरह की हिंसा हुयी कि नहीं? और अगर हम अच्छे ढ़ंग से किसी के सामने जाते हैं और उन्हे हमें देखकर अच्छा लगता है तो हमने अहिंसा के सिद्धांत का पूरी तरह पालन किया “।

गाँधी जी गुरुदेव की बात सुनकर मुस्कुराये। वे गुरुदेव की बात की गहरायी और चतुरायी दोनों को समझ गये।

उनकी तो सादगी में ही उनकी खूबसूरती छिपी थी। उनकी रचना तो लाखों करोड़ों भारतीय जो सादा जीवन ही जी सकते थे उनके साथ एकाकार होकर जीवन जीने से ही रचित हो जाती थी। उनसे अलग रुप लेकर तो वे अपनी रचना रच नहीं सकते थे। उन पर तो एक बहुत बड़े काम की जिम्मेदारी थी। उनकी रची रचना पर तो हजारों उपन्यास, लाखों कवितायें और करोड़ों चित्र बनाये जा सकते हैं। जनता जनार्दन के लिये तो उन्हे देखना ही अपने आप में उनसे जुड़ाव लेकर आता था और आज तक लेकर आता है।

दोनों महान विभूतियों के दृष्टिकोण अपने अपने रुप में सच थे और जीवन में सार्थकता बनाये रखे रहे।

महान व्यक्तियों की बातें भी महान होती हैं। उनके साथ घटने वाली घटनायें भी सामान्य मनुष्यों के लिये कुछ न कुछ शिक्षाप्रद समझ जन्मा जाती हैं।

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जून 30, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन लुट गये राम नाम की लूट के फेर में

जैसे विचित्र मुल्ला नसरुदीन वैसे विचित्र उनके साथ होने वाली घटनायें। एक झोंक में काम करने वाले व्यक्ति ठहरे नसरुद्दीन। अगर कुछ करने की सोच लें तो न आगा देखें न पीछा बस जुट जाते थे उस काम को पूरा करने में। दूसरों से सीखने का तो मतलब ही नहीं उठा कभी उनके जीवन में। वे तो सेल्फ मेड व्यक्ति थे वैसे ये बात दीगर है कि कितना निर्माण उनके द्वारा किये कामों से होता था और कितना विध्वंस उनकी हरकतों की वजह से हो जाता था। करने के बाद सोचना उनकी फितरत में था।

खैर घरवाले उन्हे उलहाना दिये रखते कि वे घर के किसी काम से मतलब नहीं रखते और मोहल्ले के बाकी लोग अपने परिवार के साथ घुमने जाते हैं उन्हे मेला दिखाने ले जाते हैं, सिनेमा दिखाने ले जाते हैं पर नसरुद्दीन हमेशा घर और परिवार को नजरअंदाज किये रखते हैं।

नसरुद्दीन इन रोज रोज के वाद विवादों से परेशान होकर वादा कर बैठे कि वे भी परिवार को कहीं न कहीं बाहर ले जाकर सबका मनोरंजन करायेंगे पर स्थान आदि उनकी अपनी मर्जी का होगा।

उनके परिवार वाले ऐसा कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे सो उन्होने झट से हाँ कर दी।

नसरुद्दीन ने सोचा कि मेरी शांति के दुश्मन इन लोगों को कहीं भी ले जाना बिना मतलब की परेशानी को मोल लेना है और सबसे अच्छा इन सबको फिल्म दिखाने ले जाना रहेगा, कम से कम सिनेमा हॉल के अंधेरे में मैं सो तो सकता हूँ।

नसरुद्दीन ने परिवार में क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री और क्या पुरुष सबको कह दिया कि अगामी रविवार को सब लोग तैयार रहें और वे उन सबको फिल्म दिखाने ले जायेंगे। चाहें तो वे लोग अपने अपने मित्रों को भी आमंत्रित कर सकते हैं।

पूरे मोहल्ले के लिये चर्चा का विषय बन गया नसरुददीन जैसे आदमी द्वारा परिवार और मित्रों को फिल्म दिखाने ले जाने का कर्यक्रम। रविवार तक पूरी फौज तैयार हो गयी फिल्म देखने जाने के लिये।

नसरुद्दीन उन दिनों तुलसी की राम चरित मानस का अध्ययन कर रहे थे। मुकेश द्वारा गायी राम चरित मानस की कैसेट्स तो उनके साथ ही रहती थीं और वे उनके वॉकमैन में बजती ही रहती थीं।

फिल्में उन्होने बहुत कम देखी थीं पर कुछ फिल्मी लोगों के नाम से वे परिचित थे। अपने रशियन दोस्तों से उन्होने राज कपूर और उनकी फिल्मों की रुस में लोकप्रियता के बारे में भी सुन रखा था।

शुक्रवार को ही राज कपूर की “राम तेरी गंगा मैली” प्रदर्शित हुयी थी। नसरुद्दीन ने फिल्म का नाम पढ़ा और सोचा कि धार्मिक फिल्म लगती है और राम का नाम शीर्षक में मौजूद है तो उनके जीवन के प्रसंग भी इसमें होंगे और हो सकता है कि मेरी रुचि से मिलती जुलती बातें भी फिल्म में मिल जायें। फिल्म के गाने चारों तरफ कुछ दिनों पहले से बजने लगे थे और नसरुद्दीन भी उन गानों से वाकिफ हो चले थे। लता मंगेशकर द्वारा गाया एक गीत “एक राधा एक मीरा” तो उन्हे इतना भाया कि उन्होने एक सज्जन से पूछ ही लिया कि किस फिल्म का गाना है और फिल्म का नाम जानकर उन्हे पूरी तसल्ली हो गयी कि वे एक धार्मिक फिल्म देखने जा रहे हैं। उन्होने तकरीबन दो दर्जन टिकट रविवार के मैटिनी शो के खरीद लिये।

रविवार आया। नसरुददीन सबको सिनेमा हाल ले गये।

सभी समझ गये होंगे कि नसरुद्दीन गये तो थे रामायण देखने और दिखाने पर वहाँ से लेकर आये महाभारत होने के बीज और कल्पना ही की जा सकती है कि कैसी फसल उगी होगी उन बीजों से। फिल्म शुरु होने के एक घंटे के अंदर ही सब लोग वापिस घर पर थे। नसरुद्दीन रास्ते से ही गायब हो गये।

विचित्रताओं के सम्राट नसरुद्दीन ऐसे घटनाचक्रों से दो चार तो होते ही रहते थे। ऐसा ही उन्होने कुछ बरस बाद फिर से किया। पर दूसरा किस्सा किसी और दिन।

…[ राकेश]

जून 29, 2010

दूर कहीं लोग जीवित हैं : डा. धर्मवीर भारती

कुछ ही दिन पूर्व डा. पुष्पा भारती ने एक और बरस का अनुभव अपने जीवन में जोड़ लिया और और 75 के पड़ाव से आगे के अनुभव संचित करने के लिये आयु के नये साल में प्रवेश कर लिया। उन्हे शुभकामनायें।

उनके पति, प्रसिद्ध कवि, लेखक एवम सम्पादक, स्व. डा. धर्मवीर भारती की एक कविता यहाँ प्रस्तुत है जो जीवन में सैंकड़ों मुश्किलों के बावजूद भी जिजीविषा को अपनाने की प्रेरणा देती है।

दीख नहीं पड़ते हैं पेड़
मगर डालों से
ध्वनियों के
अनगिनत झरने झर झर
तेज और मंद
हर झकोरे के संग
हवा चलती है
और ठहर जाती है।

सन्नाटा !
गूंगे के अबोले वाक्य सा –
जाग्रत है यह मेरा मन
पर निरर्थक है !

ट्रेन ने सीटी दी …
दूर कहीं लोग जीवित हैं
चलते हैं
यात्राऐं करते हैं
मंजिल है उनकी ।

याद पड़ता है कभी –
बहुत सुबह पौ फटने के पहले
मैने भी एक यात्रा की थी !
कच्ची पगडंडी पर
दोनो ओर सरपत की झाड़ों में
इसी तरह,
तेज हवा चलती थी,
और ठहर जाती थी।

सीटी फिर बोली –
सुनो मेरे मन
“हारो मत”
दूर कहीं लोग जीवित हैं
यात्राऐं करते हैं,
मंजिल है उनकी
!

जून 26, 2010

मन और देह के सत्य : सत्यम शिवम सुंदरम

देह का सत्य
हमेशा
मन का भी सत्य
नहीं होता।

जहाँ नजदीकी हो
और भय न हो खोने का
वहाँ पाने के लिये
मन पहले होता है,
देह सधी रहती है पार्श्व में,
धैर्य और आत्मविश्वास
की लय पर खूबसूरती
से मग्न होकर
नृत्य करती हुयी।


 

जहाँ हो कि
बस पा जायें किसी तरह तो अच्छा
वहाँ देह कूदकर आगे आ जाती है
मन की छाती पर पैर रख खड़ी हो जाती है।

वहाँ देह जीत
व्यक्ति को विजित करने का भाव
उभर आता है
मन को भी जीत जाने का
भ्रम भी उत्पन्न हो जाता है।

जहाँ गहरा जुड़ाव हो
वहाँ बिना मन
देह स्पंदन भी नहीं करती।

मन का सत्य
देह के सत्य
को भी समाहित कर लेता है
और यह ऐसा वर है
जो जीवन भर
साथ चलता है।

पर देह का सत्य
बिना मन जिन्दा रह तो लेता है
पर यह हमेशा
अल्पायु के श्राप
से शापित भी रहता है।


सत्यम शिवम सुंदरम
के तपोवन में
केवल देह के सत्य से
प्रवेश नहीं पाया जा सकता,
यह रास्ता तो जाता ही नहीं वहाँ,
इस देह से उस देह
की भूल-भुलैया में
खोकर ही रह जाता है।

वहाँ तो मन के सत्य के
कोमल उपवन से
से गुजर कर ही
प्रवेश मिल सकता है।

………………………………………………..

… [राकेश]

जून 24, 2010

अर्द्धनारीश्वर

हिन्दी में छपने वाली प्रसिद्ध पत्रिका हंस में इधर उधर छपी रचनाओं में व्याकरण की गलतियाँ ढ़ूँढ़ कर उन्हे सुधारने का सुझाव देने वाले, मनोरंजक और शैक्षणिक मूल्यों वाले एक स्तम्भ, अक्षरश: में इसके लेखक श्री अभिनव ओझा ने हंस के मई 2010 के अंक में अपने पहले ही सुधार में निम्नलिखित सुझाव दिया है,

हिजड़ा औरत या हिजड़ा मर्द नहीं होते मित्र! हिजड़ा अपने आप में अर्द्धनारीश्वर है “।

मूल पंक्ति थी ” उन तीन जवान हिजड़ा औरतों के कानों में यह बात पड़ी

श्री अभिनव ओझा की सुधारवादी पंक्तियों में कुछ पेंच हैं।

भारत में अर्द्धनारीश्वर की परिकल्पना हिन्दू मिथकों और विशेषकर शिव के अर्द्धनारी और अर्द्ध पुरुष रुप से जुड़े मिथक से पनपी है। यह सिर्फ मानव का लिंग निर्धारण करने वाले अंगों और उनमें किसी किस्म के अभाव आदि से जुड़ी छवि नहीं है बल्कि अर्द्धनारीश्वर रुप में शिव का पूरा शरीर ही स्त्री और पुरुष दो भागों का मिश्रण है।

तो ऐसे में किसी किन्नर को या किसी भी स्त्री या पुरुष को अर्द्धनारीश्वर कहा जाना संदेह उत्पन्न करता है। व्याकरण की दृष्टि से तो पता नहीं परंतु माइथोलॉजी की दृष्टि से तो ऐसा कहना गलत ही लगता है। यह तो ऐसा ही है जैसे किसी भी ब्राह्मण शूरवीर को परशुराम कहने लगो, और क्षत्रिय को रामराम और परशुराम नाम रखना और बात है या उन जैसा बताना और बात है परन्तु कोई कितना भी शूरवीर क्यों न हो, लोग उन्हे हिन्दू
माइथोलॉजी वाले राम और परशुराम तो नहीं कहने लगेंगे।

अर्द्धनारीश्वर, आधुनिक काल में ज्यादा उपयोग में आने वाले शब्द हरिजन जैसा शब्दमात्र नहीं है। अर्द्धनारीश्वर कोई खास वर्ग नहीं है। स्त्री, पुरुष और किन्नर तीन अलग अलग वर्ग हैं मनुष्य जाति के, पर अर्द्धनारीश्वर के साथ ऐसा नहीं है। अर्द्धनारीश्वर एक अतिविशिष्ट शब्द है और इसके पीछे एक विशिष्ट कथा है, इसके साथ एक विशिष्ट मिथक का जुड़ाव रहा है। यह तो महेश, शंकर और रुद्र की भाँति शिव का ही एक रुप है।

आम आदमी किन्नरों को भले ही एक ही परिभाषा से समझता हो या उनकी प्रकृति से अंजान रहता हो पर व्यवहार में यही देखने में आता है कि किन्नर भी अपने आप को स्त्री किन्नर या पुरुष किन्नर रुप में प्रस्तुत करते हैं हाँलाकि नाचने और गाने वाला काम करते हुये वे अधिकतर स्त्री वेश में ही ज्यादा देखे जाते हैं।

सिर्फ व्यवहार में ही ऐसा नहीं होता कि कोई स्त्री  एक पुरुष जैसा व्यवहार करे उस जैसी आदतें और प्रवृति और प्रकृति रखे और कोई पुरुष एक स्त्री जैसा रहे बल्कि अस्तित्व की गहराई में तो हरेक स्त्री के अंदर एक पुरुष भी है और हरेक पुरुष के अंदर एक स्त्री। पुरुषों में ऊपरी सतह पर पुरुष गुण अधिकता में होते हैं और स्त्री में स्त्रियोचित गुणों की अधिकता होती है। पर बने तो दोनों स्त्री पुरुष के संगम से ही हैं।

मूल विषय पर वापिस आयें तो प्रश्न उठता है कि अर्द्धनारीश्वर तो छोड़िये क्या किन्नर को अर्द्धनारी भी कहा जा सकता है?

यदि हाँ तब तो अर्द्धपुरुष भी किन्नरों में ही होने चाहियें?

कोई जानकार इस बारे में कुछ कह पायेगा क्या? हो सकता है लोग अर्द्धनारीश्वर शब्द का प्रयोग किन्नर समुदाय के लोगों के लिये करते रहे हों पर क्या यह उचित है?

ऐसा देखा गया है कि प्राय: हिजड़ा शब्द तब प्रयोग में लाया जाता है जब सामान्य नर नारी किन्नरों को अपने से थोड़ा नीचे का दर्जा देकर देखते हैं और कई लोग तो इस वर्ग को अपमानित करने की मंशा से हिजड़ा शब्द का प्रयोग करते हैं। पुरुषों को अपमानित करने की मंशा से भी उन्हे हिजड़ा शब्द से सम्बोधित किया जाता है और ऐसा वातावरण तैयार करने में साहित्य और खास कर फिल्मों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया है, मानो पुरुष का पौरुष सिर्फ उसकी सैक्सुअल संभावना और क्षमता से मापा जा सकता है!

किन्नर भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से चला रहा एक वृहद रुप से स्वीकृत नाम है और क्यों न इसी एक नाम का उपयोग किया जाये इस वर्ग को सम्बोधित करने के लिये!

जून 23, 2010

सीटी बुला रही है

भारत जैसे देश में इतनी सारी भाषायें और बोलियाँ बोली जाती हैं और किसी भी भारतवासी को देश में सदियों से चली आ रही इन विभिन्नताओं पर गर्व होना चाहिये और बहुत सारे भारतीयों को गर्व होता भी होगा और है भी परन्तु यह भी देखा गया है कि कई मर्तबा बड़े बड़े झगड़े भाषा और बोलियों की भिन्नता के कारण भी जन्माये गये हैं। जन्माये गये कहना ही उचित है क्योंकि ऐसा लगता नहीं कि भाषा, जो कि एक मनुष्य के दूसरे मनुष्य तक अपनी संवेदनायें और भावनाओं आदि को पँहुचाने का माध्यम है, दो व्यक्तियों को आपस में लड़वा सकती है जब तक की एक दूसरे के ऊपर वर्चस्व स्थापित करने की राजनीतिक भावना का प्रदुषण उनके दिमाग में घर न कर ले।

भाषायें शब्दों पर निर्भर हैं और समय के साथ बोलने और लिखने वाली भाषाऐं खो सकती हैं। आज पाली और प्राकृत, जो कि कभी भारत में बहुत बड़े पैमाने पर प्रचलन में थीं, आदि को तो छोड़ ही दीजिये संस्कृत तक भी ऐसी भाषा बन गयी है जिसे जानने और समझने वाले लोग संख्या में बहुत कम हैं।

मनुष्य पर कैसा भी शब्दाभाव का संकट आ जाये पर इशारों की भाषा कभी लुप्त नहीं होगी और ऐसा ही अभिव्यक्ति के उन माध्यमों के बारे में कहा जा सकता है जो शब्दों पर निर्भर नहीं हैं। आवाज के द्वारा भावों का संप्रेषण किन्ही भी परिस्थितियों में किया जा सकता है और जरुरी नहीं कि किसी भाषा के शब्द बोलकर ही ऐसा किया जाये। वाद्य यंत्रों द्वारा बजाया संगीत भाषा पर निर्भर नहीं है और वह अपने विशुद्ध रुप में भी सुनने वाले को प्रभावित कर सकता है।

सीटी भी एक ऐसा ही वाद्य यंत्र है जो हरेक मनुष्य के पास प्राकृतिक रुप से होता है और वह इसे विकसित कर सकता है। अकेला आदमी अपनी ही धुन में चलते हुये कब सीटी बजाने लगता है उसे पता भी नहीं चलता। सीटी बजाने के दुरुपयोग भी होते हैं पर मनुष्य तो पारंगत है हरेक सुविधा का दुरुपयोग करने में। चाकू से लोग मारे भी जाते हैं पर दुनिया में चाकू बनाये जाने तो बंद नहीं किये जाते और न ही उनका उपयोग करना बंद किया जाता है।

नीचे दिये वीडियो में देखिये कैसे लोग सीटी बजाने को भाषा के विकल्प के रुप में उपयोग में ला रहे हैं।


मनमोहन देसाई की देशप्रेमी में भाषा के सवाल पर एक दूसरे का सिर फोड़ने को तैयार क्रोध में अंधे लोगों को रोकने के लिये अमिताभ यह भी गा सकते थे,

नफरत की लाठी फेंको, सीटी बजाओ मेरे देश प्रेमियो

जून 22, 2010

रावण और अमिताभ बच्चन : नैतिक और जिम्मेदार पत्रकारिता का क्या होगा

इस बात से इंकार करना मुश्किल हो जायेगा कि पिछले दस पंद्रह सालों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पूरी तरह से भारत में बस जाने के बाद से TRP के भूत और रिपोर्टंग में कुछ भी कह देने की प्रवृति ने प्रिंट मीडिया को भी अपने वश में कर लिया है और अब बहुत सारे पत्रकार रिपोर्ट करने से पहले मामले की थोड़ी सी भी छानबीन करना जरुरी नहीं समझते।

सबसे पहले – सबसे आगे – सबसे तेज, जैसे शब्द पत्रकारिता के बेहद जिम्मेदारी भरे कर्तव्य पर जल्दबाजी के कारण गैर-जिम्मेदारी का मुलम्मा चढ़ाने में कामयाब हो गये हैं। अब किसी भी बात का बतंगड़ बना दिया जाता है। झूठ को इतनी शक्ति से और जोर शोर से प्रसारित और प्रचारित किया जाता है कि एकबारगी जो बताया जा रहा है वह सच लगने लगता है और अगर पाठक या दर्शक अपनी आँखों से न देख लें तो वे रिपोर्ट की गयी बातों को ही सच मान लेते हैं।

हालात उस निम्न स्तर तक पहुँच गये हैं जहाँ अगर मीडिया गलत रिपोर्टिंग करता हुआ पकड़ा भी जाये तो वह कोई क्षमा याचना नहीं करता बल्कि उसके द्वारा सीनाजोरी वाली प्रवृति ही ज्यादा दिखायी जाती है।

लोकतंत्र का यह स्तम्भ कभी बेहद मजबूत, स्वस्थ, निष्पक्ष, और कर्तव्यपरायणता हुआ करता था और जवाबदेही की भावना से ओतप्रोत रहा करता था पर बदले समय ने इसे भी बहुत हद तक बाजारु बना दिया है और इसके सरोकारों को पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने के कारण संदेहास्पद बना दिया है।

चिंताजनक बात यह है कि यह न तो लोकतंत्र के लिये अच्छा है और न ही मीडिया के लिये। भेड़िया आया की तर्ज पर यदि मीडिया की झूठे और गैर जिम्मेदार होने की छवि बनती चली जायेगी तो दिन दूर नहीं जब इसकी विश्वसनियता बिल्कुल ही खत्म हो जायेगी।

यूँ तो अमिताभ बच्चन से जुड़ी नवीनतम घटना छोटी सी है पर यह मीडिया की गैर जिम्मेदाराना हरकत को स्पष्टत: दर्शाती है इसलिये इस घटना को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर फिल्मफेयर के सम्पादक जितेश पिल्लई को रावण फिल्म के ऊपर निम्नलिखित ट्विट्स लिखे।

@jiteshpillaai  Yes it was all there, but sadly edited. Abhishek’s erratic behavior was due to symbolic 10 heads visually appearing..contd

@jiteshpillaai  contd ..and each giving him different attitudes to adopt for a situation, he would then finally shake them off and decide ..

@jiteshpillaai  ..in the edit all the visual heads got cut and you see a confused Beera expression and wonder why .. it was after he removed

@jiteshpillaai  .the other head visuals from his thinking.. in the edit you see the after effect of that thinking process, hence inconsistent

और मीडिया और समाचार पत्रों ने अमिताभ द्वारा लिखी बातों को इस बात के रुप में प्रचारित किया कि “अमिताभ रावण फिल्म की एडिटिंग से नाराज हैं“।

अमिताभ फिल्म के केवल  उन दृष्यों की बात कर रहे हैं जिन दृष्यों में बीरा द्वारा अपने सिर को इधर उधर हिलाने और उस वक्त कुछ जिबरिश सा कहने को दिखाया गया है, पर पत्रकारों ने बिना पूरी बात समझे प्रचारित करना शुरु कर दिया कि अमिताभ रावण के संपादन से नाराज हैं।

अमिताभ बिल्कुल रावण के संपादन या निर्देशन या पूरी फिल्म से ही नाराज हो सकते हैं परन्तु उनके जिन ट्विट्स को उदाहरण के तौर पर मीडिया ने उठाया है वहाँ वे कतई वे बातें नहीं कह रहे हैं जो मीडिया प्रचारित कर रहा है।

कुछ रिपोर्ट्स तो कल्पना में इतना आगे बढ़ गयी हैं कि वहाँ ऐसा अमिताभ बच्चन के ब्लॉग के हवाले से लिखा है जबकि अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर रावण की तारीफ में ही एक संक्षिप्त सा ब्लॉग लिखा था। जाहिर है लिखने वाले पत्रकारों ने न उनका ब्लॉग पढ़ा और न ही ढ़ंग से उनके ट्विट्स ही बाँचे।

जाहिर है कि ऐसे सनसनीखेज शीर्षक और खबरें देने से रिपोर्ट को ज्यादा फोकस मिल सकता है पर इस प्रक्रिया में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और नैतिकता का क्या हश्र हो रहा है?

बात छोटी सी है पर यही सब बहुत महत्व के मामलों में भी हो रहा है।

क्या चल रहा है यह?

सबसे चिंताजनक बात है कि ऐसी निम्न कोटि के हथकंडों भरी पत्रकारिता के प्रचलन में आने से नैतिकता भरी पत्रकारिता करने वाले बेहद प्रतिभावान पत्रकार और मीडियाकर्मी पीछे रह जाते हैं। उन्हे पुरातनपंथी कहकर पीछे ढ़केल दिया जाता है और उन्हे कुंठा में जीने को विवश किया जाता है।

ऐसी प्रवृति पत्रकारिता जैसे समाज के लिये बेहद महत्वपूर्ण और सम्मानजनक क्षेत्र के लिये शुभ नहीं है।

जून 19, 2010

कुमार विश्वास : बरसों पुरानी दो कविताओं का स्मरण

एक मित्र ने प्रसिद्ध कवि डा. कुमार विश्वास की दो पुरानी कवितायें भेजी हैं जो डा. विश्वास ने 1992 या 1993 में उनके शैक्षणिक संस्थान में हुये कवि सम्मेलन में सुनायी थीं। उनकी इन दोनों शुरुआती कविताओं से भी इस बात के पूरे पूरे सुबूत मिल जाते हैं कि इन बरसों में वे क्यों देश के एक जाने माने कवि बन गये हैं।

डा. विश्वास की कविताओं को पढ़ने वाले पाठकों और उनके ही मुख से सुनने श्रोताओं में उम्र के फासले खत्म हो जाते हैं क्योंकि कविता में कुछ न कुछ ऐसा जरुर होता है जो हर उम्र पाठक और श्रोता को आकर्षित कर सके।

मंच से श्रोताओं से एक जीवंत सम्बंध करने में तो वे पारंगत हैं हीं।

इन कविताओं के वीडियो शायद उपलब्ध न हों यू ट्यूब पर।

मित्र ने अपनी स्मृति के सहारे दोनों कविताओं को याद रखा हुआ था और बाद में कभी कागज पर लिख भी लिया था। हो सकता है स्मरण के सहारे भेजी कवितायें वास्तव में ज्यादा लम्बी हों।

पहली कविता में डा. विश्वास प्रेमियों और दूसरे लोगों द्वारा प्रियजनों के हमेशा के लिये बिछुड़ जाने पर की जाने वाली आत्महत्या की प्रवृति पर उन्हे वास्तविकता का बोध कराते हैं।

फक़त एक आदमी के लिये
ये दुनिया छोड़ने वालो
फक़त एक आदमी से
ये जमाना कम नहीं होता

दूसरी कविता में डा, विश्वास प्रेमी के अभिमान को दर्शाते हैं।

बहुत मशहूर हो तुम
बहुत मशहूर हैं हम
बहुत मसरुफ हो तुम
बहुत मसरुफ हैं हम
बहुत मगरुर हो तुम
बहुत मगरुर हैं हम
अत: मजबूर हो तुम
अत: मजबूर हैं हम

नोट : इन कविताओं को यहाँ प्रस्तुत करने का एकमात्र उद्देश्य पाठकों को डा विश्वास की दो पुरानी कविताओं से परिचित कराना है और यदि डा विश्वास या उनके प्रकाशकों को इस पर आपत्ति होगी तो कवितायें हटा दी जायेंगी।

जून 17, 2010

सूर्योदय जीवनोदय

खामोश
रुठे रुठे अंदाज में

चलती ज़िन्दगी
उदास दिल
जाने किन तूफानों के
आने की आशंकाओं से ग्रस्त


ऐसे ही चल रहा था
ऐसे ही चलता रहता
अगर उस सुबह
अचानक
सूरज की इठलाती किरणों ने
एक वृत बनाकर मुझे घेर न लिया होता

और छेड़ते हुये
मुस्कराकर पूछा न होता
हाल कैसा है श्रीमान का


बस सब कुछ ठिठक सा गया क्षण भर में
कुछ भारी भरकम सा था
जो पिघल कर बह गया
सूरज की ऊष्मा से

सूरज की किरणों ने एक भरपूर अँगड़ायी ली
और कानों में शंखनाद किया
सुनो मित्र रोज
जीवन का आगमन होता है मेरे साथ
इसे जियो

बस इतना मंत्र सुनना था
कि कान चारों तरफ गूँज रहे
पक्षियों का कलरव
भी सुनने लगे
हर तरफ तो
मौजूद था जीवन का संगीत|

… [राकेश]

जून 16, 2010

द्वयक्षर श्लोक : केवल दो अक्षरों से कमाल

द्वयक्षर श्लोक में, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, केवल दो ही अक्षरों का उपयोग करके श्लोक की रचना की जा सकती है।

क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर

कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक

अनुवाद :

क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता,

दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत

रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला ,

रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी (था)

(महाकवि माघ की रचना से)

पुनश्च: – एकाक्षर श्लोक [जहाँ केवल एक ही अक्षर (व्यंजन) का प्रयोग किया जा सकता है] का उदाहरण

यहाँ देख सकते हैं।

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