Posts tagged ‘Sapne’

मार्च 6, 2015

लीक पर वे चलें जिनके…

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

मार्च 15, 2014

छिल रहे हैं मेरे सपनो के नर्म अहसास

मत कहो तुम कुछ mirrorwoman-001

सुन तो हम तब भी लेंगे

रोक लो खुद को चाहे

कितना ही,

आँखे बोल देंगी तुम्हारी

होंठ मेरे सब खुद-ब-खुद  सुन लेंगे

आओ लो संभालो अपनी अमानत

बहुत दिनों से तुम्हारे लिए इसे

खाद पानी दे के बड़ा किया है

अब इसका क़द मुझसे ऊंचा हो रहा है

तुम्ही हो जो रख सकती हो इसे अपने साए में

बहुत बेचैन रहता है तुम्हारी नर्म बाहों को

संभालो कि इस से छिल रहे हैं

मेरे अपने ही सपनो के नर्म अहसास…

तुम्हारे प्रति मेरे प्यार की साँसे

उखड़ जाएँ

उससे पहले आ जाओ…

Rajnish sign

जनवरी 11, 2014

तुम हो…तुम रहोगी..

सारी हसरतें सब तमन्नाएँ love story-001

रंगीन उमंगें खो गयीं थी कहीं

तुम नहीं थीं

जब नहीं थी तुम…

तब

कवितायें सो गयीं थी कहीं

दब कुचल कर उदासी के बोझ तले

पलकों पे रखा प्रेम का मोती

पिघल जाता था आंसुओं में…

तुम नहीं थी जब…

बहुत ज़मानों के बाद फिर…

कल याद दिला दिया आकर…

तुमने कि…

है मुझमे कहीं बाकी कुछ

वज़ह मुस्कुराने की मरी नहीं अभी…

सपने फिर जिए जा सकते हैं

तुम थीं नहीं!

तुम हो…

तुम हो

और

तुम रहोगी…

Rajnish sign

दिसम्बर 22, 2013

मेरा ये नशा…

नशाlovers-001

चढ़ता है जब हौले हौले

सब कुछ रंगीन लगता है

मन में तरंग

तन में उमंग

आँखों में सपने

लाल डोरे खिंचते से

रक्त-शिराएँ तनती सी

उष्ण उत्तप्त कल्पनाएँ…

सब कुछ अपना

खुद जहाँपनाह

केवल मैं…

और केवल मैं….

अपने में ग़ुम…

सुबह से शाम

बस…नशा… नशा

और नशा…

नशा और उसका असर…

जब हो तो…

और जब ना हो तो

टूटने लगता है…

ऐंठने लगता है…

ये तन…ये मन…

बिखरने लगता है अपना साम्राज्य

शीशमहल जैसे चूर…

किरच किरच…

चुभता है सब कुछ…

धूप भी…

अँधेरा भी…

जलाता है सब कुछ

तपता दिन भी…

ठंडी रात भी

शराब मगर बेखबर…

कोई जिए

कि कोई मरे…

कोई जले

कि कोई फूंके…

कोई बिखरे

कि कोई तडपे…

बहुत कुछ तोड़ जाता है मगर ..Rajnish sign

दिसम्बर 18, 2013

एक रात की दो चिंताएँ…

उसकी बड़ी सी akhiri-001

कटोरेदार आँखों में

तरलायित सपने हैं

हर करवट पर

जब ऊपर नीचे होती है

आँख की पुतली

बदल जाता है रंग,

सपनों का|

घर- सुंदर सा छोटा घर

उमंगें-

प्रियतम के साथ

जीना -मरना,

सांसों की लय

सब कुछ साझा बाँट लेना चाहती है वह|

दूसरी चिंता अबूझ है

चटक रंग है

गोया कैनवास में अमूर्त रंग

दिन भर की भागदौड

थकन से चूर

बिस्तर पर करवटों से

पहली ही नींद का डेरा

काम, यश-कीर्ति के स्वपनों का घेरा

पहली चिंता की चिंता पर

घर से जुडी

स्नेह की डोर

भारी है

अधिक सोच से पहले ही

भारी हो चली हैं, आँखें

नींद समेट लेती है,

सब-कुछ !

Yugalsign1

दिसम्बर 2, 2013

ताबीर बख्शो…

अब आ गयी हो तो ताबीर बख्शो mansun-001

इन ख़्वाबों को

मैंने तुम्हारे गिर्द रोज़ बुने हैं

गुलाबी से चंद ख्वाब हैं मेरे

तुम्हारे हाथ हाथों में लेके

सूरज से आँख मिलाने का

ख्वाब

तुम्हारे साथ चल कर

क्षितिज तक जाने का

ख्वाब

और उस से भी पहले

तुम्हारी आँखों में

डूब जाने का

ख्वाब

और भी

बहुत, बहुत रंगों के

सपने हर वक़्त देखता हूँ मैं

तुम्हारे रंग से रंगे

तुम्हारे रंग में ढले

आ जाओ

इन्हें जीवन दे दो

अगर कोई भी बहाना

तुम्हे यहाँ ला सकता हो तो

आ जाओ…

Rajnish sign

नवम्बर 29, 2013

महकता चहकता फिरता हूँ

महकता बदनwoman-001

रेशम सी छुअन

नज़र भर शफक

शर्म की सिहरन

जिस के देखे को तरसते थे

आज संग चलती है…

रखता  है दहका  के मुझे

तुम्हारा  शीशे सा बदन…

आज कहे बिना रहा नहीं जाता

तुमने पूछा भी कि

मैं क्या सोचता हूँ

पूछा है तो सुनो

जिस किसी शाम

मेरे सपने उगते हैं तुम्हारे कंधो पे

उस शाम की महक में

तुम्हारी साँसे घुल जाती हैं

रात भर बूँद बूँद उतरती है

ये खुशबू मुझमे…

और फिर महकता चहकता रहता हूँ

मैं दिन भर…

Rajnish sign

नवम्बर 19, 2013

युवा मन बूढ़े क़दम

तीर पर ganga-001

शोर है –

लहरों का

पीछे छूट गये शहरों का

मन के खुलते बंद होते पहरों का!

तीर पर

छोर  है –

आशाओं का

निराशा लाती विलासिताओं का

डगमगाते पदों से भरी प्रत्याशाओं का!

तीर पर

अशांति है-

सुनहरे सपनों की

ठहराव चाहते अपनों की

युवा मन से तालमेल बिठाते बूढ़े क़दमों की!

Yugalsign1

नवम्बर 16, 2013

चिराग जिस्मों के

होता  है अहसास बहुत अलग सा  dreamwo-001

जब

आँखे खोलते हैं

सपने मेरे

तुम्हारी बाहों में…

अजब सी इक सिहरन

जैसे

छू  गयी हो लपक के बिजली आसमान की

दिल दिमाग सुन्न बस…

  वश में तुम्हारे सब|

एक ही ख्वाहिश रह जाती है

बस कि

चैन पाएं

मुंह छुपा कर

तुम्हारे सीने में…

सपने मेरे हद बेचैन

जागा करते हैं रात भर

आओ कि

इन्हें चैन से  नींद तो आये

रौशन रहे रात

चिरागों की तरह जलते जिस्मों की बदौलत

आओ कि

फिर चाहे सुबह न उगे

चाहे तो आए

कि फिर न दिन आए…

(रजनीश)

फ़रवरी 27, 2013

बस ऐसे जीवन बीत गया

कितने तूफानों से गुजरा

कितनी गहराई में उतरा

दोनों का ही कुछ पता नहीं

बस ऐसे जीवन बीत गया |

राजीव-नयन तो नहीं मगर मद भरे नयन कुछ मेरे थे

इन उठती-गिरती पलकों में खामोश सपन कुछ मेरे थे |

कुछ घने घनेरे से बादल

कब बने आँख का गंगाजल

दोनों का ही कुछ पता नहीं

बस ऐसे जीवन बीत गया

कब कैसे यह घट रीत गया|

जगती पलकों पर जब तुमने अधरों की मुहर लगाईं थी

तब दूर क्षितिज पर मैंने भी यह दुनिया एक बसाई थी |

कितनी कसमें कितने वादे

आकुल-पागल कितनी यादें

दोनों का ही कुछ पता नहीं

किस भय से मन का मीत गया

मैं  हार गया वह जीत गया|

तुम जब तक साथ सफर में थे, मंजिल क़दमों तक खुद आई

अब मंजिल तक ले जाती है मुझको मेरी ही तन्हाई|

कब कम टूटा कब धूप ढली

उतरी कब फूलों से तितली

दोनों का ही कुछ पता नहीं

कब मुझसे दूर अतीत गया

बस ऐसे जीवन बीत गया

{कृष्ण बिहारी}

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