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सितम्बर 9, 2016

सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना (पाश)

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होतीDBZ-001
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना – बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्‍त काट लेना – बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जो सबकुछ देखती हुई भी ठण्डी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणतया को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है

सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर कत्ल-काण्ड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आँखों में मिर्चों की तरह नहीं लड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुंचने के लिए
जो विलाप को लाँघता है
डरे हुए लोगों के दरवाज़े पर जो
गुण्डे की तरह हुँकारता है

सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते
चिपक जाता सदैवी अँधेरा बन्द दरवाज़ों की चैगाठों पर

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाये
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाये

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

paash

[अवतार सिंह संधू “पाश” (जन्म – 9 सितम्बर 1950)]

जून 4, 2014

प्रेम का वो अदभुत अनुभव

निमंत्रण akhiri-001

…………………..

आओ थोडा प्यार कर लें

चूम लें तुम्हे

आंसुओं से धुली आँखों की

पाक नज़रों में बसी उदासी को

विरह में जलते ह्रदय से उठती भाप

से सूखे पपडाए होंठो को

चूम ले तुम्हारे तपते माथे को

आओ रख दें होंठ अपने

जलते तुम्हारे बदन पे

ख़त्म कर दें खुद को

तुम्हारी तपिश मिटाने में

आओ ना!

… …. …. …. …. ….

प्रणय 

…………………………………………….

 

नीले  नीम अँधेरे उजाले में

आती हो जब दबे पाँव सकुचाई

डरी सहमी हिरनी सी

देखता रह जाता हूँ

तुम्हारे आभूषण जडित रक्तिम बदन को …

जैसे लाल आग  नीली लपटों में घिरी…

तुम्हारे बदन की  लालिमा

जैसे धीरे धीरे

उतरती है मेरी आँखों में…

ये कैसा नशा है?

ये किसका नशा है?

उस मदिरा का जो तुमने पिलाई थी सुराही से

या उस का जो टपक रही है तुम्हारी मद-भरी आँखों से?

 

moonlit-001बहक रहा है सारा आलम चारों ओर

पिरा रहा है बदन कि जैसे टूटना चाहता  हो

उफ़! ये तुम्हारी अंगड़ाई

आकार-प्रकार बदलता तुम्हारा जिस्म

जैसे चुनौती दे रहा हो कि आओ

समेट लो और भींच लो बाँहों में…

बढता ही जाता है शोर साँसों का

अपने आप मेरा बदन

ले  लेता है तुम्हारे बदन को अपने आगोश में

तुम विरोध भी करती हो और

समाती भी जाती हो

मेरे  आगोश में

मदहोश करती जाती है

तुम्हारे बदन की छुअन

दीवाना कर  रही  हैं  तुम्हारी  बाँहें

तुम्हारा  उन्नत  यौवन …

रेशमी  मखमली  बदन …

 

होश  कहाँ   अब  तुम्हे भी …

मैं पढ़ सकता हूँ तुम्हारी आँख के खिंचते डोरे

पता कहाँ चला

कब मेरे होठों ने

बात शुरू कर दी तुम्हारे होठों से

सच मानों

तुम्हारा आज का रूप कुछ और ही है

तोड़ती जाती हो वो बंध जो खुल नहीं पाते

डरी सहमी शर्मीली हिरनी की खाल से

निकल कर सामने आ रही है

कामोन्मत्त  सिंहनी…

जो निगल जाना चाह रही है यूँruhdark-001

समूचा मुझको पिघला के

समो लेना चाह रही मुझ को खुद में

हैरान हूँ मैं

कि कैसे पार कर दी तुमने

उन्मुक्तताओं की सीमाएं सारी

उफ़! ये तुम्हारा शीशे सा पिघलता जिस्म…

और  ये उठता  गिरता साँसों का ज्वार…

इस ज्वार में बह जाने को बेक़रार तुम और मैं…

हो जाते हैं एक …

एक तूफ़ान सा गुज़र जाता है जैसे

होश आता है तूफ़ान के बाद

जो अपने पीछे छोड़ जाता है…

एक डरी सकुचाई हिरनी

लेकिन तृप्त अहसासों से  भरी

मैं आज गवाह हुआ हूँ

हमारे एक सबसे उन्मुक्त देह-संगम का

हिरनी -सिंघनी-हिरनी परिवर्तन का

 

 अभिसार के बाद

………………………………………………………………..

अब जब सब बीत गया है तो मुझे अचरज होता है

न जाने क्या था जो मुझ पे छाया था….

नशा… खुमार…. उन्माद… जूनून…

गर्म अहसास तुम्हारे नर्म जिस्म का

अनावृत जिस्म

विवश करे दे रहा था मुझे

कि खूबसूरती के उदाहरणों को देखूं

या सुखद स्पर्शों का अहसास करूँ

मेरी दुविधाओं को बढ़ातीं

बंद हुयी कभी कभी खुल जाने वाली तुम्हारी आँखें

जो मेरी आँखों में झाँक कर मुझे आमंत्रित करतीं

और फिर मेरा जवाब पा

शर्मीले भावों से भर फिर से मुंद जातीं

सबसे बढ़titan-001कर मुझे मोह रहा था

मेरी ख़ुशी में सुख तलाशता

तुम्हारा समर्पण…

मेरी भावनाओं का ज्वालामुखी तो फटना ही था…

सच है मैंने कुछ किया नहीं था

सारे असर तुम्हारे थे

मैं तो जैसे जी गया था उन लम्हों में

जब तुम्हारे आगोश में सोया था

निश्चिन्त…

निर्द्वंद…

संतुष्ट…

Rajnish sign

 

मई 31, 2014

मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको…

आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप कोminorgirlsbadayun
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी इक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजू पार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाँहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा, ‘काका, तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िंदा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें’

बोला कृष्ना से – ‘बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से’

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए सरपंच के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लंबी नोक पर
देखिए सुखराज सिंह बोले हैं खैनी ठोंक कर

‘क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
न पुट्ठे पे हाथ रखने देती है, मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी’

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुरज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी सँभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेर कर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने –
‘जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने’

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोल कर
इक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर, ‘माल वो चोरी का तूने क्या किया?’

‘कैसी चोरी माल कैसा?’ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा

होश खो कर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर –

“मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो”

और फिर प्रतिशोध की आँधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देख कर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे

‘कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं’

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल-से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, ‘इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा’

minorbadayunइक सिपाही ने कहा, ‘साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें’

बोला थानेदार, ‘मुर्गे की तरह मत बाँग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टाँग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है’

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
‘कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल’

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म, संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लँगोटी के लिए
बेचती हैं जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए

(अदम गोंडवी)

मई 15, 2014

रिश्ता क्या कहलाये?

रिश्ते क्यूँ परिभाषित करें हम?lovers-001

बोलो?

क्या कोई बिना नाम का रिश्ता नहीं हो सकता हमारे बीच?

कमिटमेंट के दस्तावेजों की कोई ज़रुरत है क्या?

क्या इतना नाकाफी है जानना

कि मैं पूरा पूरा तुम्हारा हुआ…

तुम में हुआ…

दिल से

रूह से

जिस्म से!

Rajnish sign

जनवरी 28, 2014

जिस्म ही तो नहीं था

मैं जिसे बरसों चाहा किया

वो जिस्म में ढला तो था

पर जिस्म ही नहीं था…

जिस्म से इतर ही सब कुछ था…

वो था सबसे अलग जो

उस जिस्म के अन्दर में था…

Rajnish sign

टैग: , , , , , ,
जनवरी 22, 2014

सर्दी के सफ़ेद बादल और रक्तिम लौ

सर्दी में बादल fireplace-001

पुकार लगाते तो हैं

पर बहुधा बिन पानी चले आते हैं

आते हैं

तो हर चीज को सफेदी से ढक देते हैं

चारों ओर ऐसा प्रतीत होता है

जैसे धुंध ने घर कर लिया हो

शामें धुंधला जाती हैं

मेरे कमरे में अंधियारा बढ़ जाता है

मैं गमन कर जाता हूँ

बीते काल में –

मोमबत्ती के हल्के प्रकाश से

भरे कमरे में!

जब आतिशदान में लकडियाँ जलती हैं

तो कभी भी बोल नहीं पाता हूँ

बस खो जाता हूँ

आग की लपटों से बनती बिगड़ती आकृतियों में|

तुम्हारी त्वचा का गोरापन ओढ़ने लगता है

हल्का लाल-गुलाबी रंग

जब तपन की गहन तरंगें

और लालसा घेर लेती है

तुम्हारा खूबसूरत चेहरा

दमकने लगता है ऐसे

जैसे तालाब से कमल खिलकर निकलना शुरू करने लगता है

जिस्मानी  उतार चढ़ाव

चमकने लगते हैं

और एक गर्म एहसास चारों ओर बहने लगता है

और तुम्हे और मुझे अपने पंखों में समेट लेता है

सब कुछ उड़ने लगता है

ऐसे जैसे सब कुछ बादल ही हो गया है

कमरे में निस्तारित होने लगता है

श्वेत धीरे-धीरे लाल में

ऐसा लगने लगता है

हमारे जिस्म पिघल जायेंगे

मोमबत्ती की लौ

मोटी हो और तेजी से जलने लगती है

बादल रक्तिम लाल हो जाते हैं

और मुझे प्रतीत होता है

कि सर्दी के बादल लाल तप्त हो गये हैं

और वास्तव में

वे बिन पानी के ही हैं!

Yugalsign1

जनवरी 14, 2014

रूह और जिस्म

जिस्म मिलते हैं तो रूहें मिलती हैं…akhiri-001

या रूहें मिलती हैं तो जिस्म…

रूह और जिस्म जुदा नहीं कभी

एक के बिना दूसरे का मरण तय

रूह और जिस्म के इस झंझट में

कौन तय करे…

कौन ऊपर

कौन नीचे…

रूह अगर मरती नहीं

तो जिस्म चुकते ही क्यों अपने

अस्तित्व को खो देती है?

मरना ही तो हुआ?

जिंदा अगर यादों में रहने को भी कहते हैं

तो जिस्म तेरा मेरी यादों में

न सिर्फ जिंदा है…

जवान भी है…

हर चेहरे में…

तेरे जैसे रंग में

Rajnish sign

जनवरी 4, 2014

दिल का जख्मी परिंदा

हर रोज़ एक नया अरमानdev-001

दिल की कोख में जन्मता है..

और शाम होते होते अपने पंख फैलाकर

मंडराने लगता है

मेरे सर पे…

मेरे दिल पे…

मेरे जिस्म पे…

अपने पंजों में दबोच लेता है

ले उड़ चलता है मुझे बेबस करके

हर नए रोज़…

नए नए अरमानो के परिंदे उड़ते है…

फडफडाते हैं…

और हर रोज़

उनके पंजो से नीचे गिरा मैं

उनके टूटे पंखो में

खुद को तलाशता रहता हूँ|

Rajnish sign

नवम्बर 20, 2013

ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

रात की खुमारी,MB-001
तेरे बदन की खुशबू,
नथुनों में समाती मादक गंध
तेरे होठों से चूती शराब…
तेरे सांचे में ढले बदन की छुअन
रेशम में आग लगी हो जैसे
तराशे हुए जिस्म पे तेरे

फिरते मेरे हाथ
वो लरजना
वो बहकना
वो दहकना
वो पिघलना
हाय वो मिलना

अगर वो ख्वाब था तो इतना कम क्यूँ था
अगर वो ख्वाब था तो ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

(रजनीश)

नवम्बर 16, 2013

चिराग जिस्मों के

होता  है अहसास बहुत अलग सा  dreamwo-001

जब

आँखे खोलते हैं

सपने मेरे

तुम्हारी बाहों में…

अजब सी इक सिहरन

जैसे

छू  गयी हो लपक के बिजली आसमान की

दिल दिमाग सुन्न बस…

  वश में तुम्हारे सब|

एक ही ख्वाहिश रह जाती है

बस कि

चैन पाएं

मुंह छुपा कर

तुम्हारे सीने में…

सपने मेरे हद बेचैन

जागा करते हैं रात भर

आओ कि

इन्हें चैन से  नींद तो आये

रौशन रहे रात

चिरागों की तरह जलते जिस्मों की बदौलत

आओ कि

फिर चाहे सुबह न उगे

चाहे तो आए

कि फिर न दिन आए…

(रजनीश)

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