Archive for नवम्बर, 2015

नवम्बर 4, 2015

पुस्तकों की होली…ब्रेख्त

brekht

शासन ने जब आदेश दिया कि

हानिकारक ज्ञान की पुस्तकों को

खुलेआम जला दिया जाय

और चारों तरफ होलिकाओं तक

पुस्तकों से लदी गाड़ियां खींचने के लिए

बैलों को विवश किया गया ,

देश से निर्वासित एक लेखक को,

श्रेष्ठतम में जो गिना जाता था,

जलाई गयी पुस्तकों की तालिका की बारीक जांच करने पर धक्का लगा,

क्योंकि उसकी पुस्तकों की उपेक्षा हुई थी.

क्षोभ के पंखों पर उड़ता हुआ वह लेखक अपनी मेज़ के पास पहुंचा

और सत्ताधारियों को एक पत्र लिखा :

‘मुझको जलाओ !

उड़ती हुई कलम से उसने लिखा,

मुझको जलाओ !

क्या मेरी पुस्तकों ने हमेशा सच नहीं कहा है ?

और यहाँ तुम मेरे साथ ऐसा बर्ताव करते हो , जैसे मैं झूठा हूँ!

मैं तुम्हें आदेश देता हूँ:

मुझे जलाओ !!”

बर्तोल्त ब्रेख्त : (1938)

अनुवाद : चन्द्रबली सिंह 

साभार  : जनपक्ष पत्रिका (जनवादी लेखक संघ वाराणसी की प्रस्तुती) एवं लेखक उदय प्रकाश

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नवम्बर 2, 2015

1984 से 2002

देखो कैसी खिली है फ़सल अबके बरस कहर की
चीखों से फटी जाती है ख़ामोशी दोपहर की
लहू-चकां है आस्तीं हर हाकम-ए-शहर की
गली-गली में दौड़ रही है नदी-सी एक ज़हर की

दबी हुई सिसकियाँ, आब्रूएं लुटी हुईं
पगलाई हुई जुल्फ़ें, नज़रें बुझी हुईं
नोचे हुए नक़ुश, चूड़ियाँ टूटी हुईं
कांपती हुई रूहें, आरिज़ें सूजी हुईं

रक्सां है लाठी दर लाठी कूचा-ओ-बाज़ार
रंग-ए-खूं दमक रहा है कितने ही दर-ओ-दीवार
फैल रहा है किसी अफ़वाह जैसे नफ़रत का आज़ार
उठते-गिरते चमक रहे हैं खंजर और तलवार

और वोह चेहरे!
खौफ़नाक चैहरे मज़हबी वैह्शत के
ख़ुद से नाराज़ चैहरे छिनी हुई इज्ज़त के
मासूम चैहरे नासमझ दर्द के
बेख्वाब चैहरे जिस्म-ओ-जां सर्द के
दोगले चैहरे नकली ग़म-ख्वारों के
अंधे चैहरे शहर के पहरेदारों के

उस दौर-ए-क़त्ल-ए-आम की गवाही कौन देगा?
मुआफ्ज़ा-ए-मौत-ओ-तबाही कौन देगा?
कोई नहीं, कोई नहीं, कोई भी नहीं

सिवाए उस धुएं के
जो जा-बा-जा बेघर भटक रहा है, अब तक
कातिलों के ज़हन में खटक रहा है, अब तक
शायर की आँखों में अटक रहा है, अब तक

(सिफ़र)

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