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फ़रवरी 16, 2017

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे…

छोटी मगर गहरे भाव और अर्थ अपने में समाहित की हुयी कविता का उदाहरण देखना हो तो प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल की कविता “जो मेरे घर नहीं आयेंगें” तुरंत सामने आ जाती है|

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊँगा

एक उफनती नदी कभी नहीं आयेगी मेरे घर

नदी जैसे लोगों  से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टान, तालाब

असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव – गाँव, जंगल- गलियाँ जाऊँगा|

जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फुरसत से नहीं

उनसे एक जरूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा|

(विनोद कुमार शुक्ल)

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जनवरी 1, 2015

नए साल की शुभकामनाएँ!

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं!

जाँते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएँ!

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अप्रैल 28, 2014

ब्याहना

बाबा!Daughter-001
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों

ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल

मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप…

महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी

मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे

उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे !

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक

चुनना वर ऐसा
जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली
और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत

बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल

जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे ।

(निर्मला पुतुल)

अप्रैल 1, 2014

गंगा और महादेव… (राही मासूम रज़ा)

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं

और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके

कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ

मेरा भी एक संदेश है।

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है

मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको

और उस योगी से कह दो- महादेव

अब इस गंगा को वापस ले लो

यह जलील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया

लहू बनकर दौड़ रही है।

[राही मासूम रज़ा]

मार्च 31, 2014

आततायी की प्रतीक्षा…(अशोक वाजपेयी)

आततायी की प्रतीक्षा

(एक)

सभी कहते हैं कि वह आ रहा है
उद्धारक, मसीहा, हाथ में जादू की अदृश्य छड़ी लिए हुए
इस बार रथ पर नहीं, अश्वारूढ़ भी नहीं,
लोगों के कंधों पर चढ़ कर वह आ रहा है :
यह कहना मुश्किल है कि वह खुद

आ रहा है
या कि लोग उसे ला रहे हैं।

हम जो कीचड़ से सने हैं,
हम जो खून में लथपथ हैं,
हम जो रास्ता भूल गए हैं,
हम जो अंधेरे में भटक रहे हैं,
हम जो डर रहे हैं,
हम जो ऊब रहे हैं,
हम जो थक-हार रहे हैं,
हम जो सब जिम्मेदारी दूसरों पर डाल रहे हैं,
हम जो अपने पड़ोस से अब घबराते हैं,
हम जो आंखें बंद किए हैं भय में या प्रार्थना में;
हम सबसे कहा जा रहा है कि
उसकी प्रतीक्षा करो :
वह सबका उद्धार करने, सब कुछ ठीक करने आ रहा है।

हमें शक है पर हम कह नहीं पा रहे,
हमें डर है पर हम उसे छुपा रहे हैं,
हमें आशंका है पर हम उसे बता नहीं रहे हैं!
हम भी अब अनचाहे
विवश कर्तव्य की तरह
प्रतीक्षा कर रहे हैं!

(दो)

हम किसी और की नहीं
अपनी प्रतीक्षा कर रहे हैं :
हमें अपने से दूर गए अरसा हो गया
और हम अब लौटना चाहते हैं :
वहीं जहां चाहत और हिम्मत दोनों साथ हैं,
जहां अकेले पड़ जाने से डर नहीं लगता,
जहां आततायी की चकाचौंध और धूमधड़ाके से घबराहट नहीं होती,
जहां अब भी भरोसा है कि ईमानदार शब्द व्यर्थ नहीं जाते,
जहां सब के छोड़ देने के बाद भी कविता साथ रहेगी,
वहीं जहां अपनी जगह पर जमे रहने की जिद बनी रहेगी,
जहां अपनी आवाज और अंत:करण पर भरोसा छीजा नहीं होगा,
जहां दुस्साहस की बिरादरी में और भी होंगे,
जहां लौटने पर हमें लगेगा कि हम अपनी घर-परछी, पुरा-पड़ोस में
वापस आ गए हैं !

आततायी आएगा अपने सिपहसालारों के साथ,
अपने खूंखार इरादों और लुभावने वायदों के साथ,
अश्लील हंसी और असह्य रौब के साथ..
हो सकता है वह हम जैसे हाशियेवालों को नजरअंदाज करे,
हो सकता है हमें तंग करने के छुपे फरमान जारी करे,
हो सकता है उसके दलाल उस तक हमारी कारगुजारियों की खबर पहुंचाएं,
हो सकता है उसे हमें मसलने की फुरसत ही न मिले,
हो सकता है उसकी दिग्विजय का जुलूस हमारी सड़कों से गुजरे ही न,
हो सकता है उसकी दिलचस्पी बड़े जानवरों में हो, मक्खी-मच्छर में नहीं।
ashok vajpai-001पर हमें अपनी ही प्रतीक्षा है,
उसकी नहीं।
अगर आएगा तो देखा जाएगा!

(अशोक वाजपेयी )

साभार “जनसत्ता”

जनवरी 19, 2014

घर उससे है…

suhasini-001ढूँढती रहती है आँखे सिर्फ उसको …

मेरे  मकान में घर उससे है

चार दीवारों में वक़्त की  कैद का,

मैं मुन्तजिर नहीं रहता

चार गिर्द चेहरे अजनबी सी भीड़ के

उस एक के न होने का अहसास हैं

वो है पास तो

फिर भीड़ की ज़रुरत क्या है

जो  उतर गया हो दिल में,

फिर कैसे दिल से उतर जाए

Rajnish sign

दिसम्बर 18, 2013

एक रात की दो चिंताएँ…

उसकी बड़ी सी akhiri-001

कटोरेदार आँखों में

तरलायित सपने हैं

हर करवट पर

जब ऊपर नीचे होती है

आँख की पुतली

बदल जाता है रंग,

सपनों का|

घर- सुंदर सा छोटा घर

उमंगें-

प्रियतम के साथ

जीना -मरना,

सांसों की लय

सब कुछ साझा बाँट लेना चाहती है वह|

दूसरी चिंता अबूझ है

चटक रंग है

गोया कैनवास में अमूर्त रंग

दिन भर की भागदौड

थकन से चूर

बिस्तर पर करवटों से

पहली ही नींद का डेरा

काम, यश-कीर्ति के स्वपनों का घेरा

पहली चिंता की चिंता पर

घर से जुडी

स्नेह की डोर

भारी है

अधिक सोच से पहले ही

भारी हो चली हैं, आँखें

नींद समेट लेती है,

सब-कुछ !

Yugalsign1

दिसम्बर 15, 2013

कौन समझेगा तेरे सिवा?

इस घर की हरेक दीवार पे home-001

तेरी ही उँगलियों के निशां चस्पा हैं

हरेक ईंट में सिहरन है अभी भी

तेरे छूने की…

तेरी ही रिहायश से मकां घर हुआ

दिल तो वैसे मेरा

कुछ क़तरा खूँ ‘औ

कुछ वज़न ग़ोश्त

ही ठहरा

तेरे रहने फकत ने इसे इस काबिल किया

कायनात समेटे फिरता हूँ मैं

कई तूफ़ान

कई समंदर

कई साहिल

बस एक तेरे रहने से

कौन समझेगा तेरे सिवा?

Rajnish sign

दिसम्बर 13, 2013

देखें सूरज को मिलते हुए प्रेयसी रात्रि से

बैठे रहें पास पासsunset1-001

चुपचाप

न हम बोलें ना तुम कुछ,

उठती हुयी तरंगें तुम में

गुज़र जाएँ मुझ में हो कर

बस देखते रहें बेचैन सूरज को

मिलते हुए प्रेयसी रात्रि से,

कितने अधूरे हैं ये उजाले-अँधेरे

एक दूसरे के बगैर

जैसे…हम-तुम…

बस चुपचाप ही समझें इशारे,

 रंग बदलती शाम के

लाल होते आसमान के

घर लौटती चिड़ियों के

झुकती आँखों के

बहकती हुयी साँसों के

दहकते हुए होठों के

कंपकपाती  उंगुलियों के…

बस चुपचाप…

बैठे रहें पास पास

मैं और तुम…

पीते रहें हवा में घुली शराब को

उतर जाए लाल शाम हम में

उतर जाए बुखार साँसों का

बस बैठे रहें सर टिकाये एक दूसरे से

चुपचाप

पास पास  बस बैठे रहें…

Rajnish sign

दिसम्बर 3, 2013

बंद का समय

सूखी पत्तियों की फिसलन भरी डगर के पारblueumb-002

हरियाली के आँचल में

झुरमुटों के पास से

शाम का धुआँ निकल रहा है

कोई माँ, खाना बना रही है

छौनों के घर लौटने का समय हो गया है|

सड़क के किनारे बनीं छोटी-छोटी फड़ें

बाहर सजा सामान अब समेटा जा रहा है

मैले से सफ़ेद कुर्ते-पाजामे में

कैद छुटा बच्चा

पिता को सामान पकड़ा रहा है

दुकान को बंद करने का समय हो गया है|

Yugalsign1

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