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अगस्त 12, 2016

दूर मत जाओ, प्रिय! … (पाब्लो नेरुदा)

Pablo Nerudaतुम मुझसे दूर मत जाओ,

एक दिन के लिए भी दूर मत जाओ,

क्योंकि …

क्योंकि…,

मुझे नहीं पता कि इसे कैसे कहना होगा:

एक  दिन की अवधि बहुत लम्बी है मेरे लिए तुम्हारी जुदाई में व्यतीत करने के लिए,

मैं सारा दिन तुम्हारा इंतजार करता रहूंगा,

ऐसे जैसे एक सोता हुआ खाली स्टेशन करता है जब ट्रेनों को कहीं और खड़ा होने के लिए भेज दिया जाता है|

मुझे छोड़ कर मत जाओ,

एक घंटे के लिए भी दूर मत जाओ मुझसे, क्योंकि

तब व्यथा की छोटी-छोटी बूँदें एक साथ बहेंगीं,

धुआँ जो एक घर की तलाश में भटका करता है,

मेरी ओर मुड़ जायेगा

और मेरा टूटा हुआ ह्रदय उसकी जकड में घुट जायेगा|

ओह, काश कि तुम्हारा साया कभी भी समुद्र तट पर खोये नहीं,

काश तुम्हारी पलकें कभी शून्य में स्पंदन न करने पायें,

मुझे एक सेकेण्ड के लिए भी छोड़ कर मत जाना, मेरे प्रियतम!

क्योंकि उस एक क्षण में तुम इतनी दूर जा चुकी होओगी
और भ्रमित मैं, सारी पृथ्वी पर तुम्हे खोजता घूमूंगा,

यह पूछता हुआ,

“क्या तुम वापिस आओगी?”

क्या तुम मुझसे दूर चली जाओगी?

मुझे मरता हुआ छोड़कर!

Don’t Go Far Off (Pablo Neruda)

अनुवाद :-   …[राकेश]

अप्रैल 1, 2016

तो तुम लेखक बनना चाहते हो ?

अमेरिकन पिता और जर्मन माता की संतान के रूप में सन १९२० में जन्मे Charles Bukowski २४ वर्ष की उम्र में अपनी पहली कहानी छपवा पाए और उनकी पहली कविता तब छपी जब वे ३५ साल के थे| ३९ वर्ष की आयु में उनकी कविताओं की पहली पुस्तक छपी और १९९४ में मृत्यु होने तक गद्य और पद्य दोनों विधाओं में वे ४५ पुस्तकें लिख चुके थे| १९४१ में लेखक बनने के लिए उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी लेकिन १९४६ तक लगातार लिखने के बावजूद उन्हें अपने लिखे को छपवाने में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हुई और इस असफलता ने १९४६ में उनसे लेखन को दरकिनार कर जीवन यापन के लिए अन्य बहुत से कार्य करवाए| इस असफलता को पचा नहीं पाने के कारण वे शराब के नशे में डूब गये और दस सालों तक तब तक शराब के चंगुल में रहे जब तक वे गंभीर रूप से अल्सर के रोगी न बन गये| उन्होंने लेखन को फिर से अपनाया और इस बार कलम उठा कर नहीं रखी|हालांकि जीवन को सहारा देने के लिए वे अन्य क्षेत्रों में काम करते रहे पर जीवन पर्यंत लेखन को उन्होंने नहीं छोड़ा| उनकी एक बेहद प्रसिद्ध और प्रभावशाली कविता है – So you want to be a writer?

प्रस्तुत है मूल अंग्रेजी की कविता का हिन्दी रूपांतरण :

यदि तुम्हारे भीतर से यह विस्फोट के रूप में बाहर निकल कर नहीं आता

तो लिखने की तीव्र इच्छा और तमाम अन्य कारण

इतने पर्याप्त नहीं कि तुम लिखो|

 

जब तक कि यह तुम्हारे दिल और दिमाग से

और मुँह और आँतों से

अपने आप बाहर निकलने के लिए तत्पर नहीं होता,

तुम्हे इसे लिखने का अधिकार नहीं है|

 

यदि तुम्हे उचित शब्दों के इंतजार में

अपने कम्प्यूटर स्क्रीन को ताकते हुए

या टायप राइटर को घूरते हुए

घंटो बैठना पड़ता है,

तो तुम्हे बिल्कुल ही लिखना नहीं चाहिए|

 

यदि तुम इसलिए लिखना चाहते हो कि

लेखन से तुम्हे संपत्ति या प्रसिद्धि मिलेगी

तो मत लिखो|

या कि तुम इस मोह में लिखना चाहते हो कि

बहुत सी स्त्रियों को तुम अपने लेखन के मोहपाश में बांध कर

अपनी शैया पर लाकर अंकशायिनी बना पाने में कामयाबी पा लोगे

तो तुम हरगिज ही न लिखो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को बैठ कर

बार बार सुधार कर पुनर्लेखन करना पड़े

तो मत लिखो|

 

यदि तुम किसी और जैसा लिखना चाह रहे हो,

तो लिखना भूल ही जाओ|

 

यदि तुम्हे उस वक्त का इंतजार करना पड़े,

जब लेखन तुम्हारे भीतर से गर्जना करता हुआ बाहर आए

तो तुम धैर्य से उस घड़ी का इंतजार करो|

और यदि यह गर्जना करता बाहर नहीं निकलता तो

तुम किसी और उचित काम में अपनी ऊर्जा का उपयोग करो|

 

यदि तुम्हे अपने लिखे को पहले अपनी पत्नी, या गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड

या अपने माता-पिता या किसी अन्य को पढ़ कर सुनाना पड़े,

अपने लिखे पर उनका अनुमोदन लेना पड़े,

तब अभी तुम लेखन के लिए अंकुरित नहीं हुए हो,

इसे स्वीकार कर लो कि अभी तुम तैयार नहीं हो|

 

अन्य बहुत से लेखकों की तरह मत बनो,

उन हजारों लोगों की तरह मत बनो

जो स्वयं को लेखक कहते हैं,

बोरियत से भरा और बोझिलता से भारी हो चुका लेखन मत करो,

दिखावा मत करो,

अपने ही प्रति प्रेम से मत घिर जाओ|

 

अगर ऐसे ही लक्षणों से तुम ग्रसित हो

तो स्पष्ट जान लो,

दुनिया भर में पुस्तकालय,

तुम्हारी तरह के कथित लेखकों के कारण पहले से ही निद्रावस्था में हैं,

उनकी मूर्छा में बढोत्तरी मत करो|

मत लिखो|

 

यदि तुम्हारी आत्मा से लेखन

एक राकेट की तरह बाहर नहीं आता,

और यदि तुम्हे ऐसा न लगने लगे

कि तुमने अगर अब नहीं लिखा

तो या तो तुम पागल हो जाओगे

या तुम आत्मघाती हो जाओगे

या हत्यारे ही बन जाओगे

तो तुम मत लिखो|

 

अगर लिखने का वास्तविक समय आ गया है,

और तुम एक माध्यम के रूप में चुने गये हो

तब लेखन स्वयं ही तुम्हारे भीतर से बाहर आ जायेगा

और यह बाहर आता ही रहेगा जब तक कि

या तो तुम ही न मर जाओ

या कि लेखन ही तुम्हारे भीतर न मर जाए|

 

इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है,

कभी भी नहीं रहा!

(Charles Bukowski )

अनुवाद – राकेश

अक्टूबर 29, 2015

हम एक नदी हैं

LaoTzuहमारा जीवन उस तरह का नहीं है

जैसे कि पहाड़ के एक तरफ चढ़ाई

और दूसरी तरफ ढलान|

हम नीचे गिरने और मरने के लिए

एक शिखर पर नहीं पहुंचे हैं|

हम पानी की बूंदों के जैसे हैं

जो कि समुद्र में जन्मती है

और जिसे नम्र बारिश धरती पर छिड़क जाती है|

हम पहले झरना बने

फिर धारा

और अंत में एक नदी

जो मजबूती से अपनी गहराई लिए बहती जाती है

और अपने घर पहुँचने तक

अपने संपर्क में आने वाली वस्तु को पोषित करती जाती है|

बुढाये जाने के आधुनिक मिथक को स्वीकार मत करो,

तुम गल नहीं रहे हो,

तुम व्यर्थता में खोते नहीं जा रहे हो

तुम एक ऋषि हो,

तुम बहुत गहरी और बहुत उपजाऊ क्षमता वाली नदी हो |

कुछ क्षण एक नदी के किनारे बैठो

और बड़े ध्यान से देखो

जब नदी तुम्हे तुम्हारे जीवन के बारे में बताए|

[“We Are a River,” from The Sage’s Tao Te Ching: Ancient Advice for the Second Half of Life, William Martin’s interpretation of the classic work by Lao Tzu (The Experiment, 2010)]

अनुवाद – …[राकेश]

 

 

जुलाई 7, 2015

सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

फ़रवरी 2, 2015

धीरे- धीरे तुम मरने लगते हो …

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम यात्राएं नहीं करते

अगर तुम पढते नहीं

अगर तुम जीवन की आवाज को नहीं सुनते

अगर तुम अपने से सामंजस्य बिठाकर,

अपनी उचित सराहना नहीं करते |

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

जब तुम अपने आत्म-सम्मान को मार देते हो;

जब तुम दूसरों को तुम्हरी सहायता नहीं करने देते|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम अपनी आदतों के दास बन जाते हो,

अगर तुम रोजाना एक ही पथ पर चलने लगते हो…

अगर तुम ढर्रे पर चल रहे दैनिक जीवन में परिवर्तन नहीं लाते,

अगर तुम भिन्न भिन्न रंगों के कपड़े नहीं पहनते

अगर तुम उनसे बात नहीं करते जिन्हें तुम पहले से नहीं जानते|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम उत्साह और जूनून के भावों को नजरंदाज करने लगते हो

और उन भावनाओं के विचलन से डर जाते हो

जो तुम्हारी आँखों में चमक लाती रही हैं,

और तुम्हारे ह्रदय की धडकनों को बढाती रही हैं|

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो

अगर तुम अपने जीवन में उस समय परिवर्तन नहीं लाते

जब तुम अपनी नौकरी से पूर्णतया असंतुष्ट हो गये हो,

या तुम अपने वर्त्तमान प्रेम से ऊब गये हो,

जब तुम अंजाने के भय की खातिर उसे

कसौटी पर रखने का जोखिम नहीं उठाते

जिसे तुम सुरक्षित मान कर जिससे चिपक गये हो,

अगर तुम अपने सपने का पीछा नहीं करते,

अगर तुम अपने को,

जीवन में कम से कम एक बार,

अच्छी लगने वाली सलाह से दूर भागने के लिए

तैयार नहीं करते…

तुम धीरे धीरे मरने लगते हो|

(You start dying slowly – Martha Medeiros, Brazil)

हिंदी अनुवाद – …[राकेश]

जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time

RamStory2

 

मानव जाति का इतिहास गवाह है कि अच्छाई और बुराई एक साथ नहीं रह सकते, स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद एक साथ नहीं रह सकते, अच्छी और बुराइयों से ग्रस्त सभ्यताओं में टकराव अवश्यंभावी है, इसे कोई कभी नहीं टाल सका और कभी कोई टाल भी नहीं सकेगा| हमेशा ही अच्छाई और बुराई आपस में टकराये हैं| बुराई कुछ समय के लिए जगत पर छा गयी प्रतीत होती है पर उसे हराने के लिए अच्छाई पनप ही जाती है| साधारण मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण है और जीवन भर उसके अपने अंदर इन् दो प्रवृत्तियों के टकराव चलते ही रहते हैं| ऐसे महापुरुष भी हर काल में होते आए हैं जिन्होने बहुत कम आयु में ही अपने अंदर अच्छाई को बढ़ावा दिया और जो अपने अंदर की बुराई को पराजित करते रहे|

इन् महामानवों में भी सर्वश्रेष्ठ किस्म के मनुष्य हुए जिन्होने अपने अंदर की बुराई पर ही विजय प्राप्त नहीं की वरन जगत भर के मनुष्यों को अच्छाई की राह दिखाने के लिए बाहरी जगत में बेहद शक्तिशाली बुरी शक्तियों से टक्कर ली, नाना प्रकार के कष्ट सहे पर वे मनुष्यों के सामने अच्छाई को स्थापित करके ही माने| इन् सर्वश्रेष्ठ महामानवों में कुछ को ईश्वर का अवतार भी मनुष्य जाति ने माना| इनमें से जिन महामानवों ने ध्येय की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता पर विशेष जोर दिया उनमें राम का नाम बहुत महत्व रखता है| इसी नाते उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम कह कर भी पुकारा जाता है|

सदियों से हर काल में राम-कथा मनुष्य को आकर्षित करती रही है और भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने रामकथा को अपने नजरिये से जांचा परखा और प्रस्तुत किया है| राम को ईश्वर मान लो और रामकथा को सार रूप में ग्रहण कर लो तो बात आसान हो जाती है कि राम तो ईश्वर के अवतार थे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था और तब राम के जीवन से एक दूरी बन जाती है क्योंकि जन्म के क्षण से ही वे अन्य मनुष्यों से अलग समझ लिए जाते हैं और केवल भक्ति भाव से ही मनुष्य उनके जीवन के बारे में जानते हैं पर इन सबमें राम की वास्तविक संघर्ष यात्रा अनछुई और अनजानी ही रह जाती है|

पर वास्तविकता तो यह नहीं है, मनुष्य रूप में जन्मे राम को जीवनपर्यंत विकट संघर्षों और कष्टों से गुजरना पड़ा| किसी भी काल में सत्ता निर्ममता, क्रूरता और तमाम तरह के हथकंडों के बलबूते चलाई जाती रही है और जहां सत्ता के दावेदार एक से ज्यादा हों वहाँ हमेशा षड्यंत्र होते ही रहते हैं| राम के पिता दशरथ ने अपने जीवन को और अपने राज्य को जटिल समस्याओं में उसी वक्त बांध दिया था जब उन्होंने तीन विवाह किये और तीसरा विवाह अपने से बेहद कम उम्र की कैकेयी के साथ किया| इन् परिस्थितियों में अयोध्या का राजमहल षड्यंत्रों से परे रहा होगा यह मानना नासमझी का सबब ही बन सकता है|

राम कोई एक दिन में नहीं बन जाता, बचपन से उनका जीवन तमाम तरह के संघर्षों से गुजरकर निखरता रहा| अपनी खूबियों को निखारते हुए वे कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके ऐसे बने जिस रूप में कि दुनिया उन्हें जानती है|

राम के जीवन पर आधारित हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित नया उपन्यास “Ram The Soul Of Timeरामकथा को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है और रामकथा के कई अनछुए पहलुओं को प्रकाश में लाता है| यह उपन्यास “राम” की सर्वकालिक प्रासंगिकता को स्थापित करता है| आधुनिक काल में अँधेरे की ओर तेजी से अग्रसर मानवता को राम जैसे एक प्रेरणादायक वैश्विक नेता के मार्गदर्शन की ही जरुरत है जो हर मुसीबत का सामना वीरता, संकल्प और बुद्धिमानी के साथ करे और जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता से समझौते न करे और आदर्श के सच्चे और पवित्र रूप को स्थापित करे|

उपन्यास में “रामकथा” बड़े ही रोमांचक माहौल में जन्मती है| कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में मनुष्य की लोलुपता ने प्रकृति को इतना परेशान किया कि ऊपर पहाड़ों पर चहुँ ओर विनाश बरपने लगा| विनाश के तांडव में घिरे हुए एक अकेले पड़ चुके मनुष्य का, जिसे नहीं पता कि वह जीवित रहेगा या नहीं और अगर जीवित रहा भी तो कितने दिन, विज़न है यह रामकथा| मृत्यु के सामने खड़े इस मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज है यह रामकथा|

भ्रष्ट और उपभोक्तावादी राक्षसी सभ्यता को दुनिया भर की सिरमौर सभ्यता बनाने का संकल्प रखने वाले राक्षसराज रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया इसलिए राम ने रावण के साथ युद्ध किया, ऐसी धारणा बहुत से लोग रखते हैं| यह उपन्यास इस धारणा को पूरी तरह से नकारता है और स्थापित करता है कि अच्छाई की तलाश कर रहे राम का संघर्ष बुराई को जगत में स्थापित करते जा रहे रावण से होना ही था, चाहे वह किसी भी तरीके से होता| वनवास के तेरह सालों में “राम” एक एक कदम बुराई के खिलाफ उठा आगे बढ़ रहे थे| रावण का साम्राज्यवाद पनप ही नहीं सकता था राम के रहते| रावण को राम को अपने रास्ते से हटाना ही था अगर उसे पूरी दुनिया पर अपना राज कायम करना था|

उपन्यास दर्शाता है कि ऋषि विश्वामित्र पृथ्वी पर अच्छाई और, और अच्छी, मानवीय और विकास वाली सभ्यता की स्थापना करने के अपने यज्ञ में कर्म की आहुति डालने के लिए पृथ्वी पर सर्वथा योग्य राम का चयन करते हैं और उनका सपना राम की प्राकृतिक प्रवृति से मिलकर राम के लिए एक ध्येय बन जाता है|

राम के जीवन पर सीता की अग्नि परीक्षा, गर्भवती सीता को वनवास और एक शम्बूक नामक शूद्र को वेद सुनने पर दण्डित करने के आरोप लगाए जाते हैं|

यह उपन्यास सीता की अग्नि परीक्षा को बिल्कुल नये तरीके से संभालता है और जो ज्यादा वाजिब लगता है और यह भाग किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी कहा जा सकता है| यह उपन्यास राम दवारा विभीषण को लंका का राजा बनाने के साथ समाप्त हो जाता है|

आशा है लेखक अपने अंदाज वाली “रामकथा” का दूसरा भाग लिखेंगे और उसमें सीता को वनवास और शम्बूक प्रकरण की व्याख्या अपने अनुसार करेंगे|

रामकथा” में इच्छुक लोगों को यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए|

Novel – Ram The Soul Of Time

Author – Yugal Joshi

Pages – 479

Publisher – Har Anand Publications Pvt. Ltd (Delhi)

info@haranandbooks.com, haranand@rediffmail.com

जुलाई 16, 2014

वे बेचते भुट्टे…

BoyGirlCorn-001बला की गर्मी… पारा डिग्री सेल्सियस में अर्द्ध शतक लगाने के एकदम करीब था…सूरज की किरणों की तीव्रता से लग रहा था कि मानो आज अपनी सारी ऊष्मा उड़ेल कर ही दम लेगा| धूप सिर को तपाये दे रहे ही, शरीर को जलाए दे रही थी|
ऐसे में कुछ दूर धूप में पैदल चलना पड़े तो लगे मानों जीते जी भट्टी में झुलस रहे हैं|

पर कई बार वे सब काम करने पड़ते हैं जो व्यक्ति मौजूदा परिस्थितियों में करना नहीं चाहता|

न  काम होता न तपती धूप में पैदल चलना पड़ता|

प्यास से कंठ सूख रहा था|

जहां पहुंचना अथा वह इमारत अभी भी कम से कम आधा किमी दूर थी| सड़क पार करके फुटपाथ पर चलना हुआ तो देखा कि दूर दूर तक छाया का निशां नहेने था और नंगा तपा हुआ फुटपाथ मुँह चिड़ा रहा था|

थोड़ी दूर चलने पर ही देखा तपती धूप में दो बालक भुट्टे बेचते फुटपाथ पर बैठे थे| सात-आठ साल की लड़की भुट्टे भून रही थी और उससे छोटा बालक, जो उसका भाई ही होगा, भुट्टे अपने पास चटाई पर रख बेच रहा था|

उनके थोड़ा पीछे एक छोटा सा पेड़ अवश्य था पर वहाँ एक टेम्पो वाले ने दुपहर को सोने के लिए कब्जा जमा लिया था वरना बच्चे वहाँ जो भी थोड़ी बहुत छाया थी उसी में अपना डेरा जमा सकते थे|

सामने ही एक प्रसिद्द पब्लिक स्कूल का में गेट चमचमा रहा था| इन् निर्धन बच्चों को रोजाना ही अंदर प्रवेश करते अमीर बच्चे दिखाई देते होंगे और वे यहाँ फुटपाथ पर भुट्टे बेचने को अभिशप्त थे| उनके लिए तो अभी से इस देश में दो देश बन गये थे, एक उनका देश था जो बचपन से ही कठोर मेहनत करके उत्पाद उगा रहा था, बना रहा था और बेच रहा अथा और एक दूसरा देश था जिसके बाशिंदें उनसे समां कभी कभी खरीद भी लेते थे वरना दूसरे देश के लिए बाजार भी और ही किस्म के थे, चमचमाते हुए, रोशनी और चकाचौंध से भरपूर|

प्यास से कंठ सूख रहा अथा| पानी भी साथ नहीं लिया था| मन में विचार आया कि क्यों न भुट्टा खा लिया जाए|

पर उससे तो प्यास और बढ़ेगी!

तो क्या, अब मंजिल नजदीक ही है जाकर और ज्यादा पानी पी लिया जायेगा|

पर बच्चों से भुट्टे लेना क्या बाल-मजदूरी का समर्थन नहीं?

पर अगर भुट्टा ना लिया तो क्या उनकी स्थिति में कोई सुधार होगा?

अगर भुट्टा ले भी लिया तो एक भुट्टे से या कुछ भुट्टे खरीदने से क्या सुधार होगा उनकी स्थिति में?

उनके माता-पिता उन्हें मजदूरी से हटा स्कूल भेजने लगेंगे?

थोड़ी देर ऐसे ही उलझन में घिरा खड़ा रहा|

फिर बच्चों की तरफ देख दो भुट्टे देने को कहा|

कम से कम इस तपती धूप में उन्हें दो भुट्टे बेच पाने का संतोष तो मिलेगा शायद उन्हें खुशी भी हो|

इनका अच्छा भविष्य तो सरकारों के हाथ में है| वे चाहें तो ये बच्चे भी पढ़ लें और भविष्य बना लें|

भुट्टा खाते चलते हुए और बच्चों के बारे में सोचते हुए मंजिल भी आ गई|

उनके बारे में सोच सकने वाले मंत्री बनेंगे नहीं और मंत्री ऐसे बच्चों के पास समय व्यतीत करके उनके बारे में सोचेंगे नहीं|

तो ऐसे बाल-मजदूरों का क्या भविष्य है इस देश में|

क्या ये भुट्टे बेचते और ऐसे अन्य काम करते ही रह जायेंगे?

 

…[राकेश]

 

मई 23, 2014

गांधी Vs हिटलर

 

GandhiVsHitler-001

एक देश की करुणा संचित होती है गांधी में

एक देश का घमंड एकत्रित होता है हिटलर में

एक के उल्लेख के साथ प्रेम का आभास होता है

दूसरे के साथ घृणा की परिकाष्ठा का भय सताता है

एक आशा और प्रकाश का धोतक है

दूसरे की स्मृति अन्धेरा फैलाती है

पहला मानवता को पोषित करता है

दूसरा मानवता का विनाश करता है

पहला सदियों देश की जयजयकार करवाता है

दूसरा सदा देश को गालियाँ दिलवाता है

चुनाव सदा हाथ में है…

…[राकेश]

मार्च 30, 2014

वह जो है सबसे महान माँ…

सब माताएं महान होती हैं womanchildlabour

अपने बच्चों के लिए

वे नाना प्रकार के त्याग करती हैं

अपने बच्चों के लिए

वे अपने जीवन को

अपनी अभिलाषाओं को

काट-छांट कर सीमित बना देती हैं

अपने बच्चों के लिए

बहुत सी माताएं

छोड़ देती हैं

लाखों-करोड़ों की नौकरियां और व्यवसाय

अपने बच्चों के लिए

अपने तमाम शौक और जूनून की हद तक पाले गये शौक

भी छोड़ देती हैं कुछ अरसे के लिए

अपने बच्चों के लिए

जो कुछ भी आड़े आता है बच्चों के

सही ढंग से लालन पोषण में

वे उसे छोड़ देती हैं

पर सुरक्षित माहौल में

रहने वाली स्त्रियाँ

बेहतरीन माएँ होते हुए भी

उतनी महान नहीं होती

जितनी होती है एक कामगार गरीब माँ

वह स्त्री जो बांधकर

अपनी पीठ पर दूधमुयें बच्चे को

काम पर जाती है

पत्थर तोडती है

ईंटें धोती हैं

भांति भांति के परिश्रम करती है

ताकि अपने और बच्चे के लिए

जीविका कमा सके,

और यह कठोर परिश्रम उसे

रोज करना पड़ता है

अगर रहने का कुछ ठिकाना है तो

वहाँ से वह रोज सुबह निकलती है

 बच्चे को पीठ पर कपड़े से बाँध कर

ठेकेदार की चुभती निगाहों से गुजर कर

उस रोज की जीविका के लिए काम पाती है

बच्चे को कार्यस्थल के पास ही कहीं लिटा देती है

और काम पर जुट जाती है

और इस स्थल पर न उसकी सुरक्षा का कोई प्रबंध है

labour motherन उसके बच्चे की

पर इन् सब मुसीबतों से लड़ती हुयी

वह जीविकोपार्जन के लिए हाड तोड़ मेहनत करती रहती है

कुछ देर रोते बच्चे के पास जाती है तो

सुपरवाइजर से झिडकी सुनती है

चुनाव का वक्त होता है तो

देखती है पास से गुजरते वाहनों पर लदे नेताओं को

और सुनती है उनके नारों को

– वे उस जैसे गरीब लोगों के लिए बहुत कुछ करेंगे|

शायद उसे आशा भी बंधती हो

पर वह सब तो भविष्य की बातें होती है

वर्तमान में तो उसे रोज

जीने के लिए लड़ना है

इसलिए रोज सुबह वह अपने बच्चे को पीठ पर लाद

काम पर निकलती है

उसे जीना है

अपने बच्चे के लिए

और अपने बच्चे को जिंदा रखना है

खुद को जिंदा रखने के लिए|

उसे बीमार पड़ने तक की न तो सहूलियत है और न ही इजाज़त

चारों तरफ निराशा से भरे माहौल में भी

वह रोजाना कड़ी मेहनत करके जिए चली जाती है

घर-परिवार में रहने वाली तमाम माओं से

जिनके पास सहयोग होते हैं

तमाम तरह के

कहीं ज्यादा बड़े कद होते हैं ऐसी माओं के

यही हैं धरती पर सबसे महान माएँ!

…[राकेश]

 

 

 

 

जनवरी 5, 2014

अरविन्द केजरीवाल : पुराना सड़ा तंत्र सलीब लिए खड़ा है तुम्हारे लिए

सैयादे बागबां के तेवर बता रहे हैंarvind-001

ये लोग फस्लेगुल के कपड़े उतार लेंगे|

तुम सरीखे नई बात बोलने और करने वालों पर भी उपरोक्त शेर मौजूं बैठता है|

ये घाघ बहेलिये, खेले खाए चिडीमार तुम्हे आजाद पंछी की तरह कैसे उड़ने दे सकते हैं? ये तुम्हे कहीं न कहीं कैसे भी पकड़ने और अपने हाथों सजा देने का प्रयास करते रहेंगे|

गलती तुम्हारी है तुम क्यों शिकारियों और सोते हुए शिकारों के मध्य लालटेन लेकर खड़े हो गये और हुंकार भरने लगे कि शिकारों को जगाऊँगा… शिकारियों को भगाऊँगा|

अब भुगतो!

आराम से जनतंत्र में लूट का मजा ले रहे बलियों,  महाबलियों और बाहुबलियों को ललकारोगे तो क्या वे चुप बैठे रहेंगे? नहीं वे अपने सामर्थ्य भर आक्रमण तुम पर करेंगे| और ये बात तो तय है ही कि टुच्चई पर ऐसी ताकतों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है बल्कि टुच्चापन ऐसे ही लोगों के कारण धरा पर जीवित है|

एक तो बहुत बड़ी गलती तुमने दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान कर दी जब तुमने जाति,सम्प्रदाय और क्षेत्रवाद की गंदगी से लबलबाती राजनीति में मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू प्रत्याशी चुनाव में उतार दिए, एक क्षेत्र के बहुमत से घिरे इलाकों में दूसरे क्षेत्र के प्रत्याशी खड़े कर दिए और उनमें से बहुत से जीत भी गये और जो हारे भी वे भी अधिक से अधिक दो हजार मतों से हारे| इन् तत्वों वाली ध्रुवीकरण से बजबजाती राजनीति करके जनतंत्र पर कब्जा करे बैठे लोगों की नींद उड़ाने का गुनाह तुमने किया ही अब सजा भुगतो|

अभी तुम देखते जाओ अभी तो ट्रेलर भी पूरा नहीं हुआ है| पूरी फिल्म तो शुरू होनी बाकी है|

तुम पर हर ओर से आक्रमण किया जाएगा| तुम्हे हर संभव तरीके से बदनाम किया जाएगा|

शपथ लेते समय तुमने ऊनी स्वेटर और मफलर क्यों पहना था जबकि आम आदमी को ऊनी कपड़े मयस्सर नहीं होते|

तुम फलां फलां रंग के कपड़े क्यों पहनते हो?

तुम ऐसा क्यों खाते हो वैसा क्यों गाते हो| गाना न आने के बावजूद तुमने हिम्मत कैसे की कवि प्रदीप के लिखे गीत को हजारों लोगों की भीड़ के सामने की| तुम अभी तक अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ ४ कमरों के फ़्लैट में रहते रहे हो तो तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी आई.ऐ.एस अधिकारियों को मिलने वाले ५ कमरों के फ़्लैट में रहने जाने की मंजूरी देने की? इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा सचिव वहीं किसी ऐसे ही मकान में रहता होगा|

सुनो, तुम्हे तो ट्री-हॉउस में रहना चाहिए था जहां आराम से गुलेल या हाथों से ये शिकारी लोग पत्थर मारते रहते|

कैसी कैसी गलतियां तुम करते हो? तुमसे बौखलाए ये लोग तुम पर आक्रमण करेंगे ही| इंडिया शाइनिंग जैसे मनलुभावन नारों के बावजूद पिछले दस सालों से विपक्ष में बैठी भाजपा को पूरा यकीन था कि इस बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे और भाजपा को पूर्ण बहुमत अपने बल पर मिल जाएगा और तुमने बीच में घुसकर संदेह उत्पन्न कर दिया और उनके हवाई मिशन, जिसे प्रोपेगंडा के बल पर वे विस्तार देते जा रहे थे, की हवा निकलने लगी| तुम्हारी वजह से भाजपा ४ सीट पीछे रह गयी दिल्ली में बहुमत से और पन्द्रह साल से विपक्षी बने रहने की अपनी नियति को इस बार भी न बदल पाई| उसे तो तुम पर आक्रमण करने ही हैं|

जनता का एक बहुत बड़ा तबका निराशावादिता नामक बीमारी से इस कदर ग्रस्त हो चुका है कि उसे अपने से अच्छा कोई भी आदमी अच्छा ही नहीं लगता| निराशा ने इन लोगों को परपीड़ा में आनंद लेने वाला बना दिया है| ऐसे लोगों की भीड़ कभी नहीं चाहेगी कि भारत के हालात सुधरें और लोगों का जीवन स्तर सुधरे, देश में चारों ओर ईमानदारी का वास हो क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा होने लगा तो वे निंदा किसकी करेंगे और अपने जीवन में कठिनाइयों से उत्पन्न पीड़ा का आनंद कैसे उठाएंगे? वे तो बस इन्तजार कर रहे हैं कि तुम थको, हारो, और तुम पर कालिख पोत दी जाए जिससे घायल होकर जब तुम धरती पर पड़े हो तो वे दूर से तुम पर पत्थर, गालियाँ, और व्यर्थ चीजें फेंककर अपने मनपसंद संवाद बोल सकें और तुम पर लानत भेज सकें और कह सकें – धिक्कार है तुम पर, बहुत महारथी बनने चले थे अब देखो क्या हाल हो गया है तुम्हारा|

तुम्हे हारा देख कर ये सेडिस्ट आनंद में ठहाका लगा कर हंस सकेंगे और अगले ही दिन से देश, व्यक्ति निंदा के अपने मनपसंद दैनिक कार्य में लग जायेंगे और राग अलापने लगेंगे – इस देश का कुछ नहीं हो सकता यह तो ऐसे ही चलेगा, यहाँ कभी कुछ नहीं सुधर सकता, यहाँ तो भ्रष्टाचार और गरीबी हमेशा रही है और रहेगी|

ऐसी ऐसी संस्थाएं और उनके सदस्य तुम पर आक्रमण करेंगे और तुम्हे हारा देख खुश होंगे जो अपने को औरों से ज्यादा बड़ा देशभक्त घोषित करते नहीं अघाते| उनके लिए देशभक्ति के काम वही हैं जो वे करते हैं| जो वे सोच सकते हैं बस वही देश के लिए श्रेयस्कर है| उनके अलावा बाकी सब लोग देशद्रोही हैं|

उनके लिए तुम भी देशद्रोहियों की जमात में ही आते हो|

ये सब प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाले और भूमिगत रूप से ही भारत पर नियंत्रण करने वाले लोग तुम्हे हारा हुआ देखना चाहते हैं|

ये तुम्हे सूली चढ़ा कर ही शान्ति पाएंगे|

इनके आक्रमण रोज तीव्र से तीव्रतर होते जायेंगे|

पर एक बात समझ लो, देश भर में जनता का एक तबका ऐसा भी है जिसे तुम पर पूरा विश्वास है| वे चाहते हैं तुम जीतो और इस देश में सुधार लाने के लिए निमित्त बनो| वे अपने सामर्थ्य भर तुम्हारे और तुम्हारे प्रयासों के साथ हैं| वे प्रयास रत हैं क्रान्ति के इस बीज को सम्पूर्ण देश में व्यापक स्तर पर फैलाने के लिए|

कभी इस क्रान्ति की सफलता पर संदेह मत करना| तुम फ़िक्र मत करना योद्धा…

हर वक्त है इम्तहां का

ये दस्तूर है जहां का

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