Archive for मार्च, 2014

मार्च 31, 2014

आततायी की प्रतीक्षा…(अशोक वाजपेयी)

आततायी की प्रतीक्षा

(एक)

सभी कहते हैं कि वह आ रहा है
उद्धारक, मसीहा, हाथ में जादू की अदृश्य छड़ी लिए हुए
इस बार रथ पर नहीं, अश्वारूढ़ भी नहीं,
लोगों के कंधों पर चढ़ कर वह आ रहा है :
यह कहना मुश्किल है कि वह खुद

आ रहा है
या कि लोग उसे ला रहे हैं।

हम जो कीचड़ से सने हैं,
हम जो खून में लथपथ हैं,
हम जो रास्ता भूल गए हैं,
हम जो अंधेरे में भटक रहे हैं,
हम जो डर रहे हैं,
हम जो ऊब रहे हैं,
हम जो थक-हार रहे हैं,
हम जो सब जिम्मेदारी दूसरों पर डाल रहे हैं,
हम जो अपने पड़ोस से अब घबराते हैं,
हम जो आंखें बंद किए हैं भय में या प्रार्थना में;
हम सबसे कहा जा रहा है कि
उसकी प्रतीक्षा करो :
वह सबका उद्धार करने, सब कुछ ठीक करने आ रहा है।

हमें शक है पर हम कह नहीं पा रहे,
हमें डर है पर हम उसे छुपा रहे हैं,
हमें आशंका है पर हम उसे बता नहीं रहे हैं!
हम भी अब अनचाहे
विवश कर्तव्य की तरह
प्रतीक्षा कर रहे हैं!

(दो)

हम किसी और की नहीं
अपनी प्रतीक्षा कर रहे हैं :
हमें अपने से दूर गए अरसा हो गया
और हम अब लौटना चाहते हैं :
वहीं जहां चाहत और हिम्मत दोनों साथ हैं,
जहां अकेले पड़ जाने से डर नहीं लगता,
जहां आततायी की चकाचौंध और धूमधड़ाके से घबराहट नहीं होती,
जहां अब भी भरोसा है कि ईमानदार शब्द व्यर्थ नहीं जाते,
जहां सब के छोड़ देने के बाद भी कविता साथ रहेगी,
वहीं जहां अपनी जगह पर जमे रहने की जिद बनी रहेगी,
जहां अपनी आवाज और अंत:करण पर भरोसा छीजा नहीं होगा,
जहां दुस्साहस की बिरादरी में और भी होंगे,
जहां लौटने पर हमें लगेगा कि हम अपनी घर-परछी, पुरा-पड़ोस में
वापस आ गए हैं !

आततायी आएगा अपने सिपहसालारों के साथ,
अपने खूंखार इरादों और लुभावने वायदों के साथ,
अश्लील हंसी और असह्य रौब के साथ..
हो सकता है वह हम जैसे हाशियेवालों को नजरअंदाज करे,
हो सकता है हमें तंग करने के छुपे फरमान जारी करे,
हो सकता है उसके दलाल उस तक हमारी कारगुजारियों की खबर पहुंचाएं,
हो सकता है उसे हमें मसलने की फुरसत ही न मिले,
हो सकता है उसकी दिग्विजय का जुलूस हमारी सड़कों से गुजरे ही न,
हो सकता है उसकी दिलचस्पी बड़े जानवरों में हो, मक्खी-मच्छर में नहीं।
ashok vajpai-001पर हमें अपनी ही प्रतीक्षा है,
उसकी नहीं।
अगर आएगा तो देखा जाएगा!

(अशोक वाजपेयी )

साभार “जनसत्ता”

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मार्च 31, 2014

“आप” डायरी (30 मार्च 2014) : तस्वीरें बोलती हैं

HighCourtDelhiमीडिया “आम आदमी पार्टी” को न दिखाने, या गलत तरीके से प्रस्तुत करने की योजना पर पूरी मेहनत कर रहा है| देश भर में बहुत सी जगह “आप” का असर बढ़ता जा रहा है पर अखबार, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में इससे उल्ट बातें पढ़ने और देखने को मिलती हैं| दिल्ली हाई कोर्ट ने “आप” की रिट पर फैसला देते हुए कांग्रेस और भाजपा को वेदांता और Dow Chemicals द्वारा दिए गये चंदे को अवैध माना है पर किसी भी टीवी चैनल ने इस खबर को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा पर यही “आप” के साथ होता तो जमीन आसमान एक कर देता मीडिया|

मीडिया बनाम अरविंद केजरीवाल| मीडिया के बहुत बड़े वर्ग ने अरविंद से अदावत पाल ली है| वे इसका बहाना भी खोज रहे थे क्योंकि अरविंद उनके कब्जे में नहीं हैं जैसे अन्य पार्टियों के नेता हैं| अरविंद मीडिया को भी सरेआम कोसते हैं| लगभग हरेक मीडिया हाउस अरविंद और “आप” से जुडी ख़बरों को इस तरह से तोड़ रहा है जिससे सतही तौर पर देखने वाले को वह “आप” के खिलाफ लगे और चुनावी माहौल में इससे ज्यादा समय होता नहीं आम दर्शक के पास| वह गहराई में नहीं जाता|

एक अन्य उदाहरण से समझा जा सकता है कि मीडिया कैसे “आप” के खिलाफ तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहा है|

“आज तक” ने खबर चलाई  कि संतोष कोली के परिवार ने अरविंद पर गंभीर आरोप लगाए हैं और संतोष की ह्त्या हुयी थी| अरविंद और “आप” तो कब से कह रहे हैं कि संतोष की ह्त्या हुयी थी| और आज तक वाले साफ़ इस बात को छिपा गये कि “आप” ने संतोष कोली के भाई को दिल्ली में विधायक बनवाया|

modifordमीडिया ने अरविंद द्वारा कथित रूप से मीडिया को जेल भेजने वाले वीडियो के बाद तो अरविंद को पूरी तरह निशाने पर ले लिया है जबकि अरविंद ने उसमें कहा था [“इसकी जांच करवाएंगे और मीडिया समेत सबको जेल भेजेंगे”] इसका सीधा सा अर्थ यही है कि जो भी दोषी होगा इस फिक्सिंग में (मीडिया कर्मी और अन्य लोग- मसलन कोर्पोरेट वाले जो पैसे देकर मीडिया को खरीद रहे हैं) उन्हें जेल भेजेंगे| मीडिया कोई १००% ईमानदार तो है नहीं कि सारे मीडिया को इस आरोप पर आग बबूला होकर भारत में बदलाव लाने योग्य एक “आशा” – “आप” पर आक्रमण करके देश के साथ नाइंसाफी करने लगे| ईमानदार मीडियाकर्मियों को सामने आना जरूरी है|

२०१४ के मार्च महीने में भारत में बहुत कुछ हो गया| भारत ने आपातकाल के बाद वाले चुनावों को छोड़ कर इतनी रूचि किसी और चुनाव में नहीं ली होगी| भारत बनने और बिगड़ने के कगार पर खड़ा है| अगर “आप” को सम्मानजनक समर्थन भारत देता है तो देश में राजनीति  को स्वच्छ बनाने का कार्य आरम्भ हो जाएगा और अगर “आप” को वाजिब समर्थन नहीं मिला तो यह कार्य मुल्तवी हो जाएगा और भ्रष्टाचार के कारण सड़ चुका तंत्र फिर से देश की तकदीर स खेलता रहेगा|

मीडिया के कांग्रेस+भाजपा के साथ हाथ मिलाकर “आप” के खिलाफ माहौल बनाने के खेल के बावजूद “आम आदमी पार्टी” ने कांग्रेस और भाजपा का जीना मुश्किल कर दिया है| “आप” का दबाव इन पर न होता तो ये न इतने परेशान होते “आप” को लेकर और न इस पर रोज नाजायज हमले करते| क्या इन्हे सपा-बसपा, जद (यू), ने. का, वाम दल आदि पर ऐसे तीखे आक्रमण करते देखा है? दस साल पहले भाजपा पूरी ताकत कांग्रेस और वाम दलों के खिलाफ लगाती थी और कांग्रेस इन् दोनों के खिलाफ, पर आज दोनों बड़ी पार्टियां अपनी अपनी पूरी ताकत “आप” के खिलाफ लगा रही है| राजनीति को पढ़ने -समझने वाले खुद ही देख सकते हैं देश किसकी ओर ज्यादा झुका हुआ है| और यही तकलीफ है कांग्रेस-भाजपा की कि “आप” के पास न धन है, न सत्ता का अनुभव फिर भी ये कैसे देश भर में भीड़ जुटा रहे हैं, लोग अपने पैसे खर्च करके इनकी रैलियों में भागे जा रहे हैं| नीचे दिए वीडियो में फरीदाबाद की रैली में उमड़े जनसमूह का नाद देखा जा सकता है|

भाजपा के लोग “आप” के लोगों पर हर जगह हमले कर रहे हैं, चाहे जगह मोहल्ला सभाएं हों या टीवी स्टूडियो| नीचे दिए वीडियो में भाजपा के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी को क्रोध में दिमागी संतुलन खोते हुए “आप” के प्रतिनिधि को टीवी चैनल पर एक बहस के दौरान गालियों से नवाजते हुए देखा जा सकता है|

नरेंद्र मोदी का तथ्यपरक ज्ञान उनके इतिहास ज्ञान जैसा ही है और उनके भाषणों में अस्सी प्रतिशत बातें झूठ की बुनियाद पर खड़ी होती हैं| मोदी और भाजपा ने “आप” की वेबसाईट पर जिस नक्शे की बात की किस उसमें कश्मीर भारत के नक़्शे के साथ नहीं दिखाया गया, वह असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की आधिकारिक वेब साइट (AamAadmiParty.org) पर नहीं बल्कि AapTrends.com का डोनेशन मैप था (AAP-Donation-Map-Just-India)…इस नक्शे में दिखाया गया है कि AAP को भारत के किन हिस्सों से चंदा मिल रहा है…जिन हिस्सों से चंदा नहीं मिल रहा उसे काले रंग से दिखाया गया है…|ManishGoa

पर मोदी और भाजपा इतने उतावले थे कि यह भी पता नहीं लगवा पाए कि AapTrends.com आम आदमी पार्टी (AAP) की आधिकारिक वेब साइट नहीं है… आम आदमी पार्टी (AAP) की आधिकारिक वेब साइट है AamAadmiParty.org …

नरेन्द्र मोदी लोगों की भावनाओं को भड़काने के काम में लगे हुए हैं और झूठ बोलना तो उनका प्रिय शगल है| कई बार उनके भाषण में झूठ की भारी मात्रा देख विचार उठता है मन में कि भारत कैसे ऐसे झूठे नेता को कल्पना में भी प्रधानमंत्री पद के योग्य नेता माँ सकता है? भारतीय सेना और पूर्व सैनिकों को भड़काने के कुत्सित प्रयास में मशगूल मोदी बागपत जाकर फिर सुविधानुसार भूल गये कि भाजपाई प्रधानमंत्री अटल वाजपेयी ने परवेज मुशर्रफ, जिसने कारगिल रचा और जिस युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक मारे गये, को विशेष मेहमान बनाकर भारत बुलाया था और जबर्दस्त खातिरदारी से नवाजा था| आज का भाषण फिर सिद्ध करता है कि झूठ इस आदमी की राग राग में खून बन कर दौड़ रहा है| देश का दुर्भाग्य होगा अगर ऐसा आदमी संसद में पहुँच गया, ऐसे नेता का प्रधानमंत्री बनना तो भारतकी साख एकदम ही गिरा देगा|

“आप” पर कांग्रेस,  भाजपा और मीडिया के हमले जारी हैं पर देश भर में जगह जगह उसे जनता हाथों हाथ ले रही है| और भीड़ केवल दिल्ली में ही “आप” के समर्थन में नहीं है बल्कि हर जगह उसे अच्छा समर्थन मिल रहा है| लुधियाना की सभा की झलक नीचे दिए चित्र से स्पष्ट है|

AAP Ludhiyana

अरविंद केजरीवाल ने तीस मार्च को चंडीगढ़ में रोड शो किया और जनसमूह के उत्साह की झलक चित्र से ही मिल जाती है|

Arvind@Chandigarhछात्तीसगढ़ के बस्तर में सबसे गरीब उम्मीदवार आदिवासी वर्ग की सोनी सोरी, जो पुलिस द्वारा उत्पीडन किये जाने के कारण देश भर में एक चर्चित नाम है,  एक जनसभा को संबोधित करते हुए

soni sori

MapBJP

मार्च 30, 2014

वह जो है सबसे महान माँ…

सब माताएं महान होती हैं womanchildlabour

अपने बच्चों के लिए

वे नाना प्रकार के त्याग करती हैं

अपने बच्चों के लिए

वे अपने जीवन को

अपनी अभिलाषाओं को

काट-छांट कर सीमित बना देती हैं

अपने बच्चों के लिए

बहुत सी माताएं

छोड़ देती हैं

लाखों-करोड़ों की नौकरियां और व्यवसाय

अपने बच्चों के लिए

अपने तमाम शौक और जूनून की हद तक पाले गये शौक

भी छोड़ देती हैं कुछ अरसे के लिए

अपने बच्चों के लिए

जो कुछ भी आड़े आता है बच्चों के

सही ढंग से लालन पोषण में

वे उसे छोड़ देती हैं

पर सुरक्षित माहौल में

रहने वाली स्त्रियाँ

बेहतरीन माएँ होते हुए भी

उतनी महान नहीं होती

जितनी होती है एक कामगार गरीब माँ

वह स्त्री जो बांधकर

अपनी पीठ पर दूधमुयें बच्चे को

काम पर जाती है

पत्थर तोडती है

ईंटें धोती हैं

भांति भांति के परिश्रम करती है

ताकि अपने और बच्चे के लिए

जीविका कमा सके,

और यह कठोर परिश्रम उसे

रोज करना पड़ता है

अगर रहने का कुछ ठिकाना है तो

वहाँ से वह रोज सुबह निकलती है

 बच्चे को पीठ पर कपड़े से बाँध कर

ठेकेदार की चुभती निगाहों से गुजर कर

उस रोज की जीविका के लिए काम पाती है

बच्चे को कार्यस्थल के पास ही कहीं लिटा देती है

और काम पर जुट जाती है

और इस स्थल पर न उसकी सुरक्षा का कोई प्रबंध है

labour motherन उसके बच्चे की

पर इन् सब मुसीबतों से लड़ती हुयी

वह जीविकोपार्जन के लिए हाड तोड़ मेहनत करती रहती है

कुछ देर रोते बच्चे के पास जाती है तो

सुपरवाइजर से झिडकी सुनती है

चुनाव का वक्त होता है तो

देखती है पास से गुजरते वाहनों पर लदे नेताओं को

और सुनती है उनके नारों को

– वे उस जैसे गरीब लोगों के लिए बहुत कुछ करेंगे|

शायद उसे आशा भी बंधती हो

पर वह सब तो भविष्य की बातें होती है

वर्तमान में तो उसे रोज

जीने के लिए लड़ना है

इसलिए रोज सुबह वह अपने बच्चे को पीठ पर लाद

काम पर निकलती है

उसे जीना है

अपने बच्चे के लिए

और अपने बच्चे को जिंदा रखना है

खुद को जिंदा रखने के लिए|

उसे बीमार पड़ने तक की न तो सहूलियत है और न ही इजाज़त

चारों तरफ निराशा से भरे माहौल में भी

वह रोजाना कड़ी मेहनत करके जिए चली जाती है

घर-परिवार में रहने वाली तमाम माओं से

जिनके पास सहयोग होते हैं

तमाम तरह के

कहीं ज्यादा बड़े कद होते हैं ऐसी माओं के

यही हैं धरती पर सबसे महान माएँ!

…[राकेश]

 

 

 

 

मार्च 25, 2014

अरविंद केजरीवाल Vs नरेंद्र मोदी @ वाराणसी : क्यों?

aktrain25 मार्च को बनारस में सुबह एक अलग ही किस्म की होगी…
इतनी उत्सुकता, बनारस की गलियों, इसके मोहल्लों, इसके कूचों, और इसके बाशिंदों ने अरसे से न महसूस की होगी जैसी 25 मार्च की सुबह लेकर आयेगी|

रहे होते आज बिस्मिल्लाह खान साब तो किसी और ही अंदाज में गंगा तट पर शहनाई बजाते आज की सुबह|
बनारस, दुनिया के प्राचीनतम शहरों में से एक, (जिसका पुराना नाम काशी/वाराणसी/बनारस दो हजार साल से चला आ रहा है), बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाने जा रहा है|

बनारस ने सदियों से दुनिया को ज्ञान दिया है, सभ्यता की मिसालें दी हैं, सांस्कृतिक और कलात्मक धरोहरें प्रदान की हैं…

और आज फिर देश बनारस की ओर देख रहा है…

बनारस को निर्धारित करना है …

– यह संकुचित विचारधारा अपनाने वाली बुरी राजनीतिक शक्ति को, जिसके पास धन बल की सामर्थ्य बहुत बड़ी है और जिसने आपनी राजनीतिक दुकान साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर, देश के मानस को बांटकर चलाई है, समर्थन देकर अपने अस्तित्व पर एक कालिख मल लेता है,

या

– यह देश के लिए बदलाव की बात करने वाली उदारवादी, एक नई राजनीतिक आशा को शक्ति प्रदान करता है|

 

AK@Benaras

 

मार्च 22, 2014

खुदा तो बनना नहीं है…

सब्र और ताक़त dev-001

अगर खर्चने हो

सुबूत देने में

हर बार खुद की बेगुनाही के लिए,

अच्छा है

एक संगीन गुनाह का दाग

फिर तो

अपनी सलीब खुद से ढोना

मामूली इंसान को

बना सकता है… खुदा

पर मेरी तो ये तमन्ना है नहीं!

Rajnish sign

मार्च 16, 2014

नेहरू, मीडिया़ और केजरीवाल (रवीश कुमार – एन.डी.टी.वी)

akद ट्रिब्यून जैसे बड़े अख़बार ने चण्डीगढ़ बनने के दौरान नेहरू द्वारा किये गए दौरों को तो काफी जगह दी लेकिन इस परियोजना के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी । पचास और साठ के दशक में चण्डीगढ़ शहर की वजह से राज्य द्वारा विस्थापित किये गए किसानों की कहानी का यदि कोई लेखा जोखा बचा है तो वह यहाँ के बड़े बूढ़ों का मौलिक इतिहास ही है । राज्य के पूरे विमर्श ने, जिसके मुख्य प्रवक्ता जवाहरलाल नेहरू थे, इन विरोध प्रदर्शनों को राष्ट्र राज्य निर्माण के शोरगुल में दरकिनार करना ही उचित समझा । ”

नेहरू ने कांग्रेस को मिले वोटों का तात्पर्य नागरिकों द्वारा नेहरूवादी आधुनिकता को दी गया सहमति के रूप में ग्रहण किया था । कांग्रेस की चुनावी जीत को उत्तर औपनिवेशिक राज्य में आधुनिकता लाने के इरादे से शुरू की गयी बड़ी परियोजनाओं के प्रति लोगों की पूर्ण सहमति मान लिया गया था । इसी चक्कर में राज्य व्यवस्था ने विरोध के सभी स्वरों को ख़ारिज कर दिया । ये विरोधी स्वर उन सभी विस्थापितों के थे जिनके खेत खलिहानों को ज़बरदस्ती अधिग्रहीत कर राज्य ने देश के विभिन्न भागों में ऐसी योजनाएँ तथा परियोजनाएँ शुरू की थीं ।”
मीडिया तब भी वैसा ही था । विरोध की आवाज़ राष्ट्र निर्माता के स्वप्न से कमतर लगती थी । हम अभी तक एक मीडिया समाज के तौर पर महानायकी का गुणगान करने की आदत से बाज़ नहीं आए । आज भी शहर के बसने और गाँवों के उजड़ने के क़िस्सों को दर्ज करने में मीडिया असंतुलन बरतता है । कोई कराता है या अपने आप हो जाता है इस पर विवाद हो सकता है । उस दौरान विस्थापित हुए लोगों की पीढ़ियां मीडिया और राज्य व्यवस्था की इस नाइंसाफ़ी से कैसे उबर पाई होंगी आप अंदाज़ा लगाने के लिए अपने आज के समय को देख सकते हैं ।
शुरू के दो उद्धरण मैंने नवप्रीत कौर के लेख से लिये हैं । यह लेख सी एस डी एस और वाणी प्रकाशन के सहयोग से प्रकाशित हिन्दी जर्नल ‘प्रतिमान‘ में छपा है । ‘प्रतिमान’ हिन्दी में ज्ञान के विविध रूपों को उपलब्ध कराने का अच्छा प्रयास है । इसके प्रधान सम्पादक अभय कुमार दुबे हैं । साल में इसके दो अंक आते हैं और काफी कड़ाई से इसमें लेख छपने योग्य समझा जाता है । नवप्रीत कौर चंडीगढ़ के इतिहास पर काम करती हैं ।
भारत में उत्तर औपनिवेशिक शहर बनाने का सपना आज कहाँ खड़ा है । चंडीगढ़ हमारे आज के शहरी विमर्श की मुख्यधारा में भी नहीं है । उसके बाद के बने शहर चंडीगढ़ को न अतीत मानते हैं न भविष्य । लवासा, एंबी वैली, सहारा शहर, नया रायपुर, गांधीनगर, ग्रेटर नोएडा, नोएडा, गुड़गाँव, नवी मुंबई, इन नए शहरों ने हमारी शहरी समझ को कैसे विस्तृत किया है या कर रहा है हम ठीक से नहीं जानते । बल्कि अब इस देश में हर तीन महीने में कोई नया शहर लाँच हो जाता है । उस शहर का निर्माता कोई बिल्डर होता है । नेहरू न मोदी ।
नरेंद्र मोदी भी सौ स्मार्ट सिटी लाने का सपना दिखा रहे हैं । यूपीए सरकार ने भी सोलह हज़ार करोड़ का बजट रखा है । केरल के कोच्चि में स्मार्ट सिटी की आधारशिला रखी जा चुकी है । छह सात स्मार्ट सिटी बनाने का एलान उसी बजट में किया गया था । स्मार्ट सिटी से मंदी नहीं आएगी या अर्थव्यवस्था कैसे चमक जाएगी इसका कोई प्रमाणिक अध्ययन सार्वजनिक विमर्श के लिए उपलब्ध नहीं है । कुछ हफ़्ते पहले पुणे की एक राजनीति विज्ञानी ने इंडियन एक्सप्रेस में एक छोटा सा लेख ज़रूर लिखा था उम्मीद है ” स्वतंत्र और निष्पक्ष ” मीडिया इस बार विस्थापन के सवालों पर नेहरू के स्वर्ण युग वाले दौर की तरह ग़लती नहीं करेगा । स्मार्ट सिटी की परिकल्पना पर सूचनाप्रद बहस शुरू करेगा ।
अच्छा लग रहा है जिन दलों के नेता मीडिया के सवालों का सामना नहीं करते वे आजकल केजरीवाल के बयान के बहाने मीडिया की आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं । इंटरव्यू तक नहीं देते मगर चौथे खंभे का सम्मान करते हैं । पत्रकार सीमा आज़ाद को जेल भेजने वाली सरकारों के नेता कहते नहीं है । चुपचाप जेल भेज देते हैं । यही फ़र्क है । ज़रा गूगल कीजिये । नमो से लेकर रागा फ़ैन्स के बहाने इन दलों ने आलोचना की आवाज़ को कैसे कुचलने का प्रयास किया है । किस तरह की गालियाँ दी और इनके नेता चुप रहे । नमो फ़ैन्स और रागा फ़ैन्स की भाषा देखिये । किराये पर काल सेंटर लेकर अपने फ़ैन्स के नाम पर हमले कराना अब स्थापित रणनीति हो चुकी है ।
mkvenu
कपिल सिब्बल जो सोशल मीडिया पर अंकुश लगा रहे थे वे अरविंद के बयान की मज़म्मत के बहाने मीडिया के चैंपियन हो रहे हैं । महाराष्ट्र सरकार ने उस लड़की के साथ क्या किया था जिसने फेसबुक पर बाल ठाकरे के निधन के बाद टिप्पणी की थी । महाराष्ट्र में लोकमत के दफ़्तर पर हमला करने वाले कौन लोग थे । इन दलों ने पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के मालिकों को लोक सभा से लेकर राज्य सभा दिये कि नहीं दिये । दे रहे हैं कि नहीं दे रहे हैं । इन राजनीतिक दलों के उभार के इतिहास में मीडिया कैसे सहयात्री बना रहा इसके लिए इतिहास पढ़िये । राबिन ज्येफ्री की किताब है  । नाम याद नहीं आ रहा । बाबरी मस्जिद के ध्वंस के समय हिन्दी पट्टी के अख़बार क्या कर रहे थे राबिन ज्येफ्री की किताब में है । भाजपाई मीडिया और कांग्रेसी मीडिया का आरोप और द्वंद अरविंदागमन के पहले से रहा है ।
मीडिया को अपनी लड़ाई खुद के दम पर लड़नी चाहिए न कि अलग अलग समय और तरीक़ों से उन पर अंकुश लगाने वालों की मदद से । मीडिया को अपने भीतर के सवालों पर भी वैसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए जैसी अरविंद के हमले के बाद की जा रही है । स्ट्रींगरों के शोषण से लेकर छँटनी और ज़िला पत्रकारों के वेतन के सवाल पर भी उन मीडिया संगठनों को बोलना चाहिए जो इनदिनों मीडिया की तरफ़ से बयान जारी कर रहे हैं । रही बात जेल भेजने की तो यह काम कई तरीके से हो रहा है । राज्यों की मीडिया संस्थानों को विज्ञापनों के ज़रिये जेल में रखा जा रहा है । कोई जेल भेजने की बात कर रहा है तो कोई विज्ञापनों या स्वभक्ति के नाम पर अपने आप जहाँ है वहीं पर खुशी खुशी निर्विकार जेल में रह रहा है । विज्ञापन का विकल्प क्या है । पूरी दुनिया में ऐसे आरोप लग रहे हैं और इनका अध्ययन हो रहा है ।
मीडिया प्रवक्ताओं को बताना चाहिए कि राज्यों में अख़बारों को लेकर ऐसी अवधारणा क्यों है । सही है या ग़लत है । पाठकों को अहमदाबाद, पटना, राँची लखनऊ और भोपाल के अख़बारों का खुद अध्ययन करना चाहिए और देखना चाहिए कि उनमें जनपक्षधरता कितनी है । मुख्यमंत्री का गुणगान कितना है और सवाल या उजागर करने वाली रिपोर्ट कितनी छपती है ।
इस बार जब चुनाव आयोग ने कहा कि इस चुनाव में मुक्त और निष्पक्ष चुनाव को सबसे बड़ा ख़तरा पेड न्यूज़ से है तब किस किस ने क्या कहा ज़रा गूगल कीजिये । मुख्य चुनाव आयुक्त ने सम्पादकों को चिट्ठी लिखकर आगाह किया है और सरकार से क़ानून बनाने की बात की है । डर है कि कहीं अरविंद के इस बयान के सहारे कवरेज़ में तमाम तरह के असंतुलनों को भुला न दिया जाए । पेड मीडिया एक अपराध है जिसे मीडिया ने पैदा किया ।
आज हर बात में कोई भी पेड मीडिया बोलकर चला जाता है । मीडिया को लेकर बयानबाज़ी में हद दर्जे की लापरवाही है । सब अपने अपने राजनीतिक हित के लिए इसे मोहरा और निशाना बनाते हैं । आख़िर कई महीनों तक चैनलों ने क्यों नहीं बताया कि मोदी की रैली में झूमती भीड़ के शाट्स बीजेपी के कैमरे के हैं । उस चैनल के नहीं । लोगों को लगा कि क्या भीड़ है और कितनी लहर है । तब हर चैनल पर मोदी का एक ही फ़्रेम और शाट्स लाइव होता था । अब जाकर आजकल  सौजन्य बीजेपी या सौजन्य कांग्रेस लिखा जाने लगा है । क्या मीडिया ने खुद जिमी जिब कैमरे लगाकर अन्ना अरविंद आंदोलन के समय आई भीड़ को अतिरेक के साथ नहीं दिखाया । जंतर मंतर में जमा पाँच हज़ार को पचीस हज़ार की तरह नहीं दिखाया । क्या इस तरह का अतिरिक्त प्रभाव पैदा करना ज़रूरी था । याद कीजिये तब कांग्रेस बीजेपी इसी मीडिया पर कैसे आरोप लगाती थी । बीजेपी के नेताओं ने ऐसे आरोप दिसंबर में आम आदमी की सरकार बनने के बाद के कवरेज पर भी लगाए । तीन राज्यों में जहाँ बीजेपी को बहुमत मिला उसे न दिखाकर अरविंद को दिखाया जा रहा है । जेल भेजने की बात नहीं की बस । शुक्रिया । जबकि उन्हीं चैनलों पर महीनों मोदी की हर रैली का एक एक घंटे का भाषण लाइव होता रहा है । मोदी की रैली के प्रसारण के लिए सारे विज्ञापन भी गिरा दिये जाते रहे । किसी ने बोला कि ऐसा क्यों हो रहा है । याद कीजिये । यूपी विधानसभा चुनावों से पहले राहुल की पदयात्राओं कवर करने के लिए कितने ओबी वैन होते हैं । राहुल जितनी बार अमेठी जाते हैं न्यूज़ फ़्लैश होती है । क्यों ? बाक़ी सांसद भी तो अपने क्षेत्र जाते होंगे । इन सवालों पर चुप रहते हुए क्या मीडिया पर उठ रहे सवालों का जवाब दिया जा सकता है ?
अरविंद को ऐसे हमलों से बचना चाहिए । सबको गाली और दो चार को ईमानदार कह देने से बात नहीं बनती है । दो चार नहीं बल्कि बहुत लोग ईमानदारी से इस पेशे में हैं । वो भले मीडिया को बदल न पा रहे हों मगर किसी दिन बदलने के इंतज़ार में रोज़ अपने धीरज और हताशा को समेटते हुए काम कर रहे हैं । हम रोज़ फ़ेल होते हैं और रोज़ पास होने की उम्मीद में जुट जाते हैं । अरविंद अपने राजनीतिक अभियान में मीडिया को पार्टी न बनायें । मीडिया को लेकर उनके उठाये सवाल जायज़ हो सकते हैं मगर तरीक़ा और मौक़ा ठीक नहीं । जेल भेजने की बात बौखलाहट है । पेड न्यूज़ वालों को जेल तो भेजना ही चाहिए । अरविंद की बात पर उबलने वालों को मीडिया को लेकर कांशीराम के बयानों को पढ़ना चाहिए । यह भी देखना चाहिए कि मीडिया उनके साथ उस वक्त में कैसा बर्ताव कर रहा था । किस तरह से नई पार्टी का उपहास करने के क्रम में अपनी उच्च जातिवादी अहंकारों का प्रदर्शन कर रहा था । कांशीराम भी तब मीडिया को लेकर बौखला जाते थे ।
आज मायावती खुलेआम कह जाती हैं कि मैं इंटरव्यू नहीं दूँगी । पार्टी के लोगों को सोशल मीडिया के चोंचलेबाज़ी से बचना चाहिए ।मीडिया में कोई आहत नहीं होता क्योंकि मायावती अब एक ताक़त बन चुकी हैं । अरविंद बसपा से सीख सकते हैं । बसपा न अब मीडिया को गरियाती है न मीडिया के पास जाती है । जब कांशीराम बिना मीडिया के राजनीतिक कमाल कर सकते हैं तो केजरीवाल क्यों नहीं । योगेंद्र यादव भी तो आप की रणनीतियों के संदर्भ में कांशीराम का उदाहरण देते रहते हैं । जिस माध्यम पर विश्वास नहीं उस पर मत जाइये । उसे लेकर जनता के बीच जाइये । जाना है तो ।
और जिन लोगों को लगता है कि मीडिया को लेकर आजकल गाली दी जा रही है उनके लिए अख़बारों के बारे में गांधी जी की राय फिर से दे रहा हूँ ।

“कोई कितना भी चिल्लाता रहे अख़बार वाले सुधरते नहीं । लोगों को भड़काकर इस प्रकार अख़बार की बिक्री बढ़ाकर कमाई करना, यह पापी तरीक़ा अख़बार वालों का है । ऐसी झूठी बातों से पन्ना भरने की अपेक्षा अख़बार बंद हो जायें या संपादक ऐसे काम करने के बजाय पेट भरने का कोई और धंधा खोज लें तो अच्छा है । ”

12.2.1947- महात्मा गांधी( सौजन्य: वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत)
रवीश कुमार के ब्लॉग क़स्बा से साभार
मार्च 15, 2014

छिल रहे हैं मेरे सपनो के नर्म अहसास

मत कहो तुम कुछ mirrorwoman-001

सुन तो हम तब भी लेंगे

रोक लो खुद को चाहे

कितना ही,

आँखे बोल देंगी तुम्हारी

होंठ मेरे सब खुद-ब-खुद  सुन लेंगे

आओ लो संभालो अपनी अमानत

बहुत दिनों से तुम्हारे लिए इसे

खाद पानी दे के बड़ा किया है

अब इसका क़द मुझसे ऊंचा हो रहा है

तुम्ही हो जो रख सकती हो इसे अपने साए में

बहुत बेचैन रहता है तुम्हारी नर्म बाहों को

संभालो कि इस से छिल रहे हैं

मेरे अपने ही सपनो के नर्म अहसास…

तुम्हारे प्रति मेरे प्यार की साँसे

उखड़ जाएँ

उससे पहले आ जाओ…

Rajnish sign

मार्च 14, 2014

“इंकलाब जिंदाबाद” क्या है … भगत सिंह

bhagat2[भगतसिंह ने अपने विचार स्पष्ट रूप से भारतीय जनता के सामने रखे। उनके विचार में, क्रांती की तलवार विचारों की धार से ही तेज होती है। वे विचारधारात्मक क्रान्तिकारी हालात के लिये संघर्ष कर रहे थे। अपने विचारों पर हुए सभी वारों का उन्होने तर्कपूर्ण उत्तर दिया। यह वार अंग्रेजी सरकार की ओर से किये गये या देशी नेताओं की ओर से अखबारों में।

शहीद यतिन्द्रनाथ दास ६३ दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद हुए। Modern Review के संपादक रामानंद चट्टोपाद्ध्याय ने उनकी शहादत के बाद भारतीय जनता द्वारा शहीद के प्रति किए गये सम्मान और उनके “इंकलाब जिन्दाबाद” के नारे की आलोचना की। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने Modern Review के संपादक को उनके उस संपादकीय का निम्नलिखित उत्तर दिया था। – सं]

श्री संपादक जी,
माडर्न रिव्यू,

आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसंबर, १९२९ के अंक में एक टिप्पणी “इंकलाब जिन्दाबाद” शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना जिसे प्रत्येक भारतीय सम्मान की दृष्टी से देखता है, हमारे लिये बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या अभिप्राय है?

यह आवश्यक है, क्यूं कि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक पहुंचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है। यही नारा रूस के क्रान्तिकारी आंदोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों “बोस्टन और आईल” में यही नारा कुछ अराजकतावादी क्रांतिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है सशत्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई भी व्यवस्था अल्प समय के लिये भी स्थाई न रह सके। दूसरे शब्दों में देश और समाज में अराजकता फ़ैली रहे।

दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है, जो संभव है, भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए, परंतु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इनके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न हो गए हैं तथा एक सीमा तक उनमें नीहित हैं।

उदाहरण के लिये हम यतिन्द्रनाथ जिन्दाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा तात्पर्य यह होता है उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिये बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी। यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिये अचूक उत्साह को अपनाएं। यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं। इस प्रकार हमें “”इंकलाब” शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिये। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं। क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्युनल के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।

इस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्रांति (इंकलाब) का अर्थ अनिवार्य रूप से सशत्र आंदोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफ़ल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं। इसमें भी संदेह नहीं है कि कुछ आन्दोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्तौल क्रान्ति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो।

इस वाक्य में “क्रान्ति” शब्द का अर्थ “प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा” है। लोग साधारण जीवन की परंपरागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं। यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता है और रूढ़ीवादी शक्तियां मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं।

क्रान्ति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओत-प्रोत रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिये संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव न रहे और वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि आदर्श व्यवस्था संसार को बिगाड़ने से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको ह्रदय में रख कर “इंकलाब जिन्दाबाद” का नारा ऊंचा करते हैं।

भगतसिंह, बी. के. दत्त
२२ दिसंबर, १९२९
[“सरदार भगतसिंह के राजनैतिक दस्तावेज”, संपादक चमनलाल व प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इन्डिया]

मार्च 14, 2014

तुम जो फ़ांसी चढ़ने से बच गये हो…(भगत सिंह)

bhagatभगत सिंह का पत्र——- बटुकेश्वर दत्त के नाम

प्रिय भाई,

मुझे दंड सुना दिया गया है और फ़ांसी का आदेश हुआ है। इन कोठरियों में मेरे अतिरिक्त फ़ांसी की प्रतीक्षा करने वाले बहुत से अपराधी हैं। ये लोग यही प्रार्थना कर रहे हैं कि किसी तरह फ़ांसी से बच जाएं, परंतु उनके बीच शायद मैं ही एक ऐसा आदमी हूं जो बेताबी से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूं जब मुझे अपने आदर्श के लिए फ़ांसी के फ़ंदे पर झूलने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

मैं खुशी के साथ फ़ांसी के तख्ते पर चढ़कर दुनिया को यह दिखा दूंगा कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए कितनी वीरता से बलिदान दे सकते हैं।

मुझे फ़ांसी का दंड मिला है, किन्तु तुम्हे आजीवन कारावास का दंड मिला है। तुम जीवित रहोगे और तुम्हे जीवित रह्कर दुनिया को यह दिखाना है कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए केवल मर ही नहीं सकते, बल्कि जीवित रह कर हर मुसीबत का मुकाबला भी कर सकते हैं। मृत्यु सांसारिक कठिनाईयों से मुक्ति प्राप्त करने का साधन भी नहीं बननी चाहिये, बल्कि जो क्रान्तिकारी संयोगवश फ़ांसी के फ़ंदे से बच गए हैं, उन्हे जीवित रह्कर दुनिया को यह दिखा देना चाहिए कि वे न केवल अपने आदर्शों के लिए फ़ांसी चढ़ सकते हैं, बल्कि जेलों की अंधकारपूर्ण छोटी कोठरियों में घुल-घुलकर निकृष्टतम दर्जे के अत्याचारों को सहन भी कर सकते हैं।

तुम्हारा
भगतसिंह

सेन्ट्रल जेल, लाहौर
अक्टूबर ,१९३०

सरदार भगतसिंह के राजनैतिक दस्तावेज”, संपादक चमनलाल व प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इन्डिया

मार्च 10, 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति : प्रभाष जोशी की दृष्टि में

prabhasjoshiजनसत्ता के यशस्वी संपादक  प्रभाष जोशी का यह लेख 10 मार्च, 2008 को जनसत्ता में छपा था|

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन?

(अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.)

….अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.

एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.

लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”

हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.

सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.

संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं.

(साभार- जनसत्ता)

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