Archive for अप्रैल, 2011

अप्रैल 30, 2011

सपने डूबते हैं ज़हर में

नज़रें थक गयी नज़ारे इतने समाये नजर में
सब कुछ देखा आदमी के सिवा इस शहर में

ये बात अलग है उसका पता मिला या नहीं
किसी ने हवा में ढूँढा उसे किसी ने पत्थर में

हुई रात तो बच्चे अपने दड़बों में दुबक गए
पुरानी कुछ दीवारें जाग रही हैं अकेले घर में

मुँह दिखाई के रिश्ते दिल की राहें भूल गए
अजनबी अपने कमरे हैं आज सब के घर में

अँधेरा रात के संग मैली राहों पर जा भटका
चांदनी करवटें बदलती रही जलते बिस्तर में

धुंधले हुए नजारों के रंग तेरे बिना ए दोस्त
मंज़र कोई ठहरता ही नहीं अब इस नज़र में

जलती धूप में चलते रहना है जाने कब तक
पाँवों के कांटे क्या गिनें अभी तो हैं सफर में

जिंदगी बेअर्थ हुई क्या संवेदनहीन माहौल में
वरना क्यों कोमल सपने डूब रहे हैं ज़हर में

दिन की चाकरी के बाद भी चैन कहाँ आलम  
वही खड़कते बर्तन मिलगे जब लौटूँगा घर में

(रफत आलम)

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अप्रैल 29, 2011

खौफ है बरपा

राह बेताब मुसाफिर है तैयार भी
खत्म हुआ अब हर इन्तेज़ार भी

पत्थर बन गए सारे सरोकार भी
गूंगी बहरी अंधी हुई सरकार भी

मंत्री गुंडा ही नहीं है चाटूकार भी
प्रजा त्रस्त बहरा हुआ दरबार भी

बिकने वाला ही यहाँ खरीदार भी
अजब है दुनिया का कारोबार भी

गरमी में खाली मटकी प्यासी है
और जान लेवा भूख की मार भी

शेख साहब आप की करतूतों से
शर्मिंदा है मुझ सा गुनहगार भी

मंदिरों मस्जिदों के झगडे यानी
नफ़े का है बन्दों ये कारोबार भी

अज़ान आरती की पाक सदा में
सुन सको तो सुन लो चीत्कार भी

पीने गए थे बंदगी की मय लोग
साथ लाये खुदाई का खुमार भी

अक्ल का कहा तो सदा माना है
कभी सुनना दिल की पुकार भी

हमें मालूम है फैसला क्या होगा
वही कातिल है जो के पैरोकार भी

कटने के खौफ से चुप हैं ज़बाने
और तेज है खंजरों की धार भी

ईमान की चिता जली थी आलम
उजाला ले आया सियाहकार भी

(रफत आलम)

अप्रैल 29, 2011

निर्माण फिर से

जीवन के आधार तत्व
खुद आकारहीन हैं
उस निराकार की तरह
जिसने इनसे गढे हैं
साँसों की अबूझ पहली फूँक कर
कमज़ोर और ताकतवर पुतले!

दुनिया के घर में ये किरायदार
खुद को मालिक समझ बेठे हैं.
सूर्योदय के पहले दिन ही
ताकतवर की भूख ने
कमज़ोर का किस्सा छीन लिया था
जारी है ये अंतहीन सिलसिला
प्रलय दिवस तक के लिए!

इंसानी अहम की क्या कहिये
खुदाई का दावा करने वालों ने
बहुत थूका है
आकाश की ओर मुँह करके!

खुदी में चूर आँखों ने कब देखा
वक्त के क़दमों में पड़ी हैं
अनगिनत पगडियां
कर्मों से विकृत लाखों चेहरे
जिनका कोई निशान नहीं बाकी
वे सब स्वघोषित खुदा थे।

पैगम्बर –अवतार आये
संत–सूफियों ने कोशिश की
बेठिकाना इन पांच तत्वों को
मंजिल का पता मिले
फरिश्ता ना सही
आदमी, आदमी तो बन जाए!
पाप की बस्ती के वासी
अस्तित्व से ही गुनहगार बंदे
रास्ता भला पाते कैसे?
मिथ्या तर्कों के सहारे
सूली पर चढा दिया गया
हर शाश्वत सच।

कब बाज़ आया है
आदमजाद अपनी हरकतों से
वही अन्यायी ताकतों का राज है
वही ऊँच-नीच में बंटा समाज है
वही रंग-भेद के बेमानी झगडे
वही जहनी गुलामी का रिवाज है
वही चापलूस वही मसखरे वही बहरूपिये
वही वक्त के खुदाओं का शैतानी अंदाज़ है
वही मुफलिसी और अमीरी
वही असमानता का मर्ज़े लाइलाज है।

ओ! तत्वों के किमियागर
खा गया माटी का गंदमैला रँग मुझे
एक बार दुबारा निकाल
उस सांचे से
जिसमें ढ़लकर सजता है
चाँद-तारों से सजी रात का रूप
आकाश की नीली चादर पर
उजला सूरज उगता है।

(रफत आलम)

अप्रैल 28, 2011

एक रचना : दूसरा प्रसंग

हर बार फैसला करता हूँ
फिर भी डरता हूँ
इस खतरे के भय से
कि कोठरी का द्वार खुलते ही
सब कुछ खो जायेगा
खुशबू हो जायेगा
जो मेरी पूँजी है…
शायद गलत कह गया
एक धरोहर है
जो तुम बिना बताये सौंप गये हो।
जिसकी सुरक्षा में
जागरण और स्वप्न बीते हों
उसे कैसे खो जाने दूँ
खुशबू हो जाने दूँ
यह मेरी निजता है
कोई सार्वजनिक सम्पत्ति नहीं
जिस पर सबका अधिकार
अवश्यम्भावी हो।

{कृष्ण बिहारी}

एक रचना: पहला प्रसंग

एक रचना : तीसरा प्रसंग

एक रचना: निर्णायक प्रसंग

अप्रैल 28, 2011

Twitter : देवनागरी के सामने खड़ा एक जिन्न

अंग्रेजी शब्द Clone को देवनागरी में आसानी से क्लोन लिख सकते हैं क्योंकि आधे “” की गुंजाइश है।

अंग्रेजी शब्द Pure आसानी से देवनागरी में प्योर लिखा जा सकता है। आधे की उपस्थिति है।

पर जो शब्द अंग्रेजी के T
अक्षर से शुरु हों उनके साथ क्या किया जाये?

हिन्दी में या से शुरु होने वाले शब्दों को आसानी से रोमन में लिखा और पढ़ा जा सकता है।

अंग्रेजी वर्णमाला के T को हिंदी के और दोनों के संदर्भ में उपयोग में लाया जाता है और कोई दिक्कत नहीं आती। अगर रोमन में ऐसा लिखना हो कि ” दधीचि बड़े त्यागी महात्मा थे ” तो इस वाक्य के त्यागी शब्द को आसानी से रोमन में Tyagi लिखा और पढ़ा जा सकता है पर जब अंग्रेजी शब्द Tuning को देवनागरी में टयूनिंग लिखा जाता है तो क्या वह एकदम सही है? क्योंकि कायदे से इसे Tayuning पढ़ा जाना चाहिये।

अंग्रेजी के  शब्द Twin के साथ क्या किया जाता है जब इसे देवनागरी में लिखा जाता है?  इसे लिखते हैं ट्विन या ट्वीन, जो कि कतई अंग्रेजी के मूल शब्द के अनुरुप उच्चारण वाले शब्द नहीं हैं।

यही दिक्कत माइक्रो ब्लॉगिंग माध्यम के शब्द Twitter को देवनागरी लिपि में लिखने की है।

अगर इसे ट्विटर लिखें तो कायदे से इसका हिन्दी में इसका सही उच्चारण  TiwTar हो जायेगा जो कि अंग्रेजी के मूल उच्चारण से एकदम अलग है।

अगर इसे टविटर लिखें तो हिन्दी में इसका उच्चारण TawiTar हो जाता है जो कि पुनः अंग्रेजी के मूल उच्चारण से अलग है। तो क्या देवनागरी में इस शब्द को लिखा ही नहीं जा सकता।

अंग्रेजी के सही उच्चारण के तहत इस शब्द में की ध्वनि आधी बैठेगी, पर पहले ही अक्षर के रुप में आधे को कैसे लिखा जायेगा?

इस समस्या को इस तरह भी समझ सकते हैं – अगर Twitter शब्द के पहले अक्षर को हिन्दी में के बजाय की ध्वनि मिल जाती तो सही उच्चारण का सही लेखन होता त्वितर या त्विटर न कि तिवतर या तिवटर

हिन्दी की खासियत ही यही है कि जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है और जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा भी जाता है।

हिंदी शब्दों को तो रोमन लिपि में लिखा जा सकता है पर ऐसा जरुरी नहीं कि देवनागरी भी अंग्रेजी शब्दों को ऐसी सड़क मुहैया करा दे जिस पर अंग्रेजी के शब्द सरपट दौड़ सकें।

ऐसी स्थितियों में जुगाड़ से काम चलाना पड़ता है।

अप्रैल 27, 2011

पत्थर नहीं हीरा बन

जिंदगी की ठोकरों से
घबरा कर
पत्थर न बन यार!

तेरे भीतर छिपा है हीरा
तलाश उसे
तराश उसे।

माना बहुत लंबा है
सडक पर लुढ़कते फिरने से
मुकुट की शोभा बनने तक का सफर।

बुद्धि और बदन को कठोर कर
हाथ की लकीरों को रोने वाले
उठा हाथ में
कलम हो के कुदाल
पसीने की नदी में बहकर ही
सफलता के सागर की मिलती है थाह।

याद रखना
बिना तपे
सोना निखरता कब है
भीतरी आग अगर नहीं होती
सूरज रात बना रहता।

कटने-छटने-सँवरने की पीड़ा में ही
छिपा है
पत्थर से हीरा बनने का राज़
जिसकी  कुंजी
तेरी पहुँच से दूर नहीं!

(रफत आलम)

अप्रैल 27, 2011

एक रचना: पहला प्रसंग

प्राय: सोचता हूँ
दिल के भीतर कैद
यादों की वह कालकोठरी खोलूँ
जिसमें एक निर्दोष आत्मा
जाने कब से अनियत कालीन
दण्ड भुगत रही है।

खुद को
अपने भीतर बंदी रखना
कितनी बड़ी सजा है!

यही समय है
मुक्त्त कर दूँ उसे
या फिर निर्वासन ही दे दूँ
हमेशा-हमेशा के लिये,
सही
एक यही प्रायश्चित होगा।

जैसी करनी वैसी भरनी…
कैसा अतीत…
क्या इतना मुश्किल है
बिना विगत के जीना?
जी लूँगा…
एक और विष पी लूँगा।

उसे मुक्त्त करना ही होगा
पता नहीं – कोठरी छोटी हो गई है या कि
यादों का आकार बड़ा
दोनों ही एक दूसरे के लिये नाकाफी हैं।

सब कुछ धुंधुला-धुँधला सा है।
सचमुच मैं इतना उदार कब था
उसे दुख देना ही तो
मेरा सुख था।

यह कैसी बैचेनी है
जिस पर कोई लगाम नहीं है
जिसकी गति हलचल
और अस्थिरता पर कोई
विराम नहीं है।

कुछ करना ही होगा अब तो
इससे निजात पाने को
वह प्यास बुझाने को
जो एक नदी पीकर भी शांत नहीं होगी।

फिर भी
प्यास बुझाने की कोशिश
अपराध नहीं है।

लो हो गया निर्णय!

मुक्त्त करुँगा कैदी को कारा से!

{कृष्ण बिहारी}

एक रचना : दूसरा प्रसंग

एक रचना : तीसरा प्रसंग
एक रचना: निर्णायक प्रसंग

अप्रैल 26, 2011

न परदा न जीरो फीगर है तेरी हस्ती

पुरातन उसूल परदे में बिठा देते हैं तुझे
बंद कमरों की कैद में छुपा देते हैं तुझे
अति इन हालात की जान पर आफत है
नवीन संस्कार “लिव इन” बना देते हैं तुझे
………..

शोहदों की फब्तियों से किरच किरच बिखर जाती है सहमी हुई लड़की
गूंगी बहरी और अंधी बन के राह से गुज़र जाती है सहमी हुई लड़की
सर झुका के चलने की नसीहतों ने बहुत ज़ुल्म ढाया है इस अबला पर
कई बार तो चलते में अपने ही साये से डर जाती है सहमी हुई लड़की
………….

मीठे गोश्त के शिकारी घात लगा रहे हैं
कहीं दहेज के लालची आँखे दिखा रहे हैं
बहुत भारी है जवान होती बेटी का बोझ
मुफलिस बाप के कांधे झुकते जा रहे हैं
…………

आज के दौर से नज़रें मिला के चल
नीची निगाह वाली सर उठा के चल
तुझ से है ज़माना तू ज़माने से नहीं
जननी, जननों से कदम मिला के चल
…………

बड़ा है तेरा मुकाम नारी तू मादर ए दुनिया है
चूड़ियों की कैद ने तुझको अबला बना दिया है
“ज़ीरो फीगर” से सबक न ले खुद को पहचान
हव्वा तू, दुर्गा तू, सीता तू, मरियम तू, तू जुलेखा है।

(रफत आलम)

अप्रैल 25, 2011

किसी ने दीवाना समझा किसी ने सरफिरा

सरमस्ती-ए-इश्क को ज़माने ने कभी भी ना जाना
कोई सरफिरा समझा हमें किसी ने दीवाना जाना

रास्ते को मंजिल समझा मंजिल को रास्ता जाना
तब कहीं जाकर दीवाने ने खुद अपना पता जाना

साक्षात सच को समझने वाले कब डरे सूलियों से
विष के प्याले को भी पगलों ने अमृत भरा जाना

हमारे लिए तो नामालूम सफर का एक ठहराव है
और लोगों ने दुनिया को मंजिल का रास्ता जाना

कुछ भरोसा लुटा कुछ और खलिश दिल को मिली
नादान दिल ने जब कभी किसी को अपना जाना

सब अपने हैं यहाँ हमारे दिल को वहम था बहुत
भरम तोड़ गया किसी का मुँह फेर के चला जाना

डूब गए टूटी हुई पतवार पर भरोसा करके आलम
वो तिनका भी नहीं था जिसे हमने सफीना जाना

(रफत आलम)

अप्रैल 24, 2011

दर्द की दवा

गज़ल…रफत आलम

……………………………………………………………………..

किसी से उम्मीद है फ़िज़ूल आज कोई क्या देगा
दिल की दौलत छुपा लेगा खाली हाथ दिखा देगा

हमारी भूख को राशनकार्ड थमा कर हाकिमे शहर
जलती प्यास पर टूटे मटकों की मुहर लगा देगा

अभी तो कीचड ने लगाए हैं दामन पर चंद धब्बे
गंद के शिकवे की सज़ा देखिए दौर हमें क्या देगा

कलम की जगह झूठे बरतन नन्हे हाथों में देकर
वक्त गरीब बच्चों को जिंदगी के ढंग सिखा देगा

कौन सा खज़ाना है आँसू जिसे छुपाये फिरते हो
ये दरिया अगर बह निकला तो तुमको डूबा देगा

सोचता हूँ देने वाला आखिर दर्द देता ही क्यों है
ये मान लिया जिसने दर्द दिया है वही दवा देगा

दुनिया क्या याद रहती अपना पता भी भूल गए
हमें मालूम नहीं था तेरा गम इस कदर नशा देगा

एक छोटी सी विज्ञापनी खबर पल में बन जाओगे
आलम  माटी का हर रिश्ता कल तुमको भुला देगा

(रफत आलम)

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