Archive for अप्रैल, 2010

अप्रैल 29, 2010

आज का सच

इच्छाओं में वृद्धि,

आमंत्रण है तनावों को,

क्योंकि चाही गयी हर इच्छा पूर्ण नहीं होती,

पर अगर यूँ कामनाओं, आकांक्षाओं को न बढाएं,

तो लगता है कि वक्त से कहीं पीछे चल रहे हैं!

कहीं औरों से पिछड़ न जाएँ, का डर
संतुष्ट नहीं रहने देता !

ऑंखें बंद कर झांक कर देखें अपने वजूद में,

तो दृढ़ बने रहने का संकल्प लेने में हिचक नहीं होती

पर दुनिया की भेड़्चाल देखकर चूर हो जाते हैं

अपने से किये वादे!

अपने ही अंतर्मन की कमजोरी कि

सोच बनती है यदि और लोग सुधरें

तो हम भी सीधे सीधे चलें!

पर क्यों मज़बूरी सहन करनी पड़ती है

सब तरह के रास्तों को अपनाने की?

शायद इसलिए कि

सफल व्यक्ति ही आजकल अच्छा भी माना जाता है

आज मानक सिर्फ मंजिल को पाना ही रह गया है

रास्ता चाहे जैसा भी हो !

…[राकेश]

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अप्रैल 27, 2010

महासंग्राम

बार बार की खिटपिट से अच्छा होता है

एक बार का महासंग्राम

युद्ध के बाद का इतिहास ही बताता है

कौरवों और पाण्डवों का पक्ष

वरना ज्यादातर तो

बलरामों की भीड़ ही हुआ करती है!

…[राकेश]

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अप्रैल 26, 2010

अंतरचेतना

तुम नहीं जानतीं,
इन मूल्यों की कोई कीमत नहीं है आज,
नैतिकता के सवाल बेमानी हैं अब|

ये जो तुम्हारी प्रेरणा है ना,
अच्छा बनने की,
सच्चा बनने की,
ये सब तो अयोग्यताएं है आज के दौर में|

तुम मुझे भोंदू बनाना चाहती हो?
यदि मैं तुम्हारे द्वारा बताये सब गुण
अपने व्यक्तित्व में समाहित कर लूँ
तो मुझे जाने कहाँ कहाँ असफल न होना पड़ेगा,
तब रोज मुझे तनावों से दो चार होना पड़ेगा।
फिर शायद लोग कटने लगें मुझसे,
यदि मैं चलता पुर्जा न बना
तो वे हँसीं न उड़ाने लगें मेरी।

चालाकी भरे इस समय में
दूसरे की छाती पर
पैर रखकर आगे बढ़ने के युग में
तुम चाहती हो
मैं ईमानदारी की गाँठ बाँध लूँ?

तुम नाहक परेशान न करो मुझे
तुम अपना आदर्शवाद अपने तक ही
सीमित रखकर भीतर ही रहा करो
मुझे बख्श दो मेरी अंतरचेतना|

…[राकेश]

अप्रैल 25, 2010

आज के अभिमन्यु

भाग्यशाली लगता है,
आज अर्जुन पुत्र अभिमन्यु,
जिसने चक्रव्यूह भेदने की कला
माता के गर्भ में रहते हुए ही सीख ली थी|

नहीं जानता था वह चक्रव्यूह से बाहर निकलना,
पर तोड़ दुश्मन का घेरा,
घुस तो गया था अन्दर,
वह कपटियों के बिछाए जाल को तहस नहस करने को,
मरा जरुर वह,
परन्तु अपना शौर्य दिखाकर,
दुनिया को अपनी वीरता और क्षमता का प्रदर्शन दिखाकर|

आज का युवा तो
भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, सिफारिश, परोक्ष अपरोक्ष आरक्षण,
निरंतर कम होते रोजगार के अवसरों
से बने चक्रव्यूह में घुस भी नहीं पाता
उसे तोड़ना तो बहुत दूर की कौड़ी है|

इन युवाओं की फौज पर इतराने वाले देश को
आँखें खोलनी होंगीं
वरना
कुंठित होकर कब युवा
अपनी सारी योग्याताओं की समाधि बना डालेगा
पता नहीं चलेगा|

फिर इन समाधियों पर विराजमान
इन चूक चुके थके हुए युवाओं से किसी
निर्माण की आशा करना स्वप्निल ही होगा,
भ्रांतियों में जीते इन तथाकथित युवाओं से
किसी क्रांति की अपेक्षा करना
इनका मजाक उड़ाने जैसा होगा|

क्योंकि इनकी शांति भी तब
मरघट की शांति होगी
वह शांति
रक्तहीन हो चुके शरीरों की अकर्मण्यता की छाप से भरी होगी|
देश, समाज की जिम्मेदारियों को संभालने की बात कहना
तब इन्हें व्यर्थ में परेशान करने जैसा होगा|

तब ऐसे में अपने ही कन्धों पर अपना शव ढ़ोते
इन बेचारों के सामने
सिर्फ धरा पर अपना अभिनय पूरा करने का
सीमित अवसर ही हाथ में होगा|

अभी तो मौका है, समय है
जब आज के अभिमन्यु सरीखे युवाओं को अर्जुन
बनाने का प्रयास किया जा सकता है!

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

उजाले की ओर

(व्यथा एक ऐसे व्यक्ति की जो दंगों के हिसक माहौल से आया है)

दिन के उजाले की ही करना बातें मुझसे
मैं रातों के अंधेरों से लड़ता हूँ आया !

दे सको तो देना शांति और शीतलता
मैं आक्रोश की ज्वाला में तपकर हूँ आया !

देखना मुझे प्यार की ही निगाहों से
मैं नफरत की आंधी से त्रस्त होकर हूँ आया !

देना दोस्ती के फूल ही मुझे हमेशा
मैं दुश्मनी के काँटों से घायल होकर हूँ आया !

बातें करना मुझसे जिंदगी के सफर की
मैं मौत के सागर से तैर कर हूँ आया !

करना दुआ फूलों की सुगंध की मेरे लिए
मैं लाशों की बू से परेशान होकर हूँ आया !

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

समर्पण

भ्रमों, भ्रमजालों से घिरा जीवन,
कैसे तो सत्य को पहचानूँ?

जब मिथ्या है सब जगत में,
क्यों कर कोशिश करूं
सत्य से साक्षात्कार की?

कैसे तो जानूँ
किस राह जाना है मुझे?
जबकि सारी राहें
मौत ही की ओर जाती हैं !
मौत ही है जो निर्विवाद रूप से सत्य प्रतीत होती है !

हे प्रभू एक तुम हो जो न सत्य प्रतीत होते हो
न असत्य
पर तुम्हारे समक्ष समर्पण करने से शान्ति जरुर मिलती है|

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

पवित्रता

मैं आवरणहीन हूँ
पूर्णतया नग्न
बड़ी मुश्किल से आज चोला उतार फेंका है दुनियादारी का
हर तरह का मुखौटा हटा दिया है चेहरे से|

ये दुनिया किसी को आवरणहीन नहीं देख सकती!

हे प्रकृति !

मुझे शीघ्रता से
मेरी स्वाभाविक व प्राकृतिक परतों से ढक दो
वर्ना दुनिया मुझे फिर से
भेढ़चाल के वस्त्र पहनने को विवश कर देगी
लोभ, महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या और प्रतिद्वन्द्विता के
खोल मुझे पहना दिए जायेंगे
और प्रेम, मानवता और श्रद्धा आदि
फिर से अन्दर दबे छुपे रह जायेंगे!

…[राकेश]

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अप्रैल 22, 2010

स्वप्न

अक्सर मन स्वप्न बुनने लगता है

उन ढ़ेर से सपनों में से

कुछ पूरे हो जाते हैं

कुछ बीच में ही टूट जाते हैं

पर हर पुराने सपने के बाद

नया सपना देखने लगता है मन

क्योंकि स्वप्न न हों तो

जीवन रसहीन हो जाये !

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

आशा

मैं निराशा को स्वीकार नहीं कर सकता,

चिंता को अंगीकार नहीं कर सकता,

क्योंकि चिंता चिता के समान होती है

और मैं चिंता करके

खुद को पल पल मार नहीं सकता

क्योंकि वह भी आत्महत्या का ही एक रूप है

आत्मा परमात्मा का अंश है अगर,

तो कैसे परमात्मा को कष्ट दूँ?

…[राकेश]

अप्रैल 22, 2010

क्षितिज की ओर

उदासीनता के गहनतम क्षणों
से उबरकर
मन ने पाला है आज
कुछ रचनात्मक करने के विचार को|

क्योंकि उदासी की,
निराशा की अपनी सीमाएं हैं|

जबकि सृजन की,
आशा की सीमाएं असीम हैं|

वे तो क्षितिज की भाँति हैं
जो दूर से मिलते तो प्रतीत होते हैं
पर कभी मिलते नहीं,
कभी मिलेंगे नहीं|

…[राकेश]

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