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नवम्बर 18, 2013

ओमप्रकाश वाल्मीकि : गंगा में नहीं नहाऊँगा (श्रद्धांजलि)

balmikiहिंदी साहित्य में दलित जीवन के वर्णन को प्रमुखता से जगह दिलवाने वाले, जूठन जैसी अति-प्रसिद्द आत्मकथा के लेखक, वर्तमान हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर  ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की  स्मृति में कर्मकांड पर प्रहार करती उनकी एक सशक्तत कविता

जब भी चाहा छूना
मंदिर के गर्भ-गृह में
किसी पत्थर को
या उकेरे गये भित्ति-चित्रों को

हर बार कसमसाया हथौडे़ का एहसास
हथेली में
जाग उठी उंगलियों के उद्गम पर उभरी गांठें

जब भी नहाने गये गंगा
हर की पौड़ी
हर बार लगा जैसे लगा रहे हैं डुबकी
बरसाती नाले में
जहाँ तेज धारा के नीचे
रेत नहीं
रपटीले पत्थर हैं
जो पाँव टिकने नहीं देते

मुश्किल होता हैjoothan
टिके रहना धारा के विरुद्ध
जैसे खड़े रहना दहकते अंगारों पर

पाँव तले आ जाती हैं
मुर्दों की हडि्डयाँ
जो बिखरी पड़ी हैं पत्थरों के इर्द-गिर्द
गहरे तल में

ये हडि्डयां जो लड़ी थीं कभी
हवा और भाषा से
संस्कारों और व्यवहारों से
और, फिर एक दिन बहा दी गयी गंगा में
पंडे की अस्पष्ट बुदबुदाहट के साथ
(कुछ लोग इस बुदबुदाहट को संस्कृत कहते हैं)

ये अस्थियाँ धारा के नीचे लेटे-लेटे
सहलाती हैं तलवों को
खौफनाक तरीके से

इसलिये तय कर लिया है मैंने
नहीं नहाऊंगा ऐसी किसी गंगा में
जहां पंडे की गिद्ध-नजरें गड़ी हों
अस्थियों के बीच रखे सिक्कों
और दक्षिणा के रुपयों पर
विसर्जन से पहले ही झपट्टा मारने के लिए बाज की तरह !

(ओमप्रकाश वाल्मीकि)

नीचे दिए वीडियो लिंक्स में वाल्मीकि जी को कविता पाठ करते देखा-सुना जा सकता है|
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मई 21, 2011

वर्दी वाले गुंडे

रेल से नीचे धकेल दिये गये लोगों के समाचार गाहे-बेगाहे अखबारों की सुर्खियां बनने लगे हैं। एक महिला खिलाड़ी को रेल से नीचे फेंक दिये जाने की खबर छपी तो इस खबर को पढ़कर सुमीत को बरसों पहले की अपनी एक रेल यात्रा की याद हो आयी।
* * *

उस समय सुमीत को किसी भी यात्रा से पहले एक किस्म की बैचेनी होने लगती थी। बस की यात्रा तक तो गनीमत थी कि एक बस निकल जाये तो दूसरी मिल जायेगी पर रेल की यात्रा तो उसकी नींद उड़ा देती थी। घर से समय से निकलने के बावजूद उसे हमेशा संदेह लगा रहता कि वह रेल पकड़ भी पायेगा या नहीं। कई दिनों की छुट्टी अपने दोस्त के यहाँ व्यतीत करने के बाद उसे नौकरी पर वापिस जाना था और वह कोई रिस्क लेना नहीं चाहता था। रेल उसे पकड़नी थी सहारनपुर से तकरीबन सौ किमी दूर देहरादून जिले में एक छोटी सी जगह पर। इस भय से कि कहीं रेल न छूट जाये सुमीत ने अपनी यात्रा के नियत दिन से एक दिन पहले ही बस से सहारनपुर जाकर रिहर्सल कर ली। वह सही वक्त्त पर सहारनपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गया। उसके पहुँचने के बाद ही एक्स्प्रैस रेल वहाँ आयी। रेल को विदा करके ही वह वापिस लौटा। उसे थोड़ी राहत महसूस हुयी।

अगले दिन सही वक्क्त पर सुमीत सहारनपुर पहुँच गया और रेलवे स्टेशन पर पूछताछ वाली खिड़की से यह पूछ कर कि उसकी वाली एक्सप्रैस रेल किस प्लेटफार्म पर आयेगी वह नियत प्लेटफार्म पर जाकर खड़ा हो गया। रिज़र्वेशन उसके पास था ही।

प्लेटफार्म पर अच्छी खासी भीड़ थी। एक कुली से उसने पूछ लिया कि S5 बोगी कहाँ आकर रुकेगी।

कुली ने उसे बता दिया और साथ ही पूछा कि वह रेल में सामान चढ़ा दे क्या? यूँ तो सुमीत के पास एक सूट्केस और एक बैग ही था और वह खुद आराम से रेल में सामान सहित चढ़ सकता था पर शायद कुली से बोगी के बारे में पूछने के कारण या किसी अन्य कारण से उसने उसे हाँ कह दिया।

रेल एक घंटे की देरी से आयी। रेल में मौजूद लोगों की भीड़ देखकर तो सुमीत के हाथ-पाँव फूल गये। लोग दरवाजे तक खड़े थे। सहारनपुर उतरने वालों और वहाँ से रेल में चढ़ने वालों के बीच दरवाजे पर खड़े लोग दीवार बने खड़े थे। हर तरफ चिल्ल-पौं मची हुयी थी।

सुमीत को लगा कि ऐसे कैसे वह चढ़ पायेगा रेल में?

कुली ने सुमीत से कहा,” बाबू जी, भीड़ बहुत है आप अभी बीस रुपया दे दो, आपको अंदर चढ़ा देंगे। मेरा अंदर जाकर वापिस आना मुश्किल हो जायेगा। आप यहीं पैसे दे दो। आपको अंदर तो चढ़ा ही दूँगा। रास्ते में मौका देख आप अपनी सीट पर पहुँच जाना”।

सुमीत ने कुली को बीस रुपये दे दिये। उसे लग नहीं रहा था कि दरवाजे पर खड़ी भीड़ के अभेद लगते किले को भेदकर वह बोगी में अंदर प्रवेश कर पायेगा।

कुली ने सूटकेस और बैग उठाया और बोगी के दरवाजे पर खड़े लोगों को हटाने का प्रयास करते हुये सूटकेस अंदर उनके सिरों के ऊपर से अंदर फेक दिया। अंदर से गालियाँ सुनायी दीं, लोग इधर उधर हुये और समान के बोगी के फर्श पर पड़ जाने का अनुमान कुली को लग गया। अब उसने सुमीत को उसका बैग थमाया और उसे पीछे से इस तरह धकेलना शुरु किया जैसे किसी गाड़ी में धक्का लगा रहा हो। लोगों को अपनी बोली से चेतावनी देते हुये उसने जबरन सुमीत को बोगी के अंदर धकेल ही दिया।

सुमीत भीड़ में मूर्ति बना खड़ा हो गया। न पैर हिलते थे और न ही हाथ इधर उधर या ऊपर नीचे करने की ही गुंजाइश उसे दिखायी पड़ती थी। बैग उसके कंधे पर इस तरह से रखा हुआ था जैसे कैलेंडरों आदि में हनुमान जी को गदा लिये दिखाया जाता है। इस जड़ता में अपनी आरक्षित सीट तक जाने की बात सोचना भी दुस्साहस से बड़ी बात थी। उसका तो एक पैर भी फर्श पर पूरी तरह टिका हुआ नहीं था। भीड़ के कारण गरमी भी बहुत लग रही थी और साँस लेने के लिये हवा भी कम और कमजोर मालूम पड़ती थी। सुमीत समेत लोग रेल के चलने की दुआ कर रहे थे। रेल चलने से कम से कम हवा तो आयेगी।

रेल चली। जो बैग उसे पहले हल्का और बाद में ठीके-ठाक वजन वाला लग रहा था अब वही उसे  बेहद भारी लगने लगा था। हाथ और कंधें में दर्द की तरफ ध्यान जाता तो बार बार उसकी इच्छा होती कि बैग को उछालकर चलती रेल से नीचे फेंक दे। ऐसे ही कष्ट सहते-सहते अम्बाला कैंट तक की यात्रा पूरी हुयी। उसे अपनी सहन क्षमता पर कुछ गर्व भी हुआ। आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता से भरे हुये जैसे ही उसने पाया कि दो-तीन यात्रियों को अम्बाला कैंट स्टेशन पर उतरना है, उसने और दरवाजे पर खड़े लोगों ने उन यात्रियों को ऐसा स्वागत करते हुये नीचे उतारा जैसे बारातियों का स्वागत कर रहे हों। उन यात्रियों के उतरने के उपक्रम में सुमीत को जगह मिल गयी अपने कंधे पर सवार बैग को नीचे फर्श पर गिरा देने की।

बैग गिराते ही वह सूटकेस और बैग को लगभग भूल कर प्रभावित कंधे को गोल गोल घुमाने लगा। सामान को भूल जाने में ही राहत मिलनी थी हाल फिलहाल तो।

तभी रेलवे पुलिस के सिपाहियों के साथ टी.टी.ई महोदय बोगी के दरवाजे पर अवतरित हुये। वर्दीधारी सिपाहियों की अकड़ और लाठियों के तांडव ने दरवाजे पर जमे खड़े यात्रियों को गतिमान बनाया और गुंजाइश न दीखने वाली जगह में भी टी.टी.ई और चार सिपाही अंदर घुस आये।

सिपाहियों की लाठियों के सहारे बोगी में लोगों की भीड़ के चक्रव्यूह को भेदते हुये टी.टी.ई आगे बढ़ा तो सुमीत भी अपनी सीट तक पहुँचने के लिये किसी तरह वहाँ खड़े लोगों से सहायता की गुज़ारिश करके अपना सूटकेस और बैग उठाये हुये इस सरकारी कारवां की पूँछ पकड़कर खिसक-खिसक कर आगे बढ़ने लगा। किसी तरह अपनी सीट पर पहुँचा तो पाया कि वहाँ बगैर आरक्षण के एक परिवार धरना दिये हुये था। परिवार में बच्चों और महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। वे लोग भी हर तरफ खड़ी भीड़ में किसी तरह से सीटों पर जमे हुये थे। नैतिकता जोर मारने लगी और सुमीत का साहस नहीं हुआ कि उस परिवार से कहता कि वे लोग उसकी सीट खाली कर दें। उसने हालात से समझौता करते हुये अपने बैठने के लिये कोने में ज़रा सी जगह देने की गुज़ारिश की।

बैठकर शरीर को कुछ राहत मिली तो इधर उधर खड़े लोगों की भीड़ से पता चला कि एक राजनीतिक दल की रैली थी दिल्ली में और पंजाब लौटने वाले लोगों ने रेल की कई जनरल बोगियों के साथ-साथ आरक्षित बोगियों पर भी कब्जा कर लिया और मजबूरन लोगों को जिस बोगी में जगह मिली उसी में घुस जाना पड़ा।

कुछ ही देर बाद सिपाही लौटे। जिनके पास आरक्षण  नहीं था उनसे वे इस आरक्षित बोगी में यात्रा करने की अनुमति के बदले उनकी आगे तय की जाने वाली दूरी के अनुसार रुपये ले रहे थे। सुमीत की आरक्षित सीट पर बैठे परिवार को जम्मू जाना था अतः सिपाहियों ने प्रति सदस्य पचास रुपयों की मांग की। परिवार के लिये शायद मुश्किल था इतने रुपये देना। उन्होने सिपाहियों से प्रार्थना की तो सिपाहियों ने उन्हे नीचे उतारने की चेतावनी दी। परिवार की मुश्किल देख कर सुमीत ने सिपाहियों से कहा कि वे उसकी आरक्षित सीट पर यात्रा कर रहे हैं, इतनी भीड़ में कहाँ जायेंगे महिलायें और बच्चे। उन्हे परेशान न किया जाये।

एक सिपाही गुर्रा कर बोला,” बाबू तू जुर्माना देगा क्या। बुलाऊँ टी.टी.ई को, अभी चालान काटेगा, अपनी सीट पर बिना आरक्षण वाले लोगों को साथ ले जाने के लिये। और इन सबको ले जावेंगें जेल”।

परिवार बेचारा क्या करता? उन्होने सिपाहियों को रुपये दे दिये।

लोगों को उस बोगी में बने रहने के लिये पुलिस फोर्स की स्वीकृति खरीदनी पड़ी। जिन बोगियों पर राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं ने कब्जा कर लिया था वहाँ तो सिपाही घुस भी न पाये होंगे पर बाकी बोगियों से उन्होने हजारों के वारे न्यारे कर लिये होंगे।

सुमीत सोच रहा था कि अगर चोर डाकुओं को वर्दी पहना दी जाये तो शायद वे भी इस कुशलता से उगाही का काम न कर पायेंगे जैसा कि कानून के इन तथाकथित रखवालों ने अपने शौर्य से कर दिखाया है।

बोगी में जिस किसी ने रुपये देने में असमर्थता दिखायी या नियमों की दुहाई देने का दुस्साहस किया तो उसे सिपाहियों ने थप्पड़ों और घूँसों का प्रसाद देकर टॉयलेट के पास खड़ा होने के लिये भेज दिया। अगले स्टेशन पर उनके उतारने की बात सुनायी पड़ती रही।

रेल चली तो कुछ समय बाद टी.टी.ई टिकट चैक करता हुआ आया। सीट के आरक्षण के लिये लोग रुपये हाथ में लेकर उसे घेरे हुये थे। और वह भी किसी-किसी को उपकृत कर रहा था। शायद आदमी के हाथ की हरियाली देखकर वह निर्णय ले रहा था।

सिपाहियों के घमासान मचाने से लोग इधर उधर व्यवस्थित खड़े हो गये थे और गैलरी में इधर-उधर देखने लायक जगह दिखायी पड़ती थी।  टी.टी.ई टिकट चैक करके अपने लिये निर्धारित सीट पर पहुँचा तो पाया कि उससे पहले वहाँ पहुँच चुके सिपाहियों ने उसकी सीट का सौदा भी दो यात्रियों से कर लिया था। उसकी सीट पर जमे बैठे यात्रियों ने उठने से मना कर दिया। टी.टी.ई ने सिपाहियों से उन यात्रियों से अपनी सीट खाली करवाने की बात कही।

एक सिपाही ने खैनी मलते हुये कहा,” अरे अम्बाले में तो तू कह रिया था कि किसी तरह से बोगी में पहुँचा दो, अब कह रिया है कि सीट दिलवा दो, थोड़ी देर में कहेगा कि हिसाब भी समझा दो। हमारी तरह चुपचाप यहाँ टायलेट के पास खड़ा रह। बीड़ी-सिगरेट पी और ऐश कर। नहीं तो नीचे उतर जाइयो अगले स्टेशन पर। दूसरी बोगी में देख लियो, कहीं सीट मिल जावे बैठने की तो। हम भी तेरी तरह ड्यूटी पर हैं”।

सिपाही से दो टूक जवाब पाकर टी.टी.ई का चेहरा गुस्से और विवशता से अजीब सा हो गया।

पर कर भी क्या सकता था। अपमान का घूँट पीकर रह गया। सिपाहियों से चलती रेल में पंगा लेना खतरनाक था। इतनी भीड़ में कौन, कब, कैसे टपक गया चलती रेल से, बाद में कौन जान सकता है?

सरकारी अमले की आपसी मुठभेड़ को देखकर, सुमीत को अन्य यात्रियों, जो सिपाहियों और टी.टी.ई की धन-उगाही कार्यवाही के शिकार बने थे, की तरफ से भी कुंठा में कुछ राहत महसूस हुयी।

एक सिपाही टी.टी.ई से कहता सुनायी दिया,”अरे बाबू, ये रास्ता खोल दे दोनों बोगियों के बीच वाला। तू यहीं खड़ा रह आराम से, हमारा आदमी जावेगा दूसरी बोगी में और वहाँ से बिना आरक्षण वाले यात्रियों को यहाँ भेजेगा। तू भी कुछ कमा-धमा ले और हमें भी जेब भारी कर लेने दे। रोज़ रोज़ तो ऐसे मौके आते नहीं।”

सुमीत देख नहीं पाया कि टी.टी.ई पर इस प्रस्ताव की प्रतिक्रिया क्या हुयी।

कुछ समय बाद टॉयलेट की तरफ से गाली-गलौच और मार-पीट का शोर आने लगा। ऐसा लगा जैसे सिपाहियों का यात्रियों से झगड़ा हो रहा हो। या शायद यात्री ही आपस में लड़ रहे हों और सिपाही दोनों गुटों की ठुकाई में व्यस्त हों।

इस शोर-गुल में कई तरह की आवाजों के मध्य ऐसी पुकारें भी सुनायी दीं…अरे गिर गये… अरे कूद गये…अरे धकेल दिया।

बहुत देर तक शोर होता रहा।

अगले दिन सुमीत को अखबार में ही एक छोटी सी खबर पढ़ने को मिली कि जिस एक्स्प्रैस रेल में वह यात्रा कर रहा था उसमें बिना टिकट यात्रा करने वाले दो युवक टी.टी.ई से झगड़ा करने लगे और सुरक्षा बल के सिपाहियों के आने पर अफरातफरी में चलती रेल से बाहर कूद गये और अपनी जान गँवा बैठे।
* * *

इंसानी जान की कोई कीमत है नहीं इस देश में…- ठंडी सांस छोड़कर अपने आप से कहते हुये सुमीत ने अखबार सामने मेज पर रख दिया।

…[राकेश]

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