Archive for अक्टूबर, 2010

अक्टूबर 29, 2010

क्या खोया क्या पाया…(ग़ज़ल)

 जुनून-ए-इश्क की यह भी इंतहा देखी
ज़हर दिया किसी ने ज़हर खा लिया।

लाखों के खिलोनों से ना हँसा कोई
किसी को झूंठे बर्तन ने बहला लिया।

गरीब की बेटी जलाई गई सरेआम
भूख ने एक धोखा फिर खा लिया।

मुंडेरों की याद किसी दिन रुलाएगी
खेतों पर तो तूने शहर बसा लिया।

आदमियों की बस्ती में लगी आग
शैतानो ने जब भी नाम-ए-खुदा लिया।

बांस जो थे अकड़े और तनते गये
फल-लदे दरख्तों ने सर झुका लिया।

अँधेरा मांग रहा था रौशनी का सूद
तंग आके किसी ने घर जला लिया।

कुष्ट-आश्रम गया था मिला है सकून
कुछ खोया था बहुत कुछ पा लिया।

शीशा-बदनों को बिखरा हुआ देख कर
शहर ने दिल को पत्थर बना लिया।

कहा होगा कुछ आँखों की नमी ने
मैंने कब तेरा नाम ओ बेवफा लिया।

तुम कहो अब कहाँ जाओगे “आलम
साथियों ने तो घरों का रास्ता लिया।

(रफत आलम)

Advertisements
अक्टूबर 29, 2010

गुल्लू बाबू और स्विस बैंक में भारत का काला धन

गुल्लू बाबू अभी चौदह साल के हैं। उम्र की यह दहलीज बड़ी रोचक स्थितियाँ रचती है। बचपन तो चला जाता है इस उम्र के आने तक पर अभी किशोरवस्था जवानी की तरफ पूरी तरह से जा नहीं पाती और किशोर हार्मोंस की उठापठक के बीच जाने अन्जाने अहसासों से रुबरु होने लगते हैं। कुछ लड़कों की आवाज भर्राने लगती है तो वे थोड़े चुप हो जाते हैं और कुछ आवाज के इस परिवर्तन से या तो समझौता करके या लड़ाई करके हद दर्जे के लफ्फाज हो जाते हैं। गुल्लू बाबू दूसरी श्रेणी में आते हैं। दो-चार उनके यार दोस्त भी हैं ऐसे ही और ये लोग जहाँ भी इकट्ठे होते हैं वहीं मेले जैसा शोर-शराबा और माहौल रच देते हैं। इंटरनेट की कृपा से दुनिया भर के विषयों की जानकारी इन महानुभावों को हो गयी है और सार्थक या अनर्गल, किसी भी तरह की बहस में घिरे हुये गुल्लू बाबू और उनके गैंग को पाया जा सकता है। कभी कभी उनकी बहस खासा मनोरंजन भी उत्पन्न कर देती है।

बीते रविवार को गुल्लू एंड पार्टी नयी प्रदर्शित हुयी फिल्म Knock Out देख कर आये थे और उनकी बहस केन्द्रित हो गयी थी कथित रुप से स्विस बैंकों में रखे भारत के काले धन पर।

बहस तो उनकी लम्बी थी पर कुछ मुख्य और रोचक बातों का जिक्र किया जा सकता है। किशोर दिमाग बड़े रोचक तरीके से सोच सकते हैं और बहुत दफा अनुभवी और पके हुये दिमागों के लिये अलग ढ़ंग से सोच पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हो जाता है।

सबसे बड़ी बात है कि भारत की किशोर पीढ़ी के बहुत सारे नुमांइदे कितने ही गम्भीर मुद्दों पर बहस करने को तैयार दिखते हैं। उनके पास सूचनाओं का भंडार है और वे आत्मविश्वास से लबरेज़ दिखते हैं।

उनकी बहस के कुछ अंश…

अरे इतना हल्ला होता रहता है भारत के काले धन और स्विस बैंको का और फिल्म ने भी दिखाया कैसे एक नेता हजारों करोड़ रुपये स्विस बैंक में जमा करता है। पर ये बात समझ में नहीं आयी कि स्विस बैंक किस करेंसी में धन जमा करके रखते हैं अपने लॉकर्स में?

क्या फर्क पड़ता है किसी भी करेंसी में रखें?

फर्क कैसे नहीं पड़ता, कोई बताओ, पौंड, डॉलर, यूरो या स्विस फ्रेंक, किस मुद्रा में पैसा रखा जाता है वहाँ?

चलो मान लो कि अमेरिकन डॉलर के रुप में रखा जाता है, पर इस बात से क्या फर्क पड़ता है?

ओ.के. मान लिया अमेरिकन डॉलर… पर अब सवाल उठता है, जैसा कि कहा जा रहा है कि भारत का ही लाखों करोड़ रुपया वहाँ जमा है। और भी देश हैं जिनका काला धन वहाँ जमा है तो क्या अमेरिका इतने विशाल धन के लिये अलग से करेंसी नोटों की व्यवस्था करता है?

अरे ये बात तो सही है- कौन सा देश इतने सारे करेंसी नोट अलग से छापता होगा स्विस बैंक के लिये?

ये भी तो हो सकता है कि धन वहाँ सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात आदि वैकल्पिक मुद्राओं के रुप में रखा जाता है।

हो सकता है पर इतने सारे लोग स्विस बैंक और काले धन के बारे में सालों से चर्चा कर रहे हैं और हमें यह भी पढ़ने को नहीं मिला कि कौन सी करेंसी वहाँ चलती है?

एक और मुद्दा है कि क्या स्विस बैंक इस धन पर ब्याज भी देते हैं जैसे कि अन्य बैंक या वे अपने यहाँ धन रखने के लिये फीस लेते हैं?

ब्याज कहाँ से देंगे, रखने के बदले पैसा लेते होंगे आखिरकार तभी बैंक इतने अमीर हैं। करोड़ों डॉलर्स की जमापूँजी पर ब्याज देने के लिये तो उन्हे बहुत सारा धन कमाना भी पड़ेगा, कहाँ से लायेंगे इतना पैसा और उनकी गतिविधियाँ तो गुप्त रहती हैं, ओपन मार्केट में तो क्या ही लगाते होंगे पैसा?

कहीं पढ़ा था कि अमेरिका 9/11 के बाद डर गया था कि कहीं ओसामा लादेन स्विस बैंकों जैसे गुप्त खाता खोलने वाले बैंको में धन जमा न कर ले।

मेरी समझ में नहीं आता कि ओसामा चाहे अरबों डॉलर्स जमा कर ले पर हथियार तो वह कहीं से खरीदता ही होगा।

सही बात है, हथियार ओसामा लादेन जैसे आतंकवादी खुद तो बना नहीं सकते। अमेरिका, रुस, फ्रांस, ब्रिटेन, इज़रायल, चीन, कोरिया, और जापान, जैसे बड़े और विकसित देश और पाकिस्तान जैसे लड़ाकू देश हथियार बेचने का धंधा दुनिया में चलाना बंद कर दें तो ओसामा का सारा धन रखा रह जायेगा।

तब तो ओसामा जैसे किसी देश में उस धन से कैसिनो या पब चलाकर जीविका कमाने के लिये विवश हो जायेंगे और चुपचाप जीवन जियेंगे। हथियार तो उन्हे यही शक्तिशाली देश ही देते हैं।

हाँ ऐसा पढ़ा था कि अमेरिका स्विस बैंकों पर प्रैशर डाल रहा है और वहाँ जमा अमेरिकी धन पर कब्जा करने के मूड में है।

पर खाली धन से तो आतंकवाद फैल नहीं सकता। खाली धन तो किसी भी काम का नहीं होता। अगर दुनिया में विनाश फैलाने वाले हथियार ही नहीं होंगे तो आतंकवादी क्या कर लेंगे। आमने सामने की कुश्ती में तो हरेक देश की जनता ही पीट पीट कर भुर्ता बना देगी इन आतंकवादियों का।

सही बात है अगर अमेरिका जैसे देश ठान लें तो आतंकवाद का नामोनिशान न रहे दुनिया में।

हथियार की बिक्री बंद कर दो जैसे कि कोई भी देश परमाणु हथियार नहीं खरीद सकता या बना नहीं सकता ऐसे ही सारे मारक हथियारों पर यू.एन से रोक लगवा दो। जो भी देश इस बात का उल्लंघन करे उसका पूरी तरह से बॉयकाट कर दे सारे देश। एक महीने में ठीक हो जायेगा बदमाशी करने वाला देश। जब कोई भी देश न कुछ खरीदेगा कोई भी चीज उस देश से न ही उसे कुछ बेचेगा तो वहाँ की जनता अपने आप अपनी सरकार पर दबाव डालेगी।

सही बात है, सब दिखावा होता है वर्ल्ड पॉलिटिक्स में। सब नाटकबाजी है।

और क्या, अगर यू.एन, अमेरिका, भारत और तमाम बड़े देश चाहते तो चीन, तिब्बत को आजद न कर देता। दुनिया भर की मैनूफैक्चरिंग इंडस्ट्री चीन में लगी हुयी हैं और अगर सारे प्रभावशाली देश चीन पर प्रैशर डाल देते या हर देश की जनता ही ऐसी घोषणा कर देती कि न तो चीनी सामान खरीदेंगे न ही किसी चीनी को कुछ बेचेंगे तो एक महीने में चीन की जनता अपने नेताओं और सेना वालों को पीट पीट कर विवश कर देती तिब्बत को आजाद करने के लिये।

सही है, इतना ज्यादा व्यापार देशों का आपस में होता है कि अगर किसी सही बात के लिये सब शक्तिशाली देश ठान लें तो उसे पूरा करने में आज के दौर में बहुत समय नहीं लग सकता।

सब ड्रामा चलता है। किसी को भी तिब्बत की आजादी से कुछ मतलब है नहीं। हम भारतीय ही कौन सा चीन को नाराज करना चाहते हैं। चीन के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं हमारे नेता, सेना वाले और उधोगपति लोग। अगर भारत की जनता ही ठान ले कि चीनी सामान का बहिष्कार करेगी तो भी बड़ा फर्क पड़ेगा चीन की दादागिरी पर।

जनता तो सस्ते पर जाती है और चीनी सामान सबसे सस्ता है। कैसे बहिष्कार करेगी भारत की जनता चीनी सामान का?

चलो हम तुम ही बहिष्कार कर दें चीनी सामान का।

तिब्बत छोड़ो, हमारे तुम्हारे चार लोगों के करने से क्या होगा? अगर जाकर देखोगे तो प्रधानमंत्री के दफ्तर में भी मेड इन चाइना सील वाला सामान लगा हुया होगा।

आज चार हैं बाद में बढ़ भी जायेंगे। शुरुआत तो करनी चाहिये।

चलो फिर आज से ही चीनी सामान पर पाबंदी। स्कूल में कल से ही प्रचार शुरु।

स्विस बैंक से कहाँ भटक गये तुम लोग? स्विस बैंक में जमा कालाधन भारत के लिये बहुत महत्वपूर्ण विषय है।

कहते हैं कि भारत का इतना धन वहाँ जमा है कि अगर सारा वापस आ जाये तो भारत का सारा विदेशी कर्ज चुकता हो जाये और तब भी बहुत सारा धन बचा रहेगा।

गजब के करप्ट रहे होंगे भारत के नेता और बाकी दलाल किस्म के लोग जिन्होने वहाँ लाखों करोड़ रुपया जमा करा दिया।

मैं ने भी पढ़ा था कहीं इंटरनेट पर कि काला धन वापस लाने से भारत ऊर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर हो जायेगा।

अरे कैसी वाहियात बात कर रहे हो, धन लाने से कैसे भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जायेगा?

ये भी न ऐसी ऐसी दूर की कौड़ी सामने लाता है। अरे भाई, क्या खाली धन भारत में ऊर्जा के लिये वैज्ञानिक शोध को टॉप गियर में डाल देगा। वैज्ञानिक रातों रात कुछ खोज देंगे क्या?

मेरे भइया एक दिन बता रहे थे कि ज्यादातर तो बाहर की रिसर्च को देख कर ही भारत में रिसर्च होती है। 95% लोगों की कोशिश यही होती है कि किसी तरह से रिसर्च पेपर छप जाये किसी बाहर से छपने वाले जर्नल में। अब उनकी रिसर्च देश के काम आनी है या नहीं इस बात से उन्हे कोई मतलब नहीं होता। सी.वी पर पेपर्स की संख्या बढ़ाते रहते हैं। भइया के एक दोस्त तो कह रहे थे कि बड़े नामी इंस्टीट्यूशन्स के भी यही हाल हैं।

सही बात है, इतने तीरंदाज होते भारत के वैज्ञानिक तो आज देश में न पोल्यूशन इतना न होता और न ही ऊर्जा के क्षेत्र में देश इतना कमजोर होता। पानी साफ करने तक की टैक्नोलॉजी है नहीं अपने देश के पास। देश के काम आने वाली टैक्निक डेवेलप की होतीं अगर हमारे साइंटिस्टों ने तो आज देश की तस्वीर ही और होती, किसान और गरीब आत्महत्यायें न कर रहे होते।

किसी को पी.आई.एल करनी चाहिये या फिर आर.टी.आई पोलिसी के अंदर जाँच करवानी चाहिये देश की सभी शिक्षण और शोध संस्थानों के पिछले साठ सालों के क्रियाकलापों के सही मूल्यांकन के लिये। तभी दूध का दूध और पानी का पाने हो पायेगा। आखिर जनता का ही पैसा तो है जो खर्च होता है।

तुम लोग फिर भटक गये। स्विस बैंक से वापस मिले धन से विकसित देशों से तकनीक खरीदी जा सकती हैं। कितना इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा जा सकता है, कितना नया खड़ा किया जा सकता है। देश एकदम धनी हो जायेगा।

जितने काम पैसे से हो सकते हैं उतने तो हो जायेंगे पर विकसित होने की मानसिकता तो नहीं आ जायेगी रातोंरात। अगर कोई रॉ-मेटीरियल नहीं है हमारे देश के पास या कोई तकनीक नहीं हैं तब पैसे उसे विकसित तो नहीं कर देंगे। उसके लिये तो क्षमता विकसित करनी पड़ेगी और उसके लिये टाइम, लगन और बुद्धि चाहिये।

सही बात है, सब कुछ सिर्फ पैसे से नहीं हो जायेगा। बुद्धि और देश के प्रति निष्ठा की जरुरत है। पर देश को नियंत्रण करने वाले नेता, इंडस्ट्रियेलिस्ट्स और बड़े लोग जब देश हित में निर्णय लेंगे तभी ऐसा हो सकता है। वे तो देश के रिसोर्सेज के खनन करने का ठेक भी विदेशी कमपनियों को दे रहे हैं। भला कौन सी ऐसी कम्पनी है दुनिया की जो अपना हित छोड़कर भारत का हित देखेगी?

हाँ उन्हे हमारे एनवारयन्मेंट से क्या मतलब, चाहे यहाँ सूखा पड़े या बाढ़ आये, उन्हे तो रॉ-मेटीरियल चाहिये और प्रोफिट चाहिये, वो उन्हे हमारे यहाँ के भ्रष्ट नेता और कर्मचारी दिलवा ही देंगे

उनकी बातों का सिलसिला लम्बा खिंचा पर बहस का बाकी हिस्सा किसी और दिन। क्या पता उससे पहले ही गुल्लू और मित्र लोग किसी अन्य मुद्दे पर इससे भी रोचक बहस छेड़ दें।

अक्टूबर 25, 2010

लिखनी है एक गज़ल … (गज़ल – रफत आलम)

 

दिल का तकाज़ा था तेरे रेशमी बालों पर गज़ल लिखूँ
अहसास मेरा पुकार उठा फटे हालों पर गज़ल लिखूँ

मुखौटे नोच कर बेनकाब कर दूँ सफेदपोशों को आज
तन के उजले और मन के कालों पर गज़ल लिखूँ

जवाब जिनके मजनूं ओ फरहाद अपने साथ ले गये
जुनूं मिल जाये मुझे तो उन सवालों पर गज़ल लिखूँ

किसी की वफ़ा का भरम रखने के लिए चुप हूँ वरना
जी बहुत चाहता है दिल के छालों पर गज़ल लिखूँ

खिलते हुए फूलों की तारीफ तो कौन सी बड़ी बात है
मेरी खवाहिश है कभी मुरझाने वालों पर गज़ल लिखूँ

कमज़ोर की गिज़ा पर टूट पड़ते हैं खूनी पंजों वाले
छिन जाते हैं हाथों से उन निवालों पर गज़ल लिखूँ

कर्म और तकदीर की जंजीरों में उलझी हुई है ज़िदगी
कभी काट सकूं तो इन मकडजालों पर गज़ल लिखूँ.

किताबे जिंदगी के काले वर्क फड़फड़ने लगेआलम
दिल में ख्याल आया था अमालों पर गज़ल लिखूँ

(रफत आलम)

अक्टूबर 21, 2010

लहू का एक रंग यह भी…(कविता-रफत आलम)

लहू
रग- रग से निचुड़ कर
पसीने के तप में सोना बन जाता है
तिजोरी की भूख मिटाता है|

रईसजादे की कार से टकरा कर
क्षत विक्षत जिस्मों का
लहू
फुटपाथ की दहशतज़दा आँखों से
झूठी गवाही दिलाता है
इंसाफ ठगा जाता  है।

लहू
कटे सिरों से उबलता हुआ
मंदिर- मस्जिद के साये तले
शैतानी सुरों में गाता है।

आकाश जड़ हो जाता है
भूखी झोंपडियों के आगे
दवा-दारू या शायद मौत को तरसते
निढाल पड़े अधनंगे बदनों की
खूनी खांसी का बलगम बनकर
लहू
माटी में मिल जाता है
पथरा चली आँखों को सुलाता है।

(रफत आलम)

अक्टूबर 19, 2010

जिंदा हूँ इस तरह के … (कविता- रफत आलम)

कई बार यूँ ही
ज़हन में बनते है संवाद ….

कैसे हो?

तुम्हारे सामने हूँ

क्या हालत बना रखी है?

अच्छा हूँ

फिर पी रखी है?

तुम्हे भुलाने के लिए

क्या भूल गये?

खुद को भूल गया हूँ

पागल हो!

वक्त के गुबार में
वह छिप जाती है
आकाश परे जाकर

और मैं
मैं अब भी जिंदा हूँ|

 

(रफत आलम)

अक्टूबर 17, 2010

विलियम ब्लेक के नाम

Don’t adore flowers of happiness as nectar of sorrow is hidden behind it

(William Blake)

विलियम तुमने क्यों
कमतर माना
खुशी को?

क्या तुम स्वीकार नहीं करना चाहते थे
मानव जीवन में खुशी के क्षणों का महत्व?

इन्ही क्षणों की बदौलत
जीवन के दुखों से लड़ने की शक्त्ति मिलती है

यदि खुशी स्थायी नहीं है तो
गम ही कौन सा सदा रहने वाला भाव है?

गम की घटाओं को घिरते आते देखते रहे
तब तो जी चुके जीवन!

तुम साथ यह भी तो कह सकते थे
कि मत डरो
गम रुपी मकरंद से
क्योंकि
इसका तोड़ है हँसी के पास
खुशी के पास।

एक खुली हँसी माथे से शिकन हटा देती है
रात-दिन के तनावों से तनी नसों में
ऊर्जा का संचार करती है।

कोई कैसे
प्रफुल्लित मन की
मुस्कान को दबा ले
उदास बैठ जाये
मुँह लटका कर
यह सोचकर कि
खुशी के फूलों के पीछे
गम रुपी मकरंद छिपा है?

जब जब जीवन हँसने का
खिलखिलाने का मौका दे
तब तब क्यों न उसका आनंद लिया जाये!

यदि तुम ये कहते कि
खुशी को ही जीवन का सम्पूर्ण भाव न समझो
तो सहमत हुआ जा सकता है।

खुशी भी तो जीवन का एक अंग है
जैसे गम है।

जीवन की सम्पूर्णता तो
इसके सारे भावों को
संतुलित रुप से
जीने में ही है न
किसी एक खास भाव के साथ
बह जाने में तो है नहीं।

… [राकेश]

[William Blake (28 November 1757–12 August 1827)]
चित्र साभार उनके ऊपर बने विकीपीडिया पेज से

अक्टूबर 17, 2010

लड़की – यलगार हो ….(कविता – रफत आलम)

 

लड़की!

गर्भपात की छुरी से बच कर
तू अगर दुनिया में आ सकी

दादी की नाराज़ आँखों से स्वागत होगा तेरा
माँ की लोरी  में बेबसी खड़ी मिलेगी

बाप की पेशानी के बल गहरायेंगे
तेरा बढ़ता कद देख कर

घर के बाहर कदम जो रखा
लानत मलामत सुननी पड़ेगी

गिरवी रहगी तेरी आज़ादी सदा
पीहर हो के पिया के घर
होश खोने की सजा रुसवाई है
मीठे गोश्त के शिकारी
प्यार या जब्र के जाल लिए
तेरी गफलत की टोह में हैं

देख फँस ना जाना
जिंदगी कहीं मौत ना बन जाए

मैंने रोज तुझे
गांव की चौपाल पर संगसार होते देखा है
दरिंदों के पंजों में नुचते लुटते देखा है
सुहागजोड़ा पहने जलते देखा है

ए दुर्गा, मरियम ओ हव्वा की हमजिंस
सहती है ये ज़ुल्म ओ सितम क्यों

उठा सर, अपने होने का एलान कर –
मैं औरत हूँ तुम्हारा आधा हिस्सा
मैं बेटी, बहन और तुम्हारी माँ भी हूँ
आदमजाद!
मुझे अदब से सलाम करो।

 

(रफत आलम)

अक्टूबर 16, 2010

गरीबी में पतित होता जीवन …(कविता – रफत आलम)

भूख और पसीने के बीच
गहरा है रिश्ता।

मजदूर
फावडा, कुदाल और मशीन पर झुका हुआ
तने बाजू , खिंची हुई नसें
पिचके गाल तम्बाकू भरे
बहता हुआ पसीना
सारे दिन लगातार।

सरे शाम बदन की थकन
दारू के अड्डे से बहकती हुई
खाली जेब लौटती है।

झोंपड़ी की नन्ही भूखी आवाजें
आधा अधूरा चुग दुबक गयी हैं।

रात खाने पर होती है लड़ाई
कुटती है एक खाँसती औरत।

(रफत आलम)

अक्टूबर 13, 2010

बरसों की साध …(कविता- कृष्ण बिहारी)

 

बरसों बाद दिखी ज्ञानवती
ज्ञान… अरे वही, ज्ञानवती
जिसे सब ज्ञानिया कहते थे,
मैं गया था गाँव
वह आई थी मायके
मेरे गाँव से दो ही परग पर तो
उसका मायका है!

उसके बचपन का घर
उसका अपना गाँव,
जहाँ गुजरा था हमारा बचपन
मैं चला आया था शहर
वह रह गयी थी वहीं
हाँ, उसकी शादी भी तो
न जाने कब हो गयी थी
मगर इससे क्या फर्क पड़ता है
जवानी के आने में?

कभी चाहता था मैं उसे
इसलिये नहीं कि
विवाह कर लेता उससे
वह प्रजा थी हमारी
और समझता था मैं
अपना हक उस पर
उसने नहीं जताया कभी हक
इज़हार नहीं किया कभी
अपने प्यार का
मगर देखती थी मुझे
हमेशा चोर-दृष्टि से…
प्यार से,
ऐसा हमेशा सोचता था मैं
बस, इससे ज्यादा नहीं
उन दिनों
जब कभी दिखती थी वह मायके में।

इस बार बरसों बाद जब मैं उसके गाँव गया
छोटे नाना की बारात के लिये
जाज़िम और गलैचा लाने तो
मिलने पर पूछ ही लिया उसने-
कभी आई थी
हमारी याद?

क्या बोलता मैं उत्तर में
झूठ या कि सच
या कि यह कि वक्त्त बेरहम है
या मैं कह देता-
“ज्ञान तुम्हारी जगह तो किसी और ने शहर में ले ली”,
तो न जाने क्या सोचती वह
मगर कुछ तो कहना था न,
उसके सवाल के जवाब में।

मैंने भी सवाल ही किया –
“क्यों ऐसा क्यों पूछा तुमने”?
बस मन किया…- उसने कहा…-
पानी पी लेंगे मेरे हाथ का…
कितना तो घाम है…
आग लगे सूरज को।

पी लूँगा … ले आओ
शब्द जैसे अपने आप आ गये बाहर।

वह लाई दौड़कर एक लोटा पानी
एक बड़ा बताशा
किसी बक्से में से ढ़ूँढ़कर
जिसे रखा था उसने बड़े जतन से,
जून की उस दोपहर
मैंने खाया एक पूरा बताशा और पिया
एक लोटा पानी,
मैं कुछ कहता इससे पहले बोली वह-
हो गई साध पूरी बरसों की।
मैं क्या कहता उससे…
एक हरिजन लड़की
जो मात्र इतने भर से
हो गयी थी तृप्त
समूची ज़िंदगी के लिये
सिर्फ देखता रहा उसके गोरे-गोरे
भरे-भरे चेहरे को
हम दोनों की बरसों की साध में
उतना ही अंतर था
जितना होता है
कपट और मासूमियत में

{कृष्ण बिहारी}

अक्टूबर 11, 2010

उधार का भाग्य…

प्रकाश माइक के पास पहुँचे। उन्होने सामने बैठी और खड़ी भीड़ को देखा और बोलना शुरु किया।

आज मैं अंतिम बार इस स्कूल के प्रिंसीपल के रुप में आप सबसे बात कर रहा हूँ। इसी जगह खड़े होकर मैंने बरसों भाषण दिये हैं। आज जब मेरी नौकरी का अंतिम दिन है तो मैं सोचता हूँ कि इस शिक्षण संस्थान की नौकरी से तो मुक्ति मिल रही है पर क्या कल से मेरे अंदर बैठा शिक्षक भी सेवानिवृत हो जायेगा? क्या एक शिक्षक कभी भी अपने कर्तव्य से मुक्त्त हो सकता है? कुछ सवाल हैं जो मेरे अंदर उमड़ रहे हैं, उनके उत्तर भी मिल ही जायेंगे।
इस परिसर में इस मंच से अपने अंतिम सम्बोधन में एक कथा आप सबसे, विधार्थियों से खास तौर पर, कहना चाहूँगा।

बहुत साल पहले की बात है।

एक लड़का था। उम्र तकरीबन आठ-नौ साल रही होगी उस समय उसकी। एक शाम वह तेजी से लपका हुआ घर की ओर जा रहा था। दोनों हाथ उसने अपने सीने पर कस कर जकड़ रखे थे और हाथों में कोई चीज छिपा रखी थी। साँस उसकी तेज चल रही थी।

घर पहुँच कर वह सीधा अपने दादा के पास पहुँचा।

बाबा, देखो आज मुझे क्या मिला?

उसने दादा के हाथ में पर्स की शक्ल का एक छोटा सा बैग थमा दिया।

ये कहाँ मिला तुझे बेटा?

खोल कर तो देखो बाबा, कितने सारे रुपये हैं इसमें।

इतने सारे रुपये? कहाँ से लाया है तू इसे?

बाबा सड़क किनारे मिला। मेरे पैर से ठोकर लगी तो मैंने उठाकर देखा। खोला तो रुपये मिले। कोई नहीं था वहाँ मैं इसे उठा लाया।

तूने देखा वहाँ ढ़ंग से कोई खोज नहीं रहा था इसे?

नहीं बाबा। वहाँ कोई भी नहीं था। आप और बाबूजी उस दिन पैसों की बात कर रहे थे अब तो हमारे बहुत सारे काम हो जायेंगे।

पर बेटा ये हमारा पैसा नहीं है।

पर बाबा मुझे तो ये सड़क पर मिला। अब तो ये मेरा ही हुआ।

दादा के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

नहीं बेटा, ये तुम्हारा पैसा नहीं है। उस आदमी के बारे में सोचो जिसका इतना सारा पैसा खो गया है। कौन जाने कितने जरुरी काम के लिये वह इस पैसे को लेकर कहीं जा रहा हो। पैसा खो जाने से उसके सामने कितनी बड़ी परेशानी आ जायेगी। उस दुखी आदमी की आह भी तो इस पैसे से जुड़ी हुयी है। हो सकता है इस पैसे से हमारे कुछ काम हो जायें और कुछ आर्थिक परेशानियाँ इस समय कम हो जायें पर यह पैसा हमारा कमाया हुआ नहीं है, इस पैसे के साथ किसी का दुख दर्द जुड़ा हो सकता है, इन सबसे पैदा होने वाली परेशानियों की बात तो हम जानते नहीं। जाने कैसी मुसीबतें इस पैसे के साथ आकर हमें घेर लें। उस आदमी का दुर्भाग्य था कि उसके हाथ से बैग गिर गया पर वह दुर्भाग्य तो इस पैसे से जुड़ा हुआ है ही। हमें तो इसे इसके असली मालिक के पास पहुँचाना ही होगा।

प्रकाश ने रुककर भीड़ की तरफ देखा, सभी रुचि के साथ उन्हे सुन रहे थे। वे आगे बोले।

किस्सा तो लम्बा है। संक्षेप में इतना बता दूँ कि लड़के के पिता और दादा ने पैसा उसके मालिक तक पँहुचा दिया।

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद की बात है। लड़का अपने दादा जी के साथ टहल रहा था। चलते हुये लड़के को रास्ते में दस पैसे मिले, उसने झुककर सिक्का उठा लिया।

उसने दादा की तरफ देखकर पूछा,”बाबा, इसका क्या करेंगे। क्या इसे यहीं पड़ा रहने दें। अब इसके मालिक को कैसे ढ़ूँढ़ेंगे?”
दादा ने मुस्कुरा कर कहा,” हमारे देश की मुद्रा है बेटा। नोट छापने, सिक्के बनाने में देश का पैसा खर्च होता है। इसका सम्मान करना हर देशवासी का कर्तव्य है। इसे रख लो। कहीं दान-पात्र में जमा कर देंगे।

बाबा, इसके साथ इसके मालिक की आह नहीं जुड़ी होगी?

बेटा, इतने कम पैसे खोने वाले का दुख भी कम होगा। इससे उसका बहुत बड़ा काम सिद्ध नहीं होने वाला था। हाँ तुम्हारे लिये इसे भी रखना  गलत है। इसे दान-पात्र में डाल दो, किसी अच्छे काम को करने में इसका उपयोग हो जायेगा।

लड़के को कुछ असमंजस में पाकर दादा ने कहा,” बेटा उधार का धन, भाग्य और ज्ञान काम नहीं आता। वह अपने साथ मुसीबतें भी लाता है। अपने आप अर्जित किया हुआ ही फलदायी होता है”।

लड़के के दादा एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे।

आज वह लड़का आपके सामने आपके प्रिंसीपल के रुप में खड़ा है। ईमानदारी और स्वयं अर्जित करने की शिक्षा मैंने अपने बाबा से ग्रहण की थी। मुझे संतोष है कि उनकी शिक्षा के कारण मैं जीवन में ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सका। मुझे भरपूर संतोष है। आज मैं अपने बाबा के द्वारा दी गयी सीख आप सबको सौंपता हूँ। मुझे विश्वास है, कि यहाँ मौजूद सारे लोग नहीं तो कुछ अवश्य ही इस विरासत को अपनायेंगे। कुछ भी अर्जित करने की इच्छा हो उसे स्वयं ही अपनी बुद्धि और लगन से प्राप्त करें। ऐसा करना आपके लिये एक साफ-सुथरे और तनाव रहित जीवन की बुनियाद प्रदान करेगा।

…[राकेश]

%d bloggers like this: