समय साक्षी है : हिमांशु जोशी का भविष्योन्मुखी उपन्यास आज के परिपेक्ष्य में


लेखक निस्संदेह समाज के अन्य वर्गों की तुलना में करवट लेते समय को ज्यादा गहराई से समझ पाता है, वह आने वाले समय की आहट, और लोगों से पहले ही सुन लेता है। लेखक, अगर भूतकाल में घटी घटनाओं पर भी कुछ लिखता है तो वह गहराई से उस भूतकाल और उस समय हुये घटित का विश्लेषण करता है। यही पैनी दृष्टि और विश्लेषण क्षमता वह वर्तमान में घटित हो रहे घटनाक्रमों के बारे में भी अपनाता है।

अगर हिमांशु जोशी के राजनीतिक उपन्यास “समय साक्षी है” को देखें तो यह भूत काल का भी लगता है और हो सकता है कि सत्तर के दशक के जय प्रकाश आंदोलन से कुछ प्रेरणा उन्होने ली हो इस उपयास को रचते समय। जिन्होने यह उपन्यास पिछली सदी के अस्सी या नब्बे के दशकों में या नयी सदी के पहले दशक में पढ़ा हो उनके सामने यह उपन्यास ऐसी आदर्शवादी कल्पनायें लेकर आता है जहाँ लगता है कि काश ऐसा हो जाये।

लोकतंत्र में राजनीति से किनारा नहीं किया जा सकता। राजनीति और राजनीतिज्ञों की नैतिकता का स्तर किसी भी देश की समूची नैतिकता से जुड़ा होता है। अगर राजनेता ईमानदार हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि देश में भ्रष्टाचार फैल जाये क्योंकि वे बर्दाश्त ही नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार करने वाले कर्मचारियों को और जब प्रशासन में ईमानदारी बसेगी तो बाकी जगह अपने आप ईमानदारी से काम होगा।

आदमी एक एकल ईकाई के रुप में ईमानदार नहीं भी हो तब भी अगर उच्च स्तरीय पदों पर ईमानदार लोग बैठे हैं और उसे पता है कि भ्रष्टाचार करने पर उसके लिये मुसीबत खड़ी हो सकती है तो वह हिम्मत ही नहीं करेगा भ्रष्ट आचरण दिखाने की।

भारत में मौजूदा समय में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में भारत के राजनेताओं के चरित्र में कितनी गिरावट आ गयी है। नैतिकता की बात उनके लिये बेमानी हो चुकी है।

भारतीय राजनीति, चुनावी राजनीति, दलगत राजनीति और राजनैतिक एवम समाज को झझकोरने वाले आंदोलन से सम्बंधित यह अपने तरह का एक अलग ही उपन्यास है। किसी किसी पृष्ठ पर ऐसा लगने लगता है कि भारतीय राजनीति की परतें कितनी गहराई से खुरची गयी हैं और इसकी शारीरिक और मानसिक बनावट का बड़ा गहरा अध्ययन किया गया है।

एक उदाहरण देखें- क्या लिखा गया है

समस्त राष्ट्र का भविष्य जब मात्र मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में समा जाता है तो अनेक जटिल समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। यदि उनके निर्णय दूरदर्शितापूर्ण न हों तो राष्ट्र को उनके दूरगामी प्रभावों के परिणाम झेलने के लिए भी विवश होना पड़ता है। भारत आज जिस संक्रमण की स्थिति से गुजर रहा है, उसका दायित्व इन्हीं राजनीतिज्ञों पर है, जिन्होंने राजनीति में से नीति को तिरोहित कर, जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे समस्त राष्ट्र के अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया है। आए दिन चारों ओर जो हिंसा, जो रक्तपात जो विघटनकारी घटनाएँ घटित हो रही हैं, उसके मूल में कहीं ये ही कारण हैं कि मात्र अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उन्होंने किस तरह से समस्त राष्ट्र के हितों की बलि चढ़ा दी है।

हिमांशु जोशी उपन्यास की भूमिका में अपनी पैनी दृष्टि का परिचय देते हैं

राजनीति की भी कोई नीति नहीं होती है। नीति का परित्याग कर जब वह नीति अनीति का मार्ग अपनाने लगती है, तब उसके परिणाम घातक होते है- बड़े भयंकर। भारत के गत कुछ वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।
आज़ादी के बाद लोगों के मन में नई आशाएं, आकांक्षाएं जागीं। सदियों से शोषित दीन-हीन जनों को लगा-उम्मीदों का नया सूरज उगने वाला है,
यातनाओं की काली रात बीतने वाली है।
वह नया सूरज उगा, परन्तु सबके लिए नहीं।
शायद इसलिए काल-रात्रि अभी भी शेष है।

अभी करोड़ों लोग हैं, जिन्हें एक वक्त का भोजन भरपेट नहीं मिल पाता। करोडों लोग हैं। जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं। दो हाथ हैं, पर उन्हें देने के लिए काम नहीं। तन को ढकने के लिए पूरे वस्त्र नहीं, बीमार होने पर दबा नहीं-मरने पर कफन नहीं।
आज़ादी का सपना किसी सीमा तक साकार हुआ, परन्तु वास्तव में वह आज़ादी मिली कहां, जिसके लिए स्वाधीनता-सेनानियों ने लौह-कपाटों के भीतर नारकीय यातनाग्रहों में अपनी देह को गला दिया था, फांसी के तख्तों पर हंस-हंस कर झूलते हुए जीवन के उषाकाल में ही सन्ध्या का वरण कर लिया था। रोटी-रोटी के लिए मोहताज, भीख मांगते ऐसे बच्चे मैंने स्वयं देखे हैं, जिनके अभिभावक स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे चुके थे। उन अनाम, अज्ञात शहीदों का क्या कहीं लेखा-जोखा है ? लेखा-जोखा उन्होंने चाहा भी न होगा, परन्तु उनके परिणामों का हिसाब आने वाली पीढ़ियां मागें तो उसे अनुचित भी नहीं कहूँगा।

देश के ‘भाग्य विधाता’ देश-सेवा के नाम पर क्या-क्या करते हैं ? अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किस तरह करोड़ों लोगो के भाग्य के साथ खिलवाड़ करते है ? भ्रष्टाचार्य सदाचार के आवरण में किस तरह प्रस्तुत किया जाता है-उसी ‘आदर्शोन्मुख’ समाज का चित्रण प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है।

तिमिर वरन, मेघना, पी० पी० या अन्य पात्र काल्पनिक होते हुए भी काल्पनिक नहीं। भारतीय राजनीति से जो तनिक भी परिचित है, उन्हें पात्र भी सुपरिचित लगेंगे। उन्हें किसी-किसी रूप में आपने भी देखा होगा और आज भी देखते होंगे।
राजधानी में गत 25-26 साल से रहने के कारण राजनीति और राजनीतिज्ञों को तनिक निकट से देखने-परखने का मौका मिला। वे ही अनुभव और अनुभूतियां इसके लेखन में सहायक बनीं। कुछ घटनाएं आपको सत्य के इतने निकट लग सकती हैं कि हो सकता है, आप उन्हें सत्य ही मान लें। परन्तु अन्त में मैं यहीं कहूँगा कि मेरा उद्देश्य किसी की कमियों को, कमजोरियों को, रहस्यों को उजागर करके रस लेना नहीं रहा। हाँ जब इसे लिख रहा था, मेरी आंखों के सामने कोटि-कोटि संघर्षरत दीन-दुखियों का चित्र बार-बार अवश्य उभर आता था।

तथ्यों का उद्घाटन स्वयं में एक समस्या है। शायद इसलिए मैं महीनों तक आग के दरिया की धधकती लहरों से जूझता रहा। उन मित्रों का मैं कम आभारी नहीं जिन्होंने इसके लिए सामग्री जुटाने में हर तरह का जोखिम उठाकर मेरी सहायता की।

अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने से और आमरण अनशन करके अपने प्राणों को ताक पर रखने से उपन्यास समय साक्षी है, के तिमिर बारन की याद ताजा हो उठती है और जिस तरह से देश के युवावर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो समय साक्षी है का अंतिम अध्याय दिल्ली में एक नाटक के रुप में खेला जा रहा हो।

जहाँ तिमिर वरन खुद एक राजनीतिज्ञ हैं और बरसों सत्ता में रहे हैं और अपने ही दल के विरोधियों द्वारा उनके खिलाफ किये जा रहे षडयंत्रों के खिलाफ वे उठ खड़े होते हैं। देश हित में वे सड़क पर उतर आते हैं और युवाओं का आह्वान करते हैं। देश को जगाते हैं और बुरी राजनीतिक ताकतों, जो कि देश के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, के खिलाफ आंदोलन छेड़ देते हैं और उसे एक जनांदोलन के रुप में विकसित कर देते हैं।

समय साक्षी है उपन्यास का अंश पढ़ें-

‘नहीं, नहीं यह नहीं होगा। आइ से न्नो ! दांत पीसते हुए तिमिर वरन गरजे। आँखें अंगारे की तरह धधक रही थीं। चेहरा तमतमा आया था। आवेश में सारा शरीर कांपने-सा लगा था।
मुट्ठी भींचते वह दहाड़ने लगे ‘मेरी प्रतिष्ठा पर आंच आई तो सबकी इज़्जत धूल में मिला दूँगा। देखता हूँ- मुझे मंत्रिमंडल से हटाकर कौन सत्ता में टिका रहता है !’ अन्तिम चेतावनी देते हुए वह उठे फाइल बगल में दबाकर, धोती का पल्लू संभालते हुए फटफट बाहर की ओर चल पड़े।
उन्हें इस तरह उत्तेजित देखते ही धूप में बैठा ड्राइवर घबरा उठा और सिगरेट का टोटा फेंकता हुआ गाड़ी की ओर लपका।
चमचमाती हुई, एक नीली-सी लम्बी कार फर्राटे से गेट की ओर मुड़ी और हवा को चीरती हुई, वारीन्द्र घोष मार्ग पर निकल पड़ी।

बैठक में भाग लेनेवाले संसदीय दल के सभी सदस्य  क्षण-भर के लिए सन्न रह गए। तिमिर वरन का यह विकराल रौद्र रूप सबके मन में एक अजीब-सी दहशत पैदा कर गया था। एक भयावनी आशंका की कहीं दल विघटन फिर न हो जाए! इस बार दल के विघटन का अर्थ था। घोर अराजकता, सैनिक-शासन या पूर्ण तानाशाही !
पर देश इसमें से किसी भी स्थिति के लिए तैयार न था।
तिमिर वरन के पीछे पन्द्रह बीस और सदस्य उठ खड़े हुए। एक-एक कार में पाँच छह-छह जन लदकर  उसी दिशा में बढ़े जिधर से तिमिर वरन की विदेश से आयात की गई, कीमती गाड़ी अभी-अभी गुज़री थी।

सत्तर वर्ष के तिमिर वरन आज न जाने किस तरह एक ही छलांग में तीन-तीन चार-चार सीढ़ियाँ पार कर गए थे। और दिन थोड़ा-सा पैदल चलने में उनका दम फूलने लगता था। वह बुरी तरह हांफने लगते थे। आवेश के कारण, आज उन्हें कुछ भी सूझ न रहा था।
तीर की तरह वह सीधे बैठक में गए। सचिव बर्मन पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। सोफे पर फाइल पलटकर वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए।
‘यस्सर’ की भंगिमाव बनाए बर्मन हाथ में स्लिप वाली सफेद नोट-बुक उठाए, सिर झुकाए सामने खड़ा था।
‘जिन संसद-सदस्यों की सूची तुम्हें कल दी थी, उन्हें गाड़ियां भेजकर बुलाओ। अबरार से कहो कि एक नया  ड्राफ्ट तैयार करें फौरन।’

बर्मन चला गया तो उन्होंने एक लम्बी सांस ली। पाँवों को दूर तक पसारा और टोपी उतारकर मेज़ पर रख दी। देर तक उनका हाथ यों ही टोपी के ऊपर रखा रहा। फिर उनके गंजे सिर पर पहुँच गया, आँखें मूंदकर वह कुछ सोचने लगे।
अब भी उनका चेहरा तमतमा रहा था। अब तक उनका दम फूल रहा था। कभी इस तरह अपमानित किया जाएगा-उन्होंने सपने में भी न सोचा था।
अभी सुबह के नौ भी न बजे थे-चारों ओर घिरा धुंध-सी फैली थी। नमदे की तरह मोटे-मोटे घने काले बादलों से आसमान घिरा था। सर्दी के कारण बाहर निकलना कठिन था। फिर भी सड़कों पर भीड़ कम न थी। साइकलों और कारों की सचिवालय की ओर कतार-सी चली जा रही थी।

तिमिर वरन देर तक उसी मुद्रा में बैठे रहे। उनके विरुद्ध षडयंत्र का जाल निरंतर बुना जा रहा है, उन्हें इसका अहसास था। वह जानते थे, दल के लोग सरकार की नीतियों के कारण बहुत-से छोटे-छोटे गुटों में बट रहे हैं। दूसरी पार्टियों से भी बहुत-से लोग आ गए थे। जिनका एक अलग समुदाय बन रहा था। वे सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे। तिमिर वरन के लिए यह सबसे बड़ा खतरा था। इस चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने भी कम चाले न चली थीं। अपनी तरफ से कहीं कोई कसर न रखी थी। किन्तु अब पासा पलट रहा था। धीरे-धीरे तिमिर वरन को शक्तिहीन करने की सुनियोजित योजना चल रही थी। उप-चुनावों में उनके ही दल के लोंगों ने, उनके समर्थक उम्मीदवारों को हराने के लिए विपक्ष के उम्मीदवारों का छिप-छिपकर समर्थन किया था। इस अभियान में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली थी।

किन्तु तिमिर वरन भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। विपक्ष के बहुत-से नेताओं से उनके आत्मीयता के गहरे सम्बन्ध थे। उन्होंने अपने ही दल के कम सदस्य-उम्मीदवारों की ज़मानते ज़ब्द नहीं करवाई थीं। बहुत-से लोग उनका आशीर्वीद प्राप्त कर संसद तक पहुँचने में सफल हुए थे। विपक्ष की बेचों पर  बैठने के बावजूद उन पर अगाध श्रद्धा रखते थे।
उनका व्यक्तित्व बर्फ से ढके ज्वालामुखी जैसा था। बाहर से जितने सौम्य-सन्त लगते थे, भीतर से उतने  ही रीति-नीति के धनी कूटनीतिज्ञ। खादी के साधारण-से कपड़े पावों में बेडोल की चप्पलें और सिर पर हिम श्रृंग की तरह जगमगाती शुभ्र स्वच्छ टोपी !  जब वह समाजवाद या गरीबी से दूर करने के नारे लगाते थे, तब लगता था, वाकई कोई भुक्त भोगी किसान अपने ही दुख-दर्द की बातें कर रहा है !

किसान-परिवार में अपने पैदा होने का उन्हें गर्व था।  मौंके-बेमौके इस तथ्य का उद्घाटन भी भूलते न थे। सोफे से धीरे से उठकर वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। कमरे में किसी के भी प्रवेश की उन्होंने मनाही कर दी थी।
नई व्यूह-रचना के विषय में वह गम्भीरता से सोचने लगे। उन्हें-इस बार की पराजय का अर्थ है, राजनीति से पूर्ण संन्यास ! यानी कि उनकी राजनीतिक हत्या !

राजनीति से हटने से उन्हें एतराज न था। उम्र भी काफी हो गई थी। दस्तखत करते हुए हाथ कांपते थे। देर तक मीटिंग में बैठना भी कठिन लग रहा था। उस पर दिन रात टूर प्रोग्राम ! जन भाषाओं में भाषण तथा नित उठ खड़ी होने वाली नई-नई उलझने ! पर देश सेवा और जनहित के नाम पर वह वर्षों से इन यंत्रणाओं को सहते आ रहे थे। उनकी अन्तिम आकांक्षा थी कि कभी ऐसा संयोग हो और जनता  उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित कर, अपने पर  किए गए उनके उपकारों का बदला चुकाए तो संभवता वह इस गरीब देश की कुछ सेवा कर सकेंगे।

आज के परिपेक्ष्य में हिमांशु जोशी का उपन्यास- समय साक्षी है, बेहद प्रासंगिक हो उठा है और एक अच्छी कृति की पहचान यही है कि वह समय समय पर जीवित होता रहता है और भिन्न काल की पीढ़ियों को अपने से जोड़ता रहता है।

…[राकेश]

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