Archive for जनवरी, 2014

जनवरी 30, 2014

दूर नज़र के छुपा बैठा है

मन की भटकन Dk-001

खोज में किसकी

पता नहीं क्यूँ

चैन नहीं है

क्या पाना है

क्या खोया है

दूर नज़र के पार देश में

कोई छुप के जा बैठा है

कैसे उसको पास बुलाये

पंख लगा कोई कैसे जाए

मन के साथ में तन भी तो है

तन के साथ रहे न पल भर

मन बस उसके संग हो जाए

Rajnish sign

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जनवरी 30, 2014

मीठे गीत जीवन के

कितना छोटा है जीवन

यह तो मीठे गीतों

और

आराम से बहती हवा

का आनंद लेने के लिए है

पर हरेक कहता है

जीवन को शांतिपूर्वक जीना संभव नहीं ,

और हरेक को मुट्ठी तान कर

जीवन में  कठिन, और जटिल रास्तों से जूझना चाहिए |

लेकिन मुझे जो दिखाई देता है

जहां तक मेरी समझ जाती है

जहां तक दृष्टि देख सकती है

जहां तक मेरे हाथ पहुँच सकते हैं

जहां तक मैं चल सकता हूँ

– गीत रहेंगे और हवा के झोंके भी बहेंगे

मुस्कुराहट तुम बने रहना

तमाम बाधाओं और शत्रुओं

से घिरे होने के बावजूद

मैं इन् सबको साथ लेकर

चलता रहूँगा

इनसे पार जाने के लिए

Yugalsign1

जनवरी 28, 2014

जिस्म ही तो नहीं था

मैं जिसे बरसों चाहा किया

वो जिस्म में ढला तो था

पर जिस्म ही नहीं था…

जिस्म से इतर ही सब कुछ था…

वो था सबसे अलग जो

उस जिस्म के अन्दर में था…

Rajnish sign

टैग: , , , , , ,
जनवरी 24, 2014

आज भी हम बिलकुल वैसे हैं…

कभी कभी बातों के राही

मुड़ जाते हैं

यादों की पगडण्डी पर क्यूँ?

कुछ यादें जो बंद करीं थी

तहखानो में

बहुत दबा कर

सारे चिन्ह मिटा डाले थे

वक़्त की जिन पर धूल जमाई

सोच लिया था

खो जाएँगी

आज मिलीं तो पता हुआ

कि

आज भी वो बिलकुल वैसी हैं

आज भी हम बिलकुल वैसे हैं…

Rajnish sign

जनवरी 24, 2014

अरविंद केजरीवाल : अकेला ‘धरना’ क्या भाड़ झोंकेगा!

arvindkअरविंद केजरीवाल एक संवैधानिक पद पर हैं और इस छोटी अवधि वाले आंदोलन से उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे आप के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री दोनों के रूप में जनता के हितों को साधने के अपने धर्म की रक्षा भली भांति कर सकते हैं| उन्होंने एक बार कहा था कि वे और आप पुराने दलों और नेताओं को राजनीति सिखाने आए हैं और उन्होंने इसे सिद्ध भी कर दिया|

किरण बेदी जैसे एक्टीविस्ट लोग, जो ईर्ष्या और “अंगूर खट्टे हैं” वाले सिंड्रोम से पीड़ित हैं, जब टीवी पर विलाप करते हुए चीखते हैं कि मीडिया को हटा लो और फिर देखो कितने लोग वहाँ रहते हैं तो वे भूल जाते हैं कि 20 जनवरी की सुबह अरविंद केजरीवाल तो गृहमंत्री के दफ्तर के बाहर अपने छह मंत्रियों के साथ धरना देने चले थे और उन्होंने आम जनता को वहाँ आने से मना किया था| चार हजार पुलिस वाले अगर परिंदे को भी पर नहीं मारने देते रेल भवन पर तब भी अरविंद केजरीवाल अपने छह साथियों के साथ डटे रहते| मीडिया को तो खबर चाहिए और आज की तारीख में अरविंद केजरीवाल से बढ़कर कोई नहीं है जो उन्हें एक्सक्लूसिव बाईट दे|

26 जनवरी की तारीख देखते हुए अरविंद केजरीवाल का 20 तारीख को धरने पर बैठने का निर्णय दुधारी तलवार जैसा था और यही हालत केन्द्र सरकार की भी थी| अरविंद केजरीवाल को रेल भवन पर रोकने का निर्णय केन्द्र सरकार का था जिसके बाद ही अरविंद केजरीवाल ने अपील की कि धरने के समर्थक वहाँ पहुंचें| अगर गृहमंत्री दिल्ली के मंत्रियों को अपने मंत्रालय के बाहर बैठने देते तो बहुत से टकराव टाले जा सकते थे| पर केन्द्र सरकार को तो अरविंद केजरीवाल को बदनाम करना था सो सुबह से ही मेट्रो के चार स्टेशन बंद कर दिए गये| उन्हें अपने चार हजार पुलिस वालों पर भरोसा नहीं था कि वे जनता को वहाँ जाने से रोक पायेंगे|

कुछ लोग दलीलें दे रहे हैं कि कम समर्थक वहाँ उमड़े इसलिए अरविंद केजरीवाल ने निराश होकर धरना वापिस ले लिया| लोग भूले दे रहे हैं कि धरना सोमवार से शुरू हुआ था और कामकाजी वर्ग को धरने पर जाने में बहुत मुश्किलें आनी थीं| और लोगों को वहाँ आने की अपील सोमवार दोपहर के आसपास की गयी| एकदम से तो लोग पहुँच नहीं पायेंगे तब विशेष रूप से जब पुलिस ने वहाँ छावनी बना डाली हो| इसके बाद भी यही धरना अगर शुक्रवार को शुरू होता तो आधी से ज्यादा दिल्ली वहीं नजर आनी थी| पिछले साल दामिनी मामले में शनिवार और रविवार को उत्पन्न हुए जमावड़े को याद कर लें तो बात आसानी से समझ में आ जायेगी और अरविंद केजरीवाल का यह कदम इतना अजूबा था आम जनता के समझने के लिए कि जब तक वे इसके लाभ, नुकसान और अर्थ को समझ पाते, धरना ही खत्म हो गया|

अरविंद केजरीवाल और आप का लचीला रुख सामने आया जो फिर से भाजपा और कांग्रेस के दुष्प्रचारों पर कुठाराघात था| इन्हें आशा थी कि अरविंद केजरीवाल अड़ियल आदमी की तरह अड़े रहेंगे और सत्ता तंत्र  उन्हें कुचल देगा|

अरविंद केजरीवाल  की तुरंत निर्णय लेने की क्षमता (या आलोचक उतावली कहना चाहें तो कह सकते हैं), उनके इस धरने से स्पष्ट हो जाती है|

गांधी भी अपने आंदोलनों को एक अवधि के बाद वापिस लिया करते थे जिसका एक बड़ा कारण स्पष्ट है कि जनता की भागीदारी वाले आंदोलन बहुत लंबे समय तक नहीं खींचे जा सकते क्योंकि हरेक की अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याएं गुरुत्वाकर्षण बल का काम करती हैं व्यक्ति की आंदोलनकारी प्रवृत्ति पर|

अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ पर मौजूदा राजनीतिक तंत्र की तरह से किये जा रहे हमलों के कारण राजेश जोशी की एक प्रसिद्द कविता की कुछ पंक्तियाँ बेहद प्रासंगिक दिखाई देती हैं|

बरदाश्त नहीं किया जायेगा

किसी की कमीज हो

उनकी कमीज से ज्यादा सफेद।

जिसकी कमीज पर

दाग नहीं होंगे

मारे जायेंगे।

इस समय

सबसे बड़ा अपराध है

निहत्था और निरपराध होना।

जो

अपराधी नहीं होंगे

मारे जायेंगे। 

कांग्रेस की यह चाल थी कि आप की सरकार बनाकर वह इसकी कमीज को भी पुराने दलों जैसी गंदी साबित कर देगी और फिर से सालों के लिए अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित कर लेगी| किसी भी मामले पर कमेटी बैठा देना, जांच समिति बैठा देना इस आशा में कि कुछ दिनों में जनता भूल जायेगी और मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा, ऐसा अभी तक सारे राजनीतिक दल करते आए थे| पुराने राजनीतिक तंत्र द्वारा सारी कवायद यही चल रही है कि देश के सामने यह जल्दी से जल्दी सिद्ध कर दिया जाए कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथी भी उतने ही भ्रष्ट हैं, अगर यह नहीं होता तो देश को दिखाया जाये कि ये लोग अक्षम हैं सरकार चलाने में| कांग्रेस रोज ही राग अलापती है कि वह ‘आप‘ को तब तक समर्थन देगी जब तक वे जनहित के काम करते रहेंगे पर अंदरखाने वह किसी भी तरह ‘आप‘ कुछ भी ऐसा नहीं करने देना चाहती जिससे कि इनकी छवि बने या निखरे| कांग्रेस ने पहले हाँ करके अब अरविंद केजरीवाल को उनकी भ्रष्टाचार रोधी शाखा के लिए उपयुक्तत अधिकारी देने में असमर्थता दिखाई है| कुछ ही दिन पहले एक टीवी साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वे कॉमनवेल्थ खेल घोटाले को उजागर करने के लिए सम्बंधित फाइलें देख रहे हैं और कांग्रेस पछताएगी कि उसने क्यों ‘आप‘ को समर्थन दिया| कांग्रेस को ‘आप‘ की सरकार को समर्थन एक जाल है और ‘आप‘ को इस चक्रव्यूह को तोड़कर ही अपनी श्रेष्ठता दिखानी है|

अगर केन्द्र सरकार और पुराने राजनीतिक दल ये सोच रहे हैं कि वे अरविंद केजरीवाल को अपने जैसा बना लेंगे तो यह धरना उनकी आँखें खोलने के लिए पर्याप्त है कि ऐसा होने वाला है नहीं|  अरविंद केजरीवाल के धरने ने स्पष्ट जता दिया है कि उनके साथ और उनके रहते भारत में ऐसा हो पाना कठिन होगा और आगे तो यह असंभव हो जाएगा| जो गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि धरना अराजक था उन्हें अपने सिद्धान्त और अपने विचार फिर से खंगालने की जरुरत है| अरविंद केजरीवाल राजनीति में पुराने की जगह बैठ कर वही सब करने नहीं आए हैं जो चलता आ रहा है| वह इस खेल के सारे नियम बदलने आए हैं| इसमे कतई अतिशयोक्ति नहीं कि अगर ऐसा उस समय होता जब गांधी, सुभाष और भगत सिंह जिंदा थे तो शत प्रतिशत तीनों क्रांतिकारी नेता इस धरने के मंच पर बैठे दिखाई देते|

इस धरने ने कांग्रेस को स्पष्ट सन्देश दे दिया कि वह ‘आप‘ की बांह मरोड कर राजनीति नहीं कर सकती और ‘आप‘ चांटा खाकर दूसरा गाल आगे करने वाली है नहीं वह कांग्रेस के दोनों गाल जनता के सामने शर्म से लाल करवा देगी ज्यादा बुद्धिमत्ता दिखाकर| अभी कांग्रेस की एक चाल ‘आप‘ पर भारी रही है मेट्रो को बंद करके कांग्रेस ने पूरा इंतजाम कर दिया कि आम लोग ‘आप‘ के खिलाफ हो जाएँ| हो सकता है इस बात ने ‘आप‘ को बहुत प्रभावित किया हो पर थोड़ी अवधि में लोग असल बात समझ जायेंगे|

भाजपा को सन्देश दे दिया कि अब मुद्दे ‘आप‘ निश्चित करेगी और भाजपा की मजबूरी रहेगी ‘आप‘ के उठाये मुद्दों पर प्रतिक्रया देकर या उसकी नक़ल करके उसकी पिछलग्गू पार्टी बनने की|

किरण बेदी जैसे किसी खास भावना से ग्रस्त हो चुके दिमाग ही यह सोच सकते हैं कि सोमनाथ भारती के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए यह धरना आयोजित किया गया था| उनकी जानबूझ कर बंद की हुयी आखें देख पाने में असमर्थ हैं कि सोमनाथ भारती का मुद्दा क्या भुला दिया गया, क्या वह पार्श्व में चला गया? बल्कि वह तो और ज्यादा सामने आ गया है| सोमनाथ भारती की आड़ में पुरानी राजनीति ‘आप‘ पर और तीव्र हमले करगी| हो सकता हो सोमनाथ भारती की गलती हो पर क्या सिर्फ इसलिए कि यह मुद्दा ‘आप’ सरकार से जुड़ा हुआ है, एक ड्रग्स और देह व्यापार से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण मसले को रंगभेद और नस्लीय अंतर का मामला करार देकर देश की छवि से खेल सकते हैं पुराने दल? सोमनाथ भारती बलि चढ़ जायंगे या नहीं मुद्दा यह नहीं है|

वास्तविक  मुद्दा यही है कि भारतीय राजनीति में बदलाव की क्रिया शुरू हो चुकी है| या तो पुरानी राजनीति अपने आचार व्यवहार और सोच में परिवर्तन लाकर सच में समाज में अंतिम व्यक्ति के हितों की रक्षा करने के प्रयास करेगी, या जनता ही इन्हें सुधरने पर मजबूर कर देगी और वे दोनों ही तेरीकों से नहीं सुधरते तो धरती पर जीवन का इतिहास बताता है कि अस्तित्व तो यहाँ बेहद शक्तिशाली डायनासोर का भी नहीं रहा, भ्रष्ट राजनीति भी अप्रासंगिक हो दफा हो जायेगी|

पुराने राजनीतिक दलों, उनके थिंक टैंक, बड़े बड़े राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार, लेखक, समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी, कोई ऐसा नहीं है जो पहले से अनुमान लगा ले कि अरविंद केजरीवाल और योगेन्द्र यादव एवं साथी क्या करने वाले हैं, इनकी दिशा क्या है? ये लोग जब कुछ कर देते हैं तब बुद्धिजीवी मंथन शुरू कर देते हैं| दो बातें संभव हैं – या तो जहां इनकी  किताबी सिद्धांत आधारित बुद्धि खत्म हो जाती है उससे परे का ‘आप‘ पार्टी के कर्ता-धर्ता सोच रहे हैं या वे इतना साधारण सोच रहे हैं और इन बुद्धिजीवियों को नाक और आँखें नीचे करके सोचने का तरीका ही नहीं आता सो वे देख और समझ ही नहीं पा रहे हैं अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक  रणनीति, जो खुलेआम कदमताल करती हुयी समाज के सबसे निम्न वर्ग की ओर बढ़ती जा रही है, और रास्ते से सभी वर्गों की सहूलियत के लिए भ्रष्टाचार पर झाडू फेरती जा रही है|

यह धरना समाज के अंतिम व्यक्ति का महत्व भारतीय राजनीति के सम्मुख बढाने की ओर पहला कदम है|

गांधी ने कहा था कोई भी योजना बनाने से पहले समाज के अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचना कि क्या यह योजना उसे लाभान्वित करेगी अगर नहीं तो योजना बेकार है| अरविंद केजरीवाल उसी ओर बढते नजर आ रहे हैं| उच्च वर्ग को तो अरविंद केजरीवाल से बहुत दिक्कतें होने वाली हैं क्योंकि दशकों से जो घोषित एवं अघोषित सब्सिडी विभिन्न सरकारों से लेकर उन्होंने अपनी सम्पन्नता को बरकरार रखा है वह सुविधा खत्म हो जायेगी अगर आप केन्द्र की राजनीति में अपना दखल बढाती है| एफ.डी.आई पर दिल्ली राज्य में आप सरकार द्वारा निर्णय लेते ही मीडिया चैनलों और अखबारों की तोपें आप सरकार की तरफ स्पष्ट रूप से गोले दागने लगीं|

सुविधाभोगी वर्ग को बेहद तकलीफ होती है जब कोई विकेन्द्रीकरण की बात करता है क्योंकि उनके लिए आसान है एक खास वर्ग को अपनी मुट्ठी में रखना परन्तु अगर आम जनता में शक्ति फ़ैल जाए तो उन्हें बेहद मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है, कठोर परिश्रम करना पड़ता है|

पूरे देश ने देखा होगा एक युवक को जो धरना स्थल पर पुलिस के समूह में घूम घूम कर तलाश कर रहा था कि किस पुलिस वाले ने उसे मारा था| क्या कोई सोच सकता था ऐसा हो पाना अब से पहले? पुलिस ने अपनी छवि एक दुर्दांत समूह की बना ली है| बहरहाल इतना तय है कि इस धरने के बाद दिल्ली पुलिस न तो अरविंद केजरीवाल सरकार को और न ही आम जनों की समस्याओं को टालने की हिम्मत कर पायेगी| उसे एक्शन लेना ही पड़ेगा वरना जनता में उसके खिलाफ असंतोष बढ़ता ही जाएगा और मुखरित भी होने लगेगा| आखिरकार जनता को इतना तो समझ में आता ही है अब कि चाहे पुलिस का सिपाही हो या कमिश्नर, दिल्ली में गृह सचिव हो या उनके दफतर में कार्यरत सबसे छोटा सरकारी कर्मचारी, सबक वेतन जनता के दिए धन से ही चुकाए जाते हैं और उनकी जवाबदेही जनता के प्रति है| भ्रष्ट तंत्र ने ऐसा माहौल बना दिया था कि सरकारी कर्मचारियों को जनता के प्रति उत्तरदायित्व होना चाहिए ऐसी धारणा ही खत्म हो चली थी| इस धरने से बहुत से सरकारी कर्मचारी अपने आप ही अपने उत्तरदायित्व का पालन करते नजर आयेंगे क्योंकि उन्हें दिख गया होगा कि अब जनता ज्यादा जागरूक हो गई है|

आप पर हमले बढते जा रहे हैं| रोचक बात है कि आप जनता की लड़ाई लड़ रही है और जनता खुद आप के लिए लड़ रही है| दीवार पर इबारत साफ़ साफ़ लिखी है जिन बुद्धिजीवियों को दिखाई नहीं दे रही उन्हें भी कुछ महीनों में दिखने लगेगी|

ऐसा भी संभव है कि पुरानी राजनीति अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ को समाप्त कर दे या हरा दे पर अब इस क्रान्ति के बीज को पनपने से रोका नहीं जा सकता|

किसी और से ज्यादा ये पंक्तियाँ अरविंद केजरीवाल और आप के लिए ज्यादा मुनासिब दिखाई देती हैं|

मेरी हिम्मतें अभी झुकी नहीं,

मेरे शौक अभी बुलंद रहे

मुझे हार-जीत से क्या गरज

मेरी जंग थी मैं लड़ा किया!

जनवरी 22, 2014

सर्दी के सफ़ेद बादल और रक्तिम लौ

सर्दी में बादल fireplace-001

पुकार लगाते तो हैं

पर बहुधा बिन पानी चले आते हैं

आते हैं

तो हर चीज को सफेदी से ढक देते हैं

चारों ओर ऐसा प्रतीत होता है

जैसे धुंध ने घर कर लिया हो

शामें धुंधला जाती हैं

मेरे कमरे में अंधियारा बढ़ जाता है

मैं गमन कर जाता हूँ

बीते काल में –

मोमबत्ती के हल्के प्रकाश से

भरे कमरे में!

जब आतिशदान में लकडियाँ जलती हैं

तो कभी भी बोल नहीं पाता हूँ

बस खो जाता हूँ

आग की लपटों से बनती बिगड़ती आकृतियों में|

तुम्हारी त्वचा का गोरापन ओढ़ने लगता है

हल्का लाल-गुलाबी रंग

जब तपन की गहन तरंगें

और लालसा घेर लेती है

तुम्हारा खूबसूरत चेहरा

दमकने लगता है ऐसे

जैसे तालाब से कमल खिलकर निकलना शुरू करने लगता है

जिस्मानी  उतार चढ़ाव

चमकने लगते हैं

और एक गर्म एहसास चारों ओर बहने लगता है

और तुम्हे और मुझे अपने पंखों में समेट लेता है

सब कुछ उड़ने लगता है

ऐसे जैसे सब कुछ बादल ही हो गया है

कमरे में निस्तारित होने लगता है

श्वेत धीरे-धीरे लाल में

ऐसा लगने लगता है

हमारे जिस्म पिघल जायेंगे

मोमबत्ती की लौ

मोटी हो और तेजी से जलने लगती है

बादल रक्तिम लाल हो जाते हैं

और मुझे प्रतीत होता है

कि सर्दी के बादल लाल तप्त हो गये हैं

और वास्तव में

वे बिन पानी के ही हैं!

Yugalsign1

जनवरी 21, 2014

उधड़ी सीवन…

कुछ ज़ख्म सिले थे

वक़्त ने

नकली मुस्कानों का लेप लगा के

दर्द छुपाया खोखले कहकहों में

कल कुरेद कर देख लिया

सीवन उनकी उधड़ गयी कल

दर्द अभी तक टीस रहा है…

परत जमी भर  थी…

ज़ख्म नहीं भरा था

अभी तक हरा था…

Rajnish sign

जनवरी 21, 2014

अरविन्द केजरीवाल : एक धरना और सहूलियत को खांसी

नई राहें बताता है नये रास्ते दिखाता हैarvind sleep

नहीं मालूम जालिम (…) रहजन है कि रहबर है 
जब प्रकृति भी बारिश और सर्द हवाओं के जरिये भारत देश की राजधानी दिल्ली में वी.आई.पी क्षेत्र में खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों एवं समर्थकों के हौसले, उनकी सच्चाई और ईमानदारी में निष्ठा को कसौटी पर कस रही है तब अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के उद्देश्यों में पूरी निष्ठा रखने वाले लोगों को ही  आशा है कि जल्द ही सूरज निकलेगा और पूर्णतया स्वच्छ आकाश में पहले से ज्यादा लुभावनी छटा और चमक दिखायेगा और बाकी लोगों को संदेह ने घेर लिया है| इन् बाकी लोगों में ज्यादातर ऐसे हैं जिनका कभी भी जनांदोलनों में विश्वास नहीं रहता और व्यवस्था के विरोध मात्र से उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है| ‘आप‘ की दिल्ली विधानसभा में मिली सफलता ने इन् शंकालुओं में से बहुतों को ‘आप‘ की ओर और इस विचार की ओर धकेला कि शायद अब आगे ‘आप‘ का हे ज़माना रहेगा और यही व्यवस्था भारत में चलेगी सो बेहतर है थोड़ा पहले ही ‘आप‘ के साथ हो लो, बच्चों और नाती पोतों को कहने को भी हो जाएगा कि एक बदलते समय में वे बदलाव लाने वालों के साथ खड़े थे|

पर उन्हें आशा नहीं थी कि अरविन्द केजरीवाल सरकार बनाने के बावजूद कबीर की तरह बीच बाजार लठ लेकर खड़े हो जायेंगे और सत्ता और व्यवस्था को ललकारेंगे कि जनता के हक उसको दो नहीं तो उन्हें भी चैन से सोने नहीं दिया जाएगा|

ये बड़े आनंद का विषय है कि ‘आप‘ के स्थायी और अस्थायी विरोधीगण पानी पी पीकर ‘आप‘ को कोस रहे हैं कि ‘आप‘ अराजकता फैला रही है और और भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं कि यह खत्म हो जायेगी| अरे, ‘आप‘ अगर खत्म हो जायगी तो इन्हें तो खुश होना चाहिए कि इनके मार्ग का काँटा अपने आप दूर हो गया पर इनके चेहरे की हवाइयां कुछ और ही बयान कर रहे हैं| कांग्रेस और भाजपा के नेता क्यों इतने परेशान हैं अगर ‘आप‘ वाले गलत कर रहे हैं| अगर वे संविधान अपने हाथों में ले रहे हैं तो उन्हें उठाकर जेल में ठूंस दो और अगर वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं तो आनंद मनाओ कि आगामी लोकसभा चुनाव में फिर से चुनावी समर दो सत्ताभोगी अनुभव प्राप्त दलों के बीच ही होगा और कोई एक शक्ति सरकार बनाएगी|

जिन्हें लग रहा है कि सब प्रचार के लिए हो रहा है उन्हें क्या किसी ने रोका है, निकलो घर से बाहर, सर्द रातें खुले आसमान के नीचे बिताओ और अपने दलों के लिए वोट जुटाओ| जनहित के मुद्दों पर कष्ट सहकर वोट जुटाएंगे तो जनता अपने आप उनका सम्मान करने लगेगी|

शरीर की अपनी सीमाएं हैं और सड़क पर भयंकर सर्दी में रात में सोकर सुबह उठने पर बीमार अरविन्द केजरीवाल का चेहरा तो लाजिम था कि इस बात की गवाही देता कि स्थितियां उनके शरीर पर असर डाल रही हैं पर उनके हौसले तो बीते दिन से भी ज्यादा मजबूत दिखाई दिए|

तेरी सुबह बता रही है तेरी रात का अफसाना

सुबह जैसा चेहरा लिए ‘आप‘ विरोधी तंत्र सक्रिय हुआ है उससे पता चलता है कि रात अरविन्द केजरीवाल पर नहीं पर इस तंत्र पर भारी बीती है|

और अगर ‘आप‘ सिर्फ और सिर्फ दिल्ली की सीमाओं में फैला एक संकीर्ण आंदोलन मात्र है तो क्यों परेशान हो रहा है ‘आप‘ विरोधी तंत्र?

कहते हैं एक चित्र हजारों शब्दों से ज्यादा सजीव होता है सन्देश देने के लिए| नीचे दिया चित्र भी कुछ कह रहा होगा|

संसार जानता है थोड़े से लोग बहुतों से अधिक हैं!

arvindkejriwal

विगत में देश को कई मर्तबा अराजकता के दलदल में धकेलने वाले भी गले फाड़ फाड़ चिला रहे हैं कि देश अराजकता की ओर ले जाया जा रहा है ‘आप‘ द्वारा|

बहुत साल नहीं बीते – भाजपा के उस समय के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी देश भर में रथ यात्रा करते हुए नफ़रत के कण बिखेरते चलते हैं, भाजपा का मुख्यमंत्री (कल्याण सिंह) हलफनामा देता है, और पार्टी के बड़े बड़े नेता (लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और उमा भारती आदि इत्यादि) भीड़ इकट्ठा करके इतिहास (रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवादास्पद ढांचा तोड़ना) से छेड़खानी करके देश को साम्प्रदायिक दंगों के हवाले कर देते हैं और ऐसे सीधे, भोले और भले लोग आज अराजकता की बातें कर रहे हैं जबकि सारी दिल्ली जानती है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले बिना और बिना क़ानून व्यवस्था को दिल्ली राज्य सरकार के अधीन बनाए बिना दिल्ली में सरकार (कोई भी दल सरकार बनाए) ढंग से दिल्लीवासियों की सेवा नहीं कर सकती| अगर कोई प्रस्ताव सालों से अटका हुआ है और दिल्ली में क़ानून व्यवस्था का ठीकरा दिल्ली सरकार के सिर फोड़ा जा रहा हो तो दिल्ली के मुख्यमंत्री को केन्द्र के सामने दबाव तो बनाना ही पड़ेगा कि पहले क़ानून व्यवस्था दिल्ली सरकार के अधीन करो और उसके बाद सरकार का प्रदर्शन देखो|

केन्द्र सरकार सरकारी दिल्ली (लुटियंस जोन्स) को छोड़कर बाकी सारी दिल्ली की क़ानून व्यवस्था दिल्ली सरकार के अधीन कर सकती है|

दिल्ली पुलिस अरविन्द केजरीवाल की ‘आप‘ सरकार के अधीन होगी तो इतना तो निश्चित है कि बी.एम्.डब्लू एक्सीडेंट केस, प्रियदर्शनी मट्टू, नीतिश कटारा और जेसिका लाल हत्याकांडों जैसे मामलों में कितना भी प्रभावी व्यक्ति न हो, पुलिस के ऊपर दबाव नहीं बना पायेगा और मृतक के परिवार वालों को केस में शुरू से ही क़ानून का निष्पक्ष साथ मिलेगा|

जनकवि सालों साल इस आशा में दिमाग, कलम और गले का उपयोग कर करते रहे कि कभी तो कोई नायक उठेगा जनसाधारण के हितों के लिए और ऐसे जनकवियों को रात दिन अपने लेखों और भाषणों में याद कर करके अपने को जनता से जुड़ा बताने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग और मुँह में भरी सर्दी में दही जम गया है जब सामने घटनाएं हो रही हैं और अब आग से खेलने की बात करने वाले एक सुर में गा रहे हैं – ज्यादा हो रहा है| इनके पूर्वजों के जीवन के घटनाक्रमों की मैपिंग संभव हो तो पाया जाएगा विगत में वे गांधी, सुभाष, भगत सिंह आदि और उनके कर्मों को भी ऐसे ही संशय में खड़े देखते रहे होंगे और सोच रहे होंगे कहाँ फंसा रहे हैं ये बंदे, थोड़ी बहुत परेशानी है गुलामी में पर अब तो आदत हो गई है सो चलने दो|

उलजलूल  तर्क देने वाले लोगों को कोई समझदार व्यक्ति समझाए कि उन्हें इस बात पर ऊर्जा लगानी चाहिए कि कैसे केन्द्र सरकार दिल्ली की क़ानून व्यवस्था को दो भागों में विभक्त करके वीआईपी लुटियंस जोन की सुरक्षा केन्द्र के पास रखकर बाकी सारी दिल्ली की क़ानून व्यस्था की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से दिल्ली सरकार के हाथों में दे सकती है| इन्ही पुलिस वालों की क्षमता निखर कर सामने आयेगी ईमानदार और जवाबदेह सरकार के साथ काम करने से|

कहा जा रहा है कि एक केन्द्रीय मंत्री के घर का शीशा टूटने पर सुरक्षा में तैनात बारह -तेरह पुलिसकर्मी निलंबित या बर्खास्त कर दिए गये थे अब इतने सक्रिय तंत्र को क्या हो गया है?

दिल्ली में कानून दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं है, और केन्द्र के गृह मंत्री और केन्द्र सरकार के सामने इस प्रश्न पर दिल्ली सरकार भी आम आदमी जैसी ही बेबस है| विचित्र लगते हैं लोगों के तर्क कि दिल्ली में अपराध होते रहें और दिल्लीवासी इस द्वंद में फंसे रहें कि उनकी अपनी सरकार से कैसे इस मामले में काम करवाया जाए? क्या दो राज्यों की सीमाओं पर क़ानून व्यवस्था बिगड जाती है? चंडीगढ और पंचकूला में दिक्कते आ रही हैं? अगर नहीं तो कैसे केन्द्र और दिल्ली राज्य सरकार के बीच कानून व्यवस्था को लेकर स्पष्ट विभाजन होने से समस्या हो जायेगी? यह एक ज्वलंत समस्या है और केन्द्र सरकार को अपनी पूरी क्षमता इसका समाधान देने में लगा देनी चाहिए| समस्या को ताला क्यों जा आरहा है? अरविन्द केजरीवाल की सरकार तो भागने वाली है नहीं इस समस्या से मुँह मोड़कर, आज केन्द्र की सत्ता उन्हें वहाँ से हटा सकती है, जेल में बंद कर सकती है पर जब भी वे आजाद होंगे यही मांग उठाते रहेंगे| दिल्ली राज्य का वाजिब हक उसे दे दो और सर्वत्र शान्ति बरपा दो|

एक बात तो तय है कि अरविन्द केजरीवाल नामक ऊर्जा नखदंत विहीन दिल्ली सरकार में जाया करने के लिए नहीं है| केन्द्र सरकार और पुराने दलों को भली भांति समझ लेना चाहिए कि जनता अब इस जागृति से भर चुकी है कि

सरकारें देश के लिए होती हैं, देश सरकारों के लिए नहीं होता|

जनवरी 19, 2014

धुंध में…

जब धुंध में fog-001

हाथ को हाथ नहीं

सूझता था

मैं चला उसके साथ

सीमेंट की

पुरानी रोड पर !

एक दूसरे को

तलाशते, पहचानते और जानते

हम चले गये दूर तक

और तब मैंने पाया

कि हम तो एक से हैं

अलग अलग खोलों के अंदर

मुझे बेहतर महसूस हुआ

ज्यादा शान्ति और संतुष्टि

ने मुझे घेर लिया

और मैं पहले से ज्यादा इंसान बना!

Yugalsign1

जनवरी 19, 2014

घर उससे है…

suhasini-001ढूँढती रहती है आँखे सिर्फ उसको …

मेरे  मकान में घर उससे है

चार दीवारों में वक़्त की  कैद का,

मैं मुन्तजिर नहीं रहता

चार गिर्द चेहरे अजनबी सी भीड़ के

उस एक के न होने का अहसास हैं

वो है पास तो

फिर भीड़ की ज़रुरत क्या है

जो  उतर गया हो दिल में,

फिर कैसे दिल से उतर जाए

Rajnish sign

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