Archive for जनवरी, 2014

जनवरी 30, 2014

दूर नज़र के छुपा बैठा है

मन की भटकन Dk-001

खोज में किसकी

पता नहीं क्यूँ

चैन नहीं है

क्या पाना है

क्या खोया है

दूर नज़र के पार देश में

कोई छुप के जा बैठा है

कैसे उसको पास बुलाये

पंख लगा कोई कैसे जाए

मन के साथ में तन भी तो है

तन के साथ रहे न पल भर

मन बस उसके संग हो जाए

Rajnish sign

जनवरी 30, 2014

मीठे गीत जीवन के

कितना छोटा है जीवन

यह तो मीठे गीतों

और

आराम से बहती हवा

का आनंद लेने के लिए है

पर हरेक कहता है

जीवन को शांतिपूर्वक जीना संभव नहीं ,

और हरेक को मुट्ठी तान कर

जीवन में  कठिन, और जटिल रास्तों से जूझना चाहिए |

लेकिन मुझे जो दिखाई देता है

जहां तक मेरी समझ जाती है

जहां तक दृष्टि देख सकती है

जहां तक मेरे हाथ पहुँच सकते हैं

जहां तक मैं चल सकता हूँ

– गीत रहेंगे और हवा के झोंके भी बहेंगे

मुस्कुराहट तुम बने रहना

तमाम बाधाओं और शत्रुओं

से घिरे होने के बावजूद

मैं इन् सबको साथ लेकर

चलता रहूँगा

इनसे पार जाने के लिए

Yugalsign1

जनवरी 28, 2014

जिस्म ही तो नहीं था

मैं जिसे बरसों चाहा किया

वो जिस्म में ढला तो था

पर जिस्म ही नहीं था…

जिस्म से इतर ही सब कुछ था…

वो था सबसे अलग जो

उस जिस्म के अन्दर में था…

Rajnish sign

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जनवरी 24, 2014

आज भी हम बिलकुल वैसे हैं…

कभी कभी बातों के राही

मुड़ जाते हैं

यादों की पगडण्डी पर क्यूँ?

कुछ यादें जो बंद करीं थी

तहखानो में

बहुत दबा कर

सारे चिन्ह मिटा डाले थे

वक़्त की जिन पर धूल जमाई

सोच लिया था

खो जाएँगी

आज मिलीं तो पता हुआ

कि

आज भी वो बिलकुल वैसी हैं

आज भी हम बिलकुल वैसे हैं…

Rajnish sign

जनवरी 22, 2014

सर्दी के सफ़ेद बादल और रक्तिम लौ

सर्दी में बादल fireplace-001

पुकार लगाते तो हैं

पर बहुधा बिन पानी चले आते हैं

आते हैं

तो हर चीज को सफेदी से ढक देते हैं

चारों ओर ऐसा प्रतीत होता है

जैसे धुंध ने घर कर लिया हो

शामें धुंधला जाती हैं

मेरे कमरे में अंधियारा बढ़ जाता है

मैं गमन कर जाता हूँ

बीते काल में –

मोमबत्ती के हल्के प्रकाश से

भरे कमरे में!

जब आतिशदान में लकडियाँ जलती हैं

तो कभी भी बोल नहीं पाता हूँ

बस खो जाता हूँ

आग की लपटों से बनती बिगड़ती आकृतियों में|

तुम्हारी त्वचा का गोरापन ओढ़ने लगता है

हल्का लाल-गुलाबी रंग

जब तपन की गहन तरंगें

और लालसा घेर लेती है

तुम्हारा खूबसूरत चेहरा

दमकने लगता है ऐसे

जैसे तालाब से कमल खिलकर निकलना शुरू करने लगता है

जिस्मानी  उतार चढ़ाव

चमकने लगते हैं

और एक गर्म एहसास चारों ओर बहने लगता है

और तुम्हे और मुझे अपने पंखों में समेट लेता है

सब कुछ उड़ने लगता है

ऐसे जैसे सब कुछ बादल ही हो गया है

कमरे में निस्तारित होने लगता है

श्वेत धीरे-धीरे लाल में

ऐसा लगने लगता है

हमारे जिस्म पिघल जायेंगे

मोमबत्ती की लौ

मोटी हो और तेजी से जलने लगती है

बादल रक्तिम लाल हो जाते हैं

और मुझे प्रतीत होता है

कि सर्दी के बादल लाल तप्त हो गये हैं

और वास्तव में

वे बिन पानी के ही हैं!

Yugalsign1

जनवरी 21, 2014

उधड़ी सीवन…

कुछ ज़ख्म सिले थे

वक़्त ने

नकली मुस्कानों का लेप लगा के

दर्द छुपाया खोखले कहकहों में

कल कुरेद कर देख लिया

सीवन उनकी उधड़ गयी कल

दर्द अभी तक टीस रहा है…

परत जमी भर  थी…

ज़ख्म नहीं भरा था

अभी तक हरा था…

Rajnish sign

जनवरी 19, 2014

धुंध में…

जब धुंध में fog-001

हाथ को हाथ नहीं

सूझता था

मैं चला उसके साथ

सीमेंट की

पुरानी रोड पर !

एक दूसरे को

तलाशते, पहचानते और जानते

हम चले गये दूर तक

और तब मैंने पाया

कि हम तो एक से हैं

अलग अलग खोलों के अंदर

मुझे बेहतर महसूस हुआ

ज्यादा शान्ति और संतुष्टि

ने मुझे घेर लिया

और मैं पहले से ज्यादा इंसान बना!

Yugalsign1

जनवरी 19, 2014

घर उससे है…

suhasini-001ढूँढती रहती है आँखे सिर्फ उसको …

मेरे  मकान में घर उससे है

चार दीवारों में वक़्त की  कैद का,

मैं मुन्तजिर नहीं रहता

चार गिर्द चेहरे अजनबी सी भीड़ के

उस एक के न होने का अहसास हैं

वो है पास तो

फिर भीड़ की ज़रुरत क्या है

जो  उतर गया हो दिल में,

फिर कैसे दिल से उतर जाए

Rajnish sign

जनवरी 18, 2014

ज्ञान

बच्चों की दुनिया की सच्चाई!

अब जाकर है मैंने पाई,

देखे सारे खेल-खिलौने

वयस्कों के ओढ़ने-बिछौने

आकार-प्रकार और रूप बदलकर

खेलते रहते हम जीवन भर!

बस,

करते रहते यह व्यवहार

निपट भूलकर वह सब सीख

जो बरजते आए बच्चों पर

वही करें लागू अपने पर

तो जीवन हो जाए मधुरकर!

Yugalsign1

जनवरी 17, 2014

बहूँगा धमनियों में इश्क बन के…

मैं  गुज़र भी जाऊंगा अगर,

तो बीत  जाऊँगा  नहीं

रहूँगा यहीं हवाओ में आस पास घुल के

महसूस कर सकोगी मुझे

अपनी आती जाती साँसों में

ये बेनाम दर्द बहेगा

धमनियों में इश्क बन के…

Rajnish sign

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