अप्रैल 23, 2014

अरविंद केजरीवाल : हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के शातिराना खेल का हिस्सा है मीडिया

Arvindbenaras15 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल बनारस पहुंचे भारत के चुनाव की सबसे बड़ी जंग में भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी को चुनौती देने के लिए| बनारस पहुँचते ही वे सड़क पर निकल पड़े और पहुँच गये एक ऐसे परिवार के घर जिनका एकमात्र कमाऊ सदस्य दुर्भाग्य से मेनहोल में घुसकर सीवर की सफाई करने के दौरान मृत्यु को प्राप्त हो गया था| शोकग्रस्त परिवार से मिलने के बाद उन्होंने एक संवाद कार्यक्रम में शिरकत की जहां लोगों ने उनसे विभिन्न तरह के सवाल पूछे| 

अगले दिन वे रोहिण्या, जो कि काशी देहात का क्षेत्र है, में पहुँच गये और गाँवों में रैलियां और सभाएं करते रहे और बीच में अपने रास्ते में अपने प्रशंसकों से रुक कर मिलते रहे| एजाज़ अशरफ कपारफोड़वा गाँव में अरविंद केजरीवाल के वाहन पर सवार हो गये और हर्सोस गाँव आने तक जहां एक और रैली थी, २०-२५ मिनट अरविंद केजरीवाल से सवाल पूछते रहे|

जब आप कुछ दिन पहले वाराणसी आए थे तो आप पर अंडे और स्याही फेंके गये थे| तब से आप पर कई बार हमले किये ज चुके हैं| आप पर इन हमलों का क्या असर पड़ा है? 

ये हमले वाराणसी में शुरू नहीं हुए|  कब शुरू हुए ये हमले? ये शुरू हुए जब मैंने मार्च की शुरुआत में गुजरात की यात्रा की| क्या यह केवल एक संयोग है या इससे अधिक कुछ है? मैं वास्तव में नहीं जानता| हम बहुत बड़े लोगों का विरोध कर रहे हैं और जाहिर सी बात है कि वे लोग चुप तो बैठेंगे नहीं| वे हम पर हमले करेंगे|

 इन हमलों ने व्यक्तिगत रूप से आप पर क्या प्रभाव डाले हैं|

ऐसे  हमलों से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ था क्योंकि ये तो अपेक्षित थे| मुझे ऐसा भी लगता है कि चुनाव होने तक ये हमले हल्के रहेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि मुझ पर घातक हमला करने से चुनाव में उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है|  पर चुनाव के बाद, मुझे लगता है वे मुझे छोड़ेंगे नहीं| वे लोग कुछ करेंगे| मोदी और अंबानी जैसे लोग … मुझे बताया गया है कि उधोगपतियों को धमकाया गया है, संपादकों को धमकाया गया है|  They  उन्हें कहा गया है कि मोदी सत्ता में आ रहे हैं और मोदी किसी को नहीं छोड़ते और वे बदला हमेशा लेते हैं| तो वे मुझसे भी बदला लेंगे…पर मैं तैयार हूँ किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए|

आपका परिवार कैसे लेता है इन सब बातों को?

वे नर्वस हैं| मैं उन्हें शांत करने की कोशिश करता हूँ| मुझे लगता है उनके पास अब कोई विकल्प भी नहीं है (हँसते हुए)

आप मार्च में भी वाराणसी आए थे| तब और अब के बीच आपके चुनाव प्रचार ने किसी प्रगति की है?

यह केवल मेरा चुनाव प्रचार नहीं है| यह तो जनता का चुनाव प्रचार है| यदि यह मेरा चुनाव प्रचार होता तो अलग बात होती और मैं आपके सवाल का जवाब दे सकता था| सांसद बन्ना मेरा लक्ष्य नहीं  है| मेरा लक्ष्य लोगों को जागरूक बनाना है| उन्हें बदलाव के लिए तैयार करना है| यदि वे इस बार जाग जाते हैं अच्छा है अन्यथा अगले चुनाव में सही| मेरी लड़ाई जारी रहेगी|

“आप” के उम्मीदवार पर नालंदा, बिहार में भी  हमला किया गया था|  कुछ उम्मीदवारों ने अपना नामांकन वापिस ले लिया| क्या ये दूसरों द्वारा डाले दबाव के कारण है…? T

दबाव एक कारण हो सकता है| कुछ उम्मीदवारों ने नामांकन वापिस लिए हैं क्योंकि हमारी पार्टी के पास उन्हें देने के लिए पैसे नहीं थे और उनके पाने पास भी पैसे नहीं थे| तो उन्होंने अपने नाम वापिस ले लिए यह कह कर कि किसी और उम्मीदवार को टिकट दे दिया जाए|  उन्होंने चुनाव से भले ही नाम वापिस ले लिए हों पर वे पार्टी के साथ खड़े हैं| दबाव भी एक कारण हो सकता है पर मेरे पास इस बात का कोई सुबूत नहीं है| नालंदा से हमारे उम्मीदवार पर किया हमला बताता है कि आज की राजनीति कितने एअमान्वीय हो चुकी है|

AK banaras1आप वाराणसी में मुस्लिम समुदाय से भी मिले हैं| आपको कैसी प्रतिक्रया मिली उनसे? 

स्पष्टत: मुस्लिम मोदी को हराना चाहते हैं| लेकिन हम इसे दूसरी तरह से देख रहे हैं| यदि इस बार ऐसा संभव हो कि हिंदू और मुसलमान मिल कर वोट दें बिना किसे प्रकार के ध्रुवीकरण का शिकार हुए हुए… आपको पता ही है कि मोदी की राजनीति ध्रुवीकरण वाली राजनीति है| क्या हम सभी संप्रदायों और जातियों के लोगों को एक साथ ला सकते हैं चुनाव लड़ने के लिए?  मुख्य प्रश्न यह है हमारे सामने| और यही हमारा ध्येय भी है|

मूलत: हमारी जंग तो सच्चाई और ईमानदारी के लिए है| ये तो सार्वभौमिक मूल्य हैं चाहे हिंदुत्व के एबात करें या इस्लाम की, या सिख धर्म की बात करें या जैन धर्म की| ये मूल्य हरेक धर्म में उपस्थित हैं| हमारी लड़ाई समाज में प्रेम और इंसानियत को कायम रखने की है|  उनकी राजनीति नफ़रत भरी है जबकि हम प्रेममयी राजनीति करना चाहते हैं|  उनकी राजनीति भ्रष्टाचार की पोषक भी है जबकि हम ईमानदारी की स्थापना राजनीति में करना चाहते हैं| यह अनिवार्य हो गया है कि सभी लोग एक साथ आएं और इस लक्ष्यपूर्ति में सहयोग दें|  I

तो एक तरह से वाराणसी उस राजनीतिक बदलाव की राजधानी बन सकता है जो आप और आपकी पार्टी दोनों देखना चाहते हैं?

ईश्वर ने वाराणसी और अमेठी के लोगों के हाथ में देश की राजनीति बदलने की कुंजी दे दी है| यदि लोग बाहर निकलते हैं और मोदी को वाराणसी में और राहुल गांधी को अमेठी में हरा देते हैं तो भारत की राजनीति में भूचाल आ जायेगा| कांग्रेस और भाजपा दोनों खत्म हो जायंगे| एक साल बाद फिर से चुनाव होगा और आप देखेंगे कि नये किस्म के लोग राजनीति में शामिल होंगे|

मुख्तार अंसारी ने चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली है| लोग इस बात को कई तरीकों से देख रहे हैं| (2009 में, मुख़्तार अंसारी, एक कथित माफिया, बसपा के टिकट पर वाराणसी से लड़ा था और भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से  करीब 17000 वोटों से हार गया था) )

मुख्तार अंसारी इस देश का एक नागरिक है और यह उसकी स्वतंत्रता है कि वह चुनाव लड़े या अपना नाम वापिस ले ले| यह उस पर निर्भर करता है| लेकिन हम उसके संपर्क में नहीं हैं|

क्या आपने एक बार भी वाराणसी से हार जाने के बारे में सोचा है? क्या आपको हार का भय नहीं है?

जीत हो या हार, मैं इन् बातों की चिंता नहीं करता|  जीत या हार कुछ भी मेरी नहीं होगी| यह लोगों की जीत या हार होगी| मेरा लक्ष्य लोगों को यह समझाना है| मेरे हाथ में सिर्फ कर्म करना है फल तो ईश्वर के हाथ में है|

क्या आपको लगता है कि मीडिया के साथ आपके संबंधों में सुधार आ रहा है?

निश्चित रूप से नहीं! यह फेज तो बहुत महत्वपूर्ण है उनके लिए|  बहुत बड़ी मात्रा में धन निवेश  किया गया है मीडिया में और मीडिया-मालिकों और संपादकों को धमकियां दी गई हैं| मैं कुछ ऐसे रिपोर्टर्स को जानता हूँ जिनके बीट को केवल इसलिए बदल दिया गया क्योंकि उन्होंने हमारे पक्ष में साधारण से ट्वीट कर दिए|

क्या “आप” ने Times Now का बहिष्कार किया हुआ है? “आप” के प्रतिनिधि उस चैनल पर दिखाई नहीं देते| 

 हाँ, हम लोग कुछ टीवी चैनल्स से दूरी बना कर चल रहे हैं| क्योंकि हमने देखा कि वे हमारे खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे थे और गलत तरीकों से भाजपा को प्रचारित करने के लिए हमें निशाना बना रहे थे|  

तो हमने निर्णय लिया कि ऐसे चैनल्स के साथ बातचीत का कोई फायदा नहीं है| क्योंकि जो भी हम बोलेंगे वे लोग उसे तोडमरोड कर ही प्रस्तुत करेंगे|  तो हमने तय किया कि वे जो चाहें वो दिखाएँ हमारे बारे में अगर उनको अपनी ही मर्जी से ही तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना है तो उनसे बात करके भी क्या लाभ होगा? हम लोग बहुत छोटे हैं वे बहुत बड़े हैं, बहुत शक्तिशाली हैं Times Now, India TV, India News, Dainik Jagran.

वाराणसी में आपका पहला पड़ाव एक दलित बस्ती में था और वहाँ का एक आदमी मेनहोल में सफाई करते हुए मारा गया था| पर टीवी आपकी काजी से मुलाकत को ही दिखाता रहा|

मीडिया पक्षपाती है| It यह भी हिंदू-मुस्लिम का ध्रुवीकरण काने वाले तंत्र का एक हिस्सा है| मीडिया स्वतंत्र नहीं है| सारे मीडिया के बारे में ऐसा नहीं कहूँगा| कुछ मीडिया अच्छा भी है| कुछ रिपोर्टर अच्छे हैं|  कुछ मीडिया के मालिक भ्रष्ट हो चुके हैं| पत्रकार मालिकों के दबाव के सम्मुख टिक नहीं पाते| उन्हें नौकरी की रक्षा करनी पड़ती है|

15 अप्रैल को वाराणसी के प्रभावशाली व्यापारियों के साथ आपकी भेंट हुयी| मैंने उनमें से कुछ के साथ बात की और मुझे लगा कि उनमें से बड़ी उम्र के लोग “आप” से भयभीत थे| 

वे “आप” से क्यों भयभीत हैं? भेंट में उन्होंने हमारी अर्थनीति के सन्दर्भ में कुछ शंकाएं व्यक्त कीं| मैंने उनके सभी शंकाओं का निवारण किया और मुझे लगा जी वे लोग बेहद प्रसन्न थे| |मैंने सुबूतों  के साथ उनसे स्पष्ट कहा और मैंने उन्हें अपने पुराने भाषण दिखाए कि मैं कोई अभी कहानियां नहीं बना रहा उनके सामने, बल्कि हमारी अर्थनीति में एक निरंतरता बनी रही है| उन्होंने इस बात को सराहा| मैंने उनसे कहा कि सबसे बड़ा सुबूत तों आँखों देखे अपने अनुभव का है|  मैंने उन्हें बताया कि दिल्ली में  49 दिनों की सरकार के दौरान मैंने दिल्ली के व्यापारियों और उधोगपतियों के साथ भेंट की और हमने कानूनों को आसान बनाने की चेष्टा की| वैट को आसान बनाया| हमने उधोगपतियों के लिए कुछ सार्थक करने की कोशिश की|   मैंने उन्हें बताया कि वे मेरे कहे पर न जाकर मेरे कहे की खुद ही जांच कर लें|  मुझे तों कहीं से नहीं लगा कि वे हमसे भयभीत थे|

(कार रुकती है, लोगों का झुण्ड उनसे बाहर निकलने के लिए अनुरोध करता है| लोग उन्हें माला पहनाते हैं और उनके समर्थन में नारे लगाते हैं| थोड़ी देर में वे वाहन में वापिस आ जाते हैं| मैं पूछता हूँ- कितना थकान भरा है यह सब संभालना?)

चुनाव प्रचार बेहद थकान वाला काम है| आपको पता है उनमें से एक ने मुझसे कहा कि एक आदमी के दो जगहों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए| उसने कहा कि उसे भी दो क्षेत्रों से वोट देने की सुविधा मिलनी चाहिए क्योंकि नेता तों दो जगह से चुनाव लड़ लेते हैं|   गाँव वालों के पास बहुत विचार हैं|

मुझे यह भी बताया गया कि व्यापारियों के समूह में युवावर्ग “आप” के प्रति ज्यादा उत्सुक और खुला हुआ था|

हाँ मुझे भी ऐसा महसूस हुआ|लेकिन वास्तव में किसी व्यापारी को “आप” से डरने की जरुरत नहीं  है|

आपको भारत  की संसदीय प्रतिनिधि  प्रणाली में क्या कमियां लगती हैं?

हमारे लोकतंत्र में कुछ समस्याएं हैं| जैसे लोकसभा सीट के क्षेत्र बहुत बड़े बड़े हैं और एक प्रतिनिधि लगभग 20-25 लाख लोगों का अप्रतिनिधित्व करता है| बड़े लोकसभा क्षेत्रों को बांटने की जरुरत है|  और सांसद और विधायकों के पास वास्तव में कोई शक्ति नही हैं जबकि लोगों की उनसे अपेक्षायें बहुत होती हैं|  शक्तियां ब्यूरोक्रेट्स को दी गई हैं जो कि जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं| उन्हें मुख्या धारा में लाये जाने की जरुरत है| (गवर्नेंस तंत्र विकसित करने की जरुरत है)

आपकी पंजाब यात्रा कैसी थी?

बहुत अच्छी, देवीय, बहुत ही अच्छी| मुझे इतने बढ़िया रेस्पोंस की अपेक्षा नहीं थी| मैंने इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सड़कों पर आते हुए नहीं देखा|  हमें पंजाब में अच्छा प्रदर्शन करना चाहिए|

AK nominationतो लोकसभा चुनाव में कितनी सीटें “आप” को मिल जायेंगीं?

(हँसते हुए) आपको सच बताऊँ तो मुझे इन सब बातों की चिंता नहीं है, कभी नहीं रही| मेरा मानना रहा है कि – कर्म करते रहो ईश्वर अपने आप फल देगा|

“आप” की क्या भूमिका संसद में रहेगी?

(हँसते हुए) अगर हमें बहुमत मिलता है तो हम सरकार चलायेंगे…

अरे बहुमत नहीं…

अन्यथा विपक्ष में बैठेंगे|

किसी के साथ गठबंधन नहीं?

नहीं!

वाराणसी में 12 मई को चुनाव के बाद आपकी क्या योजना है?

मैं जयपुर जाउंगा विपस्सना करने| मतगणना वाले दिन भी मैं ध्यान में रहूंगा| मैं वहाँ  20 मई तक रहूंगा|

अगर “आप” चौंकाने वाले परिणाम लेकर आती है और आपकी जरुरत हो सरकार बनाने की प्रक्रिया में?

और लोग निर्णय लेंगें| पार्टी सिर्फ अरविंद केजरीवाल तों है नहीं|

क्या आप हरियाणा और बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?

हम लोग लोकसभा चुनाव के नाद तैयारी शुरू कर देंगे|

आपको फंड कहाँ से मिलेगा?

जनता  के पास से फंड आएगा| यह उनका चुनाव है| 

By Ajaz Ashraf
मूल साक्षात्कार अंग्रेजी में – Arvind Kejriwal interview

अप्रैल 22, 2014

गुजरात का विकास : मोदी से बहुत पहले की कहानी है!

(Reetika Khera, Assistant Professor, Humanities and Social Sciences department, IIT-Delhi)

मेरी ही उम्र का एक सोलह साल का लड़का पटना से बड़ोदा आया, जो कि मेरा शहर था| उसके लिए बड़ा ही आश्चर्यजनक यह देखना कि बड़ोदा में बिजली नियमित रूप से रहती थी| सड़कें बहुत अच्छी थीं| महिलायें देर रात्री में भी सड़कों पर दिखाई दे जाती थीं, अकेली जाती हुयी या दोपहिया वाहन पर, आकर्षक कपड़े पहने हुए, बैकलेस चोली पहने हुए गरबा करती हुयी… उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता था| मैंने कभी बिहार नहीं देखा था अतः मेरे लिए अचरज भरा था उसका यूं आश्चर्यचकित रह जाना|

एक और समय, जब मेरे पिता अपने व्यापार के सिलसिले में पंजाब के दौरे पर ज रहे थे| ट्रेन में उन्हें एक पंजाबी व्यापारी मिले, और दोनों व्यापार में लाभ की बातें करने लगे| जब मेरे पिता ने उनसे बिजली के बिल के बारे में बताया तो वे सज्जन अचरज में पड़ गये और बोले,” आप को बिजली का बिल देना पड़ता है तब लाभ कैसे होता है?” ऐसा सुनकर मेरे पिता को भी उतना ही आश्चर्य हुआ जैसा मुझे पटना से आए लड़के की बातों से हुआ था|

ये दनों घटनाएं 1989 की हैं| आजकल दूसरे प्रदेशों से गुजरात में पहली बार जाने वाले लोग ऐसे ही आश्चर्यचकित होकर बातें करते हैं जैसे बिहार से आआ हुआ 16 वर्षीय लड़का करता था| वास्तव में गुजरात में नियमित बिजली आपूर्ति, अच्छी सड़कें, विकसित होता उधोग जगत, अच्छे सरकारी स्कूल, मिड-दे मील (1984 से सुचारू रूप से चल रहा है), आंगनवाडी (बालवाड़ी), राज्य परिवहन की बसें, और जनहित के बहुत से कार्यों समेत बहुत कुछ था (और है) जिसकी प्रशंसा की जा सकती थी (आज भी की जा सकती है)| बहुत से क्षेत्रों में गुजरात ने पहल की थी| केरल जैसा नहीं पर उससे बहुत पीछे भी नहीं था नई शुरुआत करने में|

प्री-स्कूल में, हम लोगों को ठंडे दूध का एक गिलास मिलता था (हम लोग इसलिए पीते थे क्योंकि दूध रंगबिरंगे प्लास्टिक के गिलासों में मिलता था)| वर्तमान में मीडिया न्यौछावर हो जाता है इस खबर पर कि किसी राज्य ने लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्हें मुफ्त में साइकिलें देने की योजना पर अमल करना शुरू किया है| गुजरात में बहुत समय से लड़कियों को मुफ्त में शिक्षा दी जाती रही है, कम से कम तबसे तो निश्चित रूप से जब मैं आठवीं से बारहवीं कक्षाओं की पढ़ाई कर रही थी (सहायता प्राप्त स्कूलों में भी)|  विश्वविधालय में मेरी बी.ए   (1992-1995) का शुल्क  मात्र 36 रुपये प्रति वर्ष था|

ग्रामीण इलाकों में भी दृश्य अच्छा था| स्कूली छात्र के सरंक्षित रूप में हमने प्रकृति-शिक्षा-कैम्प के द्वारा ग्रामीण गुजरात देखा, और हम गिर के वनों में और पिरोटन द्वीप पर भी गये| स्कूल की वार्षिक पिकनिक के दौरान नर्मदा के किनारे भी गये| बड़े होने पर मैंने जाना कि गुरुदेश्वर, ज़देश्वर, और उत्कंठेश्वर गुजरात के आदिवासी इलाकों के भाग हैं जो कि तुलनात्मक रूप से राज्य का पिछडा इलाका माना जाता था| तब भी उस समय जैसी सड़कें हमने वहाँ देखीं, वैसी सड़कें, शोध के सिलसिले में 2005-2007 के दौरान मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय राजमार्गों पर भे इन्हीं पाईं (हालांकि अब वहाँ भी कफी सुधार हो गया है)| केवल आज के दौर में ये स्थान ऐसे हाइवे पा रहे हैं जैसे गुजरात नब्बे के दशक में ही इस्तेमाल में ला रहा था| पिछले चौदह सालों में देश के बहुत सारे राज्यों में शोध के सिलसिले में दौरे करने के बाद मुझे यह एहसास हो गया है कि क्यों मेरे विधार्थी जीवन में भी गुजरात में पहली बार आने वाले वहाँ पर विकास का स्तर देखकर क्यों आश्चर्यचकित रह जाते थे और कि गुजरात ने वास्तव में बहुत पहले से ही अच्छा इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लिया था|

बड़ोदा को अपने क्षेत्रीय और धार्मिक बहुलतावाद पर गर्व रहा है| स्कूल में मेरे साथ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, और सिंधी छात्र पढते थे| मुझे आज भी ओणम, पोंगल, और पतेती के अवसर पर मिलने वाली दावतों की याद है| पर वर्तमान में दुखद रूप से सब बदल चुका है| 2007 में जब संजय दत्त को आतंकवादियों से संपर्क करने के कारण सजा हुयी थी तब मेरी सात साल की भतीजी ने मासूमियत से पूछा था,” वह आतंकवादी कैसे हो सकता है, वह तो मुस्लिम नहीं है?”

ऐसा नहीं है कि गुजरात में पहले साम्प्रदायिक भावनाएं नहीं थीं| पर बड़े होने तक इन् सब भावों से कभी भी सीधी मुठभेड़ नहीं हुयी थी|

गुजरात में पाले पढ़े होने में सबसे ज्यादा (स्वादिष्ट खाद्य सामग्रियों के अलावा, जिनमें हमेशा ही चीनी नहीं डाली जाती!) महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगती है  वो है स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के भाव जो मुझे मिले क्योंकि चारों और बेहद सुरक्षित वातावरण था|  दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से एम ए (1995-7),  करते हुए मैं कई बार राजधानी एक्सप्रेस से सुबह तीन बजे बड़ोदा पहुँची और मेरे लिए यह बड़ा स्वाभाविक ठ अकी मैं अकेली स्टेशन से बाहर ऑटो स्टैंड पर जाऊं और उतना ही स्वाभाविक था मेरे औटो में बैठने के बाद मीटर चालू करके ऑटोवाले का मुझसे पूछना कि मुझे कहां जाना है? गहरी नींद में सोये हुए अपने माता-पिता को मैं जाकर जगाती थी| उन्हे कभी चिंता में नींद खराब नहीं कानी पड़ी कि मैं कैसे अकेली घर तक आउंगी|  दिल्ली में ऐसा कर पाना आज भी एक स्वप्न सा लगता है, मेरे जैसे सामाजिक पृष्ठभूमि के इंसान के लिए भी| बिना भय के कहीं भी घूमने की स्वतंत्रता का मोल हम अक्सर हल्के में लेते हैं|

इन स्व-अनुभवों से भरे किस्सों के अलावा तथ्य क्या कहते हैं? नीचे दी गई तालिका में गुजरात और राष्ट्रीय स्तर परपांच समाजिक और आर्थिक सूचकांकों का औसत दिया गया है 90 के दशक के बाद के काल में| आंकड़े बताते हैं कि नब्बे के दशक में ही गुजरात का औसत दश के औसत से बेहतर था| तब गुजरात देश के दस ऊँचे राज्यों में से एक था| 2000 के बाद के दशक में यह सफल नहेने हो पाया अपनए ही पिछले प्रदर्शन को कायम रखने में (मुफ्त शिक्षा, मिड-डे मील, शिशु-विकास योजनाएं, विस्तृत और उच्च विकास आधारित इकोनॉमी)| अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात का सामाजिक सूचकांक नीचे गिरा है|  स्पष्टतः गुजरात कोई एक दिन में नहीं बना था और गुजरात को बनाने में किया गया कठोर परिश्रम मोदी काल से कम से कम एक दशक पहले की बात है|

मेरा यह कहना नहीं है कि अस्सी और नब्बे के दशकों में गुजरात के पहले के विकास का श्रेय कांग्रेस को दिया जाना चाहिए जिसने उन सालों में सबसे अधिक सालों तक गुजरात में सत्ता चलाई| उपलब्धियों की निरतंरता ऋणात्मक सूचकांकों की रोशनी में भी देखी परखी जा सकती है| भ्रष्टाचार कम से कम अस्सी के दशक से हमारे साठ साठ विचरण कर रहा है| नब्बे के दशक में एक चुटकला प्रसिद्द था – “CM”, “Chief Minister” का संक्षिप्तीकरण न रहकर “Crore-Making” का संक्षिप्त रूप हो गया था – CM के बारे में यह माना जाने लगा था कि वह एक दिन में करोड़ों कमा रहा था|  मुझे बताया गया है कि गुजरात में आजकल अगर सारी नहीं तो अधिकतर प्रोपर्टी डील काले धन के इस्तेमाल के बगैर सम्पन्न नहीं होतीं| देश के बाकी स्थानों की तरह ही रोजमर्रा के स्तर पर भ्रष्टाचार घर कर चुका है वहाँ| आपातकालीन स्थितियों में यात्रा करने की मजबूरी के कारण एक व्यक्ति को ट्रेन छोटने से दो घंटे पहले स्टेशन पर 1000 रुपयों की घूस देकर टिकट मिला|

भाजपा की प्रचार मशीनरी गुजरात को “ईश्वर की अपनी धरती” के रूप में प्रचारित कर रही है| जबकि उत्तर भारतीय मैदानों से गये आदमी की निगाहों से देखें तो गुजरात की विकास की कहानी मोदी काल से बहुत पहले ही कायम हो चुकी थी| दक्षिण की दृष्टि से देखें तो गुजरात एक धनी राज्य दिखाई देता है पर सामाजिक सूचकांकों के आधार पर पिछडा हुआ राज्य है, तमिलनाडु की तुलना में, केरल की बात तो अलग ही है|

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Original article

अप्रैल 18, 2014

अरविंद केजरीवाल : कहानी डेंटिस्ट की ज़ुबानी

AKeatingअरविंद से मेरी पहली मुलाक़ात तब हुयी जब वे एक मरीज के तौर पर मेरे पास आए| दांत में दर्द के कारण वे पिछली रात सो नहीं पाए थे| मैंने जांच के बाद उन्हें बताया कि या तो उन्हें रूट-कैनाल करवाना पड़ेगा या फिर दांत निकलवाना पड़ेगा|

अन्य डाक्टरों के मुकाबले मैं काफी सस्ता था पर जब मैंने उन्हें रूट कैनाल करवाने का खर्चा बताया तो उन्होंने कहा कि वे यह खर्च वहन नहीं कर सकते| उन्होंने दांत उखड़वा लिया|

मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक IRS अधिकारी मेरे जैसे सस्ते डेंटिस्ट का इलाज भी वहन नहीं कर सकता|

उसके बाद दीपावली की शाम मैं बाजार से दिए आदि खरीदने घर से बाहर निकला तो देखा कि केजरीवाल दंपत्ति अपनी इमारत के बाहर एक मेज के पीछे खड़े थे और मेज पर तोहफे रखे हुए थे|

यह सब क्या है? मैंने पूछा!

अरविंद बोले,”दीवाली से पहले ही घर के दरवाजे के बाहर मैंने नोटिस लगा दिया था”नो गिफ्ट्स”, पर तब भी लोग तोहफे दे गये| यह भी दीवाली की आड़ में जबर्दस्ती घूस देने वाली बात है- जैसे बच्चों के लिए मिठाई”|

उन्होंने बताया कि वे वहाँ तोहफों को बेचने के लिए खड़े हैं और इनसे होने वाली कमाई को एनजीओ को दान कर देंगें|

मेरे लिए एक IRS दंपत्ति का इस तरह सड़क पर खड़े होकर सामान बेचना अकल्पनीय था| मैं स्तब्ध रह गया|

मुझे गुस्सा आता है जब लोग उनके ऊपर स्याही फेंक देते हैं, उन पर शारीरिक हमले कर देते हैं| पर अरविंद इन् सब हमलों से प्रभावित नहीं होते| मैं क्रोघित हो उठता हूँ क्योंकि मेरे लिए अरविंद का दर्जा बहुत ऊपर है| मैं नास्तिक हूँ पर मेरे लिए वह ईश्वर जैसे हैं…

जब उन्होंने राबर्ट वाड्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस की थी और बाद में अन्य शक्तिशाली लोगों के खिलाफ तो मैं बहुत भयभीत हो गया था| पश्चिमी उ.प्र में कानून व्यवस्था का क्या हाल है इससे सभी परिचित हैं| इंसानी जान की कीमत वहाँ कुछ भी नहीं है|

तब हमने सोचा कि उनसे बात की जाए कि अगर वे सरकार से सुरक्षा नहीं लेना चाहते तो उन्हें कम से “आप” के स्वयंसेवकों को चौबीस घंटों साथ रखना चाहिए| पर वे तैयार नहीं हुए| तब हमने फेसबुक पर एक पेज बनाया – आप एक राष्ट्रीय संपत्ति हैं, और आप पर हमारा अधिकार है| थोड़ी ही देर में दस हजार लोगों ने इस पर अपने हस्ताक्षर किये| पर अरविंद नहीं माने|

उनका विश्वास दृढ़ है|

जब हम दिल्ली विधानसभा  के चुनाव में उतरे तो हमने देखा कि “आप” के स्वयंसेवक जबर्दस्त ऊर्जा से लबरेज थे| उनकी मानसिकता अलग है| वे अरविंद के साथ एक लक्ष्य के तहत थे और वह लक्ष्य सबसे बड़ा था उनके दिमाग में|

जब अरविंद विचार कर रहे थे शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ने के बारे में तो मैंने उन्हें चेताया कि यह राजनीतिक आत्महत्या के बराबर होगा| अरविंद की नई दिल्ली से जीत अनोखी थी…

समस्या यह हो गई है कि मीडिया अचानक से इतना महत्वपूर्ण बन गया है देश में कि ज्यादातर तो यह लोगों के विचार बनाने लगता है|

शिक्षित मध्यवर्ग थोड़ा निराश है| पर ये लोग ये नहीं समझते कि जनता की सवारी नहीं की जा सकती| हमारे ज्यादातर मंत्री आम-जन थे| यदि कोई मुझे 50 करोड़ रूपये देता है एक पेपर पर साइन करने के लिए – मैं ईमानदार हूँ जब तक कि मुझे मौक़ा नहीं मिला कमाने का, ऐसा है कि नहीं?

जनलोकपाल के बिना बहुत खतरे थे| जनलोकपाल के साथ बहुत चीजें सुधर सकती थीं| तो आप या तो गिलास को आधा भरा देख सकते हैं या आधा खाली…

बिना शक शिक्षित मध्य वर्ग के समर्थन के बिना दिल्ली में इतनी सीटें नहीं मिलतीं पर अरविंद द्वारा त्यागपत्र दिए जाने पर बहस की जा सकती है|

बहुत से कह रहे हैं कि अरविंद ने जिम्मेदारी छोड़ दी…आप मुझे बताओ अगर किसी एक भी आदमी ने गलती कर दी होती तो सारा आंदोलन नष्ट हो जाता हमेशा के लिए|

सच है कि कुर्सी के अंदर बिच्छू हैं…

एक कठोर कानून जैसे कि जन-लोकपाल की महती आवश्यकता है| अगर अरविंद भी गलती करे तो वे भी उत्तरदायी रहें और पकडे जा सकें|

समस्या यह है कि शिक्षित मध्य वर्ग  चाय-कॉफी पीते हुए इन पर बहस करता रहता है| वे कभी सड़कों पर नहीं आयेंगें पुलिस की लाठियाँ और पानी की बौछार सहने के लिए| उनमें से कितने अपने बच्चों को सीमाओं पर भेजेंगे?

सत्यता यह है कि यह सब जो दिखाया जा रहा है कि मध्य वर्ग का एक तबका अरविंद से निराश है यह कुछ ही समय की बात है| नरेंद्र मोदी का प्रोपेगंडा कम ही समय जी पायेगा|

दूध का दूध और पानी का पानी होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी| मध्य वर्ग का भ्रमित तबका भी जल्द ही इस बात का बोध कर लेगा कि अरविंद सही आदमी हैं|

अरविंद सत्ता के पीछे कभी नहीं रहे| वे केवल 45 साल के हैं और वे कभी भी भौतिकवाद के पीछे नहीं भागे हैं| 

मैं उन्हें 1995 से जानता हूँ पर पहले उनके इतना करीब नहीं था|

उन्होंने गाज़ियाबाद में कौशाम्बी, जहां वे रहते थे, एक पायलेट प्रोजेक्ट चलाने के बारे में सोचा और उसके लिए उन्हें मेरी सहायता की जरुरत थी क्योंकि मैं हमेशा ही एक सामाजिक आदमी रहा हूँ|

अरविंद हमेशा से ही अपने काम के प्रति जूनूनी रहे हैं| जब वे किसी काम को हाथ में लेते हैं तो उसी में रम जाते हैं|

लगभग ढाई साल तक अरविंद और मैं सुबह से शाम साथ साथ उस इलाके में एक-एक घर गये| सीवर नहीं था और हम लोगों को बताते थे कि वे हाउस टैक्स क्यों दे रहे हैं जबकि उसमें सीवरेज का पैसा भी शामिल है जबकि आपको यह सुविधा दी ही नहीं जा रही है|

लोगों ने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं था| और ये सब लोग शिक्षित थे और इसी बात से खुश थे कि उनका घर साफ था और उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि घर से निकला सीवेज कहाँ जा रहा था|

ढाई साल के कठोर परिश्रम के बाद स्थानीय प्रशासन हरकत में आया| मायावती के दाहिने हाथ समझे जाने वाले – विजय शंकर पांडे के छोटे भाई अजय शंकर पांडे जो कि गाजिआबाद नगर निगम में कमिश्नर थे, उन्होंने एक जनसभा में वादा किया कि RWA को रोड पर लाइट्स, पार्क, और अन्य जन सुविधाओं को सँभालने की जिम्मेदारी दी जायेगी|

अरविंद की किताब- स्वराज यही बताती है कि सड़कें, स्ट्रीट-लाईट, पानी, सीवर आदि जन सुविधाओं – की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों के पास होनी चाहियें|  जो भी धन राज्य से इस मद में मिलता है वह लोगों की जरुरत और सामहिक सहमति से खर्च किया जाना चाहिए| ठेकेदार को भुगतान तभी हो जब स्थानीय निवासी ढंग से कार्य पूरा होने की रपट दे दें|

अरविंद और मनीष सिसौदिया ने 2001 में परिवर्तन नाम की एनजीओ शुरू की थी| पहले दिन से  मनीष, अरविंद के साथ हैं|

मेरी समझ में लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला समझदारी का नहीं था| शुरू में अरविंद भी इसके पक्ष में नहीं थे|

8 दिसम्बर के बाद बहुत आशामयी माहौल था और मेरे जैसे बहुत से लोगों का मानना रहा है कि इस उर्जावान माहौल को संगठन को मजबूत बनाने में लगाना चाहिए था पर ऊपर बहुत से नेताओं का यह भी मानना था कि पार्टी को राष्ट्रीय चुनाव लड़ना चाहिए ताकि इस ऊर्जा को सही ढंग से इस्तेमाल किया जा सके और राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता मिल सके लेकिन अरविंद और मनीष के दिल्ली सरकार में व्यस्त हो जाने के कारण मुझे यह निर्णय गलत लगता था|

अगर लोकसभा चुनाव में निर्णय अनुकूल नहीं आते तब भी अरविंद जैसे लोग थक-हार कर घर बैठने वाले नहीं हैं|

भारतीयों में जो निराशा घर कर गई है उसे दूर करना जरूरी है| “आम आदमी पार्टी” के उदय के साथ लोगों को पहली बार पता चला कि राजनीति ऐसे भी हो सकती है और यह सफल भी हो सकती है|

अरविंद के प्रति मेरा विश्वास पूर्ण है| अरविंद अपने जीवन को ताक पर लगाकर देश के प्रति अपनी निष्ठा रखते हैं और यह बात लोगों को कुछ समय में ही इसका बोध हो जायेगा|

जब अगस्त 2011 में अन्ना आन्दोलन शुरू हुआ तो हमारे दिमाग में राजनीतिक बात नहीं थी| जब प्रधानमंत्री ने अपने हस्ताक्षर वाला आश्वासन पत्र हमें दिया और संसंद ने उसका अनुमोदन किया किनती बाद में ये सरे सांसद अपनी बात से पलट गये तब पहली बार राजनीतिक परिपाटी में भागीदारी की बात उठने लगी|

मेरे पिता बताते हैं कि उस आंदोलन के कुछ माह बाद वे और अरविंद ऑटो से मेट्रो स्टेशन जा रहे थे और वहाँ पहुंचकर पिताजी ने अरविंद से कहा कि अब राजनीति में उतरने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है तो अरविंद ने तुरंत इस बात का पुरजोर विरोध कर दिया था|

उस समय केवल कुछ लोग ही थे जो यह बात कह रहे थे, संगठन के अंदर से यह आवाज नहीं आ रही थी|

जन लोकपाल ड्राफ्ट का प्रत्येक शब्द अरविंद ने खुद गढा था| जब इस आंदोलन की रूपरेखा बन रही थी, बैनर आदि के बारे में विचार चल रहा था, मैंने अरविंद से कहा कि यह आपके दिमाग की उपज है तो आपका फोटो इस पर होना चाहिए पर अरविंद अलग ही किस्म के इंसान हैं|

उन्होंने केवल अन्ना का फोटो जन-लोकपाल के साथ रखा| यह कोई मामूली त्याग नहीं है| मुझे कोई नहीं दिखाई देता संसार में जो यह काम करता, और तब से जन-लोकपाल आंदोलन अन्ना आंदोलन बन गया|

किसी ने नहीं कहा कि यह अरविंद का आंदोलन था, यह अन्ना का आंदोलन था| बिल का हरेक शब्द अरविंद ने सोचा और लिखा था और कानूनी भाषा के सुधार के लिए प्रशांत भूषण जी, शान्ति भूषण जी और जज राजिंदर सच्चर जी ने इसे बाद में देखा|

अरविंद ने 25 जुलाई से 10 दिनों का अनशन करने की घोषणा की| मैं उनके साथ अकेला डाक्टर था| अनशन के दौरान मेडिकल जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी| मैं उन दस दिनों और बाद के अनशन के पन्द्रह दिनों को कभी नहीं भूल सकता| अरविंद ने वास्तव में मेरी परीक्षा ली|

अरविंद मधुमेह के करीज हैं| और मधुमेह के मरीज को नियमित अंतराल पर कुछ खाना पड़ता है, और समय पर दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं| लेकिन जब से वे जन-जीवन में उतरे हैं तब से खाना और दवाइयों को समय पर लेना लगभग असंभव हो गया है|

मुझे लगा था कि मधुमेह के मरीज के लिए अनशन करना आत्मघाती कदम था| मैंने उनके साथ लड़ाई की पर उन्होंने मेरी एक न सुनी|

एक बार उन्होंने अपना मन बना लिया तो धरती पर कोई भी उन्हें लक्ष्य से हटने के लिए विवश नहीं  कर सकता|

लक्ष्य के प्रति उनका समर्पण, जूनून … आजकल लोग उनका उपहास करते हैं और उनकी गलतियां गिनाते हैं पर इन् लोगों ने उनका त्याग नहीं देखा है|

अगर आप देश के प्रति अरविंद की प्रतिबद्धता को समझेंगे तो आप साहस नहीं जुटा पायेंगे उनके खिलाफ कुछ भी कहने की|

जब वे अनशन कर रहे थे मैंने उन्हें बताया,” आपको क्या लगता है कोई आपके परिवार को सहयोग देगा अगर आपको कुछ हो जाता है तो?”

जब उन्होंने IRS की नौकरी छोड़ी और समाज सेवा में आए तो उनके नाते-रिश्तेदारों ने उन्हें कोसा और याद दिलाया कि उनका एक परिवार भी है|

अनशन के तीसरे दिन राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डाक्टरों ने सलाह दी कि अरविंद को अस्पताल में भर्ती कर देना चाहिए| एक डीजीपी ने हमें फोन किया और इस बाबत चेताया कि अस्पताल में भर्ती मत करना क्योंकि डाक्टर झुक जाते हैं|

मैं कठिन परिस्थिति में फंस चुका था| राम मनोहर लोहिया के वरिष्ठ डाक्टर सलाह दे रहे थे तुरंत अस्पताल में भर्ती करने की और अरविंद कह रहे थे कि वे एकदम ठीक थे|

अन्य स्वयंसेवक डाक्टर भी थे और 450 लोग अनशन कररहे थे, अरविंद, मनीष और गोपाल राय के साथ| डाक्टरों ने कहा कि कीटोन का स्तर 3+ होने के बाद अरविंद की अस्पताल में भर्ती जरूरी है|

मैंने कहा कि वे नहीं चाहते और क्लीनीकली ठीक लग रहे हैं| अरविंद प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद पर ज्यादा निर्भर करते हैं| उन्हें पूरा विश्वास था कि उन्हें कुछ नहीं होगा|

मेरे पास कोई विकल्प नहीं था| हम वहाँ केवल डाक्टर की तरह नहीं थे बल्कि अरविंद के आंदोलन को स्वयंसेवकों की तरह सहयोग देने के लिए भी थे|  एक हफ्ता और गुजरा पर मेरे ऊपर बहुत भारी समय था|

एक पत्रकार, जो आंदोलन को कवर कर रहे थे, ने कहा,” डाक्टर साहब, आप ठीक कर रहे हैं? आपका पूरा व्यावसायिक करियर दांव पर हैं, अगर अरविंद को कुछ हो गया तो आपका लाइसेंस निरस्त हो जायेगा, आपको जेल हो जायेगी क्योंकि सरकारी डाक्टर पहले ही तुरंत अस्पताल में भर्ती की बात कह चुके हैं और आपने सलाह मानी नहीं है”|

लेकिन अरविंद के साथ इतने बरसों काम करने के अनुभव ने सिखा दिया है कि हमेशा किताब में लिखी बात के साथ नहीं चला जा सकता|

शुक्रवार को दोपहर बाद मैंने अरविंद से कहा,” बहुत हो गया| सरकार तो सुन ही नहीं रही है, फिर क्या फायदा?”

अरविंद ने कहा,” कुछ गणमान्य लोगों ने पत्र लिखा है कि अब राजनीतिक विकल्प को अपनाए बिना काम नहेने चलेगा और उस पत्र की घोषणा शाम पांच बजे होगी”|

उन्होंने कहा.” हम यह बात जनता के सामने रखेंगे और लोगों को दो दिनों का समय देंगें सोचने विचारने के लिए| अगर लोग कहते हैं आंदोलन – तो हम इसे जारी रखेंगे चाहे जां चली जाए और अगर लोग कहते हैं राजनीतिक विकल्प चुनो तो हम लोग एक पार्टी बनाने पर विचार करेंगे|”

लेकिन उससे पहले ही हमें पता चला कि अन्ना ने घोषणा कर दी है| अन्ना ने गणमान्य लोगों द्वारा पत्र लिखे जाने की बात पहले ही सबके सामने कह दी|

अरविंद का सोचना अलग था| वे इस पर जनमत संग्रह करवाना चाहते थे| मंच पर बैठे प्रशांत भूषण और संजय सिंह स्तब्ध थे| और अरविंद भी विचलित नज़र आए|

जब अन्ना मंच से उतरे तो अरविंद उनसे बात करने गये| अन्ना ने पूछा,” मैंने कुछ गलत किया?”

मैं विज्ञान का विधार्थी हूँ और मैंने कभी ईश्वर के सामने हाथ नहीं जोड़े| मैं नास्तिक रहा हूँ|

मैं अरविंद के साथ झुग्गियों में भी गया हूँ| मैंने उनके रिश्तेदारों को उन्हें जलील करते देखा है| मैंने उनके जीवन को देखा है और उस समय राजनीति उनके दिमाग में बिल्कुल नहीं थी|

उनके बारे में कुछ बातें समझनी बेहद जरूरी हैं| मैंने अरविंद के  त्याग बहुत करीब से देखे हैं| मुझे पता है वे किसा तरह के विचार रखते हैं और कैसे सोचते हैं| मुझे उन पर पूरा भरोसा है| उन्होंने अपने लिए कभी कोई चीज नहीं चाही|

जो उन्हें नहीं जानते वे कैसे भी विचार उनके बारे में रख सकते हैं|

मैं उनका कटु-आलोचक भी हूँ|

उनका विवाह तब हो गया था जब वे नागपुर में IRS की ट्रेनिंग ले रहे थे| वहीं उनके एक सहयोगी उनकी और भाभी की बातें सुनकर कहते थे कि दोनों एक तरह से सोचते हो|

2011 के अगस्त में आंदोलन के समय भाभी का ट्रांसफर कर दिया गया और जो मकान उन्हें मिला हुआ था वह खाली करना था| मैं अरविंद के माता-पिता के साथ दस दिनों तक कौशाम्बी में भटका पर माहौल को देखकर लोग उन्हें किराए पर घर देने के लिए तैयार नहीं थे|

जब “आप” का गठन हुआ तो कोई भी दफ्तर खोलने के लिए जगह देने के लिए तैयार नहीं था और हमारे पास पैसे भी नहीं थे| मेरे पास एक खाली फ़्लैट था जो मैंने उन्हें दिया|

हम डाक्टरों को लोग हमारे व्यवसाय की वजह से सम्मान देते हैं| हमारे काम को पुण्य का काम कहा जाता है| पर सच यह है कि हम लोग आजीविका कमा रहे हैं| इसके साइड इफेक्ट के रूप में हम अच्छा काम भी कर जाते हैं पर हम यहाँ पुण्य करने नहीं बिल्कुल नहीं आते|

अरविंद की वजह से मैंने वह पाया है जो मैं अपने व्यवसाय से बिल्कुल नहीं पा सकता था| मैंने अन्य डाक्टरों की तरह से व्यवसाय नहीं किया शायद यही वजह होगी कि मैं अरविंद के करीब पहुँच सका|

इस आंदोलन ने मुझे बहुत कुछ दिया है जीवन में|

नोट: मूल अंग्रेजी में रेडिफ़ पर छपा है

Rediff link

अप्रैल 12, 2014

अरविंद केजरीवाल का मूल्याँकन सीटों से नहीं (रवीश कुमार – NDTV)

AKej@homeहार जायें या हवा हो जायें या जीत जायें । इन तीनों स्थितियों को छोड़ दें तो अरविंद केजरीवाल ने राजनीति को बदलने का साहसिक प्रयास तो किया ही । हममें से कई राजनीतिक व्यवस्था को लेकर मलाल करते रहते हैं लेकिन अरविंद ने कुछ कर के देखने का प्रयास किया । कुछ हज़ार लोगों को प्रेरित कर दिया कि राजनीति को बदलने की पहली शर्त होती है इरादे की ईमानदारी । अरविंद ने जमकर चुनाव लड़ा । उनका साथ देने के लिए कई लोग विदेश से आए और जो नहीं आ पाये वो इस बदलाव पर नज़रें गड़ाए रहें । आज सुबह जब मैं फ़ेसबुक पर स्टेटस लिख रहा था तब अमरीका से किन्हीं कृति का इनबाक्स में मैसेज आया । पहली बार बात हो रही थी । कृति ने कहा कि वे जाग रही हैं । इम्तहान की तरह दिल धड़क रहा है । ऐसे कई लोगों के संपर्क में मैं भी आया ।

अरविंद ने बड़ी संख्या में युवाओं को राजनीति से उन पैमानों पर उम्मीद करने का सपना दिखाया जो शायद पुराने स्थापित दलों में संभव नहीं है । ये राजनीतिक तत्व कांग्रेस बीजेपी में भी जाकर अच्छा ही करेंगे । कांग्रेस और बीजेपी को भी आगे जाकर समृद्ध करेंगे । कौन नहीं चाहता कि ये दल भी बेहतर हों । मैं कई लोगों को जानता हूँ जो अच्छे हैं और इन दो दलों में रहते हुए भी अच्छी राजनीति करते हैं । ज़रूरी है कि आप राजनीति में जायें । राजनीति में उच्चतम नैतिकता कभी नहीं हो सकती है मगर अच्छे नेता ज़रूर हो सकते हैं ।
एक्ज़िट पोल में आम आदमी पार्टी को सीटें मिल रहीं हैं । लेकिन आम आदमी पार्टी चुनाव के बाद ख़त्म भी हो गई तब भी समाज का यह नया राजनीतिक संस्करण राजनीति को जीवंत बनाए रखेगा । क्या कांग्रेस बीजेपी चुनाव हार कर समाप्त हो जाती है ? नहीं । वो बदल कर सुधर कर वापस आ जाती है । अरविंद से पहले भी कई लोगों ने ऐसा प्रयास किया । जेपी भी हार गए थे । बाद में कुछ आई आई टी के छात्र तो कुछ सेवानिवृत्त के बाद जवान हुए दीवानों ने भी किया है । हममें से कइयों को इसी दिल्ली में वोट देने के लिए घर से निकलने के बारे में सोचना पड़ता है लेकिन अरविंद की टोली ने सोचने से आगे जाकर किया है ।  वैसे दिल्ली इस बार निकली है । जमकर वोट दिया है सबने ।
राजनीति में उतर कर आप राजनीतिक हो ही जाते हैं । अरविंद बार बार दावा करते हैं कि वे नहीं है । शायद तभी मतदान से पहले कह देते हैं कि किसी को भी वोट दीजिये मगर वोट दीजिये । तब भी मानता हूँ कि अरविंद नेता हो गए हैं । आज के दिन बीजेपी और कांग्रेस के विज्ञापन दो बड़े अंग्रेज़ी दैनिक में आए हैं आम आदमी पार्टी का कोई विज्ञापन नहीं आया है । अरविंद के कई क़दमों की आलोचना भी हुई, शक भी हुए और सवाल भी उठे । उनके नेतृत्व की शैली पर सवाल उठे । यही तो राजनीति का इम्तहान है । आपको मुफ़्त में सहानुभूति नहीं मिलती है । कांग्रेस बीजेपी से अलग जाकर एक नया प्रयास करना तब जब लग रहा था या ऐसा कहा जा रहा था कि अरविंद लोकपाल के बहाने बीजेपी के इशारे पर हैं तो कभी दस जनपथ के इशारे पर मनमोहन सिंह को निशाना बना रहे हैं । मगर अरविंद ने अलग रास्ता चुना । जहाँ हार उनके ख़त्म होने का एलान करेगी या मज़ाक़ का पात्र बना देगी मगर अरविंद की जीत हार की जीत होगी । वो जितना जीतेंगे उनकी जीत दुगनी मानी जायेगी । उन्होंने प्रयास तो किया । कई लोग बार बार पूछते रहे कि बंदा ईमानदार तो है । यही लोग लोक सभा में भी इसी सख़्ती से सवाल करेंगे इस पर शक करने की कोई वजह नहीं है । अरविंद ने उन मतदाताओं को भी एक छोटा सा मैदान दिया जो कांग्रेस बीजेपी के बीच करवट बदल बदल कर थक गए थे ।
इसलिए मेरी नज़र में अरविंद का मूल्याँकन सीटों की संख्या से नहीं होना चाहिए । तब भी नहीं जब अरविंद की पार्टी धूल में मिल जाएगी और तब भी नहीं जब अरविंद की पार्टी आँधी बन जाएगी । इस बंदे ने दो दलों से लोहा लिया और राजनीति में कुछ नए सवाल उठा दिये जो कई सालों से उठने बंद हो गए थे । राजनीति में एक साल कम वक्त होता है मगर जब कोई नेता बन जाए तो उसे दूर से परखना चाहिए । अरविंद को हरा कर न कांग्रेस जीतेगी न बीजेपी । तब आप भी दबी ज़ुबान में कहेंगे कि राजनीति में सिर्फ ईमानदार होना काफी नहीं है । यही आपकी हार होगी ।
जनता के लिए ईमानदारी के कई पैमाने होते हैं ।
इस दिल्ली में जमकर शराब बंट गई मगर सुपर पावर इंडिया की चाहत रखने वाले मिडिल क्लास ने उफ्फ तक नहीं की । न नमो फ़ैन्स ने और न राहुल फ़ैन्स ने । क्या यह संकेत काफी नहीं है कि अरविंद की जीत का इंतज़ार कौन कर रहा है । हार का इंतज़ार करने वाले कौन लोग हैं ? वो जो जश्न मनाना चाहते हैं कि राजनीति तो ऐसे ही रहेगी । औकात है तो ट्राई कर लो ।
कम से कम अरविंद ने ट्राई तो किया ।
शाबाश अरविंद ।
यह शाबाशी परमानेंट नहीं है । अभी तक किए गए प्रयासों के लिए है । अच्छा किया आज मतदान के बाद अरविंद विपासना के लिए चले गए । मन के साथ रहेंगे तो मन का साथ देंगे।
साभार कस्बा
अप्रैल 9, 2014

अरविंद केजरीवाल: “आप” बचा पायेगी भारतीय राजनीति को कोर्पोरेट के औपनिवेशिक हमले से?

10000CRORbjpदिल्ली में और कई अन्य स्थानों पर कल 10 अप्रैल को चुनाव होना है और आज 9 अप्रैल को कई बड़े कांग्रेसी नेता ट्वीट आदि माध्यमों से बताते रहे कि भाजपा (मोदी) 10,000 करोड़ रूपये खर्च कर चुके हैं| इतनी अथाह धनराशी के बलबूते भारत को एक प्रोपेगंडा में डुबाकर नरेंद्र मोदी की नकली लहर का भ्रम पैदा करने वाली भाजपा के सामने 20 करोड़ के चंदे के साथ खड़ी “आप” कैसे लड़ पायेगी? क्या पैसा सच्चाई को हरा देगा?

देश को देखना और सिद्ध करना है कि लोकतंत्र में पैसा ही सब कुछ नहीं| आखिर जो लोग 10,000 करोड़ रूपये  चुनाव जीतने के लिए खर्च कर रहे हैं वे सत्ता में आने के बाद इस खर्चे की भरपाई भी तो करेंगे ही और वह वह जनता का शोषण किये बगैर तो हो नहीं सकती|

क्या कांग्रेस चुनाव होने से पहले ही हार मान चुकी है? दिल्ली में कुछ अरसा पहले राहुल गांधी के भी पोस्टर लगे थे पर ज्यादातर उन्ही स्थानों पर अब मोदी के पोस्टर लग गये हैं और राहुल गांधी के पोस्टर लगभग गायब हो गये हैं| कांग्रेस कहीं भी ढंग से चुनाव प्रचार करती नहीं दिखाई दे रही| क्या कांग्रेस कोर्पोरेट आकाओं का आदेश मान कर चुप है कि – इस बार मोदी की सरकार बन जाने दो?
अरविंद केजरीवाल जो कहते हैं उसकी तीव्र और तीखी प्रतिक्रया देश भर में होती है और मीडिया और राजनीतिक नेता उन पर आक्रमण कर देते हैं पर कुछ समय बाद ही अरविंद के कथन सच साबित होने लगते हैं| इस बार भी कुछ महीनों में ही स्पष्ट हो जायेगा कि अरविंद वाकई सच बोल रहे थे कि कोर्पोरेट इस देश पर कब्जा कर चुके हैं और कांग्रेस और भाजपा सरकारों की अदला बदली केवल जनता की आँखों में धूल झोंकने का प्रयास मात्र है|

AKatRajghatकल फिर अरविंद केजरीवाल पर हमला हुआ और सोशल मीडिया पर मोदी समर्थक जश्न मनाते दिखाई दिए और कांग्रेस समर्थक चुटकियाँ लेते|

भारत में मोदी समर्थक बहुतायत में सेडिस्ट हैं और यह बार बार सिद्ध हो रहा है| इतनी बड़ी संख्या में मानसिक रुग्णता इस देश का अहित करेगी ही करेगी| मोदी जैसों के मूड न भी हों पर यह भीड़ अपने अंदर की पाशविक हिंसा की संतुष्टि के लिए उन जैसे नेताओं को तानाशाह बना कर ही चैन पायेगी क्योंकि तब इस भीड़ के लिए अपने विरोधियों से बदला चुकाना और निबटना आसान हो जायेगा|

बड़े आनंद की बात है कि विजय मल्होत्रा जैसे निरर्थक हो चुके नेता को सारी कीमियागिरी पता है कि अरविंद केजरीवाल पर हमले उनकी खुद की रची नौटंकी है, तब वे क्यों नहीं ऐसा नाटक करके वर्तमान राजनीति में सार्थक बन जाते? दूसरा आनंद का विषय है कि जब ये थप्पड़-मुक्के मारने वाले नाटक के पात्र बनते हैं तो क्या पिटने के लिए भी तैयार होकर आते हैं? समर्थक तो ऐसे अचानक उत्पन्न हुए हालात में रोकते रोकते भी दो चार रसीद कर ही देते हैं|

भाजपाइयों की थकी हुयी बुद्धि के अनुसार “आप” और अरविंद केजरीवाल सब कुछ मीडिया का ध्यान पाने के लिए करते हैं| भाजपाइयों की मूर्खतापूर्ण सोच के साथ यही सिद्ध होता है पहले दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा के पैरों के नीचे से कालीन खींच कर “आप” ने सोचा कि अब सरकार बनाने के बाद तो मीडिया उन्हें पूछेगा नहीं सो उन्होंने आनन्-फानन में विनोद कुमार बिन्नी को लुभाया और उससे कहा कि अब तू “आप” से विद्रोह करने का नाटक कर और रोज मुझे और “आप” को गालियाँ दे| तू भी मीडिया में रहेगा और हम भी| और देखना कहीं भाजपाइयों और कांग्रेसियों के साथ रसगुल्ले खाते हुए न पकड़ा जाना वरना तेरा सारा खेल चौपट और तेरे साथ हमारा भी|

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कुछ दिन ऐसा चला फिर अरविंद ने अपने कई साथियों को, जो “आप” में रहकर दिल में भाजपा को बसाए रखते थे, कहा कि अब वे एक एक करके उनका और “आप” का विरोध करें और “आप” छोड़ दें या “आप” उन्हें निकाल देगी और इस तरह सभी चरित्र मीडिया में बने रहेंगे| “अश्विन उपाध्याय” को भी भरमाया कि भाई तुम ऐसे ऐसे आरोप लगाओ कि मीडिया दौड़ा चला आए तुम्हारे पास और तुम ऐसे ऐसे संवाद बोलना कि मीडिया सारे सारे दिन तुम्हारे वचन ही दिखाता रहे| फिर अरविंद ने अपने को पिटवाने और शारीरिक क्षति पहुंचाने वाले लोग भी तैयार कर लिए| आखिर मीडिया में बने जो रहना था|

बातों के थप्पड़ सही, और लात-घूंसों के मामले झूठे? वाह भाजपा, वाह  कांग्रेस!

वो (भाजपाई-कांग्रेसी) क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती, अरविंद आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम!’ !

सरकार, क़ानून और मीडिया और कांग्रेस + भाजपा क्या अरविंद केजरीवाल और “आप” द्वारा एफ.आई.आर करवाने का ही मुँह ताकते रहते हैं? किसी ने शारीरिक हमला किया, जमाने ने देखा, हमलावर को पकड़ो, जैसी जांच करवानी है करवाओ, उसे क़ानून के घेरे में लाओं| मीडिया और विपक्षी अपने तौर पर गहरी जांच कर लें कि सच्चाई क्या है| दसियों हजार करोड़ खर्च करने वाली भाजपा के पास क्या लोकल जासूसों को देने के लिए भी पैसे नहीं बचे जो सच्चाई सामने लाकर अरविंद को दुनिया के सामने एक्सपोज कर दें? कहाँ गये मीडिया के स्टिंग धुरंधर? ज़रा सामने तो आओ, अपनी कला का नमूना दिखाओ| या भय यह है कि अगर असली मास्टर माइंड तक पहुँच गये लोग तो किरकिरी हो जायेगी?

अरविंद तो खुद ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर श्री बी.एस.बस्सी के पास गये कि उन पर हो रहे लगातार हमलों की जांच करवाई जानी चाहिए जिससे कि पता लग सके इन् सब हमलों के पीछे कौन मास्टर माइंड है?

अरविंद अपने पर आक्रमण करने वाले से मिलने उसके घर गये तो AK laliभाजपा को तो छोड़ ही दें संघ को भी समस्या होने लगी कि वे क्यों अपने पर हमले करने वालों को माफ करे दे रहे हैं|

“लगे रहो अरविंदभाई” गांधीगिरी में, बदलाव आएगा ही आएगा!

जन्म से ही कोई महान नहीं होता, अलबत्ता उसमें ऐसी संभावनाओं के बीज जरुर छिपे रहते हैं पर उसे सप्रयास इन् बीजों को अंकुरित करके पहले पौधे और बाद में फल-फूल से भरा वृक्ष बनाना पड़ता है और यह एक लंबा और सतत चलने वाला और बेहद कठिन और परिश्रमबद्ध कार्य होता है| इस कार्य में परिस्थितियाँ और विरोधी लोग बार-बार अपमान करते हैं, शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचाते हैं, पर कठिन परिस्थितियों और बेहद कठिन कसौटियों से गुजर कर ही जन-नायकों का उदय होता है| महात्मा गांधी की आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” में अतुल्य हीरा बनने की यात्रा का बेहद असरदार वर्णन है| गांधी जब अपने अंतस पर नियंत्रण पाकर, जनता के दुख दर्द तो आत्मसात करके उनके हित की ही बात करके जीने का प्रण लेकर द.अफ्रीका से भारत आए तो वे 45 साल के थे| और अगले कुछ दशकों में उन्होंने गुलामी के कारण थक-हार कर घिसट-घिसट कर जीवन जीते भारत की न केवल आत्मा को जगाया बल्कि निहत्थे, गरीब और कमजोर भारतीयों को इतने  तेज से भर दिया कि वे पूरे देश में अंग्रेजों और उनकी अथाह ताकत के सामने सिर उठा कर खड़े हो गये और अंग्रेजों को यहाँ से अपना अत्याचारी राज खत्म करके वापिस अपने देश जाना पड़ा|

AAP49daysगांधी का अंतिम सपना “स्वराज” का था परन्तु ऐसे लोग जो अंग्रेजों के शासन में अपनी ज्यादा भलाई समझते थे, उनके ऐसे किसी भी लक्ष्य के विरोधी थे और अंततः साम्प्राद्यिक राजनीति की कुत्सित विचारधारा में पाले बढे अपराधी मानसिकता के लोगों ने गांधी की ह्त्या कर दी| जिन्होने देश को सम्भाला अंग्रेजों के बाद, उनका लक्ष्य “स्वराज” नहीं था, और अपनी तमाम भलमनसाहत के बावजूद वे इस बात के लिए सही तरीके से शिक्षित नहीं थे कि सोच विचार कर गांधी के लक्ष्य को पूरा करने के मार्ग पर चल सकें और बाद के नेताओं की पीढियां तो अपने घर भरने में ही लगी रहीं और भ्रष्टाचार को इस कदर पचने वाला तत्व बना दिया गया भारतीय समाज में भारतीय राजनेताओं द्वारा कि ऐसा माने जाना लगा कि ईमानदारी की बात करने वाला आदमी “पागल” होता है|
दशकों भारत में भ्रष्टाचार का अँधेरा व्याप्त रहा है अब जाकर कुछ रोशनी की किरण चमकी है और इस आशा को जगाने में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ है, परन्तु यह आंदोलन किसी खास राजनीतिक दल के खिलाफ सीमित नहीं हो सकता और इसीलिए जो लोग इस आंदोलन से अपने राजनीतिक हित साधने के लिए जुड़े थे वे धीरे धीरे करके अपने अपने राजनीतिक आकाओं के पाले में जाकर बैठ गये हैं और खुलकर भारतीय राजनीति में ईमानदारी लेन वाले निष्पक्ष योद्धाओं के खिलाफ मोर्चा संभाल रहे हैं|

AKpolice
45 साल के अरविंद केजरीवाल को भी हम लोग अपने को निरंतर अपने को गढते, तराशते और तैयार करते देख रहे हैं और उनके बहुत से अन्य साथी भी इस कार्य में लगे हुए हैं| और यही एक बात बहुत बड़ी आशा बंधाती है| ऐसा कभी किसी काल में नहीं हुआ कि सिर्फ अपना हित देखने वाले भ्रष्टाचारी, बुरी ताकतों के खिलाफ कोई आवाज उठाये और ये ताकतें उस आंदोलनकारी का पुरजोर विरोध न करें| वे करेंगे और उनका लक्ष्य ऐसे विरोध को कुचलने का और संभव हो तो ऐसे नेता को नष्ट करने का होता है| यही सब कुत्सित प्रयास हमारे इर्द-गिर्द चल रहे हैं| पर बुराई के साथ साथ अच्छाई का जन्म और विकास भी प्रकृति में चलता ही रहता है और हर बार प्रकृति यह स्थापित करके दिखाती है कि अंततः अच्छाई बुराई पर विजय प्राप्त कर ही लेती है| यह जीत आज मिले या दस साल बाद या बीस साल बाद मिले पर भारतीय राजनीति के उद्धार की जो प्रक्रिया शुरू हुई है यह अब रुकने वाली है नहीं| आर्थिक और सुविधाओं के लिहाज से समाज के सबसे नीचे तबके से लेकर सबसे ऊपर के तबके में सुगबुगाहट है और एक मंथन चल रहा है और हर स्तर से लोग इस आंदोलन के समर्थन (और विरोध में भी) में सामने आयेंगे या मौन रहकर अपना मत देकर समर्थन देंगे| इस आंदोलन के कारवाँ के यात्रियों को हमेशा एक बात स्मृति में रखने की जरुरत है कि वे अकेले नहीं हैं और उन जैसी भावनाओं वाले करोड़ों भारतीय देश के कोने कोने में इस महान यात्रा में उनके सहभागी हैं| भारत सुधार की ओर अग्रसर है, सो स्पष्ट है कि भ्रष्ट ताकतें अपने हमलों की तीव्रता और शक्ति बढाएंगी ही पर यही उनकी हताशा का सूबूत भी होगा|

दिल्ली में और कई अन्य स्थानों पर जहां कल चुनाव होगा, “आप” कि स्थिति बहुत बेहतर है कांग्रेस और भाजपा की तुलना में, और ऐसा हुआ है भाजपा और कांग्रेसी षड्यंत्रों के बावजूद|

Vote4AAP
रात में एक आरामपूर्ण नींद के बाद सुबह उठकर ताजगी भरे मन से देश की सफाई की शुरुआत करने की बेहद महत्वपूर्ण घड़ी लोगों के सामने कल सुबह 7 बजे आ जायेगी और पूरे दिन यह शुभ उपलब्ध रहेगा| देश की सफाई के लिए “झाडू” को शक्ति देना एक पुनीत कार्य में हाथ बंटाना है| पहली बार वोट देने वालों ने इतना थ्रिल पहले कभी महसूस नहीं किया होगा जीवन में जैसा वे कल सुबह करेंगे “झाडू” को वोट देते हुए|
“आरम्भ” होती है “आप” की देश-सफाई -यात्रा कल सुबह से! कल का वोट देश में बड़े बदलाव लाने का पहला और बेहद महत्वपूर्ण कदम है|

 

अप्रैल 6, 2014

क्या कोई नरेंद्र मोदी को रोक सकता है?

modiप्रसिद्द पत्रिका The Economist ने 5 अप्रैल 2014 को एक लेख प्रकाशित किया है, जिसमें नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के मसले पर विचार प्रस्तुत किये गये हैं| मूल लेख Can anyone stop Narendra Modi? अंग्रेजी में है|

यहाँ प्रस्तुत है श्री मनोज खरे द्वारा किया गया लेख का हिंदी अनुवाद -

[सम्भव है वे भारत के अगले प्रधानमंत्री बन जाएं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि वे इसके योग्य हैं।]

कौन भारत में होने वाले आम चुनावों के संभावित परिणामों के बारे में नहीं सोच रहा है? सात अप्रैल से शुरू होने वाले चुनाव में मुंबई के करोड़पतियों के साथ-साथ अशिक्षित ग्रामीणों और झोपड़पट्टियों में रहने वाले गरीब-वंचित लोगों को भी अपनी सरकार चुनने का बराबर का हक होगा। नौ चरणों में पांच सप्ताह से ज्यादा चलने वाले मतदान में लगभग 81.5 करोड़ नागरिक अपने मत का प्रयोग करेंगे जो कि इतिहास में एक सबसे बड़ा सामूहिक लोकतांत्रिक कार्य होगा। लेकिन कौन भारत के राजनीतिज्ञों के दुर्बल, गैरजवाबदेह और अनैतिक चरित्र की निंदा नहीं करता? समस्याओं से आकंठ डूबा देश कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में बनी गठबंधन सरकार के अधीन दस वर्षों के दौरान मझदार में पहुंच गया है, जिसका कोई खेवनहार नहीं है। वृद्धि-दर घटकर लगभग आधी- 5 प्रतिशत के आस-पास रह गई है, जो कि प्रति वर्ष नौकरी करने के लिए बाजार में उतरने वाले करोड़ों युवा भारतीयों को रोजगार देने की दृष्टि से बहुत कम है। सुधार अधूरे रह गए हैं, सड़कें और बिजली उपलब्ध नहीं है। बच्चों की पढ़ाई- लिखाई नहीं हो पाती है। जबकि विडंबना यह है कि नेताओं और अफसरों द्वारा ली जाने वाली रिश्वत का आंकड़ा कांग्रेस के शासन-काल में चार से बारह बिलियन डॉलर के बीच पहुंच गया है।

भारतीय लोगों की नजर में राजनीति का मतलब है- भ्रष्टाचार। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी को भारत का अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। लेकिन वे अपने कांग्रेस पार्टी के प्रतिद्वंद्वी नेता राहुल गांधी से ज्यादा अलग नहीं हैं। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के प्रपौत्र राहुल गांधी इस तरह पदग्रहण करने को तैयार बैठे हैं, मानो यह उनका दैवी अधिकार हो। जबकि मोदी पहले चाय बेचने वाले थे जो कि महज अपनी योग्यता के बलबूते ऊपर तक पहुंचे हैं। लगता है मिस्टर गांधी अपने ही मानस को नहीं समझते। यहां तक कि वे नहीं जानते कि उन्हें सत्ता चाहिए या नहीं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी का कामकाज दर्शाता है कि उन्होंने आर्थिक विकास किया है और वे विकास को धरातल पर उतार सकते हैं। राहुल गांधी के गठबंधन पर भ्रष्टाचार की कालिख पुती हुई है। जबकि तुलनात्मक रूप से मोदी साफ-सुथरे हैं।

इस तरह प्रशंसा के लिए काफी कुछ है। फिर भी यह पत्रिका नरेंद्र मोदी को भारत के सर्वोच्च पद के लिए अपना समर्थन नहीं दे सकती।

मोदी की दुर्भावना
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कारण शुरू होता है गुजरात में 2002 में मुसलमानों के विरूद्ध हिंदुओं के उन्मादी दंगों से, जिनमें कम से कम एक हजार लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे। अमदाबाद और आसपास के कस्बों-गांवों में चला हत्याओं और बलात्कार का दौर, एक ट्रेन में सवार 59 हिंदू तीर्थयात्रियों की मुसलमानों द्वारा की गई हत्या का बदला था। नरेंद्र मोदी ने 1990 में अयोध्या स्थित पवित्र-स्थल पर एक यात्रा का आयोजन करने में सहायता की थी, जिसके परिणामस्वरूप दो वर्ष बाद हिंदू-मुसलमान झड़पों में 2000 लोगों को जान गवांनी पड़ी थी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक आजीवन सदस्य हैं जो कि एक हिंदू राष्ट्रवादी समूह है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लक्ष्य के प्रति समर्पित होने के कारण ही उन्होंने जीवन भर के लिए ब्रह्मचर्य अपनाया और अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काने वाले शर्मनाक भाषण दिए। 2002 में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और उन पर जनसंहार होने देने या समर्थन करने तक के आरोप लगे।

मोदी के बचावकर्त्ता और उनके अनेक समर्थक, खासकर वे जो कारोबारी अभिजात्य वर्ग के हैं, दो बातें कहते हैं। पहली, बार-बार की गई जांच-पड़तालों में जिसमें प्रशंसनीय स्वतंत्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा कराई गई जांच भी शामिल है, ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी पर कोई आरोप लगाया जा सके। और दूसरी बात वे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने अब खुद में बदलाव लाया है। उन्होंने निवेश आकर्षित करने और हिंदू-मुसलमानों को समान रूप से फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अथक कार्य किया है। वे कहते हैं कि एक सुसंचालित अर्थव्यवस्था में देश भर के गरीब मुसलमानों को मिलने वाले भारी लाभ के बारे में सोचिए।

दोनों आधार पर यह अत्यंत उदार नजरिया है। दंगों के बारे में बैठायी गई जांच निष्कर्षहीन रहने का एक कारण यह है कि ज्यादातर सबूत या तो नष्ट हो गए थे या जानबूझ कर नष्ट कर दिए गए थे। और अगर 2002 में तथ्य अस्पष्ट और धुंधले थे तो नरेंद्र मोदी के विचार भी अब भी वैसे ही हैं। जो कुछ हुआ उसका स्पष्टीकरण देते हुए माफी मांग कर वे नरसंहार को अपने से पीछे छोड़ सकते थे। पर उन्हें दंगों और नरसंहार के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देना भी गवारा नहीं है। पिछले वर्ष दी गई एक दुर्लभ टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि उन्हें मुसलमानों की पीड़ा पर उसी तरह का दुःख है, जैसा दुःख चलती कार के नीचे किसी कुत्ते के पिल्ले के आ जाने से होता है। शोर-शराबा मचने पर उन्होंने कहा कि उनका तात्पर्य सिर्फ इतना था कि हिंदू सभी प्राणियों का ध्यान रखते हैं। मुसलमानों और उग्र हिंदुओं ने इससे अलग-अलग संदेश ग्रहण किए। अन्य भाजपा नेताओं से अलग, नरेंद्र मोदी ने मुसलिम ढंग की टोपी पहनने से मना कर दिया और 2013 में उत्तर प्रदेश में हुए दंगो की निंदा नहीं की, जिसके ज्यादातर पीड़ित मुसलमान थे।

दो में कम बुरा
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डॉग-व्हिसिल पॉलिटिक्स” हर देश में निंदनीय है, जिसमें ऐसी द्विअर्थी भाषा का प्रयोग होता है, जिसका आम जनता के लिए एक मतलब होता है तो किसी अन्य उप-समूह के लिए दूसरा। लेकिन भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा उभरती रही है। विभाजन के वक्त, जब ब्रिटिश भारत विभक्त हुआ था तब लगभग 1.2 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे और सैकड़ों मारे गए थे। 2002 के बाद में सांप्रदायिक हिंसा काफी कम हो चुकी है। लेकिन अभी भी सैकड़ों घटनाएं होती रहती हैं और प्रतिवर्ष दर्जनों जानें जाती हैं। कभी-कभी, जैसा कि उत्तर प्रदेश में हाल में हुआ, हिंसा खतरनाक स्तर पर होती है। चिंगारी बाहर से भी भड़क सकती है। मुंबई में 2008 में भारत आतंकवादियों के भयानक हमले का शिकार बना जो कि परमाणु-अस्त्रों से लैस पड़ोसी देश पाकिस्तान से आए थे। पाकिस्तान भारत के लिए हमेशा चिंता का कारण रहा है।

मुसलमानों के भय को समाप्त करने से इंकार करके मोदी उस भय को खुराक देते हैं। मुसलिम-विरोधी मतों को मजबूती से थाम कर वे इस भय को खाद-पानी देते हैं। भारत विभिन्न तरह के धार्मिक आस्थाओं, धर्मावलंबियों और विद्रोही लोगों का आनंदमय, लेकिन कोलाहलपूर्ण देश है। इनमें स्तंभकार दिवंगत खुशवंत सिंह जैसे श्रेष्ठ लोग भी हैं जो सांप्रदायिक घृणा से होने वाली क्षति के बारे में जानते हैं और उससे दुःखी रहते हैं।

नरेंद्र मोदी दिल्ली में अच्छी शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन देर-सबेर उन्हें सांप्रदायिक खून-खराबे या पाकिस्तान के साथ संकट की स्थिति से दो-चार होना पड़ेगा। और कोई नहीं जानता, कम से कम वे आधुनिक लोग जो आज मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं, कि मोदी क्या करेंगे या मुसलमानों की मोदी जैसे विभाजनकारी व्यक्ति के प्रति कैसी प्रतिक्रिया होगी। अगर नरेंद्र मोदी हिंसा में अपनी भूमिका स्पष्ट करते और सच्चा पश्चाताप जाहिर करते तो हम उनका समर्थन करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया। उचित नहीं होगा कि उन जैसा शख्स जो लोगों को बांटता आया है, विस्फोट के मुहाने पर बैठे भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री बने। राहुल गांधी के नेतृत्व में कोई कांग्रेस सरकार बने इसके आसार हमें आशाजनक नहीं लगते। लेकिन हमें फिर भी कम गड़बड़ी वाले विकल्प के रूप में भारतीय जनमानस को इसकी अनुशंसा करना चाहेंगे।

अगर कांग्रेस जीतती है, जिसकी संभावना न के बराबर है, तो उसे अपने आप को फिर से नया करना पड़ेगा और देश का सुधार करना होगा। राहुल गांधी को चाहिए कि वे राजनीति से पीछे हट कर आधुनिकतावादियों को आगे लाएं और अपनी आत्मविश्वासहीनता को एक गुण के रूप में स्थापित करें। ऐसे लोग वहां बहुत हैं और आधुनिकता ही वह चीज है, जिसे भारतीय मतदाता ज्यादा से ज्यादा चाहते हैं। अगर भाजपा की जीत होती है, जिस की संभावना ज्यादा है, तो उसके गठबंधन सहयोगियों को मोदी को छोड़ किसी अन्य नेता को प्रधानमंत्री बनाने पर जोर देना चाहिए।

फिर भी वे नरेंद्र मोदी को ही चुनें तो? हम उनके भले की कामना करेंगे और हमें खुशी होगी अगर वे भारत को आधुनिक, ईमानदार और सम्यक सुशासन प्रदान कर हमें गलत साबित कर देंगे।

लेकिन अभी तो नरेंद्र मोदी को उनके रिकार्ड के आधार पर ही जांचा जा सकता है, जो अब भी सांप्रदायिक घृणा से जुड़ा हुआ है। वहाँ कुछ भी आधुनिक, ईमानदार और सम्यक नहीं है। भारत को इससे बेहतर नेतृत्व मिलना चाहिए।

साभार – मनोज खरे

अप्रैल 5, 2014

क्रूरता…(कुमार अंबुज)

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा ऋंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अंबुज)

अप्रैल 3, 2014

“आप” डायरी (3 अप्रैल 2014) : मेनिफेस्टो, जनसभाएं, ईवीएम में गडबडी

AAP manifestoआम आदमी पार्टी (आप) ने 3 अप्रैल 2014 को लोकसभा चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र (मेनिफेस्टो) जारी कर दिया [आप” का मेनिफेस्टो यहाँ पढ़ें| दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय “आप” ने 70 विधानसभा क्षेत्रों के लिए अलग-अलग घोषणापत्र जारी किये थे जिनके बहुत सारे अंश बाद में भाजपा ने भी कॉपी किये| भारत में केन्द्र की राजनीति में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने अभी तक अपना चुनावी घोषणापत्र जारी नहीं किया है और ऐसा बताया गया है कि भाजपा 7 अप्रैल को अपना घोस्नापत्र जारी करेगी| गौरतलब है कि उसी दिन लोकसभा चुनाव का पहला चरण शुरू है और देश के कई हिस्सों में मतदान होगा| इसका अर्थ यह भी कि इन् क्षेत्रों से भाजपा को कोई सरोकार नहीं है वरना पहले ही अपना घोषणापत्र जारी कर देती जिससे कि उस दिन मतदान करने वाले भारतीय भी उसका घोषणापत्र देख लेते और उस पर विचार कर लेते|

अब अगर भाजपा के घोषणापत्र में “आप” के घोषणापत्र से मिलती जुलती बातें मिलती हैं या उनके बिंदुओं की खास काट मिलती है तो यह निश्चित हो जाएगा कि भाजपा केवल “आप” के घोषणापत्र का इंतजार कर रही थी| मुख्य विपक्षी दल होने के नाते और अपना प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा महीनों पहले करने वाले दल को मेनिफेस्टो जारी करने की फुर्सत नहीं मिली यह बात पचती नहीं| या तो भाजपा मेनिफेस्टो को महत्वपूर्ण समझती ही नहीं या उसका भी यही ख्याल है कि मेनिफेस्टो को पढता कौन है? कांग्रेस और भी बड़ी गुनाहगार है इस मामले में क्योंकि आजादी के बाद वही सबसे ज्यादा सत्ता में रही है और उसने भी अपना मेनिफेस्टो कुछ ही दिन पहले जारी किया है|

EVMअसम में ईवीएम की जांच के दौरान पाया गया कि किसी भी पार्टी के उम्मीदवार के लिए मत डालने के लिए बटन दबाया गया पर मत जाकर दर्ज हुआ सिर्फ भाजपा के खाते में! कुछ अरसा पहले एक खबर छपी थी जिसे शायद दबा दिया गया कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ संभव हो सकती है और जिस तरह की तकनीकी खराबी असम वाले मामले में देखी गई है ऐसी ही संभावना का जिक्र उस खबर में था|

क्या लोकतंत्र के पीने के पानी में मिलावट हो गयी है? सीवर का पाइप अपने आप फटा है या इसे फाड़ने वाले हर सरकारी तंत्र में घुस चुके हैं? चुनाव आयोग यदि सोया रह गया तो लोकतंत्र के खात्मे के बाद उसके कर्मचारियों को को हो सकता है नगर पालिका में स्थान्तरित कर दिया जाए|

बीते दिन 2 अप्रैल को आज-तक चैनल ने स्टिंग करके खुलासा किया था कि बहुत बड़ी संख्या में नकली मतदाता पत्र बनाए गये हैं और विशेषज्ञों का कहना था कि 40% तक नकली मत पत्र बने हो सकते हैं| शरद पवार ने तो यह कहकर अपने कथन से पल्ला झाड लिया कि उन्होंने मजाक में कहा था कि वोट देने के बाद उंगली पर लगी स्याही मिटा कर दूसरी जगह जाकर वोट दे आना, पर स्टिंग में साफ़ तौर पर दिखाया गया कि कैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान स्याही का दाग मिटाने वाला ५-५ किलो कैमिकल एक सप्लायर ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को दिया| क्या दिल्ली विधानसभा के दौरान ट्रक भर कर कुछ बूथों पर शाम पांच बजे के आसपास पहुंचे मतदाताओं और इस स्टिंग के बीच कोई संबंध है? ऐसा कहा गया है कि जहां भी देर रात तक वोटिंग हुयी वहीं से “आप” के कुछ उम्मीदवार दो हजार से भी कम मतों से हारे|AAP_Delhi2

“आप” को घेर कर खत्म कर देने की ऐसी साजिशों के बीच “आप” का चुनाव प्रचार बदस्तूर जारी है और अरविंद केजरीवाल खुद दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं पिछले दो दिन से और वे सातों लोकसभा क्षेत्रों में रोड शो और जनसभाएं करेंगे| अपेक्षित रूप से जहां भी वे जा रहे हैं अथाह भीड़ उनके साथ चलने के लिए इकट्ठी हो जाती है|

त्रिलोकपुरी में अरविंद केजरीवाल ने राजमोहन गांधी के लिए जनसभा की|

भारत के हर उस क्षेत्र जहां से “आप” के उम्मीदवार खड़े हैं जनता का बड़ा तबका उनसे जुडता जा रहा हैं|

इंदौर में वहाँ के प्रत्याशी अनिल त्रिवेदी के रोड शो का नजारा कम दिलचस्प नहीं|

AAP_Indoreइंदौर मेंअरविंद केजरीवाल ने गुजरात दौरे के बाद नरेंद्र मोदी से 17 सवाल पूछे थे| गुजरात सरकार ने कई दिन बाद 16 सवालों के जवाब दिए| अरविंद केजरीवाल के सवालों के बाद गुजरात सरकार की वेबसाईट से तथ्य एबम आंकड़े हटा दिए गये और हवाला दिया गया चुनाव की वजह से हटाये गएँ हैं|

AK tweet

अरविंद केजरीवाल और “आप” को पानी पी पे कोस रहे भाजपाइयों को यह बात हजम न हो पाए कि बस कुछ ही बरस पहले नरेंद्र मोदी ट्विट के जरिये अरविंद केजरीवाल के भ्रष्टाचार की मुहीम को समर्थन देने की अपील कर रहे थे |

Modi@AK

4 अप्रैल को ही ABP चैनल पर अभिनेता आमिर खान ने ऐसे उमीदवारों की बात की जिन पर अपराध के गंभीर आरोप हैं| और दलों ने तो साँस नहीं लिया सुधार के नाम पर “आप” के मनीष सिसोदिया ने कार्यक्रम में ही घोषणा कर दी कि “आप” दो दागी उम्मीदवारों के टिकट वापिस ले रही है और बाकी 5-6 के ऊपर जांच के बाद यथोचित कार्यवाही होगी|

http://www.dailymotion.com/video/x1lmcbt_asar-with-aamir-khan-3rd-april-2014-video-watch-online-pt3_people?start=2

 

भाजपा केवल टीवी कार्यक्रम में ही आएं बाएं नहीं गाने लगी दागी उम्मीदवारों के मामले पर, बल्कि कुछ अरसा पहले इसके एक पूर्व अध्यक्ष को ऑन-रिकार्ड कहते पाया गया था कि “अगर भाजपा ईमानदार उम्मीदवारों को टिकट दे दे तो एक भी सीट न मिले”| नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से भ्रष्टाचारियों को भाजपा के अंदर से चुन कर और बाहर दूसरे दलों से आमंत्रित करके लोकसभा के टिकट बांटे हैं उससे स्पष्ट है वे किस तरह का भारत चाहते हैं और किस तरह की राजनीति उनके नियंत्रण में चलेगी|

अप्रैल 3, 2014

अरविंद केजरीवाल : इस्तीफा क्यों दिया था, बोलो?

resignAAPLet’s take this “AAP ran away from Delhi” allegation. Here are the facts, should you choose to consider them at all:

* AAP did not win the most seats in Delhi. It won 28 out of 70. The BJP won 31 and had 1 external support.
The Congress had 8. No one had majority.

* The BJP declined to govern. It “ran away”, and not the last time either as you’ll see.

* The Congress offered AAP support from the outside – remember, the AAP didn’t ask for it. The AAP said “Hey, if you agree with us on the 18 laws we want to change, and if you agree in writing to support them, then we can break the deadlock and give Delhi a government. Else we are happy to stay where we are or go for a re-election.”

* The Congress – perhaps fearing a re-election where they would win even less, said yes, in writing.

* The AAP formed the Delhi government with the outside support of the Congress. In the first 7 weeks they passed 16 of the 18 laws they had promised to pass. This itself is unprecedented, if you choose to see it as such, and some sort of proof of governance, again if you choose to see it as such.

* The two laws they could not pass, because of staunch opposition from Congress and BJP, were the Jan Lok Pal bill and the Swaraj Bill. The Congress by now had gone back on its written word, and they teamed up with the BJP who were also afraid of their corrupt netas and even more corrupt sponsor Ambani being found out, and opposed these bills.

* Perhaps the tipping point was the FIR filed against Mukesh Ambani and Reliance for attempting to steal Rs. 25,000 crores from the coffers through artificially inflated gas prices. In a clear show of who actually directs the Congress and BJP, both parties came together 3 days after the Ambani FIR to vote down the AAP-proposed bills and in effect, end the AAP government.

AKresignmedia* Faced with this, the AAP had a choice – they could either compromise and govern Delhi under the proxy thumb of the Congress-BJP-Reliance combine – or they could resign and seek a fresh mandate from the people- and get the 36+ seats they needed, to rule Delhi the way the voters wanted.

* The AAP resigned and asked the Lieutenant Governor to call fresh elections right away to see if they could the full mandate to govern without compromise. This was a few months ago.

* At this point, both the BJP and Congress, in unison protested and said they were too busy doing other things to care about fighting elections in Delhi. In effect, both of them ran away again. So Delhi suffers under no rule right now – but this is not because the AAP ran away. It’s because the BJP and Congress did.

* And currently that’s the situation. The AAP wants elections in Delhi. It believes it can clearly win a majority by itself. The Congress and the BJP are the “bhagodas” in Delhi, unwilling to face the electorate for the state legislative assembly right away.

* What they are hoping for, perhaps, is to try to win some presence in Parliament and then buy AAP legislators over to their side later. They believe the more they can delay elections in Delhi, the more they can create fear, uncertainty and doubt to try to get voters back to them.

Now these are the facts about who ran away and who didn’t.

(Mahesh Murty)

 

अप्रैल 2, 2014

कहो बनारस कैसे हो अब?

कहो बनारस कैसे हो अब?

कैसी हैं लंका की गलियां
दशाश्वमेध का हाल है क्या?
हत्यारे के अभिषेक को गंगाजल तैयार है क्या?
बिस्मिल्ला की शहनाई क्या अब भी बजती है वैसे ही
क्या अब भी हर हर की ध्वनि सुन सब भोले को ही भजते हैं?
क्या अब भी छन्नू मिसिर के शिव नचते हैं मस्त मसानों में?

यह नमो नमो का नारा सुनकर डर तो नहीं लगा तुमको?
ठीकठाक तो है न सब?
कहो बनारस कैसे हो अब?

नींद रात को आती तो है?
कहीं स्वप्न में दंगों वाली आग का धुआँ भरा तो नहीं?
कहीं उम्मीदों वाला सपना इन नारों से मरा तो नहीं?
कहो आज तो कह लो जाने कल ये मौक़ा मिले ना मिले
कहीं सूर्य की पहली किरण में कोई अन्धेरा भरा तो नहीं?

कह दो प्यारे
फिर जाने तुमसे अब मिलना हो कब
कहो बनारस कैसे हो अब?

देखो कैसे डर का बादल घिरता आता है
देखो कैसे गर्जन तर्जन से एक सन्नाटा छाया है
देखो कैसे घर घर में उठती जाती हैं दीवारें
देखो कैसे रंग बदलती गिरगिट सर पे नाच रही है
देखो कैसे एक अन्धेरा धूप निगलता निकल पड़ा है
देखो अजाने डरी हुई हैं और मुअज्जिन डरा हुआ है
कालिख का रंग उनके भोर के सपनों तक में भरा हुआ है

कैसी रंगत रात ने बदली
दिन ने बदले कैसे ढब
कहो बनारस कैसे हो अब?

छोडो प्यारे ऐसा भी क्या चलो घाट पर चलते हैं
खोलो चुनौटी ताल बजाओ मिलकर सुरती मलते हैं
तुम भी यार ग़ज़ब हो ऐसे भी क्या सब मिट जाता है?
अपनी ताक़त इतनी भी क्या कम आगत की पदचाप सुनो
जो आया है धूमधाम से जाएगा चुपचाप सुनो
सुनो मेरी जां चौखम्भे और विश्वनाथ की आवाज़ सुनो

हाथ मिलाओ, साथ में आओ
मिलकर साथ चलेंगे सब
कहो बनारस कैसे हो अब?

(सुखपाल सिंह)

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