नवम्बर 11, 2022

इक्कीस्वीं सदी का जन्मगीत …(कृष्ण बिहारी)

कवि दृष्टा भी होते हैं और तेजी से बदलते समय में भी आगे के काल का पूर्वानुमान लगा लेते हैं| इक्कीसवीं सदी का बाइसवां साल भी अब समाप्ति के कगार पर आ खडा हुआ है तब सुप्रसिद्ध कवि श्री कृष्ण बिहारी जी की कविता “आ रही है इक्कीस्वीं सदी…” जो उन्होंने ३१ दिसम्बर २००० की रात लिखी थी, अपनी सामग्री के लिए भी याद किये जाने लायक है कि कवि ने जो देखा, समझा, और जिसका पूर्वानुमान उन्होंने लगाया था, उसमें कितना सही अब तक ठहरता है|

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पूरी सदी का चश्मदीद गवाह होने का सुख,
बिरलों को मिलता है,
और एक ही जन्म में दो सदियों से गुजरना !

यह बिरलों में से भी बिरलों को मिलता है|


जो किसी रोमांचक अनुभव से कम नहीं है,

मगर इस रोमांच को महसूसने के बाद की दहशत

बहुत भयावह , बहुत बदसूरत , बहुत हैवतनाक,बहुत मनहूस और बहुत कडवी है|


आने वाले वक्तों में मकान होंगे , घर नहीं,

मुझे याद है,

कल तक होते थे घर .घर में होते थे रिश्ते,

रिश्तों में होता था प्यार,

प्यार में होती थी खुशबू

और खुशबू में होती थी चाहत,

जो महकती रहती थी पूरी आजादी के साथ,

निर्विघ्न …

अलगू साहू के घर के पीछे की झुंगडी से लेकर आमी नदी के तट तक,
जमुना काका की चमरौटी से

तपसी अहीर की अहिरौटी तक महक में

कोई फर्क बता पाना किसी आदमी के वश की बात नहीं थी,

क्योंकि ,

महक की पहचान आदमी कर ही नहीं सकता,

यह तो आदमीयत के दुश्मनों को अनायास मिली सौगात है,

जिसे वे बेहिचक बांटते रहते हैं .इधर से उधर तक …
बाँट दी महक,

बाँट दी खुशबू ,

बाँट दी चाहत,

उठाकर एक चौहद्दी,

गिराकर वह दीवार जो कभी कहीं थी ही नहीं,

उठा ली एक दीवार पोरसे बराबर;

जिसके ऊपर रख दिए हैं शीशे के टुकड़े .

जिन्हें देखकर आदमी डरने लगा है…

बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही डूबने लगे थे सितारे उस साम्राज्य के

जिसका सूरज /डूबने से शर्माता था,

दूसरे दशक में शुरू हुआ पहला विश्व युद्ध,

ले आया अपने साथ विभीषिका महामारियों की,

आदमी ने जो तजवीज की थी विद्ध्वंस के लिए,

उसका फल मिला उसे भरपूर,

दूसरे विश्व युद्ध में,

आदमी न रहा आदमी,

हो गया जानवर से भी बदतर …
कहते हैं कि जब -जब दुनिया होती है प्रगति के शिखर पर,

पनपते हैं छल -छंद,

मिटता जाता है वह वातावरण,

जिसे हम कहते है सकारत्मक,

ज्यों -ज्यों होता गया आदमी स्वतंत्र,

होता गया अपनी ही निरंकुशता का वाहक,

आदमी होता गया देश,

आज उन देशों के नाम हैं

… सद्दाम हुसेन …बिल क्लिंटन …

जाती हुई सदी लेकर जा रही है

हमारी उदारता ,

पर दुःख कातरता ,

सहभागिता और सामंजस्यपूर्ण जीवन …
आती हुई सदी लेकर आ रही है,

गाइडेड मिसाइल , विध्वंस , मृत्यु का शिकंजा और रेडियेशन|

दो सदियाँ मिलने वाली हैं –

सौतेली बहनों की तरह .

दो सदियाँ बिछड़ने वाली हैं –

सगी बहनों की तरह,

बिना जाने कि उनके इस तरह अलगाव का अंजाम क्या होगा?

रह जायेंगे कुछ भाग्यवान लोग

दुर्भाग्यशालियों की तरह रखने को लेखा -जोखा दोनों सदियों का

यह बताने को कि क्या पाया

क्या खोया

क्या काटा

क्या बोया|

आ रही है इक्क्सीवीं सदी यह बताने को कि

आदमी को आदमी से न रहा कोई मतलब

आदमी हो गया है माल

जिसकी खपत उसके अपने विज्ञापित होने में है

जितना ज्यादा विज्ञापन

उतना जरूरी माल

विशुद्ध के नाम पर कितना मिलावटी

कितना बनावटी

कितना खोटा …

इतना कि परछाई से भी छिपाने लगा है वह अपने राज …

आ रही है इक्कसवीं सदी

जिसका स्वागत करने के लिए बरसों से कंप्यूटर पर बनने लगे हैं वन्दनवार ,

आदमियों के देशों के साथ खड़ी है दुनिया सामने स्क्रीन लगाए देखने को वह विचित्र चेहरा

जो छिपाए हुए है अपने दामन में भयावह त्रासदियों के कोलाहल

पानी में छिपी हुई भीषण आग की तरह

जिसमें समां जायेगी समूची सृष्टि अपने इतिहास की तरह…
फिर शायद ….

फिर से कहीं कोई बचा रह जाएगा मनु …

एक नयी दुनिया के सृजन के लिए …

{कृष्ण बिहारी} ( ३१ -१२-२०००)

नवम्बर 6, 2022

“टॉर्च बेचने वाले” : “ओशो (आचार्य रजनीश)” पर “हरिशंकर परसाई का आक्रमण” और उस पर ओशो का दृष्टिकोण

[“वह पहले चौराहों पर बिजली के टार्च बेचा करता था । बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा । कल फिर दिखा । मगर इस बार उसने दाढी बढा ली थी और लंबा कुरता पहन रखा था ।
मैंने पूछा, ”कहाँ रहे? और यह दाढी क्यों बढा रखी है? ”
उसने जवाब दिया, ”बाहर गया था । ”
दाढीवाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढी पर हाथ फेरने लगा । मैंने कहा, ”आज तुम टार्च नहीं बेच रहे हो? ”
उसने कहा, ”वह काम बंद कर दिया । अब तो आत्मा के भीतर टार्च जल उठा है । ये ‘ सूरजछाप ‘ टार्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं । ”
मैंने कहा, ”तुम शायद संन्यास ले रहे हो । जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है । किससे दीक्षा ले आए? ”
मेरी बात से उसे पीडा हुई । उसने कहा, ”ऐसे कठोर वचन मत बोलिए । आत्मा सबकी एक है । मेरी आत्मा को चोट पहुँचाकर आप अपनी ही आत्मा को घायल कर रहे हैं । ”

मैंने कहा, ”यह सब तो ठीक है । मगर यह बताओ कि तुम एकाएक ऐसे कैसे हो गए? क्या बीवी ने तुम्हें त्याग दिया? क्या उधार मिलना बंद हो गया? क्या हूकारों ने ज्यादा तंग करना शुरू कर दिया? क्या चोरी के मामले में फँस गए हो? आखिर बाहर का टार्च भीतर आत्मा में कैसे घुस गया? ”

उसने कहा, ”आपके सब अंदाज गलत हैं । ऐसा कुछ नहीं हुआ । एक घटना हो गई है, जिसने जीवन बदल दिया । उसे मैं गुप्त रखना चाहता हूँ । पर क्योंकि मैं आज ही यहाँ से दूर जा रहा हूँ, इसलिए आपको सारा किस्सा सुना देता हूँ ।” उसने बयान शुरू किया पाँच साल पहले की बात है । मैं अपने एक दोस्त के साथ हताश एक जगह बैठा था । हमारे सामने आसमान को छूता हुआ एक सवाल खड़ा था । वह सवाल था – ‘ पैसा कैसे पैदा करें?’ हम दोनों ने उस सवाल की एक-एक टाँग पकड़ी और उसे हटाने की कोशिश करने लगे । हमें पसीना आ गया, पर सवाल हिला भी नहीं । दोस्त ने कहा – ”यार, इस सवाल के पाँव जमीन में गहरे गड़े हैं । यह उखडेगा नहीं । इसे टाल जाएँ । ”

हमने दूसरी तरफ मुँह कर लिया । पर वह सवाल फिर हमारे सामने आकर खडा हो गया । तब मैंने कहा – ”यार, यह सवाल टलेगा नहीं । चलो, इसे हल ही कर दें । पैसा पैदा करने के लिए कुछ काम- धंधा करें । हम इसी वक्त अलग- अलग दिशाओं में अपनी- अपनी किस्मत आजमाने निकल पड़े । पाँच साल बाद ठीक इसी तारीख को इसी वक्त हम यहाँ मिलें । ”
दोस्त ने कहा – ”यार, साथ ही क्यों न चलें? ”
मैंने कहा – ”नहीं । किस्मत आजमानेवालों की जितनी पुरानी कथाएँ मैंने पढ़ी हैं, सबमें वे अलग अलग दिशा में जाते हैं । साथ जाने में किस्मतों के टकराकर टूटने का डर रहता है । ”

तो साहब, हम अलग-अलग चल पडे । मैंने टार्च बेचने का धंधा शुरू कर दिया । चौराहे पर या मैदान में लोगों को इकु कर लेता और बहुत नाटकीय ढंग से कहता – ”आजकल सब जगह अँधेरा छाया रहता है । रातें बेहद काली होती हैं। अपना ही हाथ नहीं सूझता । आदमी को रास्ता नहीं दिखता । वह भटक जाता है । उसके पाँव काँटों से बिंध जाते हैं, वह गिरता है और उसके घुटने लहूलुहान हो जाते हैं। उसके आसपास भयानक अँधेराहै । शेर और चीते चारों तरफ धूम रहे हैं, साँप जमीन पर रेंग रहे हैं । अँधेरा सबको निगल रहा है । अँधेरा घर में भी है । आदमी रात को पेशाब करने उठता है और साँप पर उसका पाँव पड़ जाता है । साँप उसे डँस लेता है और वह मर जाता है । ”आपने तो देखा ही है साहब, कि लोग मेरी बातें सुनकर कैसे डर जाते थे । भरदोपहर में वे अँधेरे के डर से काँपने लगते थे । आदमी को डराना कितना आसान है!

लोग डर जाते, तब मैं कहता – ”भाइयों, यह सही है कि अँधेरा है, मगर प्रकाश भी है । वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूँ । हमारी ‘ सूरज छाप ‘ टार्च में वह प्रकाश है, जो अंधकार को दूर भगा देता है । इसी वक्त ‘ सूरज छाप ‘ टार्च खरीदो और अँधेरे को दूर करो । जिन भाइयों को चाहिए, हाथ ऊँचा करें । ”
साहब, मेरे टार्च बिक जाते और मैं मजे में जिंदगी गुजरने लगा ।

वायदे के मुताबिक ठीक पाँच साल बाद मैं उस जगह पहुँचा, जहाँ मुझे दोस्त से मिलना था । वहाँ दिन भर मैंने उसकी राह देखी, वह नहीं आया । क्या हुआ? क्या वह भूल गया? या अब वह इस असार संसार में ही नहीं है?मैं उसे ढूंढ़ने निकल पडा ।

एक शाम जब मैं एक शहर की सडक पर चला जा रहा था, मैंने देखा कि पास के मैदान में खुब रोशनी है और एक तरफ मंच सजा है । लाउडस्पीकर लगे हैं । मैदान में हजारों नर-नारी श्रद्धा से झुके बैठे हैं । मंच पर सुंदर रेशमी वस्त्रों से सजे एक भव्य पुरुष बैठे हैं । वे खुब पुष्ट हैं, सँवारी हुई लंबी दाढी है और पीठ पर लहराते लंबे केश हैं ।
मैं भीड के एक कोने में जाकर बैठ गया ।
भव्य पुरुष फिल्मों के संत लग रहे थे । उन्होंने गुरुगभीर वाणी में प्रवचन शुरू किया । वे इस तरह बोल रहे थे जैसे आकाश के किसी कोने से कोई रहस्यमय संदेश उनके कान में सुनाई पड़ रहा है जिसे वे भाषण दे रहे हैं ।

वे कह रहे थे – ”मैं आज मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूँ । उसके भीतर कुछ बुझ गया है । यह युग ही अंधकारमय है । यह सर्वग्राही अंधकार संपूर्ण विश्व को अपने उदर में छिपाए है । आज मनुष्य इस अंधकार से घबरा उठा है । वहपथभ्रष्ट हो गया है । आज आत्मा में भी अंधकार है । अंतर की आँखें ज्योतिहीन हो गई हैं । वे उसे भेद नहीं पातीं । मानव- आत्मा अंधकार में घुटती है । मैं देख रहा हूँ, मनुष्य की आत्मा भय और पीड़ा से त्रस्त है । ”
इसी तरह वे बोलते गए और लोग स्तव्य सुनते गए ।
मुझे हँसी छूट रही थी । एकदो बार दबातेदबाते भी हँसी फूट गई और पास के श्रोताओं ने मुझे डाँटा ।

भव्य पुरुष प्रवचन के अंत पर पहुँचते हुए कहने लगे – ”भाइयों और बहनों, डरो मत । जहाँ अंधकार है, वहीं प्रकाश है । अंधकार में प्रकाश की किरण है, जैसे प्रकाश में अंधकार की किंचित कालिमा है । प्रकाश भी है । प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो । अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ । मैं तुम सबका उस ज्योति को जगाने के लिए आहान करता हूँ । मैं तुम्हारे भीतर वही शाश्वत ज्योति को जगाना चाहता हूँ । हमारे ‘ साधना मंदिर ‘ में आकर उस ज्योति को अपने भीतर जगाओ । ”साहब, अब तो मैं खिलखिलाकर हँस पडा । पास के लोगों ने मुझे धक्का देकर भगा दिया । मैं मंच के पास जाकर खडा हो गया ।

भव्य पुरुष मंच से उतरकर कार पर चढ रहे थे । मैंने उन्हें ध्यान से पास से देखा । उनकी दाढी बढी हुई थी, इसलिए मैं थोडा झिझका । पर मेरी तो दाढी नहीं थी । मैं तो उसी मौलिक रूप में था । उन्होंने मुझे पहचान लिया । बोले – ”अरे तुम! ”मैं पहचानकर बोलने ही वाला था कि उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर कार में बिठा लिया । मैं फिर कुछ बोलने लगा तो उन्होंने कहा – ”बँगले तक कोई बातचीत नहीं होगी । वहीं ज्ञानचर्चा होगी । ”
मुझे याद आ गया कि वहाँ ड्राइवर है ।
बँगले पर पहुँचकर मैंने उसका ठाठ देखा । उस वैभव को देखकर मैं थोडा झिझका, पर तुरंत ही मैंने अपने उस दोस्त से खुलकर बातें शुरू कर दीं ।
मैंने कहा – ”यार, तू तो बिलकुल बदल गया । ”
उसने गंभीरता से कहा – ”परिवर्तन जीवन का अनंत क्रम है । ”
मैंने कहा – ”साले, फिलासफी मत बघार यह बता कि तूने इतनी दौलत कैसे कमा ली पाँच सालों में? ”
उसने पूछा – ”तुम इन सालों में क्या करते रहे? ”
मैंने कहा ”मैं तो धूममूमकर टार्च बेचता रहा । सच बता, क्या तू भी टार्च का व्यापारी है? ”
उसने कहा – ”तुझे क्या ऐसा ही लगता है? क्यों लगता है? ”

मैंने उसे बताया कि जो बातें मैं कहता हूँ; वही तू कह रहा था मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू उन्हीं बातों को रहस्यमय ढंग से कहता है । अँधेरे का डर दिखाकर लोगों को टार्च बेचता हूँ । तू भी अभी लोगों को अँधेरे का डर दिखा रहा था, तू भी जरूर टार्च बेचता है ।
उसने कहा – ”तुम मुझे नहीं जानते, मैं टार्च क्यों बेचूगा! मैं साधु, दार्शनिक और संत कहलाता हूँ । ”

मैंने कहा ”तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टार्च हो । तुम्हारे और मेरे प्रवचन एक जैसे हैं । चाहे कोई दार्शनिक बने, संत बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अँधेरे का डर दिखाता है, तो जरूर अपनी कंपनी का टार्च बेचना चाहता है । तुम जैसे लोगों के लिए हमेशा ही अंधकार छाया रहता है । बताओ, तुम्हारे जैसे किसी आदमी ने हजारों में कभी भी यह कहा है कि आज दुनिया में प्रकाश फैला है? कभी नहीं कहा । क्यों? इसलिए कि उन्हें अपनी कंपनी का टार्च बेचना है । मैं खुद भरदोपहर में लोगों से कहता हूँ कि अंधकार छाया है । बता किस कंपनी का टार्च बेचता है? ”

मेरी बातों ने उसे ठिकाने पर ला दिया था । उसने सहज ढंग से कहा – ”तेरी बात ठीक ही है । मेरी कंपनी नयी नहीं है, सनातन है । ” मैंने पूछा – ”कहाँ है तेरी दुकान? नमूने के लिए एकाध टार्च तो दिखा । ‘ सूरज छाप ‘ टार्च से बहुत ज्यादा बिक्री है उसकी ।

उसने कहा – ”उस टार्च की कोई दुकान बाजार में नहीं है । वह बहुत सूक्ष्म है । मगर कीमत उसकी बहुत मिल जाती है । तू एक-दो दिन रह, तो मैं तुझे सब समझा देता हूँ । ”
”तो साहब मैं दो दिन उसके पास रहा । तीसरे दिन ‘ सूरज छाप ‘ टार्च की पेटी को नदी में फेंककर नया काम शुरू कर दिया । ”
वह अपनी दाढी पर हाथ फेरने लगा । बोला – ”बस, एक महीने की देर और है। ”मैंने पूछा -‘ तो अब कौन-सा धंधा करोगे? ”
उसने कहा – ”धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा । बस कंपनी बदल रहा हूँ । ”] (हरिशंकर परसाई)


ओशो ने व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई की रचना और एक अखबार में अपने विरुद्ध लिखे लेख को किस तरह लिया? 11 सितम्बर 1976 को पूना आश्रम में “अष्टावक्र महागीता” श्रंखला पर प्रवचनों की शुरुआत करते हुए पहले प्रवचन में ओशो ने परसाई जी के एक लेख की चर्चा की|




प्रवचन के मध्य की कुछ पंक्तियाँ –

” एक तो ढंग है फूल से पीछे की तरफ देखना, और एक है बीज से आगे की तरफ देखना।
गौर से देखो तो दोनों में सार—सूत्र एक ही है, दोनों की आधारभित्ति एक ही है; लेकिन कितना जमीन— आसमान का अंतर हो जाता है!
जो बीज वाला है, वह भी यह कह रहा है कि जो बीज में नहीं है वह फूल में कैसे हो सकता है? यह उसका तर्क है।
फूल वाला भी यही कह रहा है। वह कह रहा है, जो फूल में है वह बीज में भी होना ही चाहिए। दोनों का तर्क तो एक है। लेकिन दोनों के देखने के ढंग अलग हैं। बड़ी अड़चन है!
मुझसे कोई पूछता था कि आपके साथ बचपन में बहुत लोग पढ़े होंगे—स्कूल में, कालेज में—वे दिखायी नहीं पड़ते! वे कैसे दिखायी पड़ सकते हैं! उनको बड़ी अड़चन है। वे भरोसा नहीं कर सकते। अति कठिन है उन्हें।

कल ही मेरे पास रायपुर से किसी ने एक अखबार भेजा। श्री हरिशंकर परसाई ने एक लेख मेरे खिलाफ लिखा है। वे मुझे जानते हैं, कालेज के दिनों से जानते हैं। हिंदी के मूर्धन्य व्यंग्यलेखक हैं। मेरे मन में उनकी कृतियों का आदर है। लेख में उन्होंने लिखा है कि जबलपुर की हवा में कुछ खराबी है। यहां धोखेबाज और धूर्त ही पैदा होते हैं—जैसे रजनीश, महेश योगी, मूंदड़ा। तीन नाम उन्होंने गिनाए। धन्यवाद उनका, कम से कम मेरा नाम नंबर एक तो गिनाया। इतनी याद तो रखी! एकदम बिसार नहीं दिया। बिलकुल भूल गये हों, ऐसा नहीं है।
लेकिन अड़चन स्वाभाविक है, सीधी—साफ है। मैं उनकी बात समझ सकता हूं। यह असंभव है—बीज को देखा तो फूल में भरोसा! फिर जिन्होंने फूल को देखा, उन्हें बीज में भरोसा मुश्किल हो जाता है। तो सभी महापुरुषों की जीवन—कथाएं दो ढंग से लिखी जाती हैं। जो उनके विपरीत हैं, वे बचपन से यात्रा शुरू करते हैं; जो उनके पक्ष में हैं, वे अंत से यात्रा शुरू करते हैं और बचपन की तरफ जाते हैं। दोनों एक अर्थ में सही हैं। लेकिन जो बचपन से यात्रा करके अंत की तरफ जाते हैं, वे वंचित रह जाते हैं। उनका सही होना उनके लिए आत्मघाती है, जो अंत से यात्रा करते हैं और पीछे की तरफ जाते हैं, वे धन्यभागी हैं। क्योंकि बहुत कुछ उन्हें अनायास मिल जाता है, जो कि पहले तर्कवादियो को नहीं मिल पाता।
अब न केवल मैं गलत मालूम होता हूं मेरे कारण जबलपुर तक की हवा उनको गलत मालूम होती है. कुछ भूल हवा—पानी में होनी चाहिए! यद्यपि मैं उनको कहना चाहूंगा, जबलपुर को कोई हक नहीं है मेरे संबंध में हवा—पानी को अच्छा या खराब तय करने का। जबलपुर से मेरा कोई बहुत नाता नहीं है। थोड़े दिन वहां था। महेश योगी भी थोड़े दिन वहां थे। उनका भी कोई नाता नहीं है। हम दोनों का नाता किसी और जगह से है। उस जगह के लोग इतने सोए हैं कि उन्हें अभी खबर ही नहीं है। महेश योगी और मेरा जन्म पास ही पास हुआ। दोनों गाडरवाड़ा के आस—पास पैदा हुए। उनका जन्म चीचली में हुआ, मेरा जन्म कुछवाड़े में हुआ। अगर हवा—पानी खराब है तो वहां का होगा। इसका दुख गाडरवाड़ा को होना चाहिए—कभी होगा। या सुख…। जबलपुर को इसमें बीच में आना नहीं चाहिए।
लेकिन मन कैसे तर्क रचता है!”
अक्टूबर 27, 2020

ग़ज़ल

कहाँ पर थे, कहाँ पर हैं
सड़क पर थे, सड़क पर हैं।।१।।


हमें रोटी ना,कपड़े ना
मंका भी ना,डगर भर है।।२।।

सड़क के ढोर देखें हैं
जुगाली पर ज़िंदा भर हैं ।।३।।


बरसतीं लाठियाँ हम पर
हर जुरमकारी हम पर है।।४।।

हमारे सर सब गवाही
पुलसिया ज़ोर हम पर है।।५।।

हम सड़क के दो कौड़ी के
ये सब तो “रंक” करम पर है।।६।।

[पीताम्बर दास सराफ “रंक”

कोटा (राजस्थान)]

मार्च 19, 2018

रुग्ण परिभाषाएँ

लूला, लंगड़ा, टुंडा, गूंगा, बहरा, काना, अंधा

कहकर गाली देते हैं

अपने जैसे पूर्ण देह वाले इंसानों को लोग|

सरकारी परिभाषाएँ “अपूर्ण अंगों”

में किसी प्रकार की “दिव्यता” का दर्शन करते हुए

इन्हे ‘दिव्यांग’ कहती हैं!

शरीर नश्वर है,

और

आत्मा –

अजर है

अमर है,

निराकार है,

शुद्धतम है,

निस्पृह है,

अस्पर्शनीय है ,

अदृश्य है,

आदि हुंकारने वाले,

चेतना और प्रबोधन को फलीभूत कर दिखाने वाले,

और अष्टावक्र सरीखे मनीषियों को जन्म देने वाले,

प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक के जन्मदाता

देश से पूछा तो जा ही सकता है

वास्तव में ये हैं कौन?

 

…[राकेश]

अगस्त 3, 2017

सौंदर्यबोध

 

अपने इस गटापार ची बबुए के

पैरों में शहतीरें बांधकर

चौराहे पर खड़ा कर दो,

फिर, चुपचाप ढ़ोल बजाते जाओ,

शायद पेट भर जाए :

दुनिया विवशता नहीं

कुतूहल खरीदती है|

 

भूखी बिल्ली की तरह

अपनी गरदन में संकरी हाँडी फँसाकर

हाथ-पैर पटको,

दीवारों से टकराओ,

महज छटपटाते जाओ,

शायद दया मिल जाए:

दुनिया आँसू पसन्द करती है

मगर शोख चेहरों के|

 

अपनी हर मृत्यु को

हरी-भरी क्यारियों में

मरी हुई तितलियों-सा

पंख रंगकर छोड़ दो,

शायद संवेदना मिल जाए :

दुनिया हाथों-हाथ उठा सकती है

मगर इस आश्वासन पर

कि रुमाल के हल्के-से स्पर्श के बाद

हथेली पर एक भी धब्बा नहीं रह जाएगा|

 

आज की दुनिया में

विवशता,

भूख,

मृत्यु,

सब सजाने के बाद ही

पहचानी जा सकती है|

बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती हैं|

शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी

जो मरने के पूर्व

कफ़न और फूलों का

प्रबन्ध नहीं कर लेंगें|

ओछी नहीं है दुनिया:

मैं फिर कहता हूँ,

महज उसका सौंदर्य-बोध

बढ़ गया है|

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अगस्त 1, 2017

टूटा पहिया

मैं

रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंकों मत

क्या जाने कब

इस दुरूह चक्रव्यूह में

अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ

कोई दुस्साहसी अभिमन्यु घिर जाए?

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी

बड़े- बड़े महारथी

अकेली निहत्थी आवाज को

अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं

रथ का टूटा पहिया

उसके हाथों में

ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत

इतिहासों की सामूहिक गति

सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने

सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!

(धर्मवीर भारती)

 

जुलाई 25, 2017

पथ-हीन

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल – अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन-सा पथ है?

‘महाजन जिस ओर जाएँ’- शास्त्र हुंकारा

‘अंतरात्मा ले चले जिस ओर ‘ – बोला न्याय पण्डित

‘साथ आओ सर्व-साधारण जनों के’ – क्रान्ति वाणी|

पर महाजन-मार्ग-गम्नोचित न संबल है, न रथ है,

अंतरात्मा अनिश्चय – संशय-ग्रसित,

क्रान्ति-गति-अनुसरण-योग्य है न पद-सामर्थ्य|

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल-अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन सा पथ है?

 

(भारतभूषण अग्रवाल)

जुलाई 24, 2017

बौनों की दुनिया …

 

हम सब बौने हैं,

मन से, मस्तिष्क से भी,

बुद्धि से, विवेक से भी,

क्योंकि हम जन हैं

साधारण हैं

नहीं हैं विशिष्ट

— क्योंकि हर ज़माना ही

चाहता है बौने रहें

वरना मिलेंगें कहाँ

वक्ता को श्रोता

नेता को पिछलगुए

बुद्धिजनों को पाठक

आंदोलनों को भीड़

धर्मों को भक्त

संप्रदायों को अतिमन्द

राज्यों को क्लर्क

कारखानों को मजदूर

तोपों को भोजन

पार्टी-बॉसों को यसमैन

राजाओं को गुलाम

डिक्टेटरों को अंधे

डिमोक्रेसी को मीडियोकर

मतवादों को बुद्धू

यूथ-वादों को सांचे ढले आदमी

हम सब उन्ही के लिए

युग-युग से जीते हैं

क्रीतदास हैं हम

इतिहास-वसन सीते हैं

इतिहास उनका है

हम सब तो स्याही हैं

विजय सभी उनकी

हम घायल सिपाही हैं

हमको हमेशा ही

घायल भी रहना

सिपाही भी रहना है

दैत्यों के काम निभा

बौने ही रहना है|

 

(गिरिजाकुमार माथुर)

 

जुलाई 21, 2017

माँ – अनोखे रूप

काशी दशाश्वमेघ घाट पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं, उन्ही में से एक छोटा- सा मंदिर गंगा में अधडूबा सा है, नौका-विहार करते समय एक मल्लाह  ने मुझे उस भग्न अध डूबे मंदिर की कहानी सुनाई|

एक बुड्ढी विधवा थी, उसका एक बेटा था| बुढ़िया ने मेहनत मजदूरी करके बेटे को पढ़ाया-लिखाया| बेटा बुद्धिमान था, पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया|वह अपनी माँ के दिन भूला नहीं , गंगा-तट पर उसने मंदिर बनवाया|

मंदिर बन गया तो माँ से बोला – माँ तूने मेरे लिए इतना किया| मैंने तेरे लिए मंदिर बनवा दिया है, अब तू इधर-उधर मत जा| इसी मंदिर में भगवान की पूजा कर| तूने मेरे लिए इतना किया मैंने भी मंदिर बनवा कर तेरे ऋण से मुक्त हो गया|

कहते हैं कि जैसे ही बेटे ने कहा- मैं तेरे ऋण से मुक्त हो गया वैसे ही मंदिर टूटकर गंगा जी में डूब गया|

मल्लाह ने मुझे बताया – वह यही मंदिर है|

* * * * * * * * * * * * * * * * * * *

मेरे स्वर्गीय मित्र डॉ. बिंदु माधव मिश्र की वृद्धा माता बीमार थीं| ९० से ज्यादा की उम्र थी| लोग उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित थे| घर भर सेवा में लगा था|

मैं भी उन्हें देखने गया, चरण स्पर्श किया, बोलीं – सोचती हूँ इतने जाड़े में मरी तो बच्चों को बड़ी तकलीफ होगी, किरिया कर्म, सर मुंडाना, सर्दी लग जायेगी|

(विश्वनाथ त्रिपाठी)

साभार: कथादेश, जून २०१७

जुलाई 20, 2017

हमारी गाए – मोहम्मद इस्माइल

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