दिसम्बर 8, 2015

विद्रोही : जेएनयू की चेतना के जनकवि का अंततः चले जाना

जेएनयू के नाम के साथ एकाकार हो चुके जनकवि रमा शंकर यादव ‘विद्रोही’ की मृत्यु, चेतना की उस परम्परा की मौत है, जो संभवतः अब कभी जेएनयू  या किसी अन्य भारतीय विश्वविद्यालय में कभी देखने को न मिले|

दशकों जेएनयू के कैम्पस में जंगल और चट्टानों पर बसेरा करने वाले विद्रोही को जग संभवतः पागल या अर्द्ध पागल तो कहेगा पर जेएनयू में उनसे पहले और उनके बाद प्रवेश पाने वाला हर जीवित व्यक्ति, दुनिया में कहीं भी बैठा हो, उनकी मृत्यु की खबर पढ़ आँखों में नमी भी महसूस करेगा| जिन प्रशासकों ने उन्हें जेएनयू कैम्पस से बाहर निकाला होगा, उन्हें भी आज कुछ छूटता महसूस हुआ होगा| छात्रों के हर आंदोलन में उनके साथ खड़े विद्रोही की कवितायेँ जेएनयू के चप्पे चप्पे पर बरसों, दशकों तक गूंजती रहेंगी और कैम्पस से बाहर की बाकी दुनिया में भी कहीं न कहीं किसी न किसी के माध्यम से जीवित रहेंगीं, पुनर्जीवित हो होकर! निराला जीवन तो था ही इस जनकवि का|

Vidrohi

(रमा शंकर यादव ‘ विद्रोही )

दिसम्बर 3, 2015

प्रेम – एक थीसिस

shashisimi-001मैत्री,सख्य, प्रेम – इन का विकास धीरे-धीरे होता है ऐसा हम मानते हैं: ‘प्रथम दर्शन से ही प्रेम’ की सम्भावना स्वीकार कर लेने से भी इस में कोई अन्तर नहीं आता| पर धीरे-धीरे होता हुआ भी यह सम गति से बढ़ने वाला विकास नहीं होता, सीढ़ियों की तरह बढ़ने वाली उस की गति होती है, क्रमश: नये-नये उच्चतर स्तर पर पहुँचने वाली|

कली का प्रस्फुटन उस की ठीक उपमा नहीं है, जिस का क्रम-विकास हम अनुक्षण देख सकें: धीरे-धीरे रंग भरता है, पंखुड़ियाँ खिलती हैं, सौरभ संचित होता है, और डोलती हवाएँ रूप को निखार देते जाती हैं|

ठीक उपमा शायद सांझ का आकाश है : एक क्षण सूना, कि सहसा हम देखते हैं, अरे वह तारा! और जब तक हम चौंक कर सोचें कि यह हम ने क्षण-भर पहले क्यों न देखा – क्या तब नहीं था? तब तक इधर-उधर, आगे, ऊपर कितने ही तारे खिल आए, तारे ही नहीं, राशि-राशि नक्षत्र-मंडल, धूमिल उल्कान्कुल, मुक्त्त-प्रवाहिनी नभ-पयम्बिनी- अरे, आकाश सूना कहाँ है, यह तो भरा हुआ है रहस्यों से, जो हमारे आगे उद्घाटित है…प्यार भी ऐसा ही है; एक समोन्नत ढलान नहीं, परिचिति के, आध्यात्मिक संस्पर्श के, नये-नये स्तरों का उन्मेष…उस की गति तीव्र हो या मंद, प्रत्यक्ष हो या परोक्ष, वांछित हो य वान्छातीत| आकाश चन्दोवा नहीं है कि चाहे तो तान दें, वह है तो है, और है तो तारों-भरा है, नहीं है तो शून्य-शून्य ही है जो सब-कुछ को धारण करता हुआ रिक्त बना रहता है…

(अज्ञेय : उपन्यास ‘नदी के द्वीप‘ में)

नवम्बर 4, 2015

पुस्तकों की होली…ब्रेख्त

brekht

शासन ने जब आदेश दिया कि

हानिकारक ज्ञान की पुस्तकों को

खुलेआम जला दिया जाय

और चारों तरफ होलिकाओं तक

पुस्तकों से लदी गाड़ियां खींचने के लिए

बैलों को विवश किया गया ,

देश से निर्वासित एक लेखक को,

श्रेष्ठतम में जो गिना जाता था,

जलाई गयी पुस्तकों की तालिका की बारीक जांच करने पर धक्का लगा,

क्योंकि उसकी पुस्तकों की उपेक्षा हुई थी.

क्षोभ के पंखों पर उड़ता हुआ वह लेखक अपनी मेज़ के पास पहुंचा

और सत्ताधारियों को एक पत्र लिखा :

‘मुझको जलाओ !

उड़ती हुई कलम से उसने लिखा,

मुझको जलाओ !

क्या मेरी पुस्तकों ने हमेशा सच नहीं कहा है ?

और यहाँ तुम मेरे साथ ऐसा बर्ताव करते हो , जैसे मैं झूठा हूँ!

मैं तुम्हें आदेश देता हूँ:

मुझे जलाओ !!”

बर्तोल्त ब्रेख्त : (1938)

अनुवाद : चन्द्रबली सिंह 

साभार  : जनपक्ष पत्रिका (जनवादी लेखक संघ वाराणसी की प्रस्तुती) एवं लेखक उदय प्रकाश

नवम्बर 2, 2015

1984 से 2002

देखो कैसी खिली है फ़सल अबके बरस कहर की
चीखों से फटी जाती है ख़ामोशी दोपहर की
लहू-चकां है आस्तीं हर हाकम-ए-शहर की
गली-गली में दौड़ रही है नदी-सी एक ज़हर की

दबी हुई सिसकियाँ, आब्रूएं लुटी हुईं
पगलाई हुई जुल्फ़ें, नज़रें बुझी हुईं
नोचे हुए नक़ुश, चूड़ियाँ टूटी हुईं
कांपती हुई रूहें, आरिज़ें सूजी हुईं

रक्सां है लाठी दर लाठी कूचा-ओ-बाज़ार
रंग-ए-खूं दमक रहा है कितने ही दर-ओ-दीवार
फैल रहा है किसी अफ़वाह जैसे नफ़रत का आज़ार
उठते-गिरते चमक रहे हैं खंजर और तलवार

और वोह चेहरे!
खौफ़नाक चैहरे मज़हबी वैह्शत के
ख़ुद से नाराज़ चैहरे छिनी हुई इज्ज़त के
मासूम चैहरे नासमझ दर्द के
बेख्वाब चैहरे जिस्म-ओ-जां सर्द के
दोगले चैहरे नकली ग़म-ख्वारों के
अंधे चैहरे शहर के पहरेदारों के

उस दौर-ए-क़त्ल-ए-आम की गवाही कौन देगा?
मुआफ्ज़ा-ए-मौत-ओ-तबाही कौन देगा?
कोई नहीं, कोई नहीं, कोई भी नहीं

सिवाए उस धुएं के
जो जा-बा-जा बेघर भटक रहा है, अब तक
कातिलों के ज़हन में खटक रहा है, अब तक
शायर की आँखों में अटक रहा है, अब तक

(सिफ़र)

अक्टूबर 29, 2015

हम एक नदी हैं

LaoTzuहमारा जीवन उस तरह का नहीं है

जैसे कि पहाड़ के एक तरफ चढ़ाई

और दूसरी तरफ ढलान|

हम नीचे गिरने और मरने के लिए

एक शिखर पर नहीं पहुंचे हैं|

हम पानी की बूंदों के जैसे हैं

जो कि समुद्र में जन्मती है

और जिसे नम्र बारिश धरती पर छिड़क जाती है|

हम पहले झरना बने

फिर धारा

और अंत में एक नदी

जो मजबूती से अपनी गहराई लिए बहती जाती है

और अपने घर पहुँचने तक

अपने संपर्क में आने वाली वस्तु को पोषित करती जाती है|

बुढाये जाने के आधुनिक मिथक को स्वीकार मत करो,

तुम गल नहीं रहे हो,

तुम व्यर्थता में खोते नहीं जा रहे हो

तुम एक ऋषि हो,

तुम बहुत गहरी और बहुत उपजाऊ क्षमता वाली नदी हो |

कुछ क्षण एक नदी के किनारे बैठो

और बड़े ध्यान से देखो

जब नदी तुम्हे तुम्हारे जीवन के बारे में बताए|

[“We Are a River,” from The Sage’s Tao Te Ching: Ancient Advice for the Second Half of Life, William Martin’s interpretation of the classic work by Lao Tzu (The Experiment, 2010)]

अनुवाद – …[राकेश]

 

 

अक्टूबर 19, 2015

सेक्युलरिज्म : भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड (योगन्द्र यादव)

YY1सेक्युलरवाद हमारे देश का सबसे बड़ा सिद्धांत है। सेकुलरवाद हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड भी है। सेकुलरवाद अग्निपरीक्षा से गुज़र रहा है।

सेक्युलर राजनीति की दुर्दशा देखनी हो तो बिहार आईये। यहाँ तमाम नैतिक, राजनैतिक, जातीय और संयोग के चलते भाजपा की विरोधी सभी ताकतें सेकुलरवाद की चादर ओढ़ कर चुनाव लड़ रही हैं। उधर लोकसभा चुनाव जीतकर अहंकार में चूर भाजपा और उसके बौने सहयोगी सेक्युलर भारत की जड़ खोदने में लगे हैं। एक तरफ बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है, दूसरी तरफ थके हारे सेकुलरवादियों की कवायद।
सेकुलरवाद कोई नया सिद्धांत नहीं है। सर्वधर्म समभाव इस देश की बुनियाद में है। यह शब्द भले ही नया हो, लेकिन जिसे हमारा संविधान सेक्युलर कहता है, उसकी इबारत सम्राट अशोक के खम्बों पर पढ़ी जा सकती है। पाषान्डो, यानी मतभिन्नता रखने वाले समुदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति हमारे सेकुलरवाद की बुनियाद है। इस नीति की बुनियाद सम्राट अकबर के सर्वधर्म समभाव में है। इसकी बुनियाद आजादी के आन्दोलन के संघर्ष में है। इसकी बुनियाद एक सनातनी हिन्दू, महात्मा गाँधी, के बलिदान में है। हमारे संविधान का सेकुलरवाद कोई विदेश से इम्पोर्टेड माल नहीं है। जब संविधान किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इनकार करता है और सभी धर्मावलम्बियों को अपने धर्म, अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूरी आजादी देता है, तो वह हमारे देश की मिट्टी में रचे बसे इस विचार को मान्यता देता है।

लेकिन पिछले ६५ साल में सेकुलरवाद इस देश की मिट्टी की भाषा छोड़कर अंग्रेजी बोलने लग गया। सेकुलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी गयी गारंटी से देश में सेकुलरवाद स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गाँधी की भाषा छोड़कर विदेशी भाषा बोलनी शुरू कर दी। कानून, कचहरी और राज्य सत्ता के सहारे सेकुलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। धीरे धीरे देश की औसत नागरिकों के दिलो दिमाग को सेक्युलर बनाने की ज़िम्मेदारी से बेखबर हो गए। उधर सेकुलरवाद की जड़ खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया। इस लापरवाही के चलते धीरे धीरे बहुसंख्यक समाज के एक तबके को महसूस होने लगा कि हो न हो, इस सेकुलरवाद में कुछ गड़बड़ है। उन्हें इसमें अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बू आने लगी। इस देश के सबसे पवित्र सिद्धांत में देश के आम जन की आस्था घटने लगी।
बहुसंख्यक समाज के मन को जोड़ने में नाकाम सेक्यूलर राजनीति अल्पसंख्यकों की जोड़ तोड़ में लग गयी। व्यवहार में सेक्युलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यक समाज, खासतौर पर मुस्लिम समाज, के हितों की रक्षा। पहले जायज़ हितों की रक्षा से शुरुआत हुई, धीरे धीरे जायज़ नाजायज़ हर तरह की तरफदारी को सेकुलरवाद कहा जाने लगा। इधर मुस्लिम समाज उपेक्षा का शिकार था, पिछड़ा हुआ था, और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से भेदभाव झेल रहा था, उधर सेक्युलर राजनीति फल फूल रही थी। नतीजा यह हुआ कि सेक्युलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाने की राजनीति हो गयी। मुसलामानों को डराए रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट लेते जाओ। मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज को न शिक्षा, न रोज़गार, न बेहतर मोहल्लों में मकान। बस मुस्लिम राजनीति केवल कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और औसत मुसलमान डर के मारे सेक्युलर पार्टियों को वोट देता रहे – यह ढकोसला देश में सेकुलरवाद कहलाने लगा।

सेक्युलर वाद के सिद्धांत और वोट बैंक की राजनीति के बीच की खाई का भांडा फूटना ही था। बहुसंख्यक समाज सोचता था कि सेकुलरवाद उसे दबाने और अल्पसंख्यक समाज के तुष्टिकरण का औज़ार है। अल्पसंख्यक समाज समझता कि सेकुलरवाद उन्हें बंधक बनाए रखने का षड़यंत्र है। यह खाई सबसे पहले अयोध्या आन्दोलन में दिखाई दी, जिसकी परिणीती बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई। २००२ गुजरात के नरसंहार में सेकुलरवाद फिर हारा। इस राजनैतिक प्रक्रिया की परिणीती २०१४ चुनाव में हुई।

आज सेक्युलर राजनीति थकी हारी और घबराई हुई है। नरेन्द्र मोदी की अभूतपूर्व विजय और उसके बाद से देश भर में सांप्रदायिक राजनीति के सिर उठाने से घबराई हुई है। पिछले २५ साल में छोटे बड़े लड़ाई हार कर आज मन से हारी हुई है। देश के सामान्य जन को सेक्युलर विचार से दुबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती का सामना करने से पहले ही थकी हुई है। इसलिए आज सेक्युलर राजनीति शॉर्ट-कट हो गयी है, किसी जादू की तलाश में है, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने को मजबूर है।

बिहार का चुनाव किसी थकी हारी घबराई सेक्युलर राजनीति का नमूना है। जब सेक्युलर राजनीति जन चेतना बनाने में असमर्थ हो जाती है, जब उसे लोकमानस का भरोसा नहीं रहता, तब वो किसी भी तरह से भाजपा को हराने का नारा देती है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद गठबंधन क्षम्य है और राज काज की असफलता भी क्षम्य है। बस जो भाजपा के खिलाफ खड़ा है, वो सही है, सेक्युलर है। बिहार के चुनाव परिणाम बताएँगे की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। अभी से चुनावी भविष्यवाणी करना बेकार है। संभव है कि नितीश-लालू की रणनीति कामयाब हो भी जाए। यह भी संभव है सेकुलरवाद के नाम पर भानुमती का कुनबा जोड़ने की यह कवायद बिहार की जनता नामंज़ूर कर दे। यह तो तय है कि इस गठबंधन के पीछे मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो जाएगा। लेकिन यह ही तो भाजपा भी चाहती है, ताकि उसके मुकाबले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। अगर ऐसा हुआ तो पासा उल्टा पड़ जाएगा। चुनाव का परिणाम जो भी हो, इस चुनाव में बिहार हारेगा, सेक्युलर राजनीति हारेगी।

अगर देश के पवित्र सेक्युलर सिद्धांत को बचाना है तो सेक्युलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा, सेक्युलर राजनीति को दोबारा लोकमानस से सम्बन्ध बनाना होगा, अल्पसंख्यकों से केवल सुरक्षा की राजनीती छोड़कर शिक्षा, रोज़गार और प्रगति की राजनीती शुरू करनी होगी। शायद अशोक का प्रदेश बिहार एक अच्छी जगह है इस राजनीति की शुरुआत के लिए।

(योगेन्द्र यादव)

अक्टूबर 18, 2015

आज़ाद हिंद फौज के युद्धबंदी सैनिक और प. नेहरु

 

Azad Hindi Fauz

अक्टूबर 14, 2015

उ.प्र में सूखा और किसानों की दुर्दशा: मुख्यमंत्री के नाम सुझाव-पत्र (योगेन्द्र यादव)

13 अक्टूबर 2015
श्री अखिलेश यादव,
मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय : उत्तर प्रदेश में सूखे के संकट से निपटने के लिए कुछ सुझाव

प्रिय अखिलेश जी,

स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन के तहत हम कुछ साथी विगत 2 अक्टूबर से देश के सूखाग्रस्त इलाकों की ‘संवेदना यात्रा’ पर हैं. इस सिलसिले में पिछले चार दिनों में हमने बाँदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट, कौशाम्बी, फतेहपुर, उन्नाव, रायबरेली, कानपुर नगर, कानपुर देहात, औरैया, इटावा और आगरा जनपदों के गाँवों में यात्रा की, और किसानों से बातचीत की. इसके अलावा जिन इलाकों में हम नहीं जा पाए, वहाँ कार्यरत संगठनों एवं व्यक्तियों से भी हमने सलाह मशविरा किया.
राज्य में सूखे की स्थिति के बारे में आपको नियमित रूप से सूचनाएं तो मिलती ही हैं, आपके पास इस जानकारी का कहीं बेहतर तंत्र है. फिर भी कई बार बड़े सरकारी सूचना तंत्र के बावजूद कुछ सूचनाएँ शीर्ष तक नहीं पहुँच पातीं. इसलिए मैं इस यात्रा के निष्कर्ष और उनके आधार पर कुछ सुझाव आपके सामने रख रहा हूँ. आशा है कि इसे आप अन्यथा नहीं लेंगे और इन रचनात्मक सुझावों पर गौर करेंगे.

देश के सबसे अधिक सूखे से प्रभावित जिलों के दौरे के बाद हमारी टीम दो निष्कर्षों पर पहुंची है. पहला यह कि इस राष्ट्रीय आपदा का केंद्र बिन्दु उत्तर प्रदेश है. इस बार उत्तर प्रदेश में औसत से 45 प्रतिशत कम वर्षा हुई है. वर्षा की कमी से देश में सर्वाधिक प्रभावित 30 जिलों में से 17 उत्तर प्रदेश से हैं. प्रदेश के कई इलाकों में लगातार दूसरे या तीसरे वर्ष सूखा पड़ रहा है. एक बहुत बड़े इलाके में खरीफ की फसल लगभग बर्बाद हो चुकी है. ज्यादातर इलाकों में किसान रबी की फसल बोने की स्थिति में भी नहीं है. पीने के पानी का संकट है. लोग पशुओं को बेच रहे हैं या यूँ ही छोड़ दे रहे हैं.

हमारा दूसरा निष्कर्ष यह है कि प्रदेश में आपदा की इस घड़ी में प्रशासन तंत्र सूखे के शिकार किसान और मजदूरों को मदद पहुंचाने में असमर्थ रहा है. हालाँकि आपकी सरकार ने किसानों से मालगुजारी न वसूलने का फैसला जरूर लिया है, लेकिन यह कदम तो प्रतीकात्मक ही है. ऎसी प्राकृतिक आपदा के समय लोगों की सरकार से बहुत अपेक्षा होती है. लेकिन किसान को इस साल का मुआवजा तो दूर पिछली फसलों का मुआवजा भी नहीं मिल पाया है. खेती में मनरेगा का इस्तेमाल भी नहीं के बराबर है. इस संकट की घड़ी में जिन लोगों को सस्ते अनाज की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उनमें से अधिकांश उस राशन कार्ड के पात्र नहीं हैं.

कुल मिलाकर प्रदेश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बहुत बडे संकट से गुजर रहा है. जानवरों के लिए तो यह सूखा अकाल में बदलता ही जा रहा है, अगर सरकार की ओर से जल्द ही कुछ प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह भी आशंका है कि बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में सबसे गरीब वर्ग के लिए अकाल की स्थिति बन सकती है.

अपनी टीम के साथियों की ओर से मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि इस संकट की घड़ी में निम्नलिखित बेहद जरूरी कदम तुरंत उठाएँ.

1 प्रदेश में सूखे की तुरंत घोषणा
सूखे की उपरोक्त स्थिति को देखते हुए आपकी सरकार को पूरे प्रदेश में सूखे की तुरंत घोषणा करनी चाहिए, ताकि सूखा राहत के काम शुरू हो सकें. कर्नाटक और मध्य प्रदेश ने यह घोषणा कर दी है, जबकि वहाँ सूखे की स्थिति इतनी भयावह नहीं है. उम्मीद है कि आपकी सरकार राज्य आपदा राहत कोष और जरूरत पड़े तो राष्ट्रीय आपदा राहत कोष का इस्तेमाल करेगी और धन की कमी को सूखे की घोषणा के रास्ते में रोड़ा नहीं बनने देगी.

2 फसल नुकसान के मुआवज़े की घोषणा और बकाया राशि का भुगतान
आपकी सरकार ने पिछले साल ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से हुए नुकसान के लिए मुआवज़े की घोषणा की थी, लेकिन यह मुआवज़ा कुछ ही गाँवों तक पहुँच पाया है. ज्यादातर बड़ी ग्राम पंचायतें अब भी इस मुआवजे का इंतजार कर रही हैं. जहाँ मुआवजा मिला भी है, वहाँ यह कुछ ही लोगों तक पहुँचा पाया है. इसमें भ्रष्टाचार की शिकायतें भी सामने आई हैं. इसलिए सरकार तत्काल किसानों बकाया मुआवज़ा दिलवाने की व्यवस्था करे.

पिछली फसल के मुआवज़े के साथ-साथ इस फसल को हुए व्यापक नुकसान की भरपाई के लिए एक वस्तुपरक और न्यायसंगत नीति की घोषणा होनी चाहिए. इस सन्दर्भ में आपकी सरकार मध्य प्रदेश के राजस्व कोड के प्रावधानों पर विचार कर सकती है. ऐसी न्यायसंगत व्यवस्था में मुआवज़ा निर्धारित करते समय दो बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए- (क) किसान ने बीज, खाद, कीटनाशक आदि में कितना निवेश किया था, जो बेकार चला गया ; तथा (ख) इस फसल के नुकसान की वजह से उस अवधि में न्यूनतम गुज़ारे लायक आमदनी का कितना नुकसान हुआ. इन दोनों तथ्यों को देखते हुए हमारा सुझाव है कि जहाँ फसल का पूरा नुकसान हुआ है, वहाँ सिंचित खेतों के लिए 20,000 रूपए प्रति एकड़ और असिंचित खेती के लिए 15,000 रूपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया जाना चाहिए. इस मुआवजे की घोषणा के तत्काल बाद मुआवजज़े की राशि प्रभावित किसानों के बैंक में खाते जमा की जानी चाहिए. फसलों के नुकसान का जायजा पारदर्शी तरीके से हो, इसके लिए किसकी फसल को कितना नुकसान हुआ, यह सूची ग्रामसभा के सामने पेश की जानी चाहिए.

3 क़र्ज़ के बोझ में दबे किसानों को तात्कालिक राहत
रबी के दौरान अतिवृष्टि और अब खरीफ के दौरान सूखे के कारण किसानों ने इन फसलों के लिए जो क़र्ज़ लिया था, वह डूब चुका है. अपेक्षित आय न होने की वजह से किसान पुराने बकाया कर्जे की अदायगी में भी असमर्थ है. क़र्ज़ के बोझ में दबा किसान आत्महत्या को विवश न हो इस लिए यह ज़रूरी है किसानों के तमाम खेती संबंधी और व्यक्तिगत ऋणों का पुनर्निर्धारण हो.

इस सम्बन्ध में हमारा सुझाव है कि: क) जिन इलाकों में फसल पूरी तरह बर्बाद हो गयी है, वहाँ पिछली दोनों फसलों के ऋण को माफ़ कर दिया जाए ; ख) किसानों के बकाया क़र्ज़ का ब्याज माफ़ कर दिया जाए ; ग) इन बकाया कर्जों की किश्तों की अदायगी मुल्तवी कर दी जाए ; घ) किसानों को सरल, सुगम और समयानुसार बैंक क़र्ज़ उपलब्ध करवाया जाए ताकि वह साहूकारों के चंगुल में फंसकर प्रतिमाह 5 से 10 प्रतिशत ब्याज देने को मजबूर न हो.

4 रोजगार गारंटी योजना को सही ढंग से लागू किया जाए
जब फसल बर्बाद हो जाए और किसान मजदूरों को रोजगार देने में असमर्थ हों, ऐसे में मजदूर और सीमांत किसान अपनी आजीविका के लिए सरकार की ओर देखता है, और रोजगार के लिए सरकार का मोहताज हो जाता है. रोजगार गारंटी योजना ऎसी ही स्थितियों से निपटने के लिए बनी थी. लेकिन आज सूखे की स्थिति में सरकार इस योजना का समुचित इस्तेमाल नहीं कर रही है. अधिकांश जरूरतमंद लोगों के पास जॉब कार्ड तो है, लेकिन कई महीनों से उन्हें कोई काम नहीं मिला है. जिन लोगों को काम भी मिला, उन्हें कई महीनों से भुगतान नहीं मिल पाया है. भुगतान न मिलने की वजह से अब गरीबों को लगता है कि इस योजना के तहत काम करने से कुछ हासिल नहीं होगा. हाल ही में भारत सरकार ने महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना में अधिकतम रोजगार की सीमा सौ दिन से बढ़ाकर डेढ़ सौ दिन कर दी है. इस योजना की मदद से सूखा प्रभावित गरीब परिवारों को वैकल्पिक रोजगार देने का यह महत्वपूर्ण अवसर है.

हमारा सुझाव है कि – क) मनरेगा के तहत राज्य के हर सूखाग्रस्त जिले में हर गाँव में काम उपलब्ध करवाया जाए, चाहे उसकी औपचारिक माँग हुई हो या नहीं ; ख) मनरेगा के काम को भूमि और पानी संरक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाए, ताकि भविष्य में सूखे का सामना करने की क्षमता विकसित हो सके ; ग) काम के पंद्रह दिन के भीतर मजदूरी का भुगतान किया जाए, इसमें किसी भी तरह की देर होने पर दोषी व्यक्ति को सजा दी जाए ; घ) सूखे के समय लोगों को रोजगार न देने, उनके भुगतान में भ्रष्टाचार करने या मशीनों से काम करवाने की शिकायत पर सख्त कार्रवाई हो.

5 राशन व्यवस्था के जरिये खाद्यान्न संकट का मुकाबला
सूखे के चलते गाँवों में गरीबों के खान-पान पर असर पड़ रहा है. सूखे से खाद्यान्न की कमी और अकाल जैसे हालात न उत्पन्न हों, इसके लिए ज़रूरी है कि राशन व्यवस्था के जरिये जरूरतमंद लोगों तक सस्ता खाद्यान्न पहुंचाया जाए. लेकिन राज्य की सार्वजनिक आपूर्ति व्यवस्था आज यह करने में पूरी तरह से असमर्थ है. लाल कार्ड, पीले और सफ़ेद कार्ड वितरित करने की व्यवस्था में कोई न्यायसंगत आधार दिखाई नहीं देता. हर गाँव में बड़ी संख्या में गरीब परिवारों को पीला कार्ड दिया गया है, जिसके कारण वे सस्ते खाद्यान्न से वंचित हैं. चूँकि सरकार के लिए तुरंत इन कार्डो का पुनर्वर्गीकरण संभव नहीं है, इसलिए सूखाग्रस्त इलाको में सभी परिवारों को सूखे की अवधि के दौरान 60 किलो खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाय. इस दौरान उनसे इस खाद्यान्न का वही दाम लिया जाए, जो कि लाल कार्ड धारकों से लिया जाता है. जिन परिवारों के पास कोई भी कार्ड नहीं है, उन्हें भी सूखे के दौरान यही सुविधा एक अस्थायी प्रमाण पत्र के माध्यम से दी जाए.

6 आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को मुआवजा
हाल ही में तेलंगाना सरकार ने एक शासनादेश के जरिये आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को दिए जाने वाली मुआवजे की एक सुसंगत व्यवस्था बनाई. हमारा सुझाव है कि उत्तर प्रदेश सरकार भी ऐसा ही एक आदेश जारी कर आज की व्यवस्था में सुधार कर सकती है. इस नयी व्यवस्था के तहत: (क) आत्महत्या के शिकार परिवारों की पहचान में तकनीकी औपचारिकताओं को खत्म किया जाना चाहिए ; (ख) जमीन जोतने वाले भूमिहीन परिवारों को भी इस मुआवजे का लाभ मिलना चाहिए ; (ग) मुआवजे में परिवार के बकाया कर्ज को माफ़ करने, तात्कालिक राहत राशि, विधवा के लिए रोजगार और बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए.

7 जानवरों के लिए ‘चारा छावनी’ की व्यवस्था
इस समय पूरे प्रदेश में मवेशियों के लिए भारी आपदा की स्थिति है. पिछली गेहूँ की फसल अतिवृष्टि से खराब होने के कारण चारा भी बर्बाद हो गया था. अब खरीफ की फसल सूख जाने की वजह से ज़हरीली हो रही है. सूखा जहरीला चारा खाकर जानवरों के मरने की खबर आ रही है. जो परिवार बाहर से महँगा चारा (वर्तमान बाजार भाव 600 से 800 रूपए प्रति क्विंटल) खरीदकर अपने जानवरों को नहीं खिला सकता, वह इस विपदा की स्थिति में मजबूर होकर जानवरों को औने-पौने दाम पर बेच रहा है, या फिर उन्हें गाँव के बाहर छोड़ रहा है. एक गाँव के लोग दूसरे गाँव में जानवरों को चरने के लिए छोड़ रहे हैं. चारों ओर अफरा-तफरी मची है. इससे जानवरों के प्राणों को खतरा तो है ही, छूटे हुए जानवरों द्वारा फसल बर्बाद करने की संभावना भी है. इस आपात स्थिति से बचने के लिए सरकार को बिना देर किए महाराष्ट्र की तर्ज़ पर ‘चारा छावनी’ बनानी चाहिए. इन चारा छावनियों में सैकड़ों मवेशियों को एक साथ रखकर सरकार की ओर से चारा और पानी उपलब्ध किया जाना चाहिए. सरकार उचित समझे तो इस काम मे स्वंयसेवी संगठनों, गौशालाओं और अन्य पशुपालक संगठनों को शामिल कर सकती है.

8 सूखाग्रस्त इलाकों में नलकूपों की मरम्मत के बाद
सूखाग्रस्त इलाकों में तालाब और पानी के अन्य स्रोत सूख गए हैं। इसलिए इंसान और मवेशी, दोनों पानी के लिए नलकूपों पर निर्भर हैं. लेकिन प्रायः हर गाँव में कई नलकूप छोटी-मोटी मरम्मत के अभाव में काम नहीं कर रहे हैं. इससे गाँववासियों , खास तौर पर औरतों को, बेहद कष्ट उठाना पड़ रहा है. अतः सरकार एक मिशन की तरह पूरे प्रदेश में नलकूपों की मरम्मत का काम अगले 2 हफ्ते में संपन्न कराए.

9 सिंचाई के लिए बिजली आपूर्ति
सूखे की मार से परेशान किसान अपने बोरबेल या ट्यूबवेल के ज़रिये अपनी फसल को बचने की चेष्टा कर रहा है लेकिन बिजली की आपूर्ति अपर्याप्त होने या समयबद्ध तरीके से न होने के कारण वह फसल को बचाने में असमर्थ रहता है. बिजली का विकल्प है डीज़ल, लेकिन वह इतना मंहगा पड़ता है कि किसान उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता इसलिए अब रबी की फसल के लिए बिजली नियमित रूप से उपलब्ध करवाई जाए. जहाँ ज़रुरत हो वहां बिजली के बिलों को कुछ समय के लिए स्थगित किया जाये.

मुझे आशा है कि आप इन सुझावों की मूल भावना का सम्मान करेंगे। इस पत्र का उदेश्य आलोचना या दोषारोपण नहीं है। इस राष्ट्रीय संकट की घडी में सभी को मिलकर काम करना है. हमारी टीम ने प्रदेश में भ्रमण कर कर किसानो के दुःख-तकलीफ़ को सुना – समझा है. इसलिए हमारा फर्ज़ बनता है कि हम उनकी आवाज़ को आप तक पहुँचाएँ. देश के इस सबसे बड़े प्रदेश की जनता इस आपदा के वक्त आप की सरकार की तरफ देख रही है. मुझे विश्वास है कि आप उनकी इन आशाओं पर खरे उतरेंगे।

भवदीय,

योगेन्द्र यादव
राष्ट्रीय संयोजक
जय किसान आन्दोलन

सितम्बर 24, 2015

हरामखोर! खाना दे, वरना सब चबा जाऊँगा

बेहद  भूखा  हूँ

पेट  में , शरीर  की  पूरी  परिधि  में

महसूसता  हूँ  हर  पल  ,सब  कुछ  निगल  जाने  वाली एक  भूख .

बिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाली खेतों मे जल उठती है भयानक आग

ठीक वैसी  ही आग से जलता है पूरा शरीर .

महज दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिले , बस और कोई मांग नहीं है मेरी .

लोग तो न जाने क्या क्या मांग लेते हैं . वैसे सभी मांगते है

मकान गाड़ी , रूपए पैसे , कुछेक मे प्रसिद्धि का लोभ भी है

पर मेरी तो बस एक छोटी सी मांग है , भूख से जला जाता है पेट का प्रांतर

भात चाहिए , यह मेरी सीधी सरल सी मांग है , ठंडा हो या गरम

महीन हो या खासा मोटा या  राशन मे मिलने वाले लाल चावल का बना भात ,

कोई शिकायत नहीं होगी मुझे ,एक  मिटटी का  सकोरा भरा भात चाहिये मुझे .

दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिल जाये तो मैं अपनी समस्त मांगों से मुंह फ़ेर लूँगा .

अकारण मुझे किसी चीज़ का लालच  नहीं है, यहाँ तक की यौन क्षुधा भी नहीं है मुझ में

में तो नहीं चाहता नाभि के नीचे साड़ी बाधने वाली साड़ी की मालिकिन को

उसे जो चाहते है ले जाएँ , जिसे मर्ज़ी उसे दे दो .

ये जान लो कि मुझे इन सब की कोई जरुरत नहीं

पर अगर पूरी न कर सको मेरी इत्ती सी मांग

तुम्हारे पूरे मुल्क मे बवाल मच जायेगा ,

भूखे के पास नहीं होता है कुछ भला बुरा , कायदे कानून

सामने जो कुछ मिलेगा  खा जाऊँगा बिना किसी रोक टोक के

बचेगा कुछ भी नहीं , सब कुछ स्वाहा हो जायेगा निवालों के साथ

और मान लो गर पड़ जाओ तुम मेरे सामने

राक्षसी भूख के लिए परम स्वादिष्ट भोज्य बन जाओगे तुम .

सब  कुछ निगल लेने वाली महज़ भात की भूख

खतरनाक नतीजो को साथ लेकर आने को न्योतती है

दृश्य से द्रष्टा तक की प्रवहमानता को चट कर जाती है .

और अंत मे सिलसिलेवार मैं खाऊंगा पेड़ पौधें , नदी नालें

गाँव  देहात , फुटपाथ,  गंदे नाली का बहाव

सड़क पर चलते राहगीरों , नितम्बिनी नारियों

झंडा ऊंचा किये खाद्य मंत्री और मंत्री की गाड़ी

आज मेरी भूक के सामने कुछ भी न खाने लायक नहीं

भात दे हरामी , वर्ना मैं चबा जाऊँगा समूचा मानचित्र

(बांग्लादेश के कवि रफीक आज़ाद की कविता का अशोक भौमिक दवारा किया अनुवाद)

सितम्बर 23, 2015

फसल… (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह
पकड़ भी लूँ कलम तो
फिर भी फसल काटने
मिलेगी नहीं हम को ।

हम तो ज़मीन ही तैयार कर पायेंगे
क्रांतिबीज बोने कुछ बिरले ही आयेंगे
हरा-भरा वही करेंगें मेरे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को ।

कल जो भी फसल उगेगी, लहलहाएगी
मेरे ना रहने पर भी
हवा से इठलाएगी
तब मेरी आत्मा सुनहरी धूप बन बरसेगी
जिन्होने बीज बोए थे
उन्हीं के चरण परसेगी
काटेंगे उसे जो फिर वो ही उसे बोएंगे
हम तो कहीं धरती के नीचे दबे सोयेंगे ।

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