अगस्त 26, 2015

स्वेच्छा-मृत्यु का अधिकार हो, आत्महत्या का नहीं, : ओशो

oshoमेरा एक और सुझाव है:

स्वेच्छा-मरण, युथनेसिया

जिस प्रकार हम जन्म को नियंत्रित कर रहे हैं संतति निरोध के द्वारा, मैं तुम्हें एक और शब्द देता हूं: मृत्यु-निरोध, डेथ-कंट्रोल। लेकिन कोई भी देश मृत्यु निरोध के लिए तैयार नहीं है। एक विशिष्ट उम्र के बाद जब कोई व्यक्ति अपना जीवन भरपूर जी चुका हो, उसकी कोई जिम्मेवारी न हो और अब वह मरना चाहता हो…एक तरह से वह अपने आप पर एक बोझ ही है, फिर भी उसे मजबूरन जीना पड़ता है क्योंकि कानून आत्महत्या के खिलाफ है।

मेरा सुझाव है, यदि तुम मरने की औसतन आयु सत्तर या अस्सी या नब्बे साल मानते हो तो आदमी को चिकित्सा समिति से यह पूछने की स्वतंत्रता होनी चाहिए: “मुझे अपने शरीर से मुक्त होना है।” यदि वह और जीना नहीं चाहता क्योंकि उसने काफी जी लिया है, तो ऐसा करने का उसे पूरा हक है। जो भी करना था वह सब उसने कर लिया। और अब उसे कैंसर या टी.बी. से नहीं मरना है, उसे बस विश्रामपूर्ण ढंग से मरना है।

प्रत्येक अस्पताल में एक विशेष स्थान हो, उसका खास कर्मचारी वर्ग हो, जहां लोग आ सकते है और तनाव-रहित होकर, सुंदरता से, बिना किसी रोग के, चिकित्सा व्यवसाय के सहारे मृत्यु में लीन हो सकते हैं।

यदि चिकित्सा समिति सोचती है कि वह व्यक्ति कीमती है या वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, तब फिर उससे और कुछ समय तक जीने का अनुरोध किया जा सकता है। केवल थोड़े से लोगों से ही यहां कुछ देर अधिक रहने की प्रार्थना की जा सकती है क्योंकि उनसे मानवता को इतनी मदद मिल सकती है, अन्य लोगों की इतनी सहायता हो सकती है। लेकिन वे लोग भी यदि जीने से इनकार कर दें तो वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। तुम उनसे पूछ सकते हो, प्रार्थना कर सकते हो। और यदि वे स्वीकार करते हैं तो ठीक है,लेकिन अगर वे कहें, “नहीं, अब हमें और नहीं जीना है”, तो निश्चित ही उन्हें मरने का पूरा अधिकार है।

किसी बच्चे की जान बचाना समझ में आता है, लेकिन तुम वृद्ध लोगों को क्यों बचा रहे हो जो जी चुके हैं, काफी जी चुके हैं, दुख भोगा, सुख भोगा, सब तरह के अच्छे-बुरे काम किए? अब समय आ गया है-उनको जाने दो।

लेकिन डाक्टर उन्हें नहीं जाने देते क्योंकि वह अवैध है।

उनका आक्सीजन और अन्य जीवनदायी उपकरण वे लोग निकाल नहीं सकते। इसलिए तुम मरणासन्न या अधमरे लोगों की जान बचाए चले जाते हो।

कोई पोप आदेश जारी नहीं करता कि इन लोगों को शरीर से मुक्त होने की अनुमति दी जाए। और उनके शरीरों में बचा ही क्या है? किसी के पैर कटे हैं, किसी के हाथ कटे हैं, किसी का हृदय काम नहीं कर रहा है इसलिए उसकी जगह बैटरी काम कर रही है, किसी के गुरदे काम नहीं कर रहे हैं इसलिए उनके लिए यंत्र लगे हैं। लेकिन इन लोगों का मकसद क्या है? अगर तुम उन्हें इस ढंग से बनाए रखोगे तो भी वे क्या करने वाले हैं?

हां, ज्यादा से ज्यादा वे कुछ लोगों को काम दिलाते हैं, बस। लेकिन वे कौन सा रचनात्मक जीवन जीने वाले हैं? और उनके साथ जो किया जा रहा है उससे उन्हें क्या सुख मिलने वाला है? उन्हें निरंतर इंजेक्शन दिए जा रहे हैं। उन्हें नींद नहीं आती इसलिए नींद की गोलियां दी जा रही हैं। वे जाग नहीं सकते इसलिए उनके खून में एक्टिवेटर (उत्तेजक)दिए जा रहे हैं ताकि वे जाग जाएं। लेकिन किसलिए? उस पाखंडी शपथ के लिए? पाखंडी भाड़ में जाएं। उसे कुछ खयाल नहीं था कि उसकी शपथ क्या गजब ढाने वाली है।

दवाइयों की बजाय, उस मरते हुए आदमी को ध्यान सिखाने के लिए ध्यानी चाहिए क्योंकि अब दवा की नहीं, ध्यान की जरूरत है-कैसे शिथिल हो जाए और शरीर से विदा हो जाए।

प्रत्येक अस्पताल में ध्यानी होने चाहिए, वे अत्यंत आवश्यक हैं-उतने ही जितने कि डाक्टर।

अब तक ध्यानियों की जरूरत नहीं थी क्योंकि एक ही काम था: जान बचाना। अब काम दोहरा हो गया है: लोगों की मरने में सहायता करना। हर विश्वविद्यालय में एक विभाग हो जहां ध्यान सिखाया जाए ताकि लोग स्वयं तैयार हों। जब मरने का समय आ जाए तो वे पूरी तरह से तैयार हो जाएं-आनंद से, उत्सव मनाते हुए।

लेकिन आत्महत्या अपराध है। इसे आत्महत्या समझा जाएगा और लोग कहेंगे कि मैं सबको गैर-कानूनी बातें सिखा रहा हूं।

मेरी उत्सुकता है सत्य में, कानून में नहीं।

सत्य यह है कि तुमने प्रकृति को, जीवन को असंतुलित किया है। उसका संतुलन उसे वापस लौटा दो।

मेरा सुझाव है, एक आंदोलन शुरू किया जाए ताकि जब लोग काफी जी चुके हैं और वे अपने शरीर से मुक्त होना चाहते हैं तो अस्पतालों में सुविधापूर्ण, सुखद मृत्यु का प्रबंध हो सके। यह बिलकुल स्वस्थ दृष्टिकोण है कि हर अस्पताल में एक विशेष कक्ष होना चाहिए जहां सब सुविधाएं हों ताकि मृत्यु एक सुखद, आनंदपूर्ण अनुभव बन जाए।

[ओशो]

अगस्त 22, 2015

शुक्रवार का गठबंधन

‘हरामखोर को शुक्रवार की शाम चार बजे के आसपास पकड़ना, उसका कोई खैरख्वाह अदालत न जा पाए| फिर तो अदालत दो दिन के आराम में होंगी, तीन रातें तो हवालात में बिताएगा ही साला, वहाँ भी  खातिर तवाजोह ज़रा कायदे की हो जाए|’ नोटों का बंडल अखबार में लपेट कर देने वाले ने कहा|
हें हें हें …शुक्र का टोटका तो अंग्रेजों के जमाने से अजमाया हुआ नुस्खा है| ऐसा ही होता आया है, ऐसा ही होगा| लेने वाले ने बंडल लेटे हुए ठहाका लगाते हुए कहा|

 

सोमवार की भी फ़िक्र न करो, वहाँ भी टिकने नहीं देंगें| लंबा भेजेंगे अंदर सुसरे को| एक हफ्ता तो मानकर चलो, बेल न होने देंगें| हमें भी एडवांस दे दो आज ही|

अगस्त 9, 2015

जो भारत को जोड़ता है…

कुछ तो बात है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा

बाहरी ताकतों की तो बात ही क्या, भारतीय ही, चाहे वे सता प्रतिष्ठान से जुड़े लोग ही क्यों न हों, भारत को नुकसान पहुंचाने वाली बातें कहते और कृत्य करते ही रहते हैं| उनके वचन और कर्म ऐसे होते हैं जिनसे भारत की एकता हमेशा ही कसौटी पर टंगी रहती है पर कहीं न कहीं कोई न कोई कुछ ऐसा कहता और कर जाता है जो कि दर्शा देता है कि क्यों इतने विशाल देश, जो दुनिया में सबसे ज्यादा विभिन्नताओं को अपने में समेटे हुए है, की एकता बनी रहती है|

अनेकता में एकता की बात हवाई नहीं है, इसकी जड़ें भारत में बेहद गहरी हैं| तोड़ने वाले अगर जन्म लेते रहते हैं तो इसे एकता के सूत्र में पिरोने वाले भी जन्म लेते रहते हैं|

जब देश में हर जगह हिंदू मुसलमान के मध्य अविश्वास की खाई गहरी करने के कृत्य हर जगह हो रहे हैं, ऐसी जादू की झप्पी ही ऐसी साजिशों का जवाब हो सकती थी और है…

अगस्त 3, 2015

फेसबुक से बाहर वास्तविक जीवन में फेसबुकीय सिद्धांतों का नतीजा

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जुलाई 31, 2015

डा. अब्दुल कलाम : अंतिम छह घंटे

Kalaamमैं किसलिए याद किया जाऊँगा… महान कलाम सर के जीवन के अंतिम दिन उनके साथ बिताएं घंटों की स्मृतियों के कारण…
उनसे अंतिम बार बात करे हुए 8 घंटे हो चुके हैं और नींद मुझसे कोसों दूर है, यादों की बाढ़ सी आती जाती है, जब तब आंसुओं के सैलाब के साथ| उनके साथ मेरा अंतिम दिन – 27th July, को दोपहर 12 बजे शुरू हुआ, जब मैं उनके साथ गुवाहटी जाने के लिए हवाई जहाज में बैठा| ड़ा. कलाम की सीट थी, 1A पर और मैं बैठा था IC पर| उन्होंने गहरे रंग का ‘कलाम सूट’ पहना था और मैंने उनके सूट की प्रशंसा की,’बहुत अच्छा रंग है सर!’  तब मुझे कहाँ पता था कि इस रंग के सूट को उनके जीवित शरीर पर मैं अंतिम बार देख रहा था|

बरसात के मध्य 2.5 घंटे लंबे फ्लाईट| मुझे ऊपर आकाश में उड़ते हवाई जहाज के झटके खाने से नफरत है जबकि वे ऐसी अवस्था में अविचलित बैठे रहते| जब भी वे मुझे झटके के कारण भयभीत देखते वे खिड़की ढक देते और मुझसे कहते,’ अब भय की कोई बात दिखाई नहीं देती!’
हवाई  यात्रा के बाद 2.5 घंटे कार से यात्रा करके हम दोनों IIM शिलांग पहुंचे| पिछले पांच घंटों के सफर के दौरान हमने ढेर सारी बातें कीं, बहस की, जैसे कि हम पिछले छह सालों में हवाई यात्राओं या सड़क यातारों के दौरान करते रहे हैं|

पिछली हर बातचीत की तरह इस बार की बातचीत भी विशेष थी| विशेषतया तीन ऐसे मुददे हैं जो उनसे इस अंतिम मुलाक़ात की स्मृतियों के सबसे यादगार मुददे रहेंगें|
पहले तो डा. कलाम पंजाब में हाल में हुए आतंकवादी हमले से बेहद चिंतित थे| निर्दोषों की हत्याओं ने उन्हें अंदर तक व्यथित कर दिया था| IIM शिलांग में उनके लेक्चर का विषय ही था – पृथ्वी को रहने के लिए और बेहतर बनाया जाए| उन्होंने पंजाब में आतंकवादी घटना को अपने लेक्चर के विषय से जोड़ा और कहा,’ ऐसा प्रतीत होता है कि मानव रचित ताकतें धरती पर जीवन के लिए उतनी ही विनाशकारी हैं जैसे कि प्रदुषण|’

हम दोनों ने इस विषय पर बात की कि अगर हिंसा, प्रदुषण और मानव की बेतुकी और हानिकारक गतिविधियां आदि सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो मनुष्य को धरती को छोड़ना पड़ेगा|

‘तीस साल शायद…, अगर ऐसे ही सब कुछ चलता रहा|आप लोगों को इस सन्दर्भ में कुछ करना चाहिए … यह आप लोगों के भविष्य के संसार का मामला है|’

हमारी बातचीत का दूसरा मुद्दा राष्ट्रीय महत्त्व का था| ड़ा. कलाम, चिंतित थे कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था, संसद की कार्यवाही बार बार ठप्प हो जाती है| उन्होंने कहा,’ मैंने अपने कार्यकाल में दो भिन्न सरकारों को देखा| उसके बाद मैं कई और सरकारों को देख चुका हूँ| हरेक सरकार के काल में संसद की गतिविधियां बाधित होती रही हैं| यह उचित नहीं है| मुझे वास्तव में कोई ऐसा रास्ता खोजना चाहिए जिससे संसद की कार्यवाही बिना बाधा के सुचारू रूप से विकास के मॉडल पर चलाई जा सके|’

उसी समय उन्होंने मुझसे एक प्रश्न तैयार करने के लिए कहा जिसे वे अपने लेक्चर के अंत में IIM शिलांग के विधार्थियों से पूछना चाहते थे एक सरप्राइज असाइनमेंट के तौर पर| वे चाहते थे कि युवा विधार्थी ऐसे मौलिक रास्ते सुझाएँ जिससे संसद की कार्यवाही को ज्यादा गतिमय और उत्पादक बनाया जा सके| लेकिन कुछ क्षण बाद उन्होंने कहा,’ लेकिन मैं कैसे उनसे समस्या का हल पूछ सकता हूँ जबकि मेरे पास ही इस विकराल समस्या का कोई हल नहीं है?’ अगले एक घंटे तक हमने इस मुददे पर कई संभावित विकल्पों पर विचार किया, हमने सोचा अकी हम इन विकल्पों को अपनी आने वाली पुस्तक  – Advantage India, का हिस्सा बनायेंगें

तीसरा मुद्दा उनके सरल और मानवीय स्वभाव की खूबसूरती से मेरे सामने उपजा| हम लोग 6-7 कारों के काफिले में थे| ड़ा. कलाम और मैं दूसरी कार में थे और हमसे आगे एक खुली जिप्सी में सैनिक सवार थे| जिप्सी में दोनों और दो दो जवान बैठे थे और एक लंबा – पतला जवान खड़ा होकर अपनी बन्दुक संभाले इधर उधर निगरानी में व्यस्त था| सड़क यात्रा के एक घंटे के सफर के बाद डा. कलाम ने कहा,’ सैनिक ऐसे क्यों खड़ा है? वह थक जायेगा| यह तो सजा है उसके लिए| क्या आप वायरलेस से सन्देश भेज सकते हैं कि वह बैठ जाए|’

मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि सैनिक को बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के लिए ऐसे ही खड़ा होकर चलने के निर्देश दिए गये होंगे| पर वे नहीं माने| हमने रेडियो सन्देश भेजने का प्रयास किया लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया| यात्रा के अगले  1.5 में तीन बार डा. कलाम ने मुझे सैनिक को किसी तरह से सन्देश भेज कर उसे बैठ जाने के लिए कहा| उन्होंने कहा कि हाथ से सन्देश भेज कर देखो शायद उनमें से कोई देख ले| जब उन्हें लगा कि कुछ नहीं हो पायेगा तो उन्होंने मुझसे कहा,’ मैं सैनिक से मिलना चाहता हूँ उसे धन्यवाद देने के लिए|’ जब हम IIM  शिलांग के परिसर में पहुंचे तो मैं सिक्योरिटी के लोगों के पास गया उस सैनिक के बारे में पूछताछ करने| मैं उस सैनिक को अंदर डा. कलाम के पास ले गया| डा कलाम ने उस सैनिक का अभिवादन किया और उससे हाथ मिला कर कहा,’ भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया| क्या आप थके हैं? आप कुछ खायेंगें? मुझे बड़ा खेद है कि मेरे कारण आपको इतनी देर तक खड़े रहना पड़ा|’

काली पोशाक में सजा हुआ युवा सैनिक उनके ऐसे मृदुल व्यवहार से आश्चर्यचकित था| उसके मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे| मुश्किल से उसने कहा,’ सर आपके लिए तो छह घंटे भी खड़े रहेंगें|’

इसके बाद डा. कलाम लेक्चर हॉल में चले गये| वे लेक्चर के लिए विलम्ब से नहीं पहुंचना चाहते थे| वे हमेशा कहते थे,’ विधार्थियों को कभी इंतजार नहीं कराना चाहिए|’
मैंने जल्दी से उनका माइक सेट किया, उनके लेक्चर के बारे में संक्षिप्त सा विवरण दिया और कम्प्यूटर के सामने मुस्तैदी से बैठ गया| मैंने जैसे ही उनका माइक कनेक्ट किया उन्होंने मुस्करा कर मुझसे कहा,’ फनी गाय, आर यू डूइंग वेळ?’ ‘फनी गाय’ जब भी डा. कलाम ऐसा कहते थे तब इसके कई अर्थ हो सकते थे और उनके स्वर के माध्यम से पता लगाया जा सकता था कि उनका क्या तात्पर्य था मुझे ऐसे संबोधित करने के लिए| इसका अर्थ कुछ भी सकता था, मसलन- तुमने अच्छा काम किया, या कि तुमने सब गडबड कर दिया, और तुम्हे उन्हें ढंग से सुनना चाहिए, या कि तुम बेहद भोले हो, या वे खुद मजाक के मूड में हों तो ऐसा कहते थे| पिछले छह सालों में मैं उनके ‘फनी गाय’ के सम्बोधन का सही अर्थ जानने में प्रवीण हो गया था| इस बार वे मुझसे मजाक करने के मूड में थे|

उन्होंने कहा,’ फनी गाय! आर यू डूइंग वेळ?’ मैं उनकी तरफ मुस्करा दिया| यही वे अंतिम शब्द थे जो उन्होंने मुझसे मुखातिब होकर कहे| उनके पीछे बैठ कर  मैं उनका भाषण सुन रहा था| दो मिनट के आसपास ही भाषण में एक वाक्य बोलकर उन्होंने एक लम्बी चुप्पी साध ली, मैंने उनकी ओर देखा और वे मंच पर गिर गये|

हमने उन्हें उठाया| डाक्टर्स जब तक आटे हम्नसे सब कुछ किया जो हम कर सकते थे| मैं जीवन भर उनकी दो-तिहाई बंद आँखों के भाव नहीं भूल पाउँगा| मैंने एक हाथ में उनका सिर थामा और उन्हें रिवाइव करने के सब प्रयत्न किये जो मैं कर सकता था| उनकी मुट्ठियाँ कास गयीं और मेरे हाथों से लिपट गयीं| उनके चेहरे पर शान्ति थी उनकी बुद्धिमान आँखें स्थिर होकर भी बुद्धिमत्ता बरसा रही थीं| उन्होंने एक शब्द नहीं कहा| किसी दर्द का कोई चिह्न तक उनके चेहरे पर नहीं उभरा|

पांच मिनटों के अंदर हम पस के अस्पताल में थे| अगले कुछ मिनटों में डाक्टर्स ने सूचित कर दिया कि भारत के ‘मिसाइल मैन’ के प्राण पखेरू उड़ चुके थे| मैंने उनके चरण स्पर्श किये…अंतिम बार| अलविदा मेरे बुजुर्ग मित्र! विशाल दार्शनिक गुरु! अब केवल विचारों में ही भेंट हो पायेगी और मिलना अगले जन्म में होगा|
लौटते समय यादों का पिटारा खुल गया| बहुत बार वे मुझसे पूछते थे,’ तुम युवा हो, निर्णय करो कि तुम किस रूप में याद किये जाना पसंद करोगे?’ मैं किसी शानदार उत्तर के बारे में सोचा अकर्ता और एक बार ठाकर मैं जैसे को तैसा का सिद्धांत अपनाते हुए उन्ही से पूछ डाला,’पहले आप बताइये, आप अपने को किस रूप में याद किये जाना पसंद करेंगे? राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक, मिसाइल मैन, India 2020, Target 3 billion…. या कुछ और?’  मुझे लगा उन्हें कई विकल्प देकर मैंने प्रश्न को उनके लिए अत्यंत सरल बना दिया था| पर उनके उत्तर ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया| उन्होंने कहा,’शिक्षक के रूप में’|

तकरीबन दो सप्ताह पहले जब हम उनके मिसाइल प्रोजेक्ट के समय के मित्रों के बारे में चर्चा आकार रहे थे, उन्होंने कहा,’ बच्चों को उनके माता-पिता की देखभाल करनी चाहिए| यह दुखद है कि बहुत मामलों में ऐसा नहीं हो रहा है|’ उन्होंने एक अंतराल लेकर कहा,’ दो बातें हैं| बड़ों को भी करनी चाहियें| मृत्युशैया के लिए वसीयत या संपत्ति का बंटवारा नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे परिवार में झगडे होते हैं| दूसरा, कितना बड़ा वरदान है काम करते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाना, बिना कैसी लम्बी बीमारी से घिरे हुए तब ही चले जाना जब सीधा चल सकता हो व्यक्ति| अलविदा संक्षिप्त होनी चाहिए| वास्तव में बहुत छोटी|’

आज जब मैन पीछे मुड़कर देखता हूँ – उन्होंने अपनी यात्रा – अध्यापन करते हुए सम्पन्न की, वे हमेशा अपने को एक शिक्षक के तौर पर जाने जाना पसंद करते थे| और वे अपने जीवन के अंतिम क्षण तक, सीधे खड़े थे, काम कर रहे थे और लेक्चर दे रहे थे| वे हमें छोड़ गये एक महान शिक्षक की भांति, सबसे ऊँचे कद के साथ खड़े हुए| उन्होंने धरा छोड़ डी, अपने व्यक्तिगत खाते में बिना कोई संपत्ति जमा किये हुए| उनके खाते में जमा है करोड़ों लोगों का प्यार और उनके प्रति  सद्भावनाएं| वे अपने जीवन के अंतिम क्षणों में बेहद सफल रहे|

मुझे उनके साथ किये गये लंच और डिनर्स की बहुत याद आयेगी| मुझे बहुत खलेगा कि अब वे मुझे अपने दयालू और मृदुल व्यवहार और जिग्यासोँ से आश्चर्यचकित नहीं करेंगे, मुझे कमी महसूस होगी जीवन की उन शिक्षाओं की जो कि वे शब्दों और अपने कर्मों से मुझे समझाते थे| मुझे उनके साथ फ्लाईट पकड़ने के जद्दोजहद, उनके साथ की गई यात्राएं, उनके साथ की गयी लम्बी चर्चाएं बहुत याद आयेंगीं|

आपने मुझे सपने देखना सिखाया| आपने सिखाया कि असंभव से प्रतीत होते स्वप्नों के अलावा सब कुछ योग्यताओं के साथ समझौते हैं|

डा. कलाम चले गए हैं, उनके लक्ष्य जीवित हैं| कलाम अमर हैं|

आपका अनुगृहित विधार्थी,

समर पाल सिंह

 

जुलाई 15, 2015

जाति के आंकड़ों से कौन डरता है? …योगेन्द्र यादव

YY1जाति का भूत देखते ही अच्छे-अच्छों की मति मारी जाती है| या तो लोग बिल्ली के सामने आंख मूंदे खड़े कबूतर की तरह हो जाते है, कड़वी सच्चाई का सामना करने के बजाय यह खुशफहमी पालने लगते हैं कि जाति है ही नहीं, या फिर उनकी गति सावन के अंधे की तरह हो जाती है| सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है और इसी तर्ज पर कुछ लोगों को हर बात में जाति ही जाति नजर आने लगती है| सरकार द्वारा सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना के जाति संबंधी आंकड़े सार्वजनिक न करने से उपजी बहस हिंदुस्तानी दिमाग की इसी बीमारी का एक नमूना है| सरकार की सफाई पहली नजर में ठीक लगती है|

जनगणना के आंकड़े बीनने-छानने में वक्त लग जाता है| इसलिए सारे आंकड़े एक साथ जारी नहीं होते, इसमें कई साल लग जाते हैं| पहले सात-आठ साल लगते थे, अब के कंप्यूटरी जमाने में तीन-चार साल लगते हैं| बेहतर होता, सरकार बताती कि किस तारीख तक जाति की गिनती को कागज पर अंतिम रूप दे दिया जायेगा, जातिवार आंकड़े सार्वजनिक कर दिये जायेंगे| पर जाति संबंधी आंकड़े जारी न करने को लेकर सरकार की दलील सुनने पर सरकार की नीयत पर शक होता है|

जब जेटली कहते हैं कि इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी की जानकारी जुटाना है, तो साफ है कि सरकार गोली देने की कोशिश कर रही है| हकीकत यह है कि कांग्रेस या बीजेपी, किसी भी सरकार की मंशा नहीं थी कि जातिवार जनगणना हो| दोनों सरकारों ने इसे रोकने, टालने और मोड़ने की कोशिशें कीं| खैर कहिए कि संसद में बहस हो गयी और सरकार को जातिवार जनगणना की बात सिद्धांत रूप में स्वीकारनी पड़ी| फिर इसे उलझाने के षड्यंत्र रचे गये| जाति की गणना संग सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण भी नत्थी कर दिया| अब कहा जा रहा है कि असली बात तो सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की ही थी, जाति की गणना नहीं|

जब रामविलास पासवान जाति गणना को गोपनीय रखने के तर्क देने लगते हैं, तो सरकार की नीयत पर शक और पुष्ट होने लगता है| व्यक्तिगत आंकड़े गोपनीय होते हैं, आप नहीं पूछ सकते कि फलां व्यक्ति ने अपनी जाति क्या बतायी है! पर जाति विषयक कुल तालिकाओं का जोड़-जमा सार्वजनिक करना जरूरी है| यह सब जानते-बूझते जब पासवान जी कहते हैं कि जातियों की गणना को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो जान पड़ता है कि सरकार ने इस आंकड़े को दबाने की ठान ली है|

जातिवार जनगणना के आंकड़े से सरकार डरती है, बड़े राजनीतिक दल डरते हैं, और डरते हैं सामाजिक न्याय के वे पक्षधर जो जाति की तहों के भीतर झांकने से कतराते हैं| सबके डर की अपनी-अपनी वजहें हैं|

जाति के आंकड़ों से कांग्रेस-बीजेपी और पूरा राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान डरता है. उन्हें डर है कि जाति का जिन्न बोतल से बाहर आ जायेगा| पिछड़ी जातियों की संख्या सार्वजनिक हो जायेगी और लोगों को आधिकारिक रूप से पता चल जायेगा कि जिस जाति समुदाय की संख्या इस देश में सबसे ज्यादा है, वह शिक्षा और नौकरियों के अवसर के मामले में कितना पीछे है|

उन्हें डर यह है कि जाति और नौकरी के संबंध पर से परदा उठ जायेगा| राजनीति, अफसरशाही और अर्थव्यवस्था पर अगड़ी जाति के वर्चस्व का राज खुल जायेगा| वैसे इसमें कुछ छुपा नहीं है, पर जाति के आंकड़ों के सामने आते ही इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो जायेगी| मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद से मोटा-मोटी जानते तो सब ही हैं कि इस देश में अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल लोगों की संख्या 45 से 50 फीसदी और सवर्ण जाति के लोगों की संख्या 16-20 फीसदी के आस-पास है, पर जाति की आधिकारिक गणना के सार्वजनिक होने से शिक्षा और नौकरियों में संख्या के हिसाब से भागीदारी का सवाल भी पुरजोर तरीके से उठेगा| बराबरी के इसी सवाल को बड़ी पार्टियां और सरकार कभी खुल कर सामने नहीं आने देना चाहते|

जाति के आंकड़ों से मंडल और सामाजिक न्याय के पक्षधरों में भी बेचैनी हो सकती है| उन्हें डर है, सर्वेक्षण कहीं यह न दिखा दे कि जाति सामाजिक अन्याय का एक महत्वपूर्ण कारक तो है, पर एकमात्र कारक नहीं|

ओबीसी में आनेवाली जातियों के बीच शिक्षा और नौकरियों में अवसर के लिहाज से चंद जातियों के वर्चस्व की बात जाति जनगणना के आंकड़ों से आधिकारिक रूप से उजागर हो सकती है| यह भी सामने आ सकता है कि एक ही जाति के बीच वर्ग और लिंग-भेद भी अवसरों की असमानता का बहुत बड़ा कारक है| इन बातों के उजागर होने पर सामाजिक न्याय की राजनीति को पुराने र्ढे पर चलाना मुश्किल होगा|

जातिवार आंकड़े को सार्वजनिक करना जातिवाद नहीं है, यह जाति के भूत को वश में करने का तरीका है| आरक्षण पर रुक गयी बहस को सार्थक दिशा में ले जाने का यह एक जरूरी अवसर भी है, बशर्ते हम जाति के भूत से आंखें खोल कर सामना करने को तैयार हों|

(योगेन्द्र यादव – प्रभात खबर में)

जुलाई 14, 2015

आनंद स्वतः होने में है, लालसा से करने में नहीं – ओशो

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अकबर ने एक दिन तानसेन को कहा, तुम्‍हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा ख्‍याल उठता है कि तुम जैसा गाने वाला शायद ही इस पृथ्‍वी पर कभी हुआ हो और न हो सकेगा। क्‍योंकि इससे ऊंचाई और क्‍या हो सकेगी। इसकी धारणा भी नहीं बनती। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्‍हें विदा किया था, और सोने लगा तब अचानक ख्‍याल आया। हो सकता है, तुमने भी किसी से सीखा है, तुम्‍हारा भी कोई गुरू होगा। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं। कि तुम्‍हारा कोई गुरू है? तुमने किसी से सीखा है?

      तो तानसेन ने कहा, मैं कुछ भी नहीं हूं गुरु के सामने; जिससे सीखा है। उसके चरणों की धूल भी नहीं हूं। इसलिए वह ख्‍याल मन से छोड़ दो। शिखर? भूमि पर भी नहीं हूं। लेकिन आपने मुझे ही जाना है। इसलिए आपको शिखर मालूम पड़ता हूं। ऊँट जब पहाड़ के करीब आता है, तब उसे पता चलता है, अन्यथा वह पहाड़ होता ही है।
तानसेन ने कहा कि मैं गुरु के चरणों में बैठा हूं; मैं कुछ भी नहीं हूं। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्‍यता भी हो जाए, तो समझूंगा बहुत कुछ पा लिया।
      तो अकबर ने कहा, तुम्‍हारे गुरु जीवित हों तो तत्‍क्षण, अभी और आज उन्‍हें ले आओ। मैं सुनना चाहूंगा। पर तानसेन ने कहा: यही तो कठिनाई है। जीवित वे है, लेकिन उन्‍हें लाया नहीं जा सकता हे।
      अकबर ने कहा, जो भी भेट करना हो, तैयारी है। जो भी। जो भी इच्‍छा हो, देंगे। तुम जो कहो, वहीं देंगे। तानसेन ने कहा, वही कठिनाई है, क्‍योंकि उन्‍हें कुछ लेने को राज़ी नहीं किया जा सकता। क्‍योंकि कुछ लेने का प्रश्‍न ही नहीं है।
अकबर ने कहा, कुछ लेने का प्रश्‍न नहीं है तो क्‍या उपाय किया जाए?
तानसेन ने कहा, कोई उपाय नहीं, आपको ही चलना पड़ेगा।
अकबर ने कहा,मैं अभी चलने को तैयार हूं।
तानसेन ने कहा, अभी चलने से तो कोई सार नहीं है। क्‍योंकि कहने से वह गायेंगे नहीं। ऐसा नहीं है वे गाते बजाते नहीं है। तब कोई सुन ले बात और है। तो मैं पता लगाता हूं, कि वह कब गाते-बजाते है। तब हम चलेंगे।
      पता चला—हरिदास फकीर उसके गुरू थे। यमुना के किनारे रहते थे। पता चला रात तीन बजे उठकर वह गाते है। नाचते हे। तो शायद ही दुनिया के किसी अकबर की हैसियत के सम्राट ने तीन बजे रात चोरी से किसी संगीतज्ञ को सुना हो। अकबर और तानसेन चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठ गये। पूरी रात इंतजार करेने के बाद सुबह जब बाबा हरिदास ने भगती भाव में गीत गया और मस्‍त हो कर डोलने लगे। तब अकबर की आंखों से झर-झर आंसू गीर रहे थे। वह केवल मंत्र मुग्ध हो कर सुनते रहे एक शब्‍द भी नहीं बोले।
      संगीत बंद हुआ। वापस घर जाने लगे। सुबह की लाली आसमान पर फैल रही थी। अकबर शांत मौन चलते रहे। रास्‍ते भर तानसेन से भी नहीं बोले। महल के द्वार पर जाकर तानसेन से केवल इतना कहा,”  अब तक सोचता था कि तुम जैसा कोई भी नहीं गा बजा सकता है। मेरा भ्रम आज टुट गया। अब सोचता हूं कि तुम हो कहां। लेकिन क्‍या बात है? तुम अपने गुरु जैसा क्‍यों नहीं गा सकते हो?”
      तानसेन न कहा, बात तो बहुत साफ है। मैं कुछ पाने की लिए बजाता हूं और मेरे गुरु ने कुछ पा लिया है। इसलिए बजाते गाते है। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्‍य है। जो मुझे मिले उसमें मेरे प्राण है। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो पाते। बजाते-गाते समय में सदा अधूरा रहता हूं। अंश हूं। अगर बिना गाए-बजाए भी मुझे वह मिल जाए जो गाने से मिलता है तो गाने-बजाने को फेंककर उसे पा लुंगा। गाने मेरे लिए साधन है। साध्‍य नहीं। साध्‍य कहीं और है—भविष्‍य में, धन में, यश में, प्रतिष्‍ठा में—साध्‍य कहीं और है। संगीत सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्‍मा नहीं बन सकता; साध्‍य में ही आत्‍मा का वास होता है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाए, तो साध को छोड़ दूँ अभी। लेकिन नहीं मिलता  साधन के बिना, इसलिए साधन को  खींचता हूं। लेकिन दृष्‍टि और प्राण और आकांशा ओर सब घूमता है साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे है। संगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी है जिसे पाने को वह गा-बजा रहे हे। बल्‍कि पीछे कुछ है। वह बह रहा है। जिससे उनका संगीत फूट रहा है। और बज रहा है। कुछ पा लिया है, कुछ भर गया है। वह बह रहा है। कोई अनुभूति, कोई सत्‍य, कोई परमात्‍मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है। पैमाना छलक रहा है आनंद का। उत्‍सव का।
      अकबर बार-बार पूछने लगा, किस लिए? किस लिए?
      स्‍वभावत: हम भी पूछते है। किस लिए? पर तानसेन ने कहा,नदिया किस लिए बह रही है? फूल किस लिए खिल रहे है? चाँद-सूरज किस लिए चमक रहे है? जीवन किस लिए बह रहा है?
      किस लिए मनुष्‍य की बुद्धि ने पैदा किया हे। सारा जगत ओवर फ्लोइंग है, आदमी को छोड़कर। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा है। सारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहे। खिलनें का आनंद है। सूर्य निकलता है। निकलने में आनंद है। पक्षी गीत गा रहे है। गाने में आनंद है। हवाएँ बह रही है, चाँद-तारे,आकाश गंगाए चमक रही है। चारों तरफ एक उत्सव का माहौल है। पर आदमी इसके बीच कैसा पत्थर और बेजान सा हो गया है। आनंद अभी है, यही है, स्‍वय में विराजने में है अपने होने में है। अभी और यही। अकबर ने पूछा तब हम उसे कैसे पाये। क्‍या करे जो आपके गुरु को मिला है। उनके गायन में उनके नृत्य में। कुछ अभूतपूर्व था। कुछ प्रसाद था। जो मैंने अभी तक नहीं देखा।
(गीता दर्शन,भाग-1, अध्‍याय 1-2)
जुलाई 7, 2015

सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

जुलाई 6, 2015

विफलता : (लोकनायक जयप्रकाश नारायण)

जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।

मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को ।

तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जावे !

जयप्रकाश नारायण

(अगस्त 1975, चण्डीगढ़ जेल में)

 

जून 16, 2015

आमों का सेहरा … सागर खय्यामी

जो आम मैं है वो लब ए शीरीं मैं नहीं रस
रेशों मैं हैं जो शेख की दाढ़ी से मुक़द्दस
आते हैं नज़र आम, तो जाते हैं बदन कस
लंगड़े भी चले जाते हैं, खाने को बनारस

होटों मैं हसीनों के जो, अमरस का मज़ा है
ये फल किसी आशिक की, मोहब्बत का सिला है

आमद से दसहरी की है, मंडी में दस्हेरा
हर आम नज़र आता है, माशूक़ का चेहरा
एक रंग में हल्का है, तो एक रंग में गहरा
कह डाला क़सीदे के एवज़, आम का सेहरा

खालिक को है मक़सूद, के मख्लूक़ मज़ा ले
वो चीज़ बना दी है के बुड्ढा भी चबा ले

फल कोई ज़माने में नहीं, आम से बेहतर
करता है सना आम की, ग़ालिब सा सुखनवर
इकबाल का एक शेर, कसीदे के बराबर
छिलकों पा भिनक लेते हैं , साग़र से फटीचर

वो लोग जो आमों का मज़ा, पाए हुए हैं
बौर आने से पहले ही, वो बौराए हुए हैं

नफरत है जिसे आम से वो शख्स है बीमार
लेते है शकर आम से अक्सर लब ओ रुखसार
आमों की बनावट में है, मुज़मर तेरा दीदार
बाजू वो दसहरी से, वो केरी से लब ए यार

हैं जाम ओ सुबू खुम कहाँ आँखों से मुशाबे
आँखें तो हैं बस आम की फांकों से मुशाबे

क्या बात है आमों की हों देसी या विदेसी
सुर्खे हों सरौली हों की तुख्मी हों की कलमी
चौसे हों सफैदे हों की खजरी हों की फजरी
एक तरफ़ा क़यामत है मगर आम दसहरी

फिरदौस में गंदुम के एवज़ आम जो खाते
आदम कभी जन्नत से निकाले नहीं जाते

(सागर खय्यामी)

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