अगस्त 3, 2017

सौंदर्यबोध

 

अपने इस गटापार ची बबुए के

पैरों में शहतीरें बांधकर

चौराहे पर खड़ा कर दो,

फिर, चुपचाप ढ़ोल बजाते जाओ,

शायद पेट भर जाए :

दुनिया विवशता नहीं

कुतूहल खरीदती है|

 

भूखी बिल्ली की तरह

अपनी गरदन में संकरी हाँडी फँसाकर

हाथ-पैर पटको,

दीवारों से टकराओ,

महज छटपटाते जाओ,

शायद दया मिल जाए:

दुनिया आँसू पसन्द करती है

मगर शोख चेहरों के|

 

अपनी हर मृत्यु को

हरी-भरी क्यारियों में

मरी हुई तितलियों-सा

पंख रंगकर छोड़ दो,

शायद संवेदना मिल जाए :

दुनिया हाथों-हाथ उठा सकती है

मगर इस आश्वासन पर

कि रुमाल के हल्के-से स्पर्श के बाद

हथेली पर एक भी धब्बा नहीं रह जाएगा|

 

आज की दुनिया में

विवशता,

भूख,

मृत्यु,

सब सजाने के बाद ही

पहचानी जा सकती है|

बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती हैं|

शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी

जो मरने के पूर्व

कफ़न और फूलों का

प्रबन्ध नहीं कर लेंगें|

ओछी नहीं है दुनिया:

मैं फिर कहता हूँ,

महज उसका सौंदर्य-बोध

बढ़ गया है|

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

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अगस्त 1, 2017

टूटा पहिया

मैं

रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंकों मत

क्या जाने कब

इस दुरूह चक्रव्यूह में

अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ

कोई दुस्साहसी अभिमन्यु घिर जाए?

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी

बड़े- बड़े महारथी

अकेली निहत्थी आवाज को

अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं

रथ का टूटा पहिया

उसके हाथों में

ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत

इतिहासों की सामूहिक गति

सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने

सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!

(धर्मवीर भारती)

 

जुलाई 25, 2017

पथ-हीन

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल – अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन-सा पथ है?

‘महाजन जिस ओर जाएँ’- शास्त्र हुंकारा

‘अंतरात्मा ले चले जिस ओर ‘ – बोला न्याय पण्डित

‘साथ आओ सर्व-साधारण जनों के’ – क्रान्ति वाणी|

पर महाजन-मार्ग-गम्नोचित न संबल है, न रथ है,

अंतरात्मा अनिश्चय – संशय-ग्रसित,

क्रान्ति-गति-अनुसरण-योग्य है न पद-सामर्थ्य|

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल-अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन सा पथ है?

 

(भारतभूषण अग्रवाल)

जुलाई 24, 2017

बौनों की दुनिया …

 

हम सब बौने हैं,

मन से, मस्तिष्क से भी,

बुद्धि से, विवेक से भी,

क्योंकि हम जन हैं

साधारण हैं

नहीं हैं विशिष्ट

— क्योंकि हर ज़माना ही

चाहता है बौने रहें

वरना मिलेंगें कहाँ

वक्ता को श्रोता

नेता को पिछलगुए

बुद्धिजनों को पाठक

आंदोलनों को भीड़

धर्मों को भक्त

संप्रदायों को अतिमन्द

राज्यों को क्लर्क

कारखानों को मजदूर

तोपों को भोजन

पार्टी-बॉसों को यसमैन

राजाओं को गुलाम

डिक्टेटरों को अंधे

डिमोक्रेसी को मीडियोकर

मतवादों को बुद्धू

यूथ-वादों को सांचे ढले आदमी

हम सब उन्ही के लिए

युग-युग से जीते हैं

क्रीतदास हैं हम

इतिहास-वसन सीते हैं

इतिहास उनका है

हम सब तो स्याही हैं

विजय सभी उनकी

हम घायल सिपाही हैं

हमको हमेशा ही

घायल भी रहना

सिपाही भी रहना है

दैत्यों के काम निभा

बौने ही रहना है|

 

(गिरिजाकुमार माथुर)

 

जुलाई 21, 2017

माँ – अनोखे रूप

काशी दशाश्वमेघ घाट पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं, उन्ही में से एक छोटा- सा मंदिर गंगा में अधडूबा सा है, नौका-विहार करते समय एक मल्लाह  ने मुझे उस भग्न अध डूबे मंदिर की कहानी सुनाई|

एक बुड्ढी विधवा थी, उसका एक बेटा था| बुढ़िया ने मेहनत मजदूरी करके बेटे को पढ़ाया-लिखाया| बेटा बुद्धिमान था, पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया|वह अपनी माँ के दिन भूला नहीं , गंगा-तट पर उसने मंदिर बनवाया|

मंदिर बन गया तो माँ से बोला – माँ तूने मेरे लिए इतना किया| मैंने तेरे लिए मंदिर बनवा दिया है, अब तू इधर-उधर मत जा| इसी मंदिर में भगवान की पूजा कर| तूने मेरे लिए इतना किया मैंने भी मंदिर बनवा कर तेरे ऋण से मुक्त हो गया|

कहते हैं कि जैसे ही बेटे ने कहा- मैं तेरे ऋण से मुक्त हो गया वैसे ही मंदिर टूटकर गंगा जी में डूब गया|

मल्लाह ने मुझे बताया – वह यही मंदिर है|

* * * * * * * * * * * * * * * * * * *

मेरे स्वर्गीय मित्र डॉ. बिंदु माधव मिश्र की वृद्धा माता बीमार थीं| ९० से ज्यादा की उम्र थी| लोग उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित थे| घर भर सेवा में लगा था|

मैं भी उन्हें देखने गया, चरण स्पर्श किया, बोलीं – सोचती हूँ इतने जाड़े में मरी तो बच्चों को बड़ी तकलीफ होगी, किरिया कर्म, सर मुंडाना, सर्दी लग जायेगी|

(विश्वनाथ त्रिपाठी)

साभार: कथादेश, जून २०१७

जुलाई 20, 2017

हमारी गाए – मोहम्मद इस्माइल

मार्च 24, 2017

सेक्युलरवाद से संवाद – योगेन्द्र यादव

 उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे। उसी घड़ी एक सेक्युलर मित्र से सामना हो गया। चेहरे पर मातम, हताश और चिंता छायी हुई थी। छूटते ही बोले “देश में नंगी साम्प्रदायिकता जीत रही है। ऐसे में आप जैसे लोग भी सेक्युलरवाद की आलोचना करते हैं तो कष्ट होता है।”

मैं हैरान था: “आलोचना तो लगाव से पैदा होती है। अगर आप किसी विचार से जुड़े हैं तो आपका फर्ज़ है कि आप उसके संकट के बारे में ईमानदारी से सोचें। सेक्युलरवाद इस देश का पवित्र सिद्धांत है। जिन्हें इस सिद्धांत में आस्था है उनका धर्म है कि वो सेक्युलरवाद के नाम पर पाखंडी राजनीति का पर्दाफाश करें।”

वो संतुष्ट नहीं थे। कहने लगे “अब जलेबी न बनायें। मुझे सीधे-सीधे बताएं कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से आपको डर नहीं लगता?”

मैंने सीधी बात कहने की कोशिश की: ” डर तो नहीं लगता, हाँ दुःख जरूर हुआ। जिसे इस देश में गर्व हो उसे ऐसे किसी नेता के इतनी ऊँची कुर्सी पर बैठने पर शर्म कैसे नहीं आएगी? जिसे योग में सम्यक भाव अपेक्षा हो वो आदित्य नाथ जी योगी कैसे मान सकता है? जो धर्म को कपड़ों में नहीं आत्मा में ढूँढता है वो घृणा के व्यापार को धार्मिक कैसे कह सकता है?”

अब उनके चेहरे पर कुछ आत्मीयता झलकी “तो आप साफ़ कहिये न, कि मोदी, अमित शाह और संघ परिवार देश का बंटाधार करने पर तुले हैं।”

मैं सहमत नहीं था: “सेक्युलरवादी सोचते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दुष्प्रचार, संघ परिवार के घृणा फैलाने के अभियान और भाजपा की राजनीति ने आज सेक्यूलरवाद को संकट में पहुंचा दिया है। लेकिन इतिहास में हारी हुई शक्तियां अपने विरोधियों को दोष देती है। सच यह है कि इस देश में सेक्यूलरवाद स्वयं सेक्यूलरवाद के एकांगी विचार और सेक्यूलरवादियों की कमजोर और पाखंडी राजनीति के कारण संकट में है।”

उनके चेहरे पर असमंजस को देखकर मैंने कुछ विस्तार दिया: “संकट की इस घड़ी में सेक्यूलर राजनीति दिशाहीन है, घबराई हुई है। जनमानस और सड़क पर सांप्रदायिकता का प्रतिरोध करने की बजाय सत्ता के गलियारों में शॉर्टकट ढूंढ़ रही है, भाजपा की हर छोटी-बड़ी हार में अपनी जीत देख रही है। हर मोदी विरोधी को अपना हीरो बनाने को लालायित है। सांप्रदायिक राजनीति अपने नापाक इरादों के लिए संकल्पबद्ध है, इस मायने में सच्ची है। आत्मबल और संकल्प विहीन सेक्यूलर राजनीति अर्धसत्य का सहारा लेने को मजबूर है। सांप्रदायिकता नित नई रणनीति खोज रही है, अपनी जमीन पर अपनी लड़ाई लड़ रही है। सेक्यूलरवाद लकीर का फकीर है, दूसरे की जमीन पर लड़ाई हारने को अभिशप्त है। सांप्रदायिकता आक्रामक है तो सेक्यूलरवाद रक्षात्मक। सांप्रदायिकता सक्रिय है, सेक्यूलरवाद प्रतिक्रिया तक सीमित है। सांप्रदायिकता सड़क पर उतरी हुई है, सेक्यूलरवाद किताबों और सेमिनारों में कैद है। सांप्रदायिकता लोकमत तक पहुंच रही है, सेक्यूलरवाद पढ़े-लिखे अभिजात्य वर्ग के अभिमत में सिमटा हुआ है। हमारे समय की यही विडम्बना है-एक ओर बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है तो दूसरी ओर थके-हारे सेक्यूलरवाद की कवायद।”

अब वो “ऊँची बात कर दी श्रीमान ने” वाली मुद्रा में थे। तय नहीं कर पा रहे थे कि मैं दोस्त हूँ या दुश्मन। इसलिए मैंने इतिहास का सहारा लिया।

“आजादी से पहले सेक्यूलर भारत का सपना राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा था और सभी धर्मों के भीतर सामाजिक सुधार के लिए कटिबद्ध था।

आजादी के बाद से सेक्यूलरवाद इस देश की मिट्टी से कट गया। सेक्यूलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी इबारत से सेक्यूलर भारत स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गांधी की भाषा छोड़कर विदेशी मुहावरा बोलना शुरू किया। सेक्यूलरवाद का सरकारी अनुवाद ‘धर्मनिरपेक्षता’ इसी उधारी सोच का नमूना है। धर्म के संस्थागत स्वरूपों और अलग-अलग पंथ के बीच तटस्थ रहने की नीति धीरे-धीरे धर्म के प्रति निरपेक्षता में बदल गई। सेक्यूलरवाद का अर्थ नास्तिक होना और एक औसत भारतीय की आस्था से विमुख होना बन गया। सेक्यूलरवाद का विचार भारत के जनमानस से कटता गया।”

अब उनसे रहा नहीं गया: “यानि कि आप भी मानते हैं कि सेक्युलरवाद वोट बैंक की राजनीति है?”

“ये कड़वा सच है। आजादी के आंदोलन में सेक्यूलरवाद एक जोखिम से भरा सिद्धांत था। आजादी के बाद सेक्यूलरवाद एक सुविधाजनक राजनीति में बदल गया। चुनावी राजनीति में बैठे-बिठाए अल्पंसख्कों के वोट हासिल करने का नारा बन गया। जैसे-जैसे कांग्रेस की कुर्सी को खतरा बढ़ने लगा, वैसे-वैसे अल्पसंख्यकों के वोट पर कांग्रेस की निर्भरता बढ़ने लगी। अब अल्पसंख्यकों, खासतौर पर मुसलमानों, को वोट बैंक की तरह बांधे रखना कांग्रेस की चुनावी मजबूरी हो गई।”
“तो अब आप ये भी कहेंगे कि मुसलमानों का तुष्टिकरण भी एक कड़वा सच है?” अब उनकी दृष्टि वक्र थी।

” नहीं। तुष्टिकरण मुसलमानों का नहीं, उनके चन्द मुल्लाओं का हुआ। आजादी के बाद मुस्लिम समाज उपेक्षा, पिछड़ेपन और भेदभाव का शिकार था। देश के विभाजन के चलते अचानक नेतृत्वविहीन इस समाज को शिक्षा और रोजगार के अवसरों की जरूरत थी। लेकिन उनकी इस बुनियादी जरूरत को पूरा किए बिना उनके वोट हासिल करने की राजनीति ने सेक्यूलरवाद की चादर ओढ़ना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सेक्यूलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाए रखने की राजनीति हो गई-मुसलमानों को खौफज़दा रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट अपनी झोली में बंटोरते जाओ। नतीजतन मुस्लिम राजनीति मुसलमानों के बुनियादी सवालों से हटकर सिर्फ सुरक्षा के सवाल और कुछ धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों (उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, शादी-ब्याह के कानून) के इर्द-गिर्द सिमट गई।

जिस खेल को पहले कांग्रेस ने शुरू किया, उसे बाद में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लेफ्ट ने भी अपना लिया। डर के मारे मुसलमान सेक्यूलर पार्टियों का बंधक बन गया। मुसलमान पिछड़ते गए और सेक्यूलर राजनीति फलती-फूलती रही। मुस्लिम समाज उपेक्षा और भेदभाव का शिकार बना रहा, लेकिन उनके वोट के ठेकेदारों का विकास होता गया। वोट बैंक की इस घिनौनी राजनीति को सेक्यूलर राजनीति कहा जाने लगा। व्यवहार में सेक्यूलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े हुए दिखना। पहले जायज हितों की रक्षा से शुरुआत हुई। धीरे-धीरे जायज-नाजायज हर तरह की तरफदारी को सेक्यूलरवाद कहा जाने लगा। धीरे-धीरे एक औसत हिंदू को लगने लगा कि सेक्यूलरवादी लोग या तो अधर्मी है या विधर्मी। उसकी नजर में सेक्यूलरवाद मुस्लिमपरस्ती या अल्पंसख्कों के तुष्टिकरण का सिद्धांत दिखने लगा। उधर मुसलमानों को लगने लगा कि सेक्यूलर राजनीति उन्हें बंधक बनाए रखने का षड्यंत्र है। इससे तो बेहतर है कि वे खुलकर अपने समुदाय की पार्टी बनाए। इस तरह देश का एक पवित्र सिद्धांत देश का सबसे बड़ा ढकोसला बन गया।”

“यानि आप कह रहे हैं कि हम योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद दें कि उनके बहाने हमारी आँखे खुल गयीं ” इतना बोल मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना वे आगे बढ़ गए। मुझे लगा उनके चेहरे पर उतनी हताशा नहीं थी, उनकी चाल में एक फुर्ती थी।

मार्च 23, 2017

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव : आज का भारतीय उन्हें श्रद्धांजलि देने लायक है भी?

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत पर उनकी शान में आज की तारीख में कसीदे काढने वाली भारतीय जनता में से बहुसंख्यक क्या जीते जागते इन क्रांतिकारियों को आज की परिस्थितियों में स्वीकार भी कर पाते?

भगत सिंह और उनके साथी तो आज भी समाज के सबसे निचले पायदान पर जी रहे वंचित तबके के हितों के लिए संघर्ष कर रहे होते, आदिवासियों के हितों, देश के जंगल, पानी और आकाश और पर्यावरण की रक्षा के लिए अलख जगा रहे होते और निश्चित तौर पर वे जन-शोषक कोर्पोरेट हितों के विरुद्ध खड़े होते, और निश्चित ही किसी भी राजनैतिक दल की सरकार भारत में होती वह उन्हें पसंद नहीं करती|

उन पर तो संभवतः आजाद भारत में भी मुक़दमे ही चलते|

झूठे कसीदों से फिर क्या लाभ, सिवाय फील गुड एहसासात रखने के कि कितने महान लोगों की स्मृति में हम स्टेट्स लिख रहे हैं ?

भगत सिंह एवं उनके साथियों के पक्ष में खड़ा होना आज भी क्रांतिकारी ही है और आधुनिक भारत का बाशिंदा इस बात से मुँह नहीं मोड़ सकता कि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के वशीभूत होने के कारण किसी भी किस्म के सजग आंदोलन के पक्ष में वह खड़ा हो नहीं सकता|

आज भगत सिंह और उनके साथी होते तो उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स उन्हें गरिया रहे होते, उनके साथ गाली-गलौज भी हो सकती थी|

ऐसे में भगत सिंह और उनके साथियों को श्रद्धांजलि देने के प्रयास दोहरेपन के सिवाय कुछ भी नहीं हैं| उनके कार्यों की ताब आज की तारीख में न सहने की मानसिकता के कारण उन्हें झूठी श्रद्धांजलि देने के प्रयास २५ साल से कम उम्र में ही देश की खातिर फांसी पर चढ़ जाने वाले इस महावीर और उनके साथियों के बलिदान के प्रति अवमानना ही कहे जायेंगें|

पुनश्चा:

१) डा. राम मनोहर लोहिया का जन्म २३ मार्च को हुआ पर वे इन शहीदों की सहादत की स्मृति में अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे|

२) पंजाब के अनूठे कवि पाश, भगत सिंह और उनके शहीद साथियों के बहुत बड़े प्रशंसक थे, और संयोगवश पंजाब में आतंकवादियों दवारा उनकी ह्त्या भी इसी दिन २३ मार्च १९८८ को हुयी|

 

#BhagatSingh #Sukhdev #Rajguru

 

फ़रवरी 28, 2017

जंग न होने देंगें …अटल बिहारी बाजपेयी

gurmehar विश्व शांति के हम साधक हैं,
जंग न होने देंगे!
कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी,
खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी,
आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा,
एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी,
युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हथियारों के ढेरों पर जिनका है डेरा,
मुँह में शांति,
बगल में बम,
धोखे का फेरा,
कफन बेचने वालों से कह दो चिल्लाकर,
दुनिया जान गई है उनका असली चेहरा,
कामयाब हो उनकी चालें,
ढंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हमें चाहिए शांति,
जिंदगी हमको प्यारी,
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी,
हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से,
आगे आकर हाथ बटाए दुनिया सारी।
हरी-भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे जंग न होने देंगे।
भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है,
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,
तीन बार लड़ चुके लड़ाई,
कितना महँगा सौदा,
रूसी बम हो या अमेरिकी,
खून एक बहना है।
जो हम पर गुजरी,
बच्चों के संग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
(अटल बिहारी बाजपेयी)

फ़रवरी 23, 2017

भगवान शिव : मकबूल फ़िदा हुसैन के तसव्वुर से

shiva_hussain2

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