जुलाई 31, 2015

डा. अब्दुल कलाम : अंतिम छह घंटे

Kalaamमैं किसलिए याद किया जाऊँगा… महान कलाम सर के जीवन के अंतिम दिन उनके साथ बिताएं घंटों की स्मृतियों के कारण…
उनसे अंतिम बार बात करे हुए 8 घंटे हो चुके हैं और नींद मुझसे कोसों दूर है, यादों की बाढ़ सी आती जाती है, जब तब आंसुओं के सैलाब के साथ| उनके साथ मेरा अंतिम दिन – 27th July, को दोपहर 12 बजे शुरू हुआ, जब मैं उनके साथ गुवाहटी जाने के लिए हवाई जहाज में बैठा| ड़ा. कलाम की सीट थी, 1A पर और मैं बैठा था IC पर| उन्होंने गहरे रंग का ‘कलाम सूट’ पहना था और मैंने उनके सूट की प्रशंसा की,’बहुत अच्छा रंग है सर!’  तब मुझे कहाँ पता था कि इस रंग के सूट को उनके जीवित शरीर पर मैं अंतिम बार देख रहा था|

बरसात के मध्य 2.5 घंटे लंबे फ्लाईट| मुझे ऊपर आकाश में उड़ते हवाई जहाज के झटके खाने से नफरत है जबकि वे ऐसी अवस्था में अविचलित बैठे रहते| जब भी वे मुझे झटके के कारण भयभीत देखते वे खिड़की ढक देते और मुझसे कहते,’ अब भय की कोई बात दिखाई नहीं देती!’
हवाई  यात्रा के बाद 2.5 घंटे कार से यात्रा करके हम दोनों IIM शिलांग पहुंचे| पिछले पांच घंटों के सफर के दौरान हमने ढेर सारी बातें कीं, बहस की, जैसे कि हम पिछले छह सालों में हवाई यात्राओं या सड़क यातारों के दौरान करते रहे हैं|

पिछली हर बातचीत की तरह इस बार की बातचीत भी विशेष थी| विशेषतया तीन ऐसे मुददे हैं जो उनसे इस अंतिम मुलाक़ात की स्मृतियों के सबसे यादगार मुददे रहेंगें|
पहले तो डा. कलाम पंजाब में हाल में हुए आतंकवादी हमले से बेहद चिंतित थे| निर्दोषों की हत्याओं ने उन्हें अंदर तक व्यथित कर दिया था| IIM शिलांग में उनके लेक्चर का विषय ही था – पृथ्वी को रहने के लिए और बेहतर बनाया जाए| उन्होंने पंजाब में आतंकवादी घटना को अपने लेक्चर के विषय से जोड़ा और कहा,’ ऐसा प्रतीत होता है कि मानव रचित ताकतें धरती पर जीवन के लिए उतनी ही विनाशकारी हैं जैसे कि प्रदुषण|’

हम दोनों ने इस विषय पर बात की कि अगर हिंसा, प्रदुषण और मानव की बेतुकी और हानिकारक गतिविधियां आदि सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो मनुष्य को धरती को छोड़ना पड़ेगा|

‘तीस साल शायद…, अगर ऐसे ही सब कुछ चलता रहा|आप लोगों को इस सन्दर्भ में कुछ करना चाहिए … यह आप लोगों के भविष्य के संसार का मामला है|’

हमारी बातचीत का दूसरा मुद्दा राष्ट्रीय महत्त्व का था| ड़ा. कलाम, चिंतित थे कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था, संसद की कार्यवाही बार बार ठप्प हो जाती है| उन्होंने कहा,’ मैंने अपने कार्यकाल में दो भिन्न सरकारों को देखा| उसके बाद मैं कई और सरकारों को देख चुका हूँ| हरेक सरकार के काल में संसद की गतिविधियां बाधित होती रही हैं| यह उचित नहीं है| मुझे वास्तव में कोई ऐसा रास्ता खोजना चाहिए जिससे संसद की कार्यवाही बिना बाधा के सुचारू रूप से विकास के मॉडल पर चलाई जा सके|’

उसी समय उन्होंने मुझसे एक प्रश्न तैयार करने के लिए कहा जिसे वे अपने लेक्चर के अंत में IIM शिलांग के विधार्थियों से पूछना चाहते थे एक सरप्राइज असाइनमेंट के तौर पर| वे चाहते थे कि युवा विधार्थी ऐसे मौलिक रास्ते सुझाएँ जिससे संसद की कार्यवाही को ज्यादा गतिमय और उत्पादक बनाया जा सके| लेकिन कुछ क्षण बाद उन्होंने कहा,’ लेकिन मैं कैसे उनसे समस्या का हल पूछ सकता हूँ जबकि मेरे पास ही इस विकराल समस्या का कोई हल नहीं है?’ अगले एक घंटे तक हमने इस मुददे पर कई संभावित विकल्पों पर विचार किया, हमने सोचा अकी हम इन विकल्पों को अपनी आने वाली पुस्तक  – Advantage India, का हिस्सा बनायेंगें

तीसरा मुद्दा उनके सरल और मानवीय स्वभाव की खूबसूरती से मेरे सामने उपजा| हम लोग 6-7 कारों के काफिले में थे| ड़ा. कलाम और मैं दूसरी कार में थे और हमसे आगे एक खुली जिप्सी में सैनिक सवार थे| जिप्सी में दोनों और दो दो जवान बैठे थे और एक लंबा – पतला जवान खड़ा होकर अपनी बन्दुक संभाले इधर उधर निगरानी में व्यस्त था| सड़क यात्रा के एक घंटे के सफर के बाद डा. कलाम ने कहा,’ सैनिक ऐसे क्यों खड़ा है? वह थक जायेगा| यह तो सजा है उसके लिए| क्या आप वायरलेस से सन्देश भेज सकते हैं कि वह बैठ जाए|’

मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि सैनिक को बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के लिए ऐसे ही खड़ा होकर चलने के निर्देश दिए गये होंगे| पर वे नहीं माने| हमने रेडियो सन्देश भेजने का प्रयास किया लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया| यात्रा के अगले  1.5 में तीन बार डा. कलाम ने मुझे सैनिक को किसी तरह से सन्देश भेज कर उसे बैठ जाने के लिए कहा| उन्होंने कहा कि हाथ से सन्देश भेज कर देखो शायद उनमें से कोई देख ले| जब उन्हें लगा कि कुछ नहीं हो पायेगा तो उन्होंने मुझसे कहा,’ मैं सैनिक से मिलना चाहता हूँ उसे धन्यवाद देने के लिए|’ जब हम IIM  शिलांग के परिसर में पहुंचे तो मैं सिक्योरिटी के लोगों के पास गया उस सैनिक के बारे में पूछताछ करने| मैं उस सैनिक को अंदर डा. कलाम के पास ले गया| डा कलाम ने उस सैनिक का अभिवादन किया और उससे हाथ मिला कर कहा,’ भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया| क्या आप थके हैं? आप कुछ खायेंगें? मुझे बड़ा खेद है कि मेरे कारण आपको इतनी देर तक खड़े रहना पड़ा|’

काली पोशाक में सजा हुआ युवा सैनिक उनके ऐसे मृदुल व्यवहार से आश्चर्यचकित था| उसके मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे| मुश्किल से उसने कहा,’ सर आपके लिए तो छह घंटे भी खड़े रहेंगें|’

इसके बाद डा. कलाम लेक्चर हॉल में चले गये| वे लेक्चर के लिए विलम्ब से नहीं पहुंचना चाहते थे| वे हमेशा कहते थे,’ विधार्थियों को कभी इंतजार नहीं कराना चाहिए|’
मैंने जल्दी से उनका माइक सेट किया, उनके लेक्चर के बारे में संक्षिप्त सा विवरण दिया और कम्प्यूटर के सामने मुस्तैदी से बैठ गया| मैंने जैसे ही उनका माइक कनेक्ट किया उन्होंने मुस्करा कर मुझसे कहा,’ फनी गाय, आर यू डूइंग वेळ?’ ‘फनी गाय’ जब भी डा. कलाम ऐसा कहते थे तब इसके कई अर्थ हो सकते थे और उनके स्वर के माध्यम से पता लगाया जा सकता था कि उनका क्या तात्पर्य था मुझे ऐसे संबोधित करने के लिए| इसका अर्थ कुछ भी सकता था, मसलन- तुमने अच्छा काम किया, या कि तुमने सब गडबड कर दिया, और तुम्हे उन्हें ढंग से सुनना चाहिए, या कि तुम बेहद भोले हो, या वे खुद मजाक के मूड में हों तो ऐसा कहते थे| पिछले छह सालों में मैं उनके ‘फनी गाय’ के सम्बोधन का सही अर्थ जानने में प्रवीण हो गया था| इस बार वे मुझसे मजाक करने के मूड में थे|

उन्होंने कहा,’ फनी गाय! आर यू डूइंग वेळ?’ मैं उनकी तरफ मुस्करा दिया| यही वे अंतिम शब्द थे जो उन्होंने मुझसे मुखातिब होकर कहे| उनके पीछे बैठ कर  मैं उनका भाषण सुन रहा था| दो मिनट के आसपास ही भाषण में एक वाक्य बोलकर उन्होंने एक लम्बी चुप्पी साध ली, मैंने उनकी ओर देखा और वे मंच पर गिर गये|

हमने उन्हें उठाया| डाक्टर्स जब तक आटे हम्नसे सब कुछ किया जो हम कर सकते थे| मैं जीवन भर उनकी दो-तिहाई बंद आँखों के भाव नहीं भूल पाउँगा| मैंने एक हाथ में उनका सिर थामा और उन्हें रिवाइव करने के सब प्रयत्न किये जो मैं कर सकता था| उनकी मुट्ठियाँ कास गयीं और मेरे हाथों से लिपट गयीं| उनके चेहरे पर शान्ति थी उनकी बुद्धिमान आँखें स्थिर होकर भी बुद्धिमत्ता बरसा रही थीं| उन्होंने एक शब्द नहीं कहा| किसी दर्द का कोई चिह्न तक उनके चेहरे पर नहीं उभरा|

पांच मिनटों के अंदर हम पस के अस्पताल में थे| अगले कुछ मिनटों में डाक्टर्स ने सूचित कर दिया कि भारत के ‘मिसाइल मैन’ के प्राण पखेरू उड़ चुके थे| मैंने उनके चरण स्पर्श किये…अंतिम बार| अलविदा मेरे बुजुर्ग मित्र! विशाल दार्शनिक गुरु! अब केवल विचारों में ही भेंट हो पायेगी और मिलना अगले जन्म में होगा|
लौटते समय यादों का पिटारा खुल गया| बहुत बार वे मुझसे पूछते थे,’ तुम युवा हो, निर्णय करो कि तुम किस रूप में याद किये जाना पसंद करोगे?’ मैं किसी शानदार उत्तर के बारे में सोचा अकर्ता और एक बार ठाकर मैं जैसे को तैसा का सिद्धांत अपनाते हुए उन्ही से पूछ डाला,’पहले आप बताइये, आप अपने को किस रूप में याद किये जाना पसंद करेंगे? राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक, मिसाइल मैन, India 2020, Target 3 billion…. या कुछ और?’  मुझे लगा उन्हें कई विकल्प देकर मैंने प्रश्न को उनके लिए अत्यंत सरल बना दिया था| पर उनके उत्तर ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया| उन्होंने कहा,’शिक्षक के रूप में’|

तकरीबन दो सप्ताह पहले जब हम उनके मिसाइल प्रोजेक्ट के समय के मित्रों के बारे में चर्चा आकार रहे थे, उन्होंने कहा,’ बच्चों को उनके माता-पिता की देखभाल करनी चाहिए| यह दुखद है कि बहुत मामलों में ऐसा नहीं हो रहा है|’ उन्होंने एक अंतराल लेकर कहा,’ दो बातें हैं| बड़ों को भी करनी चाहियें| मृत्युशैया के लिए वसीयत या संपत्ति का बंटवारा नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि इससे परिवार में झगडे होते हैं| दूसरा, कितना बड़ा वरदान है काम करते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाना, बिना कैसी लम्बी बीमारी से घिरे हुए तब ही चले जाना जब सीधा चल सकता हो व्यक्ति| अलविदा संक्षिप्त होनी चाहिए| वास्तव में बहुत छोटी|’

आज जब मैन पीछे मुड़कर देखता हूँ – उन्होंने अपनी यात्रा – अध्यापन करते हुए सम्पन्न की, वे हमेशा अपने को एक शिक्षक के तौर पर जाने जाना पसंद करते थे| और वे अपने जीवन के अंतिम क्षण तक, सीधे खड़े थे, काम कर रहे थे और लेक्चर दे रहे थे| वे हमें छोड़ गये एक महान शिक्षक की भांति, सबसे ऊँचे कद के साथ खड़े हुए| उन्होंने धरा छोड़ डी, अपने व्यक्तिगत खाते में बिना कोई संपत्ति जमा किये हुए| उनके खाते में जमा है करोड़ों लोगों का प्यार और उनके प्रति  सद्भावनाएं| वे अपने जीवन के अंतिम क्षणों में बेहद सफल रहे|

मुझे उनके साथ किये गये लंच और डिनर्स की बहुत याद आयेगी| मुझे बहुत खलेगा कि अब वे मुझे अपने दयालू और मृदुल व्यवहार और जिग्यासोँ से आश्चर्यचकित नहीं करेंगे, मुझे कमी महसूस होगी जीवन की उन शिक्षाओं की जो कि वे शब्दों और अपने कर्मों से मुझे समझाते थे| मुझे उनके साथ फ्लाईट पकड़ने के जद्दोजहद, उनके साथ की गई यात्राएं, उनके साथ की गयी लम्बी चर्चाएं बहुत याद आयेंगीं|

आपने मुझे सपने देखना सिखाया| आपने सिखाया कि असंभव से प्रतीत होते स्वप्नों के अलावा सब कुछ योग्यताओं के साथ समझौते हैं|

डा. कलाम चले गए हैं, उनके लक्ष्य जीवित हैं| कलाम अमर हैं|

आपका अनुगृहित विधार्थी,

समर पाल सिंह

 

जुलाई 15, 2015

जाति के आंकड़ों से कौन डरता है? …योगेन्द्र यादव

YY1जाति का भूत देखते ही अच्छे-अच्छों की मति मारी जाती है| या तो लोग बिल्ली के सामने आंख मूंदे खड़े कबूतर की तरह हो जाते है, कड़वी सच्चाई का सामना करने के बजाय यह खुशफहमी पालने लगते हैं कि जाति है ही नहीं, या फिर उनकी गति सावन के अंधे की तरह हो जाती है| सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है और इसी तर्ज पर कुछ लोगों को हर बात में जाति ही जाति नजर आने लगती है| सरकार द्वारा सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना के जाति संबंधी आंकड़े सार्वजनिक न करने से उपजी बहस हिंदुस्तानी दिमाग की इसी बीमारी का एक नमूना है| सरकार की सफाई पहली नजर में ठीक लगती है|

जनगणना के आंकड़े बीनने-छानने में वक्त लग जाता है| इसलिए सारे आंकड़े एक साथ जारी नहीं होते, इसमें कई साल लग जाते हैं| पहले सात-आठ साल लगते थे, अब के कंप्यूटरी जमाने में तीन-चार साल लगते हैं| बेहतर होता, सरकार बताती कि किस तारीख तक जाति की गिनती को कागज पर अंतिम रूप दे दिया जायेगा, जातिवार आंकड़े सार्वजनिक कर दिये जायेंगे| पर जाति संबंधी आंकड़े जारी न करने को लेकर सरकार की दलील सुनने पर सरकार की नीयत पर शक होता है|

जब जेटली कहते हैं कि इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी की जानकारी जुटाना है, तो साफ है कि सरकार गोली देने की कोशिश कर रही है| हकीकत यह है कि कांग्रेस या बीजेपी, किसी भी सरकार की मंशा नहीं थी कि जातिवार जनगणना हो| दोनों सरकारों ने इसे रोकने, टालने और मोड़ने की कोशिशें कीं| खैर कहिए कि संसद में बहस हो गयी और सरकार को जातिवार जनगणना की बात सिद्धांत रूप में स्वीकारनी पड़ी| फिर इसे उलझाने के षड्यंत्र रचे गये| जाति की गणना संग सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण भी नत्थी कर दिया| अब कहा जा रहा है कि असली बात तो सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की ही थी, जाति की गणना नहीं|

जब रामविलास पासवान जाति गणना को गोपनीय रखने के तर्क देने लगते हैं, तो सरकार की नीयत पर शक और पुष्ट होने लगता है| व्यक्तिगत आंकड़े गोपनीय होते हैं, आप नहीं पूछ सकते कि फलां व्यक्ति ने अपनी जाति क्या बतायी है! पर जाति विषयक कुल तालिकाओं का जोड़-जमा सार्वजनिक करना जरूरी है| यह सब जानते-बूझते जब पासवान जी कहते हैं कि जातियों की गणना को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो जान पड़ता है कि सरकार ने इस आंकड़े को दबाने की ठान ली है|

जातिवार जनगणना के आंकड़े से सरकार डरती है, बड़े राजनीतिक दल डरते हैं, और डरते हैं सामाजिक न्याय के वे पक्षधर जो जाति की तहों के भीतर झांकने से कतराते हैं| सबके डर की अपनी-अपनी वजहें हैं|

जाति के आंकड़ों से कांग्रेस-बीजेपी और पूरा राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान डरता है. उन्हें डर है कि जाति का जिन्न बोतल से बाहर आ जायेगा| पिछड़ी जातियों की संख्या सार्वजनिक हो जायेगी और लोगों को आधिकारिक रूप से पता चल जायेगा कि जिस जाति समुदाय की संख्या इस देश में सबसे ज्यादा है, वह शिक्षा और नौकरियों के अवसर के मामले में कितना पीछे है|

उन्हें डर यह है कि जाति और नौकरी के संबंध पर से परदा उठ जायेगा| राजनीति, अफसरशाही और अर्थव्यवस्था पर अगड़ी जाति के वर्चस्व का राज खुल जायेगा| वैसे इसमें कुछ छुपा नहीं है, पर जाति के आंकड़ों के सामने आते ही इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि हो जायेगी| मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद से मोटा-मोटी जानते तो सब ही हैं कि इस देश में अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल लोगों की संख्या 45 से 50 फीसदी और सवर्ण जाति के लोगों की संख्या 16-20 फीसदी के आस-पास है, पर जाति की आधिकारिक गणना के सार्वजनिक होने से शिक्षा और नौकरियों में संख्या के हिसाब से भागीदारी का सवाल भी पुरजोर तरीके से उठेगा| बराबरी के इसी सवाल को बड़ी पार्टियां और सरकार कभी खुल कर सामने नहीं आने देना चाहते|

जाति के आंकड़ों से मंडल और सामाजिक न्याय के पक्षधरों में भी बेचैनी हो सकती है| उन्हें डर है, सर्वेक्षण कहीं यह न दिखा दे कि जाति सामाजिक अन्याय का एक महत्वपूर्ण कारक तो है, पर एकमात्र कारक नहीं|

ओबीसी में आनेवाली जातियों के बीच शिक्षा और नौकरियों में अवसर के लिहाज से चंद जातियों के वर्चस्व की बात जाति जनगणना के आंकड़ों से आधिकारिक रूप से उजागर हो सकती है| यह भी सामने आ सकता है कि एक ही जाति के बीच वर्ग और लिंग-भेद भी अवसरों की असमानता का बहुत बड़ा कारक है| इन बातों के उजागर होने पर सामाजिक न्याय की राजनीति को पुराने र्ढे पर चलाना मुश्किल होगा|

जातिवार आंकड़े को सार्वजनिक करना जातिवाद नहीं है, यह जाति के भूत को वश में करने का तरीका है| आरक्षण पर रुक गयी बहस को सार्थक दिशा में ले जाने का यह एक जरूरी अवसर भी है, बशर्ते हम जाति के भूत से आंखें खोल कर सामना करने को तैयार हों|

(योगेन्द्र यादव – प्रभात खबर में)

जुलाई 14, 2015

आनंद स्वतः होने में है, लालसा से करने में नहीं – ओशो

osho dancing

अकबर ने एक दिन तानसेन को कहा, तुम्‍हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा ख्‍याल उठता है कि तुम जैसा गाने वाला शायद ही इस पृथ्‍वी पर कभी हुआ हो और न हो सकेगा। क्‍योंकि इससे ऊंचाई और क्‍या हो सकेगी। इसकी धारणा भी नहीं बनती। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्‍हें विदा किया था, और सोने लगा तब अचानक ख्‍याल आया। हो सकता है, तुमने भी किसी से सीखा है, तुम्‍हारा भी कोई गुरू होगा। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं। कि तुम्‍हारा कोई गुरू है? तुमने किसी से सीखा है?

      तो तानसेन ने कहा, मैं कुछ भी नहीं हूं गुरु के सामने; जिससे सीखा है। उसके चरणों की धूल भी नहीं हूं। इसलिए वह ख्‍याल मन से छोड़ दो। शिखर? भूमि पर भी नहीं हूं। लेकिन आपने मुझे ही जाना है। इसलिए आपको शिखर मालूम पड़ता हूं। ऊँट जब पहाड़ के करीब आता है, तब उसे पता चलता है, अन्यथा वह पहाड़ होता ही है।
तानसेन ने कहा कि मैं गुरु के चरणों में बैठा हूं; मैं कुछ भी नहीं हूं। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्‍यता भी हो जाए, तो समझूंगा बहुत कुछ पा लिया।
      तो अकबर ने कहा, तुम्‍हारे गुरु जीवित हों तो तत्‍क्षण, अभी और आज उन्‍हें ले आओ। मैं सुनना चाहूंगा। पर तानसेन ने कहा: यही तो कठिनाई है। जीवित वे है, लेकिन उन्‍हें लाया नहीं जा सकता हे।
      अकबर ने कहा, जो भी भेट करना हो, तैयारी है। जो भी। जो भी इच्‍छा हो, देंगे। तुम जो कहो, वहीं देंगे। तानसेन ने कहा, वही कठिनाई है, क्‍योंकि उन्‍हें कुछ लेने को राज़ी नहीं किया जा सकता। क्‍योंकि कुछ लेने का प्रश्‍न ही नहीं है।
अकबर ने कहा, कुछ लेने का प्रश्‍न नहीं है तो क्‍या उपाय किया जाए?
तानसेन ने कहा, कोई उपाय नहीं, आपको ही चलना पड़ेगा।
अकबर ने कहा,मैं अभी चलने को तैयार हूं।
तानसेन ने कहा, अभी चलने से तो कोई सार नहीं है। क्‍योंकि कहने से वह गायेंगे नहीं। ऐसा नहीं है वे गाते बजाते नहीं है। तब कोई सुन ले बात और है। तो मैं पता लगाता हूं, कि वह कब गाते-बजाते है। तब हम चलेंगे।
      पता चला—हरिदास फकीर उसके गुरू थे। यमुना के किनारे रहते थे। पता चला रात तीन बजे उठकर वह गाते है। नाचते हे। तो शायद ही दुनिया के किसी अकबर की हैसियत के सम्राट ने तीन बजे रात चोरी से किसी संगीतज्ञ को सुना हो। अकबर और तानसेन चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठ गये। पूरी रात इंतजार करेने के बाद सुबह जब बाबा हरिदास ने भगती भाव में गीत गया और मस्‍त हो कर डोलने लगे। तब अकबर की आंखों से झर-झर आंसू गीर रहे थे। वह केवल मंत्र मुग्ध हो कर सुनते रहे एक शब्‍द भी नहीं बोले।
      संगीत बंद हुआ। वापस घर जाने लगे। सुबह की लाली आसमान पर फैल रही थी। अकबर शांत मौन चलते रहे। रास्‍ते भर तानसेन से भी नहीं बोले। महल के द्वार पर जाकर तानसेन से केवल इतना कहा,”  अब तक सोचता था कि तुम जैसा कोई भी नहीं गा बजा सकता है। मेरा भ्रम आज टुट गया। अब सोचता हूं कि तुम हो कहां। लेकिन क्‍या बात है? तुम अपने गुरु जैसा क्‍यों नहीं गा सकते हो?”
      तानसेन न कहा, बात तो बहुत साफ है। मैं कुछ पाने की लिए बजाता हूं और मेरे गुरु ने कुछ पा लिया है। इसलिए बजाते गाते है। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्‍य है। जो मुझे मिले उसमें मेरे प्राण है। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो पाते। बजाते-गाते समय में सदा अधूरा रहता हूं। अंश हूं। अगर बिना गाए-बजाए भी मुझे वह मिल जाए जो गाने से मिलता है तो गाने-बजाने को फेंककर उसे पा लुंगा। गाने मेरे लिए साधन है। साध्‍य नहीं। साध्‍य कहीं और है—भविष्‍य में, धन में, यश में, प्रतिष्‍ठा में—साध्‍य कहीं और है। संगीत सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्‍मा नहीं बन सकता; साध्‍य में ही आत्‍मा का वास होता है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाए, तो साध को छोड़ दूँ अभी। लेकिन नहीं मिलता  साधन के बिना, इसलिए साधन को  खींचता हूं। लेकिन दृष्‍टि और प्राण और आकांशा ओर सब घूमता है साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे है। संगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी है जिसे पाने को वह गा-बजा रहे हे। बल्‍कि पीछे कुछ है। वह बह रहा है। जिससे उनका संगीत फूट रहा है। और बज रहा है। कुछ पा लिया है, कुछ भर गया है। वह बह रहा है। कोई अनुभूति, कोई सत्‍य, कोई परमात्‍मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है। पैमाना छलक रहा है आनंद का। उत्‍सव का।
      अकबर बार-बार पूछने लगा, किस लिए? किस लिए?
      स्‍वभावत: हम भी पूछते है। किस लिए? पर तानसेन ने कहा,नदिया किस लिए बह रही है? फूल किस लिए खिल रहे है? चाँद-सूरज किस लिए चमक रहे है? जीवन किस लिए बह रहा है?
      किस लिए मनुष्‍य की बुद्धि ने पैदा किया हे। सारा जगत ओवर फ्लोइंग है, आदमी को छोड़कर। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा है। सारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहे। खिलनें का आनंद है। सूर्य निकलता है। निकलने में आनंद है। पक्षी गीत गा रहे है। गाने में आनंद है। हवाएँ बह रही है, चाँद-तारे,आकाश गंगाए चमक रही है। चारों तरफ एक उत्सव का माहौल है। पर आदमी इसके बीच कैसा पत्थर और बेजान सा हो गया है। आनंद अभी है, यही है, स्‍वय में विराजने में है अपने होने में है। अभी और यही। अकबर ने पूछा तब हम उसे कैसे पाये। क्‍या करे जो आपके गुरु को मिला है। उनके गायन में उनके नृत्य में। कुछ अभूतपूर्व था। कुछ प्रसाद था। जो मैंने अभी तक नहीं देखा।
(गीता दर्शन,भाग-1, अध्‍याय 1-2)
जुलाई 7, 2015

सच्ची समाजसेवा

पूरी निष्ठा और लगन से पैंतीस सालों तक नौकरी करके देवेन्द्र प्रसाद ने अवकाश प्राप्त किया तो अरसे से समाज की खातिर कुछ सेवा जैसा काम करने की उनकी इच्छा फिर से हिलोरे मारने लगी| बहुत समय से वे मित्रों से कहा करते थे,” रिटायर हो जाऊं, तो अपनी सामर्थ्यानुसार छोटा मोटा कोई ऐसा समाज सेवा का काज करूँ जिससे लोगों का भला हो”|

अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ दिनों तक सोचते रहे, मित्रों ने कहा कि किसी एनजीओ से जुड़ जाएँ पर यह विचार उन्हें कभी नहीं सुहाया और वे हमेशा ही अपने ही बलबूते कुछ करना चाहते थे जहां वे दूसरों पर निर्भर न हों और न किसी संस्था का एजेंडा लागूं करने में कलपुर्जे बनें|

एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि पास जो बहुमंजिला आवासीय इमारतें बननी शुरू हुयी हैं उसमें सैंकड़ों मजदूर काम करते हैं और उनमें बहुत सारे लगभग अनपढ़ हैं और देवेन्द्र प्रसाद चाहें तो ऐसे मजदूर स्त्री पुरुषों की मदद कर सकते हैं| या तो उन्हें पढ़ने लिखने में सहायता करें, या उनके बच्चों को पढ़ाने में मदद करें या उनके बैंक, पोस्ट ऑफिस या अन्य जरूरी फ़ार्म आदि भर दिया करें|

यह सुझाव देवेन्द्र प्रसाद को जंच गया| उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो उनसे न हो पायेगा पर फ़ार्म आदि भरने में, आवेदन पत्र आदि लिखने में वे अवश्य ही अनपढ़ मजदूरों के काम आ सकते हैं और बाद में वे इस काम को सुनियोजित तरीके से चला सकता हैं और जो थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना जानते हैं ऐसे मजदूरों को यह सिखा सकते हैं ताकि वे अपने अन्य साथियों की मदद कर सकें|

मित्र ने उनका हौंसला बढ़ाया,”यह अच्छा रहेगा, विधार्थी किस्म के युवा लोग ही ऐसे काम कर दिया करते हैं बाकी लोग किसी अन्य का हवाला देकर जरुरत मंद को टाल देते हैं कि किसी और से करवा लेना, क्योंकि आज के व्यस्त जमाने में लोगों को इतनी फुर्सत कहाँ कि ठहर कर ऐसे लोगों की सहायता कर सकें| और मोबाइल युग में तो उनके पास खिसकने का अच्छा बहाना भी होता है, मोबाइल हाथ में ले वे उसमें कुछ करते हुए वहाँ से हट जाते हैं| फिर बैंक आदि के फॉर्म तो इतने टेढ़े होते हैं कि पढ़े लिखे आदमी भी दूसरों से पूछ कर फॉर्म भरते दिखाई दे जाते हैं, अनपढों की तो बात ही क्या करें|”

रात भर देवेन्द्र प्रसाद उत्साह में लगभग जाग्रत अवस्था में ही रहे और उन्हें ऐसा महसूस होता रहा जैसा किशोरावस्था में किसी मनपसंद काम को करने की सुबह से पहली रात को हुआ करता था|

अगले दिन ही वे दस बजे घर से निकल पड़े और थोड़ी देर में ही उस जगह जा पहुंचे जहां बैंक और डाकखाना अगल-बगल थे| वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वाकई बहुत से मजदूर स्त्री पुरुष वहाँ मौजूद थे|

देवेन्द्र प्रसाद उत्साहित हुए कि समाज सेवा के उनके संकल्प का आरम्भ काल बस शुरू ही होने के कगार पर है| बैंक की इमारत के बाहर उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया और उन्हें लगा कि वहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर वे अनपढ़ लोगों के फॉर्म आदि भर कर उनकी सहायता आकार सकते हैं| वहाँ पेड़ के नीचे उन्हें बहुत सारे मजदूर खड़े भी दिखाई दिए| वे उसी ओर चल दिए|

पास जाकर देखा तो पाया कि २०-२१ साल का एक लड़का जमीन पर चटाई पर बैठा राइटिंग पैड पर रखकर फॉर्म भर रहा आता और मजदूर उसके इर्द गिर्द ही खड़े थे| उन्होंने देखा कि मजदूर एक फॉर्म भरवाने के एवज में लड़के को दो रूपये दे रहे थे| देवेन्द्र प्रसाद को लगा कि लड़का मजदूरों का शोषण कर रहा है| वे तो मुफ्त में ही फॉर्म भरेंगे मजदूरों के और अन्य अनपढ़ लोगों के| होने को था| पर अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वे मजदूरों को लड़के के पास से हटाकर अपने पास बुलाएं| उन्हें लड़के पर गुस्सा भी आया उन्होंने सोचा कि लोग हर जगह दलाल बनने चले आते हैं|

वे अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे और लड़के और उसके चारों ओर मजमा अलगाए मजदूरों की भीड़ को देख रहे थे|

तभी उनकी निगाह लड़के के पास जमीन पर पड़ी दो बैसाखियों पर पड़ी| पहले तो उन्होंने सोचा कि किसी मजदूर की होगी| पर लड़के के पास कोई और व्यक्ति जमीन पर नहीं बैठा था औअर बिना बैसाखियों के, उन्हें इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता| उन्होंने गौर से देखा तो उन्होंने पाया कि जमीन पर बैठे लड़के के दोनों पैर पोलियो ग्रस्त थे|  देवेन्द्र प्रसाद की रूचि लड़के में बढ़ी और उसके प्रति अपने विचारों पर वे शर्मिन्दा भी हुए| वे चुपचाप खड़े लड़के को काम करते देखते रहे| लड़का तल्लीनता से मजदूरों से जानकारी लेकर उनके फॉर्म भर रहा था|

कोई घंटा भर बाद लड़के को फुर्सत मिली तो देवेन्द्र प्रसाद ने उससे पूछा,” तुम ये काम रोज ही करते हो या आज ही कर रहे हो|”

“जी, रोज सुबह दस से साढ़े ग्यारह बजे के बीच मैं यहाँ यह काम करता हूँ|”

और बाकी समय?

“यहाँ से अदालत जाता हूँ, वहाँ टायपिंग का काम करता हूँ| शाम को कालेज| एल.एल.बी द्वतीय वर्ष का छात्र हूँ|”

सराहना भरे स्वर में देवेन्द्र प्रसाद बोले,” बहुत मेहनत करते हो बेटा”|

एक अधूरी और फीकी सी मुस्कान के साथ लड़का बोला,” बिना मेहनत करे कैसे चलेगा| मेहनत तो करनी ही पड़ेगी|”

“तुम्हारा नाम क्या है”|

“जी पुनीत”

“माता-पिता क्या करते हैं?”

“माता पिता तो बचपन में ही गुजर गये| चाचा ने ही पाल पोसकर बड़ा किया है| उनकी स्टेशनरी की छोटी से दुकान है, बस किसी तरह गुजारा हो जाता है| इसीलिए प्रयास करता हूँ उन पर बोझ न बनूँ| रिक्शे से इधर उधर जाना पड़ता है उसका रोजाना का खर्चा निकल जाए और कुछ जरूरी दैनिक खर्च निकल जाएँ इसी नाते पढ़ाई के साथ ये काम करने पड़ते हैं|”

“बहुत बढ़िया बेटा, लगे रहो, कामयाबी तुम्हारे पास आकर रहेगी| तुम्हारी एल.एल बी की क्लासेज तो शाम को होती होंगी, दिन में कोई स्थाई काम क्यों नहीं ढूंढते?

“स्थायी वेतन वाला काम कहाँ है?”

“मोबाइल है तो अपना नंबर दो मुझे, मैं कोशिश करता हूँ| अध्यापन कर सकोगे?”

“हाँ, पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है|”

“ठीक है मैं कुछ दिनों में तुम्हे बताता हूँ| ईश्वर ने चाहा तो काम हो जायेगा| यहाँ तो तुम आते ही रहोगे|”

“जी हाँ|”

वापिस घर लौटते समय देवेन्द्र प्रसाद को कतई दुख नहीं था कि समाज सेवा के उनके पहले अवसर का आगाज भी नहीं हो पाया

जुलाई 6, 2015

विफलता : (लोकनायक जयप्रकाश नारायण)

जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।

मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को ।

तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जावे !

जयप्रकाश नारायण

(अगस्त 1975, चण्डीगढ़ जेल में)

 

जून 16, 2015

आमों का सेहरा … सागर खय्यामी

जो आम मैं है वो लब ए शीरीं मैं नहीं रस
रेशों मैं हैं जो शेख की दाढ़ी से मुक़द्दस
आते हैं नज़र आम, तो जाते हैं बदन कस
लंगड़े भी चले जाते हैं, खाने को बनारस

होटों मैं हसीनों के जो, अमरस का मज़ा है
ये फल किसी आशिक की, मोहब्बत का सिला है

आमद से दसहरी की है, मंडी में दस्हेरा
हर आम नज़र आता है, माशूक़ का चेहरा
एक रंग में हल्का है, तो एक रंग में गहरा
कह डाला क़सीदे के एवज़, आम का सेहरा

खालिक को है मक़सूद, के मख्लूक़ मज़ा ले
वो चीज़ बना दी है के बुड्ढा भी चबा ले

फल कोई ज़माने में नहीं, आम से बेहतर
करता है सना आम की, ग़ालिब सा सुखनवर
इकबाल का एक शेर, कसीदे के बराबर
छिलकों पा भिनक लेते हैं , साग़र से फटीचर

वो लोग जो आमों का मज़ा, पाए हुए हैं
बौर आने से पहले ही, वो बौराए हुए हैं

नफरत है जिसे आम से वो शख्स है बीमार
लेते है शकर आम से अक्सर लब ओ रुखसार
आमों की बनावट में है, मुज़मर तेरा दीदार
बाजू वो दसहरी से, वो केरी से लब ए यार

हैं जाम ओ सुबू खुम कहाँ आँखों से मुशाबे
आँखें तो हैं बस आम की फांकों से मुशाबे

क्या बात है आमों की हों देसी या विदेसी
सुर्खे हों सरौली हों की तुख्मी हों की कलमी
चौसे हों सफैदे हों की खजरी हों की फजरी
एक तरफ़ा क़यामत है मगर आम दसहरी

फिरदौस में गंदुम के एवज़ आम जो खाते
आदम कभी जन्नत से निकाले नहीं जाते

(सागर खय्यामी)

जून 13, 2015

बिना पैर ऊँची उड़ान

एक बच्ची जन्मती है पर और बच्चों की तरह उसके पैर नहीं हैं, उसके जैविक माता-पिता इस घबराहट में कि वे बिना पैरों की बच्ची का लालन-पालन कैसे करेंगें, बच्ची को त्याग देते हैं| शारीरिक रूप से अपंग बच्ची को एक अन्य दयालू दंपत्ति गोद लेते हैं और उसे बचपन से सिखाते हैं कि असम्भव जैसा कुछ नहीं होता और वह बच्ची इस बात को अपने आत्मविशवास, दृढ-निश्चय और कड़ी मेहनत से सच सिद्ध करके दिखाती है|

मानव जीवन में इससे प्रेरक कुछ नहीं हो सकता जहां शारीरिक कमी कतई कोई बाधा उत्पन्न न कर पाई हो मानव के सम्मुख और मानव ने हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करके शारीरिक रूप से पूर्णतया सक्षम मानवों को पीछे करके उपलब्धियां कमाई हों और वह भी ऐसे क्षेत्रों में जहां शारीरिक अंगों के सार्थक इस्तेमाल पर बात ठहरती हो|

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जून 7, 2015

‘प. नेहरु’ और ब्रिटिश राज के बाद का भारत

Nehru

[दैनिक जनसत्ता ने ब्रिटिश राज के बाद भारत के प्रति नेहरु के योगदान और उनकी छवि को धूमिल किये जाने वाले राजनीतिक षड्यंत्र पर प्रकाश डालते हुए एक अच्छा लेख (

नेहरू को नकारने के निहितार्थ)

प्रकाशित किया है]

आजादी की लड़ाई पर सुनियोजित हमला किया जा रहा है। नेहरू इस हमले का मुख्य निशाना हैं। नेहरू का नाम आते ही नेहरू परिवार की बात शुरू हो जाती है। देश की हर समस्या, हर मुसीबत का नाम नेहरू के खाते दर्ज किया जाता है। नेहरू को एक सत्ता-लोलुप की तरह पेश किया जाता है, जिन्होंने गांधी को किनारे लगा कर अंगरेजों से सत्ता हथिया ली। या फिर, गांधी की कृपा से वे गांधी के उत्तराधिकारी बने। अगर नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री न होते तो देश की सूरत अलग होती। क्योंकि वे निर्णय लेने में अक्षम थे। वे तो पटेल थे जिनकी लोहे जैसी इच्छाशक्ति ने इस देश को बचा लिया। या फिर इस देश में नेहरू की इकलौती विरासत वंशवाद की नींव रखना था। यह और इस तरह के जाने कितने आरोप एक सांस में नेहरू पर मढ़ दिए जाते हैं। दरअसल, नेहरू कौन थे यह बात आम आदमी की याददाश्त से गायब हो चुकी है। नई पीढ़ी, जिसका सबसे बड़ा स्कूल इंटरनेट है, यू-ट्यूब वाले नेहरू को जानती है। वे नेहरू जो तथाकथित रूप से आला दर्जे के शौकीन आदमी थे।

नेहरू के दुश्मन एक नहीं, अनेक हैं। सांप्रदायिक एजेंडे में वे गांधी की तरह एक रोड़ा हैं। साम्राज्यवादियों और नव-साम्राज्यवादियों के लिए आजादी की पूरी लड़ाई एक झूठ और दिखावा थी, जो कि ब्रिटिश राज की भलाई देखने के बजाय उसकी जड़ खोदने का काम करती थी। सबाल्टर्न इतिहासकारों के हिसाब से नेहरू उस जमात के नेता थे जो अभिजात थी, जिसका नीचे से यानी जनता के भले से कोई लेना-देना नहीं था। रूढ़ मार्क्सवादी इतिहास-लेखन नेहरू को उस बूर्जुवा नेतृत्व का प्रतिनिधि मानता रहा जिसने समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद क्रांति की ऐतिहासिक संभावनाओं को कमजोर किया।

गांधी की हत्या के बाद गांधीवादियों ने नेहरू से यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि वे भी गांधी के अंतिम दिनों की तरह सत्ता से दूर रहेंगे। वे उस गांधी को भूल गए जो अपने हृदय के हर कोने से खांटी राजनीतिक थे। समाजवादियों की जमात ने कभी नेहरू के नेतृत्व में ही समाजवाद का ककहरा सीखा था। आजादी के बाद वही समाजवादी नेहरू की जड़ें खोदने पर आमादा हो गए। पटेल 1950 में स्वर्ग सिधार गए। गांधी की पहले ही 1948 में हत्या हो चुकी थी। बाकी बचे मौलाना आजाद, जो नेहरू के मुश्किल दिनों के साथी थे।

यानी आजादी के पहले और आजादी के बाद दो अलग दौर थे। पहले दौर में गांधी के व्यापक नेतृत्व में एक भरी-पूरी कांग्रेस थी, जिसमें नेहरू गांधी के बाद बिना शक नंबर दो थे। लेकिन आजादी के बाद और गांधी की हत्या के बाद सिर्फ नेहरू थे। आजादी और विभाजन के द्वैध को भुगत कर निकला देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा था। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शोषण ने देश को अंदर तक खोखला कर दिया था। इस एक तथ्य से ही हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है- 1947 में भारत में औसत आयु मात्र बत्तीस वर्ष थी।

ऐसे कठिन दौर में नेहरू ने मोर्चा संभाला। उन्होंने दिन-रात काम किया। अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सिर्फ चार-चार घंटे सोकर बिताया। जिन्हें नेहरू की मेहनत का अंदाजा लगाना हो वे गजानन माधव मुक्तिबोध का निबंध ‘दून घाटी में नेहरू’ पढ़ लें। किसी को आजादी के पहले के नेहरू से एतराज नहीं है। सबकी दिक्कत आजादी के बाद के नेहरू से है। इसलिए यहां बात सिर्फ इसी नेहरू की होनी है। उस नेहरू की, जिस पर आजादी की लड़ाई की समूची विरासत को आजाद भारत में अकेले आगे बढ़ाना था। जिसके हिस्से ‘सत्ता’ का ‘अमृत’ आया था; औपनिवेशिक शोषण और सांप्रदायिकता से टूटे-बिखरे मुल्क में ‘विष’ भी इसी नेहरू के हिस्से आया।

सबसे पहली बात रियासतों के एकीकरण की। इस काम में सरदार पटेल और वीपी मेनन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। लेकिन भारत का एकीकरण आजादी की लड़ाई का मूल विचार था। जिस देश को पिछले सौ सालों में जोड़ा-बटोरा गया था, उसे सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों में टूटने नहीं देना था। यह काम आजाद भारत की सरकार के जिम्मे आया, जिसे पटेल ने गृहमंत्री होने के नाते बखूबी अंजाम दिया। लेकिन भारत को सैकड़ों हिस्सों में तोड़ने वाला मसविदा ब्रिटेन भेजने के पहले माउंटबेटन ने नेहरू को दिखाया। माउंटबेटन के हिसाब से ब्रिटेन को क्राउन की सर्वोच्चता वापस ले लेनी चाहिए। यानी जितने भी राज्यों को समय-समय पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता स्वीकारनी पड़ी थी, इस व्यवस्था से सब स्वतंत्र हो जाते।

नेहरू यह मसविदा देखने के बाद पूरी रात सो नहीं सके। उन्होंने माउंटबेटन के नाम एक सख्त चिट्ठी लिखी। तड़के वे उनसे मिलने पहुंच गए। नेहरू की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे मजबूरन माउंटबेटन को नया मसविदा बनाना पड़ा, जिसे तीन जून योजना के नाम से जाना जाता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दो राज्य इकाइयों की व्यवस्था दी गई। ध्यान रहे पटेल जिस सरकार में गृहमंत्री थे, नेहरू उसके प्रधानमंत्री थे। इस तरह, यह निश्चित रूप से पटेल का नहीं, पटेल और नेहरू का मिलाजुला काम था।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की चुनौती थी। देश सांप्रदायिक वहशीपन के सबसे बुरे दौर से गुजर चुका था। लोगों ने गांधी के जिंदा रहते उनकी बात अनसुनी कर दी थी। जिन्ना ने अपना दार-उल-इस्लाम बना लिया था; मुसलमानों का ‘अपना’ मुल्क पाकिस्तान वजूद में आ गया था। भीषण रक्तपात, विस्थापन के साथ हिंदू और सिख शरणार्थियों के जगह-जगह पहुंचने के साथ ही ‘हिंदू’ सांप्रदायिक दबाव बहुत जबर्दस्त हो गया था। हिंदुस्तान का पहला आम चुनाव सामने था। यह ऐसा चुनाव था जो सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के मुद््दे पर लड़ा जा रहा था। नेहरू ने ‘जन भावनाओं’ की मुंहदेखी नहीं की। उन्होंने वह कहा जो बहुतों के लिए अलोकप्रिय था। उनमें अलोकप्रिय होने का साहस था।

उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के हक में आवाज बुलंद की और जनता को अंधेरे समय में रोशनी दिखाई। जनता ने अपने नेता को खुद से ज्यादा समझदार माना। इस चुनाव में नेहरू ने तकरीबन पूरा देश नाप लिया। तकरीबन चालीस हजार किलोमीटर का सफर तय किया। हर दस में एक भारतीय को सीधा संबोधित किया। यह वक्त हिंदू सांप्रदायिकता के उभार के लिए सबसे मुफीद था। लेकिन इसी समय इसे मुंह की खानी पड़ी। यह चुनाव एक तरह से धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जनमत संग्रह सिद्ध हुया। नेहरू पर एक और बड़ा जिम्मा था। आजादी की लड़ाई के दौरान बोए गए लोकतांत्रिक पौधे की जड़ें मजबूत करने का। नेहरू की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की एक रोचक कहानी है। नेहरू हर तरफ अपनी जय-जयकार सुन कर ऊब चुके थे। उनको लगता था कि बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं।

नवंबर 1957 में नेहरू ने मॉडर्न टाइम्स में अपने ही खिलाफ एक जबर्दस्त लेख लिखा। चाणक्य के नाम से ‘द प्रेसिडेंट’ नाम के इस लेख में उन्होंने पाठकों को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेताया। उन्होंने कहा कि नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वे सीजर हो जाएं।

मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर अपने कार्टूनों में नेहरू की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। नेहरू ने उनसे अपील की कि उन्हें बख्शा न जाए। फिर शंकर ने नेहरू पर जो कार्टून बनाए उनका संग्रह इसी नाम से प्रकाशित हुया- ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लंबे समय तक प्रतिबंध को नेहरू ने ठीक नहीं माना। उनका मानना था कि आजाद भारत में इन तरीकों का प्रयोग जितना कम किया जाए, उतना अच्छा। नेहरू को इस बात की बड़ी फिक्र रहती थी कि लोहिया जीत कर संसद में जरूर पहुंचें, जो हर मौके पर नेहरू पर जबर्दस्त हमला बोलते थे।

उनकी आर्थिक योजना, जिसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं, ने देश को एक मजबूत आधार दिया। जिस वक्त भारत आजाद हुया, उसे नब्बे प्रतिशत मशीनरी बाहर से आयात करनी होती थी। जर्मनी को छोड़ कर हर जगह से तकनीक का आयात किया गया। महालनोबिस योजना का मुख्य उद््देश्य भारी उद्योगों को बढ़ावा देना था। ठहरी हुई खेती के साथ खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल करना एक बड़ा सवाल था। नेहरू ने लोकतांत्रिक दायरों में रह कर भूमि सुधार किए। डेढ़ सौ साल पुरानी जमींदारी व्यवस्था को खत्म करना कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी।

गरीबों को ऊपर उठाने के लिए नेहरू और उनके योजनाकारों ने सामुदायिक व्यवस्था का सहारा लिया। नेहरू ने गांवों में ग्राम-सेवकों की पूरी फौज भेज दी। नेहरू उद्योग और कृषि में कोई फर्क नहीं करते थे। उनके मुताबिक दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई चीजें थीं। उनको विकास का महत्त्व पता था। वे मानते थे कि गरीबी का बंटवारा नहीं किया जा सकता, सबमें बांटने के लिए उत्पादन जरूरी है। लेकिन उसके लिए वे खेती से समझौता नहीं करते थे।

उन्होंने देश में हरित क्रांति की परिस्थितियां तैयार कीं। देश के पंद्रह जिलों में एक पाइलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। उनकी मृत्यु के बाद शास्त्रीजी ने हरित क्रांति को साकार कर दिया। डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पहले इक्कीस सालों में किया गया, उतना दो सौ साल किए गए काम के बराबर है। दुनिया के लगभग सारे अर्थशास्त्री- जिन्होंने नेहरू की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया- नेहरू की रणनीति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

नेहरू के विजन में गरीब लोकतंत्र की कसौटी था। उन्होंने तय किया कि गरीबों के हित परिदृश्य से बाहर नहीं फेंके जा सकते। उन्होंने गरीबों के प्रति पक्षधरता का वह बुनियादी सोच पैदा किया कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दबाव के बाजवूद गरीब किसान-मजदूर अब भी बहस का सामान्य मुद्दा बने हुए हैं। नेहरू मानते थे, ‘लोकतंत्र समाजवाद के बिना अधूरा है और समाजवाद लोकतंत्र के बिना’।

बात नेहरू के महिमामंडन की नहीं है। नेहरू की विफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं। लेकिन हर नेता अपने समय के संदर्भ में निर्णय लेता है, नीति बनाता है। जो कमियां-कमजोरियां आज हमें दिखाई दे रही हैं, वे नेहरू को नहीं दिख रही थीं। क्योंकि नेहरू अपने युग में बैठ पर दुनिया देख रहे थे। उस पर से तमाम भयानक चुनौतियों के बीच।
हमारे बीच एक बड़ा दंगा, एक बड़ी आपदा, सब-कुछ उथल-पुथल कर देती है। नेहरू ऐसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह लड़ रहे थे, जहां विफलता ही नियति थी। एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था- हमने अपनी विफलताओं से ही सही, देश की सेवा तो की।

मोहित सेन ने लिखा है कि तिब्बत सीमा विवाद के वक्त चीन ने नेहरू का कद छोटा करने के लिए उनका चरित्र हनन करना शुरू किया था। चीनी नेतृत्व (इसमें माओ शामिल नहीं थे) का मानना था कि नेहरू से टकराने के लिए, नेहरू का कद घटाना जरूरी है। यही बात सांप्रदायिक दलों पर लागू होती है। क्योंकि नेहरू उनके लिए खतरनाक हैं।

(सौरभ वाजपेयी)  – जनसत्ता 6 जून 2015
मई 7, 2015

तुम्हारे लिए (हिमांशु जोशी) : दुखद प्रेमकथा से लुभाता उपन्यास

tumhare liyeधर्मवीर भारती का उपन्यास – गुनाहों का देवता और हिमांशु जोशी का उपन्यास – तुम्हारे लिए, शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास – देवदास की भांति भावुकता की चाशनी में पगे हुए उपन्यास हैं, जिन्हें भारतीय साहित्य के लेखक और समीक्षक महान साहित्य की श्रेणी में कतई रखने को राजी नहीं होंगे पर ये ऐसे उपन्यास हैं हैं जो अपने रचे जाने के साल से लेकर वर्तमान तक पाठकों को निरंतर लुभाते रहे हैं| और ऐसा नहीं कि किशोर वय में जब पाठक साहित्य में गोते लगाना शुरू ही करता है तभी इन उपन्यासों ने उसे लुभाया हो, बलि साहित्य की सैंकडो किताबें पढ़ चुकने के बाद (अति) भावुकता के आरोपों से घिरे इन उपन्यासों को लोग पढते हैं और इनसे जुड़ाव महसूस करते हैं| भीड़ में इन उपन्यासों को भले ही हल्का कह कर नकार दे साहित्यरसिक परन्तु एकांत में इन उपन्यासों का आनंद वह हमेशा ही लेता रहता है| इनसे पूरी तरह छुटकारा कभी नहीं हो पाता|

जैसे जैसे साहित्य की समझ बढ़ती जाती है, इन उपन्यासों को पढते समय बहुत सारी कमियां स्पष्ट नज़र आती हैं पर तब भी ये उपन्यास ध्यान खींचते हैं| ये उपन्यास गुलशन नंदा और अन्य लेखकों दवारा लिखे जाने वाले कोरी भावुकता के बुनियाद पर रचे जाने वाले सामाजिक उपन्यास नहीं हैं बल्कि ये अच्छे साहित्य के किले में पाठक को प्रवेश दिलवाने वाले द्वार हैं जिनसे नये और पुराने और अनुभवी पाठक साहित्य में प्रवेश करते ही रहते हैं|

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ऐसा मानना बिल्कुल ही निपट कल्पना नहीं हैं कि शरत चंद्र के उपन्यास देवदास की छाया ने कहीं न कहीं “गुनाहों का देवता” और “तुम्हारे लिए” की रचना प्रक्रिया को प्रभावित किया है|

उत्तराखंड के कुमाऊं के नैनीताल की पृष्ठभूमि में  मनोहर श्याम जोशी के महान उपन्यास “कसप” की भांति “तुम्हारे लिए” का कैनवास विशाल नहीं है बल्कि उसकी तुलना में यह हर लिहाज से एक लघु उपन्यास है| जहां “कसप” कथा और चरित्र चित्रण और मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करके पाठक को सम्मोहित करके उसे एक परिपूर्ण प्रेमकथा पढ़ने की अनुभूति देता है और दुखद अंत पाठक को अरसे तक हिलाए रखता है, “तुम्हारे लिए”  कथा और चरित्र चित्रण के स्तर पर जितना बताता या दर्शाता नहीं उससे ज्यादा छोडता चलता है पर फिर भी दुख और एक दुखद प्रेमकथा को भांजता यह उपन्यास आकर्षित करता है| उपन्यास की इस बनावट से एक बात का अनुमान लगता है कि जब हिमांशु जोशी ने इसे रचा तब उनके सामने एक महान प्रेमकथा रचने का उद्देश्य नहीं रहा होगा पर लिखते लिखते कुछ ऐसा रचा गया जो अपनी तमाम कमियों के बावजूद पाठकों को लुभाता चला आ रहा है|

चरित्र चित्रण के स्तर पर देखें तो उपन्यास का नायक विराग है, जिसकी जातिगत पहचान के बारे में उसके सहपाठी और मित्र सुहास (जिसे देवदास के चुन्नी बाबू से प्रेरित चरित्र माना जा सकता है) दवारा उसे “विराग शर्मा” पुकारने पर पता चलता है| कुमाऊं के दूर दराज के गाँव में “शर्मा” उपनाम धारण करने वाले और पूरोहिताई करके जीवनयापन करने वाला परिवार पाया जाता होगा या नहीं इस पर सोचा जा सकता है और तर्क किये जा सकते हैं|

उपन्यास की नायिका – अनुमेहा, ड़ा दत्ता की भतीजी है| अब ड़ा. दत्ता और उस नाते अनुमेहा बंगाली है या पंजाबी, इस बात को स्पष्ट रूप से उपन्यास नहीं स्थापित करता, हाँ ड़ा. दत्ता की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी के अपने माता-पिता के पास चंडीगढ़ चले जाने की बात सुहास विराग को बताता है तो उससे अनुमान भर लगाया जा सकता है कि अनुमेहा एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है| नायिका का नाम आकर्षक है और इस बात में अतिशयोक्ति नहीं कि पिछली सदी के अस्सी और नब्बे के दशकों में इस उपन्यास को पढ़ने वाले बहुसंख्यक पाठकों ने पहली ही बार इस नाम को जाना होगा| दुखद प्रेमकथा की नायिका का नाम होने के बावजूद नाम में इतना आकर्षण है कि इस उपन्यास को पढकर बहुतों ने अपनी बेटियों के नाम इस नाम पर रखे हों ऐसा भी हुआ होगा क्योंकि पच्चीस- तीस साल से छोटी युवतियों के नाम तो अनुमेहा देखने सुनने को मिल जाते हैं पर चालीस पचास साल की नारी का अनुमेहा नाम बिरला ही सुनने में आया होगा|

गरीबी से त्रस्त विराग, जो बड़ी मुश्किल से नैनीताल में रहकर अध्ययन कर पा रहा है, अपने सहपाठी सुहास की मदद के कारण अनुमेहा को ट्यूशन देने का काम पा जाता है जिसके एवज में उसे २० रूपये प्रति माह मिलने हैं जिससे उसकी आर्थिक परेशानियां बहुत हद तक दूर हो सकती हैं|

अनुमेहा के ड़ा. पिता का देहांत हो चुका है और वह अपने चाचा (जिन्हें वह उपन्यास के काल में भी अंकल ही कहती है) के घर रह कर पढ़ रही है| उसके अपने दुख हैं और गुरु विराग और शिष्या अनुमेहा के दुख कब एक दूसरे का संबल बन जाते हैं, उपन्यास उन घटनाओं का ब्योरा नहीं देता बस शुरू के पृष्ठों में ही सांकेतिक रूप से बताया जाता है कि दोनों की भावनाएं हैं एक दूसरे के प्रति, पर जहां अनुमेहा मुखर है इस बात को स्पष्ट करने में कि उसे विराग की चिंता है, विराग इस बात को मुखरित नहीं गोने देना चाहता| शायद उसकी गरीबी और उसके परिवार की कठिनाइयां उसे प्रेम नामक अनुभव को लेने से रोकती हैं और वह इस बात से ही ग्लानि से भर जाता है कि उसके पिता पेट काट काट कर उसे नैनीताल में रख कर पढ़ा रहे हैं और वह यहाँ प्रेम में फंसा हुआ है| यही एक बात संभव लगती है विराग दवारा अनुमेहा के प्रेम को स्वीकार न कर पाने के पीछे|

विराग-अनुमेहा के प्रेम, जो विराग की मुखर स्वीकृति न मिल पाने के कारण एक निश्चित आकार ग्रहण नहीं कर पाता, और इस लिहाज से अनगढ़ रह कर प्रेमकथा को भी अनगढ़ और बहुत हद तक हवाई ही रहने देते हैं, विराग के गाँव में अपने पिता और भाई के साथ के दृश्य उपन्यास को ठोस धरातल देते हैं और वास्तविकता के करीब लेकर जाते हैं और साहित्य के घेरे में उपन्यास का प्रवेश कराते हैं| एक गरीब ब्राह्मण, जिसने अपने खेत-खलिहान और घर तक इस आशा में गिरवी रखकर बड़े पुत्र की पढ़ाई के ऊपर न्योछावर कर दिए हैं कि पुत्र पढ़ लिखकर कुछ बड़ा काम करेगा, अपनी हर निराशा, सीमितता, कठिनाई, और अपने दुख को शास्त्रों में उपलब्ध श्लोकों और ज्ञान के भरोसे सहन कर लेता है, पर इस किताबी ज्ञान से नैनीताल रहकर आधुनिक जीवन शैली के संपर्क में आ चुके ज्येष्ठ पुत्र को सहारा नहीं मिल सकता| विराग नैनीताल में पिता की परिपाटी से काम नहीं चला  सकता पर संस्कारों के कारण वह आदर्शवाद को छोड़ भी नहीं पाता|

उसकी गरीबी, उसके आदर्शवाद, और उसके संस्कार जब वास्तविक जीवन के कुछ पहलुओं से टकराते हैं तो वह अजीब दुविधा में घिर जाता है| अनुमेहा का प्रेम उसके लिए ऐसा बन गया है जिसे अनुमेहा के सामने वह स्वीकार भी नहीं कर पाता और अपने एकांत में अपने ह्रदय में अनुमेहा के प्रति प्रेम को नकार भी नहीं पाता| प्रेम को प्रदर्शित और स्वीकार न कर पाने की कमी के कारण उसका व्यक्तित्व विकसित हो ही नहीं पाता, और वह कुंठित हो उठता है| अंदर कहीं गहरे में उसे यह आशा हो सकती है कि भले ही वह अनुमेहा से प्रेम को सच रूप में नहीं स्वीकारता पर अनुमेहा उसके लिए ही इंतजार करेगी| वह अनुमेहा से बचता भी है और उससे बंध कर भी रहना चाहता है| सुहास के साथ अनुमेहा को घूमते देख उसकी कुंठा मुखरित हो उठती है और उसे अपने जीवन की विवशताएं विशालकाय लगने लगती हैं| देवदास के अनिर्णय या एक गलत निर्णय लेने की मानसिकता ने उसके जीवन को पछतावे से भरकर गलत मार्ग पर डाल दिया था, और ऐसा ही विराग के साथ भी होता है|

कुछ अरसे के अंतराल के बाद मिलने पर सुहास, विराग को ज्ञान देता है,” मुझे लगता है जीवन में न तो अतिसंयम आवश्यक है, न अतिअसंयम| बुद्ध का संतुलित सम्यक सिद्धांत ही मुझे हर समस्या का एकमात्र समाधान नजर आता है – न विरक्ति, न आसक्ति| यानि…”

पहले भी जब सुहास का साहित्य आदि पढ़ने से कोई नाता न था और वह नितांत शरीर ही था, तब भी विराग अतिसंयम का पालन करता था और बाद में भी बहुत अरसे तक करता रहा|

विराग के स्मृतियों के सहारे फ्लैशबैक में चलता उपन्यास पाठक को गहराई में एक और डूबकी तब लगवाता है, जब बहुत साल बाद विराग और अनुमेहा मिलते हैं और भावनाओं का समुद्र अनुमेहा और विराग को ही नहीं बांधता बल्कि पाठक को भी पुस्तक से बांध लेता है|

चूँकि कोई कहानी या उपन्यास उसमें उपस्थित चरित्रों की कहानी होती है पर कई मर्तबा ऐसी कथाएं सामने आ जाती हैं जिनके चरित्रों के व्यवहार को देखकर पाठक के मन में प्रश्न उठते हैं कि ये चरित्र ऐसा क्यों नहीं कर रहे या कह रहे, क्योब्की यही सही होगा| परन्तु चरित्र अपनी ही तरह के होते हैं, उनका अपना स्वभाव होता है आखिर तभी वे एक कहानी को प्रस्तुत कर पाते हैं| उपन्यास में कई बार ऐसे भाव उठते हैं कि विराग और अनुमेहा ऐसा क्यों नहीं कर लेते जिससे उनके जीवन आसान हो जाएँ| पहले उनमें सुलझेपन का नितांत अभाव दिखाई देता है और पाठक को स्पष्ट दिखाई देता है कि सुलझे दिमाग की अनुपस्थिति उनके जीवन में दुख के मूल कारणों में से एक है|

और जब दोनों जीवन में उस स्थिति में पहुंचकर मिलते हैं जहां उनके मिलन में कोई परेशानी नहीं है और बीते सालों तक जो विराग इस रिश्ते को ठोस आकार देने में नाकाम रहा है, वही प्रस्ताव रखता है,” मान लो, जिससे तुम शादी करना चाहती थीं, वह अब भी तुमसे शादी करना चाहे …|”

तो अनुमेहा इंकार कर देती है,” नहीं नहीं, , मैं स्वयं अब उससे शादी नहीं कर सकती| मैं उसके योग्य नहीं रही…|”

जब पाठक को लगने लगता है कि नितांत अकेले रहे रहे अनुमेहा और विराग जीवन के इस पड़ाव में मिलने पर एक दूसरे को अपने प्रेम का सहारा दे सकते हैं और पाठक को एक आशा घेर लेती है कि अंततः दुख से भरी इस प्रेमकथा में कुछ सुखद अंश भी समा सकते हैं, उपन्यास ऐसी सारी आशाओं को सिरे से समाप्त करके न केवल दोनों चरित्रों को बल्कि पाठकों भी उनके दुख में डुबो देता है|

अनुमेहा से विदा लेते समय कुछ याद करके विराग पूछता है,” अब कब आऊँ?”

रोकर अनुमेहा कहती है,” नहीं – नहीं| अब मत आना| कभी नहीं – कभी भी नहीं| नहीं तो मेरे लिए जीना और भी अधिक दूभर हो जायेगा| समझ लेना अनुमेहा मर गई|”

समय के साथ विराग वास्तविकता के नजदीक आ गया है पर अनुमेहा आद्रश्वाद के ज्यादा नजदीक पौंच गई है| कहते हैं प्रेम दोनों प्रेमियों को बदलता है और अगर उनमें दूरी आ जाये तो प्रेमी प्रेमिका की सोच की भांति बनता जाता है और प्रेमिका प्रेमी के विचारों की भांति सांचे में ढलने लगती है| वैसे भी यह सच है कि किसी भी रिश्ते में दोनों लोग अपने साथी के साथ कम और अपने मन में साथी की मूरत के साथ ज्यादा रहते हैं| अनुमेहा के मन में विराग की एक आदर्शवादी मूरत बसी हुयी है और उससे इतर किसी और खंडित मूरत के साथ रहने को वह राजी नहीं|

सालों के अंतराल के बाद अनुमेहा पुनः विराग के जीवन में आती है, और कुछ घंटों की मुलाक़ात में बीमार अनुमेहा जब विराग को सुहास के दिवंगत हो जाने और मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति दान कर जाने के बारे में बताती है तो विराग के साथ पाठक भी स्तब्ध रह जाता है| एक बिगडैल सुहास पर विराग के आदर्शवाद और अनुमेहा के प्रति प्रेम का बहुत असर रहा और दोनों के साथ और असर ने उसका जीवन संवार दिया|

इस बार अनुमेहा विराग से विदा लेने आई है तो इस जीवन में अंतिम बार विदा लेने के लिए और सुहास और अपने से जुड़े कुछ कागजात देने|

चलते समय अगली सुबह पालम एयरपोर्ट आने का वचन लेकर अनुमेहा विराग को ढांढस बंधाते हुए कहती है,”सुनो, दुखी न होना| पता नहीं, हमारा यह किस जन्म का कैसा बैर था, जो…जो…|”

और अनुमेहा फूट-फूटकर रोने लगती है, पाठक को भ्रमित छोड़कर कि क्यों दोनों चरित्र इतने दुख को पाले रहते हैं जबकि थोड़ा सा प्रंबधन उनके जीवन को सामान्य ढर्रे पर ला सकता था|

पर यही इस उपन्यास की विशेषता है| विराग-अनुमेहा के सहारे दुख का प्रदर्शन ही उपन्यास को बार बार पढ़ने की ओर आकर्षित करता है और पाठक सालों के अंतराल के बाद इस उपन्यास को फिर से उठा लेते हैं|

दुख को ऐसे भांजा गया है कि पाठक दोराहे पर खड़ा रहता है, कि इस दुख से सीधा मुकाबला अच्छा या इससे दूर जाने में ही भलाई है|

विराग ने ऐसे दोराहों पर हमेशा अनुमेहा से दूर जाने का रास्ता चुना और बाद में अनुमेहा ने भी यही राह चुनी|

पालम पर भी विराग के पहुँचने से पहले ही अनुमेहा का विमान टेक-ऑफ कर जाता है और बीती रात की मुलाक़ात उनके जीवन की अंतिम मुलाक़ात बन जाती है| विराग-अनुमेहा के मध्य फिर से अधूरापन रह जाता है|

उपन्यास का अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता बाकि बिरले ऐसे पाठक होंगे जो अंतिम पृष्ठ को पढकर उत्पन्न हुए दुख में डूबकर पुस्तक के पहले अध्याय पर पुनः लौट कर न आए होंगे, बहुत सी बातें छोड़ छोड़ कर पाठक को कहानी सुनाती पुस्तक को पूरा ग्रहण करने के लिए|

ऐसा ही वर्तुल इस कहानी के साथ बना रहता है| यह पुनः पुनः लौट कर आती है जीवन में|

…[राकेश]

अप्रैल 23, 2015

अरविन्द केजरीवाल के नाम खुला पत्र : (योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण का पार्टी से निष्काषन)

श्री अरविन्द केजरीवाल, संयोजक (आम आदमी पार्टी) के नाम खुला पत् र:

आम आदमी पार्टी की अनुशासन समिति द्वारा चार प्रमुख सदस्यों प्रशांत, योगेन्द्र, आनन्द कुमारअजित झा को पार्टी से निष्कासित किये जाने के फैसले की हम {परमजीतसिंह (सचिव) व राजीव गोदारा (मुख्य प्रवक्ता) आम आदमी पार्टी}, घोर निंदा करते हैं व इस फैसले को आप के मूल सिद्धांत स्वराज के खिलाफ मानते हैं |

जिस अनुशासन समिति का गठन 29 मार्च को किया गया उसी समिति ने प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, आनन्द कुमारअजीत झा को कारण बताओ नोटिस जारी कर 48 घंटे मेंजवाब मांगा | प्रशांत, योगेन्द्र व आनन्द कुमार ने विस्तृत जवाब दिए जबकि अजीत झा ने नोटिस भेजने वालीअनुशासन समिति को असैंवधानिक करार देते हुए जवाब नहीं दिया |

प्रशांत व योगेन्द्र ने कारण बताओ नोटिस के अपने जवाब में समिति के दो सदस्यों पंकज गुप्ताआशीष खेतान से निवेदन किया था कि वे दोनों लोग पहले ही प्रशांत व योगेन्द्र के खिलाफ सार्वजनिक रूप से ब्यान देकर उन्हें पार्टी विरोधी करार दे चुके हैं, इस लिए इन दोनों को फैसला करने की प्रक्रिया से हट जाना चाहिए | कारण बताओ नोटिस में वही आरोप लगाए गए हैं जिन पर पंकज गुप्ताआशीष खेतान पहले ही फैसला दे चुके हैं |

जवाब दिए जाने के कुछ ही घंटों बाद “अनुशासनसमिति” ने रात को ही इन चारों नेताओं को पार्टी से निकालेजाने का फैसला ले लिया व इन नेताओं को भेजने से पहले ही मिडिया को भेज दिया गया | हमें उम्मीद थी पार्टी कि अनुशासन समिति अपने फैसले की प्रति को भी सार्वजानिक करेगी, जबकि फैसला व आरोप सार्वजानिक किये गए हैं | हमें आशा थी कि उस फैसले में निष्काषित किये गए नेताओं के जवाब पर विचार कर उसे संतोषजनक ना माने जाने के कारण बताये जायेंगें व साथ साबित हुए आरोपों बारे भी स्पष्टता होगी | मगर लम्बी इन्तजार के बाद भी फैसले की जानकारी नहीं मिल पाई है | यह भी नहीं कहा बताया गया कि कौन से आरोप साबित हुए |

हम निम्न कारणों के चलते इस फैसले का विरोध करतें है:

1) फैसले के सार्वजानिक नहीं होने से व निष्काषित लोगों को नहीं मिलने से यह साफ़ हो जाता है कि इन लोगों के जवाब को जांचा ही नहीं गया |

2) समिति के दो सदस्यों पंकज गुप्ता व आशीष खेतान दोनों ने प्रशांत व योगेन्द्र के खिलाफ न सिर्फ आरोप लगाए बल्कि नोटिस से पहले ही उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियाँ करने का दोषी करार दिया था | उन्हीं दो लोगों को जाँच समिति में रखा गया | पूर्वाग्रह के चलते इन्हें फैसले की प्रक्रिया से हट जाने के निवेदन के बाद भी स्वीकार नहीं किया गया | ना ही कोई कारण बताया गया कि ये दोनो लोग फैसले की प्रक्रिया से अलग क्यों नहीं हुए |

3) प्रशांत, योगेन्द्र व आनन्द कुमार के जवाब में दिए गए तथ्यों व जवाब की समीक्षा नहीं की गई |

4) प्रशांत जी के जवाब के साथ उनकी अध्यक्षता वाली अनुशासन समिति (जिसमें पंकज गुप्ता भी सदस्य थे) की कार्यवाही की मिनट्स भी भेजे गए | उससे जाहिर होता है कि जिन लोगों के खिलाफ अनुशासनहीनता की कार्यवाही चल रही थी उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाया गया था, मगर इन चार वरिष्ठ साथियों को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए नहीं बुलाया गया |

हम मानते हैं कि ऊपर दिए गए तथ्य चार नेताओं के निष्कासन की निंदा करने के लिए पर्याप्त कारण हैं | इस फैसले से न्याय के हर सिद्धांत को तिलांजली दी गई है | यह फैसला साफ़ करता है कि स्वराज व आंतरिक लोकतंत्र की आवाज उठाने वालों को इसी तरह से पार्टी से बाहर किया जाएगा |

मगर हम स्वराज व आन्तरिक लोकतंत्र के लिए स्वयं की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए “अनुशासन समिति” द्वारा प्रशांत, योगेन्द्र, आनन्द कुमार व अजीत झा को पार्टी से बहार किये जाने के फैसले की कड़ी निंदा करते हैं, साथ ही आगाह करना चाहते हैं कि पार्टी अपने स्वराज के रास्ते से भटक रही है | यदि समय रहते पार्टी का राष्ट्रिय नेतृत्व नहीं चेता तो जनता उसके अहंकार का जवाब देगी |

हम अंत में कहना कहते हैं कि प्रशांत भूषण ने जो मुद्दे अपने जवाब में उठाये हैं, उन की तुरंत जाँच करवाई जाये | साथ ही हमारी मांग है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान जिन दो उम्मीदवारों की टिकट लोकपाल के कहे पर बदली गई थी, उन टिकटों को दिए जाने की सिफारिस करने वालों के नाम सार्वजानिक किये जाएँ व उनके खिलाफ कार्रवाई की जाये | हम मांग करते हैं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य नवीन जयहिंद के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों व आर्थिक अनियमितताओं सम्बन्धी मामले में लंबित जाँच, जिसमें हरियाणा के संयोजक से डिटेल रिपोर्ट भेजी जा चुकी है (प्रशांत जी के जवाब के साथ 16/10/2014 को हुई अनुशासन समिति की बैठक के फैसले का सलंगन दस्तावेज यह बताता हैं) को लोकपाल समिति के पास तुरंत भेजा जाए | साथ ही राजेश गर्ग (पूर्व विधायक) द्वारा जेटली के नाम से फोन करवाने के आरोपों के मामले की जाँच जल्द पूरी करने के लिए दिल्ली पुलिस को आग्रह किया जाये |

परमजीत सिंह (8950213717 ) राजीव गोदारा (9417150798)

सचिव मुख्य प्रवक्ता

आम आदमी पार्टी, हरियाणा आम आदमी पार्टी, हरियाणा

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