मई 7, 2015

तुम्हारे लिए (हिमांशु जोशी) : दुखद प्रेमकथा से लुभाता उपन्यास

tumhare liyeधर्मवीर भारती का उपन्यास – गुनाहों का देवता और हिमांशु जोशी का उपन्यास – तुम्हारे लिए, शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास – देवदास की भांति भावुकता की चाशनी में पगे हुए उपन्यास हैं, जिन्हें भारतीय साहित्य के लेखक और समीक्षक महान साहित्य की श्रेणी में कतई रखने को राजी नहीं होंगे पर ये ऐसे उपन्यास हैं हैं जो अपने रचे जाने के साल से लेकर वर्तमान तक पाठकों को निरंतर लुभाते रहे हैं| और ऐसा नहीं कि किशोर वय में जब पाठक साहित्य में गोते लगाना शुरू ही करता है तभी इन उपन्यासों ने उसे लुभाया हो, बलि साहित्य की सैंकडो किताबें पढ़ चुकने के बाद (अति) भावुकता के आरोपों से घिरे इन उपन्यासों को लोग पढते हैं और इनसे जुड़ाव महसूस करते हैं| भीड़ में इन उपन्यासों को भले ही हल्का कह कर नकार दे साहित्यरसिक परन्तु एकांत में इन उपन्यासों का आनंद वह हमेशा ही लेता रहता है| इनसे पूरी तरह छुटकारा कभी नहीं हो पाता|

जैसे जैसे साहित्य की समझ बढ़ती जाती है, इन उपन्यासों को पढते समय बहुत सारी कमियां स्पष्ट नज़र आती हैं पर तब भी ये उपन्यास ध्यान खींचते हैं| ये उपन्यास गुलशन नंदा और अन्य लेखकों दवारा लिखे जाने वाले कोरी भावुकता के बुनियाद पर रचे जाने वाले सामाजिक उपन्यास नहीं हैं बल्कि ये अच्छे साहित्य के किले में पाठक को प्रवेश दिलवाने वाले द्वार हैं जिनसे नये और पुराने और अनुभवी पाठक साहित्य में प्रवेश करते ही रहते हैं|

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ऐसा मानना बिल्कुल ही निपट कल्पना नहीं हैं कि शरत चंद्र के उपन्यास देवदास की छाया ने कहीं न कहीं “गुनाहों का देवता” और “तुम्हारे लिए” की रचना प्रक्रिया को प्रभावित किया है|

उत्तराखंड के कुमाऊं के नैनीताल की पृष्ठभूमि में  मनोहर श्याम जोशी के महान उपन्यास “कसप” की भांति “तुम्हारे लिए” का कैनवास विशाल नहीं है बल्कि उसकी तुलना में यह हर लिहाज से एक लघु उपन्यास है| जहां “कसप” कथा और चरित्र चित्रण और मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करके पाठक को सम्मोहित करके उसे एक परिपूर्ण प्रेमकथा पढ़ने की अनुभूति देता है और दुखद अंत पाठक को अरसे तक हिलाए रखता है, “तुम्हारे लिए”  कथा और चरित्र चित्रण के स्तर पर जितना बताता या दर्शाता नहीं उससे ज्यादा छोडता चलता है पर फिर भी दुख और एक दुखद प्रेमकथा को भांजता यह उपन्यास आकर्षित करता है| उपन्यास की इस बनावट से एक बात का अनुमान लगता है कि जब हिमांशु जोशी ने इसे रचा तब उनके सामने एक महान प्रेमकथा रचने का उद्देश्य नहीं रहा होगा पर लिखते लिखते कुछ ऐसा रचा गया जो अपनी तमाम कमियों के बावजूद पाठकों को लुभाता चला आ रहा है|

चरित्र चित्रण के स्तर पर देखें तो उपन्यास का नायक विराग है, जिसकी जातिगत पहचान के बारे में उसके सहपाठी और मित्र सुहास (जिसे देवदास के चुन्नी बाबू से प्रेरित चरित्र माना जा सकता है) दवारा उसे “विराग शर्मा” पुकारने पर पता चलता है| कुमाऊं के दूर दराज के गाँव में “शर्मा” उपनाम धारण करने वाले और पूरोहिताई करके जीवनयापन करने वाला परिवार पाया जाता होगा या नहीं इस पर सोचा जा सकता है और तर्क किये जा सकते हैं|

उपन्यास की नायिका – अनुमेहा, ड़ा दत्ता की भतीजी है| अब ड़ा. दत्ता और उस नाते अनुमेहा बंगाली है या पंजाबी, इस बात को स्पष्ट रूप से उपन्यास नहीं स्थापित करता, हाँ ड़ा. दत्ता की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी के अपने माता-पिता के पास चंडीगढ़ चले जाने की बात सुहास विराग को बताता है तो उससे अनुमान भर लगाया जा सकता है कि अनुमेहा एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है| नायिका का नाम आकर्षक है और इस बात में अतिशयोक्ति नहीं कि पिछली सदी के अस्सी और नब्बे के दशकों में इस उपन्यास को पढ़ने वाले बहुसंख्यक पाठकों ने पहली ही बार इस नाम को जाना होगा| दुखद प्रेमकथा की नायिका का नाम होने के बावजूद नाम में इतना आकर्षण है कि इस उपन्यास को पढकर बहुतों ने अपनी बेटियों के नाम इस नाम पर रखे हों ऐसा भी हुआ होगा क्योंकि पच्चीस- तीस साल से छोटी युवतियों के नाम तो अनुमेहा देखने सुनने को मिल जाते हैं पर चालीस पचास साल की नारी का अनुमेहा नाम बिरला ही सुनने में आया होगा|

गरीबी से त्रस्त विराग, जो बड़ी मुश्किल से नैनीताल में रहकर अध्ययन कर पा रहा है, अपने सहपाठी सुहास की मदद के कारण अनुमेहा को ट्यूशन देने का काम पा जाता है जिसके एवज में उसे २० रूपये प्रति माह मिलने हैं जिससे उसकी आर्थिक परेशानियां बहुत हद तक दूर हो सकती हैं|

अनुमेहा के ड़ा. पिता का देहांत हो चुका है और वह अपने चाचा (जिन्हें वह उपन्यास के काल में भी अंकल ही कहती है) के घर रह कर पढ़ रही है| उसके अपने दुख हैं और गुरु विराग और शिष्या अनुमेहा के दुख कब एक दूसरे का संबल बन जाते हैं, उपन्यास उन घटनाओं का ब्योरा नहीं देता बस शुरू के पृष्ठों में ही सांकेतिक रूप से बताया जाता है कि दोनों की भावनाएं हैं एक दूसरे के प्रति, पर जहां अनुमेहा मुखर है इस बात को स्पष्ट करने में कि उसे विराग की चिंता है, विराग इस बात को मुखरित नहीं गोने देना चाहता| शायद उसकी गरीबी और उसके परिवार की कठिनाइयां उसे प्रेम नामक अनुभव को लेने से रोकती हैं और वह इस बात से ही ग्लानि से भर जाता है कि उसके पिता पेट काट काट कर उसे नैनीताल में रख कर पढ़ा रहे हैं और वह यहाँ प्रेम में फंसा हुआ है| यही एक बात संभव लगती है विराग दवारा अनुमेहा के प्रेम को स्वीकार न कर पाने के पीछे|

विराग-अनुमेहा के प्रेम, जो विराग की मुखर स्वीकृति न मिल पाने के कारण एक निश्चित आकार ग्रहण नहीं कर पाता, और इस लिहाज से अनगढ़ रह कर प्रेमकथा को भी अनगढ़ और बहुत हद तक हवाई ही रहने देते हैं, विराग के गाँव में अपने पिता और भाई के साथ के दृश्य उपन्यास को ठोस धरातल देते हैं और वास्तविकता के करीब लेकर जाते हैं और साहित्य के घेरे में उपन्यास का प्रवेश कराते हैं| एक गरीब ब्राह्मण, जिसने अपने खेत-खलिहान और घर तक इस आशा में गिरवी रखकर बड़े पुत्र की पढ़ाई के ऊपर न्योछावर कर दिए हैं कि पुत्र पढ़ लिखकर कुछ बड़ा काम करेगा, अपनी हर निराशा, सीमितता, कठिनाई, और अपने दुख को शास्त्रों में उपलब्ध श्लोकों और ज्ञान के भरोसे सहन कर लेता है, पर इस किताबी ज्ञान से नैनीताल रहकर आधुनिक जीवन शैली के संपर्क में आ चुके ज्येष्ठ पुत्र को सहारा नहीं मिल सकता| विराग नैनीताल में पिता की परिपाटी से काम नहीं चला  सकता पर संस्कारों के कारण वह आदर्शवाद को छोड़ भी नहीं पाता|

उसकी गरीबी, उसके आदर्शवाद, और उसके संस्कार जब वास्तविक जीवन के कुछ पहलुओं से टकराते हैं तो वह अजीब दुविधा में घिर जाता है| अनुमेहा का प्रेम उसके लिए ऐसा बन गया है जिसे अनुमेहा के सामने वह स्वीकार भी नहीं कर पाता और अपने एकांत में अपने ह्रदय में अनुमेहा के प्रति प्रेम को नकार भी नहीं पाता| प्रेम को प्रदर्शित और स्वीकार न कर पाने की कमी के कारण उसका व्यक्तित्व विकसित हो ही नहीं पाता, और वह कुंठित हो उठता है| अंदर कहीं गहरे में उसे यह आशा हो सकती है कि भले ही वह अनुमेहा से प्रेम को सच रूप में नहीं स्वीकारता पर अनुमेहा उसके लिए ही इंतजार करेगी| वह अनुमेहा से बचता भी है और उससे बंध कर भी रहना चाहता है| सुहास के साथ अनुमेहा को घूमते देख उसकी कुंठा मुखरित हो उठती है और उसे अपने जीवन की विवशताएं विशालकाय लगने लगती हैं| देवदास के अनिर्णय या एक गलत निर्णय लेने की मानसिकता ने उसके जीवन को पछतावे से भरकर गलत मार्ग पर डाल दिया था, और ऐसा ही विराग के साथ भी होता है|

कुछ अरसे के अंतराल के बाद मिलने पर सुहास, विराग को ज्ञान देता है,” मुझे लगता है जीवन में न तो अतिसंयम आवश्यक है, न अतिअसंयम| बुद्ध का संतुलित सम्यक सिद्धांत ही मुझे हर समस्या का एकमात्र समाधान नजर आता है – न विरक्ति, न आसक्ति| यानि…”

पहले भी जब सुहास का साहित्य आदि पढ़ने से कोई नाता न था और वह नितांत शरीर ही था, तब भी विराग अतिसंयम का पालन करता था और बाद में भी बहुत अरसे तक करता रहा|

विराग के स्मृतियों के सहारे फ्लैशबैक में चलता उपन्यास पाठक को गहराई में एक और डूबकी तब लगवाता है, जब बहुत साल बाद विराग और अनुमेहा मिलते हैं और भावनाओं का समुद्र अनुमेहा और विराग को ही नहीं बांधता बल्कि पाठक को भी पुस्तक से बांध लेता है|

चूँकि कोई कहानी या उपन्यास उसमें उपस्थित चरित्रों की कहानी होती है पर कई मर्तबा ऐसी कथाएं सामने आ जाती हैं जिनके चरित्रों के व्यवहार को देखकर पाठक के मन में प्रश्न उठते हैं कि ये चरित्र ऐसा क्यों नहीं कर रहे या कह रहे, क्योब्की यही सही होगा| परन्तु चरित्र अपनी ही तरह के होते हैं, उनका अपना स्वभाव होता है आखिर तभी वे एक कहानी को प्रस्तुत कर पाते हैं| उपन्यास में कई बार ऐसे भाव उठते हैं कि विराग और अनुमेहा ऐसा क्यों नहीं कर लेते जिससे उनके जीवन आसान हो जाएँ| पहले उनमें सुलझेपन का नितांत अभाव दिखाई देता है और पाठक को स्पष्ट दिखाई देता है कि सुलझे दिमाग की अनुपस्थिति उनके जीवन में दुख के मूल कारणों में से एक है|

और जब दोनों जीवन में उस स्थिति में पहुंचकर मिलते हैं जहां उनके मिलन में कोई परेशानी नहीं है और बीते सालों तक जो विराग इस रिश्ते को ठोस आकार देने में नाकाम रहा है, वही प्रस्ताव रखता है,” मान लो, जिससे तुम शादी करना चाहती थीं, वह अब भी तुमसे शादी करना चाहे …|”

तो अनुमेहा इंकार कर देती है,” नहीं नहीं, , मैं स्वयं अब उससे शादी नहीं कर सकती| मैं उसके योग्य नहीं रही…|”

जब पाठक को लगने लगता है कि नितांत अकेले रहे रहे अनुमेहा और विराग जीवन के इस पड़ाव में मिलने पर एक दूसरे को अपने प्रेम का सहारा दे सकते हैं और पाठक को एक आशा घेर लेती है कि अंततः दुख से भरी इस प्रेमकथा में कुछ सुखद अंश भी समा सकते हैं, उपन्यास ऐसी सारी आशाओं को सिरे से समाप्त करके न केवल दोनों चरित्रों को बल्कि पाठकों भी उनके दुख में डुबो देता है|

अनुमेहा से विदा लेते समय कुछ याद करके विराग पूछता है,” अब कब आऊँ?”

रोकर अनुमेहा कहती है,” नहीं – नहीं| अब मत आना| कभी नहीं – कभी भी नहीं| नहीं तो मेरे लिए जीना और भी अधिक दूभर हो जायेगा| समझ लेना अनुमेहा मर गई|”

समय के साथ विराग वास्तविकता के नजदीक आ गया है पर अनुमेहा आद्रश्वाद के ज्यादा नजदीक पौंच गई है| कहते हैं प्रेम दोनों प्रेमियों को बदलता है और अगर उनमें दूरी आ जाये तो प्रेमी प्रेमिका की सोच की भांति बनता जाता है और प्रेमिका प्रेमी के विचारों की भांति सांचे में ढलने लगती है| वैसे भी यह सच है कि किसी भी रिश्ते में दोनों लोग अपने साथी के साथ कम और अपने मन में साथी की मूरत के साथ ज्यादा रहते हैं| अनुमेहा के मन में विराग की एक आदर्शवादी मूरत बसी हुयी है और उससे इतर किसी और खंडित मूरत के साथ रहने को वह राजी नहीं|

सालों के अंतराल के बाद अनुमेहा पुनः विराग के जीवन में आती है, और कुछ घंटों की मुलाक़ात में बीमार अनुमेहा जब विराग को सुहास के दिवंगत हो जाने और मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति दान कर जाने के बारे में बताती है तो विराग के साथ पाठक भी स्तब्ध रह जाता है| एक बिगडैल सुहास पर विराग के आदर्शवाद और अनुमेहा के प्रति प्रेम का बहुत असर रहा और दोनों के साथ और असर ने उसका जीवन संवार दिया|

इस बार अनुमेहा विराग से विदा लेने आई है तो इस जीवन में अंतिम बार विदा लेने के लिए और सुहास और अपने से जुड़े कुछ कागजात देने|

चलते समय अगली सुबह पालम एयरपोर्ट आने का वचन लेकर अनुमेहा विराग को ढांढस बंधाते हुए कहती है,”सुनो, दुखी न होना| पता नहीं, हमारा यह किस जन्म का कैसा बैर था, जो…जो…|”

और अनुमेहा फूट-फूटकर रोने लगती है, पाठक को भ्रमित छोड़कर कि क्यों दोनों चरित्र इतने दुख को पाले रहते हैं जबकि थोड़ा सा प्रंबधन उनके जीवन को सामान्य ढर्रे पर ला सकता था|

पर यही इस उपन्यास की विशेषता है| विराग-अनुमेहा के सहारे दुख का प्रदर्शन ही उपन्यास को बार बार पढ़ने की ओर आकर्षित करता है और पाठक सालों के अंतराल के बाद इस उपन्यास को फिर से उठा लेते हैं|

दुख को ऐसे भांजा गया है कि पाठक दोराहे पर खड़ा रहता है, कि इस दुख से सीधा मुकाबला अच्छा या इससे दूर जाने में ही भलाई है|

विराग ने ऐसे दोराहों पर हमेशा अनुमेहा से दूर जाने का रास्ता चुना और बाद में अनुमेहा ने भी यही राह चुनी|

पालम पर भी विराग के पहुँचने से पहले ही अनुमेहा का विमान टेक-ऑफ कर जाता है और बीती रात की मुलाक़ात उनके जीवन की अंतिम मुलाक़ात बन जाती है| विराग-अनुमेहा के मध्य फिर से अधूरापन रह जाता है|

उपन्यास का अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता बाकि बिरले ऐसे पाठक होंगे जो अंतिम पृष्ठ को पढकर उत्पन्न हुए दुख में डूबकर पुस्तक के पहले अध्याय पर पुनः लौट कर न आए होंगे, बहुत सी बातें छोड़ छोड़ कर पाठक को कहानी सुनाती पुस्तक को पूरा ग्रहण करने के लिए|

ऐसा ही वर्तुल इस कहानी के साथ बना रहता है| यह पुनः पुनः लौट कर आती है जीवन में|

…[राकेश]

अप्रैल 23, 2015

अरविन्द केजरीवाल के नाम खुला पत्र : (योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण का पार्टी से निष्काषन)

श्री अरविन्द केजरीवाल, संयोजक (आम आदमी पार्टी) के नाम खुला पत् र:

आम आदमी पार्टी की अनुशासन समिति द्वारा चार प्रमुख सदस्यों प्रशांत, योगेन्द्र, आनन्द कुमारअजित झा को पार्टी से निष्कासित किये जाने के फैसले की हम {परमजीतसिंह (सचिव) व राजीव गोदारा (मुख्य प्रवक्ता) आम आदमी पार्टी}, घोर निंदा करते हैं व इस फैसले को आप के मूल सिद्धांत स्वराज के खिलाफ मानते हैं |

जिस अनुशासन समिति का गठन 29 मार्च को किया गया उसी समिति ने प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, आनन्द कुमारअजीत झा को कारण बताओ नोटिस जारी कर 48 घंटे मेंजवाब मांगा | प्रशांत, योगेन्द्र व आनन्द कुमार ने विस्तृत जवाब दिए जबकि अजीत झा ने नोटिस भेजने वालीअनुशासन समिति को असैंवधानिक करार देते हुए जवाब नहीं दिया |

प्रशांत व योगेन्द्र ने कारण बताओ नोटिस के अपने जवाब में समिति के दो सदस्यों पंकज गुप्ताआशीष खेतान से निवेदन किया था कि वे दोनों लोग पहले ही प्रशांत व योगेन्द्र के खिलाफ सार्वजनिक रूप से ब्यान देकर उन्हें पार्टी विरोधी करार दे चुके हैं, इस लिए इन दोनों को फैसला करने की प्रक्रिया से हट जाना चाहिए | कारण बताओ नोटिस में वही आरोप लगाए गए हैं जिन पर पंकज गुप्ताआशीष खेतान पहले ही फैसला दे चुके हैं |

जवाब दिए जाने के कुछ ही घंटों बाद “अनुशासनसमिति” ने रात को ही इन चारों नेताओं को पार्टी से निकालेजाने का फैसला ले लिया व इन नेताओं को भेजने से पहले ही मिडिया को भेज दिया गया | हमें उम्मीद थी पार्टी कि अनुशासन समिति अपने फैसले की प्रति को भी सार्वजानिक करेगी, जबकि फैसला व आरोप सार्वजानिक किये गए हैं | हमें आशा थी कि उस फैसले में निष्काषित किये गए नेताओं के जवाब पर विचार कर उसे संतोषजनक ना माने जाने के कारण बताये जायेंगें व साथ साबित हुए आरोपों बारे भी स्पष्टता होगी | मगर लम्बी इन्तजार के बाद भी फैसले की जानकारी नहीं मिल पाई है | यह भी नहीं कहा बताया गया कि कौन से आरोप साबित हुए |

हम निम्न कारणों के चलते इस फैसले का विरोध करतें है:

1) फैसले के सार्वजानिक नहीं होने से व निष्काषित लोगों को नहीं मिलने से यह साफ़ हो जाता है कि इन लोगों के जवाब को जांचा ही नहीं गया |

2) समिति के दो सदस्यों पंकज गुप्ता व आशीष खेतान दोनों ने प्रशांत व योगेन्द्र के खिलाफ न सिर्फ आरोप लगाए बल्कि नोटिस से पहले ही उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियाँ करने का दोषी करार दिया था | उन्हीं दो लोगों को जाँच समिति में रखा गया | पूर्वाग्रह के चलते इन्हें फैसले की प्रक्रिया से हट जाने के निवेदन के बाद भी स्वीकार नहीं किया गया | ना ही कोई कारण बताया गया कि ये दोनो लोग फैसले की प्रक्रिया से अलग क्यों नहीं हुए |

3) प्रशांत, योगेन्द्र व आनन्द कुमार के जवाब में दिए गए तथ्यों व जवाब की समीक्षा नहीं की गई |

4) प्रशांत जी के जवाब के साथ उनकी अध्यक्षता वाली अनुशासन समिति (जिसमें पंकज गुप्ता भी सदस्य थे) की कार्यवाही की मिनट्स भी भेजे गए | उससे जाहिर होता है कि जिन लोगों के खिलाफ अनुशासनहीनता की कार्यवाही चल रही थी उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाया गया था, मगर इन चार वरिष्ठ साथियों को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए नहीं बुलाया गया |

हम मानते हैं कि ऊपर दिए गए तथ्य चार नेताओं के निष्कासन की निंदा करने के लिए पर्याप्त कारण हैं | इस फैसले से न्याय के हर सिद्धांत को तिलांजली दी गई है | यह फैसला साफ़ करता है कि स्वराज व आंतरिक लोकतंत्र की आवाज उठाने वालों को इसी तरह से पार्टी से बाहर किया जाएगा |

मगर हम स्वराज व आन्तरिक लोकतंत्र के लिए स्वयं की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए “अनुशासन समिति” द्वारा प्रशांत, योगेन्द्र, आनन्द कुमार व अजीत झा को पार्टी से बहार किये जाने के फैसले की कड़ी निंदा करते हैं, साथ ही आगाह करना चाहते हैं कि पार्टी अपने स्वराज के रास्ते से भटक रही है | यदि समय रहते पार्टी का राष्ट्रिय नेतृत्व नहीं चेता तो जनता उसके अहंकार का जवाब देगी |

हम अंत में कहना कहते हैं कि प्रशांत भूषण ने जो मुद्दे अपने जवाब में उठाये हैं, उन की तुरंत जाँच करवाई जाये | साथ ही हमारी मांग है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान जिन दो उम्मीदवारों की टिकट लोकपाल के कहे पर बदली गई थी, उन टिकटों को दिए जाने की सिफारिस करने वालों के नाम सार्वजानिक किये जाएँ व उनके खिलाफ कार्रवाई की जाये | हम मांग करते हैं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य नवीन जयहिंद के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों व आर्थिक अनियमितताओं सम्बन्धी मामले में लंबित जाँच, जिसमें हरियाणा के संयोजक से डिटेल रिपोर्ट भेजी जा चुकी है (प्रशांत जी के जवाब के साथ 16/10/2014 को हुई अनुशासन समिति की बैठक के फैसले का सलंगन दस्तावेज यह बताता हैं) को लोकपाल समिति के पास तुरंत भेजा जाए | साथ ही राजेश गर्ग (पूर्व विधायक) द्वारा जेटली के नाम से फोन करवाने के आरोपों के मामले की जाँच जल्द पूरी करने के लिए दिल्ली पुलिस को आग्रह किया जाये |

परमजीत सिंह (8950213717 ) राजीव गोदारा (9417150798)

सचिव मुख्य प्रवक्ता

आम आदमी पार्टी, हरियाणा आम आदमी पार्टी, हरियाणा

अप्रैल 21, 2015

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाय… योगेन्द्र यादव

YY1कई दिन की थकान थी, सोचा था आज रात जल्दी सो जाऊँगा। तभी घर का लैंडलाइन फोन बजा, जो कभी कभार ही बजता है। देखा आधी रात में सिर्फ पांच मिनट बाकी थे। अनिष्ट की आशंका हुई। फोन एक टीवी चैनल से था : “आपको पार्टी से एक्सपेल कर दिया गया है। आपका फोनो लेना है।” मैं सोच पाता उससे पहले मैं इंटरव्यू दे रहा था। आपकी पहली प्रतिक्रिया? आरोपों के जवाब में आपको क्या कहना है? आगे क्या करेंगे? पार्टी कब बनाएंगे? वो प्रश्नो की रस्म निभा रहे थे, मैं उत्तरों की।

कई चैनलों से निपटने के बाद अपने आप से पूछा: तो, आपकी पहली प्रतिक्रिया? अंदर से साफ़ उत्तर नहीं आया। शायद इसलिए चूंकि खबर अप्रत्याशित नहीं थी। पिछले कई दिनों से इशारे साफ़ थे। जब से 28 तारिख की मीटिंग का वाकया हुआ तबसे किसी भी बात से धक्का नहीं लगत। “अनुशासन समिति” के रंग-ढंग से जाहिर था किस फैसले की तैयारी हो चुकी थी। शायद इसीलिये फैसला आते ही कई प्रतिक्रियां एक साथ मन में घूमने लगीं।

अगर आपको घसीट कर आपके घर से निकाल दिया जाये (और तिस पर कैमरे लेकर आपसे आपकी प्रतिक्रिया जानने की होड़ हो) तो आपको कैसा लगेगा? बस वैसा की कुछ लगा।

सबसे पहले तो गुस्सा आता है: ये कौन होते हैं हमें निकालने वाले? कभी मुद्दई भी खुद जज सकते हैं?
फिर अचानक से दबे पाँव दुःख पकड़ लेता है। घर में वो सब याद आता है जो पीछे छूट गया। इतने खूबसूरत वॉलंटीर, कई साथी जो शायद अब मिलने से भी डरेंगे। के एल सहगल गूँज रहे हैं:

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाय

फिर ममता की बारी है। दिल से दुआ निकलती है: अब जिस का भी कब्ज़ा है वो घर को ठीक से बना कर रखे। जिस उम्मीद को लेकर इतने लोगों ने ये घोंसला बनाया था, उम्मीद कहीं टूट न जाय।

आखिर में कहीं संकल्प अपना सिर उठाता है। समझाता है, जो हुआ अच्छे के लिए ही हुआ। घर कोई ईंट-पत्थर से नहीं बनता, घर तो रिश्तों से बनता है। हो सकता है एक दिन हम उन्हें दुआ देंगे जिन्होंने हमें सड़क पर लाकर नया रास्ता दिखा दिया। हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ गूँज रही थीं:

नीड़ का निर्माण फिर …

ये किसी कहानी का दुखांत नहीं है, एक नयी, सुन्दर और लंबी यात्रा की शुरुआत है।

(योगेन्द्र यादव)

मार्च 23, 2015

भगतसिंह की सेक्युलर विरासत

Bhagat Singh

मार्च 20, 2015

सूरज को नही डूबने दूंगा …(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा।
देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं
मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं
और ढलान पर एड़ियाँ जमाकर
खड़ा होना मैंने सीख लिया है।

घबराओ मत
मैं क्षितिज पर जा रहा हूँ।
सूरज ठीक जब पहाडी से लुढ़कने लगेगा
मैं कंधे अड़ा दूंगा
देखना वह वहीं ठहरा होगा।

अब मैं सूरज को नही डूबने दूँगा।
मैंने सुना है उसके रथ में तुम हो
तुम्हें मैं उतार लाना चाहता हूं
तुम जो स्वाधीनता की प्रतिमा हो
तुम जो साहस की मूर्ति हो
तुम जो धरती का सुख हो
तुम जो कालातीत प्यार हो
तुम जो मेरी धमनी का प्रवाह हो
तुम जो मेरी चेतना का विस्तार हो
तुम्हें मैं उस रथ से उतार लाना चाहता हूं।

रथ के घोड़े
आग उगलते रहें
अब पहिये टस से मस नही होंगे
मैंने अपने कंधे चौड़े कर लिये है।

कौन रोकेगा तुम्हें
मैंने धरती बड़ी कर ली है
अन्न की सुनहरी बालियों से
मैं तुम्हें सजाऊँगा
मैंने सीना खोल लिया है
प्यार के गीतो में मैं तुम्हे गाऊँगा
मैंने दृष्टि बड़ी कर ली है
हर आँखों में तुम्हें सपनों सा फहराऊँगा।

सूरज जायेगा भी तो कहाँ
उसे यहीं रहना होगा
यहीं हमारी सांसों में
हमारी रगों में
हमारे संकल्पों में
हमारे रतजगों में
तुम उदास मत होओ
अब मैं किसी भी सूरज को
नही डूबने दूंगा।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

मार्च 19, 2015

“आम आदमी पार्टी” राजनीतिक अव्यावहारिकता का संकट : ओम थानवी

AAP_OmThanvi

साभार : प्रभात खबर ( १४ मार्च २०१५)

मार्च 6, 2015

लीक पर वे चलें जिनके…

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

मार्च 1, 2015

भूख – हरिओम पंवार

मेरा गीत चाँद है ना चांदनी है आजकल
ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल
मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
मैं गरीब के रुदन के आंसुओं की आग हूँ
भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ।

मेरा गीत आरती नहीं है राजपाट की
कसमसाती आत्मा है सोये राजघाट की
मेरा गीत झोपडी के दर्दों की जुबान है
भुखमरी का आइना है आँसू का बयान है
भावना का ज्वार भाटा जिए जा रहा हूँ मैं
क्रोध वाले आँसुओं को पिए जा रहा हूँ मैं
मेरा होश खो गया है लोहू के उबाल में
कैदी होकर रह गया हूँ मैं इसी सवाल में
आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को
नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को।

सोचकर ये शोक शर्म से भरा हुआ हूँ मैं
और अपने काव्य धर्म से डरा हुआ हूँ मैं
मैं स्वयम् को आज गुनहगार पाने लगा हूँ
इसलिये मैं भुखमरी के गीत गाने लगा हूँ
गा रहा हूँ इसलिए कि इंकलाब ला सकूं।
झोपडी के अंधेरों में आफताब ला सकूं।।

इसीलिए देशी औ विदेशी मूल भूलकर
जो अतीत में हुई है भूल, भूल-भूल कर
पंचतारा पद्धति का पंथ रोक टोक कर
वैभवी विलासिता को एक साल रोक कर
मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए
झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए

मेहरबानों भूख की व्यथा कथा सुनाऊंगा
महज तालियों के लिए गीत नहीं गाऊंगा
चाहे आप सोचते हो ये विषय फिजूल है
किंतु देश का भविष्य ही मेरा उसूल है
आप ऐसा सोचते है तो भी बेकसूर हैं
क्योकिं आप भुखमरी की त्रासदी से दूर हैं

आपने देखी नहीं है भूखे पेट की तड़प
काल देवता से भूखे तन के प्राण की झड़प
मैंने ऐसे बचपनों की दास्तान कही है
जहाँ माँ की सूखी छातियों में दूध नहीं है
यहाँ गरीबी की कोई सीमा रेखा ही नहीं
लाखों बच्चे हैं जिन्होंने दूध देखा ही नहीं
शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते हैं वे
कुत्ते जिसे चाट चुके झूठन चाटते हैं वे

भूखा बच्चा सो रहा है आसमान ओढ़कर
माँ रोटी कमा रही है पत्थरों को तोड़कर
जिनके पाँव नंगे हैं लिबास तार-तार हैं
जिनकी साँस-साँस साहुकारों की उधार है
जिनके प्राण बिन दवाई मृत्यु की कगार हैं
आत्महत्या कर रहे हैं भूख के शिकार हैं

बेटियां जो शर्मो-हया होती हैं जहान की
भूख ने तोड़ा तो वस्तु बन बैठी दुकान की
भूख आस्थाओं का स्वरूप बेच देती है
निर्धनों की बेटियों का रूप बेच देती है
भूख कभी-कभी ऐसे दांव-पेंच देती है
सिर्फ दो हजार में माँ बेटा बेच देती है

भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देती है
आन-बान-शान का गुमान तोड़ देती है
भूख सुदामाओं का भी मान तोड़ देती है
महाराणा प्रताप की भी आन तोड़ देती है
भूख तो हुजूर सारा नूर छीन लेती है
मजूरन की मांग का सिन्दूर छीन लेती है

किसी-किसी मौत पर धर्म-कर्म भी रोता है
क्योंकि क्रिया कर्म का भी पैसा नहीं होता है
घर वाले गरीब आँसू गम सहेज लेते हैं
बिना दाह संस्कार मुर्दा बेच देते हैं
थूक कर धिक्कारता हूँ मैं ऐसे विकास को
जो कफ़न भी दे ना सके गरीबों की लाश को।

कहीं-कहीं गोदामो में गेहूं सड़ा हुआ है
कहीं दाने-दाने का अकाल पड़ा हुआ है
झुग्गी-झोपड़ी में भूखे बच्चे बिलबिलाते हैं
जेलों में आतंकियों को बिरयानी खिलाते हैं
पूजा पाठ हो रहे हैं धन्ना सेठों के लिए
कोई यज्ञ हुआ नहीं भूखे पेटों के लिए

कोई सुबह का उजाला रैन बना देता है
कोई चमत्कार स्वर्ण चैन बना देता है
कोई स्वर्ग जाने की भी दे रहा है बूटियां
कोई हवा से निकाल देता है अंगूठियां
पर कोई गरीब की लंगोटी न बना सका
कभी कोई साधू बाबा रोटी न बना सका

भूख का सताया मन प्राण बीन लेता है
राजाओं से तख्त और ताज छीन लेता है
भूख जहाँ बागी होना ठानेगी अवाम की
मुँह की रोटी छीन लेगी देश के निजाम की

देश में इससे बड़ा कोई सवाल होगा क्या ?
भूख से भी बड़ा कोई महाकाल होगा क्या ?
फिर भी इस सवाल पर कोई नहीं हुंकारता
कहीं अर्जुन का गांडीव भी नहीं टंकारता
कोई भीष्म प्रतिज्ञा की भाषा नहीं बोलता
कहीं कोई चाणक्य भी चोटी नहीं खोलता

इस सवाल पर कोई कहीं क्यों नहीं थूकता।
कहीं कोई कृष्ण पाञ्चजन्य नहीं फूंकता।।

भूख का निदान झूठे वायदों में नहीं है
सिर्फ पूंजीवादियों के फायदों में नहीं है
भूख का निदान जादू टोनों में भी नहीं है
दक्षिण और वामपंथ दोनों में भी नहीं है
भूख का निदान कर्णधारों से नहीं हुआ
गरीबी हटाओ जैसे नारों से नहीं हुआ

भूख का निदान प्रशासन का पहला कर्म है
गरीबों की देखभाल सिंहासन का धर्म है
इस धर्म की पालना में जिस किसी से चूक हो
उसके साथ मुजरिमों के जैसा ही सुलूक हो

भूख से कोई मरे ये हत्या के समान है
हत्यारों के लिए मृत्युदण्ड का विधान है
कानूनी किताबों में सुधार होना चाहिए
मौत का किसी को जिम्मेदार होना चाहिए

भूखों के लिए नया कानून मांगता हूँ मैं
समर्थन में जनता का जुनून मांगता हूँ मैं
खुदकशी या मौत का जब भुखमरी आधार हो
उस जिले का जिलाधीश सीधा जिम्मेदार हो
वहां का एमएलए, एमपी भी गुनहगार है
क्योंकि ये रहनुमा चुना हुआ पहरेदार है
चाहे नेता अफसरों की लॉबी आज क्रुद्ध हो
हत्या का मुकद्दमा इन्ही तीनों के विरुद्ध हो

अब केवल कानून व्यवस्था को टोक सकता है
भुखमरी से मौत एक दिन में रोक सकता है
आज से ही संविधान में विधान कीजिये।
एक दो कलक्टरों को फाँसी टांग दीजिये।।
डॉ. हरिओम पंवार

फ़रवरी 26, 2015

ओशो : मदर टेरेसा और उनके कार्यों का विश्लेषण

Osho kidमदर टेरेसा को नोबल पुरस्कार मिलने पर ओशो ने मदर टेरेसा के कार्यों का विश्लेषण किया था, जिससे मदर टेरेसा और उनके समर्थक नाराज हो गये थे| मदर ने दिसम्बर 1980 के दिसंबर माह के अंत में ओशो को पत्र लिखा| उस पर ओशो का प्रवचन :-

राजनेता और पादरी हमेशा से मनुष्यों को बांटने की साजिश करते आए हैं| राजनेता बाह्य जगत पर राज जमाने की कोशिश करता है और पादरी मनुष्य के अंदुरनी जगत पर|   इन् दोनों ने मानवता के खिलाफ गहरी साजिशें मिलकर की हैं| कई बार तो अपने अंजाने ही इन् लोगों ने ऐसे कार्य किये हैं| इन्हे खुद नहीं पता होता ये क्या कर रहे हैं| कई बार इनकी नियत नहीं होती गलत करने की पर चेतना से रहित उनके दिमाग क्या सुझा सकते हैं?

अभी हाल में मदर टेरेसा ने मुझे एक पत्र लिख भेजा| मुझे उनके पत्र की गंभीरता पर कुछ नहीं कहना,  उन्होंने निष्ठा से भरे शब्दों से पत्र लिखा है, पर यह चेतना रहित दिमाग की उपज है| उन्हें स्वयं नहीं ज्ञात है कि वे क्या लिख रही हैं| उनका लिखना यांत्रिक है, जैसे रोबोट ने लिख दिया हो|

वे लिखती हैं,” मुझे अभी आपके भाषण की कटिंग मिली| मुझे आपके लिए बेहद खेद हुआ कि आप ने ऐसा कहा (सन्दर्भ – नोबल पुरस्कार)| आपने मेरे नाम के साथ जो विशेषण इस्तेमाल किये उनके लिए मैं पूरे प्रेम से आपको क्षमा करती हूँ|”

वे मेरे प्रति खेद महसूस कर रही हैं…मुझे उनका पत्र पढकर आनंद आया! उन्होंने मेरे दवारा उपयोग में लाये गये विशेषणों को समझा ही नहीं| लेकिन वे चेतन नहीं हैं वरना वे अपने प्रति खेद महसूस करतीं मेरे प्रति नहीं|

उन्होंने मेरे भाषण की कटिंग भी अपने पत्र के साथ भेजी है मैंने जो विशेषण इस्तेमाल किये थे, वे थे –  धोखेबाज ( deceiver), कपटी (charlatan) और पाखंडी या ढोंगी (hypocrite)….

मैंने उनकी आलोचना की थी और कहा था कि उन्हें नोबल पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए था| और इस बात को उन्होंने अन्यथा ले लिया| अपने पत्र में वे लिखती हैं “सन्दर्भ : नोबल पुरस्कार”|

यह आदमी, नोबल, दुनिया के सबसे बड़े अपराधियों में से एक था| पहला विश्वयुद्ध उसके हथियारों से लड़ा गया था, वह हथियारों का बहुत बड़ा निर्माता था…

मदर टेरेसा नोबल पुरस्कार को मना नहीं कर सकीं| प्रशंसा पाने की चाह, सारे विश्व में सम्मान पाने की चाह, नोबल पुरस्कार तुम्हे सम्मान दिलवाता है, सो उन्होंने पुरस्कार सहर्ष स्वीकार किया…

इसलिए मैंने मदर टेरेसा जैसे व्यक्तियों को धोखेबाज (deceivers) कहा| वे जानबूझ धोखा नहीं देते, निश्चित ही उनकी नियत धोखा देने की नहीं है, लेकिन यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, अंतिम परिणाम स्पष्ट है| ऐसे लोग समाज में लुब्रीकेंट का कार्य करते हैं ताकि समाज के पहिये, शोषण का पहिया, अत्याचार का पहिया यूँ ही आसानी से घूमता रहे| ये लोग न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी धोखा दे रहे हैं|

और मैं ऐसे लोगों को कपटी (charlatans) भी कहता हूँ, क्योंकि एक सच्चा धार्मिक आदमी, जीसस जैसा आदमी, नोबल पुरस्कार पायेगा?  असंभव है यह! क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि सुकरात को नोबल पुरस्कार दिया जाए, या कि अल-हिलाज मंसूर को इस पुरस्कार से नवाजे सत्ता? अगर जीसस को नोबल नहीं मिल सकता, और सुकरात को नोबल नहीं मिल सकता, और ये लोग सच्चे धार्मिक, चेतन मनुष्य हैं, तब मदर टेरेसा कौन हैं? …

सच्चा धार्मिक व्यक्ति विद्रोही होता है, समाज उसकी आलोचना करता है, निंदा करता है|जीसस को समाज ने अपराधी करार दिया और मदर टेरेसा को संत कह रहा है| यह बात विचारणीय है, अगर मदर टेरेसा सही हैं तो जीसस अपराधी हैं और अगर जीसस सही हैं तो मदर टेरेसा एक कपटी मात्र हैं उससे ज्यादा कुछ नहीं| कपटी लोगों को समाज बहुत सराहता है क्योंकि ये लोग समाज के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, समाज की जैसी भ्रष्ट व्यवस्था चली आ रहे एहोती है उसे वैसे ही चलने देने में ये लोग बड़ी भूमिका निभाते हैं|

Mother Teresa मैंने जो भी विशेषण इस्तेमाल किये वे सोच समझ कर इस्तेमाल किये| मैंने बिना विचारे कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करता| और मैंने पाखंडी या ढोंगी (hypocrites) शब्द का इस्तेमाल किया| ऐसे लोग पाखंडी हैं क्योंकि इनकी आधारभूत जीवन शैली बंटी हुयी है, सतह पर एक रूप और अंदर कुछ और रूप|

वे लिखती हैं,” ‘प्रोटेस्टेंट परिवार को बच्चा गोद लेने से इसलिए नहीं रोका गया था कि वे प्रोटेस्टेंट थे बल्कि इसलिए कि उस समय हमारे पास कोई बच्चा नहीं था जो हम उन्हें गोद दे सकते थे”|

अब उन्हें नोबल पुरस्कार इसलिए दिया गया है कि वे हजारों अनाथों की सहायता करती हैं और उनकी संस्था में हजारों अनाथालय हैं| अचानक उनके अनाथालय में एक भी बच्चा उपलब्ध नहीं रहता? और भारत में कभी ऐसा हो सकता है कि अनाथ बच्चों का अकाल पड़ जाए? भारतीय तो जितने चाहो उतने अनाथ बच्चे जन्मा सकते हैं बल्कि जितने तुम चाहो उससे भी कहीं ज्यादा!

और उस प्रोटेस्टेंट परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था| यदि एक भी अनाथ बच्चा उपलब्ध नहीं था और उनके सारे अनाथालय खाली हो गये थे तो मदर टेरेसा सात सौ ननों का क्या कर रही हैं? इन ननों का काम क्या है? सात सौ ननें? वे किसकी माताओं की भूमिका निभा रही हैं? एक भी अनाथ बच्चा नहीं – अजीब बात है! – और वो भी कलकत्ता में!  सड़क पर कहीं भी तुम्हे अनाथ बच्चे दिखाई दे जायेंगे – तुम्हे कूड़ेदान तक में बच्चे मिल सकते हैं| उन्हें सिर्फ बाहर देखने की जरुरत थी और उन्हें बहुत से अनाथ बच्चे मिल जाते| तुम आश्रम से बाहर जाकर देखना, अनाथ बच्चे मिल जायेंगें| तुम्हे खोजने की भी जरुरत नहीं, वे अपने आप आ जायेंगें!

अचानक उनके अनाथालय में अनाथ बच्चे नहीं मिलते|… और अगर उस परिवार को एकदम से इंकार किया जाता तब भी बात अलग हो जाती| लेकिन परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था, उनसे कहा गया था,”हाँ, आपको बच्चा मिल सकता है, आवेदन पत्र भर दीजिए”|  आवेदन पत्र भरा गया था| जब तक कि परिवार ने अपने सम्प्रदाय का नाम जाहिर नहीं किया था तब तक उनके लिए बच्चा उपलब्ध था पर जैसे ही उन्होने आवेदन पत्र में लिखा कि वे प्रोटेस्टेंट चर्च को माने वाले मत के हैं, अचानक से मदर टेरेसा की संस्था के अनाथालयों में अनाथ बच्चों की किल्लत हो गयी, बल्कि अनुपस्थिति हो गयी|

और असली कारण प्रोटेस्टेंट परिवार को बताया पर कैसे? अब यही पाखण्ड है! यही धोखेबाजी है| यह गन्दगी से भरा है|  कारण भी उन्हें इसलिए बताना पड़ता है क्योंकि बच्चे वहाँ थे अनाथालयों में| कैसे कहते कि अनाथ बच्चे नहीं हैं? उनकी तो हरदम प्रदर्शनी लगी रहती है वहाँ|

उन्होंने मुझे भी आमंत्रित किया है: आप किसी भी समय आ सकते हैं और आपका स्वागत है हमारे अनाथालय और हमारी संस्था देखने आने के लिए| उनका सदैव ही प्रदर्शन किया जाता है|

बल्कि, उस प्रोटेस्टेंट परिवार ने पहले ही एक अनाथ बच्चे का चुनाव कर लिया था| अतः वे कह नहीं पायीं ,” हमें खेद है, बच्चे नहीं हैं अनाथालय में”|

उन्होंने परिवार से कहा.” इन अनाथ बच्चों को रोमन कैथोलिक चर्च के रीति रिवाजों और विधि विधान के मुताबिक़ पाला पोसा गया है, और इनके मनोवैज्ञानिक विकास के लिए यह बहुत बुरा होगा अगर उन्हें इस परम्परा से अलग हटाया गया| आपको उन्हें गोद देने का असर उन पर यह पड़ेगा कि उनके विकास की गति  छिन्न भिन्न हो जायेगी| हम उन्हें आपको गोद नहीं दे सकते क्योंकि आप प्रोटेस्टेंट हैं|”

वही असली कारण था| और बच्चा गोद लेने का इच्छुक परिवार कोई मूर्ख नहीं था| पति यूरोपियन यूनिवर्सिटी में प्रोफसर है – और वह स्तब्ध रह गया, उसकी पत्नी स्तब्ध रह गयी| वे इतनी दूर से बच्चा गोद लेने आए थे पर उन्हें इंकार कर दिया गया क्योंकि वे प्रोटेस्टेंट थे| यदि उन्होंने आवेदन पत्र में ‘कैथोलिक’ लिखा होता तो उन्हें तुरंत बच्चा मिल जाता| परिवार

एक और बात समझ लेने की है : ये बच्चे मूलभूत रूप से हिंदू हैं| अगर मदर टेरेसा को इन बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास और हित की इतनी चिंता है तो इन बच्चों का पालन पोषण हिंदू धर्म के अनुसार करना चाहिए| पर उन्हें कैथोलिक चर्च के अनुसार पाला गया है| और इस सबके बद उन्हें प्रोटेस्टेंट परिवार को गोद देना, और प्रोटेस्टेंट कोई बहुत अलग नहीं है कैथोलिक लोगों से| क्या अंतर है कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में? केवल कुछ मूर्खतापूर्ण अंतर… !

कुछ ही रोज पहले भारतीय संसद में धर्म की स्वतंत्रता के ऊपर एक बिल प्रस्तुत किया गया| बिल प्रस्तुत करने के पीछे उद्देश्य था कि किसी को भी अन्यों का धर्म बदलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए : जब तक कि कोई अपनी मर्जी से अपना धर्म छोड़ कर किसी अन्य धर्म को अपनाना न चाहे| और मदर टेरेसा पहली थीं जिन्होने इस बिल का विरोध किया| अब तक के अपने पूरे जीवन में उन्होंने कभी किसी बात का विरोध नहीं किया, यह पहली बार था और शायद अंतिम बार भी| उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और उनके और प्रधानमंत्री के बीच एक विवाद उत्पन्न हो गया| उन्होंने कहा,” यह बिल किसी भी हालत में पास नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से हमारे काम के खिलाफ जाता है| हम लोगों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और लोग केवल तभी बचाए जा सकते हैं जब वे रोमन कैथोलिक बन जाएँ”|

उन्होंने सारे देश में इतना हल्ला मचाया – और राजनेता तो वोट के एफिरक में रहते ही हैं, वे ईसाई मतदाताओं को नाराज करने का ख़तरा नहीं उठा सकते थे – सो बिल को गिर जाने दिया गया| बिल को भुला दिया गया…

यदि मदर टेरेसा सच में ही ईमानदार हैं और वे यह विश्वास रखती हैं कि किसी व्यक्ति का मत परिवर्तन करने से उसका मनोवैज्ञानिक ढांचा छिन्न भिन्न हो जाता है तो उन्हें मूलभूत रूप में मत-परिवर्तन के खिलाफ होना चाहिए| कोई अपनी इच्छा से अपना मत बदल ले तो बात अलग है|

अब उदाहरण के लिए तुम स्वयं मेरे पास आए हो, मैं तुम्हारे पास नहीं गया| मैं तो अपने दरवाजे से बाहर भी नहीं जाता…

मैं किसी के पास नहीं गया, तुम स्वयं मेरे पास आए हो| और मैं तुम्हे किसी और मत में परिवर्तित भी नहीं कर रहा हूँ| मैं यहाँ कोई विचारधारा भी स्थापित नहीं कर रहा हूँ| मैं तुम्हे कैथोलिक चर्च के catechism के एतारह धार्मिक शिक्षा की प्रश्नोत्तरी भी नहीं दे रहा,  किसी किस्म का कोई वाद नहीं दे रहा| मैं तो सिर्फ मौन हो सकने में सहायता प्रदान कर रहा हूँ| अब, मौन न तो ईसाई है, न मुस्लिम, और न ही हिंदू ; मौन तो केवल मौन है| मैं तो तुम्हे प्रेममयी होना सिखा रहा हूँ, प्रेम न ईसाई है न हिंदू, और न ही मुस्लिम| मैं तुम्हे जाग्रत होना सिखा रहा हूँ| चेतनता सिर्फ चेतनता ही है इसके अलावा और कुछ नहीं और यह किसी की बपौती नहीं है| चेतनता को ही मैं सच्ची धार्मिकता कहता हूँ|

मेरे लिए मदर टेरेसा और उनके जैसे लोग पाखंडी हैं, क्योंकि वे कहते एक बात हैं, पर यह सिर्फ बाहरी मुखौटा होता है क्योंकि वे करते दूसरी बात हैं| यह पूरा राजनीति का खेल है – संख्याबल की राजनीति|

और वे कहती हैं,” मेरे नाम के साथ आपने जो विशेषण इस्तेमाल किये हैं उनके लिए मैं आपको प्रेम भरे ह्रदय के साथ क्षमा करती हूँ”| पहले तो प्रेम को क्षमा की जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि प्रेम क्रोधित होता ही नहीं| किसी को क्षमा करने के लिए तुम्हारा पहले उस पर क्रोधित होना जरूरी है|

मैं मदर टेरेसा को क्षमा नहीं करता, क्योंकि मैं उनसे नाराज नहीं हूँ| मैं उन्हें क्षमा क्यों करूँ? वे भीतर से नाराज होंगीं…| इसीलिये मैं तुमको इन बातों पर ध्यान लगाने के लिए कहना चाहता हूँ| कहते हैं, बुद्ध ने कभी किसी को क्षमा नहीं किया, क्योंकि साधारण सी बात है कि वे किसी से कभी भी नाराज ही नहीं हुए| क्रोधित हुए बिना तुम कैसे किसी को क्षमा कर सकते हो? यह असंभव बात है| वे क्रोधित हुए होंगीं| इसी को मैं अचेतनता कहता हूँ, उन्हें इस बात का बोध ही नहीं कि वे असल में लिख क्या रही हैं…उन्हें भान भी नहीं है कि मैं उनके पत्र के साथ क्या करने वाला हूँ!

वे कहती हैं,” ‘मैं महान प्रेम के साथ आपको क्षमा करती हूँ’ – जैसे कि प्रेम भी छोटा और महान होता है| प्रेम तो प्रेम है, यह न तो तुच्छ हो सकता है और न ही महान| तुम्हे क्या लगता है कि प्रेम गणनात्मक है? यह कोई मापने वाली मुद्रा है?- एक किलो प्रेम, दो किलो प्रेम| कितने किलो का प्रेम महान प्रेम हो जाता है? या कि टनों प्रेम चाहिए?

प्रेम गणनात्मक नहीं वरन गुणात्मक है और गुणात्मक को मापा नहीं जा सकता| न यह गौण है न ही महान| अगर कोई तुमसे कहे, “ मैं तुमसे बड़ा महान प्रेम करता हूँ|” तो सावधान हो जाना| प्रेम तो बस प्रेम है, न उससे कम न उससे ज्यादा|

और मैंने कौन सा अपराध किया है कि वे मुझे क्षमादान दे रही हैं? कैथोलिक्स की मूर्खतापूर्ण पुरानी परम्परा- और वे क्षमा करे चली जाती हैं! मैंने तो किसी अपराध को स्वीकार नहीं किया फिर उन्हें मुझे क्यों क्षमा करना चाहिए?

मैं इस्तेमाल किये गये विशेषणों पर कायम हूँ, बल्कि मैं कुछ और विशेषण उनके नाम के साथ जोड़ना पसंद करूँगा – कि वे मंद और औसत बुद्धि की मालकिन हैं, बेतुकी हैं| और अगर किसी को क्षमा ही करना है तो उन्हे ही क्षमा किया जाना चाहिए क्योंकि वे एक बहुत बड़ा पाप कर रही हैं| अपने पत्र में वे कहती हैं,” मैं गोद लेने की परम्परा को अपना आकार गर्भपात के पाप से लड़ रही हूँ”| अब आबादी के बढते स्तर से त्रस्त काल में गर्भपात पाप नहीं है बल्कि सहायक है आबादी नियंत्रित रखने में| और अगर गर्भपात पाप है तो पोलोक पोप और मदर टेरेसा और उनके संगठन उसके लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि ये लोग गर्भ-निरोधक संसाधनों के खिलाफ हैं, वे जन्म दर नियंत्रित करने के हर तरीके के खिलाफ हैं, वे गर्भ-निरोधक पिल्स के खिलाफ हैं| असल में यही वे लोग हैं जो गर्भपात के लिए जिम्मेदार हैं| गर्भपात की स्थिति लाने के सबसे बड़े कारण ऐसे लोग ही हैं| मैं इन्हे बहुत बड़ा अपराधी मानता हूँ!

बढ़ती आबादी से ग्रस्त धरती पर जहां लोग भूख से मर रहे हों, वहाँ गर्भ-निरोधक पिल का विरोध करना अक्षम्य है| यह पिल आधुनिक विज्ञान का अक बहुत बड़ा तोहफा है आज के मानव के लिए| यह पिल धरती को सुखी बनाने में सहायता कर सकती है|

मैं गरीब लोगों की सेवा नहीं करना चाहता, मैं उनकी मैं गरीबी को समाप्त करके उन्हें समर्थ बनाना चाहूँगा| बहुत हो चुकीं ऐसी बेतुकी बातें| मेरी रूचि उन्हें गरीब बनाए रखने में नहीं है जिससे कि मैं उनकी सेवा करके लोगों की निगाह में पुण्य कमाऊं| उनकी गरीबी दूर होना मेरे लिए ज्यादा आनंद का विषय है| दस हजार सालों से मूर्ख गरीब लोगों की सेवा करते आए हैं पर इससे कुछ नहीं बदला| अब हमारे पास समर्थ टैक्नोलौजी हैं जिससे हम गरीबी समाप्त करने में सफलता पा सकें|

तो अगर किसी को क्षमा किया जाना चाहिए तो इसके पात्र ये लोग हैं| पोप, मदर टेरेसा, आदि इत्यादी लोगों को क्षमा किया जाना चाहिए| ये लोग अपराधी हैं पर इनका अपराध देखने समझने के लिए तुम्हे बहुत बड़ी मेधा और सूक्ष्म बुद्धि चाहिए|

और ज़रा इनका अहंकार देखिये, दूसरों से बड़ा होने का अहं| वे कहती हैं,”मैं तुम्हे क्षमा करती हूँ, मुझे तुम्हारे लिए बड़ा खेद है”| और वे प्रार्थना करती हैं,” ईश्वर की अनुकम्पा आपके साथ हो और आपका ह्रदय प्रेम से भर जाए”|

बकवास है यह सब!

मैं किसी ऐसे ईश्वर में विश्वास नहीं करता जो मानव जैसा होगा, जब ऐसा ईश्वर है ही नहीं तो वह कृपा कैसे करेगा मुझ पर या किसी और पर? ईश्वरत्व को केवल महसूस किया जा सकता है, ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है जिसे पाया जा सके या जीता जा सके| यह तुम्हारी ही शुद्धतम चेतनता है| और ईश्वर को मुझ पर कृपा क्यों करनी चाहिए? मैं ही तुम्हारी कल्पना के सारे ईश्वरों पर कृपा बरसा सकता हूँ| मुझे किसी की कृपा के लिए प्रार्थना क्यों करनी चाहिए? मैं पूर्ण आनंद में हूँ मुझे किसी कृपा की आवश्यकता है ही नहीं| मुझे विश्वास ही नहीं है कि कहीं कोई ईश्वर है| मैंने तो हर जगह देख लिया मुझे कहीं ईश्वर के होने के लक्षण नजर नहीं आए| यह ईश्वर केवल सत्य से अंजान लोगों के दिमाग में वास करता है| ध्यान रखना मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर मैं आस्तिक भी नहीं हूँ|

ईश्वर मेरे लिए कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक उपस्थिति है, जिसे केवल ध्यान की उच्चतम और सबसे गहरी अवस्था में ही महसूस किया जा सकता है| उन्ही क्षणों में तुम्हे सारे अस्तित्व में बहता ईश्वरत्व महसूस होता है| कोई ईश्वर कहीं नहीं है लेकिन ईश्वरत्व है!

मैं गौतम बुद्ध के बारे में कहे गये H. G. Wells के बयान को प्रेम करता हूँ| उसने कहा था,” गौतम बुद्ध सबसे बड़े ईश्वररहित व्यक्ति हैं लेकिन साथ ही वे सबसे बड़े ईश्वरीय व्यक्ति हैं|

यही बात तुम मेरे बारे में कह सकते हो: मैं इश्वर्राहित व्यक्ति हूँ लेकिन मैं ईश्वरीयता को जानता हूँ|

ईश्वरीयता एक सुगंध जैसी है, परम आनंद का अनुभव, परम स्वतंत्रता का अनुभव| तुम ईश्वरीयता के सामने प्रार्थना नहीं कर सकते| तुम इसका चित्र नहीं बना सकते| तुम यह नहीं कह सकते – कि ईश्वर तुम्हारा भला करे- और ऐसा तो खास तौर पर नहीं कह सकते – कि ईश्वर की कृपा तुम्हारे साथ रहें पूरे 1981 के दौरान! तब 1982 का क्या होगा?

महान साहस! महान साझेदारी! ऐसी उदारता!

“…और तुम्हारा ह्रदय प्रेम से भर जाए”| मेरा ह्रदय प्रेम के अतिरेक से पहले ही भरा हुआ है| इसमें किसी और के प्रेम के लिए जगह बची ही नहीं| और मेरा ह्रदय किसी और के प्रेम से क्यों भरे? उधार का प्रेम किसी काम का नहीं| ह्रदय की अपनी सुगंध होती है|

लेकिन इस तरह की बकवास को बहुत धार्मिक माना जाता है| वे इस आशा से यह सब लिख रही हैं कि मैं उन्हें बहुत बड़ी धार्मिक मानूंगा| लेकिन जो मैं देख पा रहा हूँ वे एक बेहद साधारण, औसत इंसान हैं जो कि आप कहीं भी पा सकते हैं| औसत लोगों से अटी पड़ी है धरती|

मैं उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारता रहा हूँ पर मुझे उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारना बंद करना चाहिए क्योंकि हालांकि मैं कतई सज्जन नहीं हूँ पर मुझे समुचित जवाब तो देना ही चाहिए| उन्होंने मुझे लिखा है- मि. रजनीश, तो अब से मुझे भी उन्हें मिस टेरेसा कह कर संबोधित करना चाहिए| यही सज्जनता भरा व्यवहार होगा|

अहंकार पिछले दरवाजे से आ जाता है| इसे बाहर निकाल फेंकने का प्रयत्न मत करो|

कलकत्ते से मुझे एक न्यूज-कटिंग मिली है| पत्रकार ने बताया कि वह मदर टेरेसा के बारे में मेरे बयान – कि वे बेतुकी हैं- की कटिंग लेकर मदर टेरेसा के पास गया और वे कटिंग देखते ही गुस्से में आग बबूला हो गयीं और उन्होंने कटिंग फाड़ कर फेंक दी| वे इतनी क्रोधित थीं कि कोई बयान देने के लिए तैयार नहीं हुईं| पर बयान तो उन्होने दे दिया- कटिंग को फाड़ कर|

पत्रकार ने कहा,” मैं तो हैरान हो गया उनका बर्ताव देखकर| मैंने उनसे कहा कि कटिंग तो मेरी थी और मैं तो उस बयान पर उनकी प्रतिक्रिया जानने उनके पास गया था”|

और ये लोग समझते हैं कि वे धार्मिक हैं| वास्तव में कटिंग फाड़ कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मैंने जो कुछ उनके बारे में कहा था वह सही था : कि वे औसत और बेतुकी हैं| अब कटिंग फाड़ना एक बेतुकी बात है|

अब मुझे तो दुनिया भर से इतने ज्यादा कॉम्प्लीमेंट्स – “इनवर्टेड कौमाज़” वाले- मिलते हैं कि अगर मैं उन सबको फाड़ने लग जाऊं तो मेरी तो अच्छी खासी एक्सरसाइज इसी हरकत में हो जाए और तुम्हे पता ही है एक्सरसाइज मुझे कितनी नापसंद है|

 

(अंग्रेजी प्रवचन से अनुवादित)

फ़रवरी 25, 2015

किसान की पगड़ी बचाने का यह आखिरी मौका है…शायद ! (योगेन्द्र यादव)

बहुत दिनों बाद किसान खबरों की सुर्खियों में है. सियासी दांव पेंच, वर्ल्ड कप की हार-जीत और शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव के मोहपाश में बंधे मीडिया ने मानो एक-दो दिन के लिए किसान दिवस मनाने का फैसला ले लिया है. संसद में गतिरोध,बजट का सन्दर्भ, दिल्ली की हार के बाद मोदी के पैंतरे और फिर अन्ना हजारे. इन तमाम बातों से मीडिया को किसानों का दुःख-दर्द देखने की फुर्सत मिली है.

धीरे-धीरे किसान, खेती और गाँव देश के मानस पटल से ओझल होते जा रहे हैं. देश के कर्णधार, नीतियों के सूत्रधार और बुद्धिजीवी, सब मान चुके हैं कि देश के भविष्य में किसान, खेती और गाँव का कोई भविष्य नहीं है. इसलिए हमारे भविष्य की योजनाओं में ‘स्मार्ट सिटी’ है, सूचना प्रौद्योगिकी है, फैक्ट्रियां और मॉल हैं, लेकिन गाँव-देहात नहीं है. अगर कुछ है तो बस खेती की जमीन जिससे किसान को बेदखल करके यह सब सपने साकार किए जाने हैं. किसान खेती और गाँव के लिए एक अलिखित योजना है इस देश में. गाँव या तो उजड़ेंगे या फिर शहरों के बीच दड़बों में बंद हो जायेंगे. खेती धीरे धीरे काश्तकार के हाथ से निकलकर बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथ जायेगी. किसान शहरों की ओर पलायन करेगा, दिहाड़ी का मजदूर बनेगा. इस अलिखित योजना को हर कोई समझता है, बस मुंह से बोलता नहीं. ऐसे में किसान की व्यथा की खबर बूँद बूँद रिसती रहती है, सुर्ख़ियों में नहीं अखबार के अन्दर के पन्नो में किसी हाशिये पर पडी रहती है.

ऐसी ही एक खबर पिछले हफ्ते छपी. भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि उसके लिए फसलों के दाम को किसान की लागत से ड्योढ़ा करना संभव नहीं है. किसानों की अवस्था पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए दायर एक याचिका पर सरकार ने यह जवाब दिया. सरकार ने कहा कि किसान को लागत पर 50 फ़ीसदी मुनाफा देने से खाद्यान्न बहुत मंहगे हो जायेंगे. इसे सरकार के सामान्य जवाब की तरह देख कर नज़रंदाज़ कर दिया गया. असली बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया. मीडिया ने यह नहीं बताया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना भारतीय जनता पार्टी का चुनावी वादा था. लोक सभा चुनाव और हरियाणा विधान सभा चुनाव के घोषणापत्र में बीजेपी ने लिखकर वादा किया था कि किसानो के लिए फसल की उनकी लागत के ऊपर 50 फ़ीसदी मुनाफा जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जायेगा. बीजेपी चुनाव जीत गयी, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा में इस वादे को भुला दिया गया और सरकार की बेशर्मी देखिए कि उसने भविष्य में भी ऐसा कुछ करने से इनकार कर दिया है. मामला किसान का है इसलिए इस इनकार की खबरों में सुर्खियां नहीं बनीं.

उधर हरियाणा सरकार ने भी गुपचुप किसानों को एक बड़ा झटका दिया, लेकिन इसकी कोई चर्चा नहीं हुई. सारे देश में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर बहस हो रही थी. अरुण जेटली कह रहे थे कि अध्यादेश में और कुछ भी बदलाव किया गया हो,कम से कम मुआवजे की रकम घटायी नहीं गयी है. लेकिन हरियाणा की बीजेपी सरकार 4 दिसंबर को अधिग्रहण का मुआवजा आधा कर चुकी थी. सन २०१३ के नए अधिग्रहण कानून में कहा गया था कि मुआवजा तय करते समय जमीन की कीमत पहले की तरह कलेक्टर रेट या पुरानी रजिस्ट्री के आधार पर आंकी जायेगी. ग्रामीण इलाकों में इस कीमत को दो से गुणा किया जा सकेगा. फिर जो राशि बनेगी उसमें उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यानि अगर जमीन का सरकारी दाम 20 लाख रुपये है तो किसान को कुल मिलाकर 80 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन हरियाणा सरकार ने नए नियम बनाकर दाम को दुगना करने की बजाय य़थावत रखा. यानि हरियाणा में किसान को 80 लाख के बजाय 40 लाख मिलेंगे.

इतना बड़ा फैसला हो गया लेकिन कोई पूरा सच बताने को तैयार नहीं है. हरियाणा के मुख्य- मंत्री का दफ्तर कह रहा है कि यह फैसला औद्योगीकरण के लिए जरूरी था, लेकिन खुद खट्टर जी कह रहे हैं की मुआवजा कम हुआ ही नहीं! हरियाणा से चुने गए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बीरेंद्र सिंह कह रहे हैं कि उनके रहते मुआवज़े को चार गुणा से कम कोई कर ही नहीं सकता! इधर हरियाणा के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार अधिग्रहण के पुराने मामलों में भी 100 फ़ीसदी सोलेशियम देगी. लेकिन ख्ट्टर साहब की सरकार सिरसा में इसी हफ्ते होने वाले अधिग्रहण में सिर्फ 30 फीसद सोलेशियम देने का आदेश जारी कर रही है!

यही किसान-राजनीति की त्रासदी है. किसान की खबर हाशिये पर दबी है, किसान की विचारधारा टुकड़ों में बंटी है, किसान आन्दोलन खंड- खंड में बिखरा हुआ है| इसलिए, किसान की राजनीति ऐसे चौधरियों के कब्जे में है जो उसका वोट डकारकर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं लेकिन किसान-हित की जगह बिल्डरों, उद्योग और व्यापारियों के हित में काम करते हैं|

आज देश को एक नई किसान-राजनीति की जरूरत है| आज किसानी घाटे का धंधा बन चुकी है| किसान के पास न तो आमदनी है, न ही अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के साधन| ले दे कर उसके उसके पास तीन ही चीजें बची हैं- पाँव के नीचे जमीं का टुकड़ा, उंगली में वोट देने की ताकत और सर पर बेवजह शान की प्रतीक पगड़ी| अपनी पगड़ी की आन को बनाये रखने के लिए किसान को वोट की ताकत का इस्तेमाल कर अपनी जमीं बचानी होगी| इसलिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ चल रहा आन्दोलन किसान राजनीति को बदलने का बहुत बड़ा मौका है| यह मौका है किसान आन्दोलन को पुराने चौधरियों की गिरफ्त से बाहर निकाल कर भविष्य के सवालों से जोड़ने का, एक नया नेतृत्व और एक नई दिशा देने का|

हां, शायद यह आखिरी मौका है|

(योगेन्द्र यादव)

साभार : एक्सप्रेस टुडे

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