मार्च 1, 2015

भूख – हरिओम पंवार

मेरा गीत चाँद है ना चांदनी है आजकल
ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल
मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
मैं गरीब के रुदन के आंसुओं की आग हूँ
भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ।

मेरा गीत आरती नहीं है राजपाट की
कसमसाती आत्मा है सोये राजघाट की
मेरा गीत झोपडी के दर्दों की जुबान है
भुखमरी का आइना है आँसू का बयान है
भावना का ज्वार भाटा जिए जा रहा हूँ मैं
क्रोध वाले आँसुओं को पिए जा रहा हूँ मैं
मेरा होश खो गया है लोहू के उबाल में
कैदी होकर रह गया हूँ मैं इसी सवाल में
आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को
नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को।

सोचकर ये शोक शर्म से भरा हुआ हूँ मैं
और अपने काव्य धर्म से डरा हुआ हूँ मैं
मैं स्वयम् को आज गुनहगार पाने लगा हूँ
इसलिये मैं भुखमरी के गीत गाने लगा हूँ
गा रहा हूँ इसलिए कि इंकलाब ला सकूं।
झोपडी के अंधेरों में आफताब ला सकूं।।

इसीलिए देशी औ विदेशी मूल भूलकर
जो अतीत में हुई है भूल, भूल-भूल कर
पंचतारा पद्धति का पंथ रोक टोक कर
वैभवी विलासिता को एक साल रोक कर
मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए
झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए

मेहरबानों भूख की व्यथा कथा सुनाऊंगा
महज तालियों के लिए गीत नहीं गाऊंगा
चाहे आप सोचते हो ये विषय फिजूल है
किंतु देश का भविष्य ही मेरा उसूल है
आप ऐसा सोचते है तो भी बेकसूर हैं
क्योकिं आप भुखमरी की त्रासदी से दूर हैं

आपने देखी नहीं है भूखे पेट की तड़प
काल देवता से भूखे तन के प्राण की झड़प
मैंने ऐसे बचपनों की दास्तान कही है
जहाँ माँ की सूखी छातियों में दूध नहीं है
यहाँ गरीबी की कोई सीमा रेखा ही नहीं
लाखों बच्चे हैं जिन्होंने दूध देखा ही नहीं
शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते हैं वे
कुत्ते जिसे चाट चुके झूठन चाटते हैं वे

भूखा बच्चा सो रहा है आसमान ओढ़कर
माँ रोटी कमा रही है पत्थरों को तोड़कर
जिनके पाँव नंगे हैं लिबास तार-तार हैं
जिनकी साँस-साँस साहुकारों की उधार है
जिनके प्राण बिन दवाई मृत्यु की कगार हैं
आत्महत्या कर रहे हैं भूख के शिकार हैं

बेटियां जो शर्मो-हया होती हैं जहान की
भूख ने तोड़ा तो वस्तु बन बैठी दुकान की
भूख आस्थाओं का स्वरूप बेच देती है
निर्धनों की बेटियों का रूप बेच देती है
भूख कभी-कभी ऐसे दांव-पेंच देती है
सिर्फ दो हजार में माँ बेटा बेच देती है

भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देती है
आन-बान-शान का गुमान तोड़ देती है
भूख सुदामाओं का भी मान तोड़ देती है
महाराणा प्रताप की भी आन तोड़ देती है
भूख तो हुजूर सारा नूर छीन लेती है
मजूरन की मांग का सिन्दूर छीन लेती है

किसी-किसी मौत पर धर्म-कर्म भी रोता है
क्योंकि क्रिया कर्म का भी पैसा नहीं होता है
घर वाले गरीब आँसू गम सहेज लेते हैं
बिना दाह संस्कार मुर्दा बेच देते हैं
थूक कर धिक्कारता हूँ मैं ऐसे विकास को
जो कफ़न भी दे ना सके गरीबों की लाश को।

कहीं-कहीं गोदामो में गेहूं सड़ा हुआ है
कहीं दाने-दाने का अकाल पड़ा हुआ है
झुग्गी-झोपड़ी में भूखे बच्चे बिलबिलाते हैं
जेलों में आतंकियों को बिरयानी खिलाते हैं
पूजा पाठ हो रहे हैं धन्ना सेठों के लिए
कोई यज्ञ हुआ नहीं भूखे पेटों के लिए

कोई सुबह का उजाला रैन बना देता है
कोई चमत्कार स्वर्ण चैन बना देता है
कोई स्वर्ग जाने की भी दे रहा है बूटियां
कोई हवा से निकाल देता है अंगूठियां
पर कोई गरीब की लंगोटी न बना सका
कभी कोई साधू बाबा रोटी न बना सका

भूख का सताया मन प्राण बीन लेता है
राजाओं से तख्त और ताज छीन लेता है
भूख जहाँ बागी होना ठानेगी अवाम की
मुँह की रोटी छीन लेगी देश के निजाम की

देश में इससे बड़ा कोई सवाल होगा क्या ?
भूख से भी बड़ा कोई महाकाल होगा क्या ?
फिर भी इस सवाल पर कोई नहीं हुंकारता
कहीं अर्जुन का गांडीव भी नहीं टंकारता
कोई भीष्म प्रतिज्ञा की भाषा नहीं बोलता
कहीं कोई चाणक्य भी चोटी नहीं खोलता

इस सवाल पर कोई कहीं क्यों नहीं थूकता।
कहीं कोई कृष्ण पाञ्चजन्य नहीं फूंकता।।

भूख का निदान झूठे वायदों में नहीं है
सिर्फ पूंजीवादियों के फायदों में नहीं है
भूख का निदान जादू टोनों में भी नहीं है
दक्षिण और वामपंथ दोनों में भी नहीं है
भूख का निदान कर्णधारों से नहीं हुआ
गरीबी हटाओ जैसे नारों से नहीं हुआ

भूख का निदान प्रशासन का पहला कर्म है
गरीबों की देखभाल सिंहासन का धर्म है
इस धर्म की पालना में जिस किसी से चूक हो
उसके साथ मुजरिमों के जैसा ही सुलूक हो

भूख से कोई मरे ये हत्या के समान है
हत्यारों के लिए मृत्युदण्ड का विधान है
कानूनी किताबों में सुधार होना चाहिए
मौत का किसी को जिम्मेदार होना चाहिए

भूखों के लिए नया कानून मांगता हूँ मैं
समर्थन में जनता का जुनून मांगता हूँ मैं
खुदकशी या मौत का जब भुखमरी आधार हो
उस जिले का जिलाधीश सीधा जिम्मेदार हो
वहां का एमएलए, एमपी भी गुनहगार है
क्योंकि ये रहनुमा चुना हुआ पहरेदार है
चाहे नेता अफसरों की लॉबी आज क्रुद्ध हो
हत्या का मुकद्दमा इन्ही तीनों के विरुद्ध हो

अब केवल कानून व्यवस्था को टोक सकता है
भुखमरी से मौत एक दिन में रोक सकता है
आज से ही संविधान में विधान कीजिये।
एक दो कलक्टरों को फाँसी टांग दीजिये।।
डॉ. हरिओम पंवार

फ़रवरी 26, 2015

ओशो : मदर टेरेसा और उनके कार्यों का विश्लेषण

Osho kidमदर टेरेसा को नोबल पुरस्कार मिलने पर ओशो ने मदर टेरेसा के कार्यों का विश्लेषण किया था, जिससे मदर टेरेसा और उनके समर्थक नाराज हो गये थे| मदर ने दिसम्बर 1980 के दिसंबर माह के अंत में ओशो को पत्र लिखा| उस पर ओशो का प्रवचन :-

राजनेता और पादरी हमेशा से मनुष्यों को बांटने की साजिश करते आए हैं| राजनेता बाह्य जगत पर राज जमाने की कोशिश करता है और पादरी मनुष्य के अंदुरनी जगत पर|   इन् दोनों ने मानवता के खिलाफ गहरी साजिशें मिलकर की हैं| कई बार तो अपने अंजाने ही इन् लोगों ने ऐसे कार्य किये हैं| इन्हे खुद नहीं पता होता ये क्या कर रहे हैं| कई बार इनकी नियत नहीं होती गलत करने की पर चेतना से रहित उनके दिमाग क्या सुझा सकते हैं?

अभी हाल में मदर टेरेसा ने मुझे एक पत्र लिख भेजा| मुझे उनके पत्र की गंभीरता पर कुछ नहीं कहना,  उन्होंने निष्ठा से भरे शब्दों से पत्र लिखा है, पर यह चेतना रहित दिमाग की उपज है| उन्हें स्वयं नहीं ज्ञात है कि वे क्या लिख रही हैं| उनका लिखना यांत्रिक है, जैसे रोबोट ने लिख दिया हो|

वे लिखती हैं,” मुझे अभी आपके भाषण की कटिंग मिली| मुझे आपके लिए बेहद खेद हुआ कि आप ने ऐसा कहा (सन्दर्भ – नोबल पुरस्कार)| आपने मेरे नाम के साथ जो विशेषण इस्तेमाल किये उनके लिए मैं पूरे प्रेम से आपको क्षमा करती हूँ|”

वे मेरे प्रति खेद महसूस कर रही हैं…मुझे उनका पत्र पढकर आनंद आया! उन्होंने मेरे दवारा उपयोग में लाये गये विशेषणों को समझा ही नहीं| लेकिन वे चेतन नहीं हैं वरना वे अपने प्रति खेद महसूस करतीं मेरे प्रति नहीं|

उन्होंने मेरे भाषण की कटिंग भी अपने पत्र के साथ भेजी है मैंने जो विशेषण इस्तेमाल किये थे, वे थे –  धोखेबाज ( deceiver), कपटी (charlatan) और पाखंडी या ढोंगी (hypocrite)….

मैंने उनकी आलोचना की थी और कहा था कि उन्हें नोबल पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए था| और इस बात को उन्होंने अन्यथा ले लिया| अपने पत्र में वे लिखती हैं “सन्दर्भ : नोबल पुरस्कार”|

यह आदमी, नोबल, दुनिया के सबसे बड़े अपराधियों में से एक था| पहला विश्वयुद्ध उसके हथियारों से लड़ा गया था, वह हथियारों का बहुत बड़ा निर्माता था…

मदर टेरेसा नोबल पुरस्कार को मना नहीं कर सकीं| प्रशंसा पाने की चाह, सारे विश्व में सम्मान पाने की चाह, नोबल पुरस्कार तुम्हे सम्मान दिलवाता है, सो उन्होंने पुरस्कार सहर्ष स्वीकार किया…

इसलिए मैंने मदर टेरेसा जैसे व्यक्तियों को धोखेबाज (deceivers) कहा| वे जानबूझ धोखा नहीं देते, निश्चित ही उनकी नियत धोखा देने की नहीं है, लेकिन यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, अंतिम परिणाम स्पष्ट है| ऐसे लोग समाज में लुब्रीकेंट का कार्य करते हैं ताकि समाज के पहिये, शोषण का पहिया, अत्याचार का पहिया यूँ ही आसानी से घूमता रहे| ये लोग न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी धोखा दे रहे हैं|

और मैं ऐसे लोगों को कपटी (charlatans) भी कहता हूँ, क्योंकि एक सच्चा धार्मिक आदमी, जीसस जैसा आदमी, नोबल पुरस्कार पायेगा?  असंभव है यह! क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि सुकरात को नोबल पुरस्कार दिया जाए, या कि अल-हिलाज मंसूर को इस पुरस्कार से नवाजे सत्ता? अगर जीसस को नोबल नहीं मिल सकता, और सुकरात को नोबल नहीं मिल सकता, और ये लोग सच्चे धार्मिक, चेतन मनुष्य हैं, तब मदर टेरेसा कौन हैं? …

सच्चा धार्मिक व्यक्ति विद्रोही होता है, समाज उसकी आलोचना करता है, निंदा करता है|जीसस को समाज ने अपराधी करार दिया और मदर टेरेसा को संत कह रहा है| यह बात विचारणीय है, अगर मदर टेरेसा सही हैं तो जीसस अपराधी हैं और अगर जीसस सही हैं तो मदर टेरेसा एक कपटी मात्र हैं उससे ज्यादा कुछ नहीं| कपटी लोगों को समाज बहुत सराहता है क्योंकि ये लोग समाज के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, समाज की जैसी भ्रष्ट व्यवस्था चली आ रहे एहोती है उसे वैसे ही चलने देने में ये लोग बड़ी भूमिका निभाते हैं|

Mother Teresa मैंने जो भी विशेषण इस्तेमाल किये वे सोच समझ कर इस्तेमाल किये| मैंने बिना विचारे कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करता| और मैंने पाखंडी या ढोंगी (hypocrites) शब्द का इस्तेमाल किया| ऐसे लोग पाखंडी हैं क्योंकि इनकी आधारभूत जीवन शैली बंटी हुयी है, सतह पर एक रूप और अंदर कुछ और रूप|

वे लिखती हैं,” ‘प्रोटेस्टेंट परिवार को बच्चा गोद लेने से इसलिए नहीं रोका गया था कि वे प्रोटेस्टेंट थे बल्कि इसलिए कि उस समय हमारे पास कोई बच्चा नहीं था जो हम उन्हें गोद दे सकते थे”|

अब उन्हें नोबल पुरस्कार इसलिए दिया गया है कि वे हजारों अनाथों की सहायता करती हैं और उनकी संस्था में हजारों अनाथालय हैं| अचानक उनके अनाथालय में एक भी बच्चा उपलब्ध नहीं रहता? और भारत में कभी ऐसा हो सकता है कि अनाथ बच्चों का अकाल पड़ जाए? भारतीय तो जितने चाहो उतने अनाथ बच्चे जन्मा सकते हैं बल्कि जितने तुम चाहो उससे भी कहीं ज्यादा!

और उस प्रोटेस्टेंट परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था| यदि एक भी अनाथ बच्चा उपलब्ध नहीं था और उनके सारे अनाथालय खाली हो गये थे तो मदर टेरेसा सात सौ ननों का क्या कर रही हैं? इन ननों का काम क्या है? सात सौ ननें? वे किसकी माताओं की भूमिका निभा रही हैं? एक भी अनाथ बच्चा नहीं – अजीब बात है! – और वो भी कलकत्ता में!  सड़क पर कहीं भी तुम्हे अनाथ बच्चे दिखाई दे जायेंगे – तुम्हे कूड़ेदान तक में बच्चे मिल सकते हैं| उन्हें सिर्फ बाहर देखने की जरुरत थी और उन्हें बहुत से अनाथ बच्चे मिल जाते| तुम आश्रम से बाहर जाकर देखना, अनाथ बच्चे मिल जायेंगें| तुम्हे खोजने की भी जरुरत नहीं, वे अपने आप आ जायेंगें!

अचानक उनके अनाथालय में अनाथ बच्चे नहीं मिलते|… और अगर उस परिवार को एकदम से इंकार किया जाता तब भी बात अलग हो जाती| लेकिन परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था, उनसे कहा गया था,”हाँ, आपको बच्चा मिल सकता है, आवेदन पत्र भर दीजिए”|  आवेदन पत्र भरा गया था| जब तक कि परिवार ने अपने सम्प्रदाय का नाम जाहिर नहीं किया था तब तक उनके लिए बच्चा उपलब्ध था पर जैसे ही उन्होने आवेदन पत्र में लिखा कि वे प्रोटेस्टेंट चर्च को माने वाले मत के हैं, अचानक से मदर टेरेसा की संस्था के अनाथालयों में अनाथ बच्चों की किल्लत हो गयी, बल्कि अनुपस्थिति हो गयी|

और असली कारण प्रोटेस्टेंट परिवार को बताया पर कैसे? अब यही पाखण्ड है! यही धोखेबाजी है| यह गन्दगी से भरा है|  कारण भी उन्हें इसलिए बताना पड़ता है क्योंकि बच्चे वहाँ थे अनाथालयों में| कैसे कहते कि अनाथ बच्चे नहीं हैं? उनकी तो हरदम प्रदर्शनी लगी रहती है वहाँ|

उन्होंने मुझे भी आमंत्रित किया है: आप किसी भी समय आ सकते हैं और आपका स्वागत है हमारे अनाथालय और हमारी संस्था देखने आने के लिए| उनका सदैव ही प्रदर्शन किया जाता है|

बल्कि, उस प्रोटेस्टेंट परिवार ने पहले ही एक अनाथ बच्चे का चुनाव कर लिया था| अतः वे कह नहीं पायीं ,” हमें खेद है, बच्चे नहीं हैं अनाथालय में”|

उन्होंने परिवार से कहा.” इन अनाथ बच्चों को रोमन कैथोलिक चर्च के रीति रिवाजों और विधि विधान के मुताबिक़ पाला पोसा गया है, और इनके मनोवैज्ञानिक विकास के लिए यह बहुत बुरा होगा अगर उन्हें इस परम्परा से अलग हटाया गया| आपको उन्हें गोद देने का असर उन पर यह पड़ेगा कि उनके विकास की गति  छिन्न भिन्न हो जायेगी| हम उन्हें आपको गोद नहीं दे सकते क्योंकि आप प्रोटेस्टेंट हैं|”

वही असली कारण था| और बच्चा गोद लेने का इच्छुक परिवार कोई मूर्ख नहीं था| पति यूरोपियन यूनिवर्सिटी में प्रोफसर है – और वह स्तब्ध रह गया, उसकी पत्नी स्तब्ध रह गयी| वे इतनी दूर से बच्चा गोद लेने आए थे पर उन्हें इंकार कर दिया गया क्योंकि वे प्रोटेस्टेंट थे| यदि उन्होंने आवेदन पत्र में ‘कैथोलिक’ लिखा होता तो उन्हें तुरंत बच्चा मिल जाता| परिवार

एक और बात समझ लेने की है : ये बच्चे मूलभूत रूप से हिंदू हैं| अगर मदर टेरेसा को इन बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास और हित की इतनी चिंता है तो इन बच्चों का पालन पोषण हिंदू धर्म के अनुसार करना चाहिए| पर उन्हें कैथोलिक चर्च के अनुसार पाला गया है| और इस सबके बद उन्हें प्रोटेस्टेंट परिवार को गोद देना, और प्रोटेस्टेंट कोई बहुत अलग नहीं है कैथोलिक लोगों से| क्या अंतर है कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में? केवल कुछ मूर्खतापूर्ण अंतर… !

कुछ ही रोज पहले भारतीय संसद में धर्म की स्वतंत्रता के ऊपर एक बिल प्रस्तुत किया गया| बिल प्रस्तुत करने के पीछे उद्देश्य था कि किसी को भी अन्यों का धर्म बदलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए : जब तक कि कोई अपनी मर्जी से अपना धर्म छोड़ कर किसी अन्य धर्म को अपनाना न चाहे| और मदर टेरेसा पहली थीं जिन्होने इस बिल का विरोध किया| अब तक के अपने पूरे जीवन में उन्होंने कभी किसी बात का विरोध नहीं किया, यह पहली बार था और शायद अंतिम बार भी| उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और उनके और प्रधानमंत्री के बीच एक विवाद उत्पन्न हो गया| उन्होंने कहा,” यह बिल किसी भी हालत में पास नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से हमारे काम के खिलाफ जाता है| हम लोगों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और लोग केवल तभी बचाए जा सकते हैं जब वे रोमन कैथोलिक बन जाएँ”|

उन्होंने सारे देश में इतना हल्ला मचाया – और राजनेता तो वोट के एफिरक में रहते ही हैं, वे ईसाई मतदाताओं को नाराज करने का ख़तरा नहीं उठा सकते थे – सो बिल को गिर जाने दिया गया| बिल को भुला दिया गया…

यदि मदर टेरेसा सच में ही ईमानदार हैं और वे यह विश्वास रखती हैं कि किसी व्यक्ति का मत परिवर्तन करने से उसका मनोवैज्ञानिक ढांचा छिन्न भिन्न हो जाता है तो उन्हें मूलभूत रूप में मत-परिवर्तन के खिलाफ होना चाहिए| कोई अपनी इच्छा से अपना मत बदल ले तो बात अलग है|

अब उदाहरण के लिए तुम स्वयं मेरे पास आए हो, मैं तुम्हारे पास नहीं गया| मैं तो अपने दरवाजे से बाहर भी नहीं जाता…

मैं किसी के पास नहीं गया, तुम स्वयं मेरे पास आए हो| और मैं तुम्हे किसी और मत में परिवर्तित भी नहीं कर रहा हूँ| मैं यहाँ कोई विचारधारा भी स्थापित नहीं कर रहा हूँ| मैं तुम्हे कैथोलिक चर्च के catechism के एतारह धार्मिक शिक्षा की प्रश्नोत्तरी भी नहीं दे रहा,  किसी किस्म का कोई वाद नहीं दे रहा| मैं तो सिर्फ मौन हो सकने में सहायता प्रदान कर रहा हूँ| अब, मौन न तो ईसाई है, न मुस्लिम, और न ही हिंदू ; मौन तो केवल मौन है| मैं तो तुम्हे प्रेममयी होना सिखा रहा हूँ, प्रेम न ईसाई है न हिंदू, और न ही मुस्लिम| मैं तुम्हे जाग्रत होना सिखा रहा हूँ| चेतनता सिर्फ चेतनता ही है इसके अलावा और कुछ नहीं और यह किसी की बपौती नहीं है| चेतनता को ही मैं सच्ची धार्मिकता कहता हूँ|

मेरे लिए मदर टेरेसा और उनके जैसे लोग पाखंडी हैं, क्योंकि वे कहते एक बात हैं, पर यह सिर्फ बाहरी मुखौटा होता है क्योंकि वे करते दूसरी बात हैं| यह पूरा राजनीति का खेल है – संख्याबल की राजनीति|

और वे कहती हैं,” मेरे नाम के साथ आपने जो विशेषण इस्तेमाल किये हैं उनके लिए मैं आपको प्रेम भरे ह्रदय के साथ क्षमा करती हूँ”| पहले तो प्रेम को क्षमा की जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि प्रेम क्रोधित होता ही नहीं| किसी को क्षमा करने के लिए तुम्हारा पहले उस पर क्रोधित होना जरूरी है|

मैं मदर टेरेसा को क्षमा नहीं करता, क्योंकि मैं उनसे नाराज नहीं हूँ| मैं उन्हें क्षमा क्यों करूँ? वे भीतर से नाराज होंगीं…| इसीलिये मैं तुमको इन बातों पर ध्यान लगाने के लिए कहना चाहता हूँ| कहते हैं, बुद्ध ने कभी किसी को क्षमा नहीं किया, क्योंकि साधारण सी बात है कि वे किसी से कभी भी नाराज ही नहीं हुए| क्रोधित हुए बिना तुम कैसे किसी को क्षमा कर सकते हो? यह असंभव बात है| वे क्रोधित हुए होंगीं| इसी को मैं अचेतनता कहता हूँ, उन्हें इस बात का बोध ही नहीं कि वे असल में लिख क्या रही हैं…उन्हें भान भी नहीं है कि मैं उनके पत्र के साथ क्या करने वाला हूँ!

वे कहती हैं,” ‘मैं महान प्रेम के साथ आपको क्षमा करती हूँ’ – जैसे कि प्रेम भी छोटा और महान होता है| प्रेम तो प्रेम है, यह न तो तुच्छ हो सकता है और न ही महान| तुम्हे क्या लगता है कि प्रेम गणनात्मक है? यह कोई मापने वाली मुद्रा है?- एक किलो प्रेम, दो किलो प्रेम| कितने किलो का प्रेम महान प्रेम हो जाता है? या कि टनों प्रेम चाहिए?

प्रेम गणनात्मक नहीं वरन गुणात्मक है और गुणात्मक को मापा नहीं जा सकता| न यह गौण है न ही महान| अगर कोई तुमसे कहे, “ मैं तुमसे बड़ा महान प्रेम करता हूँ|” तो सावधान हो जाना| प्रेम तो बस प्रेम है, न उससे कम न उससे ज्यादा|

और मैंने कौन सा अपराध किया है कि वे मुझे क्षमादान दे रही हैं? कैथोलिक्स की मूर्खतापूर्ण पुरानी परम्परा- और वे क्षमा करे चली जाती हैं! मैंने तो किसी अपराध को स्वीकार नहीं किया फिर उन्हें मुझे क्यों क्षमा करना चाहिए?

मैं इस्तेमाल किये गये विशेषणों पर कायम हूँ, बल्कि मैं कुछ और विशेषण उनके नाम के साथ जोड़ना पसंद करूँगा – कि वे मंद और औसत बुद्धि की मालकिन हैं, बेतुकी हैं| और अगर किसी को क्षमा ही करना है तो उन्हे ही क्षमा किया जाना चाहिए क्योंकि वे एक बहुत बड़ा पाप कर रही हैं| अपने पत्र में वे कहती हैं,” मैं गोद लेने की परम्परा को अपना आकार गर्भपात के पाप से लड़ रही हूँ”| अब आबादी के बढते स्तर से त्रस्त काल में गर्भपात पाप नहीं है बल्कि सहायक है आबादी नियंत्रित रखने में| और अगर गर्भपात पाप है तो पोलोक पोप और मदर टेरेसा और उनके संगठन उसके लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि ये लोग गर्भ-निरोधक संसाधनों के खिलाफ हैं, वे जन्म दर नियंत्रित करने के हर तरीके के खिलाफ हैं, वे गर्भ-निरोधक पिल्स के खिलाफ हैं| असल में यही वे लोग हैं जो गर्भपात के लिए जिम्मेदार हैं| गर्भपात की स्थिति लाने के सबसे बड़े कारण ऐसे लोग ही हैं| मैं इन्हे बहुत बड़ा अपराधी मानता हूँ!

बढ़ती आबादी से ग्रस्त धरती पर जहां लोग भूख से मर रहे हों, वहाँ गर्भ-निरोधक पिल का विरोध करना अक्षम्य है| यह पिल आधुनिक विज्ञान का अक बहुत बड़ा तोहफा है आज के मानव के लिए| यह पिल धरती को सुखी बनाने में सहायता कर सकती है|

मैं गरीब लोगों की सेवा नहीं करना चाहता, मैं उनकी मैं गरीबी को समाप्त करके उन्हें समर्थ बनाना चाहूँगा| बहुत हो चुकीं ऐसी बेतुकी बातें| मेरी रूचि उन्हें गरीब बनाए रखने में नहीं है जिससे कि मैं उनकी सेवा करके लोगों की निगाह में पुण्य कमाऊं| उनकी गरीबी दूर होना मेरे लिए ज्यादा आनंद का विषय है| दस हजार सालों से मूर्ख गरीब लोगों की सेवा करते आए हैं पर इससे कुछ नहीं बदला| अब हमारे पास समर्थ टैक्नोलौजी हैं जिससे हम गरीबी समाप्त करने में सफलता पा सकें|

तो अगर किसी को क्षमा किया जाना चाहिए तो इसके पात्र ये लोग हैं| पोप, मदर टेरेसा, आदि इत्यादी लोगों को क्षमा किया जाना चाहिए| ये लोग अपराधी हैं पर इनका अपराध देखने समझने के लिए तुम्हे बहुत बड़ी मेधा और सूक्ष्म बुद्धि चाहिए|

और ज़रा इनका अहंकार देखिये, दूसरों से बड़ा होने का अहं| वे कहती हैं,”मैं तुम्हे क्षमा करती हूँ, मुझे तुम्हारे लिए बड़ा खेद है”| और वे प्रार्थना करती हैं,” ईश्वर की अनुकम्पा आपके साथ हो और आपका ह्रदय प्रेम से भर जाए”|

बकवास है यह सब!

मैं किसी ऐसे ईश्वर में विश्वास नहीं करता जो मानव जैसा होगा, जब ऐसा ईश्वर है ही नहीं तो वह कृपा कैसे करेगा मुझ पर या किसी और पर? ईश्वरत्व को केवल महसूस किया जा सकता है, ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है जिसे पाया जा सके या जीता जा सके| यह तुम्हारी ही शुद्धतम चेतनता है| और ईश्वर को मुझ पर कृपा क्यों करनी चाहिए? मैं ही तुम्हारी कल्पना के सारे ईश्वरों पर कृपा बरसा सकता हूँ| मुझे किसी की कृपा के लिए प्रार्थना क्यों करनी चाहिए? मैं पूर्ण आनंद में हूँ मुझे किसी कृपा की आवश्यकता है ही नहीं| मुझे विश्वास ही नहीं है कि कहीं कोई ईश्वर है| मैंने तो हर जगह देख लिया मुझे कहीं ईश्वर के होने के लक्षण नजर नहीं आए| यह ईश्वर केवल सत्य से अंजान लोगों के दिमाग में वास करता है| ध्यान रखना मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर मैं आस्तिक भी नहीं हूँ|

ईश्वर मेरे लिए कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक उपस्थिति है, जिसे केवल ध्यान की उच्चतम और सबसे गहरी अवस्था में ही महसूस किया जा सकता है| उन्ही क्षणों में तुम्हे सारे अस्तित्व में बहता ईश्वरत्व महसूस होता है| कोई ईश्वर कहीं नहीं है लेकिन ईश्वरत्व है!

मैं गौतम बुद्ध के बारे में कहे गये H. G. Wells के बयान को प्रेम करता हूँ| उसने कहा था,” गौतम बुद्ध सबसे बड़े ईश्वररहित व्यक्ति हैं लेकिन साथ ही वे सबसे बड़े ईश्वरीय व्यक्ति हैं|

यही बात तुम मेरे बारे में कह सकते हो: मैं इश्वर्राहित व्यक्ति हूँ लेकिन मैं ईश्वरीयता को जानता हूँ|

ईश्वरीयता एक सुगंध जैसी है, परम आनंद का अनुभव, परम स्वतंत्रता का अनुभव| तुम ईश्वरीयता के सामने प्रार्थना नहीं कर सकते| तुम इसका चित्र नहीं बना सकते| तुम यह नहीं कह सकते – कि ईश्वर तुम्हारा भला करे- और ऐसा तो खास तौर पर नहीं कह सकते – कि ईश्वर की कृपा तुम्हारे साथ रहें पूरे 1981 के दौरान! तब 1982 का क्या होगा?

महान साहस! महान साझेदारी! ऐसी उदारता!

“…और तुम्हारा ह्रदय प्रेम से भर जाए”| मेरा ह्रदय प्रेम के अतिरेक से पहले ही भरा हुआ है| इसमें किसी और के प्रेम के लिए जगह बची ही नहीं| और मेरा ह्रदय किसी और के प्रेम से क्यों भरे? उधार का प्रेम किसी काम का नहीं| ह्रदय की अपनी सुगंध होती है|

लेकिन इस तरह की बकवास को बहुत धार्मिक माना जाता है| वे इस आशा से यह सब लिख रही हैं कि मैं उन्हें बहुत बड़ी धार्मिक मानूंगा| लेकिन जो मैं देख पा रहा हूँ वे एक बेहद साधारण, औसत इंसान हैं जो कि आप कहीं भी पा सकते हैं| औसत लोगों से अटी पड़ी है धरती|

मैं उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारता रहा हूँ पर मुझे उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारना बंद करना चाहिए क्योंकि हालांकि मैं कतई सज्जन नहीं हूँ पर मुझे समुचित जवाब तो देना ही चाहिए| उन्होंने मुझे लिखा है- मि. रजनीश, तो अब से मुझे भी उन्हें मिस टेरेसा कह कर संबोधित करना चाहिए| यही सज्जनता भरा व्यवहार होगा|

अहंकार पिछले दरवाजे से आ जाता है| इसे बाहर निकाल फेंकने का प्रयत्न मत करो|

कलकत्ते से मुझे एक न्यूज-कटिंग मिली है| पत्रकार ने बताया कि वह मदर टेरेसा के बारे में मेरे बयान – कि वे बेतुकी हैं- की कटिंग लेकर मदर टेरेसा के पास गया और वे कटिंग देखते ही गुस्से में आग बबूला हो गयीं और उन्होंने कटिंग फाड़ कर फेंक दी| वे इतनी क्रोधित थीं कि कोई बयान देने के लिए तैयार नहीं हुईं| पर बयान तो उन्होने दे दिया- कटिंग को फाड़ कर|

पत्रकार ने कहा,” मैं तो हैरान हो गया उनका बर्ताव देखकर| मैंने उनसे कहा कि कटिंग तो मेरी थी और मैं तो उस बयान पर उनकी प्रतिक्रिया जानने उनके पास गया था”|

और ये लोग समझते हैं कि वे धार्मिक हैं| वास्तव में कटिंग फाड़ कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मैंने जो कुछ उनके बारे में कहा था वह सही था : कि वे औसत और बेतुकी हैं| अब कटिंग फाड़ना एक बेतुकी बात है|

अब मुझे तो दुनिया भर से इतने ज्यादा कॉम्प्लीमेंट्स – “इनवर्टेड कौमाज़” वाले- मिलते हैं कि अगर मैं उन सबको फाड़ने लग जाऊं तो मेरी तो अच्छी खासी एक्सरसाइज इसी हरकत में हो जाए और तुम्हे पता ही है एक्सरसाइज मुझे कितनी नापसंद है|

 

(अंग्रेजी प्रवचन से अनुवादित)

फ़रवरी 25, 2015

किसान की पगड़ी बचाने का यह आखिरी मौका है…शायद ! (योगेन्द्र यादव)

बहुत दिनों बाद किसान खबरों की सुर्खियों में है. सियासी दांव पेंच, वर्ल्ड कप की हार-जीत और शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव के मोहपाश में बंधे मीडिया ने मानो एक-दो दिन के लिए किसान दिवस मनाने का फैसला ले लिया है. संसद में गतिरोध,बजट का सन्दर्भ, दिल्ली की हार के बाद मोदी के पैंतरे और फिर अन्ना हजारे. इन तमाम बातों से मीडिया को किसानों का दुःख-दर्द देखने की फुर्सत मिली है.

धीरे-धीरे किसान, खेती और गाँव देश के मानस पटल से ओझल होते जा रहे हैं. देश के कर्णधार, नीतियों के सूत्रधार और बुद्धिजीवी, सब मान चुके हैं कि देश के भविष्य में किसान, खेती और गाँव का कोई भविष्य नहीं है. इसलिए हमारे भविष्य की योजनाओं में ‘स्मार्ट सिटी’ है, सूचना प्रौद्योगिकी है, फैक्ट्रियां और मॉल हैं, लेकिन गाँव-देहात नहीं है. अगर कुछ है तो बस खेती की जमीन जिससे किसान को बेदखल करके यह सब सपने साकार किए जाने हैं. किसान खेती और गाँव के लिए एक अलिखित योजना है इस देश में. गाँव या तो उजड़ेंगे या फिर शहरों के बीच दड़बों में बंद हो जायेंगे. खेती धीरे धीरे काश्तकार के हाथ से निकलकर बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथ जायेगी. किसान शहरों की ओर पलायन करेगा, दिहाड़ी का मजदूर बनेगा. इस अलिखित योजना को हर कोई समझता है, बस मुंह से बोलता नहीं. ऐसे में किसान की व्यथा की खबर बूँद बूँद रिसती रहती है, सुर्ख़ियों में नहीं अखबार के अन्दर के पन्नो में किसी हाशिये पर पडी रहती है.

ऐसी ही एक खबर पिछले हफ्ते छपी. भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि उसके लिए फसलों के दाम को किसान की लागत से ड्योढ़ा करना संभव नहीं है. किसानों की अवस्था पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए दायर एक याचिका पर सरकार ने यह जवाब दिया. सरकार ने कहा कि किसान को लागत पर 50 फ़ीसदी मुनाफा देने से खाद्यान्न बहुत मंहगे हो जायेंगे. इसे सरकार के सामान्य जवाब की तरह देख कर नज़रंदाज़ कर दिया गया. असली बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया. मीडिया ने यह नहीं बताया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना भारतीय जनता पार्टी का चुनावी वादा था. लोक सभा चुनाव और हरियाणा विधान सभा चुनाव के घोषणापत्र में बीजेपी ने लिखकर वादा किया था कि किसानो के लिए फसल की उनकी लागत के ऊपर 50 फ़ीसदी मुनाफा जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जायेगा. बीजेपी चुनाव जीत गयी, न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा में इस वादे को भुला दिया गया और सरकार की बेशर्मी देखिए कि उसने भविष्य में भी ऐसा कुछ करने से इनकार कर दिया है. मामला किसान का है इसलिए इस इनकार की खबरों में सुर्खियां नहीं बनीं.

उधर हरियाणा सरकार ने भी गुपचुप किसानों को एक बड़ा झटका दिया, लेकिन इसकी कोई चर्चा नहीं हुई. सारे देश में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर बहस हो रही थी. अरुण जेटली कह रहे थे कि अध्यादेश में और कुछ भी बदलाव किया गया हो,कम से कम मुआवजे की रकम घटायी नहीं गयी है. लेकिन हरियाणा की बीजेपी सरकार 4 दिसंबर को अधिग्रहण का मुआवजा आधा कर चुकी थी. सन २०१३ के नए अधिग्रहण कानून में कहा गया था कि मुआवजा तय करते समय जमीन की कीमत पहले की तरह कलेक्टर रेट या पुरानी रजिस्ट्री के आधार पर आंकी जायेगी. ग्रामीण इलाकों में इस कीमत को दो से गुणा किया जा सकेगा. फिर जो राशि बनेगी उसमें उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यानि अगर जमीन का सरकारी दाम 20 लाख रुपये है तो किसान को कुल मिलाकर 80 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन हरियाणा सरकार ने नए नियम बनाकर दाम को दुगना करने की बजाय य़थावत रखा. यानि हरियाणा में किसान को 80 लाख के बजाय 40 लाख मिलेंगे.

इतना बड़ा फैसला हो गया लेकिन कोई पूरा सच बताने को तैयार नहीं है. हरियाणा के मुख्य- मंत्री का दफ्तर कह रहा है कि यह फैसला औद्योगीकरण के लिए जरूरी था, लेकिन खुद खट्टर जी कह रहे हैं की मुआवजा कम हुआ ही नहीं! हरियाणा से चुने गए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बीरेंद्र सिंह कह रहे हैं कि उनके रहते मुआवज़े को चार गुणा से कम कोई कर ही नहीं सकता! इधर हरियाणा के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार अधिग्रहण के पुराने मामलों में भी 100 फ़ीसदी सोलेशियम देगी. लेकिन ख्ट्टर साहब की सरकार सिरसा में इसी हफ्ते होने वाले अधिग्रहण में सिर्फ 30 फीसद सोलेशियम देने का आदेश जारी कर रही है!

यही किसान-राजनीति की त्रासदी है. किसान की खबर हाशिये पर दबी है, किसान की विचारधारा टुकड़ों में बंटी है, किसान आन्दोलन खंड- खंड में बिखरा हुआ है| इसलिए, किसान की राजनीति ऐसे चौधरियों के कब्जे में है जो उसका वोट डकारकर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं लेकिन किसान-हित की जगह बिल्डरों, उद्योग और व्यापारियों के हित में काम करते हैं|

आज देश को एक नई किसान-राजनीति की जरूरत है| आज किसानी घाटे का धंधा बन चुकी है| किसान के पास न तो आमदनी है, न ही अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के साधन| ले दे कर उसके उसके पास तीन ही चीजें बची हैं- पाँव के नीचे जमीं का टुकड़ा, उंगली में वोट देने की ताकत और सर पर बेवजह शान की प्रतीक पगड़ी| अपनी पगड़ी की आन को बनाये रखने के लिए किसान को वोट की ताकत का इस्तेमाल कर अपनी जमीं बचानी होगी| इसलिए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ चल रहा आन्दोलन किसान राजनीति को बदलने का बहुत बड़ा मौका है| यह मौका है किसान आन्दोलन को पुराने चौधरियों की गिरफ्त से बाहर निकाल कर भविष्य के सवालों से जोड़ने का, एक नया नेतृत्व और एक नई दिशा देने का|

हां, शायद यह आखिरी मौका है|

(योगेन्द्र यादव)

साभार : एक्सप्रेस टुडे

फ़रवरी 21, 2015

भूखा आदमी और ईश्वर

भूखे नेbhookh
ईश्वर से रोटी मांगी
ईश्वर ने कहा
पहले स्तुति गाओ
भूखे ने
गायी
ध्यान भूख में रहा
ईश्वर ने कहा
पापी हो तुम
भूखे ने सुना ईश्वर का कटाक्ष


ईश्वर ने फिर कहा
यही है तुम्हारे दुखो का कारण
इसीलिए भूख तुम्हारी नियति है


भूखे ने कहा
हमारा संयम हमारी भूख का कारण है ईश्वर
ईश्वर ने आँखे तरेरी
बोले अदब से बात करो
भूखे की इतनी हिम्मत!


भूखे ने डाल दिया ईश्वर की गर्दन पर हाथ
बोला
भूखा हिम्मत ही करता
तो ना तुम ईश्वर होते
ना मैं भूखा

(संकलन साभार – Arvind Thalor)

फ़रवरी 19, 2015

स्वाइन फ़्लू : लक्षण, रक्षा और उपचार

क्या है स्वाइन फ्लू

स्वाइन फ्लू श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी है, जो ए टाइप के इनफ्लुएंजा वायरस से होती है। यह वायरस एच1 एन1 के नाम से जाना जाता है और मौसमी फ्लू में भी यह वायरस सक्रिय होता है। 2009 में जो स्वाइन फ्लू हुआ था, उसके मुकाबले इस बार का स्वाइन फ्लू कम पावरफुल है, हालांकि उसके वायरस ने इस बार स्ट्रेन बदल लिया है यानी पिछली बार के वायरस से इस बार का वायरस अलग है।

कैसे फैलता है

जब आप खांसते या छींकते हैं तो हवा में या जमीन पर या जिस भी सतह पर थूक या मुंह और नाक से निकले द्रव कण गिरते हैं, वह वायरस की चपेट में आ जाता है। यह कण हवा के द्वारा या किसी के छूने से दूसरे व्यक्ति के शरीर में मुंह या नाक के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। मसलन, दरवाजे, फोन, कीबोर्ड या रिमोट कंट्रोल के जरिए भी यह वायरस फैल सकते हैं, अगर इन चीजों का इस्तेमाल किसी संक्रमित व्यक्ति ने किया हो।

शुरुआती लक्षण

- नाक का लगातार बहना, छींक आना, नाक जाम होना।

– मांसपेशियां में दर्द या अकड़न महसूस करना।

– सिर में भयानक दर्द।

– कफ और कोल्ड, लगातार खांसी आना।

– उनींदे रहना, बहुत ज्यादा थकान महसूस होना।

– बुखार होना, दवा खाने के बाद भी बुखार का लगातार बढ़ना।

– गले में खराश होना और इसका लगातार बढ़ते जाना।

नॉर्मल फ्लू से कैसे अलग

सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के वायरस में एक फर्क होता है। स्वाइन फ्लू के वायरस में चिड़ियों, सूअरों और इंसानों में पाया जाने वाला जेनेटिक मटीरियल भी होता है। सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के लक्षण एक जैसे ही होते हैं, लेकिन स्वाइन फ्लू में यह देखा जाता है कि जुकाम बहुत तेज होता है। नाक ज्यादा बहती है। पीसीआर टेस्ट के माध्यम से ही यह पता चलता है कि किसी को स्वाइन फ्लू है। स्वाइन फ्लू होने के पहले 48 घंटों के भीतर इलाज शुरू हो जाना चाहिए। पांच दिन का इलाज होता है, जिसमें मरीज को टेमीफ्लू दी जाती है।

कब तक रहता है वायरस

एच1एन1 वायरस स्टील, प्लास्टिक में 24 से 48 घंटे, कपड़े और पेपर में 8 से 12 घंटे, टिश्यू पेपर में 15 मिनट और हाथों में 30 मिनट तक एक्टिव रहते हैं। इन्हें खत्म करने के लिए डिटर्जेंट, एल्कॉहॉल, ब्लीच या साबुन का इस्तेमाल कर सकते हैं। किसी भी मरीज में बीमारी के लक्षण इन्फेक्शन के बाद 1 से 7 दिन में डिवेलप हो सकते हैं। लक्षण दिखने के 24 घंटे पहले और 8 दिन बाद तक किसी और में वायरस के ट्रांसमिशन का खतरा रहता है।

चिंता की बात

इस बीमारी से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है दिमाग से डर को निकालना। ज्यादातर मामलों में वायरस के लक्षण कमजोर ही दिखते हैं। जिन लोगों को स्वाइन फ्लू हो भी जाता है, वे इलाज के जरिए सात दिन में ठीक हो जाते हैं। कुछ लोगों को तो अस्पताल में एडमिट भी नहीं होना पड़ता और घर पर ही सामान्य बुखार की दवा और आराम से ठीक हो जाते हैं। कई बार तो यह ठीक भी हो जाता है और मरीज को पता भी नहीं चलता कि उसे स्वाइन फ्लू था। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि जिन लोगों का स्वाइन फ्लू टेस्ट पॉजिटिव आता है, उनमें से इलाज के दौरान मरने वालों की संफ्या केवल 0.4 फीसदी ही है। यानी एक हजार लोगों में चार लोग। इनमें भी ज्यादातर केस ऐसे होते हैं, जिनमें पेशंट पहले से ही हार्ट या किसी दूसरी बीमारी की गिरफ्त में होते हैं या फिर उन्हें बहुत देर से इलाज के लिए लाया गया होता है।

यह रहें सावधान

5 साल से कम उम्र के बच्चे, 65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं। जिन लोगों को निम्न में से कोई बीमारी है, उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए :

- फेफड़ों, किडनी या दिल की बीमारी

– मस्तिष्क संबंधी (न्यूरोलॉजिकल) बीमारी मसलन, पर्किंसन

– कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग

– डायबीटीजं

– ऐसे लोग जिन्हें पिछले 3 साल में कभी भी अस्थमा की शिकायत रही हो या अभी भी हो। ऐसे लोगों को फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

– गर्भवती महिलाओं का प्रतिरोधक तंत्र (इम्यून सिस्टम) शरीर में होने वाले हॉरमोन संबंधी बदलावों के कारण कमजोर होता है। खासतौर पर गर्भावस्था के तीसरे चरण यानी 27वें से 40वें सप्ताह के बीच उन्हें ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है।

अकसर पूछे जाने वाले सवाल

- अगर किसी को स्वाइन फ्लू है और मैं उसके संपर्क में आया हूं, तो क्या करूं?

सामान्य जिंदगी जीते रहें, जब तक फ्लू के लक्षण नजर नहीं आने लगते। अगर मरीज के संपर्क में आने के 7 दिनों के अंदर आपमें लक्षण दिखते हैं, तो डॉक्टर से सलाह करें।

– अगर साथ में रहने वाले किसी शफ्स को स्वाइन फ्लू है, तो क्या मुझे ऑफिस जाना चाहिए?

हां, आप ऑफिस जा सकते हैं, मगर आपमें फ्लू का कोई लक्षण दिखता है, तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं और मास्क का इस्तेमाल करें।

– स्वाइन फ्लू होने के कितने दिनों बाद मैं ऑफिस या स्कूल जा सकता हूं?

अस्पताल वयस्कों को स्वाइन फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखने पर सामान्यत: 5 दिनों तक ऑब्जर्वेशन में रखते हैं। बच्चों के मामले में 7 से 10 दिनों तक इंतजार करने को कहा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में व्यक्ति को 7 से 10 दिन तक रेस्ट करना चाहिए, ताकि ठीक से रिकवरी हो सके। जब तक फ्लू के सारे लक्षण खत्म न हो जाएं, वर्कप्लेस से दूर रहना ही बेहतर है।

- क्या किसी को दो बार स्वाइन फ्लू हो सकता है?

जब भी शरीर में किसी वायरस की वजह से कोई बीमारी होती है, शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उस वायरस के खिलाफ एक प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है। जब तक स्वाइन फ्लू के वायरस में कोई ऐसा बदलाव नहीं आता, जो अभी तक नहीं देखा गया, किसी को दो बार स्वाइन फ्लू होने की आशंका नहीं रहती। लेकिन इस वक्त फैले वायरस का स्ट्रेन बदला हुआ है, जिसे हो सकता है शरीर का प्रतिरोधक तंत्र इसे न पहचानें। ऐसे में दोबारा बीमारी होने की आशंका हो सकती है।

दिल्ली में इलाज के लिए कहां जाएं

सरकारी अस्पताल

जीटीबी अस्पताल, दिलशाद गार्डन

एलएनजेपी अस्पताल, दिल्ली गेट

सफदरजंग अस्पताल, रिंग रोड

राम मनोहर लोहिया अस्पताल, बाबा खड़क सिंह मार्ग

दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल, हरिनगर

संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल, मंगोलपुरी

लाल बहादुर शास्त्री हॉस्पिटल, खिचड़ीप़ुर

पं. मदन मोहन मालवीय अस्पताल, मालवीय नगर

बाबा साहब आंबेडकर हॉस्पिटल, रोहिणी

चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय, गीता कॉलोनी

भगवान महावीर अस्पताल, रोहिणी

महर्षि वाल्मीक अस्पताल, पूठ खुर्द

बाबू जगजीवन राम मेमोरियल अस्पताल, जहांगीरपुरी

अरुणा आसफ अली अस्पताल, राजपुर रोड

एयरपोर्ट हेल्थ ऑर्गनाइजेशन हॉस्पिटल, आईजीआई एयरपोर्ट

प्राइवेट हॉस्पिटल

मूलचंद हॉस्पिटल, लाजपतनगर

सर गंगाराम हॉस्पिटल, राजेंद्र नगर

अपोलो हॉस्पिटल, सरिता विहार

ऐक्शन बालाजी हॉस्पिटल, पश्चिम विहार

सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल, तीस हजारी

एनसीआर में स्वाइन फ्लू सेंटर

नोएडा: डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल, नोएडा

गुड़गांव: सिविल हॉस्पिटल, ओल्ड गुड़गांव

फरीदाबाद: बादशाह खान (बीके) हॉस्पिटल, फरीदाबाद

गाजियाबाद: एमएमजे हॉस्पिटल, जसीपुरा मोड़, गाजियाबाद

स्वाइन फ्लू से बचाव और इसका इलाज

स्वाइन फ्लू न हो, इसके लिए क्या करें?

- साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए और फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही सावधानी बरती जाए, तो इस बीमारी के फैलने के चांस न के बराबर हो जाते हैं।

– जब भी खांसी या छींक आए रूमाल या टिश्यू पेपर यूज करें।

– इस्तेमाल किए मास्क या टिश्यू पेपर को ढक्कन वाले डस्टबिन में फेंकें।

– थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ को साबुन और पानी से धोते रहें।

– लोगों से मिलने पर हाथ मिलाने, गले लगने या चूमने से बचें।

– फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

– अगर फ्लू के लक्षण नजर आते हैं तो दूसरों से 1 मीटर की दूरी पर रहें।

– फ्लू के लक्षण दिखने पर घर पर रहें। ऑफिस, बाजार, स्कूल न जाएं।

– बिना धुले हाथों से आंख, नाक या मुंह छूने से परहेज करें।

आयुर्वेद

ऐसे करें बचाव

इनमें से एक समय में एक ही उपाय आजमाएं।

- 4-5 तुलसी के पत्ते, 5 ग्राम अदरक, चुटकी भर काली मिर्च पाउडर और इतनी ही हल्दी को एक कप पानी या चाय में उबालकर दिन में दो-तीन बार पिएं।

– गिलोय (अमृता) बेल की डंडी को पानी में उबाल या छानकर पिएं।

– गिलोय सत्व दो रत्ती यानी चौथाई ग्राम पौना गिलास पानी के साथ लें।

– 5-6 पत्ते तुलसी और काली मिर्च के 2-3 दाने पीसकर चाय में डालकर दिन में दो-तीन बार पिएं।

– आधा चम्मच हल्दी पौना गिलास दूध में उबालकर पिएं। आधा चम्मच हल्दी गरम पानी या शहद में मिलाकर भी लिया जा सकता है।

– आधा चम्मच आंवला पाउडर को आधा कप पानी में मिलाकर दिन में दो बार पिएं। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

स्वाइन फ्लू होने पर क्या करें

यदि स्वाइन फ्लू हो ही जाए तो वैद्य की राय से इनमें से कोई एक उपाय करें:

- त्रिभुवन कीर्ति रस या गोदंती रस या संजीवनी वटी या भूमि आंवला लें। यह सभी एंटी-वायरल हैं।

– साधारण बुखार होने पर अग्निकुमार रस की दो गोली दिन में तीन बार खाने के बाद लें।

– बिल्वादि टैब्लेट दो गोली दिन में तीन बार खाने के बाद लें।

होम्योपैथी

कैसे करें बचाव

फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखने पर इन्फ्लुएंजाइनम-200 की चार-पांच बूंदें, आधी कटोरी पानी में डालकर सुबह-शाम पांच दिन तक लें। इस दवा को बच्चों समेत सभी लोग ले सकते हैं। मगर डॉक्टरों का कहना है कि फ्लू ज्यादा बढ़ने पर यह दवा पर्याप्त कारगर नहीं रहती, इसलिए डॉक्टरों से सलाह कर लें। जिन लोगों को आमतौर पर जल्दी-जल्दी जुकाम खांसी ज्यादा होता है, अगर वे स्वाइन फ्लू से बचना चाहते हैं तो सल्फर 200 लें। इससे इम्यूनिटी बढ़ेगी और स्वाइन फ्लू नहीं होगा।

स्वाइन फ्लू होने पर क्या है इलाज

1: बीमारी के शुरुआती दौर के लिए

जब खांसी-जुकाम व हल्का बुखार महसूस हो रहा हो तब इनमें से कोई एक दवा डॉक्टर की सलाह से ले सकते हैं:

एकोनाइट (Aconite 30), बेलेडोना (Belladona 30), ब्रायोनिया (Bryonia 30), हर्परसल्फर (Hepursuphur 30), रसटॉक्स (Rhus Tox 30), चार-पांच बूंदें, दिन में तीन से चार बार।

2: अगर फ्लू के मरीज को उलटियां आ रही हों और डायरिया भी हो तो नक्स वोमिका (Nux Vomica 30), पल्सेटिला (Pulsatilla 30), इपिकॉक (Ipecac-30) की चार-पांच बूंदें, दिन में तीन से चार बार ले सकते हैं।

3: जब मरीज को सांस की तकलीफ ज्यादा हो और फ्लू के दूसरे लक्षण भी बढ़ रहे हों तो इसे फ्लू की एडवांस्ड स्टेज कहते हैं। इसके लिए आर्सेनिक एल्बम (Arsenic Album 30) की चार-पांच बूंदें, दिन में तीन-चार बार लें। यह दवा अस्पताल में भर्ती व ऐलोपैथिक दवा ले रहे मरीज को भी दे सकते हैं।

योग

शरीर के प्रतिरक्षा और श्वसन तंत्र को मजबूत रखने में योग मददगार साबित होता है। अगर यहां बताए गए आसन किए जाएं, तो फ्लू से पहले से ही बचाव करने में मदद मिलती है। स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले अभ्यास करें:

- कपालभाति, ताड़ासन, महावीरासन, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन, मंडूकासन, अनुलोम-विलोम और उज्जायी प्राणायाम तथा धीरे-धीरे भस्त्रिका प्राणायाम या दीर्घ श्वसन और ध्यान।

– व्याघ्रासन, यानासन व सुप्तवज्रासन। यह आसन लीवर को मजबूत करके शरीर में ताकत लाते हैं।

डाइट

- घर का ताजा बना खाना खाएं। पानी ज्यादा पिएं।

– ताजे फल, हरी सब्जियां खाएं।

– मौसमी, संतरा, आलूबुखारा, गोल्डन सेव, तरबूज और अनार अच्छे हैं।

– सभी तरह की दालें खाई जा सकती हैं।

– नींबू-पानी, सोडा व शर्बत, दूध, चाय, सभी फलों के जूस, मट्ठा व लस्सी भी ले सकते हैं।

– बासी खाना और काफी दिनों से फ्रिज में रखी चीजें न खाएं। बाहर के खाने से बचें।

मास्क की बात

न पहने मास्क

- मास्क पहनने की जरूरत सिर्फ उन्हें है, जिनमें फ्लू के लक्षण दिखाई दे रहे हों।

- फ्लू के मरीजों या संदिग्ध मरीजों के संपर्क में आने वाले लोगों को ही मास्क पहनने की सलाह दी जाती है।

- भीड़ भरी जगहों मसलन, सिनेमा हॉल या बाजार जाने से पहले सावधानी के लिए मास्क पहन सकते हैं।

- मरीजों की देखभाल करने वाले डॉक्टर, नर्स और हॉस्पिटल में काम करने वाला दूसरा स्टाफ।

- एयरकंडीशंड ट्रेनों या बसों में सफर करने वाले लोगों को ऐहतियातन मास्क पहन लेना चाहिए।

कितनी देर करता है काम

- स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए सामान्य मास्क कारगर नहीं होता, लेकिन थ्री लेयर सर्जिकल मास्क को चार घंटे तक और एन-95 मास्क को आठ घंटे तक लगाकर रख सकते हैं।

– ट्रिपल लेयर सजिर्कल मास्क लगाने से वायरस से 70 से 80 पर्सेंट तक बचाव रहता है और एन-95 से 95 पर्सेंट तक बचाव संभव है।

– वायरस से बचाव में मास्क तभी कारगर होगा जब उसे सही ढंग से पहना जाए। जब भी मास्क पहनें, तब ऐसे बांधें कि मुंह और नाक पूरी तरह से ढक जाएं क्योंकि वायरस साइड से भी अटैक कर सकते हैं।

– एक मास्क चार से छह घंटे से ज्यादा देर तक न इस्तेमाल करें, क्योंकि खुद की सांस से भी मास्क खराब हो जाता है।

कैसा पहनें

– सिर्फ ट्रिपल लेयर और एन 95 मास्क ही वायरस से बचाव में कारगर हैं।

– सिंगल लेयर मास्क की 20 परतें लगाकर भी बचाव नहीं हो सकता।

– मास्क न मिले तो मलमल के साफ कपड़े की चार तहें बनाकर उसे नाक और मुंह पर बांधें। सस्ता व सुलभ साधन है। इसे धोकर दोबारा भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

ध्यान रखें कि

- जब तक आपके आस-पास कोई मरीज या संदिग्ध मरीज नहीं है, तब तक मास्क न लगाएं।

– अगर मास्क को सही तरीके से नष्ट न किया जाए या उसका इस्तेमाल एक से ज्यादा बार किया जाए तो स्वाइन फ्लू फैलने का खतरा और ज्यादा होता है।

– खांसी या जुकाम होने पर मास्क जरूर पहनें।

– मास्क को बहुत ज्यादा टाइट पहनने से यह थूक के कारण गीला हो सकता है।

– अगर यात्रा के दौरान लोग मास्क पहनना चाहें तो यह सुनिश्चित कर लें कि मास्क एकदम सूखा हो। अपने मास्क को बैग में रखें और अधिकतम चार बार यूज करने के बाद इसे बदल दें।

कीमत
– थ्री लेयर सजिर्कल मास्क : 10 से 12 रुपये

– एन-95 : 100 से 150 रुपये

swainflu

फ़रवरी 19, 2015

हरियाणा में भूमि-अधिग्रहण मुआवजे पर “आम आदमी पार्टी” का आंदोलन शुरू

श्री मनोहर लाल खट्टर 19 फरवरी, 2015
मुख्यमंत्री, हरियाणा
चंडीगढ़

विषय: हरियाणा सरकार द्वारा भूमि-अधिग्रहण का मुवावज़ा आधे से कम करने का आदेश.

आदरणीय श्री मनोहर लाल खट्टर जी,

आपके मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के बाद पहली बार आपसे संवाद का अवसर मिल रहा है. इसलिए मैं अपने, अपने साथियों और अपने संगठन की ओर से आपको शुभकामनाएं देता हूँ. आशा करता हूँ कि आपके नेतृत्व में हरियाणा सरकार उन उम्मीदों पर खरी उतरेगी जिनके आधार पर हरियाणा की जनता ने आपकी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया है.

1. मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आपकी सरकार के हाल के निर्णयों और बयानों से उन आशाओं को धक्का लगा है. हरियाणा के किसान और ग्रामवासी आम तौर पर भारतीय जनता पार्टी को शक की निगाह से देखते थे. लेकिन इस बार के विधान-सभा चुनाव में उन्होंने अपने पुराने पूर्वाग्रह छोड़कर खुले दिल से भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया. इस समर्थन के पीछे वे तमाम वादे थे जो आपकी पार्टी ने किसानों से किये थे. आपकी पार्टी के विधान-सभा चुनाव घोषणा-पत्र में आपने “दूसरी हरित-क्रांति” लाने का वादा किया था. आपने किसानों के साथ वादा किया था कि “किसानों के फसलों के दाम लागत-मूल्य पर 50% लाभ निर्धारित करके निर्धारित किये जाने की पद्धति अपनाई जाएगी. समय समय पर बढ़ने वाली महंगाई के अनुरूप किसानों के उत्पाद/फसलों के दाम भी बढ़ाये जायेंगे.” आपने यह वादा भी किया था कि “कृषि भूमि को कॉर्पोरेट घरानों को नहीं बेचा जायेगा और अगर अधिग्रहण किया तो किसान के शेयर का प्रावधान रखा जायेगा.”

2. लेकिन जब से आपकी सरकार आई है तब से किसान अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. पिछली सरकारों के राज में पनपी किसानों की दुःख-तकलीफ का निवारण करने के बजाय भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार ने एक के बाद एक किसानों के साथ धक्का किया है. सरकारी बद-इंतज़ामी के कारण किसान यूरिया खाद के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है. किसान को वादा हुआ था 24 घंटे की बिजली का लेकिन उसकी बिजली 14 घंटे से घटाकर 11 घंटे कर दी गयी है. लागत से 50% लाभ देना तो दूर, सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को महंगाई दर के हिसाब से भी नहीं बढाया है. फसलों के दाम गिर रहे हैं लेकिन सरकारी मूल्य पर भी खरीद नहीं हो रही है. और ऊपर से भूमि-अधिग्रहण कानून में संशोधन करके किसान की ज़मीन छीनने की तैयारी चल रही है.
3. इस पत्र के माध्यम से मैं आपका ध्यान एक विशेष मुद्दे की ओर खींचना चाहता हूँ. यह मामला पूरी तरह से आपके राज्य सरकार के अधीन है. आपकी सरकार ने किसानों को भूमि-अधिग्रहण पर मिलने वाले मुवावज़े को एक ही झटके में आधे से भी कम कर दिया. मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपकी सरकार किसानों के साथ इतना बड़ा धोखा कैसे कर सकती है.

3.1 जैसा की आपको ज्ञात है संसद द्वारा पारित नए भूमि-अधिग्रहण कानून (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act) 2013 के अनुसार भू-स्वामियों को मुवावज़ा नए तरीके से तय होना है. इस कानून के शेड्यूल 1 के मुताबिक ज़मीन के सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य को किसी गुणांक या फैक्टर से गुणा किया जायेगा. इस गुणन-फल से प्राप्त राशि में उतना ही सोलेशियम जोड़ दिया जायेगा. यह गुणांक कितना होगा इसका फैसला राज्य सरकार को करना होता है. केन्द्रीय कानून के मुताबिक़ यह गुणांक शहरी इलाकों में 1.0 रहेगा लेकिन गाँव में राज्य सरकार 2.0 तक कोई भी गुणांक तय कर सकती है. केन्द्रीय कानून कहता है कि यह फैसला लेते वक़्त शहरी क्षेत्रों से दूरी को ध्यान में रखा जायेगा. अगर राज्य सरकार चाहे तो कलेक्टर रेट से दो गुना तक मुवावजा और उतना ही सोलाशियम यानि कुल मिलकर चार गुना मुआवजा राशि दे सकती है.

3.2 नया कानून बनने के बाद आपकी पूर्ववर्ती सरकार ने मुवावज़ा तय करते वक़्त 2.0 का फैक्टर लगाया था. दिनांक 22 अगस्त 2014 को महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील के शिवनाथपुरा गाँव के भूमि-अधिग्रहण आदेश में सरकार ने कीमत को दुगना करके मुवावज़ा तय किया था.

3.3 लेकिन आपकी सरकार ने केन्द्रीय कानून की भावना, किसानों की आकांक्षा और पिछली सरकार के निर्णय के उलट जाते हुए किसान को कम से कम मुवावज़ा देने की नीति अपनाई है. चार दिसम्बर 2014 को जारी सर्कुलर (संख्या 2331-R-5-2014/16094) के जरिये आपने पूरे ग्रामीण हरियाणा में मुवावज़े के फैक्टर को घटाकर 1.0 कर दिया है. इसका मतलब यह होगा कि भू-स्वामी को मिलने वाला मुवावज़ा आधा हो जायेगा. उदाहरणार्थ अगर कलेक्टर रेट 20 लाख रूपये एकड़ है तो 2.0 फैक्टर के हिसाब से कुल 80 लाख रुपया मुवावज़ा मिलता (20×2.0 = 40 लाख मुवावज़ा + 40 लाख सोलेशियम = 80 लाख) लेकिन इस फैक्टर को 1.0 करने के कारण कुल मुवावज़ा राशि 40 लाख रह जाएगी. ( 20×1.0 = 20 लाख मुवावज़ा + 20 लाख सोलेशियम = 40 लाख) कुल मुवावज़ा राशि आधी कर देने वाला यह नियम अब हरियाणा में हर भूमि-अधिग्रहण पर लागू होगा.

3.4 यही नहीं, आपकी सरकार द्वारा बनाये नए नियमों (दिनांक 28 अक्टूबर 2014) के अनुसार भूमि के मूल्य निर्धारण में भी किसान को भारी घाटा होगा. हरियाणा सरकार की पुरानी अधिग्रहण नीति (9 नवम्बर 2010 को अधिसूचित) के तहत सरकार ने एक न्यूनतम “फ्लोर रेट” तय कर दिया था ताकि जिन इलाकों में ज़मीन के दाम बहुत कम चल रहे हैं वहाँ भी किसान को वाजिब मुवावज़ा मिले. नए नियमों में इस प्रावधान को हटा दिया गया है. पुरानी रजिस्ट्री के हिसाब से मूल्य निर्धारण में भी किसान को कम से कम दाम देने की नीयत झलकती है. पिछले तीन सालों की रजिस्ट्री को देखते वक़्त साल को “कैलेण्डर वर्ष” की तरह परिभाषित किया गया है. इसके चलते वर्तमान वर्ष की नवीनतम रजिस्ट्री का संज्ञान भी नहीं लिया जायेगा. अगर एक एकड़ से कम की कोई रजिस्ट्री हुई है तो उसका भी संज्ञान नहीं लिया जायेगा. यानी कि हर कदम पर सरकार की नीयत यह है कि किसान के मुवावज़े में जितनी कटौती की जा सके उतनी की जाए.
3.5 केन्द्रीय कानून के मुताबिक़ ज़मीन के सरकारी दाम का सरकार द्वरा तय किये फैक्टर से गुना करने पर जो राशि बनती है उसपर सौ फ़ीसदी सोलेशियम देना होगा. लेकिन बावल, जिला रेवाड़ी के 16 गाँव का अधिग्रहण आदेश (संख्या 13/R दिनांक 4 दिसम्बर 2014) जारी करते समय सरकार ने सोलेशियम को घटाकर 30% कर दिया. यह तो बिलकुल ग़ैर-कानूनी है. क्या हरियाणा सरकार भूमि-अधिग्रहण में आगे भी सोलेशियम को 30% की दर से निर्धारित करेगी?

3.6 मुवावज़े की दर को घटाने का यह आदेश जिस जल्दबाजी और गुपचुप तरीके से हुआ वह सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करता है. नियमों में संशोधन करने का ड्राफ्ट सरकार ने २७ नवम्बर 2014 को अधिसूचित किया (संख्या 2249-R-2014/15792). जनता को इसकी सूचना 29 नवम्बर को मिली और आपात्ति दर्ज़ करने के लिए मात्र 3 दिसंबर तक का समय मिला. फिर भी प्रभावित किसानों ने 1 दिसंबर को विस्तृत आपत्तियां दर्ज करवाई. आपकी सरकार ने इन सब वाजिब आपत्तियों को दरकिनार करते हुए प्रस्तावित ड्राफ्ट को हुबहू 4 दिसंबर को अधिसूचित कर दिया. प्रदेश के किसानों के भविष्य पर इतना दूरगामी असर डालने वाले इस फैसले में इतनी जल्दबाजी क्यूँ की गयी? आपके अफसर कह रहे हैं की यह फैसला किसी कमेटी की सफ़ारिश पर लिया गया. क्या सरकार उस कमेटीकी रिपोर्ट को सार्वजनिक करेगी?

3.7 इन सब तथ्यों का अवलोकन करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि आपकी सरकार किसी भी तरह से किसानों का मुवावज़ा कम से कम करने पर आमादा है. ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी सरकार किसान के हित में नहीं बल्कि उसकी ज़मीन पर नज़र गड़ाये बिल्डरों और उद्योगपतियों के हित में काम कर रही है. इस मुद्दे पर मीडिया से बात करते हुए आपके प्रतीनिधियों ने कहा है कि यदि किसान को ज्यादा मुवावज़ा दे दिया तो इस ज़मीन पर लगने वाले प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाएगी. यह तो कुतर्क है. एक तो किसी भी उद्योग में ज़मीन की लागत उसका एक छोटा हिस्सा होती है. दूसरा, अगर सरकार को इन प्रोजेक्ट्स की लागत कम करनी है तो सरकार अपनी जेब से इन्हें सब्सिडी क्यूँ नहीं दे देती. यह रियायत किसान से छीन कर क्यूँ दी जा रही है. असली सवाल यह है कि आपकी सरकार की पहली चिंता किसान की आजीविका है या कि बिल्डर और उद्योगपतियों का मुनाफा?

4. इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप
(क) नए भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश के अंतर्गत बनाये गए इन नियमों के तहत अधिग्रहण को ततकाल प्रभाव से रोक दें.
(ख) इन नियमों की समीक्षा कर इनमें तमाम किसान-विरोधी प्रावधानों को हटाया जाए.
(ग) मुवावज़े के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के गुणन फैक्टर को 1.0 की बजाय 2.0 किया जाय.
(घ) यह स्पष्ट किया जाय कि सरकार 30% की बजाय 100% सोलेशियम देगी.

आम आदमी पार्टी इस मुद्दे और किसानों के साथ हो रहे चौतरफा धक्के के खिलाफ 21 तारीख से प्रदेश भर में जय-किसान अभियान शुरू कर रही है. संविधान की भावना के अनुरूप और लोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए आम आदमी पार्टी ऐसे सभी किसान-विरोधी नीतियों और निर्णयों के विरुद्ध संघर्ष करेगी. जब तक इन किसान-विरोधी प्रावधानों को बदला नहीं जाता तब तक आम आदमी पार्टी हरियाणा प्रदेश में कहीं भी भूमि-अधिग्रहण नहीं होने देगी.

आशा है कि प्रदेश के किसानों की हितरक्षा के अपने दायित्व को देखते हुए आप इन मांगो को स्वीकार कर लेंगे और किसानो और सरकार के बीच किसी भी टकराहट की नौबत नहीं आने देंगे.

सादर,
आपका
योगेन्द्र यादव
हरियाणा राज्य प्रभारी और मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता, आम आदमी पार्टी

फ़रवरी 19, 2015

आचार्य नरेंद्र देव – समाजवादी आंदोलन के पुरोधा

narendradevआचार्य नरेंद्र देव का जन्म 31 अक्टूबर 1889 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ था। उनका घर का नाम अविनाशीलाल था। परंतु उनके पिता के दोस्त पं. माधव प्रसाद मिश्र ने उनका नाम नरेन्द्र देव रख दिया। उनके पिता वकालत करते थे। बचपन से ही वे पिता के साथ कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाने लगे थे। 1905 में वे पहली बार बनारस कांग्रेस अधिवेशन में गये थे। कांग्रेस ने जब गरम दल बना तब उसमें शामिल हो गये। कांग्रेस के अधिवेशन में 1908 के बाद जाना छोड़ दिया लेकिन उसके बाद 1916 में जब नरम दल व गरम दल फिर एक साथ आ गये तब उन्होंने फिर से कांग्रेस के कार्यक्रमों में आना-जाना शुरू किया। 1915 में एलएलबी पास करके केे फैजाबाद में वकालत शुरू की तथा होमरूल लीग में शामिल होकर फैजाबाद की शाखा के मंत्री चुने गये। जब बनारस में विद्यापीठ खुला तब डा. भगवानदास के प्रस्ताव पर वे उपाध्यक्ष बना दिये गये तथा 1926 में उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया।

आचार्यजी अति संकोची थे। वे पद लेना तथा चुनाव लड़ना नहीं चाहते थे लेकिन जब उ. प्र. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने से उन्होंने इन्कार कर दिया तथा पं. जवाहर लाल नेहरू के कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल होने के प्रस्ताव को उन्होंने अस्वीकार कर दिया था लेकिन बाद में अपने सहयोगियों के आग्रह पर उन्होंने दोनों पद स्वीकार किये। इसी तरह 1934 में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाने का प्रस्ताव जे.पी. ने उनके समक्ष रखा तब उन्होंने सम्मेलन का सभापति बनने से इन्कार किया। बाद में वे कार्यकर्ताओं के आग्रह पर 1934 में सम्मेलन के सभापति बनाये गये। आचार्यजी के कहने पर ही पार्टी का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता रखा गया था। 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें विशेष ट्रेन से अहमदनगर ले जाया गया। 1945 में 14 जून को जवाहर लाल जी के साथ रिहा किये गये। आजादी मिलने के बाद जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से अलग होने की चर्चा शुरू हुई तब उन्होंने कहा कि कांग्रेस यदि कोई ऐसा नियम बनाती है जिसमें हम लोगों का कांग्रेस में रहना असंभव हो जाये तो सबसे पहले मैं कांग्रेस छोड़ दूंगा। कांग्रेस के निर्णय के बाद उन्होंने यही किया, कांग्रेस पार्टी छोड़ दी।

आचार्य नरेंद्र देव मानव समाज के कल्याण और नैतिक जीवन के विकास के लिए अन्याय का विरोध आवश्यक समझते थे उनका विचार था कि शोषणविहीन समाज में सामाजिकता के आधार पर मनुष्य का नैतिक विकास हो सकता है लेकिन स्वार्थ प्रेरणा पर आश्रित वर्ग समाज में सामाजिक भावनाओं का विकास बहुत कुछ अवरूद्ध हो जाता है। ऐसे अन्यायपूर्ण समाज में अन्याय का निरंतर का विरोध नैतिक जीवन और मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। उनकी दृष्टि में वही नैतिक है, जो अन्याय के साथ समझौता करने को तैयार न हो, स्वयं अन्याय करने से बचता रहे तथा दूसरे के अन्याय को सहन करने को तैयार न हो। उन्हें इस बात का संतोष था कि वह जीवन भर अन्याय का विरोध करते रहे। उन्हें विदेशियों के द्वारा किया जा रहा अन्याय खटकता था परंतु स्वजनों द्वारा आर्थिक और सामाजिक अन्याय किये जाने की खिलाफत वे लगातार करते थे। इसलिए वे राजनैतिक स्वराज्य के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक स्वराज्य के लिए भी प्रयत्नशील रहे। राजनैतिक स्वतंत्रता मिल जाने के बाद देश में जनतांत्रिक समाजवादी समाज निर्मित करने का प्रयास करते रहे।

आचार्य नरेंद्र देव जी को देश और दुनिया माक्र्सवादी तथा बौद्ध दर्शन का प्रखर विद्वान जानती और मानती है। लेकिन आमतौर पर आचार्य जी का किसान आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान की जानकारी कम लोगों को है। 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान अवध के 4 प्रमुख जिलों रायबरेली, फैजाबाद, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर में किसान आंदोलन तेजी से चला। आचार्यजी ने इस आंदोलन का ख्ुालकर समर्थन किया तथा उनके प्रभावशाली भाषण के चलते किसान आंदोलन में डटे रहे। सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए 7 जनवरी 1921 को मुंशीगंज में गोली चालन कराया। दमन के बावजूद आंदोलन उग्र रूप धारण कर लगातार चलता रहा तब सरकार को किसानों की बेदखली रोकने वाली मांग स्वीकार करनी पड़ी। अवध आंदोलन भी आचार्यजी की भूमिका के चलते सफल रहा। आंदोलन के दौरान किसानों को यह प्रतिज्ञा करायी गयी कि वे गैरकानूनी टैक्स अदा नहीं करेंगे, बेगार-बिना मजदूरी नहीं करेंगे। पलई, भूसा तथा रसल बाजार भाव पर बेचेंगे तथा नजराना नहीं देंगे। बेदखल खेत को कोई दूसरा किसान नहीं खरीदेगा तथा बेदखली कानून मंजूर होने तक सतत संघर्ष चलाएंगे। 1936 में भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। आचार्यजी को 1939 में गया अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया जिसमें आचार्यजी ने किसान सभाओं और कांग्रेस संगठन के संबंधों पर जोर देते हुए कहा कि साम्राज्यवाद के विरोध में दोनों को एक साथ खड़े होकर किसान क्रांति को परिपक्व करने की जरूरत है ताकि किसान जमीन का मालिक बन जाये। राज्य और किसानों के बीच मध्यवर्ती शोषकों का शोषण अंत हो जाय। कर्जे के बोझ से किसानों को छुटकारा मिले तथा श्रम का पूरा लाभ उन्हें मिल सके। 1949 में सोशलिस्ट पार्टी ने पटना में अधिवेशन कर किसान पंचायत संघर्ष समिति बनाई। उ. प्र. का किसान पंचायत क्रांति सम्मेलन आचार्य जी की अध्यक्षता में कानपुर जिले के ग्राम सिठमरा में हुआ। डा. लोहिया की प्रेरणा से सोशल्स्टि पार्टी व किसान पंचायत का संयुक्त अधिवेशन 25 नवंबर 1949 को लखनऊ में हुआ जिसमें 50 हजार किसानों ने भाग लिया। आचार्य नरेंद्र देव ने खुलकर सरकार पर किसानों की उपेक्षा और अन्याय करने का आरोप लगाते हुए जमीदारी खत्म करने, जमीन का बंटवारा करने, सरकारी खेती, ग्रामीण उद्योग को बढ़ावा, भूमि सेना का गठन, कृषि उत्पादों तथा कपड़ा और सीमेंट की कीमतों में संतुलन, खेतिहर मजदूरों के कर्जे माफ करने तथा जमीनों से बेदखली रोकने का मांग-पत्र सरकार के समक्ष रखा। फरवरी 1950 में डा. लोहिया की अध्यक्षता में रीवा में हिंद किसान पंचायत का पहला अधिवेशन हुआ, तब आचार्य जी ने किसानों का हौसला बढ़ाते हुए किसानों से संगठित होने का आह्वान किया। आचार्य जी ने जमीदारी उन्मूलन कमेटी को 1947 में लिखे स्मृति पत्र में कहा कि जिस तरह से जमीदारों ने किसानों को लूटा, खसोटा और चूसा है यदि उसका हिसाब लगाया जाय तो किसानों के ऋण से मुक्त होना जमीदारों के बूते की बात नहीं। ऐसी हालत में जमीदारों को मुजावजा देने का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए। आचार्य जी ने देवरिया सत्याग्रह में किसानों की फसल खराब होने के बाद भागीदारी करते हुए किसानों और सरकारी कर्मचारियों के भेद को समाप्त करने की मांग की। 1950 में पंजाब में भी नरेंद्र देव जी ने हिसार जिले में भी बेदखली के खिलाफ संघर्ष किया था। आचार्य जी का किसानों का संघर्ष का लंबा इतिहास है जो आज भी किसान आंदोलन को ताकत दे सकता है।

अपने बारे में आचार्यजी कहते थे कि मेरे जीवन के अब कुछ वर्ष ही शेष रह गये हैं। शरीर नामक संपत्ति भी अच्छी नहीं है किंतु मन में अभी उत्साह है। जीवन सदा अन्याय से लड़ते जिया है। यह काम कोई छोटा नहीं है। स्वतंत्र भारत में इसकी और भी आवश्यकता है। अपनी जिंदगी पर एक निगाह डालने से मालूम होता है कि जब मेरी आंखें मुंदेंगी मुझे यह संतोष होगा कि मैंने विद्यापीठ में स्थाई काम किया। यही मेरी पूंजी है। इसके आधार पर मेरी राजनीति चलती है।
आचार्यजी को बीमारी ने आजादी आंदोलन के दौरान ही जकड़ लिया था। शुरू से ही वे दमा के रोग से पीडि़त थे। स्वयं गांधी जी ने वर्धा आश्रम बुलाकर आचार्यजी की प्राकृतिक चिकित्सा भी की थी। आचार्यजी ने 19 फरवरी 1956 को शरीर त्याग दिया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आचार्यजी को अजातशत्रु कहा था। उन्होंने कहा था कि आचार्यजी और गांधी जी अतिरिक्त उन्हें अब तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो आदमियत, व्यक्तित्व, इंसानियत, बौद्धिक शक्ति, ज्ञान, वाक्पटुता, भाषण शक्ति, इतिहास और दर्शन की समझ आचार्य नरेंद्रदेव जैसी रखता हो। आचार्य नरेंद्रदेवजी समाजवादी समाज के साथ-साथ समाजवादी सभ्यता का निर्माण करना चाहते थे। उनका स्पष्ट मत था कि समाजवादी समाज को बनाने के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ-साथ जनता के मानस को बदलने की, जागृत करने की, स्वयं अपनी समस्याओं को सुलझाने योग्य बनाने तथा समाजवादी नैतिक मूल्यों के समुचित प्रशिक्षण की नितांत आवश्यकता है।

संपूर्णानंद ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि वे संस्कृत और पाली के उच्च कोटि के विद्वान थे जिन्होंने काशी विद्यापीठ को गरिमा प्रदान की थी। वे हंसमुख थे तथा खूब मजाक किया करते थे। उनका सेंस आॅफ ह्यूमर अद्वितीय था।
राहुल सांकृत्यायन ने आचार्यजी के बारे में कहा था कि उनकी अंग्रेजी भाषा पर असाधारण पकड़ थी। बौद्ध दर्शन पर उनकी किताब ‘अभिकोश भाष्य’ को उन्होंने ऐतिहासिक ग्रन्थ बताया था। कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो का अनुवाद भी आचार्य जी और राहुल जी ने मिलकर शुरू किया था। जिसके कुछ अंश प्रेमचंद जी की प्रेस में छपे भी थे। लेकिन वह पूर्ण नहीं हो सका।

डा. राममनोहर लोहिया ने आचार्य के बारे में कहा था कि वे बौद्ध दर्शन, बौद्ध साहित्य, बौद्ध इतिहास के साथ-साथ राजनीति की गहराई से जानकारी रखने वाले विद्वान थे। मंत्री पद न लेना, लखनऊ विश्वविद्यालय का वाईस चांसलर बनने से इंकार करना उनके लिए छोटी बात थी। आचार्यजी के भाषण शिक्षाप्रद और जोशीले होते थे। उन्होंने काशी विद्यापीठ में हजारों विद्यार्थियों को समाजवादी विचार से शिक्षित किया।

चंद्रशेखर जी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि आचार्य जी ऋषिकुल परंपरा के ऐसे संत थे जिनका जीवन कठोर साधना में बीता। जिन्होंने सुख-दुख को समान समझा। उनकी पीड़ा आमजन के प्रति थी। अतीत में जो कुछ शुभ है उसको अक्षुण रखने का संकल्प था। लेकिन विकृतियों, अंधविश्वासों तथा रूढि़वादिता के खिलाफ वे आजीवन संघर्ष करते रहे। उन्होंने बुद्ध की करूणा तथा माक्र्स के दर्शन को जीवन का संबल बनाया था।

आचार्यजी की पुण्य तिथि आज 19 फरवरी 2015 को देशभर में मनाई जा रही है। आचार्यजी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके पथ पर समाजवादी समाज की रचना के लिए न केवल किसानों, मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित करें, बल्कि पठन-पाठन करते हुए नैतिकता आधारित जीवन जीते हुए स्वयं के आध्यात्मिक विकास के लिए प्रयासरत रहें।

डाॅ सुनीलम
पूर्व विधायक, राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम

फ़रवरी 14, 2015

‘मुक्तिबोध’ आस्था देते हैं मुक्ति नहीं …

मुक्तिबोध और ख़ासकर उनकी कविता ‘अंधेरे में’ पर लिखने की मुश्किलें कई हैं। कुछ का वास्ता मुक्तिबोध के अपने बेहद जटिल काव्य विन्यास से है तो कुछ का उनके मूल्यांकन की सतत चली आ रही कोशिशों से, जिनमें कुछ बहुत सरल हैं कुछ बहुत जटिल, कुछ बहुत साधारण हैं कुछ वाकई असाधारण। मुक्तिबोध के निधन के बाद उनके समकालीनों और समानधर्मा लेखकों ने जिस आत्मीयता, अधिकार और प्रामाणिकता से उन पर लिखा है, वह भी किसी नए लिखने वाले की एक मुश्किल है। और जो सबसे बड़ी मुश्किल है, वह बीते पचास सालों का वह कालखंड है जिसमें हिंदी पट्टी अपने बहुत सारे ठहरावों के बावजूद इतनी बदल गई है कि मेरी तरह के लेखक को मुक्तिबोध बहुत दूर खड़े दिखाई पड़ते हैं। एक प्रातःस्मरणीय पुरखे की तरह उनका सम्मान आसान काम है, एक परंपरा के रूप में उनकी पहचान करना, उनसे रिश्ता-राब्ता जोड़ना मुश्किल है।
लेकिन इतनी सारी मुश्किलें हैं तो हम मुक्तिबोध को छोड़ देने का सबसे आसान काम क्यों नहीं करते? ऐसा तो नहीं है कि हमारी पीढ़ी ने अपने जीवन की सारी चुनौतियों का सामना किया है? उल्टे यह दिखाई पड़ता है कि सवालों के बच निकलने की, बने-बनाए तैयार जवाबों में जा छुपने की, चालू जुमलेबाज़ी की गलियों से अपने लिए रास्ता बनाने की, एक पूरी शैली हमारे पास तैयार है और उस पर हम ख़ूब अमल करते हैं। बल्कि चाहें तो इस रास्ते से मुक्तिबोध का सामना करते हुए भी दिख सकते हैं। बड़ी आसानी से उन समीक्षात्मक निष्कर्षों का सहारा लेते हुए जो मुक्तिबोध के अध्ययन के दौरान विकसित हुए हैं, हम कई जाने-पहचाने सूत्र बता सकते हैं- कि मुक्तिबोध बहुत गहरे अंत:संषर्ष के कवि हैं, कि विवेक और वेदना उनके बीज शब्द हैं, कि उनमें हमारी सभ्यता के संकट झांकते हैं। सच तो यह है कि मुक्तिबोध पर बहुत कुछ इतना अच्छा भी लिखा गया है- उनके एक-एक शब्द और वाक्य को उद्धृत करते हुए उनकी ऐसी व्याख्याएं सुलभ हैं कि उन पर जैसे नए सिरे से लिखना कुछ पुराने प्रयत्नों को दुहराने के बराबर लग सकता है।

इन सबके बावजूद उन पर लिखने की इच्छा होती है तो इसलिए कि हम मुक्तिबोध को भले छोड़ना चाहें, मुक्तिबोध हमें नहीं छोड़ते। किसी घने जंगल सरीखा उनका बहुत उलझा-सुलझ- प्रीतिकर और भयंकर भी- उनका काव्य वितान हमें जैसे किसी जादू में बांध लेता है- अंधेरे में कोई ब्रह्मराक्षस जैसे हमारी आत्मा में उतर आता है, वह कभी लुभाता है, कभी डराता है, कभी हम उसका हाथ छुड़ाकर भागना चाहते हैं लेकिन अक्सर कुछ सहमे हुए उसके पीछे-पीछे चलते जाते हैं- इस उम्मीद में कि इसी यातना भरी यात्रा में वह मोती है जिसमें कविता के होने का मर्म है, मनुष्यता के होने की नियति है। जाहिर है, यह थोपी हुई नहीं, उनकी कविता के भीतर से निकलती उम्मीद है।

यह अनायास नहीं है कि इस अंधेरे में से गुजरते हुए एक पाठक के रूप में हम जो महसूस करते हैं, ‘भोगते’ हैं, जिस प्रक्रिया से गुज़रते हैं, एक लेखक के रूप में मुक्तिबोध कहीं ज़्यादा निर्ममता और तीव्रता के साथ वही सब झेलते, भोगते हैं और उसी प्रक्रिया से गुज़रते हैं। उनकी विडंबना इस मायने में कहीं ज्यादा गहरी और मारक है कि वे इस सबके रचयिता भी हैं- जिस कभी न पाई गई अभिव्यक्ति की चर्चा उनके काव्य के संदर्भ में बहुत रूढ़ ढंग से बार-बार होती है, वह मुक्तिबोध के सामने बार-बार रूप बदल कर आती है- कभी उनके समरूप की तरह, कभी उनके विलोम की तरह, कभी रक्तस्नाता, तो कभी ‘चेहरे पर सुबहें खिलती हैं उसके।‘
अचानक यहां मुक्तिबोध रचना की- यानी सृजन- की वह गिरह खोलते दिखाई पड़ते हैं जो होती हम सबके भीतर है, लेकिन उसे पाने की मुक्तिबोधीय तड़प हमारे भीतर नहीं होती। मुक्तिबोध के यहां सृजन किसी मौलिक कल्पना का सहज उन्मेष नहीं है, बल्कि वह एक दिए हुए पर्यावरण में, एक लगातार रूप बदलती प्रकृति के भीतर सुलभ अवयवों का अनुसंधान और उनका परिमार्जन है। कहना न होगा कि जिसे सृजन, निर्माण या उत्पादन कहते हैं- वह दरअसल, अर्थशास्त्र की ठोस भाषा में- इसी प्रक्रिया का नाम है- एक दी हुई वस्तु का रूप बदल कर उसे उपयोगी बनाना- लकड़ी से मेज़ बनाना, लुगदी से कागज़ बनाना और लोहे से सुई से लेकर तलवार तक बनाना।
लेकिन मुक्तिबोध बनाते क्या हैं? उनकी कविता में मिलने वाला बीहड़ यथार्थ कैसे आकार लेता है? क्या वे अनुभव नाम के लोहे में अपनी निजी वेदना और विवेक का रसायन घोल कर कविता नाम का हथियार तैयार करते हैं? क्या वे ऐसा कुछ तैयार करने की कोशिश करते भी दिखते है? जब हम यह समझने उनकी कविता के कारखाने तक पहुंचते हैं तो पाते हैं कि यह किसी जलती हुई धमन भट्टी जैसा है जिसमें पसीने से लथपथ- लेकिन श्रम की आभा से दमकते हुए मुक्तिबोध, जैसे अपनी हड्डियों का लोहा गला रहे हैं। यहां आकर हम पाते हैं कि कारीगर-कारखाना और कृति एक हो गए हैं, कवि अपनी कविता का कच्चा माल भी है, उस पर पड़ने वाला लोहा भी, उस पर गिरने वाली आग भी। अचानक हमारे सामने एक ऐसी कविता है जो इस धमन भट्टी में लगातार रूप बदल रही है, लेकिन अनवरत जारी है- ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही- क्योंकि वह जितनी कविता है, उससे कहीं ज़्यादा अपने चारों तरफ पसरे हुए जीवन और जंगल की मार्मिक पहचान भी है।
शायद ज़्यादातर बड़ी रचनाओं में यही होता है- कृति और कृतिकार एक हो जाते हैं। लेकिन ज्यादातर लेखक जो चक्रव्यूह बनाते हैं, उससे निकलने का रास्ता भी जानते हैं- या कम से कम इतना जानते हैं कि वह सुरक्षित बिंदु कौन सा है जहां से वापस हो लिया जाए या ख़ुद को बचाकर निकल लिया जाए। मुक्तिबोध बस यह काम नहीं करते। वे अपने रचे हुए चक्रव्यूह में जैसे घूमते, झुलसते रहते हैं- बल्कि उस चक्रव्यूह को और बड़ा करते जाते हैं ताकि बाहर की जो तपिश है, वेदना है, बाहर का जो युद्ध है, वह पूरी तरह कविता में चला आए। ऐसा नहीं कि मुक्तिबोध को निकलना नहीं आता था- न निकलने के जोखिम से भी मुक्तिबोध पूरी तरह परिचित थे- अपने पास बार-बार आती जो अभिव्यक्ति है, उसके सामने उनकी प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि वे भय में भी होते हैं, संशय में भी होते हैं, लेकिन अंततः सबसे ज़्यादा इस निश्चय में होते हैं कि इस तार-तार अभिव्यक्ति को ज्यों का त्यों पा लें, उसकी संपूर्णता में अर्जित कर लें।
‘अंधेर में’ की शुरुआत से ही इस कोशिश का बहुत बहुत मार्मिक और मानवीय संघर्ष दिखता है। अंधकार, वेदना, रहस्य, भय- सब जैसे उनकी कविता के शुरू में ही अपने चरम पर हैं। इन सबको वे बिल्कुल मूर्त और ठोस ढंग से पकड़ने और व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। इस कविता की जो दृश्यबहुलता है, उसे देखते हुए ही शायद प्रभाकर माचवे ने इसे कविता में गुएर्निका करार दिया था, लेकिन यह पेंटिंग नहीं, एक पूरी फिल्म है। मुक्तिबोध जैसे कविता के सेल्युलाइड पर एक ‘हॉरर फिल्म’ बना रहे है। कविता के फॉर्म को छोड़कर, उसे तोड़ कर वे जैसे अपने समय की- और आने वाले समयों की भी- एक विराट पटकथा लिख रहे हैं। इस पटकथा में जिंदगी के कमरों में अंधेरे कोई लगातार चक्कर लगा रहा है जिसकी आवाज़ भर सुनाई देती है, जिसका सिर्फ घूमना महसूस होता है। इस तिलिस्मी खोह में भीत से चूना गिरता है और एक चेहरा बन जाता है- नुकीली नाक और भव्य ललाट वाला (क्या यह ख़ुद मुक्तिबोध हैं- या उनकी आत्मछवि?), इसके बाद शहर की पहाड़ी के पार का तालाब चला आता है, वहां भी अंधेरा है, लेकिन वृक्षों पर बिजलियां नाच रही हैं और इन्हीं के बीच किसी एक तिलिस्मी खोह का शिला द्वार खुलता है और वह ‘रक्तालोक स्नात पुरुष’ प्रगट होता है जिसका तेजोप्रभावमय ललाट देख कवि के अंग-अंग में एक थर-थर जाग उठती है लेकिन अंततः वह पाता है कि ‘वह रहस्यमय व्यक्ति / अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है /…मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव?’
मुक्तिबोध का यह कौन सा खेल है? या यह कैसी यातना है जिसे वे शब्दों में ढाल रहे हैं? यह फिल्मकार के अपनी फिल्म में, कृतिकार के अपनी कृति में दाखिल होने की विवशता है- जो शायद ‘हृदय में रिस रहे ज्ञान’ के इस तनाव से निकली है कि इस पटकथा, कविता या फिल्म के बाहर खड़े रहना उस प्रक्रिया को कुछ अधूरा छोड़ देना है जो अपनी परिपूर्णता में घटित हो रही है- उन प्रश्नों को भी, जिनके बिना जीवन और अभिव्यक्ति के अर्थ में समझ में नहीं आते?
क्योंकि यहां अचानक दृश्य ख़त्म हो जाते हैं और प्रश्न शुरू हो जाते हैं-
‘वह फटे वस्त्र क्यों पहने है?
उसका स्वर्णमुख मैला क्यों?
वक्ष पर इतना बडा घाव कैसे हो गया?
उसने कारावास दुख क्यों झेला?
उसकी इतनी भयानक स्थिति क्यों है?
रोटी उसे कौन पहुंचाता है?
कौन पानी देता है?
फिर भी उसके मुख पर स्मित क्यों है?
प्रचंड शक्तिमान क्यों दिखाई देता है?’

मुक्तिबोध इन्हें गंभीर और ख़तरनाक प्रश्न बताते हैं, लेकिन इनके जवाब मिलें- इसके पहले अचानक कुछ और हो जाता है। कवि के मुताबिक ‘बाहर के गुंजान / जंगलों से आती हुई हवा ने / फूंक मार कर एकाएक मशाल ही बुझा दी…/ कि मुझको यो अंधेरे में पकड़ कर / मौत की सज़ा दी।‘

यह कौन सी मशाल है? किसे मौत की सज़ा दी गई है? यह कोई पीछे छूटा डर है जो कवि के भीतर इस तरह उभरता है या आने वाला अंदेशा जो सवालों के तत्काल बाद उसके हिस्से की रोशनी बुझा देता है?
मुक्तिबोध के संदर्भ में इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। मेरी तरह के पाठक को जो अर्थ सबसे ज़्यादा आकृष्ट करता है, वह यही कि मुक्तिबोध का दृष्टिबोध इतना प्रखर है कि वे न सिर्फ बहुत सारी उलझी हुई सच्चाइयों को पहचान लेते हैं, बल्कि यह भी देख लेते हैं कि इस पहचानने को लिख देना बहुत जोखिम भरा है- इतना कि उसके लिए किसी को अंधेरे में पकड़ कर मौत की सज़ा दी जा सकती है।
इस पूरी कविता में यथार्थ, स्वप्न और फंतासी का यह उलझाव भरा जाल और भी बीहड़ रास्तों पर फैला दिखाई देता है- ‘समझ न पाया कि चल रहा स्वप्न या / जागृति शुरू है।‘ हिंदी कविता में अब बहुचर्चित हो चुका आधी रात का वह जुलूस, जिसमें जाने-पहचाने पत्रकार, सैनिक, कर्नल ब्रिगेडियर, जनरल, जगमगाते कवि, उद्योगपति, विचारक, मंत्री और कुख्यात हत्यारा डोमाजी उस्ताद तक शामिल हैं- मुक्तिबोध के इसी दृष्टिबोध का अनुपम साक्ष्य है जिसे उन्होंने साठ के उन शुरुआती दशकों में ही पहचान लिया था और तब भी वे जिसे पहचानने की सज़ा जानते थे- ‘हाय-हाय! मैंने उन्हें देख लिया नंगा / इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।‘

ऐसा लगता है, जैसे मुक्तिबोध भविष्य को देख रहे हैं। आधी रात का वह जुलूस हमारे समय में अब चौबीस घंटे चलता रहता है और वाकई उसमें वे सब लगातार मौजूद रहते हैं जिनका ज़िक्र मुक्तिबोध किसी अंधेरे में पचास साल पहले कर गए थे। यह हमारे समय का वह वृत्तांत है जिसे मुक्तिबोध जैसे पूरे ब्योरों के साथ दर्ज कर गए हैं। सच देखने की, सच बोलने की, सच के लिए खड़ा होना चाहने की सज़ाएं क्या हैं- इसका भी बयान है। जैसे मुक्तिबोध ने बिल्कुल अनुभव किया हो कि सत्ता जब थर्ड डिग्री की यातनाएं देती है तो वे कितनी अमानवीय होती हैं।

लेकिन स्वप्न, फंतासी और यथार्थ का यह खेल चलता रहता और मुक्तिबोध अपनी अभिव्यक्ति की तलाश में खोए अंतर्द्वंद्वों वाले कवि होते तो शायद ‘अंधेरे में’ इतनी बड़ी कविता नहीं होती। कविता बड़ी बारीकी से बदलती है। फिल्म बदलती है, (बकौल मुक्तिबोध, सीन बदलता है) और ‘अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा / मुझे डर लगता है ऊंचाइयों से; / बजने दो सांकल!! / उठने दो अंधेरे में ध्वनियों के बुलबुले / वह जन…वैसे ही / आप चला जाएगा आया था जैसे। / खड्डे के अंधेरे में / मैं पड़ा रहूंगा पीड़ाएं समेटे/’ जैसी अकेलेपन और वेधक बेचारगी से गुज़रने वाली कविता आख़िरकार यह महसूस करती है, ‘अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे / उठाने ही होंगे। / तोड़ने होंगे ही मठ और गढ सब / पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार।‘

हालांकि यह यात्रा इतनी सरल नहीं है। कवि भीषण भय और उत्कट उम्मीद के बीच लगातार जैसे एक तनी हुई नहीं, बल्कि वक़्त के थपेड़ों से बार-बार हिलती हुई रस्सी पर चलने की कोशिश में है। इस कोशिश में वह कभी अपने सिद्धांतवादी और आदर्शवादी मन से पूछता है कि ‘अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया!!….दुखों के दागों को तमगे सा पहना, अपने ही खयालों में दिन रात रहना असंग बुद्धि व अकेले में सहना, ज़िंदगी निष्क्रिय बन गई तलघर, अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया!!’ ‘अंधेरे में’ के वक्र-जटिल शिल्प के बीच अचानक आया यह गीतात्मक अंतराल लेकिन देर तक नहीं टिकता, वह फौरन फिर से संशय, एक अंदेशे में ढलता है- ‘गलियों में अंधकार भयावह…./ मानो मेरे ही कारण लग गया / मार्शल लॉ वह, मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया…/ निष्क्रिय संज्ञा किसी मार्शल लॉ की ज़िम्मेदार हो सकती है, यह वही कवि समझ और महसूस कर सकता है जिसे सत्ता-व्यवस्था और जनता के बीच के जटिल रिश्ते की सही और खरी पहचान हो।
‘जीवन क्या जिया’ की तरह की एक और टेक अंधेरे में आती है- ‘भागता मैं दम छोड़ / घूम गया कई मोड़’। जाहिर है, यह देखना-भागना-घूमना वह स्वानुभूत प्रक्रिया है जिसने कवि को उसका यथार्थ दिया है। उसके हिस्से यंत्रणाओं की स्मृतियों और दमन के अंदेशे हैं, वह बार-बार अपनी अभिव्यक्ति तक पहुंचता है. उसे पहचानता है, लेकिन उसे हासिल करने से डरता है- लेकिन अंततः वह सारे डरों के पार जाता है। खास बात ये है कि अब उसकी अभिव्यक्ति किसी तिलिस्मी खोह से, किसी रहस्यमय गुफ़ा से नहीं आती, वह लोगों के बीच से निकलती है, वहीं घूमती है, उन्हीं के बीच कातर पड़ती है, रक्ताक्त होती है, जर्जर होती है लेकिन अंततः वहीं पूर्णता हासिल करती है। ‘परम अभिव्यक्ति / अविरत घूमती है जग में / पता नहीं, जाने कहां, जाने कहां / वह है। / इसलिए मैं हर गली में / और हर सड़क पर / झांक-झांक कर देखता हूं हर एक चेहरा / प्रत्येक गतिविधि, / प्रत्येक चरित्र / व हर एक आत्मा का इतिहास, / हर एक देश, व राजनीतिक स्थिति और परिवेश / प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श, / विवेक प्रक्रिया, क्रियागत परिणति !! / खोजता हूं पहाड़.. पठार… समुंदर, / जहां मिल सके मुझे / मेरी वह खोई हुई / परम अभिव्यक्ति अनिवार / आत्मसंभवा।‘

यह अंधेरे का अंत है। लेकिन इतना आसान नहीं है। इस अभिव्यक्ति को पहचानना पड़ता है। उसे खोजना पड़ता है, बार-बार साधना पड़ता है। वह मिल जाती है, वह ख़तरे में पड़ती है, जब मिल जाती है तो फिर सांवली हवाओं में काल टहलता है। वह ‘स्वानुभूत आदर्श’ है, यानी किताबी नहीं। महत्त्वपूर्ण बस इतना है कि वह अनिवार्य और आत्मसंभवा है।

हालांकि मुक्तिबोध के ऐसे सरल भाष्य उस विराट अंधेरे की विडंबनामूलक विभीषिका को ख़त्म कर देते हैं जो इस कविता में पर्यावरण की तरह छाया हुआ है। मुक्तिबोध आस्था तो देते हैं, लेकिन मुक्ति नहीं देते। उनकी कविता शब्द-शब्द पढ़ने के लिए नहीं है। वह उस मनोवेग को पहचानने के लिए है जो सत्ता में निहित अन्याय और हिंसा के अंदेशे के बीच संवेदनात्मक तीव्रता से भरे किसी कवि के भीतर पैदा हो सकता है। ‘अंधेरे में’ की महानता इस तथ्य में भी निहित है कि व्यक्ति से समाज तक, निजी से सामूहिक तक, अंतर्भूत वेदना से बहिर्जगत के विवेक तक आवाजाही करते हुए भी उसकी ऊर्जस्वित तीव्रता कभी कम नहीं होती। दूसरी बात यह कि यह पूरी कविता जैसे लगातार बन रही है। जो ‘हॉरर फिल्म’ मुक्तिबोध बना रहे हैं, उसमें बनती-मिटती आकृतियों और आवाज़ों का एक पूरा जंगल है जो ‘अंधेरे में’ को एक अलग आयाम देता है।

दरअसल यहां यह भी खयाल आता है कि ‘अंधेरे में’ को मुक्तिबोध की पूरी काव्य यात्रा में अलग से नहीं पढ़ा जा सकता। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के हवाले से लिखा है कि मुक्तिबोध जीवन भर एक ही कविता ‘अंधेरे में’ लिखते रहे। यह पूरा सच भले न हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इस कविता को पढते हुए मुक्तिबोध की कई और कविताओं की बेसाख्ता याद आती है। ‘ चांद का मुंह टेढ़ा है’, ‘भूल गलती’, या ऐसी अन्य कई कविताओं का अंतिम पाठ बनाती यह कविता फिर भी जैसे अंतिम पाठ नहीं लगती। इस लिहाज से लगता है कि ‘असाध्य वीणा’ भले अज्ञेय ने लिखी हो, लेकिन उसे साध मुक्तिबोध रहे थे- बेशक, किसी राजा के आग्रह पर पधारे प्रियंवद गुफागेह केशकंबली की तरह नहीं, बल्कि अपनी गुफा के अंधेरे में बैठे एक तपस्वी की तरह। और जो वह साध गए, वह एक बीहड़ राग है जो हमारी आत्माओं के अंधेरे में अब भी उतरता है और बीच-बीच में ऐसी चमक पैदा करता है जिसकी रोशनी में हम अपनी ही खोई हुई अभिव्यक्ति का सुराग पाते हैं।

इस बात का बहुत बार ज़िक्र किया गया है कि ‘अंधेरे में” में टॉल्स्टाय भी आते हैं और गांधी भी। वे अनायास चले आते हैं या इसलिए भी कि कहीं मुक्तिबोध के अवचेतन में अपनी अभिव्यक्ति, अपने विचार के लिए ये दो मॉडल रहे होंगे? कम से कम मेरे लिए यह बताना मुश्किल है। लेकिन दरअसल मुक्तिबोध अपने काल से बंधे हुए कवि नहीं हैं। वे आसान राजनीतिक-सामाजिक या मानवीय व्याख्याओं के लिए भी नहीं हैं। उनका जटिल काव्य-वितान उन्हें आम लोकप्रिय कवि भी नहीं रहने देता। हालांकि इसके बावजूद यह बात बार-बार कही गई है और शायद बहुत दूर तक सच भी है कि अपने निधन के इन पचास वर्षों में मुक्तिबोध कभी काव्य-परिदृश्य से धूमिल नहीं हुए, बल्कि उनकी कीर्ति कुछ बढ़ी ही है। फिर भी मुक्तिबोध को लोकप्रियता की तलाश न थी, न तब मिली होगी और न आगे मिलेगी। लेकिन लोकप्रियता और प्रासंगिकता दो अलग-अलग चीज़ें हैं। लोकप्रिय होने की परवाह न करने की वजह से ही मुक्तिबोध हमारे इस समय में भी- जब पूरी हिंदी पट्टी की चूलें हिली हुई हैं. मध्यवर्ग उपभोक्ता वर्ग में बदल चुका है, पठन-पाठन का अभ्यास छूट रहा है, सरलीकरणों और सतहीपन का बोलबाला है- इस तरह प्रासंगिक और ज़रूरी लगते हैं कि हम उनसे आंख मिलाने से भी बचते हैं, और फिर उन्हें देखने-पढ़ने भी लगते हैं।

दरअसल मुक्तिबोध जितने रहस्यमय और जादुई दिखते हैं, उतने ही ठोस यथार्थवादी हैं- उनकी कविताओं के गझिन शिल्प के झाड़-झंखाड़ और फूल-पत्ते हटाकर देखें तो जैसे अस्तित्व की असह्य वेदना के बीच मुक्ति के स्वप्न में विचरती और बिल्कुल सूक्तियों में ढलती पंक्तियां मिलती हैं। उनका फलक बहुत विस्तृत है। कभी-कभी वे प्रसाद और निराला की तरह उदात्त हो उठते हैं, अक्सर काफ़्का की तरह संशयशील, कभी शमशेर जैसे सुंदर और अक्सर अपने बीहड़ वितान में ऐसे महाकाव्यात्मक, जिनको ठीक से पढ़ने-समझने के लिए बार-बार उनकी कविता में दाखिल होना पड़ता है। कमाल यह है कि उनका यथार्थ-बोध कई स्तरों पर इतना स्पष्ट और खरा है कि वह हमें अपनी समकालीनता को समझने के सबसे सूक्ष्म उपकरण सुलभ कराता है और कई स्तरों पर इतना मानवीय कि वह हमें एक सुकोमल-सार्वकालिक अनुभव-बोध के बीच छोड़ जाता है।

(प्रियदर्शन, NDTV)

साभार : बहुवचन

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फ़रवरी 9, 2015

प्यारे बच्चों…

प्यारे बच्चो, हम तुम्हारे काम नहीं आ सके । तुम चाहते थे हमारा क़ीमती
समय तुम्हारे खेलों में व्यतीत हो । तुम चाहते थे हम तुम्हें अपने खेलों
में शरीक करें । तुम चाहते थे हम तुम्हारी तरह मासूम हो जाएँ ।

प्यारे बच्चो, हमने ही तुम्हें बताया था जीवन एक युद्धस्थल है जहाँ
लड़ते ही रहना होता है । हम ही थे जिन्होंने हथियार पैने किये । हमने
ही छेड़ा युद्ध हम ही थे जो क्रोध और घृणा से बौखलाए थे । प्यारे
बच्चो, हमने तुमसे झूठ कहा था ।

यह एक लम्बी रात है । एक सुरंग की तरह । यहाँ से हम देख सकते
हैं बाहर का एक अस्पष्ट दृश्य । हम देखते हैं मारकाट और विलाप ।

बच्चो, हमने ही तुम्हें वहाँ भेजा था । हमें माफ़ कर दो । हमने झूठ कहा
था कि जीवन एक युद्धस्थल है ।

प्यारे बच्चो, जीवन एक उत्सव है जिसमें तुम हँसी की तरह फैले हो ।
जीवन एक हरा पेड़ है जिस पर तुम चिड़ियों की तरह फड़फड़ाते हो ।

जैसा कि कुछ कवियों ने कहा है जीवन एक उछलती गेंद है और
तुम उसके चारों ओर एकत्र चंचल पैरों की तरह हो ।

प्यारे बच्चो, अगर ऐसा नहीं है तो होना चाहिए ।

(मंगरेश डबराल)

फ़रवरी 8, 2015

दलाली … हरिशंकर परसाई की दृष्टि से

एक दिन राजा ने खीझकर घोषणा कर दी कि मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जाएेगा।

सुबह होते ही लोग बिजली के खम्भों के पास जमा हो गये। उन्होंने खम्भों की पूजा की,आरती उतारी और उन्हें तिलक किया।

शाम तक वे इंतजार करते रहे कि अब मुनाफाखोर टांगे जाएेंगे- और अब। पर कोई नहीं टाँगा गया।

लोग जुलूस बनाकर राजा के पास गये और कहा,”महाराज,आपने तो कहा था कि मुनाफाखोर बिजली के खम्भे से लटकाये जाएेंगे,पर खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं और मुनाफाखोर स्वस्थ और सानन्द हैं।”

राजा ने कहा,”कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जाएेगा। थोड़ा समय लगेगा। टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही,सब मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा।

भीड़ में से एक आदमी बोल उठा,”पर फन्दे बनाने का ठेका भी तो एक मुनाफाखोर ने ही लिया है।”

राजा ने कहा,”तो क्या हुआ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जाएेगा।”

तभी दूसरा बोल उठा,”पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी मैं ही ले लूँगा।”

राजा ने जवाब दिया,”नहीं,ऐसा नहीं होगा। फाँसी देना निजी क्षेत्र का उद्योग अभी नहीं हुआ है।”

लोगों ने पूछा,” तो कितने दिन बाद वे लटकाये जाएेंगे।”

राजा ने कहा,”आज से ठीक सोलहवें दिन वे तुम्हें बिजली के खम्भों से लटके दीखेंगे।”

लोग दिन गिनने लगे।

सोलहवें दिन सुबह उठकर लोगों ने देखा कि बिजली के सारे खम्भे उखड़े पड़े हैं। वे हैरान हो गये कि रात न आँधी आयी न भूकम्प आया,फिर वे खम्भे कैसे उखड़ गये!

उन्हें खम्भे के पास एक मजदूर खड़ा मिला। उसने बतलाया कि मजदूरों से रात को ये खम्भे उखड़वाये गये हैं। लोग उसे पकड़कर राजा के पास ले गये।

उन्होंने शिकायत की ,”महाराज, आप मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से लटकाने वाले थे ,पर रात में सब खम्भे उखाड़ दिये गये। हम इस मजदूर को पकड़ लाये हैं। यह कहता है कि रात को सब खम्भे उखड़वाये गये हैं।”

राजा ने मजदूर से पूछा,”क्यों रे,किसके हुक्म से तुम लोगोंने खम्भे उखाड़े?”

उसने कहा,”सरकार ,ओवरसियर साहब ने हुक्म दिया था।”

तब ओवरसियर बुलाया गया।

उससे राजा ने कहा,” क्यों जी तुम्हें मालूम है ,मैंने आज मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटकाने की घोषणा की थी?”

उसने कहा,”जी सरकार!”

“फिर तुमने रातों-रात खम्भे क्यों उखड़वा दिये?”

“सरकार,इंजीनियर साहब ने कल शाम हुक्म दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ दिये जाएें।”

अब इंजीनियर बुलाया गया। उसने कहा उसे बिजली इंजीनियर ने आदेश दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ देना चाहिये।

बिजली इंजीनियर से कैफियत तलब की गयी,तो उसने हाथ जोड़कर कहा,”सेक्रेटरी साहब का हुक्म मिला था।”

विभागीय सेक्रेटरी से राजा ने पूछा,खम्भे उखाड़ने का हुक्म तुमने दिया था।”

सेक्रेटरी ने स्वीकार किया,”जी सरकार!”

राजा ने कहा,” यह जानते हुये भी कि आज मैं इन खम्भों का उपयोग मुनाफाखोरों को लटकाने के लिये करने वाला हूँ,तुमने ऐसा दुस्साहस क्यों किया।”

सेक्रेटरी ने कहा,”साहब ,पूरे शहर की सुरक्षा का सवाल था। अगर रात को खम्भे न हटा लिये जाते, तो आज पूरा शहर नष्ट हो जाता!”

राजा ने पूछा,”यह तुमने कैसे जाना? किसने बताया तुम्हें?

सेक्रेटरी ने कहा,”मुझे विशेषज्ञ ने सलाह दी थी कि यदि शहर को बचाना चाहते हो तो सुबह होने से पहले खम्भों को उखड़वा दो।”

राजा ने पूछा,”कौन है यह विशेषज्ञ? भरोसे का आदमी है?”

सेक्रेटरी ने कहा,”बिल्कुल भरोसे का आदमी है सरकार।घर का आदमी है। मेरा साला होता है। मैं उसे हुजूर के सामने पेश करता हूँ।”

विशेषज्ञ ने निवेदन किया,” सरकार ,मैं विशेषज्ञ हूँ और भूमि तथा वातावरण की हलचल का विशेष अध्ययन करता हूँ। मैंने परीक्षण के द्वारा पता लगाया है कि जमीन के नीचे एक भयंकर प्रवाह घूम रहा है। मुझे यह भी मालूम हुआ कि आज वह बिजली हमारे शहर के नीचे से निकलेगी। आपको मालूम नहीं हो रहा है ,पर मैं जानता हूँ कि इस वक्त हमारे नीचे भयंकर बिजली प्रवाहित हो रही है। यदि हमारे बिजली के खम्भे जमीन में गड़े रहते तो वह बिजली खम्भों के द्वारा ऊपर आती और उसकी टक्कर अपने पावरहाउस की बिजली से होती। तब भयंकर विस्फोट होता। शहर पर हजारों बिजलियाँ एक साथ गिरतीं। तब न एक प्राणी जीवित बचता ,न एक इमारत खड़ी रहती। मैंने तुरन्त सेक्रेटरी साहब को यह बात बतायी और उन्होंने ठीक समय पर उचित कदम उठाकर शहर को बचा लिया।

लोग बड़ी देर तक सकते में खड़े रहे। वे मुनाफाखोरों को बिल्कुल भूल गये। वे सब उस संकट से अविभूत थे ,जिसकी कल्पना उन्हें दी गयी थी। जान बच जाने की अनुभूति से दबे हुये थे। चुपचाप लौट गये।

उसी सप्ताह बैंक में इन नामों से ये रकमें जमा हुईं:-

सेक्रेटरी की पत्नी के नाम- २ लाख रुपये

श्रीमती बिजली इंजीनियर- १ लाख

श्रीमती इंजीनियर -१ लाख

श्रीमती विशेषज्ञ – २५ हजार

श्रीमती ओवरसियर-५ हजार

उसी सप्ताह ‘मुनाफाखोर संघ’ के हिसाब में नीचे लिखी रकमें ‘धर्मादा’ खाते में डाली गयीं-

कोढ़ियों की सहायता के लिये दान- २ लाख रुपये

विधवाश्रम को- १ लाख

क्षय रोग अस्पताल को- १ लाख

पागलखाने को-२५ हजार

अनाथालय को- ५ हजार

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