जुलाई 11, 2016

नारी … (महात्मा गाँधी)

“नारी” पुरुष की सहचर है, सहगामी है, संगी है, साथी है, और उसकी क्षमताएं किसी भी मायने में पुरुष से कमतर नहीं हैं|

नारी के पास पुरुष की गतिविधियों की बारीकियों में सम्मिलित होने का अधिकार है, और उसके पास, जैसे पुरुष के पास स्त्री के प्रति है, पुरुष जैसी ही स्वतंत्रता और छूट है|

सेवा और त्याग की आत्मा के जीते जागते उदाहरण के रूप में मैंने नारी को पूजा है|

प्रकृति ने जैसे नारी को स्वहित से परे की सेवा की आत्मिक शक्ति से नारी को परिपूर्ण किया है, उस शक्ति की बराबरी पुरुष कभी भी नहीं कर सकता|”

जून 3, 2016

कॉल ड्राप का गोरखधंधा… (के.एन. गोविंदाचार्य)

4 दिन पूर्व कॉल ड्राप के बारे में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को लिखा विस्तृत पत्र आप सभी के साथ साझा कर रहा हूं   – के. एन. गोविंदाचार्य

दिनांक-30 मई 2016
प्रिय मित्र श्री नरेंद्र जी,

सादर नमस्ते!

सरकार की दूसरी वर्षगांठ पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं। राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए आपकी सरकार ने डिजीटल इंडिया समेत कई योजनाओं की शुरुआत की है परंतु सार्थक बदलावतो योजनाओं के सही क्रियान्वयन से ही आ सकता है। सुशासन के लिए आपने सार्थक सहयोग और सकारात्मक आलोचना हेतु जो अपील की है वह निश्चित ही स्वागत योग्य हैं। आज के समाचार पत्रों में टेलीकॉम कंपनियों द्वारा कॉल ड्रॉप के माध्यम से धांधली की खबर पर आपका ध्यानाकर्षित करना चाहता हूं, जिसकी वजह से 100 करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ता बेवजह लुट रहे हैं (संलग्नक-1)।

टेलीकॉम कंपनियों द्वारा मोबाइल नेटवर्क में निवेश की कमी से कॉल ड्रॉप एक राष्ट्रीय महामारी बन गई है। इसपर आप भी गंभीर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए 16 अक्तूबर 2015 को नियम बनाया था जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मई 2016 के निर्णय से निरस्त कर दिया है। फैसले के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख सरकार द्वारा तथ्यों का सही प्रस्तुतीकरण नहीं किया गया, इसका संक्षिप्त विवरण मेरे पत्र के साथ संलग्न है (संलग्नक-2)। हमारी वज्र फाउंडेशन की टीम ने फैसले के विस्तृत अध्ययन के पश्चात कानूनी बिंदुओं कानिर्धारण किया है जिनका संक्षिप्त प्रस्तुतिकरण इस पत्र के साथ संलग्न है (संलग्नक-3)। मैं आशा करता हूं कि आप अविलंब दूरसंचार मंत्रालय तथा ट्राई को इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार सरकार द्वारा कॉल ड्रॉप पर मुआवजे का नियम सही तरीके से नहीं बनाया गया था। इस बारे में संसद को नया कानून पारित करना होगा। यदि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सहमत है तो फिर नए कानून के लिए अविलंब अध्यादेश जारी करना चाहिए जिससे देश में सबसे बड़े उपभोक्ता वर्ग ( जिनमें से अधिकांश मध्यवर्गीय और गरीब हैं ) को राहत मिल सके।

दरअसल कॉल ड्रॉप में उपभोक्ता की मोबाइल पर बात होती ही नहीं है तो फिर उस पर टेलीकॉम कंपनियों द्वारा पैसा वसूली एक खुली लूट ही है। इस पर सरकार लगाम लगाने में विफल रही है।आज के समाचार से स्पष्ट है कि जुर्माने से बचने के लिए टेलीकॉम कंपनिया अब ‘रेडियो लिंक टेक्नोलॉजी’ से उपभोक्ताओं को ठग रही हैं जिससे अब कॉल ड्रॉप के बावजूद कनेक्शन नहीं कटता। अटॉर्नी जनरल श्री मुकुल रोहतगी ने कॉल ड्रॉप मामले में बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मोबाइल कंपनियां कार्टेल बनाकर जनता को लूट रही हैं। कॉल ड्रॉप मामले में आम जनता किस तरह ठगी गई है उसकी पुष्टि के लिए मैं संक्षिप्त विवरण आपको भेज रहा हूं (संलग्नक 4)।

कॉल ड्रॉप पर निर्धारित मापदंडों का पालन नहीं करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों पर सख्त पेनॉल्टी के प्रावधान हैं जिनका ट्राई द्वारा पालन नहीं हो रहा है। कॉल ड्रॉप में बगैर सेवा दिए टेलीकॉम कंपनियों द्वारा पिछले कुछ सालों में ग्राहकों से हजारों करोड़ की अवैध वसूली की गई है।इसे ग्राहक निधि में जमा कराने के लिए 2007 के कानून का पालन हो यहसुनिश्चित कराने की आवश्यकता है।

मैं आशा करता हूं कि हमारे प्रतिवेदन का संज्ञान लेते हुएआप माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख अविलंब पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश देंगे। कानूनों के क्रियान्वयन से जनता को प्रभावी न्याय तथा सुशासन दिलाने के लिए मैं ऐसे अन्य विषयों पर आपको सहयोग देता रहूंगा जिससे हम सभी का राष्ट्रीय स्वप्न साकार हो सके।

शुभकामनाओं सहित।
सादर

(के एन गोविंदाचार्य)
श्री नरेंद्र मोदी जी,
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली

प्रति-

1- श्री रविशंकर प्रसाद, दूरसंचार मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली
2- श्री आर एस शर्मा, चेयरमैन, ट्राई, नई दिल्ली

मई 27, 2016

जल-हल

जल में हल
हल का जल,
जल ही जीवन
जीवन का हल,
हल का फल
फल का रस,
रस ही सार
सार ही धार,
धार का धौरा
धौरा में जल,
जल की माया
माया में काया,
काया बिन न कुछ पाया
पाया है तो आगे चल,
चल तू , जन गण तक
तक ना, थक ना,
ना थक चलता जा
जा पायेगा जल का हल,
हल का जल
जल सबका जल,
जल ही जीवन
जीवन का हल |
जल की धारा
धारा का जल,
जल है प्यारा
प्यारा है सहारा,
सहारा टूटा
टूटा जीवन,
जीवन खाली
खाली खेत,
खेत में उडती
उडती सूखी रेत,
रेत बिन पानी
पानी बिन सूना,
सूना जीवन
जीवन जिजिविषा,
जिजिविषा जिलाए
जिलाए किसान,

किसान का अन्न
अन्न की रोटी,
रोटी का जल
जल सबका जल,
जल ही जीवन
जीवन का हल

(रमेश चंद शर्मा  – गाँधी शांति प्रतिष्ठान) – स्वराज अभियान के जल-हल आंदोलन के संदर्भ में रची कविता!

मई 23, 2016

मुसलमान … (देवी प्रसाद मिश्र)

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे

वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया

वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे

उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की

प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे

न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे

वे मुसलमान थे

वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू

वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं

वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे

वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए

कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे

वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती

वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता

वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे

वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे

इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे

वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे

वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे

वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे

वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं

वे शहर के बाहर रहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं

उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे

वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है

अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे

वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे

कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए

वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे

सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे

वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसल

मान थे अफ़वाह नहीं थे

वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे”

 

 (देवीप्रसाद मिश्र)
मई 22, 2016

मीना कुमारी …(गुलज़ार)

GulzarMeenaKumari-001शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लमहा-लमहा खोल रही है
पत्ता-पत्ता बीन रही है
एक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायन
एक-एक साँस को खोल के, अपने तन
पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की क़ैदी
रेशम की यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जाएगी।
(गुलज़ार)

मई 17, 2016

प्रकृति एवं जैव-विविधता – महात्मा गाँधी

Gandhiहम प्रकृति के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए पारिस्थितिकी आंदोलन (इकॉलोजी मूवमेंट) तब तक नहीं चला सकते जब तक कि अहिंसा के नियम मानव सभ्यता के केन्द्र बिन्दु नहीं बन जाते|

इंसान के पास जीवन को रचने की शक्ति नहीं है और इसीलिये उसके पास जीवन को नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है|

किसी भी समाज को इस कसौटी पर जांचा जा सकता है कि उसका जानवरों के प्रति व्यवहार कैसा है?

यह कहना एक अहंकारजनित अवधारणा है कि मानव के पास बाकी जीव जंतुओं का स्वामितव है और वह उनका भगवान है| इसके उलट, प्रकृति दवारा मानव जीवन को दिए गये वरदानों के कारण, मानव को एक ट्रस्टी के रूप में जीव-जंतुओं की देखभाल की जिम्मेदारी उठानी चाहिए|

वन्य जीवन जंगलों में कम होता जा रहा है लेकिन शहरों में यह बढ़ता ही जाता है|

जीवन में हम अपने आसपास जितनी भी विविधता देखते हैं प्रकृति ने एक मूल एकता के सूत्र से हम सबको आपस में जोड़ रखा है|

मुझे प्रकृति के सिवा कहीं और से प्रेरणा लेने की आवश्यकता नहीं होती| प्रकृति ने कभी मुझे निराश नहीं किया| प्रकृति के रहस्य नित नये रूप में सामने आते हैं,  और वह मुझे हमेशा ही आश्चर्यचकित करती है| प्रकृति ही है जिसने मुझे आनंद की पराकाष्टा का अनुभव अकसर ही कराया है|

 

 

मई 16, 2016

स्वच्छता … ( महात्मा गांधी )

gandhi2“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन/दिमाग का वास हो सकता है”|

कोई भी ऐसा व्यक्ति जो लापरवाही से इधर उधर थूक कर, कूड़ा करकट फेंककर या अन्य तरीकों से जमीन को गंदा करता है, वह इंसान और प्रकृति के विरुद्ध पाप करता है| दुर्भाग्य से हम सामाजिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता की महत्ता को नहीं समझते|

हम अपने कुओं, पोखरों और नदियों की शुद्धता का बिल्कुल भी सम्मान नहीं करते और उनके किनारे ही गंदे नहीं करते वरन अपने शरीर की गंदगी से इन प्राकृतिक वरदानों के जल को भी गंदा करते हैं| भारतीयों की इस बेहद शर्मनाक कमी से ही हमारे गाँवों में असम्मानजनक स्थितियां बनी रहती हैं और इसी कारण पवित्र नदियों के पवित्र किनारे गंदे दिखाई देते हैं और इस कारण उत्पन्न अस्वच्छता से विभिन्न बीमारियाँ भारतीयों को अपना शिकार बनाए रखती है|

“देश के अपने भ्रमण के दौरान मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ गंदगी को देखकर हुई…इस संबंध में अपने आप से समझौता करना मेरी मजबूरी है।’

‘इस तरह की संकट की स्थिति में तो यात्री परिवहन को बंद कर देना चाहिए लेकिन जिस तरह की गंदगी और स्थिति रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बों में है उसे जारी नहीं रहने दिया जा सकता क्योंकि वह हमारे स्वास्थ्य और नैतिकता को प्रभावित करती है। निश्चित तौर पर तीसरी श्रेणी के यात्री को जीवन की बुनियादी जरूरतें हासिल करने का अधिकार तो है ही। तीसरे दर्जे के यात्री की उपेक्षा कर हम लाखों लोगों को व्यवस्था, स्वच्छता, शालीन जीवन की शिक्षा देने, सादगी और स्वच्छता की आदतें विकसित करने का बेहतरीन मौका गवां रहे हैं।’

‘मैं पवित्र तीर्थ स्थान डाकोर गया था। वहां की पवित्रता की कोई सीमा नहीं है। मैं स्वयं को वैष्णव भक्त मानता हूं, इसलिए मैं डाकोर जी की स्थिति की विशेष रूप से आलोचना कर सकता हूं। उस स्थान पर गंदगी की ऐसी स्थिति है कि स्वच्छ वातावरण में रहने वाला कोई व्यक्ति वहां 24 घंटे तक भी नहीं ठहर सकता। तीर्थ यात्रियों ने वहां के टैंकरों और गलियों को प्रदूषित कर दिया है।’

‘हमें पश्चिम में नगरपालिकाओं द्वारा की जाने वाली सफाई व्यवस्था से सीख लेनी चाहिए…पश्चिमी देशों ने कोरपोरेट स्वच्छता और सफाई विज्ञान किस तरह विकसित किया है उससे हमें काफी कुछ सीखना चाहिए… पीने के पानी के स्रोतों की उपेक्षा जैसे अपराध को रोकना होगा…’

‘लोक सेवक संघ के कार्यकर्ता को गांव की स्वच्छता और सफाई के बारे में जागरूक करना चाहिए और गांव में फैलने वाली बिमारियों को रोकने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए’

Ganga‘वह (कांग्रेसी कार्यकर्ता) गांव के धर्मगुरु या नेता के रूप में लोगों के सामने न आएं बल्कि अपने हाथ में झाड़ू लेकर आएं। गंदगी, गरीबी निठल्लापन जैसी बुराइयों का सामना करना होगा और उससे झाड़ू कुनैन की गोली और अरंडी के तेल साथ लड़ना होगा…’

‘गांव में रहने वाले प्रत्येक बच्चे, पुरुष या स्त्री की प्राथमिक शिक्षा के लिए, घर-घर में चरखा पहुंचाने के लिए, संगठित रूप से सफाई और स्वच्छता के लिए पंचायत जिम्मेदार होनी चाहिए”

‘बच्चों के लिए स्वच्छता और सफाई के नियमों के ज्ञान के साथ ही उनका पालन करना भी प्रशिक्षण का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए,… ”

 

 

 

मई 12, 2016

अज्ञेय से … (शमशेर बहादुर सिंह)

अज्ञेय से

जो नहीं है
जैसे कि ‘सुरुचि’
उसका गम क्‍या?
वह नहीं है।

किससे लड़ना?

रुचि तो है शान्ति,
स्थि‍रता,
काल-क्षण में
एक सौन्दर्य की
मौन अमरता।

अस्थिर क्‍यों होना
फिर?

जो है
उसे ही क्‍यों न सँजोना?
उसी के क्‍यों न होना!-
जो कि है।

जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका गम क्‍या?
वह नहीं है।

* * * * *

एक पीली शाम
 

 

एक पीली शाम
पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता
शान्त
मेरी भावनाओं में तुम्‍हारा मुखकमल
कृश म्‍लान हारा-सा
(कि मैं हूँ वह
मौन दर्पण में तुम्‍हारे कहीं?)     वासना डूबी
शिथिल पल में
स्‍नेह काजल में
लिये अद्भुत रूप-कोमलताअब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू
सान्‍ध्‍य तारक-सा
अतल में।

आओ

1
क्‍यों यह धुकधुकी, डर, –
दर्द की गर्दिश यकायक साँस तूफान में गोया।
छिपी हुई हाय-हाय में
सुकून
की तलाश।

                 बर्फ के गालों में है खोया हुआ
या ठंडे पसीने में खामोश है
शबाब।

तैरती आती है बहार
पाल गिराए हुए
भीने गुलाब – पीले गुलाब
के।
तैरती आती है बहार
खाब के दरिया में
उफक से
जहाँ मौत के रंगीन पहाड़
है।
जाफरान
जो हवा में है मिला हुआ
साँस में भी है।
मुँद गयी पलकों में कोई सुबह
जिसे खून के आसार कहेंगे।
– खो दिया है मैंने तुम्‍हें।

2
कौन उधर है ये जिधर घाट की दीवार… है?
वह जल में समाती हुई चली गयी है;
लहरों की बूँदों में
करोड़ों किरनों
की जिन्दगी
का नाटक-सा : वह
मैं तो नहीं हूँ।

फिर क्‍यों मुझे (अंगों में सिमिट कर अपने)
तुम भूल जाती हो
पल में :
तुम कि हमेशा होगी
मेरे साथ,
तुम भूल न जाओ मुझे इस तरह।  * *

एक गीत मुझे याद है।
हर रोम के नन्‍हें-से कली-मुख पर कल
सिहरन की कहानी मैं था;
हर जर्रे में चुम्‍बन के चमक की पहचान।
पी जाता हूँ आँसू की कनी-सा वह पल।

ओ मेरी बहार!
तू मुझको समझती है बहुत-बहुत – – तू जब
यूँ ही मुझे बिसरा देती है।

खुश हूँ कि अकेला हूँ,
कोई पास नहीं है –
बजुज एक सुराही के,
बजुज एक चटाई के,
बजुज एक जरा-से आकाश के,
जो मेरा पड़ोसी है मेरी छत पर
(बजुज उसके, जो तुम होतीं – मगर हो फिर भी
यहीं कहीं अजब तौर से।)

तुम आओ, गर आना है
मेरे दीदों की वीरानी बसाओ;
शे’र में ही तुमको समाना है अगर
जिन्दगी में आओ, मुजस्सिम…
बहरतौर चली आओ।
यहाँ और नहीं कोई, कहीं भी,
तुम्‍हीं होगी, अगर आओ;
तुम्‍हीं होगी अगर आओ, बहरतौर चली आओ अगर।
(मैं तो हूँ साये में बँधा-सा
दामन में तुम्‍हारे ही कहीं, एक गिरह-सा
साथ तुम्‍हारे।)

3
तुम आओ, तो खुद घर मेरा आ जाएगा
इस कोनो-मकाँ में,
तुम जिसकी हया हो,
लय हो।

उस ऐन खमोशी की – हया-भरी
इन सिमतों की पहनाइयाँ मुझको
पहनाओ!
तुम मुझको
इस अंदाज से अपनाओ
जिसे दर्द की बेगानारवी कहें,
बादल की हँसी कहें,
जिसे कोयल की
तूफान-भरी सदियों की
चीखें,
कि जिसे ‘हम-तुम’ कहें।

(वह गीत तुम्‍हें भी तो
याद होगा?)

टूटी हुई, बिखरी हुई


टूटी हुई बिखरी हुई चाय
की दली हुई पाँव के नीचे
पत्तियाँ
मेरी कविता
बाल, झड़े हुए, मैल से रूखे, गिरे हुए, गर्दन से फिर भी
चिपके… कुछ ऐसी मेरी खाल,
मुझसे अलग-सी, मिट्टी में
मिली-सीदोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतजार की ठेलेगाड़ियाँ
जैसे मेरी पसलियाँ…
खाली बोरे सूजों से रफू किये जा रहे हैं…जो
मेरी आँखों का सूनापन हैं

ठंड भी एक मुसकराहट लिये हुए है
जो कि मेरी दोस्‍त है।

कबूतरों ने एक गजल गुनगुनायी . . .
मैं समझ न सका, रदीफ-काफिये क्‍या थे,
इतना खफीफ, इतना हलका, इतना मीठा
उनका दर्द था।

आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।
मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ
और चमक रहा हूँ कहीं…
न जाने कहाँ।

मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार –
जिसके स्‍वर गीले हो गये हैं,
छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है…
छप् छप् छप्व

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्‍यु को सँवारने वाला है।
वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्‍वाइजन’ का लेबुल लिए हुए
दवाइयाँ हँसती हैं –
उनके इंजेक्‍शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है।

वह मुझ पर हँस रही है, जो मेरे होठों पर एक तलुए
के बल खड़ी है
मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं
और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह
खुरच रहे हैं
उसके एक चुम्‍बन की स्‍पष्‍ट परछायीं मुहर बनकर उसके
तलुओं के ठप्‍पे से मेरे मुँह को कुचल चुकी है
उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है।

मुझको प्‍यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं
एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।
मुझको सूरज की किरनों में जलने दो –
ताकि उसकी आँच और लपट में तुम
फौवारे की तरह नाचो।
मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,
ताकि उसकी दबी हुई खुशबू से अपने पलकों की
उनींदी जलन को तुम भिगो सको, मुमकिन है तो।
हाँ, तुम मुझसे बोलो, जैसे मेरे दरवाजे की शर्माती चूलें
सवाल करती हैं बार-बार… मेरे दिल के
अनगिनती कमरों से।

हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
…जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।

आईनो, रोशनाई में घुल जाओ और आसमान में
मुझे लिखो और मुझे पढ़ो।
आईनो, मुसकराओ और मुझे मार डालो।
आईनो, मैं तुम्‍हारी जिंदगी हूँ।

एक फूल उषा की खिलखिलाहट पहनकर
रात का गड़ता हुआ काला कम्‍बल उतारता हुआ
मुझसे लिपट गया।

उसमें काँटें नहीं थे – सिर्फ एक बहुत
काली, बहुत लम्बी जुल्‍फ थी जो जमीन तक
साया किये हुए थी… जहाँ मेरे पाँव
खो गये थे।

वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को
अपनी कनखियों में घुलाता हुआ, मुझ पर
एक जिन्‍दा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा –

और तब मैंने देखा कि मैं सिर्फ एक साँस हूँ जो उसकी
बूँदों में बस गयी है।
जो तुम्‍हारे सीनों में फाँस की तरह खाब में
अटकती होगी, बुरी तरह खटकती होगी।

मैं उसके पाँवों पर कोई सिजदा न बन सका,
क्‍योंकि मेरे झुकते न झुकते
उसके पाँवों की दिशा मेरी आँखों को लेकर
खो गयी थी।

जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफाफा
तुम्‍हारे हाथ आया।
बहुत उसे उलटा-पलटा – उसमें कुछ न था –
तुमने उसे फेंक दिया : तभी जाकर मैं नीचे
पड़ा हुआ तुम्‍हें ‘मैं’ लगा। तुम उसे
उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोचकर
मुझे वहीं छोड़ दिया। मैं तुमसे
यों ही मिल लिया था।

मेरी याददाश्‍त को तुमने गुनाहगार बनाया – और उसका
सूद बहुत बढ़ाकर मुझसे वसूल किया। और तब
मैंने कहा – अगले जनम में। मैं इस
तरह मुसकराया जैसे शाम के पानी में
डूबते पहाड़ गमगीन मुसकराते हैं।

मेरी कविता की तुमने खूब दाद दी – मैंने समझा
तुम अपनी ही बातें सुना रहे हो। तुमने मेरी
कविता की खूब दाद दी।

तुमने मुझे जिस रंग में लपेटा, मैं लिपटता गया :
और जब लपेट न खुले – तुमने मुझे जला दिया।
मुझे, जलते हुए को भी तुम देखते रहे : और वह
मुझे अच्‍छा लगता रहा।

एक खुशबू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह
बस गयी है, जैसे तुम्‍हारे नाम की नन्‍हीं-सी
स्‍पेलिंग हो, छोटी-सी प्‍यारी-सी, तिरछी स्‍पेलिंग।

आह, तुम्‍हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गयी थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है।

अगर मुझे किसी से ईर्ष्‍या होती तो मैं
दूसरा जन्‍म बार-बार हर घंटे लेता जाता :
पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ –
तुम्‍हारी बरकत!

बहुत-से तीर बहुत-सी नावें, बहुत-से पर इधर
उड़ते हुए आये, घूमते हुए गुजर गये
मुझको लिये, सबके सब। तुमने समझा
कि उनमें तुम थे। नहीं, नहीं, नहीं।
उसमें कोई न था। सिर्फ बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास
रंगीनियाँ थीं। फकत।

 

 

 

 

मई 8, 2016

माँ – एक चित्रकार और एक कवि की निगाहों से

Mother Child-001

Painting : Gustav Klimt , कविता – असद जैदी

मई 2, 2016

पानी पानी …(रघुवीर सहाय)

Raghuvir Sahayपानी पानी
बच्चा बच्चा
हिन्दुस्तानी
मांग रहा है
पानी पानी
जिसको पानी नहीं मिला है
वह धरती आजाद नहीं
उस पर हिन्दुस्तानी बसते हैं
पर वह आबाद नहीं
पानी पानी बच्चा बच्चा
मांग रहा है
हिन्दुस्तानी
जो पानी के मालिक हैं
भारत पर उनका कब्जा है
जहां न दें पानी वहां सूखा
जहां दें वहां सब्जा है
अपना पानी
मांग रहा है
हिन्दुस्तानी
बरसों पानी को तरसाया
जीवन से लाचार किया
बरसों जनता की गंगा पर
तुमने अत्याचार किया
हमको अक्षर नहीं दिया है
हमको पानी नहीं दिया
पानी नहीं दिया तो समझो
हमको बानी नहीं दिया
अपना पानी
अपनी बानी हिन्दुस्तानी
बच्चा बच्चा मांग रहा है
धरती के अंदर का पानी
हमको बाहर लाने दो
अपनी धरती अपना पानी
अपनी रोटी खाने दो
पानी पानी
पानी पानी
बच्चा बच्चा
मांग रहा है
अपनी बानी
पानी पानी

पानी पानी
पानी पानी
[‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’ (1978)]

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