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फ़रवरी 3, 2017

तुम मेरे बोलने और विरोध करने की स्वतंत्रता मुझसे नहीं छीन सकते : अनुराग कश्यप

anuragkप्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, लेखक एवं अभिनेता अनुराग कश्यप केवल शब्दों के ही धनी नहीं हैं वरन वे बेहद साहसी किस्म के भी हैं| अमिताभ बच्चन ने तो फ़िल्म के परदे पर ही अपनी दमदार आवाज में संवाद बोले कि आज मेरी जेब में पांच पैसे भी नहीं और मैं पांच लाख का सौदा करने निकला हूँ| और वास्तविक जीवन में तो अमिताभ बच्चन ने पूरे समाज की बात छोड़ दीजिए कभी फ़िल्मी दुनिया में कायम किसी गलत बात के लिए भी आवाज नहीं उठायी, और यही हाल कमोबेश हिन्दी फ़िल्म उद्योग के ज्यादातर बड़े नामों का है, किन्तु अनुराग कश्यप जब फ़िल्मी दुनिया में वास्तविक जीवन में भी जब बेहद मुश्किल और हालात से गुजर रहे थे तब भी उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया अमिताभ बच्चन या फ़िल्मी दुनिया में शक्ति केन्द्र बन चुके प्रोडक्शन हाउसेज और बड़े फ़िल्मी लोगों से नेक्सस बनाकर चलने वाले शक्तिशाली फ़िल्म क्रिटिक्स के खिलाफ खुलकर खड़े होकर बोलने में| अनुराग ने परिणाम की परवाह कम ही की है और उनका विरोध और गलत बात से उपजा क्रोध उनकी फिल्मों मे दिखाई भी देता है|
पिछले कुछ समय से जो उन्हें गाल्ट लग रहा है उसके खिलाफ वे मुखर होकर बोल रहे हैं और इंटरनेट संसार के ट्रोल्स (जिनमें पैसा लेकर ऐसा करने वाले किराए के ट्रोल्स भी मौजूद हैं) की भीड़ ने उन पर आक्रमण किये हैं| उन सबका विरोध करते हुए उन्होंने नीचे दिए दो बयान सोशल मीडिया पर चस्पाये|

मैं उस वक्त से अपनी रीढ़ सीधी रखकर खड़ा हो रहा हूँ जब आवाज और चेहरे विहीन लोगों को भीड़ का भ्रम जुटाने के लिए सोशल मीडिया का धरातल उपलब्ध नहीं हुआ करता था| इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरे विरुद्ध क्या कहते हो या क्या करते हो, मुझ पर गालियों से आक्रमण करते हो या मुझ पर शारीरिक आक्रमण करते हो, मुझे जो उचित लगेगा मैं उसे कहता रहूंगा| तुम्हारी भीड़ मुझे भयभीत नहीं कर सकती, मैं तुम्हारी किसी धमकी से नहीं डरता, तुम लाख चीख लो चिल्ला लो, मेरी आवाज तुम्हारी भीड़ के सामूहिक शोर से ज्यादा बुलन्द रहेगी| मैं अपने सच को गले लगाता हूँ और मुझे तुम्हारे दवारा लगाए आरोपों से तनिक भी भय नहीं लगता|
मुझे सिखाया गया है कि अपने विवेकानुसार बोलने, तर्क करने और प्रश्न पूछने की आजादी बाकी सारी आजादियों से बड़ी है और मैं अपने इस अधिकार का उपयोग सदैव करता रहूंगा| तुम मुझे परिभाषित नहीं करते, मैं स्वयं और मेरा काम मुझे परिभाषित करते हैं, और यह परिभाषा कुछ भी हो सकती है लेकिन यह सदैव मेरी अपनी होगीI मैं अपने प्रयासों में सफल बनूँ या असफल, जिस भी मात्रा में ये मुझ तक आएं ये मेरी अपनी होंगीं|
मुझे सिखाया गया है कि उन लोगों के सोच विचार और कर्म पर दृष्टि रखो और उनसे प्रश्न पूछते रहो जिन्हें हमने सरकार बनाने के लिए चुना है| और मैं यह तब से करता आ रहा हूँ जबकि मैं एक विधार्थी ही था और देश के प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह हुआ करते थे] उनके बाद कांग्रेस की सरकारें बनीं फिर भाजपा की बनी| मुझे सिखाया गया कि हमें अपने प्रधानमंत्री से प्रश्न करने, उससे उत्तर पाने की अपेक्षा रखने, उसके निर्णयों और किये पर प्रश्न उठाने, उससे तर्क करने का पूरा अधिकार है और उससे भय तो कदापि नहीं रखना है| अगर किसी को उससे भयभीत होना है तो यह बेहद दुखद बात है क्योंकि उसे हमने देश की खुशहाली के लिए स्वयं चुन कर देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बिठाया है| सम्मान निर्देश देकर प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसे कमाना पड़ता है| मेरा किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं है और कुछ भी मुझे राजनीतिक और सत्ता तंत्र से प्रश्न पूछने से नहीं रोकता|
तुम लोग मुझे कुछ भी कह सकते हो, मेरे ऊपर चिल्ला सकते हो| मेरा अपने संविधान पर पूरा भरोसा है और मुझे पूर्ण-विश्वास अपने अधिकारों और अपनी स्वतंत्रता पर और जहां मुझे आवश्यक लगेगा मैं इनका भरपूर उपयोग करूँगा| तो तुम लोग जितना भी जोर लगा लो, तुम मुझे रोक नहीं पाओगे, तुम्हारे मुझ पर प्रेम उडेलने के लिए धन्यवाद|
और जो लोग ये रट लगा रहे हैं – उस वक्त तुम कहाँ थे, उस घटना के कहाँ तुम क्यों चुप थे, ऐसा पूछने वाली ट्रोल्स की भीड़ के लिए मेरे पास एक ही जवाब है कि मैं यहीं था पर मेरे बोलने की जरुरत इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि जिन्हें बोलना चाहिए या जिनके ऊपर बोलने का उत्तरदायित्व था वे बोल रहे थे| चाहे वह जायरा का मामला हो, जहां सरकार और उसके नुमाइंदें तुरंत बोल पड़े थे और गलत की निंदा की उन्होंने, और चाहे विवेक की फ़िल्म की बात हो जहां राज्य का समर्थन उसके साथ था| | मैं तभी बोलता हूँ जब राज्य सत्ता या तो चुप्पी धारण कर लेती है या मामले को नजरंदाज कर देती है| क्योंकि यही समय होता है जब किसी को बल्कि हम सभी को बोलना चाहिए|
जिस एक वक्त की अपनी चुप्पी का मुझे अभी तक खेद है वह है FTII का मामला| जब यह सब चल रहा था मैं सरकार के साथ काम कर रहा था और मुझे विश्वास दिलाया गया था कि सरकार वास्तव में बिगड़ती जा रही स्थितियों को संभालने की कोशिश में लगी हुयी है और मैंने उनके कहे पर विश्वास किया| और मुझसे ये बातें स्वयं आई एंड बी के कनिष्ठ मंत्री ने कहीं| उन्होंने कहा कि मुझे इस मुददे पर शामिल होने की जरुरत नहीं है और वे लोग समाधान पर काम कर रहे हैं| मैंने उनके कहे पर विश्वास कर लिया| एक और बार मैंने विश्वास किया जब सेंसरशिप का मुद्दा उठा और मैं चुप रहा| और तब मुझे दीवार की ओर ढकेल दिया गया जब “उड़ता पंजाब” प्रदर्शन के लिए तैयार थी और उन सबने मौन धारण कर लिया, मुझसे चुप्पी साध ली| उस वक्त मैं उनके तरीके को समझ पाया कि कैसे शोषण किया जाता है और कैसे मेरे जैसे को उसके विश्वास करने के कारण एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है| तब मैं जागा और तब से मैं यहाँ हूँ और लगातार बोल रहा हूँ उन उन बातों पर जिन पर बहुत से चुप रहे गये| और मैं हर उस बात के लिए बोलूंगा जिस पर बोलना चाहिए और जिस पर सत्ता शक्ति लोगों की चुप्पी चाहती है| मैं इस स्थान पर हूँ और रहूंगा तो तुम सारे लोग जो तोता रटंत लगा रहे हो कि उस वक्त मैं कहाँ था, उस मामले में चुप क्यों रहा, अपनी रट की बत्ती बना लो और ….
धन्यवाद !

नवम्बर 24, 2013

अंतस के परिजन: एक डॉक्टर की डायरी

antasमनुष्य जीवित है तो उसका साथ शारीरिक और मानसिक कष्टों और रोगों से होता ही रहेगा और ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सिक से दूरी तो रह नहीं सकती| किसी भी विधा में अभ्यास करता हो चिकित्सिक, चाहे वह वैध हो, हकीम हो, एलोपेथिक डॉक्टर हो या होमियोपैथी से इलाज करता हो, वह हर काल में समाज का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है|

जीने से मनुष्य का अगाध मोह है और एक ही नहीं हजारों भगवद गीता रच दी जाएँ, सामूहिक स्तर पर  मनुष्य जीवन से इस मोह को मिटाना संभव नहीं है और लाखों-करोड़ों में से कोई एक ही जीवन और शरीर के मोह से ऊपर उठ पाता है| जीने के प्रति इस गहरे भाव के कारण ही मनुष्य के लिए चिकित्सक ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व करता है| वही है जो उसे मौत के मुँह में से भी खींच लाता है और उसकी काया से रोगों को दूर भगाने में उसकी सहायता करता है उसका पथ –प्रदर्शक बनता है| इस आदर के कारण मानव की चिकित्सिक से अपेक्षायें भी बहुत ज्यादा होती हैं| बीमारी की हालत में चिकित्सिक के वरदहस्त में पहुँचते ही रोगी को आशा बांधने लगती है कि अब शायद वह अच्छा हो जायेगा और फिर से जीवन की ओर वापस करेगा|

असल जीवन में नर्स बोलते ही मानव के मन मस्तिष्क में Florence Nightingale नाम तैरने लगता है| डा. कोटनिस एक त्यागमयी चिकित्सिक के रूप में मनुष्य को देवता स्वरूप लगते आए हैं|

साहित्य, नाटक और फ़िल्में जैसी विधाएं भी चिकित्सक के विभिन्न चरित्रों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करती रही हैं, उनमें से कुछ ऐसे चरित्र हैं जिनकी अच्छाइयों के कारण वे दर्शक के मनमानस में गहरे जाकर बैठ जाते हैं|

कौन भूल सकता है आनंद फिल्म के डा. भास्कर बनर्जी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने बेहद अच्छे अभिनय से जीवंत किया था, को जो अपने पास आने वाले रोगियों को कभी भी गलत सलाह नहीं देता और चिकित्सीय पेशे की ईमानदारी उसके लिए खुद की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उसी के साथी लोगों से छल करके धनी बनते रहते हैं वह ईमानदारी का दामन पकडे रखता है| खामोशी फिल्म की नर्स राधा (वहीदा रहमान) को क्या भुलाया जा सकता है जो अपने को नर्स होने के दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित कर देती है कि मानसिक संतुलन खो बैठती है|

भारत जैसे विकासशील देश में तो चिकित्सक वाकई ईश्वर का ही एक रूप लगता है| लोगों की भावनाएं किस तरह चिकित्सक से जुडी रहती है इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म- मुन्नाभाई एम्.बी.बी.एस, याद की जा सकती है| एक महाबली, पर सह्रदय गुंडे की भावनाओं से जनता की भावनाओं का मेल ज्यादा गहरे स्तर पर होता है न कि एक कठोर ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर के अनुशासन से| धोखे से मेडिकल कालेज में प्रवेश लेकर पढ़ रहे गुंडे के वचन और दयालू कर्म जनता के अंतर्मन को भिगो देते हैं और बहुत पढ़ा लिखा, बहुत बड़ा डॉक्टर जो मेडिकल कालेज का प्रिंसिपल भी है खलनायक लगने लगता है क्योंकि उसके पास भावना नाम के चीज है ही नहीं| रोगी इंसान है ही नहीं उसके लिए|

मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के व्यक्ति मिलते हैं पर मनुष्य की चिकित्सक पर निर्भरता कुछ इस कदर गहरी है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे मनुष्यों को ही देखना चाहते हैं| प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” का डा. चड्ढा, घमंडी और रोगी के प्रति असंवेदनशीलता से भरा हुआ होने के कारण एक खलनायक है और जब मन्त्रों से सर्पदंश का इलाज करने वाला, डा. चड्ढा की असंवेदनशीलता और दुर्व्यवहार का शिकार होकर अपने इकलौते पुत्र को खोने वाला, बूढ़ा भगत, डा. चड्ढा के पुत्र को मौत के मुँह से निकाल लाता है और डा. चड्ढा भोर की हल्की रोशनी में बूढ़े भगत को पहचान कर शर्मिन्दा होते हैं तो जीवन में केवल अच्छे चिकित्सकों से ही मिलने की आस लगाए पाठक ही नहीं विजेता महसूस करते बल्कि पूरी मानवता जीतती हुयी प्रतीत होती है|

जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी ईमानदारी और मूल्यों का बहुत बड़ी मात्रा में ह्रास हुआ है| ऐसे ऐसे किस्से मिल जाते हैं पढ़ने-देखने को जहां पैसे के लिए चिकित्सिक ने अपने व्यवसाय में उतरने से पहले ली गयी कसम को तो भुलाया ही मानवता को भी भुला दिया और अपनी आँखों के सामने मरीज को मर जाने दिया पर उसका इलाज करना शुरू न किया क्योंकि मरीज के परिवार वाले उसकी फीस भरने में असमर्थ थे| ऐसे भी मामले प्रकाश में आए हैं जहां चिकित्सिक मरीज के शरीर से अंग निकाल लिए हैं किसी और धनी मरीज को जीवनदान देने के लिए और गरीब मरीज गरीबी का शाप भोगने को विवश रहकर विकलांग जीवन जीने को भी विवश हो जाता है|

हालत ऐसी हो गयी है कि बीस-बीस साल के अनुभव के बाद भी चिकित्सक कहते पाए जा सकते हैं कि उन्होंने नई “दुकान” खोली है|

दुकान!

क्लीनिक और डिस्पेंसरी अब अनुभवी चिकित्सकों तक के लिए भी दुकान बन गये हैं|

साहित्य ने मरीजों की तरफ से लिखी गयी सामग्री प्रस्तुत की है, अगर साहित्यकार खुद मरीज बन गया है तो उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से अच्छा साहित्य दुनिया को दिया है| रशियन

Aleksandr Solzhenitsyn ने Cancer Ward जैसे कालजयी उपन्यास की भेंट दुनिया को दी| लेखकों ने दूर से देखे या पूर्णतया कल्पित चिकित्सक चरित्रों की रचना भी की है और उनमें से बहुत से विश्वसनीय भी लगते हैं| पर तब भी उन्होंने चरित्र के उन्ही भागों का वर्णन किया है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित है और उनके व्यवसाय से सतही सामग्री ही सामने आती रही है| ऐसे में ऐसा तो लगता ही है कि अगर किसी चिकित्सक में लेखकीय गुण भी हों तो उसका लेखन बेहद विश्वसनीय तरीके से इस क्षेत्र का गहराई से वर्णन कर पायेगा|

डा. भवान महाजन की स्व:अर्जित अनुभवों से सम्पन्न मराठी पुस्तक – मैत्र-जिवाचे, उस ओर एक कदम है|

अशोक बिंदल, जो अपनी तरह के एक अलग ही कला -दीवाने, कवि एवं लेखक हैं, ने मराठी मूल की पुस्तक को हिंदी में इस तरह प्रस्तुत किया है कि “अंतस के परिजन” कहीं से भी अनुवादित किताब होने का आभास नहीं देती|

मरीज, उनके नाते-रिश्तेदार, चिकित्सक का त्रिकोण रोगी और चिकित्सा के हर मामले से सम्बंधित पाया जाता है और “अंतस के परिजनतीनों प्रकार के चरित्रों को पाठक के सम्मुख लाती है|

एक उम्र होती है जब पाठक हर किस्म की पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित रहता है क्योंकि उसमें नये से नया पढ़ने की भूख होती है और उतना पढ़ने की ऊर्जा और समय भी| उम्र के साथ पाठक चुनींदा साहित्य ही पढ़ने लग जाते हैं क्योंकि समय अन्य कामों में भी लगने लगता है, ऊर्जा में कमतरी होने लगती है| ऐसे में जब तक कोई बहुत ही किसी पुस्तक की चर्चा न करे, ऐसा संदेह रहता है कि हर पाठक हर किस्म की पुस्तक अपने आप पढ़ ही लेगा|

“अंतस के परिजन की चर्चा किसी तक न पहुंचे तो ऐसा नहीं कि पाठक दरिद्र रह जाएगा पर अगर वह इसे पढ़ ले तो जीवन में सवेदनशीलता के थोड़ा और नजदीक आएगा|

हरेक व्यक्ति कभी न कभी या तो स्वयं बीमार पड़ता है या किसी नजदीकी व्यक्ति की तीमारदारी करता है और इस नाते उसका पाला चिकित्सक से पड़ता ही पड़ता है और लगभग हरेक व्यक्ति को चिकित्सक से मुठभेड़ का कोई न कोई अनुभव जरुर ही होता है| अब यह अनुभव खट्टा भी हो सकता है, मीठा भी और कड़वा भी|

“अंतस के परिजन सब तरह के अनुभवों को समेटती है|

ये डा. भवान महाजन के चिकित्सीय जीवन के संस्मरण हैं जहां देहात के इलाकों में वे भिन्न-भिन्न किस्म के मरीजों से मिले, उनके नाते-रिश्तेदारों से मिले अलग अलग किस्म के रोगों से सीमित साधनों के बावजूद जूझे|

एक सरल, और सहज भाषा में अशोक बिंदल ने डा. महाजन के संस्मरण हिंदी में प्रस्तुत किये हैं| डा. महाजन ने न केवल मोती-माणिक सरीखे मरीजों का वर्णन किया है जिनसे मिलकर कोई भी अंदर से अच्छा महसूस करेगा बल्कि ऐसे मरीजों और उनके रिश्तेदारों का भी वर्णन किया है जो किसी भी चिकित्सक को भलमनसाहत का रास्ता छोड़ देने पर विवश कर दें| ऐसे चिकित्सक भी इस पुस्तक में हैं जो चिकित्सा के क्षेत्र की दैवीय छवि को दीमक की तरह से नष्ट कर रहे हैं और जो इस बात का लिहाज भी नहीं करते कि उनका मरीज उनके ही हमपेशा चिकित्सक का करीबी है| वे प्रेमचंद द्वारा रचित डा चड्ढा के आधुनिक अवतार ही लगते हैं, जिनके लिए उनके सुख और ऐश्वर्य मरीज के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं|

पुस्तक में शामिल संस्मरण पाठक को अंदर तक छू जाते हैं|

ऐसी पुस्तक को कम से कम छोटे परदे पर एक धारावाहिक के रूप में जरुर अवतरित होना चाहिए|

पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त की जा सकती है|

एक संस्मरण भोर को यहाँ पढ़ा जा सकता है|

अंतस के परिजन” के बारे में कुछ लेखों एवं कवियों के वचन|

गुलज़ार लिखते हैं –

अशोक बिन्दल ने कमाल किया। पढ़ कर ये नहीं लगता कि ये किसी और का अनुभव है जो वो अपनी ज़बान में बता रहे हैं।

विश्वनाथ सचदेव कहते हैं |

अनुवाद सृजन से कम महत्वपूर्ण और कम मुश्किल नहीं होता | पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे अशोक बिंदल ने काम बड़ी आसानी से किया है | मराठी में इस पुस्तक की काफी प्रशंसा हुई है | मुझे विश्वास है हिंदी-जगत में ही वैसा ही स्नेह सम्मान मिलेगा…

बालकवि बैरागी लिखते हैं|

‘अंतस के परिजन’ मैं पढ़ गया | अच्छे संस्मरण यदि ऐसी सलिल भाषा में मिल जाएं तो मन भीग ही जाता है | डा. श्री भवान महाजन ने अशोक बिंदल के माध्यम से प्रभावित किया…

कवि नईम लिखते हैं|

अंतस के कई परिजनों ने रुला दिया | उनसे एक उनसियत हो गई जैसी डा. भवान महाजन को उनसे थी | लेखक की आत्मीयता के ये पात्र हैं बल्कि लेखक इतना आत्मीय अंतस का नहीं होता, तो इन्हें पुनर्जीवित नहीं कर सकता था| कमोबेश उसी भावावेश में हिचकोले खाते हुए अशोक ने भावानुवाद किया है…..

…[राकेश]

मई 23, 2013

अमिताभ बच्चन का हिंदी प्रेम : असली नकली?

Amitabhलगता है भारत में लोगों के जीवन में वाकई बोरियत आ गयी है या कि भीषण गर्मी का असर है| जनता का एक तबका इसी बात पर न्यौछावर हुआ जा रहा है कि श्री अमिताभ बच्चन ने कान फेस्टीवल में हिंदी में अपना भाषण/संबोधन बोला/पढ़ा? अमिताभ बच्चन इलाहाबद में जन्मे, पिता उनके हिंदी के लेखक, और वे पढ़ाते भले ही अंगरेजी रहे हों, पर जीवन में सम्मान और उच्च पद उन्हें हिंदी की बदौलत ही प्राप्त हुए| प्रो. ड़ा हरिवंश राय बच्चन के पास इतना धन तो था हे कि वे अपने दो बेटों को शेरवुड जैसे पब्लिक स्कूल में पढवा पाए और उन्हें अंग्रेजी में भी पारंगत करवा दिया| अमिताभ को भी सारी धन-संपदा, मान- सम्मान हिंदी फिल्मों में काम करने से ही प्राप्त हुआ है पर वह वक्त बहुत पुराना नहीं हुआ है जब इस बात की चर्चा की जाती थी कि अमिताभ अंग्रेजी बहुत अच्छी बोलते हैं| यह समझ से परे है कि अमिताभ के कान में हिंदी बोलने पर इतना बवाल क्यों? अमिताभ ऐसे हिंदी प्रेमी भे नहीं हैं| अगर होते तो अस्सी के दशक में जब उन्होंने बिलियर्ड चैम्पियनशिप में (शायद गीत सेठी जिस साल चैम्पियन बने उस साल) हिंदी में बोलते, या जब कि बम्बई में उन्हें सीए एसोसियेशन ने बुलाया मुख्य अतिथि के तौर पर तब वे हिंदी में बोलते (बोफोर्स तब चल ही रहा था, और एक सज्जन की टिप्पणी छपी थी कि- अंग्रेजी में कितना जबरदस्त बोलता है यह आदमी, बेचारे को गलत फंसा दिया)| अस्सी और नब्बे के दशक के ज्यादातर पुराने कार्यक्रमों में अमिताभ अंग्रेजी में ही बोलते दिखाई देंगे| क्यों? क्या इसलिए कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर कलाकार हिंदी में ही बोलते थे उस समय और अमिताभ को अलग दिखना था, एक अलग कुलीन छवि बनाए रखनी थी? नब्बे के दशक में जब अमिताभ ने फिल्मों से अस्थायी अवकाश ले लिया था तब पत्र-पत्रिकाओं में उनके एक अंग्रेजी साक्षात्कार के बड़ी चर्चा थी क्योंकि उसमें उन्होंने अंग्रेजी डिक्शनरी में उपस्थित (उस वक्त) सबसे बड़ा शब्द- Floccinaucinihilipilification, प्रयुक्त किया था| उस वक्त अमिताभ के चर्चे ऐसे अभिनेता के रूप में ही थे जो हिंदी फिल्मों का बड़ा सितारा है और जो बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलता है|
नब्बे के दशक में जब हिंदी भाषी अभिनेताओं के अंग्रेजीदां पुत्र नायक बन हिंदी फिल्मों पर छ गये और पिछले बीस-पच्चीस सालों में ज्यादातर अभिनेता और अभिनेत्रियां अंग्रेजी ही बोलने, लिखने और पढ़ने वाले हो गये तो अमिताभ के हिंदी की चर्चा भी जोर पकड़ने लगी| क्या अब हिंदी पर उनका इतना जोर व्यवसायिक कारणों से नहीं है? अमिताभ के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिंदी में बोलने के ग्राफ का संबंध उनके जीवन में आर्थिक पतन (ऐ.बी.सी.एल के डूबने) और फिर के.बी.सी के कारण उत्थान से भी जोड़ा जा सकता है| के.बी.सी में जन-साधारण से हिंदी के कारण बार्तालाप से बढ़ी उनकी प्रसिद्धि का बहुत बड़ा हाथ है उनके हिंदी प्रेम के पीछे|

अगर वे इतने हिंदी प्रेमी होते तो उनके बेटे – अभिषेक और बेटी-श्वेता, हिंदी में तंग हाथ वाले न होते| अमिताभ के हिंदी प्रेम को हार पहनाकर उस दिन सम्मान देना उचित न होगा जिस दिन अभिषेक बच्चन बिना तैयारी के मौके पर ही धाराप्रवाह सही हिंदी में पांच मिनट बोल लें? क्या अमिताभ की जिम्मेवारी इतना कहने भर से खत्म हो जाती है कि वे तो अभिषेक से खूब कहते हैं कि हिंदी पर पकड़ मजबूत बनाओ – (कई सालों से अभिषेक कोशिश भी कर रहे हैं, और तरक्की भी की है उन्होंने)| पर इसके मूल में भी यही बात है कि अभिषेक को हिंदी फिल्मों में काम करके जीविकोपार्जन करना है इसलिए अमिताभ को इस बात कि चिंता है कि अभिषेक को सही हिंदी सीखनी चाहिए जिससे वह अपने साथी कलाकारों से आगे रह सके| अगर अमिताभ को हिंदी की चिंता होती तो वे बचपन से इस बात पर ध्यान देते (जैसे उनके पिता ने उन पर दिया होगा)| अभिनय को क्यों इतना तूल दिया जा रहा है? ज्यादातर दुनिया के सभी अभिनेता वैश्विक आयोजनों में अपनी भाषा में ही बोलते हैं| अमिताभ ने हिंदी में बोल दिया तो क्या गजब कर दिया| क्या हिन्दुस्तानी वेशभूषा भे उन्होंने पहनी अपना भाषण देते हुए?

वास्तव में पहले उन्होंने नफीस अंग्रेजी में अपनी बात कही और फिर हिन्दुस्तानियों के लिए वही बात हिंदी में भी बोली| या सारा मामला पी.आर गतिविधियों का है?


 

जून 19, 2011

सोनिया गाँधी और संघ परिवार

बतकही : आरम्भ से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

सही कह रहे हो आप। उन्ही अटल जी की कविताओं को अमिताभ द्वारा स्वर दिये जाने की बात थी लोकसभा चुनावों से पहले। ये तो वक्त वक्त की बात है। भाजपा, शिव सेना ने बच्चन परिवार का जीना मुश्किल कर दिया था और शिवसेना ने तो अमिताभ की शहंशाह फिल्म की रिलीज पर जमकर हँगामा किया था। आज अमिताभ को कहना पड़ता है कि बाल ठाकरे तो उनके मित्र हैं। आज तो अमिताभ सपा के साथ खड़े दिखायी देते हैं जबकि मुलायम ​सिंह यादव ने भी बोफोर्स के दिनों में वी.पी.सिंह के समर्थन में बच्चन परिवार के खिलाफ जम कर सभायें की होंगी। आपको याद होगा कि सपा ने अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता अपने पक्ष में भुनाने के लिये ब्लड डोनेशन कैम्प लगवाये थे क्योंकि अमिताभ अब राजनीति में सीधी भागीदारी से बचते हैं और ऐसे ही किसी जगह उन्होने कह दिया था कि मुलायम सिंह यादव तो उनके लिये पिता समान हैं। तब भाजपायी नेताओं ने पूरे चुनावों के दौरान अमिताभ की खिल्ली उड़ायी थी कि साठ साल का पुत्र और पैंसठ साल का पिता। अब अमिताभ ने जो कहा था वह एक भावनात्मक बात थी। और आप ताज्जुब देखो कि कुछ समय बाद जब अटल जी की कविताओं को लता मंगेशकर ने गाया था और कैसेट के विमोचन पर लता जी कह रही थीं कि अग्रेंजी में नाम लिखने पर लता का उल्टा अटल है और अटल का उल्टा लता और अटल जी मेरे पिता समान हैं तो भाजपायी भावविभोर होकर धन्य हो धन्य हो का कोरस गान कर रहे थे। अब भाजपाइयों जैसा कोई कह ही सकता था कि अठत्तर साल की पुत्री और अस्सी साल का पिता। पर माफ करना अशोक जी ऐसी टिप्पणियाँ सामान्यत: भाजपा के खेमे से ही निकलती रही हैं। बरसों ये लोग विपक्ष में रहे हैं सो बिना किसी जवाबदेही के कुछ भी बोलने की आदत पड़ गयी है जो छह साल की सत्ता मिलने के बाद भी नहीं गयी है।

आप तो विजय बाबू ऐसे कह रहे हो जैसे मैंने पूरी भाजपा का ठेका ले लिया हो। अरे कह दिया होगा किसी राज्य स्तर के छोटे मोटे नेता ने कुछ। सबके मुँह से फिसल जाता है। भाजपा का केन्द्रिय नेतृत्व देखिये कितना शालीन है। आडवाणी जी को देखो। मजाल है कोई फालतू बात मुँह से निकल जाये जैसे फिल्टर लगा हो मुँह में और हर बात छनकर बाहर आती हो। आपको याद दिला दूँ कि त्याग की मूर्ति सोनिया गांधी ने अटल जी के लिये कहा था कि जिनके अपने घुटने कमजोर हों वे देश क्या संभालेंगें। अभी इनकी पुत्री प्रियंका गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान अटल जी जैसे वष्ठितम राजनेता के खिलाफ टिप्पणी कर दी थी वह भी थी उनके स्वास्थ्य को लेकर। अब ये हैं क्या अटल जी के सामने। अशोक बाबू भड़कते हुये बोले।

मैने पहले भी सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की टिप्पणियों की आलोचना की थी। शारीरिक अवस्था पर टिप्पणी स्वस्थ बात नहीं है। वैसे इस तरह की शुरूआत तो चीन युद्ध के बाद डा.लोहिया की बीमार नेहरू पर की गयी टिप्पणी से ही हो गयी थी। बाद में उन्होने इंदिरा गाँधी पर भी व्यक्तिगत टिप्पणी की थी। शायद उन्होने या उनके किसी समकालीन बड़े नेता ने उन्हे गूँगी गुड़िया कहा था। किसी ने उनके बारे में कहा था कि संसद में अब एक हसीन चेहरा देखने को मिल जायेगा। वैसे अशोक जी मेरा मानना है कि भाजपा और सोनिया गांधी के मामले मे पहल भाजपा द्वारा की गयी है। बरसों ऊटपटांग टिप्पणियां सोनिया पर की गयी हैं और आज भी की जाती हैं। अभी पिछले राजस्थान चुनावों की बात ले लो। भाजपा की तो जबर्दस्त जीत हुयी थी वहाँ। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता की रिपोर्ट थी। शेखर जब चुनाव की कवरेज के लिये जयपुर–कोटा राजमार्ग पर ​स्थित एक गाँव में चाय की दुकान पर ठहरे तो वहाँ भाजपा समर्थक दावा कर रहा था कि उसने आर.एस.एस की किसी पत्रिका में पढ़ा था कि कुछ पत्रकार इटली में सोनिया गांधी के गाँव में गये थे और उन्हे वहाँ बताया गया था कि सोनिया इटली में कैबरे डांसर हुआ करती थीं। शेखर ने कहा कि ऐसा नहीं है और मान लो किसंघ की पत्रिका में ऐसा छपा भी हो तो आप लोग ऐसी बात को गम्भीरता से नहीं ले सकते। पर भाजपा समर्थक मानने को तैयार नहीं थे। मान लो शेखर गुप्ता झूठ बोल रहे थे उनका भाजपा से दुराव और कांग्रेस से लगाव रहा होगा। दूसरा किस्सा सुनो जो हमारा अपना ही सुना हुआ है। लोकसभा चुनावों की बात है। उन्ही दिनों हमने बच्चों से इंटरनेट प्रयोग करना सीखा था। टाइम्स आफ इण्डिया की वेब साइट हमने खोली और समाचार पढ़ने लगे। वहाँ हमने रेडियो पर भी समाचार सुने। वहीं हमारी दृष्टि पड़ी एक खबर पर राहुल गांधी के खिलाफ खड़े भाजपा के उम्मीदवार श्री वेदांती से वार्ता। मै‍र्ने उस वार्ता के लिंक पर क्लिक कर दिया। एक से बढ़कर एक वचन सुनायी दिये वेदांती जी के सुमुख से नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ खासकर सोनिया और राहुल के खिलाफ। वेदांती जी को पता चला कहीं से कि राहुल का प्रेम चल रहा है किसी कोलम्बियन लड़की से तो वेदांती जी लगे पड़े थे कि अमेठी में कोलम्बिया की एक हजार लड़कियां घूम रही हैं नवयुवकों के वोट राहुल को दिलवाने के लिये। शाम को बागों में अश्लील नृत्य चल रहे हैं।

साक्षात्कार लेने वाले ने पूछा कि वेदांती जी क्या आपने खुद देखा है किसी विदेशी लड़की को। तो वेदांती जी बोले कि हमारे देखने की जरूरत नहीं है सब जानते हैं। और आगे सुनो। वेदांती जी ने सोनिया गांधी को अपशकुनी बता दिया कि सोनिया के आने से सबसे पहले संजय गांधी की अकाल मृत्यु हुयी और फिर इन्दिरा और राजीव गांधी की हत्यायें। अब वेदांती जी की परिभाषा से मेनका गांधी क्या हुयी ये तो वही जाने। और इस सोच से वरुण गाँधी कितने भाग्यशाली हुये अपने पिता के लिये? आप खुद ही बताओ ऐसी दकियानूसी बातें कहाँ मिलेंगी?

अजी विजय बाबू ऐसे एक दो तो हरेक पार्टी में होते हैं। कौन सा किसी को जीतना था राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से? ये तो इस फैमिली की घर की सीट है।

अशोक बाबू बात यह है कि क्या ऐसे लोगों को टिकट देकर भाजपा लोकतंत्र को मजबूत बना रही है? आज सीटे जीतने के लिये आप जनता की भावनाओं को भड़काने के लिये कैसे ही लोगों को टिकट दे दो पर इतिहास गवाह है कि अन्त में मुसीबत आपकी भी आनी है। आखिर छह साल सत्ता में रहते हुये भाजपा ने झेला ही था विहिप आदि के तानों को। ये तो भाजपा को सोचना है कि वह परिपक्व राजनीति करना चाहती है या ​सिर्फ सत्ता पाने के लिये शार्टकट इस्तेमाल करना चाहती है।

आप ये बताओ विजय जी कि ये नेहरू–गांधी परिवार और बच्चन परिवार में ऐसा क्या झगड़ा हो गया? अखबार तो ये लिखते हैं कि अब दोनो परिवार एक दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलते और कहाँ तो ऐसी निकट की दोस्ती थी कि राजीव गांधी छुट्टियाँ तक अमिताभ बच्चन के साथ बिताते थे। हमने तो सुना है कि जब अमिताभ बच्चन को चोट लगी थी सन बयासी में तो इन्दिरा गांधी विदेश से अपनी सरकारी यात्रा अधूरी छोड़कर वापिस आ गयीं थीं और राजीव गांधी भी अमेरिका से तुरन्त आ गये थे और सीथे अस्पताल पहुँचे थे। हमने तो ये तक सुना है कि शुरू में सोनिया गांधी बच्चन परिवार के यहाँ ही ठहरी थी जब राजीव गांधी से शादी हुयी थी। अब ऐसा क्या हो गया? आप ये न कह देना कि इन दोनों परिवारों में अलगाव भी भाजपा का कराया हुआ है। अशोक बाबू हँसकर विषय बदलते हुये बोले।

अजी बड़े लोग हैं। क्यों मनमुटाव हो गया क्या हो गया ये सब बातें तो उन लोगों का आपसी मामला है। फिर सोनिया गांधी ने तो कभी कुछ कहा नहीं सार्वजनिक रूप से। या तो अमिताभ ने कहा था कि हम रंक हैं और नेहरू–गांधी परिवार राजा है और सम्बंध रखना न रखना तो राजा के हाथ में होता है। अब ये पत्रकार लोग भी तो हलक में माइक डाले खड़े रहते हैं। अब क्या पता है कि जया बच्चन ने चुनाव सभा में कहा कि नहीं कहा कि नेहरू–गांधी परिवार ने संकट में बच्चन परिवार का साथ छोड़ दिया। अब पत्रकारिता तो सेंसेशन वाली हो गयी है। पत्रकार लोग तुरन्त राहुल गांधी के पास पहुँच गये पूछने कि जया बच्चन तो उनके परिवार को धोखा देने वाला बता रहीं हैं। राहुल गाँधी का कहा भी सुर्खियाँ बन गया कि लोग जानते हैं कि किसने अपनी वफादारी बदली है और उनका परिवार कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता।

विजय बाबू जया बच्चन ने कहा तो था ही कि नेहरू–गांधी परिवार ने बच्चन परिवार को मझदार में छोड़ दिया जब हम मुसीबतों से गुजर रहे थे और अमर ​सिंह और मुलायम ​सिंह ने उनका साथ दिया और ये लोग भरोसे वाले लोग हैं। हरेक अखबार में छपा था। बाद में राहुल गांधी ने कड़ा बयान दिया था। और अमिताभ ने भी कुछ कहा था।

अमिताभ बच्चन ने जो कहा था कि यदि जया ने ऐसा कोई बयान दिया है तो गलत किया है और नेहरू–गांधी परिवार तथा बच्चन परिवार की दोस्ती जया और सोनिया के इन परिवारों में आने से बहुत पहले की है तो वह एक संवेदनशील बात कह रहे थे और ऐसी बयानबाजी के कारण उनको हुआ दुख स्पष्ट पता चल रहा था। आप देखो कि उनके बयान के बाद कोई भी बयान इस ​सिलसिले में नहीं आया किसी का भी। अब अन्दर की बात तो वे लोग ही जाने पर हमें एक बात तो लगती ही है कि जितने खुले रूप में बच्चन परिवार अमर ​सिंह या सपा के साथ खड़ा दिखा दिखायी देता है उतने खुले रूप में वे लोग सोनिया गांधी के साथ खड़े दिखायी नहीं दिये राजीव गांधी की हत्या के बाद। या ये कह लो कि समय ही खराब था दोनो परिवारों के लिये कि जब दोनो परिवारों को एक दूसरे के साथ की जरूरत थी तब दोनो ही मुश्किलों में फंसे हुये थे। या शायद बच्चन परिवार को लगा हो कि गांधी परिवार तो हर तरह से सक्षम है उन्हे सहायता की क्या जरूरत है ? कुछ न कुछ गलतफहमी तो जरूर रही होगी। पर कोई भी बात एकतरफा नहीं हो सकती चाहे दोस्ती हो या दुश्मनी। अमिताभ हैं कलाकार और कलाकार बेहद भावुक होते हैं। बोफोर्स के आरोपों से त्रस्त होकर अमिताभ ने राजनीति से तौबा कर ली थी। जबकि हमारे विचार में राजीव गांधी उनसे कहीं ज्यादा परेशानी में थे बोफोर्स के कारण और उन्हे भी मित्रों के साथ की जरूरत थी पर अमिताभ राजनीति का ताप न सह पाये और मैदान छोड़ गये। लन्दन में भी तो उन्होने केस लड़ा अपने को निर्दोष साबित करने के लिये। ये काम वे सांसद बने रहकर भी कर सकते थे। उनका उस समय इस्तीफा देना मित्रधर्म नहीं था। बाद में भले ही वे राजनीति से हट जाते पर तब उन्हे राजीव के साथ मजबूती से खड़ा होना था। बोफोर्स मामले में राजीव को उनके मित्रों के ऐसे कदम पीछे हटाने से बहुत नुकसान उठाना पड़ा। अरूण ​सिंह का मसला भी ऐसा ही था। राजीव के जाने के बाद भी अमिताभ समय समय पर राजनीति से दूर रहने कि बात दोहराते रहे तो फिर सपा के केस में ऐसा क्या हो गया? भले ही समाज सेवा के बहाने से अमिताभ ने सपा के लिये समर्थन माँगा पर माँगा तो है ही। अब पता नहीं सच है कि नहीं पर अखबार में ही पढ़ा हमने कि अमिताभ ने एक निर्देशक की फिल्म साइन करने के बाद छोड़ दी ये कहकर कि उस निर्देशक को उनके पारिवारिक मित्र अमर ​सिंह से समस्यायें थीं और वे ऐसे निर्देशक के साथ कैसे काम कर सकते हैं। यदि इतनी दृढ़ता अमिताभ ने नेहरू–गांधी परिवार के प्रति भी दिखायी होती तो शायद दोनो परिवारों की दोस्ती बनी रहती। और एक राजनीतिक सच ये भी है कि उ.प्र. में यदि कांग्रेस मजबूत होती है तो सपा को राजनीतिक हानी होनी ही है । सपा परोक्ष रूप से कई बार सोनिया गांधी का विरोध कर चुकी है विदेशी मूल के मामले में। तो बच्चन परिवार तो धर्म संकट में रहता ही कि कैसे दो राजनीतिक रूप से प्रतिद्वन्द्वी दलों के मुखियाओं से दोस्ती निभाये। फिर कांग्रेस में कितने ही ऐसे होंगे जो कभी नहीं चाहेंगे कि बच्चन परिवार नेहरू–गांधी परिवार के पास आये ताकि वे सोनिया गांधी के नजदीक जा सकें। समय तो चलायमान है। चीजें बनती बिगड़ती रहती हैं।

अशोक बाबू लम्बा व्याख्यान सुनकर बोले अजी हमें क्या मतलब है इन लोगों की मित्रता से कल टूटती तो आज टूट जाये। न इनकी मित्रता से देश का भला हो रहा और ना ही मित्रता के न रहने से देश गर्त में जा रहा। सब ड्रामा है। और आप अमिताभ बच्चन की क्या बात करते हो। कांग्रेस ने इन साहब को इलाहाबाद से खड़ा किया हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे वरिष्ठ राजनेता को हराने के लिये। अमिताभ ने फिल्मी लटकों झटकों से उन्हे हराया होगा। बेचारे बहुगुणा जी का राजनीतिक जीवन ही खत्म हो गया उस हार से। ये ठीक लगता है आपको?

अशोक जी बहुगुणा जी तो हैं नहीं सो कुछ कहना ठीक नहीं पर जब आपने बात छेड़ी है तो आपको बताना जरूरी है कि उस चुनाव में बहुगुणा जी ने किन्नरों को किराये पर बुलाकर सारे लोकसभा क्षेत्र में घुमाया था और जगह जगह किन्नर अमिताभ की खिल्ली उड़ाते घूमते थे गाना गाकर कि मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। ये अलग बात है कि इस सबके बावजूद अमिताभ ने बहुगुणा जी को अच्छी शिकस्त दी। हमारे ख्याल से तो बहुगुणा जी जैसे वरिष्ठ राजनेता को अपने प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार की इस तरह से खिल्ली उड़ाना शोभा नहीं देता था। अमिताभ का फिल्मों में काम करना उसमें गीत गाना या गाने पर नाचना उनके प्रोफेशन का हिस्सा थे और किसी को भी हक नहीं कि दूसरे के व्यवसाय का मजाक बनाये। यही सब कुछ पिछले चुनाव में गोविन्दा की जीत में सहायक रहा होगा। जनता इतनी मूर्ख नहीं होती जितना कि राजनेता समझ लेते हैं। और फिर आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अगर कांग्रेस से इतनी ही दिक्कत थी या है तो बहुगुणा जी के बेटे और बेटी क्यों कांग्रेस में बने हुये हैं? उन्हे तो आपसे और हमसे ज्यादा अपने पिता के मान-सम्मान या अपमान की चिंता होगी।

अजी हमारी समझ में तो आता नहीं कि कैसे हमारे देश के लोग एक विदेशी महिला को समर्थन देते हैं। कहाँ भाजपा की प्रचंड देशभक्ति और कहाँ सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस का ढ़ुलमुलपन। कहीं कोई मुकाबला है भला। दो मिनट तो सोनिया लगातार बोल नहीं सकती यदि लिखकर न दिया जाये। अशोक बाबू तैश में आकर बोले।

अशोक बाबू ने अपनी बात पूरी की ही थी कि हरि बाबू वहाँ पँहुच गये और उनकी बात लपकते हुये बोले,” कौन दो मिनट नहीं बोल सकता बिना लिखे हुये को पढ़े? जरूर आप सोनिया गांधी को गरिया रहे होगे। अरे कभी तो बेचारी को बख्श दिया करो। अब जनता ने भाजपा को फिर से सत्ता नहीं दी तो इसमें सोनिया का क्या कसूर। आपके प्रमोद महाजन के हिसाब से तो सोनिया से माफिक कोई भी नेता विपक्ष नहीं हो सकता था भाजपा के लिये। अपनी काबिलियत से ज्यादा महाजन को सोनिया की नाकाबिलियत पर भरोसा था। कहते थे कि जब तक सोनिया विपक्ष की नेता हैं भाजपा को कोई खतरा नहीं और भाजपा सत्ता में बनी रहेगी। पर हाय री भारत की जनता उसे भाजपा की शुद्ध हिन्दी के बजाय सोनिया की टूटी फूटी इटेलियन टोन वाली हिन्दी ही पसन्द आयी।

देखो जी समर्थन तो कांग्रेस को भी नहीं दिया जनता ने फिर क्यों लपक कर सरकार बना ली और रोज़ गाना गाया जा रहा है कि सोनिया ने ये त्याग किया वो त्याग किया। इतना बड़ा त्याग किया और ऐसे त्याग की मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। त्याग मेरी जूती। अजी जब काबिल ही नहीं थी तो पद ग्रहण न करने का नाटक किया। आपने पढ़ा नहीं था बाल ठाकरे का बयान कि राष्ट्रपति ने सोनिया को बुलाकर साफ कह दिया था कि उनके पी.एम. बनने से जटिलतायें खड़ी हो सकती हैं और हो सकता है कि सेना उनका आदेश न माने। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने ताल ठोक ही रखी थी आंदोलन करने की। इन्ही सब बातों से घबराकर इस महिला ने कुर्सी छोड़ने का नाटक किया। अजी बहुत चतुर नारी है। अशोक बाबू आवेश में आकर बोले।

बुरा न मानना अशोक बाबू पर कुछ बातों में संघ परिवार से जुड़े घटकों की बातों पर विश्वास कर पाना मुश्किल होता है। ये लोग कैसी भी बातें फैलाते रहते हैं। हमें तो इतना पता है कि बाल ठाकरे की बात जो आप कर रहे हो खुद राष्ट्रपति महोदय ने ऐसी बातों का खंडन ​किया कि उन्होने सोनिया गांधी से इस तरह की कोई चेतावनीयुक्त बात कही थी। हमारे पास तो ऐसा कोई कारण है नहीं कि राष्ट्रपति की बात पर भरोसा न किया जाये। एक तो ऐसा एक भी व्यक्तित्व वर्तमान राजनीति में नहीं है जो देशहित में ही सब बातें सोचता कहता और करता हो। इतना ऊर्जावान राष्ट्रपति हमने तो पहले देखा नहीं कोई भी। साहब हमें तो तो पहली बार कोई राष्ट्रपति पसन्द आया है।

सही बात है हरि बाबू उन्हे पता है कि देश की जरूरत क्या है और आज की वास्तविकता क्या है। तभी उन्होने अपना सारा ध्यान बच्चों पर केन्द्रित किया है। कैसे वे बच्चों में उत्साह जगा रहे हैं। ये सब कुछ सालों में नजर आयेगा। विजय बाबू ने समर्थन किया।

ये बात तो सही कह रहे हो आप आदमी तो प्रोग्रे​सिव है भाजपा बड़ा अच्छा काम कर गयी डा. कलाम को राष्ट्रपति बनाकर। अशोक बाबू ने भी समर्थन करते हुये कहा।

अरे आप दोनो कहाँ चारदिवारी से घिरे बैठे हो। चलकर पार्क में बैठा जाये कुछ घूमना भी हो जायेगा। हरि बाबू ने प्रस्ताव रखा।

हाँ ये ठीक रहेगा बातें वहीं होंगीं अब। अशोक बाबू ने कुर्सी से उठकर अंगड़ायी लेते हुये कहा।

ठीक है मैं जरा अन्दर घर में बता कर आ जाऊँ। विजय बाबू ने कहा और घर के अन्दर चले गये।

कुछ ही देर में विजय बाबू बाहर आ गये और बोले कि चलो सुनील जी को भी देख लिया जाये कहाँ रह गये?

तीनो लोग सड़क पर आ गये। पार्क के रास्ते में सुधीर बाबू का घर पड़ा तो विजय बाबू ने गेट से ही अन्दर खेलते बच्चे से पूछा बेटा बाबा आ गये बाजार से वापिस?

बच्चे ने ना में गरदन हिलायी। तब तक आवाज सुनकर सुनील जी का छोटा बेटा बाहर आया और सबको नमस्ते करके बोला कि अभी तो पापा आये नहीं हैं ।

अरे तुम तो इस बार दो तीन हफ्तों के बाद आ रहे हो। कहाँ अटक गये थे? विजय बाबू ने पूछा।

बस जी काम के चक्कर में आना हो नहीं पाया पहले। फिर सुबह और रात को इतना कोहरा हो जाता है कि ज्यादा शाम को उधर से इधर आने की हिम्मत हुयी और ये भी पता था कि शनिवार की रात को किसी तरह आ भी गया तो सोमवार की सुबह सुबह जाना मुश्किल हो जायेगा और यदि रविवार की शाम को ही वापिस जाना पड़े तो अच्छा नहीं लगता।

सही बात है इतनी भागदौड़ से क्या फायदा। अब कोहरा कम होता जायेगा तो फिर से हर हफ्ते चक्कर लगने लगेंगे। हरि बाबू बोले।

अच्छा बेटा पापा आ जायें तो बोलना कि हम लोग पार्क में बैठे हैं वहीं आ जायें। अशोक बाबू ने कहा।

…जारी…

जून 18, 2011

बतकही : आरम्भ

चारों मित्र अपनी बैठकों को बतकही क्लब कहा करते हैं। इन बैठकों की शुरुआत तो कब हुयी यह इन मित्रों को भी याद न होगा पर सन 2005 के जनवरी माह से ये बैठकें नियमित जरुर हो गयीं। बिरला ही कोई दिन जाता है कि जब चारों घर पर हों और बैठक न लगे।

उसी दौरान की एक बैठक से :-

जनवरी का दूसरा रविवार होने के बावजूद धूप खिलकर निकली थी अत सुबह का नाश्ता समाप्त करते ही अशोक बाबू विजय जी के घर पहुँच गये थे और दोनों लोग इस वक्त धूप का लुत्फ उठाते हुये अखबार पढ़ने में लगे हुये थे।

अशोक बाबू ने अखबार के पन्ने बन्द करके कलाई घड़ी में समय देखकर कहा,” दस बज गये विजय बाबू, ये हरि बाबू और सुनील जी नहीं आये अभी तक। कहाँ रह गये कहीं टी.वी. सीरियलों से तो नहीं चिपक गये बच्चों के साथ- साथ”?

“आते ही होंगे सुनील जी तो शायद बाजार गये होंगे मिठाई लाने उनके बेटे का प्रमोशन हो गया है। मेजर से ले. कर्नल बन गया है और हरि जी भी फंस गये होंगे किसी काम में। आते ही होंगें दोनों। कौन सा यहाँ संसद लगनी है जिसके लिये कोरम पूरा नहीं हो रहा है”, विजय बाबू इत्मिनान से बोले।

सुनील जी ने आपको बताया अपने बेटे के प्रमोशन के बारे में? हमें तो बताया नहीं कल शाम पाँच बजे ही मिले थे हमसे तो। अशोक बाबू शिकायती लहजे़ में बोले।

अजी उन्हे तो खुद कल रात पता चला जब उनके बेटे ने फोन करके बताया। वो तो सुबह दूध लेने जाते समय उनसे मुलाकात हो गयी तो मुझे पता चला। अब अशोक बाबू आप यहाँ हिन्दुस्तान में रहो तब तो कोई आपको बताये कुछ। रोज़ तो आप शहर से बाहर रहते हो। विजय बाबू ने चुटकी ली।

अशोक कुछ कह पाते उससे पहले ही चाय आ गयी।

लो जी चाय पियो आप अशोक बाबू। तभी आपको रस आयेगा बातों में।

अच्छा चाय आ गयी है तो पी लेते हैं पर मुझे लगने लगा है कि चाय आदि पीने से मेरा बी.पी. कुछ बढ़ जाता है।

अजी कुछ बी.पी. ऊपर नीचे नहीं हो रहा चाय पीने से। आप थोड़ा सा ना चिन्ता कम किया करो सब अपने आप ठीक रहेगा। जमाने भर की चिन्ता करना छोड़ दो।

अजी चिन्ता कोई मैल तो है नहीं कि नहा लिये और शरीर से दूर हो गयी। जो चिन्ता है वो है। जब तक काम पूरा नहीं होगा चिन्ता दूर कैसे हो जायेगी? आप भी कैसी बात करते हो? अशोक बाबू ने चाय का कप उठाते हुये कहा।

विजय बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ देर दोनों चाय की चु​स्कियों के साथ चुपचाप अखबार पढ़ते रहे।

सहसा अशोक बाबू बोले,” विजय बाबू ये शाहरूख खान के बारे में आपका क्या विचार है”?

विजय बाबू ने अशोक जी के अखबार में छपी तस्वीर पर निगाह डालते हुये कहा विचार तो ठीक ठाक सा ही है। तरक्की तो कमाल की है लड़के की। देखो टी0वी के सीरियलों से कहाँ पहुँच गया। कुछ तो बात जरूर होगी उसमें। पर आप एक्टिंग की बात करो तो ये लड़कपन के किरदारों वाली फिल्में तो ठीक हैं पर परिपक्व रोल में मामला जमता नहीं। बड़ा हल्ला सुना था कि शाहरूख की देवदास आ रही है टी.वी. पर। हमने भी देखी पर साहब बात जमीं नहीं। हमारे पास तो शरत बाबू की किताब भी है। दिलीप कुमार की फिल्म देखने के बाद हमने किताब पढ़ी थी और ऐसा लगा था कि जैसे दिलीप कुमार को सोचकर किताब लिखी गयी हो। बड़ा जबर्दस्त अभिनय किया था दिलीप कुमार ने। दिलीप कुमार भी तकरीबन इसी उम्र के रहे होंगे देवदास करते समय जितनी उम्र में शाहरूख देवदास बने हैं पर दिलीप के अभिनय में गहरायी और परिपक्वता थी। या कह लो कि निर्देशक की अपनी समझ है। अपना अपना समय है हो सकता है हम लोग बूढ़े हो गये हैं और पुराना रिकार्ड बजा रहे हैं पर व्यक्तिगत रूप से हमें तो यही लगता है कि नायक के रूप में अभी तक तो कोई भी दिलीप कुमार से आगे नहीं जा पाया। अमिताभ बच्चन को ही थोड़ा करीब मान सकते हैं पर वह भी उन्नीस ही रहे दिलीप कुमार के सामने।

हमें तो विजय बाबू बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ये शाहरूख खान और बच्चों को देखो पागल हुये रहते हैं इसके पीछे।

अजी बच्चे तो रितिक या ह्रितिक क्या है उसके दीवाने हैं आजकल।

ये देखो विजय बाबू ये लड़की कह रही है कि इसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी शाहरूख के साथ काम करेगी। मुझे तो बेवकूफी लगती है ऐसी बात।

मुझे तो अशोक बाबू वो लड़का ज्यादा पसन्द है जो कोकाकोला के विज्ञापन में आता है अलग अलग रूपों में। ठंडा माने कोकाकोला कहता हुआ। विजय बाबू चहक कर बोले।

अच्छा आमिर खान। वो तो मुझे भी ठीक लगता है। बल्कि सारे खानों में सबसे सही वही है। वो तीसरा सलमान खान तो मुझे एक आँख नहीं भाता। हमेशा कुछ न कुछ घपला करे रखता है।

हम तो टीवी पर ही देखते हैं अशोक बाबू फिल्में आदि। ​सिनेमा गये तो सालों हो गये। इस सलमान खान की भी एक फिल्म अभी दुबारा देखी थी हम आपके हैं कौन। ये बहुत अच्छी लगी हमें। वैसे अब तो खान ही खान हैं फिल्मों में। अभी फिरोज खान का पुत्र ही जम नहीं पाया था कि संजय खान के पुत्र ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पटौदी के साहबजादे हैं ही पहले से। और भी कई होंगें।

विजय बाबू खान तो हमेशा रहे हैं फिल्मों में। ये आपका दिलीप कुमार है तो ये भी कुछ खान ही। इन खानों का मन ही फिल्मों में लगता है।

हाँ अशोक बाबू उधर खान और इधर खन्ना। राजेश खन्ना विनोद खन्ना और अब इनकी सन्तानें। कपूर खानदान तो है ही हमेशा से।

हाँ जी अब तो खानदानी व्यवसाय बन गया है। बच्चन परिवार, देयोल परिवार, चोपड़ा परिवार, रोशन परिवार, कपूर परिवार, भट्ट परिवार। जैसे पहले व्यापारिक संस्थायें हुआ करती थीं एंड संस के नाम से फिल्मों में भी बाकायदा लिखा जाने लगेगा फलाना एंड संस।

अब तो अशोक बाबू ऐसा लगने लगा है कि बाहर के लोग जिनका कोई नहीं है फिल्म इंडस्ट्री में फिल्म लाइन में घुस ही नहीं पायेंगें।

सही बात है। किसी भी उद्योग में सीमित पैसा होता है। जब सारा पैसा इन स्टार संस और डॉटरों पर लग जायेगा तो बाहर से आने वालों को कौन घास डालेगा और कहाँ से डालेगा?

अजी अब तो टीवी पर भी इन फिल्म वालों का ही कब्जा होता जा रहा है। स्टार प्लस पर आप ये समझो कि कम से कम चार पाँच सीरियल रोज़ आते हैं जितेन्द्र की बेटी एकता कपूर के। करिश्मा कपूर और श्रीदेवी आ ही रही थीं सहारा टीवी पर अब हेमा मालिनी भी आने लगीं।

विजय बाबू हमारी तो समझ में आता नहीं कि हेमा मालिनी को क्या जरूरत है सीरियल आदी करने की। एक फिल्म क्या हिट हो गयी अमिताभ बच्चन के साथ फिर से मैदान में कूद पड़ीं। अब एक तरफ तो इनकी बिटिया फिल्मों में है और ये अभी तक मोह नहीं छोड़ पा रही। ये हालत तो तब है जबकि ये सांसद भी हैं। जाने कब ये जनता के लिये समय निकाल पाती होगीं जाने कौन तो इन्हे संसद में भेज देता है?

अजी ये तो इनकी मर्जी फिल्म या सीरियल करें न करें। आखिरकार इन लोगों का व्यवसाय तो यही है। जीने के लिये कमायेंगे तो है ही। और हेमा मालिनी को तो आपकी भाजपा ने ही संसद में भेजा है और इस बार तो इनके पतिदेव धर्मेन्द्र को भी भेज दिया है। भाजपा का तो पूरा इरादा टीवी वाली तुलसी को भी भेजने का था दिल्ली से संसद में पर दिल्ली की जनता को तुलसी जमी नहीं। विजय बाबू चुटकी लेते हुये बोले।

देखो विजय बाबू ऐसा तो है नहीं कि खाली मेरी भाजपा ही भेज रही है इन फिल्मी ​सितारों को संसद में। इसी लोकसभा में सुनील दत्त और गोविन्दा आये कांग्रेस के टिकट से जीतकर। जया प्रदा और राज बब्बर आये सपा के टिकट पर। सपा ने ही जया बच्चन को भेजा राज्य सभा में। और ये अमिताभ बच्चन आज भले ही सपा के साथ खड़े दिखायी दे रहें हों इन्हे राजनीति में तो राजीव गांधी ही लाये थे कांग्रेस की ओर से। अशोक बाबू कुर्सी पर पहलू बदल कर बोले।

ऐसा है अशोक बाबू सुनील दत्त का मामला ऐसा तो है नहीं कि सीधे फिल्मों से संसद में जाकर बैठ गये हों। सालों से समाजसेवा के काम में जुटे रहे। आतंकवाद से जलते पंजाब में पदयात्रा निकालने गये थे अस्सी के दशक के मध्य में। दत्त साहब आज से तो सांसद हैं नहीं। ऐसा नहीं है कि फिल्म वालों पर कोई पाबन्दी है राजनीति में आने की। पर आप यदि ये कह रहे हैं कि खाली अपनी सेलिब्रिटी छवि का सहारा लेकर ये लोग राजनीति में घुस जाते हैं जो कि गलत है तो मैं भी आपकी बात से सहमत हूँ। खाली फिल्मी ​सितारे ही नहीं बल्कि सब तरह के ​सितारों के लिये ये बात सच है। इनमें से जो लोग ऐसा समझते या करते हैं कि जब और धंधे बन्द हो जाते हैं तो राजनीति में घुसने की कोशिश करने लगते हैं तो ये राजनीतिक दलों राजनीति और देश सबका नुकसान ही ज्यादा करते हैं।

भाजपा तो इसीलिये इन फिल्मी सितारों या अन्य ​सितारों को टिकट दिया नहीं करती थी। शत्रुघन सिन्हा को भी पार्टी से जुड़ने के सालों बाद टिकट दिया। अशोक बाबू कुछ फख्र से बोले।

देखो अशोक जी गलत बयानबाजी़ तो आप करो मत। आपको शायद याद न हो सबसे पहले शत्रुघन सिन्हा, वी.पी.​सिंह के सर्मथन में उतरे थे। ये तो याद नहीं कि ये उनके साथ घूमे भी थे या नहीं पर बयानबाजी अच्छी खासी की थी। और राज बब्बर भी वी.पी के सर्मथन में ही कूदे थे जब वी.पी ने राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स मामले में ताल ठोक रखी थी सन सतासी के आसपास। वो तो बाद में शत्रुघन ​सिन्हा भाजपा में जा पहुँचे और राज बब्बर सपा में। सपा के बढ़ने में खासा पसीना बहा है राज बब्बर का भी। और ऐसा नहीं है कि शत्रुघन ​सिन्हा को बहुत बाद में टिकट दिया गया हो। ये सन इक्यानवें के लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली में हुये उपचुनाव में राजेश खन्ना के खिलाफ भाजपा की ओर से लड़े थे। इस सीट पर पहले आडवाणी जीते थे राजेश खन्ना को ही हराकर पर उनके पास शायद गांधीनगर की सीट भी थी और उन्होने दिल्ली की सीट छोड़ दी थी। उपचुनाव में शत्रुघन ​सिन्हा हार गये थे राजेश खन्ना से और फिर सालों तक भाजपा उनका उपयोग केवल चुनाव के समय भीड़ जुटाने में ही करती रही और बाद में राज्यसभा में ले लायी। और आपको शायद याद आ जाये कीर्ति आजाद चेतन चौहान रामायण वाली सीता यानि दीपिका रावण यानि अरविन्द त्रिवेदी महाभारत के कृष्ण यानि नीतिश भारद्वाज व अन्य की जो भाजपा द्वारा सिर्फ संसद की सीटें जीतने के लोभ में राजनीति में लाये गये थे। जबकि इनमें से किसी का भी समाज सेवा से न पहले मतलब था और न ही बाद में रहा। आखिर जीतने के बाद तो ऐसे ​सितारों को गम्भीर हो जाना चाहिये राजनीति के प्रति।

चलो विजय बाबू मान लिया भाजपा ने भी ​सितारों को टिकट दे दिया। अशोक बाबू कुछ हार मानते हुये बोले। पर ये सारी शुरूआत तो कांग्रेस द्वारा की गयी थी। हमारे पास तो रिकार्ड है नहीं कि कौन कब कहाँ से खड़ा हुआ पर टक्कर में आने को भाजपा को भी ​सितारों की मदद की मदद लेनी पड़ी। कांग्रेसियों ने कितनी फजीहत की बेचारे धर्मेन्द्र की इस चुनाव में। कितना कीचड़ उछाला हेमामालिनी से शादी को लेकर? अशोक बाबू रोष से बोले।

अशोक बाबू हमें तो ये पता है कि आजकल राजनीति का जो स्तर हो गया है उसमें धर्मेन्द्र किसी भी पार्टी से खड़े होते विपक्षी दल यही सब बातें उठाते। हर दल यही सब कर रहा है। शरीफ आदमी है धर्मेन्द्र। पता नहीं क्यों राजनीति के चक्कर में आ जाते हैं ऐसे लोग। वर्तमान की राजनीति का ताप सहना इतना आसान नहीं है। मुझे तो एक बात पता है कि किसी खास राजनीतिक दल से जुड़कर ये फिल्मी ​सितारे अपना नुकसान ही ज्यादा करते हैं। अगर फिल्मों में काम न करना हो आगे तो बात अलग है वरना इन लोगों को बचना चाहिये सक्रिय राजनीति से। समाज सेवा तो आप कैसे भी कर सकते हो। भारत की जनता भावनात्मक रूप से बहुत परिपक्व नहीं है। और जब ये फिल्मी ​सितारे राजनीति में आ टपकते हैं तो अपना मार्केट ही डाउन करते हैं क्योंकि जब तक सत्तारूढ़ दल के साथ हैं तब तक तो ठीक है पर यदि वही दल हार जाये तब? भाई या तो आपके कुछ अपने राजनीतिक विचार हों और आप पूरे तौर पर राजनीति में आ जायें। पर ये हिन्दी ​सिनेमा वाले लोग दोनो नावों की सवारी करना चाहते हैं और कुछ तो पावर के लोभ में राजनीति की ओर दौडते़ हैं।

ना जी विजय बाबू भाजपा कभी ये काम ना करती यदि धर्मेन्द किसी विपक्षी दल के टिकट पर खड़े होते। भाजपा कभी व्यक्तिगत जीवन पर आक्षेप ना लगाती। भाजपा की ट्रेनिंग ही ऐसी नहीं है। भाजपा कभी शालीनता नहीं छोड़ती। सारी दुनिया जानती रही है बच्चन परिवार की नेहरू–गांधी परिवार से निकटता को। पर जब अटल जी पी.एम थे तो एक समारोह में डा. हरिवंश राय बच्चन की जमकर तारीफ की थी और ग्वालियर का उनसे जुड़ा हुआ कोई प्रसंग सुनाया था। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अशोक जी आप मेरा मुँह न खुलवाओ। चलो आप पहले बच्चन जी की ही बात ले लो। अटल जी ने बच्चन जी की तारीफ की होगी उनके रचे साहित्य के कारण। बच्चन जी के साहित्य की गुणवत्ता और उनकी प्रसिद्धि से सब वाकिफ हैं। हरेक के अपने अपने क्षेत्र हैं। अब आप ये बुरा न मान जाना कि मैं अटल जी की कविताओं की बुराई कर रहा हूँ या उन्हे साहित्यकार के रूप में कम आँक रहा हूँ। पर हाँ उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले हमने कभी उनकी कविता नहीं सुनी थी। मुझे याद है कई साल पहले अटल जी अमेरिका गये थे किसी सर्जरी के ​सिलसिले में और वहाँ से धर्मयुग या नवभारत टाइम्स के लिये एक संवेदनशील लेख लिख कर भेजा था। बहुत अच्छा लगा था पढ़कर। उनके साहित्यप्रेमी होने और अच्छा लिखने की क्षमता के बारे में तो कोई सन्देह है नहीं।

थोड़ा ठहरकर विजय बाबू बोले अब बच्चन जी तो रहे नहीं। पर जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से एम.पी. थे और वी.पी.सिंह सारे देश में राजीव गांधी के विरूद्ध बोफोर्स की अलख जगाते हुये घूम रहे थे तो अटल जी ने भी सारे भारत में बच्चन और नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ था। हमने तो तभी अटल जी को साक्षात सुना था। अटल जी ने गरज कर कहा था कि बच्चन जी कहते हैं कि यदि उनके पुत्रों को परेशान किया गया तो वे भी जबान खोल देंगें। अटल जी ने बच्चन जी को मुँह खोलने की चुनौती दी थी और ललकार कर कहा था कि बच्चन परिवार को बताना पड़ेगा कि बोफोर्स की दलाली का पैसा कहाँ गया। तब ये बच्चन परिवार की किसी लोटस कम्पनी का जिक्र किया करते थे।

अजी अटल जी राजनीति में थे तो ​स्थितियों का फायदा तो उठाते ही। वे विपक्ष में थे उनका काम ही था मामले को हर जगह उठाना। वे भला क्यों बच्चन या राजीव गांधी परिवार पर लगे आरोपों से मुक्त होने में उनकी सहायता करते।। अशोक बाबू कुर्सी पर कमर पीछे टिकाते हुये बोले।

…जारी…

दूसरी किस्त : बतकही – सोनिया गाँधी और संघ परिवार

तीसरी किस्त :बतकही – उदारीकरण और भारत

फ़रवरी 11, 2011

रेगिस्तान में हिमपात : कविराज की पहली पुस्तक

और अंततः कविराज, जैसे कि पढ़ाई के जमाने से ही वे मित्रों में पुकारे जाते थे, की पहली पुस्तक प्रकाशित हो ही गयी। बीसियों साल लगे हैं इस पुण्य कार्य को फलीभूत होने में पर न होने से देर से होना बेहतर!

पहले कम्प्यूटर इंजीनियरिंग और बाद में मैनेजमेंट की पढ़ाई करके प्रबंधन के क्षेत्र में झण्डे गाड़ने की व्यस्तता के कारण उन्हे ऐसा मौका नहीं मिल पाया कि वे किताब प्रकाशित करा पाते । पर एक दिन किताब छपवाने का ख्याल फिर से आ गया तो उसने जाने का नाम ही नहीं लिया। सर पर चढ़ कर बैठ गया विचार कि इससे पहले की तुम और गंजे हो जाओ उससे पहले किताब छपवा लो। बस विचार के आगे समर्पण करके उन्होने अपने पुराने हस्तलिखित कागज ढूँढे। हिन्दी में टाइप करना सीखा और युद्ध स्तर पर कम्प्यूटर में अपनी पुरानी कवितायें टाइप करके संग्रहित कर दीं।

विरोधाभासी बातें एक ही कविता में कहना उनका एक खास गुण रहा है और इसीलिये उन्होने अपनी किताब का शीर्षक भी ’रेगिस्तान में हिमपात’ रखा है।

तब हॉस्टल के समय वे बैठे बैठे, चलते चलते, नहाते नहाते, खाते खाते  कवितायें उवाचते रहते थे, बल्कि उनके रुम मेट तो कहा करते थे कि यह बंदा नींद में भी कवितायें गढ़ता रहता है। एक बार तो ऐसे ही मित्रों ने किसी अवसर पर खुद खाना बनाने का आयोजन किया तो प्याज काटते काटते कविराज के मुख से सुर झड़ने लगे।

नैनों में अश्रु आये प्याज जो काटी हाये
ऐसे में कोई आके मोहे चश्मा लगा दे

कविता में कैसी भी तुकबंदी कर दें पर कविराज गाते बहुत अच्छा थे। किशोर के गीत को उनके जैसी आवाज में खुले गले से गाने की कोशिश करते और मुकेश के गीत को उनके जैसी विधा में।

वैसे तुकबंदी की प्रेरणा उन्हे अभिनेता प्राण से मिली। हुआ यूँ कि उन्होने दिल दिया दर्द लिया फिल्म देखी और प्राण के बचपन की भूमिका निभाने वाले बाल कलाकार के मुख से निकले एक  काव्यात्मक नारे ने उन्हे बहुत लुभाया था। वह पात्र दूध लेकर आये नौकर से गाकर कहा करता था

दूध नहीं पीना तेरा खून पीना है

कविराज को भी बचपन से ही दूध नापसंद था सो स्पष्ट है कि उन्हे उपरोक्त्त नारा पसंद आना था। हाँ खून पीने की बात उन्हे पसंद न आयी थी। सो उन्होने उसकी जगह चाय रख दी थी और अक्सर वे गुनगुनाते थे।

दूध नहीं पीना मुझे चाय पीनी है

और भी तमाम फिल्मों में प्राण कुछ न कुछ काव्यात्मक तकियाकलाम बोला करते थे और उनके अभिनय की यही बात कविराज को लुभा गयी। बाद में उन्होने प्राण के तरीके से ही बड़े अभ्यास के बाद सिगरेट के धुंये से हवा में छल्ले बनाना सीख लिया। हालाँकि वे धुम्रपान नहीं करते थे पर ऐसा करने वाले साथियों से कहते थे कि जब थोड़ी सी सिगरेट रह जाये तो मुझे छल्लों की प्रेक्टिस के लिये दे देना।

बकौल खुद उनके, कविता रचने के प्रति उनका प्रेम जीवन के पहले पहले प्रेम के कारण ही पनपा। आठवीं कक्षा में पढ़ते थे और साइकिल पर स्कूल जाते हुये उन्हे एक अन्य स्कूल की छात्रा से प्रेम हो गया। उनकी साइकिल बिल्कुल उसी गति और तरीके से चलने लगी जैसे कि उस लड़की की साइकिल के पहिये चलते।

घर में कविराज के पिता भी आरामकुर्सी पर आँखें बंद करके  देखा देखी बलम हुयी जाये गाती हुयी बेग़म अख्तर की आवाज में घंटों खोये रहते थे।

प्रेम का जीन तो पक्का पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदा रहता है।

कविराज का प्रेम जब देखादेखी की हदों में सिमटने से इंकार करने लगा और पढ़ते हुये कॉपी किताबों के पन्नों में भी तथाकथित प्रेमिका का चेहरा दिखायी देने लगा और बैठे बैठे वे उसके ख्याल में खो जाने लगे तो उन्हे प्रेरणा मिली प्रेम पत्र लिखने की। कायदे से यही उनकी पहली रचना थी। दुनिया के बहुत बड़े बड़े लेखकों के लेखन की शुरुआत प्रेम पत्र लिखने से ही हुयी है।

तो शुरुआत उनकी गद्य से हुयी। करुण हास्य का बोध उन्हे इस प्रेम गाथा से गुजरने के बाद ही हुआ। बाद में वे खुद ही चटकारे लेकर अपने पहले प्यार की पहली चिट्ठी का हाथों लिखा और आँखों देखा हाल सुनाया करते थे।

कुछ पंक्त्तियाँ तो अभी भी याद आती हैं। उस जमाने में उन्हे लड़की की नाक बहुत पसंद थी। मुमताज़ उनकी पसंदीदा नायिका थीं और उनके जैसी ही नाक उस लड़की की भी थी। पत्र में उसके प्रति प्रेम को विस्तार से स्वीकारने की औपचारिकता के बाद उन्होने अपनी कल्पनाओं को प्रदर्शित करते हुये लिखा था कि वे उसकी नाक को अपनी नाक से छूना चाहते हैं

तब तो उन्हे पता न था कि संसार के बहुत सारे कबीले ऐसे हैं जहाँ नाक से नाक छुआकर प्रेम को प्रदर्शित किया जाता है।

हंसते हुये लड़की के गाल सुर्ख लाल हो जाया करते थे और उनके अनुसार उन्हे लाल अमरुद याद आ जाते थे। दुनिया के बहुत सारे लोगों की तरह उन्हे भी बचपन में सफेद से ज्यादा लाल रंग वाले अमरुद बहुत ज्यादा आकर्षित करते थे। लाल अमरुद उनके अंदर सौंदर्य बोध जगाता था जैसे कि बसंत में टेसू के फूल भी उन्हे आह्लादित कर जाते थे। नदी किनारे लगे अमलतास के पेड़ तो उन्हे इतना आकर्षित करते थे कि वे बहुत बार पेड़ से लटकी फूलों की झालरें तोड़ने के लिये नीचे नदी में गिर चुके थे। तैरना उन्हे थोड़ा बहुत आता था पर तैरने में कुशलता तो उन्होने अपनी इसी हरकत से हासिल की।

कहने का तात्पर्य यह है कि बचपन से ही वे कुदरती तौर पर एक प्रेमी थे। जिसे अंग्रेजी में कहा जाता है,” Ohh! By nature he was a romantic person”, ऐसे वे हुआ करते थे। अभी भी हैं।

प्रेम करना या प्रेम में होना उनके लिये बहुत जरुरी था। वे भी कहते थे और बहुत सारे मित्र इस बात से इत्तेफाक रखते थे कि भारत नामक देश में, खासकर हिन्दी भाषी प्रदेशों में, युवा लोग दो इच्छाओं का तहेदिल से पीछा करते हैं- एक थी किसी लड़की से प्रेम करना और दूसरी आई.ए.एस बनना। दूसरी इच्छा बहुत कठिन श्रम माँगती है तो उसे सम्भालने के लिये और जीवन की अन्य कठिनाइयों से उत्पन्न ऋणात्मक ऊर्जा को सम्भालने के लिये युवा प्रेम में आसरा खोजा करते थे। आजकल भी खोजा करते होंगे बस प्रेम अब कागजी और हवाई न रहकर देह से ज्यादा जुड़ गया है और अब जैसे भी हो जल्दी से जल्दी देह-सम्बंध बनाने की इच्छा कुलबुलाती रहती है।

बहरहाल कविराज ने कॉपी से पन्ने फाड़कर एक लम्बा सा रुक्का लिखा जिसमें उन्होने अपने पहले प्यार की सारी भावनायें बहा दीं और कई दिनों तक मौका तलाशते रहे कि लड़की उन्हे मिनट भर को भी अकेली मिल जाये। एक दिन सुबह स्कूल जाते हुये उन्हे ऐसा मौका मिल भी गया और उन्होने शीघ्रता से साइकिल लड़की की साइकिल के नजदीक लाकर रेलगाड़ी की रफतार से धड़कते दिल के साथ पत्र जेब से निकाला और हकलाते हुये लड़की से कहा,” तुम्हारे लिये है पढ़ लेना“।

चेहरा उनका डर के मारे लाल हो चुका था। पत्र को उसके हाथों में थमाकर उन्होने सरपट साइकिल दौड़ा दी।

दोपहर बाद स्कूल से लौटते हुये उसी जगह जहाँ उन्होने लड़की को पत्र सौंपा था एक बलिष्ठ युवक ने उन्हे रोका।

संयोग की बात कि इस घटना से पहले दिन उनके अंग्रेजी के अध्यापक ने सबको Aftermath शब्द का अर्थ समझाया था पर कविराज उसे समझ नहीं पाये थे। हो सकता है कि उनका अंतर्मन प्रेमिका के ख्यालों में गुम हो और उनकी इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण न कर पायीं। पर उस युवक के रोके जाने के बाद हुयी घटना और उसके बाद मन में उठने वाले भावों ने उन्हे अंग्रेजी के शब्द का अर्थ बखूबी समझा दिया। कहते भी हैं कि जीवन में स्व: अनुभव का बड़ा महत्व है।

उस शाम उनके विचलित मन में प्रथम बार काव्य का प्रस्फुटन हुआ और उन्हे कक्षा में पढ़ी काव्य पंक्तियों के अर्थ ऐसे समझ में आने लगे जैसे उनकी कुंडलिनी जाग्रत हो गयी हो।

वियोगी होगा पहला कवि विरह से उपजा होगा गान

जैसी पंक्त्तियों ने उनसे कहलवाया

वियोगी ही बन पाते हैं कवि विरह से ही उपजता है ज्ञान

तो उपरोक्त्त पंक्ति उनके द्वारा रची गयी पहली काव्यात्मक पंक्त्ति थी। पूरे चौबीस घंटे उनका दिमाग किसी और ही दुनिया में विचरण करता रहा। फिर जाने क्या हुआ कि उन्हे करुण – हास्य जैसे  मिश्रित भाव का बोध होने लगा। अगली रात के करीब दो बजे होंगे, जब पूरे मोहल्ले में शायद वे ही जाग रहे थे, उन्होने सिनेमा के परदे पर भावनात्मक रुप से लुटने-पिटने के बाद एक अजीब सी मुस्कान फेंकने वाले राज कपूर की भांति एक मुस्कान अपने चेहरे पर महसूस की और उनके हाथों में थमी कलम सामने मेज पर रखी कॉपी के पन्ने पर चलने लगी।

कलम रुकी तो उन्होने पढ़ा कि कुछ पंक्तियाँ पन्ने पर ठहाका मार रही थीं। उन्होने उन पंक्तियों को ऐसे पढ़ा जैसे कि इनका अस्तित्व उनके लिये अजनबी हो।

समझते रहे हम आज तक जिसे अपनी कविता
वह तो निकली सूरज पहलवान की बहन सविता
अब कभी न होने वाले साले ने, घुमा के थप्पड़ ऐसे मारे
लाल कर दिये गाल हमारे, आंखों में नचा दिये तारे

तो हास्य मिश्रित करुण भाव से यह उनका पहला साक्षात्कार था। पहले प्यार में खाये थप्पड़ों ने उन्हे यह साहस न करने दिया कि वे यह राज जान पाते कि कैसे लड़की के भाई को उनके प्रेम पत्र के बारे में पता चला। यह राज राज ही बना रहा और उन्हे सालों तक सालता रहा।

पहले प्यार ने उन्हे कवि बना दिया। बाद में उनकी लेखन प्रतिभा उन लोगों के बड़ी काम आयी जो प्रेम करने की जुर्रत तो कर बैठते थे पर प्रेम पत्र तो छोड़िये घर वालों को कुशल क्षेम का पत्र भी नहीं लिख पाते थे ऐसे सारे साक्षर अनपढ़ तथाकथित प्रेमियों के लिये प्रेम पत्र कविराज ही लिखा करते थे।

कविराज की काव्य रचने की क्षमता में सबसे खास बात थी कि जब ’बस दो मिनट’ जैसे विज्ञापन नूडल्स को भारतीयों पर थोप रहे थे वे मिनट भर में ही लुभाने वाली पंक्तियाँ लेकर हाजिर हो जाते थे। नारे बनाने में उनका कोई सानी न था।

सीनियर बुश ने इराक पर हमला किया और सैटेलाइट टी.वी की बदौलत जब दुनिया ने युद्ध का लाइव कवरेज देखा और भारत में बुश और सद्दाम हुसैन के पक्ष और विपक्ष में ध्रुवीकरण होने लगा तो उन्हे सद्दाम हुसैन से व्यक्तिगत कोई लगाव न था पर कविराज बुश की साम्राज्यवादी नीतियों के सख्त खिलाफ थे। एक रोज सुबह जब कुछ लोग जॉगिंग करते हुये नवाबगंज की दीवार के पास से गुजरे तो उन्होने बड़े बड़े अक्षरों में लिखा पाया

सद्दाम उतरे खाड़ी में बुश घुस गये झाड़ी में

बीती रात कविराज खाना खाने के बाद से कुछ घंटों के लिये गायब थे। लौटने पर उन्होने बताया था कि वे पास के सिनेमा हॉल में नाइट शो देखने गये थे।
पहले तो कभी वे अकेले फिल्म देखने न गये थे। उन्होने कभी स्वीकार न किया परंतु मित्रों को संदेह था कि बुश और सद्दाम हुसैन के ऊपर बनाया गया नारा उन्होने ही गढ़ा था।

ऐसा नहीं कि वे केवल तुकबंदी वाली कवितायें ही रचते थे। वे बेहद ज़हीन और संवेदनशील कवितायें भी रचते थे। बस उन्हे देख पाने का सौभाग्य उनके केवल दो मित्रों को ही मिला था और वह भी इस आश्वासन के बाद कि उनके इस संवेदनशील रुप की बात जाहिर न की जाये। वे अमिताभ बच्चन के चरित्रों जैसी दिलजलों वाली धीर-गम्भीर छवि ही बनाये रखना चाहते थे, ऐसा दिलजला जो कॉमेडी का सहारा तो लेता है पर अंदर से अकेला है।

कितने ही साथियों के प्रेम सम्बंध कविराज की लेखनी के कारण मजबूती के जोड़ से जीवित रहे। कितनों के प्रेम सम्बंध शादी की परिणति पा गये। यह संदेहास्पद है कि किसी भी साथी ने अपनी पत्नी पर कभी यह राज खोला होगा कि उसे लिखे जाने वाले उच्च कोटि के प्रेम पत्रों में उसका योगदान बस इतना था कि वह कविराज के लिये चाय, फिल्म और खाने का इंतजाम करता था।

कविराज की कवितायें कॉपियों, रजिस्टरों एवम डायरियों के पन्नों में बंद होती गयीं।

सालों बीत गये। साथी दुनिया में इधर उधर बिखर गये। ईमेल का पर्दापण हुआ तो सम्बंध फिर से स्थापित हुये और फिर ऊर्जा जाती रही तो त्योहारों और नव वर्ष आदि के अवसरों पर शुभकामनायें भेजने तक संवाद बने रहे। यादें तो यादें हैं कभी जाया नहीं करतीं, जीवन कितनी ही और कैसी ही व्यस्तताओं में क्यों न उलझा ले पर ऐसे मौके आते हैं जब बीते हुये की स्मृतियाँ पास आकर बैठ जाती हैं।

और जब एक रोज़ सूचना मिले कि आखिरकार कविराज की कवितायें छप ही गयीं और पुस्तक डाक से पहुँचने वाली है तो प्रसन्नता तो होती है भाई!

प्रसन्नता होनी लाजिमी है।

…[राकेश]

नवम्बर 28, 2010

विश्वनाथ प्रताप सिंह : कवि और चित्रकार

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को बहुत सारे लोग भारत के सबसे विवादास्पद प्रधानमंत्री भी कहेंगे।

27 नवम्बर श्री वी.पी सिंह की पुण्य तिथि है अगर वे जीवित होते तो इस साल 25 जून को उनका 79वाँ जन्म दिवस मनाया जाता।

लोकनायक जय प्रकाश नारायण के बाद वही ऐसे राजनेता हुये जिन्होने विपक्ष में रह कर भारत की राजनीति में भूचाल ला खड़ा किया।

अस्सी के दशक के अंत में मंडल कमीशन की सिफारिशों के विरुद्ध खम ठोक कर विरोध करने वाले लोग भी श्री वी.पी.सिंह को सिर्फ इसी एक मुद्दे के बलबूते नकार नहीं पायेंगे। अच्छा या बुरा जैसा भी रहा हो उनके द्वारा उठाये गये कदम का परिणाम पर उनके कदम ने भारत की राजनीति की दिशा ही बदल दी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

इतिहास ऐसे मुँह नहीं मोड़ सकता भारत के पिछले साठ साल के एक ऐसे राजनेता से जिन्होने ईमानदारी के नाम पर सत्ता हासिल करके दिखा दी। जून जुलाई की भयानक गर्मी में मोटर साइकिल पर सवार होकर उन्होने इलाहाबाद में चुनाव प्रचार किया था और अमिताभ बच्चन द्वारा इस्तीफा दिये जाने से खाली हुयी सीट पर हुये उपचुनाव में श्री लाल बहादुर शास्त्री के सुपुत्र श्री सुनील शास्त्री को हराया था। एसी में बैठ रणनीति बनाने वाले नेताओं के बलबूते की चीज नहीं है ऐसा परिश्रम।

नब्बे के दशक में खुद उनके पास चलकर गया प्रधानमंत्री पद सम्भालने का प्रस्ताव, जिसे उन्होने स्वास्थ्य कारणों से ठुकरा दिया। विरोधाभास निस्संदेह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। युवावस्था में ही अपनी रियासत की बहुत सारी जमीन उन्होने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से प्रेरित होकर दान कर दी थी। देहरादून में अपनी करोड़ों अरबों की जमीन उन्होने ऐसे ही छोड़ दी उन लोगों के पास जो नाममात्र का किराया देकर वहाँ दुकानें आदि चलाते थे। श्री वी.पी सिंह उन बिरले राजनेताओं में से रहे हैं जिन पर धन के भ्रष्टाचार का आरोप कोई नहीं लगा सकता।

उन्हे सिर्फ एक राजनेता ही नहीं कहा जा सकता। श्री वी.पी सिंह में कई व्यक्तित्व दिखायी देते हैं और उन्हे सिर्फ किसी एक मुद्दे पर खारिज नहीं किया जा सकता। वे एक बेहतरीन कवि, लेखक, चित्रकार और फोटोग्राफर भी थे।

राजा नहीं फकीर है
देश की तकदीर है

का बेहद सटीक नारा गढ़ने वाला व्यक्ति बेहद सक्रिय और तीक्ष्ण बुद्धि का मालिक रहा होगा जिसकी लेखन क्षमता के बारे में संदेह नहीं किया जा सकता।

मंडल कमीशन लागू करने के सामाजिक और राजनीतिक निर्णय ने उनके व्यक्तित्व को बहुत हद तक भ्रम भरे बादलों के पीछे ढ़क दिया है। उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन राजनीतिक इतिहास लिखने वाले लोग करेंगे पर राजनीति से परे उनके अंदर के कलाकार पर तो लेखक और कलाकार समुदाय निगाह डाल ही सकता है।

उनकी कविता में गहरे भाव रहे हैं। उन्होने तात्कालिक परिस्थितियों से उपजी कवितायें भी लिखीं जो काल से परे जाकर भी प्रभाव छोड़ने की माद्दा रखती हैं।

कांग्रेस से इस्तीफा देते समय उन्होने यह कविता भी रची थी।

तुम मुझे क्या खरीदोगे
मैं बिल्कुल मुफ्त हूँ

उनकी कविता आधुनिक है, उसमें हास-परिहास, चुटीलापन भी है और व्यंग्य भी। उनकी कविता बहुअर्थी भी है। बानगी देखिये।

काश उसका दिल एक थर्मस होता
एक बार चाह भरी
गरम की गरम बनी रहती
पर कमबख्त यह केतली निकली।

वे नेताओं के राजनीतिक जीवन की सांझ के दिनों पर भी कविता लिखे बिना नहीं माने।

उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वहीं चिपका है
फटे इश्तेहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले
निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता।

कविता भारत के लगभग हर नेता के जीवन का सच उजागर कर देती है।

आदर्शवाद उनकी कविताओं में भी छलकता है और शायद इसी आदर्शवाद ने उन्हे राजनीति में कुछ खास निर्णय लेने के लिये प्रेरित किया होगा।

निम्नलिखित कविता में नेतृत्व को लेकर कितनी बड़ी बात वे कह गये हैं।

मैं और वक्त
काफिले के आगे-आगे चले
चौराहे पर …
मैं एक ओर मुड़ा
बाकी वक्त के साथ चले गये।

मनुष्य की अंहकार भरी प्रकृति और खासतौर पर समाज में शक्तिशाली व्यक्ति के हथकंडों पर उन्होने एक बेहतरीन कविता लिखी थी।

भगवान हर जगह है
इसलिये जब भी जी चाहता है
मैं उन्हे मुट्ठी में कर लेता हूँ
तुम भी कर सकते हो
हमारे तुम्हारे भगवान में
कौन महान है
निर्भर करता है
किसकी मुट्ठी बलवान है।

मानव मस्तिष्क के अंधेरे बंद कोनों को भी खूब खंगाला उन्होने और कविताओं और पेंटिंग्स के माध्यम से उन्हे अभिव्यक्ति दी।

निराशा का भाव भी उनकी कविताओं में झलकता है और वैराग्य का भाव भी किसी किसी कविता के माध्यम से बाहर आ जाता है।

उनकी एक कविता है मुफ़लिस, जो राजनेता के रुप में उनकी मनोदशा को बहुत अच्छे ढ़ंग से दर्शाती है।

मुफ़लिस से
अब चोर बन रहा हूँ मैं
पर
इस भरे बाज़ार से
चुराऊँ क्या
यहाँ वही चीजें सजी हैं
जिन्हे लुटाकर
मैं मुफ़लिस बन चुका हूँ।

सितम्बर 25, 2010

शबाना और जावेद ने खाकर स्लम उड़ाया है गरीबों का मज़ाक

पात्र    : शबाना आजमी, जावेद अख्तर, और हिन्दी फिल्म जगत की नामचीन हस्तियाँ
अवसर : शबाना आजमी का साठवां जन्मदिन

शबाना आजमी – भारत के सबसे बेहतरीन अदाकारों में से एक।

शबाना आजमी – साम्यवादी और शायर मरहूम कैफ़ी आजमी की सुपुत्री।

शबाना आजमी – अस्सी के दशक में झोंपड़ पट्टी में रहने वालों के अधिकारों के लिये भूख-हड़ताल पर बैठने वाली सिनेतारिका कम एक्टीविस्ट

शबाना आजमी – हिन्दी फिल्मों के मशहूर पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर की पत्नी, जो बकौल जावेद साहब, उनकी महबूबा भी हैं।

शबाना आजमी – जो किसी भी नारी पात्र को तभी निभाने के लिये तैयार होती हैं जब वह पात्र प्रोग्रेसिव हो।

शबाना आजमी – जो भारत के किसी भी मुद्दे पर हद से ज्यादा संवेदनशील बन कर जब तक उनके गले की नसें थक न जायें तब तक बोलती रहती हैं।

और जावेद अख्तर साहब के तो कहने ही क्या हैं। कितनी ही ब्लॉकबस्टर फिल्मों को उन्होने अपने दहकते शोलों जैसे कथानक और आग उगलते संवादों की सहायता से ज्वलनशील प्रकृति प्रदान की है और जिन्हे देखकर दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाया करते हैं। वास्तविक जीवन में उन्होने अपनी छवि एक धर्म-निरपेक्ष और धार्मिक असहिष्णुता के प्रति कठोर और संवेदनशील लेखक और शायर की बनायी है।

उन्हे करीब से जानने वाले हिन्दी फिल्म उद्योग के लोग उनके सेंस ऑफ ह्यूमर की तारीफ करते नहीं थकते हैं।

भारत में मज़ाक में कहा जाता है कि फलां फलां व्यक्ति सठिया गया है। शबाना आजमी साठ की क्या हुयीं उनसे कई बरस पहले ही साठ के आँकड़े को पार कर चुके उनके पति, सांसद जावेद अख्तर ने सूबूत दे दिया कि किसी भी उम्र के लोग मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकते हैं।

जावेद जी ने शबाना जी के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर एक विशिष्ट किस्म का केक बनवाने का आर्डर दिया। केक में ऐसा क्या खास था?


केक को एक स्लम के एरियल व्यू की साज सज्जा से सुशोभित किया गया था। किसी भी गरीब स्लम की विवशता भरी विशेषतायें उस केक की शोभा बढ़ाने के लिये उपयोग में लायी गयी थीं।
स्लम के लोग विवश हैं गन्दगी में जीवन व्यतीत करने के लिये परन्तु शबाना-जावेद की जोड़ी ने दर्शा दिया कि वे गरीबों और उनकी गरीबी के प्रति वास्तव में कितने संवेदनशील हैं।

दोनों लोग कलाकार हैं और यही दुख की बात है कि संवेदना के स्तर पर जीने वाले कलाकार ऐसी असंवेदनशील मूर्खतापूर्ण गलती कर सकते हैं।

भारत की माननीय राष्ट्रपति महोदया ने श्री जावेद अख्तर को देश की संसद के उच्च सदन राज्य सभा में एक सांसद के रुप में मनोनीत किया हुआ है। जावेद साहब की मति को क्या हो गया था?
ऐसी तो आशा ही करनी बहुत बड़ी बेवकूफी होगी कि आज के दौर की भारतीय संसद के सांसद इतने संवेदनशील हो सकते हैं कि वे संसद से इस्तीफा दे दें ऐसी असंवेदना प्रकट करने के लिये।

इससे पहले कि किसी का दिमाग शबाना और जावेद की हरकत में सियासी दलों में बँटी राजनीति ढ़ँढ़े, यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि शबाना आजमी के जन्म दिन की पार्टी में लगभग हरेक राजनीतिक दल से जुड़े लोग मौजूद थे।

भारत के हर मुद्दे पर गला खँखार कर लोगों को खामोश करते, भाषण देते, हमेशा बड़े बड़े बोल बोलने वाले शत्रुघ्न सिन्हा शायद अभी तक गरारे ही कर रहे हैं ताकि अगर इस मुद्दे पर राजनीति जोर पकड़ ही जाये तो किसी तरह अपनी जान बचाने को कुछ बोल सकें।

भारत के सबसे अच्छे अभिनेताओं में सिरमौर कुछ अभिनेताओं में शामिल माननीय नसीरुद्दीन शाह, जिनके पास हिन्दी सिनेमा के लगभग हर अभिनेता के खिलाफ व्यंग्य के तीर हमेशा मौजूद रहते हैं, अभी कुछ कह नहीं पाये हैं। शायद वे कुछ कह भी नहीं पायेंगे।

पार्टी में शामिल किसी भी फिल्मी व्यक्ति से किसी भी विवाद उत्पन्न करने वाले मुद्दे पर कुछ कहने की उम्मीद करना भी ऐसा होगा जैसे कि ये उम्मीद करना कि कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी में भ्रष्टाचार के मामले में एक भी पैसे का हेरफेर नहीं हुआ है।

जनता की बेवकूफी इस बात से जाहिर होगी कि लोग अभी भी इन सितारों को पूजे चले जायेंगे।

भारत कब एक सभ्य देश बनेगा और कब सभ्य बनेंगे इसके नागरिक ताकि वे दूसरों की भावनाओं पर घात न करें।

ऐसे हालात पर सिर्फ दुखी हुआ जा सकता है।

गलती सभी से होती है पर जावेद अख्तर इसे गलती न मानकर इसे उनके द्वारा शबाना आजमी के लिये किया गया एक मज़ाक ही मान रहे हैं। उनके मुताबिक शबाना अपने हर मामले को इतनी गम्भीरता से लेती हैं कि उन्हे मज़ाक का अर्थ समझाने के लिये ऐसा केक बनाने का विचार उनके दिमाग में आया था।

इस काम के लिये तो जावेद अख्तर अपने गरीबी और दिक्कतों से भरे बचपन की यादों से भरा हुआ केक बनवा सकते थे। ऐसा केक उनकी संवेदशीलता की जाँच भी कर लेता।

अंकुर, पार और धारावी जैसी फिल्मों में गरीब स्त्री की भूमिकायें सशक्त रुप से निभाने वाली शबाना आजमी ने सिद्ध कर दिया है कि वे एक प्रशिक्षित अभिनेत्री मात्र हैं और उनके द्वारा गरीबों के अधिकारों के लिये दिये गये धरने जैसे प्रयास भी मंचीय अभिनय के ही विस्तृत रुप थे।

जावेद साहब ने भी अपना सेंस ऑफ ह्यूमर दिखा दिया है कि यह औरों का मज़ाक बनाने पर ही निर्भर करता है।

अपने जन्मदिवस पर अतिथियों के सामने “मुन्नी बदनाम हुयी” गीत पर नृत्य करने वाली शबाना आजमी को गुमान भी न रहा होगा कि एक गलती उन्हे गाने पर विवश कर देगी।

मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिये
शबाना बदनाम हुयी जावेद तेरे लिये

पार्टी में गये अतिथियों की तस्वीरें देखने के लिये यहाँ और यहाँ क्लिक करें।

जून 23, 2010

सीटी बुला रही है

भारत जैसे देश में इतनी सारी भाषायें और बोलियाँ बोली जाती हैं और किसी भी भारतवासी को देश में सदियों से चली आ रही इन विभिन्नताओं पर गर्व होना चाहिये और बहुत सारे भारतीयों को गर्व होता भी होगा और है भी परन्तु यह भी देखा गया है कि कई मर्तबा बड़े बड़े झगड़े भाषा और बोलियों की भिन्नता के कारण भी जन्माये गये हैं। जन्माये गये कहना ही उचित है क्योंकि ऐसा लगता नहीं कि भाषा, जो कि एक मनुष्य के दूसरे मनुष्य तक अपनी संवेदनायें और भावनाओं आदि को पँहुचाने का माध्यम है, दो व्यक्तियों को आपस में लड़वा सकती है जब तक की एक दूसरे के ऊपर वर्चस्व स्थापित करने की राजनीतिक भावना का प्रदुषण उनके दिमाग में घर न कर ले।

भाषायें शब्दों पर निर्भर हैं और समय के साथ बोलने और लिखने वाली भाषाऐं खो सकती हैं। आज पाली और प्राकृत, जो कि कभी भारत में बहुत बड़े पैमाने पर प्रचलन में थीं, आदि को तो छोड़ ही दीजिये संस्कृत तक भी ऐसी भाषा बन गयी है जिसे जानने और समझने वाले लोग संख्या में बहुत कम हैं।

मनुष्य पर कैसा भी शब्दाभाव का संकट आ जाये पर इशारों की भाषा कभी लुप्त नहीं होगी और ऐसा ही अभिव्यक्ति के उन माध्यमों के बारे में कहा जा सकता है जो शब्दों पर निर्भर नहीं हैं। आवाज के द्वारा भावों का संप्रेषण किन्ही भी परिस्थितियों में किया जा सकता है और जरुरी नहीं कि किसी भाषा के शब्द बोलकर ही ऐसा किया जाये। वाद्य यंत्रों द्वारा बजाया संगीत भाषा पर निर्भर नहीं है और वह अपने विशुद्ध रुप में भी सुनने वाले को प्रभावित कर सकता है।

सीटी भी एक ऐसा ही वाद्य यंत्र है जो हरेक मनुष्य के पास प्राकृतिक रुप से होता है और वह इसे विकसित कर सकता है। अकेला आदमी अपनी ही धुन में चलते हुये कब सीटी बजाने लगता है उसे पता भी नहीं चलता। सीटी बजाने के दुरुपयोग भी होते हैं पर मनुष्य तो पारंगत है हरेक सुविधा का दुरुपयोग करने में। चाकू से लोग मारे भी जाते हैं पर दुनिया में चाकू बनाये जाने तो बंद नहीं किये जाते और न ही उनका उपयोग करना बंद किया जाता है।

नीचे दिये वीडियो में देखिये कैसे लोग सीटी बजाने को भाषा के विकल्प के रुप में उपयोग में ला रहे हैं।


मनमोहन देसाई की देशप्रेमी में भाषा के सवाल पर एक दूसरे का सिर फोड़ने को तैयार क्रोध में अंधे लोगों को रोकने के लिये अमिताभ यह भी गा सकते थे,

नफरत की लाठी फेंको, सीटी बजाओ मेरे देश प्रेमियो

जून 22, 2010

रावण और अमिताभ बच्चन : नैतिक और जिम्मेदार पत्रकारिता का क्या होगा

इस बात से इंकार करना मुश्किल हो जायेगा कि पिछले दस पंद्रह सालों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पूरी तरह से भारत में बस जाने के बाद से TRP के भूत और रिपोर्टंग में कुछ भी कह देने की प्रवृति ने प्रिंट मीडिया को भी अपने वश में कर लिया है और अब बहुत सारे पत्रकार रिपोर्ट करने से पहले मामले की थोड़ी सी भी छानबीन करना जरुरी नहीं समझते।

सबसे पहले – सबसे आगे – सबसे तेज, जैसे शब्द पत्रकारिता के बेहद जिम्मेदारी भरे कर्तव्य पर जल्दबाजी के कारण गैर-जिम्मेदारी का मुलम्मा चढ़ाने में कामयाब हो गये हैं। अब किसी भी बात का बतंगड़ बना दिया जाता है। झूठ को इतनी शक्ति से और जोर शोर से प्रसारित और प्रचारित किया जाता है कि एकबारगी जो बताया जा रहा है वह सच लगने लगता है और अगर पाठक या दर्शक अपनी आँखों से न देख लें तो वे रिपोर्ट की गयी बातों को ही सच मान लेते हैं।

हालात उस निम्न स्तर तक पहुँच गये हैं जहाँ अगर मीडिया गलत रिपोर्टिंग करता हुआ पकड़ा भी जाये तो वह कोई क्षमा याचना नहीं करता बल्कि उसके द्वारा सीनाजोरी वाली प्रवृति ही ज्यादा दिखायी जाती है।

लोकतंत्र का यह स्तम्भ कभी बेहद मजबूत, स्वस्थ, निष्पक्ष, और कर्तव्यपरायणता हुआ करता था और जवाबदेही की भावना से ओतप्रोत रहा करता था पर बदले समय ने इसे भी बहुत हद तक बाजारु बना दिया है और इसके सरोकारों को पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होने के कारण संदेहास्पद बना दिया है।

चिंताजनक बात यह है कि यह न तो लोकतंत्र के लिये अच्छा है और न ही मीडिया के लिये। भेड़िया आया की तर्ज पर यदि मीडिया की झूठे और गैर जिम्मेदार होने की छवि बनती चली जायेगी तो दिन दूर नहीं जब इसकी विश्वसनियता बिल्कुल ही खत्म हो जायेगी।

यूँ तो अमिताभ बच्चन से जुड़ी नवीनतम घटना छोटी सी है पर यह मीडिया की गैर जिम्मेदाराना हरकत को स्पष्टत: दर्शाती है इसलिये इस घटना को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर फिल्मफेयर के सम्पादक जितेश पिल्लई को रावण फिल्म के ऊपर निम्नलिखित ट्विट्स लिखे।

@jiteshpillaai  Yes it was all there, but sadly edited. Abhishek’s erratic behavior was due to symbolic 10 heads visually appearing..contd

@jiteshpillaai  contd ..and each giving him different attitudes to adopt for a situation, he would then finally shake them off and decide ..

@jiteshpillaai  ..in the edit all the visual heads got cut and you see a confused Beera expression and wonder why .. it was after he removed

@jiteshpillaai  .the other head visuals from his thinking.. in the edit you see the after effect of that thinking process, hence inconsistent

और मीडिया और समाचार पत्रों ने अमिताभ द्वारा लिखी बातों को इस बात के रुप में प्रचारित किया कि “अमिताभ रावण फिल्म की एडिटिंग से नाराज हैं“।

अमिताभ फिल्म के केवल  उन दृष्यों की बात कर रहे हैं जिन दृष्यों में बीरा द्वारा अपने सिर को इधर उधर हिलाने और उस वक्त कुछ जिबरिश सा कहने को दिखाया गया है, पर पत्रकारों ने बिना पूरी बात समझे प्रचारित करना शुरु कर दिया कि अमिताभ रावण के संपादन से नाराज हैं।

अमिताभ बिल्कुल रावण के संपादन या निर्देशन या पूरी फिल्म से ही नाराज हो सकते हैं परन्तु उनके जिन ट्विट्स को उदाहरण के तौर पर मीडिया ने उठाया है वहाँ वे कतई वे बातें नहीं कह रहे हैं जो मीडिया प्रचारित कर रहा है।

कुछ रिपोर्ट्स तो कल्पना में इतना आगे बढ़ गयी हैं कि वहाँ ऐसा अमिताभ बच्चन के ब्लॉग के हवाले से लिखा है जबकि अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर रावण की तारीफ में ही एक संक्षिप्त सा ब्लॉग लिखा था। जाहिर है लिखने वाले पत्रकारों ने न उनका ब्लॉग पढ़ा और न ही ढ़ंग से उनके ट्विट्स ही बाँचे।

जाहिर है कि ऐसे सनसनीखेज शीर्षक और खबरें देने से रिपोर्ट को ज्यादा फोकस मिल सकता है पर इस प्रक्रिया में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और नैतिकता का क्या हश्र हो रहा है?

बात छोटी सी है पर यही सब बहुत महत्व के मामलों में भी हो रहा है।

क्या चल रहा है यह?

सबसे चिंताजनक बात है कि ऐसी निम्न कोटि के हथकंडों भरी पत्रकारिता के प्रचलन में आने से नैतिकता भरी पत्रकारिता करने वाले बेहद प्रतिभावान पत्रकार और मीडियाकर्मी पीछे रह जाते हैं। उन्हे पुरातनपंथी कहकर पीछे ढ़केल दिया जाता है और उन्हे कुंठा में जीने को विवश किया जाता है।

ऐसी प्रवृति पत्रकारिता जैसे समाज के लिये बेहद महत्वपूर्ण और सम्मानजनक क्षेत्र के लिये शुभ नहीं है।

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