Archive for जनवरी, 2011

जनवरी 29, 2011

अँधेरे का इतिहास नहीं होता…(रफत आलम)

सच के तराज़ू का कोई बाट कयास नहीं होता
वज़न का पैमाना मगर झूठ के पास नहीं होता

कब से चाँद तारों के बीच ढूँढ रहा हूँ अपना नाम
मुझको कौन समझाए अँधेरे का इतिहास नहीं होता

शीशे से पत्थर बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा
बहुरूपियों के बीच भी अब दिल उदास नहीं होता

कहकहों के बीच भी सुना जायेगा रुदन भरा गीत
नाउम्मीद तो हूँ बहुत मगर बे-आस नहीं होता

एक वक्त था बेचेन हो जाता था उसको देखे बिना
वक्त ये भी के वो पास है और अहसास नहीं होता

चुप करने के लिए छुरियां दिखा रहे हैं यार लोग
जबान रोज कटती है मेरी और अहसास नहीं होता

रोज मर्सिहा सुना कर जा रहे हैं सब अपने प्यारे
जिंदा भी हूँ के नहीं कई बार विश्वास नहीं होता

गए दिनों की सदाओं को अब भी है मेरी तलाश
लोगों तुम्हारी इन अफवाहों पर विश्वास नहीं होता

तन्हाई में बच के रहना गए दिनों की यादों से
ये आसेब आते ही हैं जब कोई आसपास नहीं होता

साँस बन के समा चुका है दिल की धडकनों में
वह इतना नज़दीक है के और पास नहीं होता

(रफत आलम)

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जनवरी 27, 2011

भगवती चरण वर्मा : एक प्रेम कविता

पदमभूषण, राज्यसभा के सदस्य श्री भगवती चरण वर्मा ने चित्रलेखा, रेखा, भूले-बिसरे चित्र (साहित्य अकादमी से पुरस्कृत), सामर्थ्य और सीमा, सबहि नचावत राम गोसाईं, सीधी सच्ची बातें, टेढ़े मेढ़े रास्ते, पतन, और तीन वर्ष आदि प्रसिद्ध पुस्तकें लिख कर अपनी गद्य-रचना से हिन्दी जगत को अपने लेखन का प्रशंसक बनाया था। उच्च स्तरीय गद्य के साथ साथ उन्होने उच्च कोटि के काव्य की रचना भी की।

स्त्री-पुरुष के मध्य पनपे प्रेम पर उच्च स्तरीय लेखन करने के भाव से दुनिया का हर लेखक एवम कवि गुजरता ही गुजरता है और यह इच्छा उसके जीवन में कई बार सिर उठाती है और कुछ रचियता उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर प्रेम के अलग- अलग रुपों को अपनी रचनाओं के माध्यम से खोजने का प्रयास करते हैं। साहित्य हो या फिल्में, प्रेम में वियोग की स्थिति में स्त्री की कोमल भावनाओं को प्रदर्शित करने वाली सामग्री बहुतायत में मिल जाती है पर पुरुष की कोमल भावनाओं की अभिव्यक्त्ति कम ही मिलती है।

पुरुष भी वियोग में आँसू बहा सकता है। भगवती बाबू प्रस्तुत कविता में प्रेमिका के वियोग से पीड़ित प्रेमी के भावों को अभिव्यक्त्ति देते हैं। प्रेम किसी भी व्यक्त्ति (स्त्री या पुरुष) की ऊर्जा के स्तर को बदल डालता है, चाहे प्रेमीगण प्रेम में संयोग की खुशी से लबरेज़ हों या बिछोह की पीड़ा से गुजर रहे हों, उनकी ऊर्जायें अलग हो जाती हैं, दोनों ही परिस्थितियों में रात की नींद की गुणवत्ता, प्रकृति और अवधि बदल जाती है। दिमाग और मन की चेतना का स्तर अलग हो जाता है। देखने की, महसूस करने की और सहने की क्षमता अलग हो जाती है। संवेदनशीलता अलग हो जाती है।

वियोग में प्रेमीगण अपने प्रेम की भावनाओं को अपने प्रेमी तक किसी भी तरह पहुँचाना चाहते हैं। कभी उन्हे हवा से आस बंधती है कि जो हवा यहाँ उनकी खिड़की के बाहर बह रही है वह सीधे चलकर उनके प्रेमी के पास जायेगी और उनके प्रेम का संदेश पहुँचा देगी, कभी उन्हे आसमान में चमकते चाँद को देखकर ढ़ाढ़स बँधता है कि यही कुछ करेगा।

भावना के जगने की देर है कि नींद उड़ जाती है।

भगवती बाबू ने वियोग में जल रहे प्रेमी पुरुष के मनोभावों को बड़ी ही खूबसूरती से नीचे दी गयी कविता में उकेरा है!

क्या जाग रही होगी तुम भी?
निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये!
अपना यह व्यापक अंधकार,
मेरे सूने-से मानस में, बरबस भर देतीं बार-बार;
मेरी पीड़ाएँ एक-एक, हैं बदल रहीं करवटें विकल;
किस आशंका की विसुध आह!
इन सपनों को कर गई पार
मैं बेचैनी में तड़प रहा;
क्या जाग रही होगी तुम भी?

अपने सुख-दुख से पीड़ित जग, निश्चिंत पड़ा है शयित-शांत,
मैं अपने सुख-दुख को तुममें, हूँ ढूँढ रहा विक्षिप्त-भ्रांत;
यदि एक साँस बन उड़ सकता, यदि हो सकता वैसा अदृश्य
यदि सुमुखि तुम्हारे सिरहाने, मैं आ सकता आकुल अशांत

पर नहीं, बँधा सीमाओं से, मैं सिसक रहा हूँ मौन विवश;
मैं पूछ रहा हूँ बस इतना- भर कर नयनों में सजल याद,
क्या जाग रही होगी तुम भी?

जनवरी 24, 2011

प. भीमसेन जोशी : श्रद्धांजलि

पृथ्वीवासी अब हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक संगीत सम्राट प. भीमसेन जोशी की सजीव संगीत प्रस्तुतियों का आनंद न ले पायेंगे। संगीत के धुनी भक्त्त पंडित जी ने अपने जीवनकाल में इतना और इतना गहरा संगीत रचा है कि भारत देश धन्य रहा है उनके अस्तित्व की मौजूदगी से। भाग्यशाली है यह देश जहाँ ऐसे संगीत उपासक जन्म लेते हैं। भारत ने उनके प्रति कृतज्ञता दिखाते हुये उन्हे भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित करके उनकी संगीत साधना के प्रति आभार प्रकट किया।

दशकों तक पंडित जी की सधी हुयी गायिकी ने श्रोताओं के अंतर्मन को गहरे स्तर पर छुआ है। उनकी आवाज के आरोह-अवरोह की स्वर-लहरियों के साथ तैरते-डूबते-उड़ते श्रोता बाकी सब बातें भूलते रहे हैं। उन्हे सुनते हुये पहले श्रोता संगीत में खोता है, फिर उसके होने का अहसास खत्म हो जाता है और सिर्फ संगीत रह जाता है और कब सब कुछ खत्म होकर सिर्फ आनंद रह जाता है इस प्रगति का पता तब ही चलता है जब पंडित जी का गायन समाप्त होकर श्रोताओं को वापस होश में ले आता है।

आभार तकनीक का भी है जिसके कारण भौतिक रुप से हमारे बीच न होते हुये भी प. भीमसेन जोशी जी की गायिकी हमारे बीच उपस्थित रहेगी और संगीत रसिकों की संगीत संवेदनाओं को दिलासा देती रहेगी। जो उन्होने गा दिया है वह सैंकड़ो सालों तक पृथ्वी के भाल पर सुनायी देता रहेगा और पृथ्वी को संगीतमयी बनाये रखेगा।

अस्सी के दशक के मध्यांतर के बाद के काल में जब दूरदर्शन ने भारत की ’ अनेकता में एकता ’ की विरासत को सम्मान देने के लिये संगीत वीडियो बनाया तो उसकी शुरुआत प. भीमसेन जोशी जी के गायन से ही हुयी। जब वे ‘ मिले मेरा सुर मेरा तुम्हारा ’ गाते परदे पर आते हैं तो किसी भी सुनने वाले को इस देश की एकता और अखंडता के सूत्र मिल जाते हैं।

साभार धन्यवाद पंडित जी की इस देश में उपस्थिति को कि उन्होने इतने दशकों तक भारतवर्ष को संगीत की उच्च विरासत को न केवल संजोकर रखा बल्कि करोड़ों लोगों को संगीत के संस्कार भी दिये।

परलोक भी धन्य हो गया होगा उन्हे पाकर। अब वे वहाँ अपनी अदभुत गायिकी से संगीत लहरियाँ बिखेरेंगे।

श्रद्धा नमन पं भीमसेन जोशी जी को!

जनवरी 23, 2011

औरत…(कृष्ण बिहारी)

औरत को मारो पीटो
दहलाओ उसके सुख-दुख
हारी-बीमारी
और हाँ-ना से
कोई सरोकार न रखो
मौका मिलते ही उसे
जांघ के नीचे दबाओ
या फिर उसके
नितम्बों पर चढ़ जाओ
और जंगलीपन दिखाओ।

उसे पत्नी होने का दर्जा
हकीकत में मत दो
उसके आगे वायदों की
बिसात बिछाओ
वरना वह चढ़ जायेगी तुम पर
कर देगी तुम्हारा कद कमतर।

औरत को सताने की शुरुआत
तुम थोड़े ही कर रहे हो
जो तुम्हारे बाप ने किया
तुम्हारी माँ के साथ
वही तुम करो
अपने बेटे की माँ के साथ।

बेटी होने पर
मुँह फुलाओ
बेटा होने पर फुसलाओ
किसी भी बहाने से
उसे फिर से
गर्भिणी बनाओ।

तुम्हारा बाप
तुम और तुम्हारा बेटा
तीनों ही वास्तव में मर्द हो
जिनको पैदा करने की
बहुत बड़ी भूल की है औरत ने
चुकाने दो उसे कीमत
और वसूलो सूद
महाजन बनकर।

दिन में उसे हड़काओ-धमकाओ
रात को उसके लंहगे में गिड़गिड़ाओ
अपनी मर्दागिनी बहाओ।

औरत को निकलने मत दो बाहर
हाथ से निकल जायेगी
करने मत दो किसी से प्रेम
बदल जायेगी
उसे अपनी जरुरत पर
बाहर लाओ
व्यक्तिगत लाभ के लिये
नंगा घुमाओ
उसकी कमाई खाओ।

शरमाने की क्या बात है
शरम कोई हवा का झौंका नहीं है
वह कहीं नहीं जायेगी
मर भी गई तो
तुम्हारे पास दूसरी आयेगी
अकालों के बावजूद
औरतों का टोटा नहीं है।

औरत को इशारों पर
नचाओ
घर में रंग रुप और
सलीके के न होने का आरोप लगाओ
दहेज कम लाने का ढ़ोल बजाओ
सड़क पर, संसद में
उसे मोहरा बनाओ
मंच पर फेंको कुछ सिक्के
खनखनाओ
उसकी देह से बरसेगा सोना
दोनों हाथों से लूटो और कमाओ।

सिनेमा का परदा हो या
विश्व-बंदरियों का जमावड़ा
जिसे पता न हो अपने सौन्दर्य का
उसे खूबसूरत बताओ
उसके अहम को तुष्ट करो
उसे चूतिया बनाओ
और अपना मन बहलाओ।

शास्त्रों और पुराणों में
सत्य वचन
वह तुम्हारे मन बहलाव के लिये बनी है
इसलिये
औरत होने के जुर्म से सनी है।

{कृष्ण बिहारी}

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जनवरी 22, 2011

गूँगों की बस्ती में नक्कारखाने में बजती तूती…(रफत आलम)

सफर काँटों का है चल सको तो साथ आओ
जिंदगी के रास्ते में सिर्फ बेल-बूंटे ही नहीं हैं
जल्दी क्या है हमदर्दो नमक भी ले आना
पक गए हैं दिल के छाले अभी फूटे नहीं हैं
* * *

फूलों की तरफ क्या सोच कर बढ़ाया था हाथ
काँटों का ऊँगलियों में चुभ जाना बेसबब नहीं
नासमझ हाथों से छूटी थी बहते हुए पानी में
कागज की किश्ती का डूब जाना अजब नहीं
* * *

मैंने अपने दिल पर हाथ रख की थी बात
तुम भी दिल पर हाथ रख कर जवाब लो
मुझको मिल गया जवाब जैसा भी मिला है
तुम भी अपने दिल की बात ध्यान से सुनो
* * *

गूंगों की बस्ती में होंठ हिलाना भी है गुनाह
जो हो रहा है होने दो कुछ न कहो चुप रहो
तूतियों की कब सुनी गयी है नक्कारखानों में
शोर में शामिल होने से बेहतर है कुछ न कहो
* * *

जान लता में है तो लचकती है ए दोस्त
सूखी  हुई शाख ही अकड़ती है ए दोस्त
पर अकडन नहीं है जो के स्वाभिमान है
जिंदगी यूँही कब खुद से लड़ती है ए दोस्त
* * *

सिखाया जाता है हमें झुकना ए दोस्त
फिर क्यों आ जाता है बकना ए दोस्त
क्यों चल देते हैं लोग सूलियों के साथ
कठिन कब था घर में छुपना ए दोस्त
* * *

सर जो झुका था आज भी झुका है
क्या पता अपनी सोच पर शर्मिंदा है
लोग कर रहे  हैं अंजाम की बाते
आगाज़ का भी जिन्हें नहीं पता है
* * *

कहकहों की महफ़िल में आंसुओं की बात गुनाह
दबाई गयी कुचल गयी आरज़ूओं की बात गुनाह
ये कहना अज़ाब के ज़ख्मों को भी देखलो यारो
नवेली पोशाकों के बीच रफुओं की बात गुनाह

(रफत आलम)

जनवरी 20, 2011

आसमान आदमी का कहाँ था…(रफत आलम)

कुछ सवालों का जवाब
जब कही नहीं मिलता
अक्ल, सोच और मोटी मोटी किताबें
कयास में सच बांचने लगते हैं
धरती के तलिस्म का तोड़
आसमान पर खोजा जाने लगता है
चींटी के पगों की सदा सुनने वाला
आदमी की कब सुनता है?
न प्रार्थना न पुकार!

धर्म- युद्ध
क्रूसेड
जिहाद
गुलामी
आदमी द्वारा आदमी पर
पैशाचिक-ज़ुल्म की अनंत दस्ताने हैं!

विजयी फौजों के बूटों तले
ठोकरों में आते रहे है
मंदिर मस्जिद गिरजे
जाने किसका आसमान सच्चा है
वक्त के साथ बस
ज़ुल्म ओ सितम की ध्वजाओं का रंग बदलता है

आसमान आदमी का कहाँ था
जब
मिटटी के नाम साँसे लिखी गयी
एक कदम बहकने की सजा
नामालूम सफर ने भुगती है
नातमाम है रास्ता
पहला साथी शैतान साथ है

आसमान आदमी का कहाँ था
जब
आसान शिकार की तलाश में
कमज़ोर का कच्चा गोश्त खाकर
ताकतवर ने
वक्त का खुदा बनने का हुनर सीखा था

मानव सिरों पर तख़्त बिछा कर
शाह – तानाशाह  बैठ गए थे
अनगिनत बेबस इंसान
ठूंस दिए गए थे गैसचेंबरों में
बादलों के उपर से
हिरोशिमा पर कयामत उतरी थी
विकलांग नस्ले अब भी पूछ रही हैं
आसमान किसका है…

कल ही इंसानियत को रोते देखा है
पांच लाख मय्यतों पर
बमों की बारिश से
कत्लगाह बना है एक देश
पर कहीं से फरिश्तों की फोज नहीं आई
इन्साफ लेकर
कलियुग में ये भी इमकान नहीं
पैगंबर, कोई अवतार मरहम लेकर आएगा

आसमान आदमी का कहाँ था
जब
कोड़ों के फुंकार पर
उठ खड़े हुए पिरामिड, ताज…
कटे हुए हाथों
उतारी गयी मानव त्वचा के
करुण रुदन से

महलों पर कभी बिजली नहीं गिरी
बैलों की जगह जुतीं झोपडियों
प्यासे खेतों को लहू पसीना पिलाते
मेला ढोते, बेगार करते इंसानों को
दुआओं से भी महरूम रखा गया
कंकर पत्थर की बनी इबादतगाहों की तरफ
देखना भी गुनाह था

अंधेरे में धकेल दी गयी कौमें
हुक्मों –आदेशों –फतवों की गिरवी
इलम ओ हुनर से महरूम नस्लें
फुटपाथ के गहने
झुग्गियों की सड़न
भूखी कांपती जिंदा लाशें
जिंदगी की ये अभिशिप्त सदायें
वक्त के दरवाज़े पर हाथ फैलाए खड़ी हैं
इनका कोई आसमान नहीं है

(रफत आलम)

जनवरी 17, 2011

गुरु

किसी कारण दोनों लड़कों का मूड ऑफ था। दोनों ही अपने अपने विचारों में खोये हुये पैदल चलते रहे। बाहर से खामोश थे पर दोनों के ही अंदर तरह तरह के विचार उमड़ रहे थे।

जब उनकी तन्द्रा भंग हुयी तो वे कालेज से दूर चिड़ियाघर तक आ चुके थे। उन्होने सड़क किनारे खड़े फलों के ठेलेवाले से केले खरीदे और चिड़ियाघर की ओर सड़क किनारे बनी रेलिंग पर बैठकर केले खाते हुये इधर-उधर आते जाते लोगों को देखने लगे।

कुछ समय बाद उनका मूड कुछ ठीक हुआ तो एक लड़के ने कहा,” चलो यार हॉस्टल चला जाये”।

उन्होने सामने से गुजरते हुये एक अधेड़ उम्र के रिक्शे वाले को आवाज देकर रोका,” क्यों भैया, गुरुदेव पैलेस के पास चलोगे क्या”।

“चलेंगे, बाबू भैया, दस रुपये लगेंगे”।

“चलो”।

दोनों लड़के रिक्शा में बैठ गये। रिक्शा चली तो चलती हवा सुहानी प्रतीत हुयी।

अक्टूबर के माह में बादलों भरा दिन अच्छा लग रहा था। लड़कों का मूड दुरुस्त हो चला था।

रिक्शा चिड़ियाघर के सामने वाली सड़क से गुरुदेव पैलेस जाने वाली सड़क पर मुड़ने लगी तो पहले से उस मुख्य सड़क पर चल रही एक रिक्शा उनके सामने से गुजरी। रिक्शा चालक एक जवान युवक था और रिक्शे में दो लड़कियाँ बैठी हुयी थीं और आपस में हंसी ठिठोली करने में व्यस्त थीं।

पहले कभी भी लड़कियों को देखकर छींटाकशी न करने वाले लड़कों को न जाने आज क्या चंचलता सूझी कि एक लड़के ने सीटी बजा दी। सीटी तेज नहीं बजायी गयी थी पर इतनी हल्की भी नहीं थी कि आगे चल रही रिक्शे में बैठी लड़कियां न सुन पायें।

सीटी की आवाज सुनकर लड़कियों ने पीछे मुड़कर देखा और वापस हंसते हुये अपनी बातों में मशगूल हो गयीं।

लड़कों पर आज असामान्य व्यवहार हावी था।

एक लड़के ने रिक्शे वाले से कहा,” भैया, ज़रा तेज चलाओ, उस आगे वाले रिक्शे के बराबर में ले चलो”।

रिक्शे वाले ने कहा,” बाबू भैया, एक बात कहूँ”।

“हाँ, कहो”।

“आप लोग भले घरों के हो। अच्छे पढ़े लिखे हो। कल को बड़े आदमी बनोगे। ये सब छोटी हरकतें आपको शोभा नहीं देतीं।”

लड़कों को चुप पाकर रिक्शे वाले ने आगे कहा,” आप लोगों के पिता, चाचा वगैरहा मेरी ही उम्र के होंगे। उसी बुजुर्गियत के नाते कह रहा हूँ। और अपने जीवन के अनुभव से कहता हूँ बेटा कि समय बहुत बड़ा न्याय करने वाला होता है। यह सूद समेत वापस करता है। आज आप किसी की बेटी को छेड़ोगे, कल कोई आपकी बेटी को छेड़ेगा। समय ऐसा करेगा ही करेगा।”

रिक्शे वाले की नसीहत सुनकर लड़कों की सोच, जो इधर-उधर हिल गयी थी वापस अपनी नैसर्गिक स्थिति में आ गयी। वे भीतर ही भीतर शर्मिंदा महसूस करने लगे।

रिक्शे वाले ने कहा,” आप भले लगे इसलिये कह देने की इच्छा हो गयी।”

“आपने ठीक कहा, शुक्रिया”। लड़कों ने कहा।

उनका हॉस्टल भी आ गया था। वे रिक्शे से उतर गये। उन्होने रिक्शे वाले को पचास का नोट दिया। उसके पास खुले नहीं थे, लड़कों ने कहा कि फिर किसी और दिन हिसाब हो जायेगा।

हॉस्टल की ओर बढ़ते हुये एक लड़के ने अपने साथी से कहा,” यार, ज़िंदगी पता नहीं कैसे कैसे सिखा देती है और कहीं से भी गुरु ले आती है शिक्षा देने के लिये”।

…[राकेश]

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जनवरी 16, 2011

नियति…(कविता – कृष्ण बिहारी)

 

क्या तुमने देखी है
ऐसी कोई नाव
लहरों पर नदिया की
या फिर तरंगों पर सागर की
अनियंत्रित सी,
और जिस पर हों यात्री
अपने घर-परिवार से दूर
देखते
सामने
नियति का काल-चक्र क्रूर!

कुछ वैसी ही हो गई है
ज़िंदगी आजकल
आतंकित
आशंकित सी।

धूप जैसे
घर की मुंडेरों से
कमरों में बँटकर आये
वैसे ही घटनायें
जीवन से होकर
हिस्सों में जायें।

टुकड़ों में बँटकर और
निर्लिप्त होकर ऊपर से
दीखती है
संयमित सी।

बाहर का कोलाहल
भीतर का सूनापन
अपनों से दूरी
गैरों से अपनापन
लगता है जैसे कोई
आरी से काटे
भावना
व्यथित सी।

{कृष्ण बिहारी}

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जनवरी 16, 2011

दुआ करके क्या पाया… (रफत आलम)

मैं भी देख लूँ कैसे लगते हैं इसमें जिंदगी के रँग
कुछ दिन के लिये मुस्कान वाला मुखौटा दे दे यार
आँसुओं के धब्बों से बदरंग नहीं होने दूंगा उसे
फिर भी डर है तुझको तो मेरा चेहरा ले ले यार।
* * *

समंदर से जब कोई कतरा निकलता है
आवारा बादल बनके भटकता फिरता है
घर छोड़ने की सजा बड़ी मिलती है यार
शाम हुए ही वापसी का पता मिलता है।
* * *

ये गिला ये शिकायत चाहे हकीकत भी है यार
सबसे बढ़ कर ये जान पर मुसीबत भी है यार
सब तुमसे रूठे तुम अपने कहे पर खुद से रूठे
आगे से मुंह बंद रखना बडो की नसीहत है यार।
* * *

जुनून की हालत में कई दीवाने
खुद को जाने क्या समझ बैठे
थे तो मिटटी के चंद ज़र्रे मगर
तारों की बुलंदी से उलझ बैठे।
* * *

आँख बन गई रास्ता चले आओ
फिर बन के उजाला चले आओ
अभी बजता है साज़ साँसों का
तुम बन के नगमा चले आओ।
* * *

घर आँगन में चांदनी लहराई
या उतरा उजली धूप का साया
हमको बता ऐ पगले ’आलम
तूने दुआएं कर के क्या पाया।

(रफत आलम)

जनवरी 15, 2011

तेरे जाने के बाद…(कविता – रफत आलम)

 

कल पतंग का दिन है
गुलाबी पतँग का एक टुकड़ा
आई लव यू लिखा हुआ
कुछ संजोये-संभाले रखे गए खत
प्यार की निशानियाँ थी
साल हा साल जिनके साथ
हमने सपने साकार किये थे
फूल चुने थे खारों के दर्द सहे थे
जानदार थी जिंदगी
नन्हे से घरोंदे में
बहुत खुशगवार थी जिंदगी
मगर वक्त के अबूझ चौराहे पर
सितारों की सिम्त मुड गयी तेरी राह
तेरे जाने के बाद
मैंने खुद ही अँधेरे का सफर चुन लिया है
किरची किरची हुए अहसास के बीच
जिंदगी क्या है अब
मौत की दुआ के सिवा

(रफत आलम)

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