Archive for सितम्बर, 2010

सितम्बर 30, 2010

जरुरत है जरुरत है कबीर की

आज के भारत की सबसे बड़ी कमजोरी है किसी भी ऐसी शख्सियत की गैर-मौजूदगी, जो कि पूरे भारत के जन-मानस को प्रभावित कर सके। जो किसी भी पक्ष का न हो बस मानवता का हो। राजनीति के क्षेत्र से तो आशा करना ही मूर्खता है कि ऐसा कोई व्यक्तित्व उपज पायेगा अगले दस बीस सालों में भी क्योंकि राजनीतिक रुप से तो देश अगले कम से कम पच्चीस सालों तक बँटा हुआ रहेगा।

अध्यात्म के क्षेत्र से ही किसी ऐसी भरपूर धार्मिक शख्सियत उभर सकती है जो देश को और मानवता को दिशा दे सके।

अयोध्या पर कोर्ट ने ऐसा निर्णय दिया है जो लगभग सभी पक्षों की राजनीति खत्म कर देगा। कितना ही तड़पड़ायें अयोध्या के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले पर अब बहुत बड़ी राजनीति इस मुद्दे पर कोई भी नहीं चला पायेगा। वे माहौल को बिगाड़ना चाहेंगे आखिरकार उनके रुतबे का साम्राज्य खत्म होने जा रहा है।

पर अयोध्या या ऐसे मुद्दे तो बहुत छोटे सरोकार हैं और भारत में धार्मिक सदभाव और सामजिक एकता बनाये रखने के लिये ऐसे नेतृत्व का होना बहुत जरुरी है जो हर धर्म के मानने वालों को समान अधिकार से दिशा दे सकें और अगर लोग गलत राह पर जा रहे हों तो उन्हे डाँट सकें। ऐसे नेतृत्व की जरुरत है जो सभी धर्मों की कमजोरियों की तरफ बिना किसी भय या पक्षपात के इशारा कर सकें।
भारतीय इतिहास में समय समय पर ऐसे सामाजिक नेता हुये हैं। कबीर ऐसे महान व्यक्तियों में बहुत ऊँचे स्थान पर विराजते हैं।

उनके वचनों को पढ़कर, सुनकर लगता है कि हिन्दू-मुस्लिम तनाव उनके समय में भी अस्तित्व में आता रहता था और दोनों वर्ग एक दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में लगे रहते थे।
कबीर ने दोनों वर्गों को उनकी कमजोरियाँ दिखायी हैं। वे दोनों वर्गों को डाँटते हुये कहते हैं।

अरे इन दोऊन राह न पाई
हिन्दू अपने करै बड़ाई गागर छुअन न देई।
वेश्या के पायन तर सौवे, यह देखो हिन्दुआई।
मुसलमान के पीर औलया, मुरगी मुरगा खाई।
खाला केरी बेटी ब्याहे घरहि में करहिं सगाई।

कबीर समय समय पर हिन्दू और मुसलमान, दोनों वर्गों को चेताते रहे और बताते रहे कि दोनों धर्मों के लोग कर्मकांड के घेरे में फँसे हुये हैं और धर्म के नाम पर पाखंड अपनाते हैं।

हिन्दुओं को उन्होने चेताया कह कर

पाहन पूजे हरि मिले
तो मैं पूजौ पहार

और मुसलमानों को शीशा दिखाना चाहा कह कर

काँकर पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दै, बहरा हुआ खुदाय।

कबीर ने अपने जीवन से और अपने ज्ञान से बखूबी सिद्ध किया है कि धार्मिक होने का, अध्यात्मिक होने का धर्म के पाखंड के सामने दंडवत होने से कोई सम्बंध नहीं है। एक व्यक्ति पूरी तरह धार्मिक और अध्यात्मिक हो सकता है और वह जीवन भर मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा और सिनेगॉग आदि से पीठ करे रह सकता है।

कबीर कटाक्ष करते हैं हिन्दू और इस्लाम धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों पर।

न जाने तेरा साहब कैसा?
मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या साहब तेरा बहरा है?
चींटी के पग नेबर बाजै, सो भी साहब सुनता है।
बहुतै देखे पीर औलिया, पढ़े किताब कुराना
कह हिन्दू मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहमाना।

आधुनिक दौर में कबीर जैसे ही किसी अस्तित्व की जरुरत है।

यह कबीर का ही माद्दा था कि वे राजतंत्र में राजा के ऊपर भी कटाक्ष करने से नहीं हिचकिचाये।

राजा देश बड़ौ परपंची, रैयत रहत उजारी,
इतते उत, उतते इत रहु, यम की सौढ़ सवारी,
घर के खसम बधिक वे राजा,
परजा क्या छोंकौ, विचारा।

भारत ने सब कुछ राजनीति (धार्मिक और सामाजिक) से अपनी जीविका चलाने वालों के हाथों में छोड़ दिया है और इस व्यवस्था ने भारत की बहुत बड़ी हानि की है। भारत के लोग केवल अपना और अपने परिवार का हित देखने वाले नेताओं के पिछलग्गू बन कर रह गये हैं। राजनीतिक गुटबंदियों के कारण लोग गहन और सच्चे मित्रों से भी अलगाव करने से नहीं बाज आते।

भारत को पुनर्जागरण की जरुरत है और जनता को यह काम खुद ही करना होगा। बुद्धिमान, ईमानदार और चेतन जनता के प्रतिनिधि नेता भी बुद्धिमान, ईमानदार और चेतनाशील होंगे। मूर्ख, दुष्ट, भ्रष्ट नेता तब अपने आप हाशिये पर चले जायेंगे।

भारत की सांस्कृति और अध्यात्मिक चेतना की विरासत बुद्ध, कबीर, जैसी मेधाओं के हाथों में रही है। बहुत पतन हो चुका है भारत का और इसके लोगों का। अब तो यही कहा जा सकता है

अपने ही हाथों में पतवार सँभाली जाये
तब तो मुमकिन है कि ये नाव बचा ली जाये।

और एक एक व्यक्ति जाग जाये इस जागरण के लिये कबीर जैसे प्रकाश पुंज की जरुरत आज के समय को है।

…[राकेश]

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सितम्बर 29, 2010

जो हुआ सो हुआ …. निदा फाज़ली

जो मरा क्यों मरा
जो लुटा क्यों लुटा

जो हुआ क्यों हुआ…

मुद्दतों से हैं गुम
इन सवालों के हल

जो हुआ सो हुआ …

मंदिरों में भजन,
मस्जिदों में अजान
आदमी है कहाँ,
आदमी के लिये

एक ताजा ग़ज़ल
जो हुआ सो हुआ…

(निदा फाज़ली)

सितम्बर 29, 2010

इमारतों के सहारे मनुष्यता को हराता अधर्म… (कविता – रफत आलम)

इन दिनों
डरा हुआ है आदमी|

आसमान की हुकूमत का फैसला
ज़मीन पर होने वाला है|

छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर
आसमान बसने वाला है|

मंदिर की घंटियों में
मस्जिद की अजानों में
जाने क्यों कंपन सा है
आसमान ज़मीं पर जो उतर रहा है|

किस ओर से आयेगा आसमान
राम-रहीम की राह से
न्यायालय की निगाह से
या मानवता की कराह से|

इन दिनों
डरा हुआ है आदमी|

गये वक्तों की याद है उसे
आसमान को
धरती पर लाने का रास्ता
सदा ही
तलवारों ने चुना है|

चतुर आसमान
स्वर्ग उपर ही छोड कर आता है
नरक साथ लाता है|

कटे हुए सर, जलते मंज़र
लहुलुहान कस्बे शहर
मलबा बने स्वयं के घर|

आसमान देखता है संतोषपूर्वक
और
वापस लौट जाता है ऊपर

(रफत आलम)

सितम्बर 28, 2010

मन्नू बचपन कब जियेगी…(कविता – रफत आलम)

किताबों का मोल क्या?
वे तो अमूल्य होती हैं
परन्तु
वाह रे नया जमाना
ऐसी अनमोल धरोहर भी
दुश्मन बन गयी है
मन्नू के लिए,
रोज रुलाती हैं
उसे किताबें
जब
भारी बस्ता बन कर
कन्धों पर
चढ़ जाती हैं।


ए फॉर एप्पल
बी फॉर बुक
तीन साल की मन्नू को
रटने की मिली है
बड़ी सजा
मम्मी कसकर दबाती है
नन्ही उंगलिया
आढ़ी-टेढ़ी लिखाती है
सांप सी गिनतियाँ
और वह
चश्मे वाली टीचर
दुश्मन!
धूप में खड़ा कर देती है
मन्नू को
धूप काली डायन बन कर
किताब से डराती है
मन्नू को

ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार
मम्मी रटाती है
नन्ही मन्नु
रोज ही भूल जाती है
मम्मी की डाट खाती है
टप टप
आँखों से तारे
उतर आते हैं
चंदा मामा दूर के
मन्नू को सुनते हैं
|

(रफत आलम)

सितम्बर 27, 2010

सच और भ्रम …. (कविता- कृष्ण बिहारी)

सच और भ्रम
दोनों निरपेक्ष हैं
खुशी और गम की तरह।

शायद यह
एक तरह की संज्ञा शून्यता है
या फिर
वह तंद्रा
जिसमें जागते हुये भी
सोने का
और नींद में
जागते होने का
वहम बना रहता है।

अपने भीतर के मैं से
रात-दिन उलझता
बेचैनी और घबराहट के
डंक सहता
खुद से सवाल पर सवाल करता
बार-बार स्वयं को सराहता हूँ
कि
इतना सब कुछ होने पर भी
ज़िन्दगी से न भागने की
यह कैसी कसम खाई है।

मित्र, रिश्ते-नाते
छ्ल-कपट और घातें
विश्वास…आदि सब शब्द हैं
और शब्दों के अर्थ
जगह, जमीन, जलवायु
और पानी के साथ-साथ
बदलते हैं।

इन्हे ढ़ोते रहने से बचने वाले
हर तकलीफ से बच निकलते हैं।
जब दिख जाते हैं,
मिल जाते हैं
मुझे ऐसे लोग
तो अचानक किसी दूसरी दुनिया में
खुद के पहुँच जाने का पता चलता है
जिसके कायदे-कानून से मैं कभी
वाकिफ़ नहीं रहा।

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 26, 2010

दुनिया के ढ़ंग निराले … (रफत आलम)

गली कूचों में बे-बात ही बिखरा है बहुत
इन दिनों आदमी का लहू सस्ता है बहुत

आसमान के पास दोज़ख का चर्चा है बहुत
भुगत सको तो प्यारे यह दुनिया है बहुत

दुनिया की राह पर निकल तो जाँऊ मगर
खुद से बिछड जाने का खतरा है बहुत

उपर आने दे किसी को तो खुद गिर पड़े
चोटी पर जो बैठा है अकेला है बहुत

खो गयी तो भी बाखूब याद है मझे
किताबे जिस्मे यार तुझको पढ़ा है बहुत

क्या खौफ जो दुनिया दुश्मन बन गयी है
एक उसका आसरा है तो आसरा है बहुत

मेरे आज के रहनुमा से हार जायगा गिरगिट
मान लिया ये जानवर रंग बदलता है बहुत

झोपडियों के पास पहनने को कपडा नहीं
महलों में नंगे बदन बोले कपडा है बहुत

पीने के लिए मिलना ही दूभर है ‘ आलम
आंख का पानी तो आज सस्ता है बहुत

(रफत आलम)


सितम्बर 25, 2010

कन्हैयालाल नंदन : श्रद्धा सुमन

गुज़रा कहाँ कहाँ से जैसी प्रसिद्ध कृति की रचना करने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार श्री कन्हैयालाल नंदन मृत्यु का दामन पकड़ जीवन का साथ छोड़ गये।

सत्तर के दशक से अस्सी के दशक के शुरु के काल में बचपन व्यतीत करने वाले  ऐसे करोड़ों  हिन्दी भाषी लोग होंगे जिन्होने अपने बचपन में नंदन जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली बाल-पत्रिका पराग के द्वारा बाल-साहित्य के मायावी, कल्पनात्मक और ज्ञानवर्धक संसार में गोते लगाकर गंभीर और श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने की ओर कदम बढ़ाने के लिये आरम्भिक शिक्षा दीक्षा प्राप्त की।

इसी पीढ़ी ने थोड़ा बड़े होकर नंदन जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं सारिका और दिनमान के जरिये देश-विदेश का साहित्य पढ़ने और सम-साअमायिक विषयों को समझने की समझ विकसित की।

लोग नंदन जी का प्रभाव धर्मयुग के द्वारा भी महसूस करते रहे जहाँ वे उप-सम्पादक थे।

करोड़ों हिन्दी भाषियों को नंदन जी का जाना ऐसे ही लगेगा मानो बचपन में एक सितारा उनसे जान पहचान करने आया था और वे उसके लिखे शब्दों या उसके द्वारा छांटे शब्दों के आलोक में जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहे और लुभावनी मुस्कान वाला वह सितारा आज बुझ गया।

धन्यवाद श्री कन्हैयालाल नंदन को एक पूरी पीढ़ी को साहित्यिक संस्कार देने के लिये।

ईश्वर नंदन जी की आत्मा को शांति प्रदान करे।

सितम्बर 25, 2010

शबाना और जावेद ने खाकर स्लम उड़ाया है गरीबों का मज़ाक

पात्र    : शबाना आजमी, जावेद अख्तर, और हिन्दी फिल्म जगत की नामचीन हस्तियाँ
अवसर : शबाना आजमी का साठवां जन्मदिन

शबाना आजमी – भारत के सबसे बेहतरीन अदाकारों में से एक।

शबाना आजमी – साम्यवादी और शायर मरहूम कैफ़ी आजमी की सुपुत्री।

शबाना आजमी – अस्सी के दशक में झोंपड़ पट्टी में रहने वालों के अधिकारों के लिये भूख-हड़ताल पर बैठने वाली सिनेतारिका कम एक्टीविस्ट

शबाना आजमी – हिन्दी फिल्मों के मशहूर पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर की पत्नी, जो बकौल जावेद साहब, उनकी महबूबा भी हैं।

शबाना आजमी – जो किसी भी नारी पात्र को तभी निभाने के लिये तैयार होती हैं जब वह पात्र प्रोग्रेसिव हो।

शबाना आजमी – जो भारत के किसी भी मुद्दे पर हद से ज्यादा संवेदनशील बन कर जब तक उनके गले की नसें थक न जायें तब तक बोलती रहती हैं।

और जावेद अख्तर साहब के तो कहने ही क्या हैं। कितनी ही ब्लॉकबस्टर फिल्मों को उन्होने अपने दहकते शोलों जैसे कथानक और आग उगलते संवादों की सहायता से ज्वलनशील प्रकृति प्रदान की है और जिन्हे देखकर दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाया करते हैं। वास्तविक जीवन में उन्होने अपनी छवि एक धर्म-निरपेक्ष और धार्मिक असहिष्णुता के प्रति कठोर और संवेदनशील लेखक और शायर की बनायी है।

उन्हे करीब से जानने वाले हिन्दी फिल्म उद्योग के लोग उनके सेंस ऑफ ह्यूमर की तारीफ करते नहीं थकते हैं।

भारत में मज़ाक में कहा जाता है कि फलां फलां व्यक्ति सठिया गया है। शबाना आजमी साठ की क्या हुयीं उनसे कई बरस पहले ही साठ के आँकड़े को पार कर चुके उनके पति, सांसद जावेद अख्तर ने सूबूत दे दिया कि किसी भी उम्र के लोग मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकते हैं।

जावेद जी ने शबाना जी के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर एक विशिष्ट किस्म का केक बनवाने का आर्डर दिया। केक में ऐसा क्या खास था?


केक को एक स्लम के एरियल व्यू की साज सज्जा से सुशोभित किया गया था। किसी भी गरीब स्लम की विवशता भरी विशेषतायें उस केक की शोभा बढ़ाने के लिये उपयोग में लायी गयी थीं।
स्लम के लोग विवश हैं गन्दगी में जीवन व्यतीत करने के लिये परन्तु शबाना-जावेद की जोड़ी ने दर्शा दिया कि वे गरीबों और उनकी गरीबी के प्रति वास्तव में कितने संवेदनशील हैं।

दोनों लोग कलाकार हैं और यही दुख की बात है कि संवेदना के स्तर पर जीने वाले कलाकार ऐसी असंवेदनशील मूर्खतापूर्ण गलती कर सकते हैं।

भारत की माननीय राष्ट्रपति महोदया ने श्री जावेद अख्तर को देश की संसद के उच्च सदन राज्य सभा में एक सांसद के रुप में मनोनीत किया हुआ है। जावेद साहब की मति को क्या हो गया था?
ऐसी तो आशा ही करनी बहुत बड़ी बेवकूफी होगी कि आज के दौर की भारतीय संसद के सांसद इतने संवेदनशील हो सकते हैं कि वे संसद से इस्तीफा दे दें ऐसी असंवेदना प्रकट करने के लिये।

इससे पहले कि किसी का दिमाग शबाना और जावेद की हरकत में सियासी दलों में बँटी राजनीति ढ़ँढ़े, यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि शबाना आजमी के जन्म दिन की पार्टी में लगभग हरेक राजनीतिक दल से जुड़े लोग मौजूद थे।

भारत के हर मुद्दे पर गला खँखार कर लोगों को खामोश करते, भाषण देते, हमेशा बड़े बड़े बोल बोलने वाले शत्रुघ्न सिन्हा शायद अभी तक गरारे ही कर रहे हैं ताकि अगर इस मुद्दे पर राजनीति जोर पकड़ ही जाये तो किसी तरह अपनी जान बचाने को कुछ बोल सकें।

भारत के सबसे अच्छे अभिनेताओं में सिरमौर कुछ अभिनेताओं में शामिल माननीय नसीरुद्दीन शाह, जिनके पास हिन्दी सिनेमा के लगभग हर अभिनेता के खिलाफ व्यंग्य के तीर हमेशा मौजूद रहते हैं, अभी कुछ कह नहीं पाये हैं। शायद वे कुछ कह भी नहीं पायेंगे।

पार्टी में शामिल किसी भी फिल्मी व्यक्ति से किसी भी विवाद उत्पन्न करने वाले मुद्दे पर कुछ कहने की उम्मीद करना भी ऐसा होगा जैसे कि ये उम्मीद करना कि कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी में भ्रष्टाचार के मामले में एक भी पैसे का हेरफेर नहीं हुआ है।

जनता की बेवकूफी इस बात से जाहिर होगी कि लोग अभी भी इन सितारों को पूजे चले जायेंगे।

भारत कब एक सभ्य देश बनेगा और कब सभ्य बनेंगे इसके नागरिक ताकि वे दूसरों की भावनाओं पर घात न करें।

ऐसे हालात पर सिर्फ दुखी हुआ जा सकता है।

गलती सभी से होती है पर जावेद अख्तर इसे गलती न मानकर इसे उनके द्वारा शबाना आजमी के लिये किया गया एक मज़ाक ही मान रहे हैं। उनके मुताबिक शबाना अपने हर मामले को इतनी गम्भीरता से लेती हैं कि उन्हे मज़ाक का अर्थ समझाने के लिये ऐसा केक बनाने का विचार उनके दिमाग में आया था।

इस काम के लिये तो जावेद अख्तर अपने गरीबी और दिक्कतों से भरे बचपन की यादों से भरा हुआ केक बनवा सकते थे। ऐसा केक उनकी संवेदशीलता की जाँच भी कर लेता।

अंकुर, पार और धारावी जैसी फिल्मों में गरीब स्त्री की भूमिकायें सशक्त रुप से निभाने वाली शबाना आजमी ने सिद्ध कर दिया है कि वे एक प्रशिक्षित अभिनेत्री मात्र हैं और उनके द्वारा गरीबों के अधिकारों के लिये दिये गये धरने जैसे प्रयास भी मंचीय अभिनय के ही विस्तृत रुप थे।

जावेद साहब ने भी अपना सेंस ऑफ ह्यूमर दिखा दिया है कि यह औरों का मज़ाक बनाने पर ही निर्भर करता है।

अपने जन्मदिवस पर अतिथियों के सामने “मुन्नी बदनाम हुयी” गीत पर नृत्य करने वाली शबाना आजमी को गुमान भी न रहा होगा कि एक गलती उन्हे गाने पर विवश कर देगी।

मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिये
शबाना बदनाम हुयी जावेद तेरे लिये

पार्टी में गये अतिथियों की तस्वीरें देखने के लिये यहाँ और यहाँ क्लिक करें।

सितम्बर 24, 2010

ब्लॉग की दुनिया में एक घुसपैठिया …रफत आलम

नौकरी से रिटायर होने पर एक साथी ने उनसे मजाक में कहा था,” कहो दिलीप बाबू बुढ़ापा मानते हुये राम भजोगे, डर डर कर मरोगे या नेट वगैरहा की रंग-रंगीली दुनिया और ब्लॉग आदि से  मन बहला कर आनंद पूर्वक मरना चाहोगे”।
तब दिलीप सेवानिवृत होने के तत्काल बाद की भयानक शांति और जीवनचर्या में एकदम से आये बदलावों से परिचित न थे सो न तो साथी की बात समझ पाये और न ही कुछ उत्तर दे पाये।
पर शीघ ही पार्टियां और मेल मुलाकातें खत्म हुयीं और इन सब व्यस्तताओं से फारिग होकर एक दोपहर वे अकेले बैठे थे। कहते है ना – खाली दिमाग शैतान का घर सो उनके दिमाग में भी खुरापात ने घर कर लिया और उन्हे अपने साथी की कही बात याद आ गयी। उनके मन में ललक उठी कि कुछ दिन नेट के भी मज़े ले लें बाकी राम तो आखिर में भजना ही है।

ब्लॉग वाणी के ज़रिये ब्लॉग-संसार में जा घुसे। बस साब क्या कहें ब्लॉग की दुनिया के बारे में। अजीब अजीब से नाम उन्हे पुकार रहे थे और भाँति भाँति के सुंदर, औसत और साधारण पासपोर्ट साइज़ चेहरे उनका स्वागत कर रहे थे।

ब्लॉग संसार में विचरण करते हुये उन्हे एक साब, जो टी.वी. की दुनिया के ठीक ठाक से नाम वाले कलाकार हैं और जिनके उछल-कूद  भरे अभिनय से दिलीप अपनी ढ़ल गयी जवानी का दर्द भूल कर कुछ देर के लिये मस्त हो जाया करते हैं, का मुखडा एक ब्लॉग पर देखा।

दिलीप ने पहली एंट्री उन्ही के ब्लॉग में लगायी। दिलीप तो इस आशंका से ब्लॉग पर गये थे कि हीरो साब ने ज़रूर उछल-कूद में शामिल हसीन तारिकाओं के चटपटे किस्से लिखे होंगे पर वहाँ तो लघभग आधे किस्से सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं की फूहड़ स्तुति में लिखे गये थे और बाकी में दिनांक वार सामाजिक समस्यायें, बॉडी फिटनेस ,शायरी, हास्य और दुनिया भर के बारे में यह ऐसा है वह वैसा है जैसा लिखा था। नहीं थे तो हसीनाओं के अन्तरंग किस्से जिनकी तलाश दिलीप जी की ढ़ली जवानी के कांपते ऊबाल को थी।

उस ब्लॉग में एक कथा एक उमर दराज़ बूढी महिला से सम्बंधित थी। पति के स्वर्गवास होते ही पांच माह में ही उस बदनसीब को  बहुओं और बेटों ने  सड़क पर धकेल दिया था। बेचारी अब मंदिर के आगे भीख माँग कर किसी तरह अपना गुजारा कर रही थी। कथा मार्मिक लगी।  पोस्ट के नीचे टिप्पणी का बक्सा लगा दिख रहा था। पसीजे दिल से टिप्पणी वाला बक्सा खोल लिया।
पचास के लगभग  टिप्पणियाँ  लिखी थीं। आधी लाइन से डेढ़ लाइन तक की। वास्तविक जीवन के इतनी मार्मिक किस्से पर अजीबोगरीब टिप्पणियाँ देखकर मन और ज्यादा गीला हो गया।
ज़रा मुलाहिज़ा कीजिये टिप्पणियों के नमूनों का –
सुंदर है, साधुवाद, आभार आदि। बस इसी पर बात खत्म। दुखियारी बूढ़ी महिला की रूठी किस्मत के मुकदमे का फैसला एक शब्द में? वाह क्या इंसाफ था! अधिक किसी ने कलम को कष्ट दिया तो यूँ  लिख दिया था – अच्छा पोस्ट पढ़ाने के लिए धन्यवाद, कृपया मेरे लिंक्स – फलां फलां ,  भी देखें। और टिप्पणीकार का मतलब सिद्ध। समझ गये ना आप।
दिलीप यद्यपि कुछ हद तक मोहभंग की स्थिति में थे पर फर्ज़ मानकर अपने पसंदीदा अदाकार ब्लोगर महोदय की शान में कुछ कसीदे लिखे। माउस क्लिक और उनकी टिप्पणी भी दर्ज हो गयी। इसी ब्लॉग पर उन्हे एक ग़ज़ल भी दिखायी दी। उखड़े मूड को कुछ शांति प्रदान करने के लिये ग़ज़ल की शरण में चले गये।
ग़ज़ल बड़े ही रंगीन बैकग्राउण्ड और सुंदर अंदाज़ में शोभायमान थी पर शायर का नाम नीचे बिलकुल नन्हे अक्षरों में लगभग अदृष्य सा लिखा था। .गज़ल अच्छी लगने के कारण पूरी पढ़ी और कवि का नाम भी दिमाग में रट सा गया। उन्होने टिप्पणी वाला बक्सा यहाँ भी खोला और खँगाला। लगभग सभी टिप्पणीकारों द्वारा शायर के स्थान पर ब्लॉगर साब की शान में सुंदर गज़ल लिखने से सम्बंधित कलम कसीदाकारी की गयी थी।
प्रशंसागान में लीन टिप्पणियों के बीच बेचारे शायर की डेढ़ लाइन वाली गुहार भी गिरगिराती दिखायी दी कि साब हमारा नाम ऊपर लिख दो। लोगों में आपके शायर होने का गलतगुमानी हो रही है।

दिलीप शायर साब की काबलियत से खासे प्रभवित हो ही गये थे सो उन्होने लोगों की अल्पदृष्टि को इंगित करते हुये शायर और गज़ल की तारीफ में काफी कुछ लिख मारा पर यह क्या, टिप्पणी बक्से के उपर अंग्रेजी में लिखी हु्यी कुछ इस प्रकार की लिखावट प्रकट हो गई- युअर कमेन्ट इस सेव्ड और मोडरेटर द्वारा स्वीकृत होने पर छपेगी। देर तक इन्तज़ार करने के बाद निराश होकर लौटते वक्त नज़र जो पड़ी तो देखा- शायर की गज़ल के दो शेर ब्लॉगर साब की तस्वीर के ठीक नीचे छपे थे। दिलीप की आशंका बलवती हो गयी कि अब उनकी टिप्पणी कभी नहीं छपेगी।

दिलीप जी उखड़े मन से इधर उधर आँखे चला रहे थे कि स्क्रीन पर कुछ देखकर वे वे बेसाख्ता मुस्कराने लगे। एक ब्लॉग का नाम ही ऐसा था। एक अतिसुंदर महिला के चित्र के उपर लिखा था, “पुरुष के सर पर चप्पल”। चप्पल तो महिला की तस्वीर के सर पर थी और नाम ब्लॉग का था – पुरुष  के सर पर चप्पल। ऐसे कारनामे पर किसे हँसी न आती। दिलीप तुरंत ब्लॉग के भीतर हो लिए।
यहाँ भी दिलीप को निराशा ही मिली। सोच कर गये थे कुछ चंचलता होगी, हुस्न का जादू मर्द के सर पर नाचता दिखाई देगा, पर पहला ही पोस्ट था – पति देवता को कैसे मनाएं। फिर कविता थी- प्राण नाथ के चरणों की सौगंध। आगे थी करवा चौथ के व्रत की जानकारी आदि, आदि। यानि पुरुष के सर पर चप्पल के सिवा, मर्द के अहंकार की चापलूसी सम्बंधित सभी कुछ था।
दिलीप का पहले से उखड़ा मन थोड़ा और कसैला हो गया पर फिर भी अबला पर दया ही आयी. बेचारी बात तो सर उठाने की करती है, एम.एल.ए, सरपंच भी बन जाती है परन्तु  घूँघट के साथ। पुरुष  समाज बुरा हो तेरा। दिलीप को समझ नहीं आया कि क्या टिप्पणी करें सो चुपके से बाहर हो लिए।
दिलीप ने कई और ब्लॉगों के चक्कर लगाये। अंदाज़ लेखन के चाहे बिलकुल अलग रहे हों पर दो वस्तुओं की समानता लगभग सभी ब्लॉगों में बिना विविधता देखने को मिली – एक तो रचनायें, लेख और जानकारिया चाहे जो हों, कोई भी 10 से 15 साल से कम पुरानी  नहीं  थी या किसी से साभार उधार ली गयी थीं और दूसरी सभी टिप्पणीकार वही आधी से डेड लाइन वाली टिप्पणी जमाने में लगे थे। पाठक भूले तो नहीं हैं, सुंदर…आभार आदि वाली बात।

दिलीप का तो जी घबरा सा गया। लगा नमाज़ के चक्कर में रोज़े गले पड़ रहे हैं। उन्होने अपने दिमाग की खैर मनाने में ही भलाई समझी और निकल चले ब्लॉग संसार से बाहर की ओर। वापसी के रास्ते में एक ब्लॉग का अजीब सा नाम देख कर फिर से उत्सुकता जागी। माउस पर क्लिक और वे अंदर।
वहाँ भी वही राग- तेरी भी सफ़ेद मेरी भी सफ़ेद वाली बात देखने को मिली। खैर आ ही गये थे तो ब्लॉगर साब की उस १० वर्ष पुरानी रचना जिस के बारे में उन्होंने कितने ही अन्य ब्लॉगरों द्वारा चोरी का  दावा किया था, देखी। यानि चोरी से ये कम्प्यूटरों की कैद में बंद ब्लॉग भी अछूते नहीं। इतनी बड़ी तारीफ के बाद भी ना पढते तो रचना के साथ नाइंसाफी होती। अचानक नादान मन के लुभाने पर, टिप्पणी बक्से में नाम देखने के लालच ने उनसे वहाँ भी ब्लॉगर महोदय की शान में कसीदा लिखवाया और तुरत इनाम भी मिल गया – उनकी टिप्पणी भी कुछ दिनों के लिए अमर हो गयी।

ब्लॉगर साब की एक और कविता, जो कुछ नास्तिकता के विचार लिए हुये थी, पढ़ कर दिलीप आग-बबूला हो गये। अंजाम से बेखबर भीतर का आस्तिक जाग उठ खड़ा हुआ। कलम की स्याही आध्यमिकता से उबलने लगी। उन्होने खूब खरी- खोटी टिप्पणी ब्लॉगर जी की कविता के विरुद्ध लिख फेंकी। छापने की बात तो दूर अबकी बार तो टिप्पणी बक्से ने छापने सम्बंधित कोई सुझाव भी उन्हे नहीं दिया यानि टिप्पणी वाला बक्सा देर तक खाली ही रहा।

टिप्पणी छपवाने में मिली अब तक की असफलताओं से दिलीप की समझ में आ चुका था कि ब्लॉग सकून से पढ़ कर टिप्पणी छपाने के लिए ब्लॉगर और रचना, चाहे दो कौड़ी की भी ना हो, दोनों की तारीफ जरुरी है।
उन्होने एक और बात नोट की कि भले ही ब्लॉगर प्रतिकूल टिप्पणी को छापे न पर हर टिप्पणी बक्से के ऊपर टिप्पणीकार को आकर्षित करने हेतु ब्लॉगर द्वारा कुछ ना कुछ बेबाक राय छापने सम्बंधित आदर्श वाक्य जरुर लिखे होते हैं।

पुनश्च-:

(1) तीन दिन बाद जाने क्यों दिलीप के मन में हुडक उठी और उनके मन ने लालच दिया – जाओ देखो  तो सही, क्या पता ब्लॉगर महोदय ने अन्तर्रात्मा  की आवाज़ पर तुम्हारी टिप्पणी छाप ही दी हो। पर हाय रे ब्लॉग संसार, ब्लॉग भूमि पर उनके चंचल मन की तीसरी हार हुयी थी, उनकी टिप्पणियों का नामोनिशान तक मौजूद न था।

(2) दिलीप को भूला हुआ एक सबक याद आ गया- बाज़ार चाहे किसी का हो (भले ही बुद्दिजीवियों का ही क्यों ना हो) सौदे स्वलाभ के आधार पर ही किये जाते हैं।
(3) टिप्पणी छपवाने की कीमियागिरी दिलीप ने सीख ही ली थी और जल्द ही ढ़ेर सारे ब्लॉग्स पर उनकी टिप्पणियाँ चमचमाने लगीं।

(रफत आलम)

सितम्बर 23, 2010

एतबार … ग़ज़ल (रफत आलम)

मासूम फूल के तले हथियार छुपा था खार का
उँगलियों का दिल ज़ख़्मी हुआ बुरा हो बहार का

तेरे जाने के बाद सभी मंज़र रुक से गये
मेरी आँखों में ठहर गया मौसम इन्तज़ार का

ये उड़ते परिदे तो साँझ को घर लौट आएंगे
हमें जाने कहाँ छोड जाएगा रास्ता गुबार का

जिंदा लाश के सीने में पडा है टूटा हुआ दिल
दिया भी तो ना बन सका किसी मजार का

वो जो उसूलों का पाठ पढ़ा रहा था मुझे
दामन पकड़ कर चल दिया एक दुनियादार का

बेरोज़गारी की शिकायत के दफ्तर सब बंद हुए
नौकरी पर पहला हक है मंत्री के रिश्तेदार का

उसमे बड़ी कमी के बगल में छुरी नहीं रखता
आलम ’ आदमी नहीं है किसी भी एतबार का

(रफत आलम)

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