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जुलाई 6, 2014

गंगा आए कहाँ से…गंगा बचे कैसे?

Ganga pollutedगंगा समग्र यात्रा के दौरान कानपुर में उमा भारती ने कहा था कि उनकी पार्टी की सरकार बनने पर दो काम उनकी प्राथमिकता में होंगे। एक यह कि कानपुर के गंगा-जल को आचमन के योग्य बनाएंगे। और दूसरा, गौ हत्या पर काफी सख्त कानून बनाया जाएगा। लेकिन यहां हम बात केवल गंगा की कर रहे हैं। गंगा को लेकर बड़े-बड़े वादे करने वाले अब सत्ता में हैं।

कानपुर से ही बात शुरू करते हैं। इन पंक्तियों के लेखक का दावा है कि कानपुर में गंगा-जल है ही नहीं। तो फिर आचमन-योग्य किस चीज को बनाया जाएगा? कानपुर गंगा पथ का ऐसा अभागा शहर है जहां नाव पतवार से नहीं, बांस से चलती है। यहां की गंगा में तो टीबी अस्पताल के नाले जैसे कई नालों की गाद और टिनरीज का लाल-काला पानी है, जिसमें बांस गड़ा-गड़ा कर नाव को आगे बढ़ाया जाता है। हरिद्वार में आधे से ज्यादा गंगा-जल दिल्ली को पीने के लिए हर की पैड़ी में डाल दिया जाता है। इसके बाद बिजनौर में मध्य गंगा नहर से भारी मात्रा में पानी सिंचाई के लिए ले लिया जाता है। बचा-खुचा पानी नरौरा लोअर गंग नहर में डाल कर उत्तर प्रदेश के हरित प्रदेश में पहुंचा दिया जाता है।

वास्तव में गंगा नरौरा में आकर ही खत्म हो जाती है। अदालत की लगातार फटकार और लोगों के दबाव में नरौरा के बाद बहुत थोड़ा-सा पानी आगे बढ़ता है। नरौरा, जहां नहर नदी की तरह दिखाई देती है और नदी नहर की तरह। नाममात्र के इस गंगा-जल को कानपुर पहुंचने से ठीक पहले बैराज बना कर शहर को पानी पिलाने के लिए रोक लिया जाता है। चूंकि शहर में पानी की किल्लत रहती है इसलिए यहां से एक बूंद पानी भी आगे नहीं बढ़ पाता। इसके बाद इलाहाबाद के संगम में और बनारस की आस्था के स्नान में गंगा-जल को छोड़ कर सबकुछ होता है। वास्तव में आस्थावान लोग जिसमें गंगा समझ कर डुबकी लगाते हैं वह मध्यप्रदेश की नदियों- चंबल और बेतवा- का पानी होता है, जो यमुना में मिलकर गंगा को आगे बढ़ता है। तो अगर नई सरकार का मन कानपुर में आचमन करने का है तो गंगा को वहां पहुंचाना होगा और उसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की जरूरत है।

नई सरकार आने के बाद से गंगा को लेकर नदी विकास की बातें प्रमुखता से कही गई हैं। तट विकसित होंगे, पार्किंग बनेंगी, घाट बनेंगे, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लाइट ऐंड साउंड कार्यक्रम होगा, परिवहन होगा, गाद हटाई जाएगी, मछली पालन भी होगा। लेकिन इस सब में मूल तत्त्व गायब है, गंगा में पानी कहां से आएगा इस पर कोई बात नहीं हो रही। जहाजरानी मंत्रालय की ओर से ग्यारह बैराज बनाने का विचार सामने आया है। इसकी सार्थकता पर सरकार के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। तो फिर किया क्या जाए?

पहले कदम के रूप में निजी और उद्योगों के नालों को बंद करने का कदम उठाना चाहिए, ये नाले सरकारी नालों की अपेक्षा काफी छोटे होते हैं लेकिन पूरे गंगा पथ पर इनकी संख्या हजारों में है। रही बात बड़े और सरकारी नालों की, तो उन्हें बंद करने का वादा नहीं नीयत होनी चाहिए। वास्तव में उत्तरकाशी, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस और गाजीपुर जैसे शहरों की सीवेज व्यवस्था ही ऐसे डिजाइन की गई है, जिसमें गंगा मुख्य सीवेज लाइन का काम करती है। अब इन शहरों में पूरी सीवेज व्यवस्था को नए सिरे से खड़ा करना होगा ताकि गंगा इससे अछूती रहे। नए सीवेज सिस्टम के लिए बनारस भविष्य में एक मॉडल का काम कर सकता है।

वाराणसी को तीन पाइपलाइन मिलनी थी, पीने के पानी के अलावा वर्षाजल निकासी और सीवेज की पाइपलाइन डाली जानी थी। शहर खोदा गया, सीवेज के पाइप डाले गए, लेकिन सीवेज संयंत्र के लिए जरूरी जमीन का अधिग्रहण नहीं हो सका।

वाराणसी में हर रोज पैदा होने वाले चालीस करोड़ लीटर एमएलडी सीवेज में से मात्र सौ एमएलडी साफ हो पाता है, बाकी सारा गंगा को भेंट हो जाता है। सरकार के लिए वाराणसी की गलियों की ऐतिहासिकता बचा कर रखते हुए इस काम को कर पाना बड़ी चुनौती है।

दूसरा बेहद जरूरी कदम यह है कि कानपुर के चमड़ा-कारखानों को तुरंत वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने भी कई बार इन कारखानों को हटाने का आदेश दिया है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के चलते यह अब तक संभव नहीं हो सका। अकेले उत्तर प्रदेश में 442 बड़े और मंझोले चमड़ा कारखाने हैं। जब सरकार चीन को बिजनेस पार्क के लिए जगह दे सकती है तो इन कारखानों को क्यों नहीं?

तीसरा कदम है रिवर पुलिसिंग का। हर दो किलोमीटर पर एक गंगा चौकी हो, जहां जल-पुलिस की तैनाती हो, जिसमें स्थानीय मछुआरों को रोजगार दिया जाए। रिवर पुलिस लोगों को गंगा में कचरा डालने से रोकेगी। अर्थदंड लगाने जैसे अधिकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा देंगे, इसलिए रिवर पुलिस की भूमिका जागरूकता फैलाने और स्थानीय प्रशासन के बीच सेतु बनाने की होनी चाहिए।

गंगा संरक्षण की दिशा में चौथा उपाय मोटर से चलने वाली छोटी नाव पर रोक के रूप में होना चाहिए। रोजगार के नाम पर लाखों की संख्या में डीजल आधारित मोटरबोट गंगा में चलती हैं। नावों में लगाई जाने वाली ये सेकेंडहैंड मोटरें बड़ी संख्या में बांग्लादेश से तस्करी कर लाई जाती हैं। अत्यधिक पुरानी होने के चलते इनसे काला धुआं और तेल की परत निकलती है, जिसमें मछलियां और उनके अंडे जीवित नहीं रह पाते। इन नावों में डीजल की जगह केरोसिन का उपयोग होता है। एक तर्क यह दिया जाता है कि जब छोटे जहाज और स्टीमर गंगा में चल सकते हैं तो इन गरीबों की नाव रोकने की क्या तुक है। पर गंगा में स्टीमर और फेरी मुख्यत: बिहार और बंगाल में ही चलते हैं जहां गंगा में पानी की समस्या नहीं है। बनारस तक के क्षेत्र में, जहां गंगा अस्तित्व के लिए ही जूझ रही है, वहां यह बंद होना चाहिए। वहां गैस से चलने वाले स्टीमर की इजाजत दी जा सकती है।

पांचवां और बेहद महत्त्वपूर्ण विषय है आस्था को ठेस पहुंचाए बिना पूजन सामग्री के निपटान का। गंगा पथ पर बसे घरों की समस्या यह है कि वे पूजा के फूलों और पूजन सामग्री का क्या करें। मजबूरी में लोग उसे नदी में डालते हैं, क्योंकि कहीं और फेंकने से आस्था को ठेस पहुंचती है। एक उपाय यह है कि हर रोज नगर निगम इस पूजन सामग्री को लोगों के घरों से इकट्ठा करें। इस काम के लिए कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों का उपयोग न किया जाए। इस इकट्ठा की गई पूजन सामग्री का उपयोग खाद बनाने में हो सकता है। मूर्ति विसर्जन पर पूर्णत: रोक छठा कदम है, जिसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए। सातवां निर्णय तुरंत लागू किया जा सकता है, कि मौजूदा सीवेज शोधन संयंत्र अपनी पूर्ण क्षमता से काम करें। अभी तो आधे से भी कम संयंत्र चालू हालत में हैं, ये भी अपने दावे के अनुरूप नहीं चलते। सिर्फ उत्तर प्रदेश में पैंतालीस बड़े नाले गंगा में गिरते हैं, छोटे नालों की तो गिनती ही नहीं है। अकेले बनारस में तीस छोटे-बड़े नाले गंगा में मिलते हैं। बिजली की भारी कमी के चलते भी सीवेज प्लांट नहीं चलते।

यह हालत खासकर उत्तर प्रदेश में है जहां इन संयंत्रों का चालू रहना बेहद जरूरी है। साथ ही यह पक्का किया जाए कि भविष्य में कोई नया प्लांट नहीं लगाया जाएगा। हमारे देश की स्थिति लंदन से अलग है। हमारे यहां सीवेज जमीन के भीतर नहीं इकट्ठा होता जिसे शोधित कर उपयोग में लाया जा सके। हमारे यहां तो बहते हुए नालों को ही सीवेज ट्रीटमेंट सेंटर बनाने की जरूरत है और उस शोधित पानी को भी गंगा में या सिंचाई में उपयोग में न लाया जाए। एक बानगी देखिए। वाराणसी के पास सारनाथ से सटे कोटवा गांव में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया। पहले पहल शहर के गंदे नाले का पानी खेतों में डाला गया तो लगा दूसरी हरित क्रांति हो गई। फसल चार से दस गुना तक बढ़ी।

मगर अब स्थानीय लोग खुद इन खेतों की सब्जियों को हाथ नहीं लगाते, क्योंकि वे देखने में तो चटक हरी, बड़ी और सुंदर होती हैं मगर उनमें कोई स्वाद नहीं होता, और कुछ ही घंटों में कीड़े पड़ जाते हैं। यही हाल अनाज का भी है, सुबह की रोटी शाम को खाइए तो बदबू आएगी। कई सालों तक उपयोग करने के बाद बीएचयू के एक अध्ययन में यह सामने आया कि शोधित पानी सोने की शक्ल में जहर है। इन साग-सब्जियों में कैडमियम, निकिल, क्रोमियम जैसी भारी धातुएं पाई जाती हैं।

लोकलुभावन घोषणाओं और गंभीर पहल के बीच का फर्क समझते हुए उमा भारती को अगले कदम के रूप में हरिद्वार और ऋषिकेश के आश्रमों को नोटिस देना चाहिए कि वे एक समय-सीमा के भीतर अपने सीवेज का वैकल्पिक इंतजाम कर लें। इनके भक्तों पर गंगा को निर्मल बनाने और निर्मल रखने की इनकी अपील का असर तब पड़ेगा, जब ये खुद इस पर अमल करेंगे। अब तक तो गंगा आंदोलन में शामिल सभी आश्रमों के मुंह से निर्मल गंगा की बात ऐसे ही लगती है जैसे हम पेड़ काटते हैं, उसका कागज बनाते हैं और फिर उस पर लिखते हैं ‘वृक्ष बचाओ’।

अविरल गंगा के रास्ते की बाधा हटाने का नौवां कदम होना चाहिए हर बैराज के ठीक पहले डिसिल्टिंग का। गंगा पर बने हर बैराज के पहले कई किलोमीटर तक भारी गाद जमा हो गई है; फरक्का बैराज के पहले जमा गाद ने गंगा की सहायक नदियों पर भी काफी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। साथ ही गंगा में रेत खनन पर जारी रोक को तुरंत हटाना चाहिए। रेत खनन न होने से कई जगह नदी का स्तर उठ गया है, जो आने वाले मानसून में बाढ़ का सबब हो सकता है। रेत खनन विशेषज्ञ की देखरेख में किया जाए, क्योंकि गाद हटाने के नाम पर रेत माफिया कब से गंगा पर नजर गड़ाए हुए हैं। वास्तव में यह रेत खनन नहीं रेत चुगान होना चाहिए। बालू के क्षेत्र को नियंत्रित किया जाना जरूरी है।

दसवां और सबसे महत्त्वपूर्ण काम। गंगा में गंदगी डालने को कार्बन क्रेडिट जैसा मामला नहीं बनाना चाहिए। किसी भी उद्योग पर गंदगी डालने पर जुर्माना न लगाया जाए, हर हाल में यह पक्का करना चाहिए कि गंदगी न डाली जाए, जुर्माने वाली व्यवस्था से सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। कई बड़े उद्योगों का गणित यह है कि जुर्माना देना सरल है, वैकल्पिक व्यवस्था करना महंगा है। इसलिए वे जुर्माने को मलबा निपटान की अपनी लागत में जोड़ कर चलते हैं।

एक प्यारी छोटी-सी मछली होती है हिल्सा। फरक्का बनने से पहले वह गंगा में ही पाई जाती थी। खारे पानी की यह मछली अंडे देने मीठे पानी में उत्तराखंड तक आती थी। कानपुर का जल आचमन के लायक हुआ या नहीं, इस पर वैज्ञानिक बहस करते रहेंगे। पर जिस दिन कानपुर में हिल्सा नजर आई, समझें वह नई मंत्री का इस्तकबाल करने आई है। क्या नए शासन में इतनी इच्छाशक्ति है?

अभय मिश्र

साभार : जनसत्ता

 

नवम्बर 18, 2013

ओमप्रकाश वाल्मीकि : गंगा में नहीं नहाऊँगा (श्रद्धांजलि)

balmikiहिंदी साहित्य में दलित जीवन के वर्णन को प्रमुखता से जगह दिलवाने वाले, जूठन जैसी अति-प्रसिद्द आत्मकथा के लेखक, वर्तमान हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर  ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की  स्मृति में कर्मकांड पर प्रहार करती उनकी एक सशक्तत कविता

जब भी चाहा छूना
मंदिर के गर्भ-गृह में
किसी पत्थर को
या उकेरे गये भित्ति-चित्रों को

हर बार कसमसाया हथौडे़ का एहसास
हथेली में
जाग उठी उंगलियों के उद्गम पर उभरी गांठें

जब भी नहाने गये गंगा
हर की पौड़ी
हर बार लगा जैसे लगा रहे हैं डुबकी
बरसाती नाले में
जहाँ तेज धारा के नीचे
रेत नहीं
रपटीले पत्थर हैं
जो पाँव टिकने नहीं देते

मुश्किल होता हैjoothan
टिके रहना धारा के विरुद्ध
जैसे खड़े रहना दहकते अंगारों पर

पाँव तले आ जाती हैं
मुर्दों की हडि्डयाँ
जो बिखरी पड़ी हैं पत्थरों के इर्द-गिर्द
गहरे तल में

ये हडि्डयां जो लड़ी थीं कभी
हवा और भाषा से
संस्कारों और व्यवहारों से
और, फिर एक दिन बहा दी गयी गंगा में
पंडे की अस्पष्ट बुदबुदाहट के साथ
(कुछ लोग इस बुदबुदाहट को संस्कृत कहते हैं)

ये अस्थियाँ धारा के नीचे लेटे-लेटे
सहलाती हैं तलवों को
खौफनाक तरीके से

इसलिये तय कर लिया है मैंने
नहीं नहाऊंगा ऐसी किसी गंगा में
जहां पंडे की गिद्ध-नजरें गड़ी हों
अस्थियों के बीच रखे सिक्कों
और दक्षिणा के रुपयों पर
विसर्जन से पहले ही झपट्टा मारने के लिए बाज की तरह !

(ओमप्रकाश वाल्मीकि)

नीचे दिए वीडियो लिंक्स में वाल्मीकि जी को कविता पाठ करते देखा-सुना जा सकता है|
अगस्त 1, 2011

‘गंगा’ से घृणा करते दूधनाथ सिंह

मैं गंगा से घृणा करता हूँ
वहाँ मैंने अपनी पत्नी को अग्नि में समर्पित किया
वहाँ हमने अपने नवजात बच्चे को
जल समाधि में अर्पित किया
वहाँ मैंने दोस्तों-दुश्मनों का दाह किया
मैं गंगा में स्नान नहीं करता
मैं गंगा से घृणा करता हूँ
गंगा में मौत की थपक है
मैं गंगातट नहीं जाता
मैं छिप-छिप कर रोता हूँ
आधी रात…
गंगा किनारे…

(दूधनाथ सिंह)

जून 22, 2011

बतकही : जाम

बतकही : आरम्भ ,
सोनिया गाँधी और संघ परिवार ,
और उदारीकरण और भारत
से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

विजय और हरि भी बोले,” सुनील जी बधाई”।

सुनील बैठते हुये बोले,” हमें भी रात ही पता चला बेटे के फोन से। मिठाई आप लोगों के घर पहुँच गयी होगी अभी छोटे बेटे को बोलकर ही चला था कि आप सबके यहाँ मिठाई देकर आये। आप लोग मेरे साथ चलोगे ही घर पर वहीं चाय मिठाई हो जायेगी।”

अजी ये सब तो होता रहेगा। बड़े दिनों बाद ढ़ंग की धूप निकली है जरा आनन्द तो उठा लें धूप का। हरीश जी बोले।

हाँ ये भी ठीक है। यहाँ धूप में गपशप कर लें। लौटते समय हमारे यहाँ से होकर निकल लेना। सुनील बोले।

आप तो कुछ समय पहले बता भी रहे थे कि बेटे का प्रमोशन ड्रयू है। विजय बाबू ने कहा।

हाँ होना तो पिछले साल फरवरी में ही था पर कोई कमीशन बैठा था उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही इस जनवरी में आदेश हो पाये।

चलिये अब तो हो गया प्रमोशन। उसने तो वेलिंग्टन कालेज वाला कोर्स भी कर रखा है। अब तो काफी आगे तक जायेगा।

देखिये विजय बाबू जाना तो चाहिये ऊपर तक। बाकी सब तो किस्मत है। सुनील ठण्डी साँस छोड़कर बोले।

अजी सही उम्र में सब कुछ हो रहा है जायेगा कैसे नहीं अपनी निर्धारित प्रगति तक? पर आप ये तो बताओ कहाँ रह गये थे आप हम लोग तो कब से आपकी राह देख रहे हैं। रहा है जैसे पूरा बाजार ही घर ले आये हो। अशोक ने कहा।

गया था मिठाई लेने। एक दो काम और भी थे घंटाघर की तरफ। सोचा पहले वहीं के काम निबटाता चलूँ। वहाँ से काम करके वापिस आने ही लगा था कि पाया कि छात्रों का जलूस निकल रहा है विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनावों के ​सिलसिले में। ऐसा जाम लगा कि एक घंटे से ज्यादा वहीं फंसे रहे न आगे जा सके न पीछे। सुनील रोष से बोले।

एक तो शहर की सड़कें ही इतनी चौड़ी हैं कि मुश्किल से एक ही गाड़ी निकल पाती है और ऊपर से बाजार में इतनी भीड़ हो गयी है कि अब तो ट्रैफिक के कारण डर और लगता है बाजार जाने में। ये भीड़ भड़क्का कहीं आने जाने लायक छोड़गा ही नहीं इस शहर को। वहीं पैदल, साइकिल, रिक्शा चल रहे हैं वहीं घोड़ा ताँगा और वहीं स्कूटर, मोटरसायकिल, कार, बसे और ट्रक चल रहे हैं। बस एक रेल की कमी रह गयी है। और मंडी की तरफ तो बहुत ही बुरा हाल है। हम तो चला नहीं पाते बाजार में कोई भी वाहन। एक जगह खड़ा करके पैदल ही काम निबटाते हैं। विजय बाबू शिकायती लहजे में बोले।

अजी इतने ट्रैफिक में भी इन लड़कों को देखो कैसे सायं सायं करते हुये आड़े तिरछे चलाते हैं मोटरसायकिल। और मोटरसायकिल तो हो गया है पुराना शब्द। अब तो सीधे बाइक बोला जाता हैं। एक भी हेलमेट नहीं लगाता और रोज एक्सीडैन्ट होते हैं इनके और या तो ये बाइक वाले खुद चोट खाते हैं या दूसरों को चोट देते हैं। अशोक ने कहा।

अशोक बाबू कहीं न कहीं घर के लोग भी जिम्मेदार हैं। बारह चौदह साल के लड़कों को बाइक दे देते हैं और लड़कियाँ ही कौन सा कम हैं जब से सेल्फ स्टार्ट वाले दुपहिया वाहन आ गये हैं लड़कियाँ भी दौड़ी घूम रही हैं। लाइसेंस लेने की उम्र हुयी या न हुयी हो बस बाइक लेकर निकल पड़ते हैं शहर में। सुनील बोले।

सुनील जी बच्चे भी क्या करें। स्कूल कालेज से छुटकर कोई कोचिंग करने जा रहा है कोई कुछ अन्य रूचि की चीज सीखने जा रहा है। समय बदल गया है और लोगों की जरूरतें भी पर शहर की सुविधायें वहीं की वहीं हैं जहाँ बीस तीस साल पहले थीं। सड़कें तो उतनी ही चौड़ी हैं और संख्या में गाडि़याँ बढ गयी हैं बेतहाशा जाम न लगे तो क्या हो। विजय ने कहा।

हरि बोले,” जाम लगने की अच्छी बात कही। परसों का सुनो। पिछले हफ्ते नातिन आयी हुयी थी नये साल की छुट्टियाँ मनाने पर यहाँ आकर उसे लग गयी ठंड। तो मैं उसे छोड़ने रूड़की चला गया। रात में सोचा कि जब रूड़की तक आ गया हूँ तो अगले दिन सुबह जल्दी हरिद्वार जाकर वहीं से वापसी की बस ले लूँगा। बस सुबह हरिद्वार पहुँच गया और गंगा जी के दर्शन करके बारह बजे की बस ले ली सोचा था पाँच नहीं तो छह घंटे में घर पहुँच ही जाऊँगा। रूड़की तक पहुँचते-पहुँचते आँख भी लग गयी। नींद खुली तो पाया कि बस रूकी हुयी थी। दूर दूर तक गाडि़याँ ही गाडि़याँ दिखायी दे रही थीं। बड़ा तगड़ा जाम लग रहा था। बस में चाट और मूंगफली बेचने वाले लड़के चढ़े तो मैने पूछा कि माजरा क्या है और कहाँ रूके हुये हैं। उसने बताया कि पुरकाजी से करीब आधा किमी पहले बस खड़ी है और पहले आगे ​सिखों का कोई जलूस निकल रहा था और जिसके कारण पुरकाजी के दोनों ओर जाम लग गया जो अब इतनी खराब ​स्थिति में पहुँच चुका है कि जल्दी खुलने वाला है नही। बस से नीचे उतरे तो देखा बसें, ट्रक, ट्रैक्टर अपनी लम्बी ट्रालियों सहित, कारें,  और भैंसा-बुग्गी, आदि सब कुछ आपस में गडमड होकर फंसे हुये थे। दर्जनों ट्रक तो गन्ने से लदे दिखायी दे रहे थे। दो तीन सेना के ट्रक भी दिखायी दे रहे थे।

थोड़ा रूककर हरि बोले,” दिखायी तो दे ही रहा था कि जाम जल्दी खुलने वाला है नहीं पर दिल को कैसे राहत हो। हर आदमी को जल्दी होती है। नीचे खड़े लोगों में से कुछ जलूस को कोस रहे थे कि इसे भी आज ही निकलना था। जलूस वाले तो अपना काम कर गये पर इस जाम में फंसे लोगों के कामों का क्या होगा।

अशोक बोले,” जब से डा. मनमोहन ​सिंह पी.एम बने हैं तबसे सिखों में जोश भी बहुत ज्यादा आ गया है। रोज़ ही इनके जलूस निकल रहे हैं”।

हरि हँस कर बोले,” अजी और क्या अब तो पहली बार सेना प्रमुख भी एक ​सिख बने हैं। जोश तो आना ही चाहिये। सही मायने में नारा सही हो गया है कि राज करेगा खालसा। पर अभी कुछ साल पहले ही तो खालसा के तीन सौ साल पूरे होने के जश्न मनाये गये थे। अब कौन सा अवसर आ गया इतना बड़ा जलूस निकालने का। और वह भी पुरकाजी जैसी छोटी जगह में?”

अब सरकार को गम्भीरता से सोचना चाहिये इन धार्मिक और राजनीतिक जलूसों के बारे में कोई नीति बनाने के बारे में। रोज ही कोई न कोई जलूस निकल रहा है और जनता परेशान होती रहती है। हर सम्प्रदाय और राजनीतिक दल को इस जलूस निकालने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिये। विजय ने कहा।

सुनील भी सहमति में बोले,” हाँ जी कोई जनहित याचिका होनी चाहिये इस पर भी। सुप्रीम कोर्ट आदेश देगा तब ही कुछ हो पायेगा। कोई भी सरकार अपने आप कुछ करने वाली है नहीं ऐसे मामले में सबको सबके वोट चाहियें। फिर यहाँ तो ये हाल है कि दूसरे सम्प्रदाय और दूसरे दल के जलूस आदि खराब हैं और हमारे तो मतलब से ही निकलते हैं।”

हरि ने कहा,” अजी आप आगे तो सुनो जाम की बात। हमारी बस के एक यात्री ने अपने मोबाइल से किसी को फोन किया तो पता चला कि वे महाशय भी इसी जाम में फंसे हुये हैं जबकि वे हमारी बस से दो घंटे पहले वाली बस से चल पड़े थे। मतलब दो घंटे पहले से तो जाम लगा ही हुआ था। हमारी बस करीब दो बजे जाम में आकर रूकी थी और करीब चार बजे जाम खुलने पर खिसकी। रात़े साढ़े आठ बजे घर पहुँचे। रास्ते में कहीं मौका नहीं लगा कि घर पर फोन करके बता दें। बस वाला फिर कहीं रूका ही नहीं सवारियों को उतारने के अलावा।”

हाँ जी चिन्ता तो हो ही जाती है घर पर। मोबाइल का बड़ा फायदा है ऐसे समय। कहीं भी फंसे हों ऐसी ​स्थिति में कम से कम घर पर फोन से बता तो सकते हैं। अशोक ने कहा।

उस दिन तो हमें भी मोबाइल के फायदे नजर आये। पर सबसे खराब लगा एक एम्बूलैंस को देखकर। जब जाम खुला तो थोड़ा सा चलने के बाद ही हमारी बस को क्रॉस किया एम्बूलैंस ने। कहीं पास में दुघर्टना हुयी होगी और घायल लोग भी कब से जाम में फंसे पड़ होंगें। एम्बूलैंस लगभग जाम के बीच में फंसी हुयी थी। ना तो रूड़की की तरफ जा सकते थे और ना ही वापस मुजफ्फरनगर की ओर। छोटे बच्चों का अलग बुरा हाल था। हरि बोले।

जलूस निकालने वालों या जाम लगाने वालों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि उनके काम का दूसरे लोगों पर क्या फर्क पड़ रहा हैं। ये लोग तो अपनी ही धुन की ऊर्जा से भरे हुये होते हैं इन्हे कुछ दिखायी नहीं देता अपनी जरूरत के ​सिवा। विजय ने कहा।

सुनील बोले,” सड़क जाम करना तो सबसे आसान काम है अपने देश में। इलाके का ट्रांसफारमर फूक गया है तो सड़क जाम कर दो। सरकार की किसी बात से नाराजगी है तो सड़क जाम कर दो। ये सरकार को संदेश पहुँचाने का एक आसान तरीका लगता है लोगों को। जाम वाले ये नहीं सोचते कि सड़क पर चल कौन रहा है किसे अपने काम पर जाने की जल्दी है? उनके जैसे ही जनता के आम लोग। इन मंत्रियों और बड़े अधिकारियों का क्या फर्क पड़ता है ऐसे जामों से। भुगतना तो आम आदमी को ही पड़ता है”।

एक और बात भी तो है किस तरह सरकार तक अपनी आवाज पहुँचायी जाये। खैर छोड़ो इस बात को। तो सुनील जी जी शहर में आज छात्रों का चुनाव प्रचार चल रहा है। अशोक ने पूछा।

हाँ कारों की छतों पर बैठकर छात्र छात्रायें चुनाव प्रचार कर रहे थे। इतनी कारें, स्कूटर, मोटरसायकिलें थीं उन लोगों के काफिले में कि अचरज होता है सोचकर कि ये कालेजों के छात्रसंघ के चुनाव के लिये प्रचार हो रहा है। ऐसा लगता था जैसे एम.एल.ए या सभासद के चुनाव के चुनाव के लिये निकले हों।

अरे छात्रसंघों के चुनावों से लाभ क्या होना है इन कालेजों और विश्वविद्यालयों का। चारों तरफ दीवारें पोस्टरों से पाट देते हैं। चुनाव तो ये लोग ऐसे अन्दाज़ में लड़ते हैं जैसे विधायकी या सांसदी का चुनाव लड़ रहे हों। ऊपर से चुनाव में होने वाले इन इन लोगों के झगड़े। हरि बोले।

विजय बोले,”चुनाव की जरूरत क्या है और चुनाव हो भी तो प्रत्याशियों के लिये पढ़ाई में मेरिट सबसे बड़ा क्राइटेरिया होना चाहिये। अभी तो ये हाल हो गया है कि चुनाव वे छात्र लड़ते हैं जिनका पढ़ने लिखने से कोई मतलब नहीं रह गया है। राजनीति तो कालेज स्तर से ही खराब हो जाती है। वहीं से युवा लोग गुंडों के सामने नत-मस्तक होना सीख जाते हैं क्योंकि जहाँ बहुमत शिक्षा प्राप्त करके अपना जीवन संवारने के लिये वहाँ जाता है वहीं राजनीतिक महत्वाकांक्षा लिये हुये गुंडे टाइप युवा सिर्फ राजनीति चमकाने कालेजों में पड़े रहते हैं और अच्छे विधार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं”।

…जारी…

जून 6, 2011

बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमों ने भारत को हलचल से भर दिया है। कहीं कोलाहल है तो कहीं चुपचाप देखा जा रहा है कि आगे क्या होगा। कल, विजय, अशोक, हरि और सुनील, चार बुजुर्ग मित्रों की रोज़ाना होने वाली बैठक एक बहस-गोष्ठी में बदल गयी। बहुत समय बाद चारों के दिमाग और ज़ुबान दोनों ही राजनीतिक तेवरों से ओत-प्रोत हो रहे थे।

आम तौर पर चारों सुबह दस बजे किसी भी एक के घर मिल बैठ दुनिया जहान की बातें किया करते हैं। दोस्ताना माहौल में वक्त्त अच्छा बीत जाता है। सुख-दुख की बातें हो जाती हैं।

मजमा विजय के घर पर लगा। चारों के हाथों में अलग-अलग अखबार थे।

विजय बाबू ने गहरी साँस भ्रने के बाद गम्भीर स्वर में कहा,” घटनाक्रमों ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सारे मामले के बहुत सारे पहलू उजागर हुये हैं”।

हरि – विजय जी, एक बात तो तय है कि अनशन को तोड़ने के लिये आधी रात को पुलिस बल से जैसी हिंसक कारवाही करवायी गयी है उस निर्णय ने जैसी किरकिरी कांग्रेस पार्टी और सरकार की की है, उसका कलंक आसानी से हटने वाला है नहीं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत का इससे अच्छा उदाहरण हो नहीं सकता।

सुनील – ये तो सही कहा आपने हरि भाई। पर विजय बाबू आप कुछ सवाल और पहलुओं की बात कर रहे थे। कुछ बताओ।

अशोक – हाँ पहले आप ही बताओ आपको क्या दिखता है इस मामले में?

विजय – पहली बात तो यही है कि बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के अनशन के समय से ही सार्वजनिक रुप से मीडिया को दिये साक्षात्कारों में बार-बार कह रहे थे कि वे जून के पहले हफ्ते से अपने एक लाख समर्थकों के साथ भ्रष्टाचार और काले धन की विदेश से वापसी जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिये सरकार पर उचित कार्यवाही करने के लिये दबाव बनाने के लिये अनशन पर बैठेंगे। सरकार कहती है कि अनुमति सिर्फ योग-शिविर लगाने के लिये ली गयी थी। अगर ऐसा था तो दिल्ली में जब रामलीला मैदान में शिविर लगाये जा रहे थे तभी सरकार ने उचित कदम क्यों नहीं उठाये? बाबा रामदेव के दिल्ली पहुँचने के बाद भी उनसे स्पष्ट क्यों नहीं कहा कि शिविर की अनुमति के साथ वे शांतिपूर्ण ढ़ंग से भी वहाँ अनशन पर नहीं बैठ सकते।

हरि – सही कह रहे हो विजय बाबू, जब बाबा रामदेव और सरकार दोनों को पता था कि अनुमति सिर्फ योग शिविर लगाने की ली गयी है और सरकार अनशन के दूसरे या तीसरे दिन कानूनी कार्यवाही कर सकती है तो क्यों हजारों लोगों की जान को जोखिम में डाला गया? अनशन से पहले दिन टीवी पर ऐसी बातें भी उठ रही थीं कि रामलीला मैदान में योग शिविर ही रहेगा और अनशन जंतर-मंतर पर किया जायेगा। सरकार के चार बड़ी मंत्रियों ने हवाई-अड्डे पर ही बाबा रामदेव को पकड़ कर क्या इस बात की संभावना उनके दिमाग से हटा दी कि जंतर-मंतर पर अलग से अनशन करने की जरुरत नहीं है और सरकार से बातचीत से उचित हल निकल आयेगा, और बाबा रामदेव जंतर मंतर को भूलकर रामलीला मैदान में ही अनशन की लीला दिखाने लगे और उन्हे लगता था कि सब कुछ ठीक पटरी पर चल रहा है और सब ऐसे ही निबट जायेगा? हमें तो घपला लगता है मामले में।

सुनील – जब अनशन की पहली ही शाम आते आते सरकार और बाबा रामदेव में वार्ता टूट गयी तो क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता था कि अनशन स्थल पर बैठे हजारों लोगों की जान की सलामती की फिक्र करती? सरकार का बाबा रामदेव से कुछ भी रिश्ता हो, कोई भी सरकार हजारों लोगों की भीड़ की जान के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है? बहुत शोर मचाकर कहा जा रहा है कि सांसद संवैधानिक रुप से जनता द्वारा चुने गये हैं तो ऐसे समय में संविधान की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाते हुये इन्ही सांसदों से बनी सरकार ने हजारों लोगों की जान जोखिम में डालते हुये पुलिस को आधी रात को लोगों को वहाँ से हटाने के लिये भेजा? कैसे पुलिस को आदेश देने वाले मंत्रियों ने नहीं सोचा कि अगर पुलिस की लाठियों से लोग बच भी गये तो भगदड़ में महिलायें, बच्चे और वृद्ध अपनी जान बचा पायेंगे या घायल होने से बच पायेंगे? सरकार अनशन पर बैठे लोगों को दिन में नोटिस देकर कुछ घंटे का समय नहीं दे सकती थी जिससे लोगों को पता चल जाये कि सरकार की मंशा अब रामलीला मैदान से लोगों को हटाने की है। अगर अनशन अवैध था तो कोर्ट से नोटिस लाया जा सकता था। पर किसी तरह से भी संविधान का सम्मान न करते हुये लोगों को सबक सिखाने के लिये पुलिसिया कार्यवाही की गयी।

अशोक – अरे सरकार की बदमाशी है। यह सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास दिखावा है। इन्होने ही तो इमेरजैंसी लगवायी थी, तभी भाजपा राजघाट पर अनशन में बैठ गयी है इनकी करतूतों के विरोध में।

विजय – अशोक बाबू भाजपा भी दूध की धुली नहीं है। राजघाट में कब से उसकी श्रद्धा हो गयी? कल्याण सरकार के दिन भूल गये क्या? कैसे गांधी को पानी पी पी कोसा जाता था। गाँधी से इनका क्या लेना देना। बल्कि किसी भी दल का कुछ लेना देना नहीं है गाँधी से। उन्हे तो अलग ही रखें।

सुनील – कांग्रेस नियंत्रित सप्रंग सरकार की दूसरी पारी के आरम्भ से ही भाजपा निष्क्रिय स्थिति में पड़ी हुयी थी। उसे राजनीतिक जमीन नहीं मिल रही थी। पांच साल का इंतजार उसे और निष्क्रिय बना देता। कांग्रेस की सरकार ने भाजपा में जान डाल दी। उसे मुकाबले में खड़ा कर दिया। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को संघ की ओर धकेल दिया। सबको लगता था कि कांग्रेस नियंत्रित सरकार की दूसरी पारी आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और कहीं कई अड़चन नहीं आयेगी। ताजे घटनाक्रमों ने दिखा दिया है कि सरकार की आगे की राह मुश्किल हैं। सरदार जी ने माथे पर कलंक लगवा ही लिया। इतिहास तो उन्हे ऐसे प्रधानमंत्री के रुप में याद करेगा जिसकी सरकार ने रात में सोते हुये स्त्री-बच्चों, बूढ़ों और अनशनकारियों पर लाठियाँ बरसवायीं। उन्हे घायल किया और उनकी जान को जोखिम में डाला।

हरि- कांग्रेस की सरकार ने तो भाजपा को थाली में सजाकर मौका दे दिया है। इससे ज्यादा खुश भाजपा और अन्य विपक्षी दल कभी भी नहीं हुये होंगे, पिछले पांच-सात साल में।

अशोक- अजी भाजपा निष्क्रिय नहीं थी। उसी ने मुद्दा उठाया था काले धन की वापसी का, भ्रष्टाचार के खात्मे का।

विजय- अशोक जी भाजपा की ईमानदारी तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के मामलों में चमक ही रही है। गुजरात के मामले में उसकी नैतिकता भी जगजाहिर रही है!

सुनील – भाजपा की बात छोड़ो। मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार बार उठ रहा है – क्या शुरु में बाबा रामदेव से मीठी मीठी बातें करने के कुछ घंटो बाद सरकार को वस्तुस्थिति का एहसास हुआ कि अगर बाबा रामदेव के अनशन के कारण उनकी माँगें मानी गयीं तो यह बाबा रामदेव की जीत कहलायेगी और सरकार द्वारा उठाये गये कदम मजबूरी में उठाये गये कदम कहलायेंगे और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ नहीं मिल पायेगा।

हरि – सरकार के किन्ही भी सलाहकारों ने ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही करने की सलाह दी हो और उस पर दबाव डाला हो, क्या कांग्रेस को इस घटना के बाद किसी किस्म का राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? इसमें पूरा संदेह है।

विजय- कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस मायावाती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल में उ.प्र पुलिस द्वारा किसानों पर अत्याचार कराने को लेकर संघर्षरत थी। अब उसकी खुद की सरकार ने वैसा ही कर दिया है। कांग्रेस के पास अब नैतिक चेहरा है ही नहीं किसी अन्य सरकार द्बारा पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही कराये जाने की निंदा करने का। भारत की जनता हमेशा से ही शोषित के पक्ष में रही है और अब पुराना समय नहीं रहा जब किसी तरह की कोई भी खबर दबायी जा सकती थी। इस इलेक्ट्रानिक युग में कांग्रेस ने ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है और इसका राजनीतिक खामियाजा या तो अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देगा या फिर उसकी सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि वह बड़ी संख्या में दूसरे दलों पर निर्भर हो जाये।

सुनील- देश अगली बार फिर से कई दलों की मिली जुली सरकार के चंगुल में फंसता दिखायी दे रहा है। कांग्रेस का उ.प्र अभियान भी गड्ढ़े में पड़ा समझिये। दुख की बात है कि दो दशकों से ज्यादा समय से उ.प्र क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों द्वारा संचालित हो रहा है। विकास कार्य लगभग ठप रहे हैं। वैसे भी पाँच नहीं तो दस साल में सरकारें बदल जानी चाहियें। तभी संतुलन ठीक बना रहता है।

अशोक – कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव के अनशन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है। अगर ऐसा है भी तो जब हवाईअड्डे पर सरकार के बड़े मंत्री उनकी अगुवाई करने गये थे तब भी उन्हे इस बात का पता होगा। अगर पता था और उन्हे इस बात से परहेज था तो उन्होने अनशन को शुरु ही क्यों होने दिया?

सुनील- अशोक जी आपकी इस बात से सहमति है। अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो इस संगठन को कानून का सहारा लेकर प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो कांग्रेस और इसके द्वारा नियंत्रित सरकार आर.एस.एस द्वारा समर्थित और नियंत्रित भाजपा के सांसदों से परहेज क्यों नहीं करती? उन्हे संसद से बाहर का रास्ता दिखा दे। उन्हे किसी भी कमेटी में न रखे। आखिरकार भाजपा को तो आर.एस.एस का पूरा समर्थन है। ऐसा कैसी हो सकता है कि भाजपा के सांसद तो स्वीकार्य हैं पर जो सांसद नहीं हैं और जिन पर शक है कि आर.एस.एस उन्हे समर्थन देता है, वे स्वीकार्य नहीं हैं।

विजय- सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे, जो भारत को खाये जा रहे हैं, को लेकर जनता को ठोस हल चाहिये और उसे इस बात से क्या मतलब कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये जा रहे प्रयास को आर.एस.एस समर्थन दे रहा है या कोई अन्य संगठन।

हरि- अरे अगर ऐसा है तो आर.एस.एस को देशद्रोही साबित करके प्रतिबंधित कर दो, कानूनी राह पर चला दो और अगर ऐसा साबित हो जाता है तो जनता चूँ भी नहीं करेगी।

विजय- मेरी समझ में तो ऐसा पैरानोइया आता नहीं। आप ये जानो कि जब भाजपा राजनीतिक दौर के शिखर पर थी तब भी उसे केवल 26% मतों का समर्थन हासिल था और जो अब घटकर 20% के आसपास आ गया है। देश की कुल आबादी का 75-80% हिन्दुओं को माना जा सकता है तो ऐसा तो है नहीं कि सभी हिन्दु भाजपा को समर्थन देते हैं और मत देते हैं। फिर क्यों इतनी हायतौबा, क्यों इतना भय? यह देश मुख्यतः सेकुलर रहा है और रहेगा।

…जारी…

बतकही 2 -बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस

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