Archive for जनवरी, 2015

जनवरी 31, 2015

महाभारत

शकुनि को पूरा विश्वास था किHusain

अबकी बार बारी कौरवों की है।

क्या उसे ध्यान नहीं आया दुर्योधन की नयी दुरभिसंधि का ?

अपने परिवार के वृद्ध परिजनों को चुप कर देने का अभियान ?

 

 

ऐसा नहीं है कत्तई

कि युद्ध में विजेता वे होते हैं

जो किसी युद्ध में हुआ करते हैं योद्धा ।

सच तो यह है,

कि विजेता होते हैं वे,

जो होते हैं, उस युद्ध के प्रायोजक ।

और अब वे मांगेंगे अपने-अपने पारितोषिक

एक एक रथ के लिए, दस दस रथ,

हर एक अश्व के बदले सौ-सौ घोड़े।

 

 

क्या नीतियां अलग और भिन्न होतीं

यदि विजयी हुए होते पांडव ?

नीतियों का तो नहीं होता कोई अर्थ,

महत्वपूर्ण होती है तत्परता।

सत्य भी नहीं होता कोई मुद्दा,

महत्वपूर्ण होता है यह

कि झूठ को कौन कितनी अच्छी तरह से बेच सकता है।

 

शब्दाडंबर असत्य को बेहतर ढंग से छुपाते हैं

संकोच और संयम के मुकाबले,

और यदि धर्म का हो पीठ पर हाथ,

तब तो हो जाता है चमत्कार।

 

जीते कोई भी कोई युद्ध,

हर बार मारे जाने वाले लोग वही-वही होते हैं।

उन्हीं की हुआ करती हैं विधवाएं,उन्हीं के होते हैं अनाथ।

 

जितना चतुर-चालाक शासन,शत्रु की उतनी तत्काल मृत्यु।

 

इसका नहीं है कोई अर्थ कि क्या जला …

खांडव या लंका ?

धुएं का रंग है काला,

जिसमें से आती है जले हुए पक्षियों, वृक्षों

और आदिवासियों की गंध।

 

अभी तो बहुतेरे वनों की कटाई है शेष,

बहुत से खदानों का होना बाकी है उत्खनन।

कुछ बलिदान तो अनिवार्य ही हुआ करते हैं,

उन्हें टाला नहीं जा सकता।

पेड़ों पर लटकेंगे अभी और भी कई शव,

कुछ और भी शव ढोये जायेंगे चप्पुओं-नौकाओं में।

 

जो अशक्त है,

वह जीवित है किसी तरह,

अनाम, भूमिहीन,

परंतु यही तो है पांडवों की विरासत

अपने समूचे सामर्थ्य के साथ ढोई जाती हुई।

 

संजय अंधे को अंधा बनाये रखेगा,

विजेता के पक्ष में करता रहेगा वह हर घटना की व्याख्या,

बस, सिर्फ भूत-प्रेतों के मुंह बंद रखने की आवश्यकता है।

 

मान लो,

वे जो मरे पांडवों के पक्ष में लड़ते हुए

और उनके साथ कौरव

किसी साझा जुलूस में एक साथ उठ खड़े हों ?

 

नदियों को तो हम जोड़ सकते हैं, लेकिन पहाड़ ?

 

कैसे कोई तय करेगा कि जो सो रहे हैं, वे सोये ही रहेंगे सदा ?

 

क्या अब वे कोई नया महाकाव्य लिखेंगे,जिसमें न पांडव होंगे न कौरव ?

 

शकुनि यह भी समझता है

दस साल, मात्र दस वर्ष उसे चाहिये

कोई भी निर्धन तब नहीं रहेगा जीवित

और

नये शिशुओं को जन्म देने का साहस

नहीं कर पायेंगी स्त्रियां।

 

( के. सच्चिदानंदन  )   अनुवाद – (उदय प्रकाश)

(10 जून, 2014 को, सुप्रसिद्ध भारतीय कवि के. सच्चिदानंदन की मलयालम में लिखी कविता के उन्हीं के द्वारा अंग्रेज़ी में अनुदित पाठ के आधार पर अनुवाद )

साभार : उदय प्रकाश

Advertisements
जनवरी 31, 2015

आम आदमी पार्टी : दिल्ली में सरकार के 49 दिन

AAP Cartoon2ऊंचे स्थानों से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए एक मजबूत और प्रभावी लोकपाल की मांग को लेकर देश भर में शुरू हुए एक लोकप्रिय आंदोलन से आम आदमी पार्टी का गठन हुआ। स्वच्छ राजनीति के एक नए युग की शुरूआत के साथ आम आदमी पार्टी को 2013 में पहली चुनावी पारी में दिल्लीवासियों से उल्लेखनीय समर्थन मिला और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी। आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा में जनलोकपाल बिल को पारित करना चाहती थी लेकिन भाजपा और कांग्रेस आपस में मिल गई और, दिल्ली विधानसभा में जन लोकपाल बिल को पास नहीं होने दिया । अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली सरकार समझ गई कि अल्पमत में रहते हुए स्वतंत्र और स्वायत्त लोकपाल को पारित करा पाना नामुमकिन है। और, अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा देने का फैसला किया।

हालांकि, 49 दिन, दिल्ली की आम जनता को आम आदमी पार्टी के सरकार चलाने के तरीके, सुशासन को दिखाने के लिए पर्याप्त थे। आम आदमी पार्टी ने समयबद्ध तरीके से अपने वादों को लागू किया-

  • 400 यूनिट तक बिजली बिल आधा किया
  • बिजली वितरण कंपनियों के ऑडिट के आदेश दिए
  • बीस किलोलीटर तक पानी मुफ्त किया।
  • पानी माफियाओं का सफाया, दिल्ली जल बोर्ड व अन्य सभी सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, पानी टैंकर के संचालन की सूची सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई गई, इसका फायदा आम जनता को हुआ।
  • दिल्ली जल बोर्ड से संबंधित घोटाले में तीन एफआईआर दर्ज किए गए, दिल्ली जल बोर्ड के 800 कर्मचारियों को स्थानांतरित किया गया और तीन वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित किया गया।
  • व्यापारियों की रक्षा और नौकरियों के नुकसान को रोकने के लिए खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रवेश पर रोक
  • मोहल्ला सभा के माध्यम से विधायक विकास कोष के उपयोग पर आम जनता की भागीदारी की पहल की आम आदमी पार्टी के विधायकों ने
  • 1984 के सिख विरोधी दंगा पीड़ितो को न्याय दिलाने के लिए एसआईटी के गठन का आदेश

अनुसूचित जाति, जनजाति और कमजोर वर्ग के सदस्यों के स्वरोजगार के लिए 5500 नए ऑटो परमिट

भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों को दर्ज कराने के लिए भ्रष्टाचार विरोधी हेल्पलाइन नंबर की शुरूआत

“वीआईपी” संस्कृति, को समाप्त किया

अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी नियुक्ति देने के लिए समिति का गठऩ

केजी डी 6 घोटाले में आरआईएल अध्यक्ष श्री मुकेश अंबानी, पूर्व केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रियों एम वीरप्पा मोइली और मुरली देवड़ा और पूर्व महानिदेशक हाइड्रोकार्बन वीके सिब्बल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया।

21 करोड़ रुपये शिक्षा छात्रवृत्ति के रूप में वितरित किया

राष्ट्रमंडल खेलों से संबधित स्ट्रीट लाइटिंग घोटाले में एफआईआऱ दर्ज

आम आदमी पार्टी ने जो कहा से किया। पहले भी किया और आगे भी करेंगे।

7 फ़रवरी 2015 को दिल्ली में चुनाव होने है और एक बार फिर से सभी राजनीतिक पार्टियां अपना घोषणा पत्र जारी कर रही है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि अब सभी पार्टियों के घोषणापत्र में पहले जैसी गंभीरता नहीं दीखती। न तो लोगों से अपने वायदों को लेकर और न ही वायदों को निभाने को लेकर। इससे आम आदमी के मन में भी राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठा में कमी आई है। जबकि आम आदमी पार्टी की विचारधारा दूसरी पार्टियों से बिलकुल अलग है। आम आदमी पार्टी निर्वाचित प्रतिनिधियों और लोकतंत्र में आम जनता के विश्वास को फिर से बहाल करना चाहती है।

जनवरी 31, 2015

किरन बेदी , पहली महिला IPS ? दावा झूठा हो सकता है…

सामन्य ज्ञान के विधार्थियों के लिए यह जानकारी रोचक है क्योंकि अगर किरन बेदी स्वतंत्र भारत की पहली महिला IPS नहीं थीं तो आज तक लोगों को एक झूठ बताया जाता रहा और खुद किरन बेदी का ऐसा दावा करना भी झूठा सिद्ध हो जाता है|

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिन से 14 June 1957 के The Times Of India में छपी खबर चल रही है जिसके अनुसार पंजाब कैडर की सुरजीत कौर पहली आई.पी.एस अधिकारी थीं| अगर यह सच है तो आश्चर्य है कि भारत के उस दौर के तमाम आई.पी.एस अधिकारियों ने कभी किरन बेदी के बारे में फैलाये गये दावे को गलत तथ्य घोषित नहीं किया| आई.पी.एस एकेडेमी ने भी सही तथ्य न बता कर अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया| बरसों से जाने सामान्य ज्ञान के कितने प्रश्न पत्रों में किरन बेदी को पहली महिला आई.पी.एस अधिकारी बताकर कितने ही उम्मीदवार उत्तीर्ण हुए होंगे|

FirstIPS

जनवरी 30, 2015

दिल्ली चुनाव : मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल – (उदय प्रकाश)

Aap cartoonयह सिर्फ़ मेरा निजी आब्जर्वेशन है कि अब दिल्ली का चुनाव पूरी तरह से मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल हो गया है। किरन बेदी, जो अब साफ़-साफ प्राक्सी कैंडिडेट हैं, उनकी हास्यास्पद हार को बचाने के लिए (जो दरअसल मोदी हाइप की ढलान का शुरुआती संकेत है) न सिर्फ़ संसार के सबसे ताक़तवर राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा के आगमन, गणतंत्र दिवस की संवैधानिक गरिमा का लोकल इस्तेमाल किया गया, बल्कि लगभग सारा केंद्रीय कैबिनेट, राज्यों के मुख्यमंत्री , बालीवुड के स्टार्स, कार्पोरेट्स के अधीनस्थ टीवी चैनल, धर्म, विकासवादी सम्मोहन और समस्त संसाधनों को झोंक दिया गया।
लगता है जैसे यह हस्तिनापुर का युद्ध है, जिसमें अकेला अभिमन्यु कुरु सैन्यविशारदों के चक्रव्यूह को भेदने और पार पाने के लिए जूझ रहा है।
हर रोज़ एक व्यूह दरकता है और हर रोज़ एक और व्यूह रच लिया जाता है।
अन्ना हज़ारे समेत उन सबको अब समझ लेना चाहिए कि यह उनकी भूमिका का सबसे निर्णायक समय है। यह समय तय कर देगा कि कौन किस पक्ष में खड़ा था।
हो सकता है यह आकलन एक मासूम अराजनीतिक आकलन हो, लेकिन यह कार्पोरेट पावर और आम नागरिक के बीच की निर्णायक लड़ाई है।
मैजिक अब उतार पर है।
साफ़ है।

साभार : टिप्पणी – उदय प्रकाश ( हिंदी के प्रसिद्द लेखक)

कार्टून – गुरप्रीत

जनवरी 27, 2015

किरन बेदी का समर्थन क्यों संभव नहीं? (कृष्ण बिहारी)

मैं किरण बेदी के खिलाफ क्यों हूँ ?

२ अगस्त २०१२ को मैं दिल्ली में था,  साथ में हिन्दी कथाकार अमरीक सिंह दीप जी भी थे| अन्ना आन्दोलन शिखर पर था| मंच पर केजरीवाल , कुमार विश्वास , अर्चना पूरण सिंह थे, अन्ना तो थे ही, अनुपम खेर भी थे|

लेकिन उस दिन अन्ना हजारे ने अपने संबोधन में कहा था कि दिल्ली की बहरी सरकार कुछ सुन नहीं रही, अब हमें राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ेगी| उस संबोधन से पहले मैंने कभी अन्ना को राजनीतिक होते नहीं देखा-सुना था| मुझे जयप्रकाश नारायण की याद आई और लगा कि १९७७ दुहराया जाएगा| अरविन्द केजरीवाल को पहचानने लगे थे|किरन बेदी और कुमार विश्वास को लोग जानते थे| उस दिन तक राजनीतिक दल ‘आप‘ का गठन नहीं हुआ था| यह जरूर स्पष्ट हो गया था कि कोई दल अस्तित्व में आएगा|

लेकिन जैसे ही ‘आप‘ का औपचारिक रूप सामने आना शुरू हुआ वैसे ही किरन बेदी का सत्ता प्रेमी हुक्मरान भी सामने आने के लिए छटपटाने लगा| चूंकि , अन्ना  हजारे, अरविन्द को ईमानदार के विशेषण से नवाज़ चुके थे इसलिए ‘आप‘ में अरविन्द केजरीवाल ही नम्बर-१ के स्थान पर स्वीकृत हो चुके थे|  किरन बेदी के लिए यह बरगद से बोनसाई होना था| उन्होंने साहिल से भी दूरी बना ली, बाढ़ में उतरने का तो प्रश्न ही नहीं था| जनरल विक्रम सिंह ने तो किरन बेदी से पहले ही भांप लिया कि अरविन्द के सामने उनका व्यक्तित्व भी बौना है और यह कहाँ सुनिश्चित है कि सत्ता के आगे आर्थिक रूप से कमजोर पार्टी ‘आप‘ अपना प्रभाव दिखा सकेगी तो उन्होंने अन्ना से दूरी बनाई और जैसे ही मौका मिला भाजपा में शामिल हो गए|  उन्हें भी अपने जनरल रह चुकने का गुमान कभी सामान्य आदमी बनने नहीं देता| उनका गुमान पार्टी हाई कमान ने कुछ ऐसा कुचला है कि अब वे खुद को खुर्दबीन से खोज रहे हैं| आम आदमी पार्टी बनी| उससे पहले बाबा रामदेव की कुटाई हो चुकी थी| उनका भी अता-पता भाजपा के शक्ति केंद्र बन जाने के बाद ही लगा| उनके योग का महत्त्व आज तो स्थापित हो गया और उनकी चलती दूकान बंद होने से बच गई,  लेकिन यदि कहीं ऐसा नहीं हुआ होता तो एक बार शलवार-कुरता पहनकर जान किसी तरह बच गई थी, दूसरा मौका नहीं मिलना था| उन्होंने भी अरविन्द के मंच से किनारा किया|

आम आदमी पार्टी बनने और चुनाव में हिस्सा लेने के बाद ‘बिन्नी‘ की भूमिका को देश ने देखा है, और इसलिए ‘बिन्नी’ पर कोई बात महत्त्वपूर्ण नहीं है. शाजिया को इस बात की गलतफहमी है कि वे दिल्ली की दूसरी इमाम हैं और पूरी दिल्ली उनके फतवे को सुनकर अमल करेगी| दो-दो चुनाव हारने के बाद भी अपनी कमजोरियों को वे विशेषताएं ही समझती हैं, उन्हें ऐसा समझने से कौन रोक सकता है!

आम आदमी पार्टी की सरकार किन परिस्थितियों में बनी, ४९ दिन तक कैसे चली ? यह सब देश ने देखा है कि दिल्ली विधान सभा में कांग्रेस और भाजपा एक होकर सदन में क्या कर रहे थे ? या कि शोएब ने सदन में क्या किया था ? अब चुनाव एक बार फिर सामने हैं| 

किरन बेदी को सत्ता पर काबिज़ होने का एक मौका भाग्य से फिर मिल गया है, जो वह चाहती थीं| लेकिन, उन्हें जानना चाहिये कि जनता सत्ता और संघर्ष का अर्थ जानती है| वे केवल सत्ता का अर्थ जानती हैं, उनका दिल्ली की जनता के प्रति प्रेम कितना है इसे उनसे बेहतर जनता जानती है| चुनाव में , खासतौर पर भारत में सभी हथकंडे आजमाए जाते हैं, हो सकता है कि वे जीत भी जाएँ लेकिन यह यकीनी तौर पर मान लें कि वे  अरविन्द केजरीवाल के आगे हार चुकी है| और , अरविन्द के खिलाफ चुनाव न लड़कर उनके पहले कदम पर ही हार की मुहर लग गई है…

 

कृष्ण बिहारी (हिंदी के प्रसिद्द लेखक एवं पत्रिका ‘निकट‘ के सम्पादक)

जनवरी 26, 2015

आर के लक्ष्मण : अलविदा ‘कॉमन मैन’ के रचियता

rk laxmanrklaxman2आर के लक्ष्मण ने दशकों तक हिन्दुस्तान को प्रभावित करने वाले सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों को अपने कार्टूनों के जरिये इस तरीके से उभारा कि मुद्दों को हास्य और व्यंग्य के तरीके से समझने की एक परम्परा ने लोगों के अंदर अपनी पकड़ बनाई| उनके कार्टूनों के शिकार बने नेता भी उनके कार्टूनों का उसी बेसब्री से इंतजार किया करते थे जैसा कि आम पाठक किया करता था|

अब आर के लक्ष्मण नहीं रहे और अब “You Said It” में नये कार्टून स्थान नहीं पायेंगे|

उनके कार्टूनों की विरासत से अनभिज्ञ पीढ़ी शायद उस जीनियस परम्परा को नहीं जान पायेगी जो आर के लक्ष्मण उन्होंने शुरू की थी|

 

जनवरी 26, 2015

भारत के विकास का आँकड़ा : 1950 बनाम 2015

1950vs2015

जनवरी 26, 2015

अरविंद केजरीवाल के नाम जयपुर से स्कूल के विधार्थियों का पत्र (26 January 2015)

Jaipur kids

जनवरी 26, 2015

दिल्ली की एक बहादुर लड़की का सन्देश नेताओं के नाम

क्या देश के नेता जागेंगे और महिला सुरक्षा के प्रति संवेदनशील होंगे?

अवकाश प्राप्ति की ओर बढ़ रहे एक विदेशी राष्ट्र प्रमुख के लिए रातों रात दिल्ली में हजारों CCTV कैमरे लग जाते हैं, नेताओं की सुरक्षा में हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात हो जाते हैं पर आम महिला की सुरक्षा के प्रति कोई सरकार कदम नहीं उठाती|

पुरुष की तरह, महिला भी स्वतन्त्र रूप से सुरक्षित महसूस करते हुए देश की राजधानी में विचरण कर सके ऐसी इच्छा बहत बड़ी तो नहीं| इतना अधिकार तो महिलाओं का दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक होने के नाते बनता ही है|

जनवरी 25, 2015

अरविंद केजरीवाल : “पैसे सबसे लेना पर वोट झाड़ू पर ही देना” पर चुनाव आयोग को जवाब

AKpoliceदिनांक: 24/01/2015
सेवा में,
माननीय मुख्य चुनाव आयुक्त
भारतीय चुनाव आयोग, दिल्ली
निर्वाचन सदन,
अशोका रोड, नई दिल्ली
मुझे चुनाव आयोग से नोटिस मिला है। मुझ पर आरोप है कि मैं लोगों को रिश्वत लेने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूं। ये आरोप सरासर गलत है। हमारी पार्टी रिश्वतखोरी के सख़्त खिलाफ है। देश की राजनीति को साफ़ करने के लिए और भ्रष्टाचार दूर करने के लिए ही हमारी पार्टी का जन्म हुआ है। ऐसे में मैं किसी को रिश्वत देने अथवा लेने को प्रोत्साहित करूंगा, ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता।आज इस सच को नहीं झुठलाया जा सकता कि हमारे देश के कई नेता और पार्टियां पैसे और अन्य सामान बांट कर वोट खरीदते हैं। सरकार, चुनाव आयोग और कई गैर सरकारी संगठनों के सतत प्रयासों के बावजूद यह अभिशाप हमारे देश की राजनीति का अभिन्न अंग बन चुका है।इसे कैसे रोका जाए? राजनीति की इस कुरीति को रोकने के लिए ही हमने ये तरीका अपनाया है। मैंने अपने भाषणों में जो कुछ कहा उसका असली तात्त्पर्य है- ‘‘जो पैसा दे, उससे पैसा ले लो। लेकिन पैसा देने वालो वोट बिल्कुल नहीं दो। वोट अपने मन से दो। वोट उसे दो जो पैसा नहीं दे रहा।’’

अगर मेरे भाषण को ध्यान से सुने तो मेरे कहने का मर्म यही है। अगर मैं कहता कि जो पैसा दे उसी को वोट दो, तब आप मुझ पर इल्ज़ाम लगा सकते थे कि मैं लोगों को रिश्वत देकर वोट डालने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूं। मैं तो इसके बिल्कुल उल्टा कह रहा हूं। मैं तो कह रहा हूं जो पैसा दे उसे वोट बिल्कुल मत दो। इस तरह से तो मैं रिश्वतखोरी रोकने का काम कर रहा हूं। मैं तो आप ही की मदद कर रहा हूं।

हमने पिछले दिल्ली विधानसभा के चुनाव के पहले भी अपने हर भाषण में ये बात कही थी। तब किसी ने कुछ नहीं कहा। मैंने लोकसभा चुनाव के दौरान भी अपने हर भाषण में यही बात कही थी, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा। लेकिन अब भाजपा और कांग्रेस दोनों ने मेरे खिलाफ शिकायत की है। ऐसा क्यों? अब इन्हें क्या तकलीफ़ हो रही है?

ऐसा इसलिए क्योंकि एक साल के अंदर दिल्ली का वोटर धीरे-धीरे समझदार हो गया है। वो भारी संख्या में इस बात को लागू करने लगा है कि जो पैसा देगा उससे पैसा तो ले लेंगे पर वोट उसे कतई नहीं देंगे। इसलिए ये पार्टियां घबरा गईं कि इनका पैसा बेकार हो जाएगा। अब इन पार्टियों को पता चल गया है कि पैसे देकर वोट नहीं खरीद पाएंगे। अब इन पार्टियों को पता चल गया है कि चुनाव के कि चुनाव के दौरान रिश्वतखोरी नहीं चलेगी। इसलिए इन दोनों पार्टियों ने घबराकर और बौखलाकर मेरे खिलाफ शिकायत की है।

मैंने तो ये अपील करके हमारी राजनीति की एक गंदी परंपरा को बंद करने की दिशा में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। जिसे मीडिया तोड़-मरोड़कर भ्रष्ट पार्टियों के इशारे पर जनता के सामने गलत रूप से पेश कर रही है. अपने हर भाषण में मैं जनता से पूछता हूँ – ‘‘क्या बीजेपी-कांग्रेस वाले चुनाव के टाइम पैसे देने आते हैं?’’ जनता ज़ोर से चिल्लाकर एक आवाज़ में कहती है- ‘‘हां आते हैं।’’ इसका मतलब वोट खरीदने की परंपरा बहुत बड़े पैमाने पर चल रही है।

पिछले एक साल से मेरी अपील ने इस गंदी परंपरा को तोड़ने में बहुत अहम्‌ भूमिका निभाई है। इसीलिए ये दोनों पार्टियां बुरी तरह से घबरा गई हैं। और इसलिए इन्होंने आपके समक्ष मेरी शिकायत की है।

आपको याद होगा कि जब मैं मुख्यमंत्री बना तो मैंने दिल्ली के लोगों को रिश्वतखोरी पर कुछ इसी तरह का आह्‌वान किया था। मेरा आह्‌वान कई लोगों को अटपटा लगा। कुछ लोगों का मानना था कि मैं रिश्वतखोरी को प्रोत्साहन दे रहा हू। लेकिन आपने देखा कि मेरी इस अपील ने भ्रष्ट कर्मचारियों के मन में ऐसा खौप़ पैदा कर दिया कि उन 49 दिनों में दिल्ली में रिश्वतखोरी लगभग बंद हो गई थी।

उस वक्त भी मैंने रिश्वतखोरी बंद करने के लिए जनता से मदद मांगी थी और आज भी रिश्वतखोरी बंद करने के लिए जनता से ही मदद मांग रहा हूं।

आज जब मैं दिल्ली के वोटरों से ये अपील कर रहा हूं कि पैसा सब से ले लो, लेकिन वोट उस पार्टी को दो जो आपको पैसा नहीं दे रही। कुछ लोगों को मेरी अपील अटपटी लग सकती है। लेकिन राजनीति को साफ़ करने में इस अपील ने एक अहम भूमिका निभाई है। और दोनों पार्टियों की बौखलाहट में इसका असर दिखाई देता है।

कानूनी रूप से भी मैंने और मेरे वकीलों ने कानून में दी गई ‘‘रिश्वतखोरी’’ की परिभाषा को अच्छे से पढ़ा है। कानूनन भी मेरी अपील किसी भी तरह से रिश्वतखोरी की अपील नहीं मानी जा सकती। आपके नोटिस कानूनी रूप से जवाब इस पत्र के साथ में संलग्न है।

मैं चुनाव आयोग की बहुत इज्ज़त करता हूं। मैं हमारे संविधान और कानून की भी बहुत इज्ज़त करता हूं। मैं किसी भी हालत में कोई कानून नहीं तोड़ूंगा। मेरी उपर दी गईं दलीलों के बावजूद यदि आपको लगता है कि मेरी अपील गलत है तो जब तक MCC लागू है, तब तक मैं ये अपील करना बंद कर दूंगा। लेकिन मेरी आपसे एक विनती है यदि आप मेरी दलीलों से असहमत हैं तो मुझे एक बार व्यक्तिगत रूप से पेश होकर आपके समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर जरूर दें।

भवदीय,
अरविन्द केजरीवाल!

%d bloggers like this: