Posts tagged ‘Krishna’

अगस्त 26, 2016

कृष्ण कन्हाई… हसरत मोहानी

Krishna1मन तोसे प्रीत लगाई कन्हाई

कहु और की सुरति अब काहे को आई

गोकुल ढूंढ बृंदाबन ढूंढो

बरसाने लग घूम के आई

तन मन धन सब वार के हसरत

मथुरा नगर चली धुनि रमाई

(My heart has fallen in love with Kanhaiya; Why should it think of anyone else? We searched for him in Gokul and Brindaban, let’s now go to Barsana and check that too. Sacrifi ce for him, Hasrat, all that is yours, Then go to Mathura and become a jogi)

– Hazrat Maulana Hasrat Mohani (Rahmatullah Alaih), Poem 2 (2 October 1923; Dīvān 8)

 

अगस्त 25, 2016

श्री कृष्ण — (नज़ीर अकबराबादी)

Krishna1

है सबका ख़ुदा सब तुझ पे फ़िदा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।
हे कृष्ण कन्हैया, नन्द लला !
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इसरारे हक़ीक़त यों खोले ।
तौहीद के वह मोती रोले ।
सब कहने लगे ऐ सल्ले अला ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

सरसब्ज़ हुए वीरानए दिल ।
इस में हुआ जब तू दाखिल ।
गुलज़ार खिला सहरा-सहरा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

फिर तुझसे तजल्ली ज़ार हुई ।
दुनिया कहती तीरो तार हुई ।
ऐ जल्वा फ़रोज़े बज़्मे-हुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मुट्ठी भर चावल के बदले ।
दुख दर्द सुदामा के दूर किए ।
पल भर में बना क़तरा दरिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

जब तुझसे मिला ख़ुद को भूला ।
हैरान हूँ मैं इंसा कि ख़ुदा ।
मैं यह भी हुआ, मैं वह भी हुआ ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

ख़ुर्शीद में जल्वा चाँद में भी ।
हर गुल में तेरे रुख़सार की बू ।
घूँघट जो खुला सखियों ने कहा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

दिलदार ग्वालों, बालों का ।
और सारे दुनियादारों का ।
सूरत में नबी सीरत में ख़ुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इस हुस्ने अमल के सालिक ने ।
इस दस्तो जबलए के मालिक ने ।
कोहसार लिया उँगली पे उठा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मन मोहिनी सूरत वाला था ।
न गोरा था न काला था ।
जिस रंग में चाहा देख लिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

तालिब है तेरी रहमत का ।
बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा ।
तू बहरे करम है नंद लला ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।।                                   (नज़ीर अकबराबादी)

सितम्बर 5, 2015

‘कृष्ण जन्म’ हम जैसा ही था – ओशो

Krishna1कृष्ण का जन्म होता है अँधेरी रात में, अमावस में। सभी का जन्म अँधेरी रात में होता है और अमावस में होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती, सब कुछ जन्म अँधेरे में ही होता है। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अँधेरे में जन्मता है। फूल खिलते हैं प्रकाश में, जन्म अँधेरे में होता है।

असल में जन्म की प्रक्रिया इतनी रहस्यपूर्ण है कि अँधेरे में ही हो सकती है। आपके भीतर भी जिन चीजों का जन्म होता है, वे सब गहरे अंधकार में, गहन अंधकार में होती है। एक कविता जन्मती है, तो मन के बहुत अचेतन अंधकार में जन्मती है। बहुत अनकांशस डार्कनेस में पैदा होती है। एक चित्र का जन्म होता है, तो मन की बहुत अतल गहराइयों में जहाँ कोई रोशनी नहीं पहुँचती जगत की, वहाँ होता है। समाधि का जन्म होता है, ध्यान का जन्म होता है, तो सब गहन अंधकार में। गहन अंधकार से अर्थ है, जहाँ बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुँचता। जहाँ सोच-समझ में कुछ भी नहीं आता, हाथ को हाथ नहीं सूझता है।

कृष्ण का जन्म जिस रात में हुआ, कहानी कहती है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, इतना गहन अंधकार था। लेकिन इसमें विशेषता खोजने की जरूरत नहीं है। यह जन्म की सामान्य प्रक्रिया है।

दूसरी बात कृष्ण के जन्म के साथ जुड़ी है- बंधन में जन्म होता है, कारागृह में। किसका जन्म है जो बंधन और कारागृह में नहीं होता है? हम सभी कारागृह में जन्मते हैं। हो सकता है कि मरते वक्त तक हम कारागृह से मुक्त हो जाएँ, जरूरी नहीं है हो सकता है कि हम मरें भी कारागृह में। जन्म एक बंधन में लाता है, सीमा में लाता है। शरीर में आना ही बड़े बंधन में आ जाना है, बड़े कारागृह में आ जाना है। जब भी कोई आत्मा जन्म लेती है तो कारागृह में ही जन्म लेती है।

लेकिन इस प्रतीक को ठीक से नहीं समझा गया। इस बहुत काव्यात्मक बात को ऐतिहासिक घटना समझकर बड़ी भूल हो गई। सभी जन्म कारागृह में होते हैं। सभी मृत्युएँ कारागृह में नहीं होती हैं। कुछ मृत्युएँ मुक्ति में होती है। कुछ अधिक कारागृह में होती हैं। जन्म तो बंधन में होगा, मरते क्षण तक अगर हम बंधन से छूट जाएँ, टूट जाएँ सारे कारागृह, तो जीवन की यात्रा सफल हो गई।

कृष्ण के जन्म के साथ एक और तीसरी बात जुड़ी है और वह यह है कि जन्म के साथ ही उन्हें मारे जाने की धमकी है। किसको नहीं है? जन्म के साथ ही मरने की घटना संभावी हो जाती है। जन्म के बाद – एक पल बाद भी मृत्यु घटित हो सकती है। जन्म के बाद प्रतिपल मृत्यु संभावी है। किसी भी क्षण मौत घट सकती है। मौत के लिए एक ही शर्त जरूरी है, वह जन्म है। और कोई शर्त जरूरी नहीं है। जन्म के बाद एक पल जीया हुआ बालक भी मरने के लिए उतना ही योग्य हो जाता है, जितना सत्तर साल जीया हुआ आदमी होता है। मरने के लिए और कोई योग्यता नहीं चाहिए, जन्म भर चाहिए।

लेकिन कृष्ण के जन्म के साथ एक चौथी बात भी जुड़ी है कि मरने की बहुत तरह की घटनाएँ आती हैं, लेकिन वे सबसे बचकर निकल जाते हैं। जो भी उन्हें मारने आता है, वही मर जाता है। कहें कि मौत ही उनके लिए मर जाती है। मौत सब उपाय करती है और बेकार हो जाती है। कृष्ण ऐसी जिंदगी हैं, जिस दरवाजे पर मौत बहुत रूपों में आती है और हारकर लौट जाती है।

वे सब रूपों की कथाएँ हमें पता हैं कि कितने रूपों में मौत घेरती है और हार जाती है। लेकिन कभी हमें खयाल नहीं आया कि इन कथाओं को हम गहरे में समझने की कोशिश करें। सत्य सिर्फ उन कथाओं में एक है, और वह यह है कि कृष्ण जीवन की तरफ रोज जीतते चले जाते हैं और मौत रोज हारती चली जाती है।

मौत की धमकी एक दिन समाप्त हो जाती है। जिन-जिन ने चाहा है, जिस-जिस ढंग से चाहा है कृष्ण मर जाएँ, वे-वे ढंग असफल हो जाते हैं और कृष्ण जीए ही चले जाते हैं। लेकिन ये बातें इतनी सीधी, जैसा मैं कह रहा हूँ, कही नहीं गई हैं। इतने सीधे कहने का पुराने आदमी के पास कोई उपाय नहीं था। इसे भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है।

जितना पुरानी दुनिया में हम वापस लौटेंगे, उतना ही चिंतन का जो ढंग है, वह पिक्टोरियल होता है, चित्रात्मक होता है, शब्दात्मक नहीं होता। अभी भी रात आप सपना देखते हैं, कभी आपने खयाल किया कि सपनों में शब्दों का उपयोग करते हैं कि चित्रों का?

सपने में शब्दों का उपयोग नहीं होता, चित्रों का उपयोग होता है। क्योंकि सपने हमारे आदिम भाषा हैं, प्रिमिटिव लैंग्वेज हैं। सपने के मामले में हममें और आज से दस हजार साल पहले के आदमी में कोई फर्क नहीं पड़ा है। सपने अभी भी पुराने हैं, प्रिमिटिव हैं, अभी भी सपना आधुनिक नहीं हो पाया। अभी भी सपने तो वही हैं जो दस हजार साल, दस साल पुराने थे। गुहा-मानव ने एक गुफा में सोकर रात में जो सपने देखे होंगे, वही एयरकंडीशंड मकान में भी देखे जाते हैं। उससे कोई और फर्क नहीं पड़ा है। सपने की खूबी है कि उसकी सारी अभिव्यक्ति चित्रों में है।

जितना पुरानी दुनिया में हम लौटेंगे- और कृष्ण बहुत पुराने हैं, इन अर्थों में पुराने हैं कि आदमी जब चिंतन शुरू कर रहा है, आदमी जब सोच रहा है जगत और जीवन के बाबत, अभी जब शब्द नहीं बने हैं और जब प्रतीकों में और चित्रों में सारा का सारा कहा जाता है और समझा जाता है, तब कृष्ण के जीवन की घटनाएँ लिखी गई हैं। उन घटनाओं को डीकोड करना पड़ता है। उन घटनाओं को चित्रों से तोड़कर शब्दों में लाना पड़ता है। और कृष्ण शब्द को भी थोड़ा समझना जरूरी है।

कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है जिस पर सारी चीजें खिंचती हों। जो केंद्रीय चुंबक का काम करे। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिँचती हैं और आकृष्ट होती हैं।

शरीर खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, परिवार खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, समाज खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, जगत खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आसपास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है, और उसके बाद सब चीजें उसके आसपास निर्मित होनी शुरू होती हैं। उस कृष्ण बिंदु के आसपास क्रिस्टलाइजेशन शुरू होता है और व्यक्तित्व निर्मित होता है। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्म मात्र नहीं है, बल्कि व्यक्ति मात्र का जन्म है।

कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है। महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है। पीछे लौटकर निर्मित होती है।

पीछे लौटकर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है। जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे। और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिंदगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है।

हजारों लोग लिखते हैं। जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएँ होती चली जाती हैं। फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं, एक इंस्टीट्यूट हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं। फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है। इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूँ। कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति रह ही नहीं जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं। और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे हैं, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।

ओशो (कृष्ण स्मृति)

मार्च 1, 2015

भूख – हरिओम पंवार

मेरा गीत चाँद है ना चांदनी है आजकल
ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल
मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
मैं गरीब के रुदन के आंसुओं की आग हूँ
भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ।

मेरा गीत आरती नहीं है राजपाट की
कसमसाती आत्मा है सोये राजघाट की
मेरा गीत झोपडी के दर्दों की जुबान है
भुखमरी का आइना है आँसू का बयान है
भावना का ज्वार भाटा जिए जा रहा हूँ मैं
क्रोध वाले आँसुओं को पिए जा रहा हूँ मैं
मेरा होश खो गया है लोहू के उबाल में
कैदी होकर रह गया हूँ मैं इसी सवाल में
आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को
नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को।

सोचकर ये शोक शर्म से भरा हुआ हूँ मैं
और अपने काव्य धर्म से डरा हुआ हूँ मैं
मैं स्वयम् को आज गुनहगार पाने लगा हूँ
इसलिये मैं भुखमरी के गीत गाने लगा हूँ
गा रहा हूँ इसलिए कि इंकलाब ला सकूं।
झोपडी के अंधेरों में आफताब ला सकूं।।

इसीलिए देशी औ विदेशी मूल भूलकर
जो अतीत में हुई है भूल, भूल-भूल कर
पंचतारा पद्धति का पंथ रोक टोक कर
वैभवी विलासिता को एक साल रोक कर
मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए
झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए

मेहरबानों भूख की व्यथा कथा सुनाऊंगा
महज तालियों के लिए गीत नहीं गाऊंगा
चाहे आप सोचते हो ये विषय फिजूल है
किंतु देश का भविष्य ही मेरा उसूल है
आप ऐसा सोचते है तो भी बेकसूर हैं
क्योकिं आप भुखमरी की त्रासदी से दूर हैं

आपने देखी नहीं है भूखे पेट की तड़प
काल देवता से भूखे तन के प्राण की झड़प
मैंने ऐसे बचपनों की दास्तान कही है
जहाँ माँ की सूखी छातियों में दूध नहीं है
यहाँ गरीबी की कोई सीमा रेखा ही नहीं
लाखों बच्चे हैं जिन्होंने दूध देखा ही नहीं
शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते हैं वे
कुत्ते जिसे चाट चुके झूठन चाटते हैं वे

भूखा बच्चा सो रहा है आसमान ओढ़कर
माँ रोटी कमा रही है पत्थरों को तोड़कर
जिनके पाँव नंगे हैं लिबास तार-तार हैं
जिनकी साँस-साँस साहुकारों की उधार है
जिनके प्राण बिन दवाई मृत्यु की कगार हैं
आत्महत्या कर रहे हैं भूख के शिकार हैं

बेटियां जो शर्मो-हया होती हैं जहान की
भूख ने तोड़ा तो वस्तु बन बैठी दुकान की
भूख आस्थाओं का स्वरूप बेच देती है
निर्धनों की बेटियों का रूप बेच देती है
भूख कभी-कभी ऐसे दांव-पेंच देती है
सिर्फ दो हजार में माँ बेटा बेच देती है

भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देती है
आन-बान-शान का गुमान तोड़ देती है
भूख सुदामाओं का भी मान तोड़ देती है
महाराणा प्रताप की भी आन तोड़ देती है
भूख तो हुजूर सारा नूर छीन लेती है
मजूरन की मांग का सिन्दूर छीन लेती है

किसी-किसी मौत पर धर्म-कर्म भी रोता है
क्योंकि क्रिया कर्म का भी पैसा नहीं होता है
घर वाले गरीब आँसू गम सहेज लेते हैं
बिना दाह संस्कार मुर्दा बेच देते हैं
थूक कर धिक्कारता हूँ मैं ऐसे विकास को
जो कफ़न भी दे ना सके गरीबों की लाश को।

कहीं-कहीं गोदामो में गेहूं सड़ा हुआ है
कहीं दाने-दाने का अकाल पड़ा हुआ है
झुग्गी-झोपड़ी में भूखे बच्चे बिलबिलाते हैं
जेलों में आतंकियों को बिरयानी खिलाते हैं
पूजा पाठ हो रहे हैं धन्ना सेठों के लिए
कोई यज्ञ हुआ नहीं भूखे पेटों के लिए

कोई सुबह का उजाला रैन बना देता है
कोई चमत्कार स्वर्ण चैन बना देता है
कोई स्वर्ग जाने की भी दे रहा है बूटियां
कोई हवा से निकाल देता है अंगूठियां
पर कोई गरीब की लंगोटी न बना सका
कभी कोई साधू बाबा रोटी न बना सका

भूख का सताया मन प्राण बीन लेता है
राजाओं से तख्त और ताज छीन लेता है
भूख जहाँ बागी होना ठानेगी अवाम की
मुँह की रोटी छीन लेगी देश के निजाम की

देश में इससे बड़ा कोई सवाल होगा क्या ?
भूख से भी बड़ा कोई महाकाल होगा क्या ?
फिर भी इस सवाल पर कोई नहीं हुंकारता
कहीं अर्जुन का गांडीव भी नहीं टंकारता
कोई भीष्म प्रतिज्ञा की भाषा नहीं बोलता
कहीं कोई चाणक्य भी चोटी नहीं खोलता

इस सवाल पर कोई कहीं क्यों नहीं थूकता।
कहीं कोई कृष्ण पाञ्चजन्य नहीं फूंकता।।

भूख का निदान झूठे वायदों में नहीं है
सिर्फ पूंजीवादियों के फायदों में नहीं है
भूख का निदान जादू टोनों में भी नहीं है
दक्षिण और वामपंथ दोनों में भी नहीं है
भूख का निदान कर्णधारों से नहीं हुआ
गरीबी हटाओ जैसे नारों से नहीं हुआ

भूख का निदान प्रशासन का पहला कर्म है
गरीबों की देखभाल सिंहासन का धर्म है
इस धर्म की पालना में जिस किसी से चूक हो
उसके साथ मुजरिमों के जैसा ही सुलूक हो

भूख से कोई मरे ये हत्या के समान है
हत्यारों के लिए मृत्युदण्ड का विधान है
कानूनी किताबों में सुधार होना चाहिए
मौत का किसी को जिम्मेदार होना चाहिए

भूखों के लिए नया कानून मांगता हूँ मैं
समर्थन में जनता का जुनून मांगता हूँ मैं
खुदकशी या मौत का जब भुखमरी आधार हो
उस जिले का जिलाधीश सीधा जिम्मेदार हो
वहां का एमएलए, एमपी भी गुनहगार है
क्योंकि ये रहनुमा चुना हुआ पहरेदार है
चाहे नेता अफसरों की लॉबी आज क्रुद्ध हो
हत्या का मुकद्दमा इन्ही तीनों के विरुद्ध हो

अब केवल कानून व्यवस्था को टोक सकता है
भुखमरी से मौत एक दिन में रोक सकता है
आज से ही संविधान में विधान कीजिये।
एक दो कलक्टरों को फाँसी टांग दीजिये।।
डॉ. हरिओम पंवार

फ़रवरी 4, 2015

कृष्ण को क्यों याद करे दुनिया?

Krishna 2दुनिया युद्ध, नफरत, आतंकवाद, पर्यावरण के ह्रास और मानवता में गिरावट जैसे मुद्दों से विनाश की ओर अग्रसर है तो ऐसे में अवसाद से घिरी मानवता को बचाने के लिए क्या वही सब कुछ याद न करना पड़ेगा जो मानव जीवन में श्रेष्ठ रहा है, जिसने जीवन को समृद्ध किया है!

श्याम, कान्हा, कृष्ण…मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं वे जीवन के।

क्या मनुष्य रुप में जीवन इससे बड़ा हो सकता है या इससे ऊपर जा सकता है?

कृष्ण को न याद करें तो किसे करें?

    “कान वो कान है जिसने तेरी आवाज सुनी

     आँख वो आँख है जिसने तेरा जलवा देखा

कृष्ण की कथा का रसास्वादन अदभुत है| क्या तो आनंद है बाल-गोपाल की कथा कहने में, सुनने में, और देखने में|

और थोड़े बड़े हो चुके कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी सदियों से मनुष्य को लुभाता आ रहा है|

सिर पर मोर मुकुट, गैया के पास थोड़े तिरछे खड़े, एक पैर पर दूसरा पैर रखे, बांसुरी बजाते कान्हा… वर्णन सुनने में हर बार लगता है जैसे गोकुल ही पहुँच गये हों… परम आनंद की अनुभूति होती है|

* * * * * * * * * * * * * * *  * *

अपने पिता महाराज उग्रसेन को राजगद्दी से उतारकर मथुरा का राजा बन बैठा अत्याचारी कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को उसके विवाहोपरांत ससुराल पहुंचा कर आने के लिए अपने महल से निकल कर बाहर आया ही था कि एक ऋषिवर वहाँ आए और कहा,” राजन, आपके सैनिकों ने वन प्रदेशों में आतंक मचा रखा है, वे तपस्वियों की साधना भंग करते हैं| कई गुरुकुलों को तहस नहस कर चुके हैं| आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की कन्याओं को ही नहीं वरन अब तो ऋषि कन्याओं को भी उठा लेने का दुस्साहस कर रहे हैं|

कंस ने कहा,” ऋषि बेकार की बातें मत करो| मेरे सैनिक वीर हैं और उनकी वीरता पर मुग्ध होकर वन प्रदेशों की कन्याएं स्वयं ही उनके साथ चली जाती होंगी| और मेरे राज्य की सीमाओं के अंदर रहने वाले सभी लोग, चाहे वे तपस्वी हे क्यों न हों, मेरे अधीन हैं, अगर वे मेरे सैनकों को कर नहीं देंगे, उनका कहना नहीं मानेंगे तो मेरे सैनिक उन्हें दंड देंगे ही|

“राजन, सत्ता का इतना नशा ठीक नहीं किसी राजा के लिए”|

“सुनो ऋषि अभी मैं अपनी बहन को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा हूँ| किसी और दिन आना और मेरे सैनिकों के विपरीत बातें करके उनकी छवि बिगाड़ने का प्रयास ना करो| जाकर तपस्वियों को समझाओ कि मेरे सैनिकों से न उलझें और वीर हमेशा ही धरती पर हर सुख को भोगते हैं| उन्हें कोई कन्या पसंद आयेगी तो वे उसे पाने का प्रयास करेंगे ही| आप लोगों में साहस हो तो उनसे लड़ो और पराजित करो उन्हें और अपनी कन्याओं की रक्षा कर लो| अब मेरा मार्ग छोड़ो”

कंस स्वयं ही रथ को हांकने बैठ गया|

रथ के चलने की आवाज और घोड़ों के हिनहिनाने की आवाजों के शोर के मध्य बादल गडगडाने की आवाज आती है|… ऋषि ने कंस को चेताते हुए कहा

 “हे कंस, जिस बहन के प्रति तू इतना लाड दिखा रहा है, याद रखना इसकी आठ संतानों में से एक संतान – एक पुत्र, ही तेरे काल का कारण बनेगी

कंस क्रोध और कुंठा से विचलित होते हुए गरजता है,” ऋषि अपनी वाणी पर नियंत्रण रखो और मेरी निगाह के सामने से दूर हो जाओ”|

ऋषि चला जाता है| कंस कुछ सोच में पड़ जाता है और कुछ पल पश्चात गरज कर कहता है,” देवकी, रथ से नीचे उतरो, तूने उस ऋषि की वाणी सुनी| मुझे, तुम दोनों, तुझे और तेरे पति, को मारना ही पड़ेगा, मैं जोखिम नहीं उठा सकता|”

देवकी रोने लगती है “भईया…”

वसुदेव याचना करते हुए कहता है,” महाराज, आप शक्तिशाली हैं, आपको ज्ञात ही है- आपको हमारी संतान से ख़तरा बताया गया है, आपकी बहन देवकी से तो आपको कोई जोखिम नहीं| उसे मारकर अपनी नवविवाहिता बहन को मारने का पाप आप क्यों अपने सिर लेते हैं| जब भी हमारे संतान होगी मैं स्वयं उसे लेकर आपके सामने उपस्थित हो जाउंगा|

कंस चेतावनी देता है,” देवकी, वासुदेव मुझसे कपट करने का प्रयास कदापि न करना, आज मैं तुम्हे जीवित छोड़े दे रहा हूँ| पर अब से तुम दोनों मथुरा में ही मेरे सैनिकों की देखरेख में रहोगे|”

कंस ने देवकी की छह संतानों को उनके जन्म लेते ही मार दिया| किसी तरह से देवकी और वासुदेव कंस से देवकी के सातवीं बार गर्भधारण होने की बात छिपाने में सफल रहे और वासुदेव द्वारा गोकुल में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहाँ सामाजिक कार्य में सम्मिलित होने हेतु अनुरोध करने पर कंस ने सैनिकों की देखरेख में पति-पत्नी को गोकुल जाने दिया, जहां देवकी का गर्भ, कंस के भय से गोकुल में अज्ञातवास में रह रही वासुदेव की एक अन्य पत्नी रोहिणी के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया गया| वापिस मथुरा आकर देवकी ने फिर से गर्भवती होने और शिशु के गर्भ में ही मृत हो जाने की बात उड़ा दी| देवकी की आठवीं संतान के समय कंस कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था अतः उसने देवकी और वासुदेव को बंदी बना कर, कड़े सुरक्षा से घिरे अपने कारागृह में भेज दिया|

…जारी

….[राकेश]

जनवरी 31, 2015

महाभारत

शकुनि को पूरा विश्वास था किHusain

अबकी बार बारी कौरवों की है।

क्या उसे ध्यान नहीं आया दुर्योधन की नयी दुरभिसंधि का ?

अपने परिवार के वृद्ध परिजनों को चुप कर देने का अभियान ?

 

 

ऐसा नहीं है कत्तई

कि युद्ध में विजेता वे होते हैं

जो किसी युद्ध में हुआ करते हैं योद्धा ।

सच तो यह है,

कि विजेता होते हैं वे,

जो होते हैं, उस युद्ध के प्रायोजक ।

और अब वे मांगेंगे अपने-अपने पारितोषिक

एक एक रथ के लिए, दस दस रथ,

हर एक अश्व के बदले सौ-सौ घोड़े।

 

 

क्या नीतियां अलग और भिन्न होतीं

यदि विजयी हुए होते पांडव ?

नीतियों का तो नहीं होता कोई अर्थ,

महत्वपूर्ण होती है तत्परता।

सत्य भी नहीं होता कोई मुद्दा,

महत्वपूर्ण होता है यह

कि झूठ को कौन कितनी अच्छी तरह से बेच सकता है।

 

शब्दाडंबर असत्य को बेहतर ढंग से छुपाते हैं

संकोच और संयम के मुकाबले,

और यदि धर्म का हो पीठ पर हाथ,

तब तो हो जाता है चमत्कार।

 

जीते कोई भी कोई युद्ध,

हर बार मारे जाने वाले लोग वही-वही होते हैं।

उन्हीं की हुआ करती हैं विधवाएं,उन्हीं के होते हैं अनाथ।

 

जितना चतुर-चालाक शासन,शत्रु की उतनी तत्काल मृत्यु।

 

इसका नहीं है कोई अर्थ कि क्या जला …

खांडव या लंका ?

धुएं का रंग है काला,

जिसमें से आती है जले हुए पक्षियों, वृक्षों

और आदिवासियों की गंध।

 

अभी तो बहुतेरे वनों की कटाई है शेष,

बहुत से खदानों का होना बाकी है उत्खनन।

कुछ बलिदान तो अनिवार्य ही हुआ करते हैं,

उन्हें टाला नहीं जा सकता।

पेड़ों पर लटकेंगे अभी और भी कई शव,

कुछ और भी शव ढोये जायेंगे चप्पुओं-नौकाओं में।

 

जो अशक्त है,

वह जीवित है किसी तरह,

अनाम, भूमिहीन,

परंतु यही तो है पांडवों की विरासत

अपने समूचे सामर्थ्य के साथ ढोई जाती हुई।

 

संजय अंधे को अंधा बनाये रखेगा,

विजेता के पक्ष में करता रहेगा वह हर घटना की व्याख्या,

बस, सिर्फ भूत-प्रेतों के मुंह बंद रखने की आवश्यकता है।

 

मान लो,

वे जो मरे पांडवों के पक्ष में लड़ते हुए

और उनके साथ कौरव

किसी साझा जुलूस में एक साथ उठ खड़े हों ?

 

नदियों को तो हम जोड़ सकते हैं, लेकिन पहाड़ ?

 

कैसे कोई तय करेगा कि जो सो रहे हैं, वे सोये ही रहेंगे सदा ?

 

क्या अब वे कोई नया महाकाव्य लिखेंगे,जिसमें न पांडव होंगे न कौरव ?

 

शकुनि यह भी समझता है

दस साल, मात्र दस वर्ष उसे चाहिये

कोई भी निर्धन तब नहीं रहेगा जीवित

और

नये शिशुओं को जन्म देने का साहस

नहीं कर पायेंगी स्त्रियां।

 

( के. सच्चिदानंदन  )   अनुवाद – (उदय प्रकाश)

(10 जून, 2014 को, सुप्रसिद्ध भारतीय कवि के. सच्चिदानंदन की मलयालम में लिखी कविता के उन्हीं के द्वारा अंग्रेज़ी में अनुदित पाठ के आधार पर अनुवाद )

साभार : उदय प्रकाश

मई 31, 2014

मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको…

आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप कोminorgirlsbadayun
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी इक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजू पार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाँहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा, ‘काका, तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िंदा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें’

बोला कृष्ना से – ‘बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से’

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए सरपंच के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लंबी नोक पर
देखिए सुखराज सिंह बोले हैं खैनी ठोंक कर

‘क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
न पुट्ठे पे हाथ रखने देती है, मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी’

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुरज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी सँभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेर कर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने –
‘जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने’

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोल कर
इक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर, ‘माल वो चोरी का तूने क्या किया?’

‘कैसी चोरी माल कैसा?’ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा

होश खो कर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर –

“मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो”

और फिर प्रतिशोध की आँधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देख कर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे

‘कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं’

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल-से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, ‘इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा’

minorbadayunइक सिपाही ने कहा, ‘साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें’

बोला थानेदार, ‘मुर्गे की तरह मत बाँग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टाँग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है’

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
‘कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल’

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म, संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लँगोटी के लिए
बेचती हैं जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए

(अदम गोंडवी)

मई 20, 2014

कैसे हो द्वारकाधीश?… बोली राधा

radhakrishnaस्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण,
प्रसन्नचित सी राधा…

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई…

इससे पहले
कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल उठी…

कैसे हो द्वारकाधीश?

जो राधा
उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से
द्वारकाधीश का संबोधन
कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी
किसी तरह
अपने आप को संभाल लिया…

और बोले राधा से,
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है…
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो…

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी…

बोली राधा,
मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई
ना कोई आंसू बहा…
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते…

इन आँखों में
सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे…

प्रेम के
अलग होने पर
तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको?

कुछ कडवे सच,
प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा
इस तरक्की में
तुम कितने पिछड़ गए?

यमुना के
मीठे पानी से
जिंदगी शुरू की
और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए?

एक ऊँगली पर
चलने वाले सुदर्शन चक्र पर
भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए?

कान्हा
जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी,
प्रेम से अलग होने पर
वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी?

सुदर्शन चक्र उठाकर
विनाश के काम आने लगी!

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ?

कान्हा होते
तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता!

युद्ध में और प्रेम में
यही तो फर्क होता है!

युद्ध में
आप मिटाकर जीतते हैं
और
प्रेम में
आप मिटकर जीतते हैं!

कान्हा
प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है,
पर किसी को दुःख नहीं देता !

आप तो
कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया ?
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया !

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था
जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे!

आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर, हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे !

आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं !

गीता में
मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर

” राधे राधे” करते है..!

मई 14, 2014

ओशो : बुद्ध को समझने में बड़ी भूल हुई दुनिया से!

Osho Buddhaगौतम बुद्ध की वाणी अनूठी है। और विशेषकर उनके लिए, जो सोच-विचार, चिंतन-मनन, विमर्श के आदी हैं। हृदय से भरे हुए लोग सुगमता से परमात्मा की तरफ चले जाते हैं। लेकिन हृदय से भरे हुए लोग कहां हैं? और हृदय से भरने का कोई उपाय भी तो नहीं है। हो तो हो, न हो तो न हो। ऐसी आकस्मिक, नैसर्गिक बात पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। बुद्ध ने उनको चेताया जिनको चेताना सर्वाधिक कठिन है-विचार से भरे लोग, बुद्धिवादी, चिंतन-मननशील।

प्रेम और भाव से भरे लोग तो परमात्मा की तरफ सरलता से झुक जाते हैं; उन्हें झुकाना नहीं पड़ता। उनसे कोई न भी कहे, तो भी वे पहुंच जाते हैं; उन्हें पहुंचाना नहीं पड़ता। लेकिन वे तो बहुत थोड़े हैं, और उनकी संख्या रोज थोड़ी होती गयी है। उंगलियों पर गिने जा सकें, ऐसे लोग हैं।

मुनष्य का विकास मस्तिष्क की तरफ हुआ है। मनुष्य मस्तिष्क से भरा है। इसलिए जहां जीसस हार जाएं, जहां कृष्ण की पकड़ न बैठे, वहां भी बुद्ध नहीं हारते हैं; वहां भी बुद्ध प्राणों के अंतरतम में पहुंच जाते हैं।

बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म कहा गया है। बुद्धि पर उनका आदि तो है, अंत नहीं। शुरुआत बुद्धि से है। प्रारंभ बुद्धि से है। क्योंकि मनुष्य वहां खड़ा है। लेकिन अंत, अंत उसका बुद्धि में नहीं है। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहां सब विचार खो जाते हैं, सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है; जहां केवल साक्षी, मात्र साक्षी शेष रह जाता है। लेकिन बुद्ध का प्रभाव उन लोगों में तत्क्षण अनुभव होता है जो सोच-विचार में कुशल हैं।

बुद्ध के साथ मनुष्य-जाति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने वह कहा जो आज भी सार्थक मालूम पड़ेगा, और जो आने वाली सदियों तक सार्थक रहेगा। बुद्ध ने विश्लेषण दिया, एनालिसिस दी। और जैसा सूक्ष्म विश्लेषण उन्होंने किया, कभी किसी ने न किया था, और फिर दुबारा कोई न कर पाया। उन्होंने जीवन की समस्या के उत्तर शास्त्र से नहीं दिए, विश्लेषण की प्रक्रिया से दिए।

बुद्ध धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है। उनके साथ तो समझ पर्याप्त है। अगर तुम समझने को राजी हो, तो तुम बुद्ध की नौका में सवार हो जाओगे। अगर श्रद्धा भी आएगी, तो समझ की छाया होगी। लेकिन समझ के पहले श्रद्धा की मांग बुद्ध की नहीं है। बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूं, भरोसा कर लो। बुद्ध कहते हैं, सोचो, विचारो, विश्लेषण करो; खोजो, पाओ अपने अनुभव से, तो भरोसा कर लेना।

दुनिया के सारे धर्मों ने भरोसे को पहले रखा है, सिर्फ बुद्ध को छोड़कर। दुनिया के सारे धर्मों में श्रद्धा प्राथमिक है, फिर ही कदम उठेगा। बुद्ध ने कहा, अनुभव प्राथमिक है, श्रद्धा आनुशांगिक है। अनुभव होगा, तो श्रद्धा होगी। अनुभव होगा, तो आस्था होगी।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, आस्था की कोई जरूरत नहीं है; अनुभव के साथ अपने से आ जाएगी, तुम्हें लानी नहीं है। और तुम्हारी आयी हुई आस्था का मूल्य भी क्या हो सकता है? तुम्हारी लायी हुई आस्था का मूल्य भी क्या हो सकता है? तुम्हारी लायी आस्था के पीछे भी छिपे होंगे तुम्हारे संदेह।

तुम आरोपित भी कर लोगे विश्वास को, तो भी विश्वास के पीछे अविश्वास खड़ा होगा। तुम कितनी ही दृढ़ता से भरोसा करना चाहो, लेकिन तुम्हारी दृढ़ता कंपती रहेगी और तुम जानते रहोगे कि जो तुम्हारे अनुभव में नहीं उतरा है, उसे तुम चाहो भी तो कैसे मान सकते हो? मान भी लो, तो भी कैसे मान सकते हो? तुम्हारा ईश्वर कोरा शब्दजाल होगा, जब तक अनुभव की किरण न उतरी हो। तुम्हारे मोक्ष की धारणा मात्र शाब्दिक होगी, जब तक मुक्ति का थोड़ा स्वाद तुम्हें न लगा हो।

बुद्ध ने कहा: मुझ पर भरोसा मत करना। मैं जो कहता हूं, उस पर इसलिए भरोसा मत करना कि मैं कहता हूं। सोचना, विचारना, जीना। तुम्हारे अनुभव की कसौटी पर सही हो जाए, तो ही सही है। मेरे कहने से क्या सही होगा!

बुद्ध के अंतिम वचन हैं: अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनना। और तुम्हारी रोशनी में तुम्हें जो दिखाई पड़ेगा, फिर तुम करोगे भी क्या-आस्था न करोगे तो करोगे क्या? आस्था सहज होगी। उसकी बात ही उठानी व्यर्थ है।

बुद्ध का धर्म विश्लेषण का धर्म है। लेकिन विश्लेषण से शुरू होता है, समाप्त नहीं होता वहां। समाप्त तो परम संश्लेषण पर होता है। बुद्ध का धर्म संदेह का धर्म है। लेकिन संदेह से यात्रा शुरू होती है, समाप्त नहीं होती। समाप्त तो परम श्रद्धा पर होती है।

इसलिए बुद्ध को समझने में बड़ी भूल हुई। क्योंकि बुद्ध संदेह की भाषा बोलते हैं। तो लोगों ने समझा, यह संदेहवादी है। हिंदू तक न समझ पाए, जो जमीन पर सबसे ज्यादा पुरानी कौम है। बुद्ध निश्चित ही बड़े अनूठे रहे होंगे, तभी तो हिंदू तक समझने से चूक गए। हिंदुओं तक को यह आदमी खतरनाक लगा, घबड़ाने वाला लगा। हिंदुओं को भी लगा कि यह तो सारे आधार गिरा देगा धर्म के। और यही आदमी है, जिसने धर्म के आधार पहली दफा ढंग से रखे।

श्रद्धा पर भी कोई आधार रखा जा सकता है! अनुभव पर ही आधार रखा जा सकता है। अनुभव की छाया की तरह श्रद्धा उत्पन्न होती है। श्रद्धा अनुभव की सुगंध है। और अनुभव के बिना श्रद्धा अंधी है। और जिस श्रद्धा के पास आंख न हों, उससे तुम सत्य तक पहुंच पाओगे?

बुद्ध ने बड़ा दुस्साहस किया। बुद्ध जैसे व्यक्ति पर भरोसा करना एकदम सुगम होता है। उसके उठने-बैठने में प्रमाणिकता होती है। उसके शब्द-शब्द में वजन होता है। उसके होने का पूरा ढंग स्वयंसिद्ध होता है। उस पर श्रद्धा आसान हो जाती है। लेकिन बुद्ध ने कहा, तुम मुझे अपनी बैसाखी मत बनाना। तुम अगर लंगड़े हो, और मेरी बैसाखी के सहारे चल लिए-कितनी दूर चलोगे? मंजिल तक न पहुंच पाओगे। आज मैं साथ हूं, कल मैं साथ न रहूंगा, फिर तुम्हें अपने ही पैरों पर चलना है। मेरी रोशनी से मत चलना, क्योंकि थोड़ी देर को संग-साथ हो गया है अंधेरे जंगल में। तुम मेरी रोशनी में थोड़ी देर रोशन हो लोगे; फिर हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे। मेरी रोशनी मेरे साथ होगी, तुम्हारा अंधेरा तुम्हारे साथ होगा। अपनी रोशनी पैदा करो।

अप्प दीपो भव!

यह बुद्ध का धम्मपद, कैसे वह रोशनी पैदा हो सकती है अनुभव की, उसका विश्लेषण है। श्रद्धा की कोई मांग नहीं है। श्रद्धा की कोई आवश्यकता भी नहीं है। इसलिए बुद्ध को लोगों ने नास्तिक कहा। क्योंकि बुद्ध ने यह भी नहीं कहा कि तुम परमात्मा पर श्रद्धा करो।

तुम कैसे करोगे श्रद्धा? तुम्हें पता होता तो तुम श्रद्धा करते ही। तुम्हें पता नहीं है। इस अज्ञान में तुम कैसे श्रद्धा करोगे? और अज्ञान में तुम जो श्रद्धा बांध भी लोगे, वह तुम्हारी अज्ञान की ईंटों से बना हुआ भवन होगा; उसे तुम परमात्मा का मंदिर कैसे कहोगे? वह तुमने भय से बना लिया होगा। मौत डराती होगी, इसलिए सहारा पकड़ लिया होगा। यहां जिंदगी हाथ से जाती मालूम होती होगी, इसलिए स्वर्ग की कल्पनाएं कर ली होंगी। लेकिन इन कल्पनाओं से, भय पर खड़ी हुई इन धारणाओं से, कहीं कोई मुक्त हुआ है! इससे ही तो आदमी पंगु है। इससे ही तो आदमी पक्षघात में दबा है। इसलिए बुद्ध ने ईश्वर की बात नहीं की।

एच.जी.वेल्स ने बुद्ध के संबंध में कहा है कि पृथ्वी पर इस जैसा ईश्वरीय व्यक्ति और इस जैसा ईश्वर-विरोधी व्यक्ति एक साथ पाना कठिन है-सो गाड लाइक एंड सो गाडलेस! अगर तुम ईश्वरीय प्रतिभाओं को खोजने निकलो तो तुम बुद्ध से ज्यादा ईश्वरीय प्रतिभा कहां पाओगे? सो गाडलेस! और फिर भी इतना ईश्वर-शून्य! ईश्वर की बात ही नहीं की। इस शब्द को ही गंदा माना। इस शब्द का उच्चार नहीं किया। इससे यह मत समझ लेना कि ईश्वर-विरोधी थे बुद्ध। उच्चार नहीं किया, क्योंकि उस परम शब्द का उच्चार किया नहीं जा सकता।

उपनिषद कहते हैं, ईश्वर के संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता; लेकिन इतना तो कह ही देते हैं। बुद्ध ने इतना भी न कहा। वे परम उपनिषद हैं। उनके पार उपनिषद नहीं जाता। जहां उपनिषद समाप्त होते हैं, वहां बुद्ध शुरू होते हैं। आखिर इतना तो कह ही दिया, रोक न सके अपने को, कि ईश्वर निर्गुण है। तो निर्गुण उसका गुण बना दिया। कहा कि ईश्वर निराकार है, तो निराकार उसका आकार हो गया। लेकिन बिना कहे न रह सके। उपनिषद के ऋषि भी बोल गए! मौन में ही सम्हालना था उस संपदा को; बोलकर गंवा दी। बंधी मुट्ठी लाख की थी, खुली दो कौड़ी की हो गई। वह बात ऐसी थी कि कहानी नहीं थी। क्योंकि तुम जो कुछ भी कहोगे, वह गलत होगा। यह कहना भी कि परमात्मा निराकार है, गलत है, क्योंकि निराकार भी एक धारणा है। वह भी आकार से ही जुड़ी है। आकार के विपरीत होगी, तो भी आकार से संबंधित है।

निराकार का क्या अर्थ होता है? जब भी अर्थ खोजने जाओगे, आकार का उपयोग करना पड़ेगा। निर्गुण का क्या अर्थ होता है? जब भी कोई परिभाषा पूछेगा, गुण को परिभाषा में लाना पड़ेगा। ऐसी निर्गुणता भी बड़ी नपुंसक है, जिसकी परिभाषा में गुण लाना पड़ता है! और ऐसे निराकार में क्या निराकार होगा, जिसको समझाने के लिए आकार लाना पड़ता है!

बुद्ध से ज्यादा कोई भी नहीं बोला; और बुद्ध से ज्यादा चुप भी कोई नहीं है। कितना बुद्ध बोले हैं! अन्वेषक खोज करते हैं तो वे कहते हैं, एक आदमी इतना बोला, यह संभव कैसे है! उन्हें डर लगता है कि इसमें बहुत कुछ प्रक्षिप्त है, दूसरों ने डाल दिया है। कुछ भी प्रक्षिप्त नहीं है। जितना बुद्ध बोले, पूरा संगृहीत ही नहीं हुआ है। खूब बोले। और फिर भी उनसे ज्यादा चुप कोई भी नहीं है। क्योकि जहां-जहां नहीं बोलना था, वहां नहीं बोले। ईश्वर के संबंध में एक शब्द न कहा। इस खतरे को भी मोल लिया कि लोग नास्तिक समझेंगे। और आज तक लोग नास्तिक समझे जा रहे हैं। और इससे बड़ा कोई आस्तिक कभी हुआ नहीं।

बुद्ध महा आस्तिक हैं। अगर परमात्मा के संबंध में कुछ कहना संभव नहीं है, तो फिर बुद्ध ने ही कुछ कहा-चुप रह कर; इशारा किया।

पश्चिम के एक बहुत बड़े विचारक विट्गिंस्टीन ने अपनी बड़ी अनूठी किताब टेक्टेटस में लिखा है कि जिस संबंध में कुछ कहा न जा सके, उस संबंध में बिलकुल चुप रह जाना उचित है। दैट व्हिच कैन नॉट बी सेड, मस्ट नॉट बी सेड। जो नहीं कहा जा सकता, कहना ही मत, कहना ही नहीं चाहिए।

अगर विट्गिंस्टीन बुद्ध को देखता तो समझता। अगर विट्गिंस्टीन के वचन को बुद्ध ने समझा होता तो वे मुस्कुराते और उन्होंने स्वीकृति दी होती। विट्गिंस्टीन को भी पश्चिम में लोग नास्तिक समझे। नास्तिक नहीं है। पर जो कही नहीं जा सकती बात, अच्छा है न ही कही जाए। कहने से बिगड़ जाती है। कहने से गलत हो जाती है।

लाओत्से तक, कहता तो है प्रथम वचन में अपने ताओ-तेह-किंग में कि सत्य कहा नहीं जा सकता, और जो भी कहा जाए वह असत्य हो जाता है; लेकिन फिर भी सत्य के संबंध में बहुत सी बातें कही हैं। बुद्ध ने नहीं कही। तुम कहोगे, फिर बुद्ध कहते क्या रहे? बुद्ध ने स्वास्थ्य के संबंध में एक भी शब्द नहीं कहा, केवल बीमारी का विश्लेषण किया और निदान किया; औषधि की व्यवस्था की। बुद्ध ने कहा, मैं एक वैद्य हूं; मैं कोई दार्शनिक नहीं हूं। मैं तुम्हारी बीमारी का विश्लेषण करूंगा, निदान करूंगा, औषधि सुझा दूंगा; और जब तुम ठीक हो जाओगे, तभी तुम जानोगे कि स्वास्थ्य क्या है। मैं उस संबंध में कुछ भी न कहूंगा।

स्वास्थ्य जाना जाता है, कहा नहीं जा सकता। बीमारी मिटायी जा सकती है, बीमारी समझायी जा सकती है, बीमारी बनायी जा सकती है, बीमारी का इलाज हो सकता है-सही हो सकता है, गलत हो सकता है-बीमारी के साथ बहुत कुछ हो सकता है। स्वास्थ्य? जब बीमारी नहीं होती तब शेष रह जाता है, वही। उस तरफ केवल इशारे हो सकते हैं, मौन। इंगित हो सकते हैं-वे भी प्रत्यक्ष नहीं, बड़े परोक्ष।

बुद्ध के धर्म को शून्यवादी कहा गया है। शून्यवादी उनका धर्म है। लेकिन इससे यह मत समझ लेना कि शून्य पर उनकी बात पूरी हो जाती है। नहीं, बस शुरू होती है।

बुद्ध एक ऐसे उत्तुंग शिखर हैं, जिसका आखिरी शिखर हमें दिखायी नहीं पड़ता। बस थोड़ी दूर तक हमारी आंखें जाती हैं, हमारी आंखों की सीमा है। थोड़ी दूर तक हमारी गर्दन उठती है, हमारी गर्दन के झुकने की सामर्थ्य है। और बुद्ध खोते चले जाते हैं-दूर…हिमाच्छादित शिखर है। बालों के पार! उनका प्रारंभ तो दिखायी पड़ता है, उनका अंत दिखायी नहीं पड़ता। यही उनकी महिमा है। और प्रारंभ को जिन्होंने अंत समझ लिया, वे भूल में पड़ गए। प्रारंभ से शुरू करना; लेकिन जैसे-जैसे तुम शिखर पर उठने लगोगे, और आगे, और आगे दिखायी पड़ने लगा, और आगे दिखायी पड़ने लगेगा।

बहुत लोग बोले हैं। बहुत लोगों ने मनुष्य के रोग का विश्लेषण किया है; लेकिन ऐसा सचोट नहीं। बड़े सुंदर ढंग से लोगों ने बातें कही हैं, बड़े गहरे प्रतीक उपाय में लाए हैं। पर बुद्ध, बुद्ध के कहने का ढंग ही और है। अंदाजे-बयां और! जिसने एक बार सुना, पकड़ा गया। जिसने एक बार आंख से आंख मिला ली, फिर भटक न पाया। जिसको बुद्ध की थोड़ी सी भी झलक मिल गयी, उसका जीवन रूपांतरित हुआ।

आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, जिस दिन बुद्ध का जन्म हुआ, घर में उत्सव मनाया जाता था। सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था, पूरी राजधानी सजी थी। रातभर लोगों ने दीए जलाए, नाचे। उत्सव का क्षण था! बूढ़े सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था। बड़े दिन की प्रतीक्षा पूरी हुई थी। बड़ी पुरानी अभिलाषा थी पूरे राज्य की। मालिक बूढ़ा होता जाता था और नए मालिक की कोई खबर न थी। इसलिए बुद्ध को सिद्धार्थ नाम दिया। सिद्धार्थ का अर्थ होता है, अभिलाषा का पूरा हो जाना।

पहले ही दिन, जब द्वार पर बैंड-बाजे बजते थे, शहनाई बजती थी, फूल बरसाए जाते थे महल में, चारों तरफ प्रसाद बंटता था, हिमालय से भागा हुआ एक वृद्ध तपस्वी द्वार पर खड़ा हुआ आकर। उसका नाम था असिता। सम्राट भी उसे सम्मान करता था। और कभी असिता राजधानी नहीं आया था। जब कभी जाना था तो शुद्धोदन को, सम्राट को, स्वयं उसके दर्शन करने जाना होता था। ऐसे बचपन के साथी थे। फिर शुद्धोधन सम्राट हो गया, बाजार की दुनिया में उलझ गया। असिता महातपस्वी हो गया। उसकी ख्याति दूर-दिगंत तक फैल गयी। असिता को द्वार पर आए देखकर शुद्धोदन ने कहा, आप, और यहां! क्या हुआ? कैसे आना हुआ? कोई मुसीबत है? कोई अड़चन है? कहें! असिता ने कहा, नहीं, कोई मुसीबत नहीं, कोई अड़चन नहीं। तुम्हारे घर बेटा पैदा हुआ, उसके दर्शन को आया हूं।

शुद्धोधन तो समझ न पाया। सौभाग्य की घड़ी थी यह कि असिता जैसा तपस्वी और बेटे के दर्शन को आया। भागा गया अंतःगृह में। नवजात शिशु को लेकर बाहर आ गया। असिता झुका, और उसने शिशु के चरणों में सिर रख दिया। और कहते हैं, शिशु ने अपने पैर उसकी जटाओं में उलझा दिए। फिर तब से आदमी की जटाओं में बुद्ध के पैर उलझे हैं। फिर आदमी छुटकारा नहीं पा सका। और असिता हंसने लगा, और रोने भी लगा। और शुद्धोधन ने पूछा कि इस शुभ घड़ी में आप रोते क्यों हैं?

असिता ने कहा, यह तुम्हारे घर जो बेटा पैदा हुआ है, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है; असाधारण है। कई सदियां बीत जाती हैं। यह तुम्हारे लिए ही सिद्धार्थ नहीं है; यह अनंत-अनंत लोगों के लिए सिद्धार्थ है। अनेकों की अभिलाषाएं इससे पूरी होंगी। हंसता हूं, कि इसके दर्शन मिल गए। हंसता हूं, प्रसन्न हूं, कि इसने मुझ बूढ़े की जटाओं में अपने पैर उलझा दिए। यह सौभाग्य का क्षण है! रोता इसलिए हूं कि जब यह कली खिलेगी, फूल बनेगी, जब दिग-दिगंत में इसकी सुवास उठेगी, और इसकी सुवास की छाया में करोड़ों लोग राहत लेंगे, तब मैं न रहूंगा। यह मेरा शरीर छूटने के करीब आ गया।

और एक बड़ी अनूठी बात असिता ने कही है, वह यह कि अब तक आवागमन से छूटने की आकांक्षा थी, वह पूरी भी हो गयी; आज पछतावा होता है। एक जन्म अगर और मिलता तो इस बुद्धपुरुष के चरणों में बैठने की, इसकी वाणी सुनने की, इसकी सुगंध को पीने की, इसके नशे में डूबने की सुविधा हो जाती। आज पछताता हूं, लेकिन मैं मुक्त हो चुका हूं। यह मेरा आखिरी अवतरण है; अब इसके बाद देह न धर सकूंगा। अब तक सदा ही चेष्टा की थी कि कब छुटकारा हो इस शरीर से, कब आवागमन से…आज पछताता हूं कि अगर थोड़ी देर और रुक गया होता…।

इसे तुम थोड़ा समझो।

बुद्ध के फूल के खिलने के समय, असिता चाहता है, कि अगर मोक्ष भी दांव पर लगता हो तो कोई हर्जा नहीं। तब से पच्चीस सौ साल बीत गए। बहुत प्रज्ञा-पुरुष हुए। लेकिन बुद्ध अतुलनीय हैं। और उनकी अतुलनीयता इसमें है कि उन्होंने इस सदी के लिए धर्म दिया, और आने वाले भविष्य के लिए धर्म दिया। कृष्ण की बात कितनी ही समझाकर कही जाए, इस सदी के लिए मौजूं नहीं बैठती। फासला बड़ा हो गया है। बड़ा अंतराल पड़ गया है। कृष्ण ने जिनसे कहा था उनके मनों में, और जिनके मन आज उसे सुनेंगे, बड़ा अंतर है। बुद्ध की कुछ बात ऐसी है, कि ऐसा लगता है अभी-अभी उन्होंने कही। बुद्ध की बात को समसामयिक बनाने की जरूरत नहीं है; वह समसामयिक है, वह कंटेम्प्रेरी है। कृष्ण पर बोलो, तो कृष्ण को खींचकर लाना पड़ता है बीसवीं सदी में; बुद्ध को नहीं लाना पड़ता। बुद्ध जैसे खड़े हैं, बीसवीं सदी में ही खड़े हैं। और ऐसा अनेक सदियों तक रहेगा। क्योंकि मनुष्य ने जो होने का ढंग अंगीकार कर लिया है, बुद्धि का, वह अब ठहरने को है; वह अब जाने को नहीं है। और उसके साथ ही बुद्ध का मार्ग ठहरने को है।

धम्मपद उनका विश्लेषण है। उन्होंने जो जीवन की समस्याओं की गहरी छानबीन की है, उसका विश्लेषण है। एक-एक शब्द को गौर से समझने की कोशिश करना। क्योंकि ये कोई सिद्धांत नहीं हैं जिन पर तुम श्रद्धा कर लो। ये तो निष्पत्तियां हैं, प्रयोग की। अगर तुम भी इनके साथ विचार करोगे तो ही इन्हें पकड़ पाओगे। यह आंख बंद करके स्वीकार कर लेने का सवाल नहीं है; यह तो बड़े सोच-विचार, मनन का सवाल है।

नवम्बर 17, 2013

मृत्युंजय कोई नहीं धरा पर : संत सिद्धार्थ

नहीं नहीं नहीं !karna-001

मृत्युंजय कोई नहीं है धरा पर,

कभी भी नहीं हुआ,

कभी हो नहीं सकता|

जो जन्मा है

वह मरेगा अवश्य|

जन्म और मृत्यु

दो मुख हैं एक ही अटल सत्य के, एक के बिना दूसरा नहीं|

इसे चाहे लम्बाई में समझ लें तो ये दो सिरे हैं और चाहे गोलाई में मान लें तो एक दूजे में गुथी हुयी दो परतें हैं|

एक कथा कहता हूँ तुमसे| महाभारत की है|

कर्ण की वीरता के सच का बोध अर्जुन को करा कर कृष्ण मरणासन्न कर्ण के पास ब्राह्मण वेष में पहुँच दान माँग और मनचाहा दान पाकर  अर्जुन को कर्ण की दानवीरता का भव्य प्रदर्शन भी दिखा चुके थे|

कर्ण के सामने अपने असली रूप में आकर कृष्ण ने कर्ण से उसकी अंतिम इच्छा पूछी|

मरणासन्न पर चेतन कर्ण ने कृष्ण से कहा,”मेरी मृत देह का संस्कार अदग्धा भूमि पर किया जाए|

कृष्ण बोल उठे,”ऐसा ही होगा”|

कथा कहती है कि कर्ण के मरणोपरांत कृष्ण उसके पार्थिव शरीर को लेकर सारे संसार में घूम आए पर हर जगह, धरती ने उन्हें एक ही जवाब दिया,

“अदग्धा भूमि! वह कैसे मिल सकती है? आप तो ज्ञानी हैं, आपने कैसे ऐसा वचन दे दिया? आरम्भ से ही मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते आए हैं और जब तक जीवन है तब तक वे मृत्यु के  शिकार होते ही रहेंगे| अमर कोई नहीं है| ऐसे में अदग्धा स्थल के बारे में कल्पना करना भी असंभव है|”

कहते हैं, कृष्ण ने अपनी हथेली पर कर्ण का दाह संस्कार किया|

कृष्णकर्ण कथा के द्वारा धरती, और यहाँ मनुष्य से सम्बंधित जन्म और मृत्यु के चक्र को सुपरिभाषित किया गया है|

मनुष्य संत हो या शैतान, मृत्यु से परे नहीं है|

मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता|

पर मृत्यु के भय पर उसे विजय प्राप्त करनी होती है…करनी ही होती है|

इस सच के बोध को कभी धूमिल न होने दें| यही सच जीवन में बड़े सच की ओर यात्रा करवा पाने में सहायक सिद्ध होता है|

%d bloggers like this: