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सितम्बर 8, 2015

सब कुछ कह लेने के बाद… (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ्य है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

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नवम्बर 17, 2013

मृत्युंजय कोई नहीं धरा पर : संत सिद्धार्थ

नहीं नहीं नहीं !karna-001

मृत्युंजय कोई नहीं है धरा पर,

कभी भी नहीं हुआ,

कभी हो नहीं सकता|

जो जन्मा है

वह मरेगा अवश्य|

जन्म और मृत्यु

दो मुख हैं एक ही अटल सत्य के, एक के बिना दूसरा नहीं|

इसे चाहे लम्बाई में समझ लें तो ये दो सिरे हैं और चाहे गोलाई में मान लें तो एक दूजे में गुथी हुयी दो परतें हैं|

एक कथा कहता हूँ तुमसे| महाभारत की है|

कर्ण की वीरता के सच का बोध अर्जुन को करा कर कृष्ण मरणासन्न कर्ण के पास ब्राह्मण वेष में पहुँच दान माँग और मनचाहा दान पाकर  अर्जुन को कर्ण की दानवीरता का भव्य प्रदर्शन भी दिखा चुके थे|

कर्ण के सामने अपने असली रूप में आकर कृष्ण ने कर्ण से उसकी अंतिम इच्छा पूछी|

मरणासन्न पर चेतन कर्ण ने कृष्ण से कहा,”मेरी मृत देह का संस्कार अदग्धा भूमि पर किया जाए|

कृष्ण बोल उठे,”ऐसा ही होगा”|

कथा कहती है कि कर्ण के मरणोपरांत कृष्ण उसके पार्थिव शरीर को लेकर सारे संसार में घूम आए पर हर जगह, धरती ने उन्हें एक ही जवाब दिया,

“अदग्धा भूमि! वह कैसे मिल सकती है? आप तो ज्ञानी हैं, आपने कैसे ऐसा वचन दे दिया? आरम्भ से ही मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते आए हैं और जब तक जीवन है तब तक वे मृत्यु के  शिकार होते ही रहेंगे| अमर कोई नहीं है| ऐसे में अदग्धा स्थल के बारे में कल्पना करना भी असंभव है|”

कहते हैं, कृष्ण ने अपनी हथेली पर कर्ण का दाह संस्कार किया|

कृष्णकर्ण कथा के द्वारा धरती, और यहाँ मनुष्य से सम्बंधित जन्म और मृत्यु के चक्र को सुपरिभाषित किया गया है|

मनुष्य संत हो या शैतान, मृत्यु से परे नहीं है|

मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता|

पर मृत्यु के भय पर उसे विजय प्राप्त करनी होती है…करनी ही होती है|

इस सच के बोध को कभी धूमिल न होने दें| यही सच जीवन में बड़े सच की ओर यात्रा करवा पाने में सहायक सिद्ध होता है|

मई 7, 2013

प्रेम पत्र

अब असंभव है तुम्हे चिट्ठी लिख पाना

चाहता हूँ कितना खोलूँ खिड़की

जी भरकर पीऊँ समुद्र-पवन

फिर बैठूं लिखने जो दुनिया का

सबसे आवेगपूर्ण प्रेम पत्र हो और उसका हर पैराग्राफ

वर्णन करे एक सुवासित स्वप्न

उस स्वप्न के कुछ-कुछ आलोकित गलियारों से

मैं तुम्हारे होने की जगह जाता

वह चिट्ठी पढ़ने के बाद

मैं जानता हूँ तुम समझ जाती

मृत्यु का शीतल दुर्ग तोड़ने का जादू

मेरी साँसों में सारी ऋतुएँ स्थित हैं

जाड़े की रात में ढूंढोगी यदि बेला

वह मिलेगा मेरे आत्म समर्पण में|

किन्तु असंभव है अब

तुम्हे चिट्ठी लिख पाना,

केवल स्वप्न में अथवा

स्वप्न-सा निरर्थक लगने में

तुम देखोगी, जब आखें

खुली होंगी और अंग प्रत्यंग

मेरी सचेत इच्छानुसार चलेंगे

तुम बनोगी इतिहास ,

एक प्रागैतिहासिक शहर

जो दब गया समुद्र तले और

जिसकी बिखरी एकाध ईंटें

पड़ जाएँगी किसी दर्शक की दृष्टि में|

मैं भी बदल गया काफी |

मैंने तुम्हे खोया या खोया

मेरे जैसे दिखने वाले मेरे अन्य रूप ने?

उसकी आवाज मेरी आवाज सी थी

जबकि उसमें थी शीतलता, प्रच्छन, विद्रूप|

वह रूप मैं होऊं या वह हो

मेरी आत्मा के छुपे अंगार से बनी

एक प्रतिमूर्ति ,

मेरा नाम आज उसका नाम है

उसे मिलेगी आज दुनिया भर की सहानुभूति

मैं अंधेरी रत में

एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक चलता रहूंगा,

पूरा आकाश भरा होगा तारों से

न जाने कितनी दूर

और किस समघात से

मैं बनूंगा वह पत्र-लेखक

कई देहांत के बाद

जिसकी इतर सत्ताएँ मर जाएँगी,

निर्मल अतीत के साथ एकाकार होगा

शून्य भविष्य|

मुझे लगता हैशुरू हो गया है मेरा देहांत

झरने के कल-कल बहते शब्दों से

संभावना नियंत्रण कुछ भी नहीं है, सिर्फ

एक सह्रीर के ध्वस्त होने के बाद का

विलाप सुनाई देता है और

मेरे प्रेम पत्र की भाषा भी

सुनाई देती है अस्पष्ट स्वरों में|

(रमाकांत रथ)

उडिया से अनुवाद – राजेन्द्रप्रसाद मिश्र

मार्च 12, 2013

गीत गुनगुनाने दो

 

सपने हैं शीशे से साफ़ करो इनको

सपनों की गलती क्या माफ करो इनको |

मन में कुछ आने दो कुछ मन से आने दो

गीत गुनगुनाने दो …|

मोहक हर दर्पण था मोह गया मन को

आकर्षण बंधन का तोड़ गया तन को |

सुख को तुम माने दो दुख में कुछ गाने दो

गीत गुनगुनादे दो…|

मन को तो रोक लिया मिलने से उनको

भीतर के जग में अब रोकोगे किनको |

सृष्टि है लुभाने दो दो दृश्य हैं रमाने दो

गीत गुनगुनाने दो…|

दूर जा चुके हैं सब जाना था जिनको

अब किसे पुकारें हम आना है किनको |

अब दिया बुझाने दो दर्द को सुलाने दो

गीत गुनगुनाने दो…|

{कृष्ण बिहारी}

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