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सितम्बर 14, 2015

बुद्ध, महावीर, अहिंसा और मांसाहार : ओशो

प्रश्न: आपने कहा कि बाह्य आचरण से सब हिंसक हैं। आपने कहा कि बुद्ध और महावीर अहिंसक थे। बुद्ध तो मांस खाते थे, वे अहिंसक कैसे थे?

ओशो

मेरा मानना है कि आचरण से अहिंसा उपलब्ध नहीं होती। मैंने यह नहीं कहा कि अहिंसा से आचरण उपलब्ध नहीं होता। इसके फर्क को समझ लीजिए आप। हो सकता है कि मैं मछली न खाऊं। लेकिन इससे मैं महावीर नहीं हो जाऊंगा। लेकिन यह असंभव है कि मैं महावीर हो जाऊं और मछली खाऊं। इस फर्क को आप समझ लें। आचरण को साध कर कोई अहिंसक नहीं हो सकता, लेकिन अहिंसक हो जाए तो आचरण में अनिवार्य रूपांतरण होगा।
दूसरी बात यह कि मैंने बुद्ध और महावीर को अहिंसक कहा, लेकिन बुद्ध मांस खाते थे। बुद्ध मरे हुए जानवर का मांस खाते थे। उसमें कोई भी हिंसा नहीं है। लेकिन महावीर ने उसे वर्जित किया किसी संभावना के कारण। जैसा कि आज जापान में है। सब होटलों के, दूकानों के ऊपर तख्ती लगी हुई है कि यहां मरे हुए जानवर का मांस मिलता है।

अब इतने मरे हुए जानवर कहां से मिल जाते हैं, यह सोचने जैसा है। बुद्ध चूक गए, बुद्ध से भूल हो गई। हालांकि मरे हुए जानवर का मांस खाने में हिंसा नहीं है, क्योंकि मांस का मतलब है कि मार कर खाना। मारा नहीं है तो हिंसा नहीं है। लेकिन यह कैसे तय होगा कि लोग फिर मरे हुए जानवर के नाम पर मार कर नहीं खाने लगेंगे! इसलिए बुद्ध से चूक हो गई है और उसका फल पूरा एशिया भोग रहा है।

बुद्ध की बात तो बिलकुल ठीक है, लेकिन बात के ठीक होने से कुछ नहीं होता; किन लोगों से कह रहे हैं, यह भी सोचना जरूरी है। महावीर की समझ में भी आ सकती है यह बात कि मरे हुए जानवर का मांस खाने में क्या कठिनाई है। जब मर ही गया तो हिंसा का कोई सवाल नहीं है। लेकिन जिन लोगों के बीच हम यह बात कह रहे हैं, वे कल पीछे के दरवाजे से मार कर खाने लगेंगे। वे सब सज्जन लोग हैं, वे सब नैतिक लोग हैं, बड़े खतरनाक लोग हैं। वे रास्ता कोई न कोई निकाल ही लेंगे, वे पीछे का कोई दरवाजा खोल ही लेंगे।

मैं बुद्ध और महावीर दोनों को पूर्ण अहिंसक मानता हूं। बुद्ध की अहिंसा में रत्ती भर कमी नहीं है। लेकिन बुद्ध ने जो निर्देश दिया है, उसमें चूक हो गई है। वह चूक समाज के साथ हो गई है। अगर समझदारों की दुनिया हो तो चूक होने का कोई कारण नहीं है।

 ओशो (महावीर या महाविनाश)

जनवरी 7, 2015

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं…

पुरखों की कसम खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

आर्य, शक, हूण, मंगोल, मुगल, अंग्रेज,

द्रविड़, आदिवासी, गिरिजन, सुर-असुर

जाने किस-किस का रक्त

प्रवाहित हो रहा है हमारी शिराओं में

उसी मिश्रित रक्त से संचरित है हमारी काया

हाँ हम सब वर्णसंकर हैं।

पंच तत्वों को साक्षी मानकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र, कावेरी से लेकर

वोल्गा, नील, दजला, फरात और थेम्स तक

असंख्य नदियों का पानी हिलोरें मारता है हमारी कोशिकाओं में

उन्हीं से बने हैं हम कर्मठ, सतत् संघर्षशील

सत्यनिष्ठा की शपथ लेकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

जाने कितनी संस्कृतियों को हमने आत्मसात किया है

कितनी सभ्यताओं ने हमारे ह्रदय को सींचा है

हज़ारों वर्षों की लंबी यात्रा में

जाने कितनों ने छिड़के हैं बीज हमारी देह में

हमें बनाए रखा है निरंतर उर्वरा

इस देश की थाती सिर-माथे रखते हुए कहता हूँ

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

बुद्ध, महावीर, चार्वाक, आर्यभट्ट, कालिदास

कबीर, ग़ालिब, मार्क्स, गाँधी, अंबेडकर

हम सबके मानस-पुत्र हैं

तुम सबसे अधिक स्वस्थ एवं पवित्र हैं

इस देश की आत्मा की सौगंध खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

हम एक बाप की संतान नहीं

हममें शुद्ध रक्त नहीं मिलेगा

हमारे नाक-नक्श, कद-काठी, बात-बोली,

रहन-सहन, खान-पान, गान-ज्ञान

सबके सब गवाही देंगे

हमारा डीएन परीक्षण करवाकर देख लो

गुणसूत्रों में मिलेंगे अकाट्य प्रमाण

रख दोगे तुम कुतर्कों के धनुष-बाण

मैं एतद् द्वारा घोषणा करता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

हम जन्मे हैं कई बार कई कोख से

हमें नहीं पता हम किसकी संतान हैं

इतना जानते हैं पर

जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं

हम उस राम के वंशज नहीं

माफ़ करना रामभक्तों

हम रामज़ादे नहीं!

हे शुद्ध रक्तवादियों,

हे पवित्र संस्कृतिवादियों

हे ज्ञानियों-अज्ञानियों

हे साधु-साध्वियों

सुनो, सुनो, सुनो!

हर आम ओ ख़ास सुनो!

नर, मुनि, देवी, देवता

सब सुनो!

हम अनंत प्रसवों से गुज़रे

इस महादेश की जारज़ औलाद हैं

इसलिए डंके की चोट पर कहता हूँ

हम सब हरामज़ादे हैं।

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं।

(मुकेश कुमार , मीडियाकर्मी)

नवम्बर 30, 2013

बुद्ध या शैतान…उसकी मर्जी

कठपुतली वाले नेbuddha-001

गले से बांधकर

लटकाई हैं कठपुतलियां

ह्रदय से नहीं ;

वह शैतान भी निकाल सकता है,

वह बुद्ध भी निकाल सकता है!

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जून 6, 2013

ओशो : राहुल सांकृत्यायन (बौद्ध भिक्षु और वामपंथी लेखक)

Osho rahulमेरे एक मित्र, संस्कृत, पाली और प्राकृत के विद्वान, बौद्ध भिक्षु थे| लेकिन वे कम्यूनिज्म की ओर भी आकर्षित हो गये, और इसका कारण साधारण सी समानता थी, कि बुद्ध के यहाँ भी ईश्वर की परिकल्पना नहीं  है और मार्क्स के यहाँ भी नहीं है| सो वे मार्क्सिज्म की ओर आकर्षित हो गये और अंततः कम्यूनिस्ट बन गये| और सोवियत यूनिवर्सिटी ने उन्हें कहा कि वे वहाँ जाकर  संस्कृत पढाएं और वे मॉस्को चले गये|

भारत से बाहर, मॉस्को में हर चीज अलग थी| यहाँ उनके लिए असंभव था कि बौद्ध भिक्षु भी बने रहते और किसी स्त्री से प्रेम भी कर लेते| सोवियत यूनियन  में ऐसी कोई परेशानी नहीं थी| वे वहाँ एक स्त्री के प्रेम में पड़ गये| लोला– उसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थी और उसके दो बच्चे भी थे|

सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी कि वे लोला और उसके बच्चों को सोवियत संघ के बाहर ले जाएँ, अलबत्ता वहाँ वे उनके साथ रह सकते थे| पर राहुल भारत वापिस आना चाहते थे|  और वे घबराये हुए भी थे| एक तरह से सोवियत सरकार उनकी अंदुरनी इच्छा ही पूरी कर रही थी – कैसे वे पत्नी और दो बच्चों के साथ भारत जा सकते थे? सबने उनकी निंदा की होती, खासकर बौद्धों ने,”तुम एक भिक्षु हो|” सो एक तरह से वे खुश भी थे कि सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी सो अब वह प्रश्न ही खड़ा नहीं हुआ|

वे वापिस आ गये| उन्होंने मुझे बताया,” जब मैं पहले पहले सोवियत संघ पहुंचा मैंने एक छोटे लड़के से पूछा,” क्या तुम ईश्वर में विश्वास रखते हो|” उसने कहा,”ईश्वर! लोग अंधे युगों में उसमें विश्वास किया करते थे| अगर आपको ईश्वर की मूर्ति देखनी हो तो आप म्यूजियम में जा देख सकते हैं|” ”

लेकिन ये सब भी प्रोग्रामिंग है| ऐसा नहीं है कि ऐसे छोटे लड़के जानते हैं कि ईश्वर नहीं है या कि कार्ल  मार्क्स ही जनता था कि ईश्वर नहीं है| केवल ध्यान में गहरे उतरने वाला व्यक्ति ही जां सकता है कि ईश्वर है या नहीं|

आप सब लोग किसी न किसी सांचे में ढाले गये लोग हो| आपकी प्रोग्रामिंग की गई है| और तुम्हारे साथ यह इतने गहरे में किया गया है कि तुम समझने लगे हो कि यह तुम्हारा स्वभाव है| तुम्हारी कल्पनाएं, तुम्हारी आशा, तुम्हारा भविष्य …कुछ भी प्राकृतिक नहीं है|

प्रकृति इस क्षण के सिवाय कुछ नहीं जानती| प्रकृति कुछ नहीं जानती, आशा, इच्छाएं , लालसा| प्रकृति तो आनंद उठाती है उसका जो इस क्षण, अभी और यहीं, उपलब्ध है|

राहुल ने मुझे बताया,” रशियन लोगों के लिए सबसे बड़ी अचरज की बात थी मेरे हाथ|”

मैंने कहा,” आपके हाथ!”

उन्होंने कहा,” हाँ मेरे हाथ! जब भी मैं उनसे हाथ मिलाता, वे तुरंत अपने हाथ खींच लेते और कहते,”तुम जरुर बुजुर्वा हो, तुम्हारे हाथ बताते हैं कि तुमने कभी काम नहीं किया|””

मैंने बौद्ध भिक्षु से कहा,”आप मेरे हाथ का स्पर्श करो| तब आपको पता लगेगा कि आप श्रमजीवी हो और मैं बुजुर्वा| यह आपको बहुत बड़ा दिलासा देगा|”

अगस्त 23, 2011

ओशो : कृष्ण प्रतीक हैं हँसते व जीवंत धर्म के

कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं। भविष्य में ही यह संभव हो पाएगा कि कृष्ण को हम समझ पाएँ।

इसके कुछ कारण हैं।

सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं, जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं। साधारणत: संत का लक्षण ही रोता हुआ होना है। जिंदगी से उदास, हारा हुआ, भागा हुआ। कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं, हँसते हुए, गीत गाते हुए। अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म उदास आँसुओं से भरा हुआ था। हँसता हुआ धर्म, जीवन को समग्र रूप से स्वीकार करनेवाला धर्म, अभी पैदा होने को है। निश्चित ही पुराना धर्म मर गया है, और पुराना ईश्वर, जिसे हम अब तक ईश्वर समझते थे, जो हमारी धारणा थी ईश्वर की, वह भी मर गई है।

जीसस के संबंध में कहा जाता है कि वह कभी हँसे नहीं। शायद जीसस का यह उदास व्यक्तित्व और सूली पर लटका हुआ उनका शरीर ही हम दुखी चित्त लोगों के बहुत आकर्षण का कारण बन गया। महावीर या बुद्ध बहुत गहरे अर्थों में जीवन के विरोधी हैं। कोई और जीवन है परलोक में, कोई मोक्ष है, उसके पक्षपाती हैं। समस्त धर्मों ने दो हिस्से कर रखे हैं जीवन के-एक वह, जो स्वीकार करने योग्य है और एक वह, जो इंकार करने के योग्य है।

कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है। और वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया।

अल्बर्ट श्वीत्जर ने भारतीय धर्म की आलोचना में एक बड़ी कीमत की बात कही है, और वह यह कि भारत का धर्म जीवन-निषेधक, ‘लाइफ निगेटिव’ है। यह बात बहुत दूर तक सच है, यदि कृष्ण को भुला दिया जाए। और यदि कृष्ण को भी विचार में लिया जाए तो यह बात एकदम ही गलत हो जाती है। और श्वीत्जर यदि कृष्ण को समझते तो ऐसी बात न कह पाते। लेकिन कृष्ण की कोई व्यापक छाया भी हमारे चित्त पर नहीं पड़ी है। वे अकेले दु:ख के एक महासागर में नाचते हुए एक छोटे से द्वीप हैं। या ऐसा हम समझें कि उदास और निषेध और दमन और निंदा के बड़े मरुस्थल में एक बहुत छोटे-से नाचते हुए मरुद्यान हैं। वह हमारे पूरे जीवन की धारा को नहीं प्रभावित कर पाए। हम ही इस योग्य न थे, हम उन्हें आत्मसात न कर पाए।

मनुष्य का मन अब तक तोड़कर सोचता रहा, द्वंद्व करके सोचता रहा। शरीर को इंकार करना है, आत्मा को स्वीकार करना है, तो आत्मा और शरीर को लड़ा देना है। परलोक को स्वीकार करना है, इहलोक को इंकार करना है तो इहलोक और परलोक को लड़ा देना है। स्वभावत: यदि हम शरीर को इंकार करेंगे, तो जीवन उदास हो जाएगा। क्योंकि जीवन के सारे रसस्रोत और सारा स्वास्थ्य और जीवन का सारा संगीत और सारी वेदनाएँ शरीर से आ रही हैं। शरीर को जो धर्म इंकार कर देगा, वह पीतवर्ण हो जाएगा, रक्तशून्य हो जाएगा। उस पर से लाली खो जाएगी। वह पीले पत्ते की तरह सूखा हुआ धर्म होगा। उस धर्म की मान्यता भी जिनके मन में गहरी बैठेगी वे भी पीले पत्तों की तरह गिरने की तैयारी में संलग्न, मरने के लिए उत्सुक और तैयार हो जाएँगे।

कृष्ण अकेले हैं, जो शरीर को उसकी समस्तता में स्वाकीर कर लेते हैं, उसकी ‘टोटलिटी’ में। यह एक आयाम में नहीं, सभी आयाम में सच है। शायद कृष्ण को छोड़कर… कृष्ण को छोड़कर, और पूरे मनुष्यता के इतिहास में जरथुस्त्र एक दूसरा आदमी है, जिसके बाबत यह कहा जाता है कि वह जन्म लेते ही हँसा। सभी बच्चे रोते हैं। एक बच्चा सिर्फ मनुष्यजाति के इतिहास में जन्म लेकर हँसा है। यह सूचक है। यह सूचक है इस बात का कि अभी हँसती हुई मनुष्यता पैदा नहीं हो पाई। और कृष्ण तो हँसती हुई मनुष्यता को ही स्वीकार हो सकते हैं। इसलिए कृष्ण का बहुत भविष्य है। फ्रॉयड-पूर्व धर्म की जो दुनिया थी, वह फ्रॉयड-पश्चात् नहीं हो सकती। एक बड़ी क्रांति घटित हो गई है, और एक बड़ी दरार पड़ गई है मनुष्य की चेतना में। हम जहाँ थे फ्रॉयड के पहले, अब हम वहीं कभी भी नहीं हो सकेंगे। एक नया शिखर छू लिया गया है और एक नई समझ पैदा हो गई है। वह समझ समझ लेनी चाहिए।

पुराना धर्म सिखाता था आदमी को दमन और ‘सप्रेशन’। काम है, क्रोध है, लोभ हैं, मोह है। सभी को दबाना है और नष्ट कर देना है। और तभी आत्मा उपलब्ध होगी और तभी परमात्मा उपलब्ध होगा। यह लड़ाई बहुत लंबी चली। इस लड़ाई के हजारों साल के इतिहास में भी मुश्किल से दस-पाँच लोग हैं, जिनको हम कह पाएँ कि उन्होंने परमात्मा को पा लिया। एक अर्थ में यह लड़ाई सफल नहीं हुई। क्योंकि अरबों-खरबों लोग बिना परमात्मा को पाए मरे हैं। जरूर कहीं कोई बुनियादी भूल थी। यह ऐसा ही है जैसे कि कोई माली पचास हजार पौधे लगाए और एक पौधे में फूल आ जाएँ, और फिर भी हम उस माली के शास्त्र को मानते चले जाएँ, और हम कहें कि देखो एक पौधे में फूल आए ! और हम इस बात का खयाल ही भूल जाएँ कि पचास करोड़ पौधों में अगर एक पौधे में फूल आते हैं, तो यह माली की वजह से न आए होंगे, यह माली से किसी तरह बच गया होगा पौधा, इसिलए आ गए हैं। क्योंकि माली का प्रमाण तो बाकी पचास करोड़ पौधे हैं, जिनमें फूल नहीं आते, पत्ते नहीं लगते, सूखे ठूँठ रह जाते हैं।

एक बुद्ध, एक महावीर, एक क्राइस्ट अगर परमात्मा को उपलब्ध हो जाते हैं, द्वंद्वग्रस्त धर्मों के बावजूद, तो यह कोई धर्मों की सफलता का प्रमाण नहीं है। धर्मों की सफलता का प्रमाण तो तब होगा, माली तो तब सफल समझा जाएगा, जब पचास करोड़ पौधों में फूल लगें और एक में न लग पाएँ तो क्षमा-योग्य है। कहा जा सकेगा कि यह पौधे की गलती हो गई। इसमें माली की गलती नहीं हो सकती। पौधा बच गया होगा माली से, इसलिए सूख गया है, इसलिए फल नहीं आते हैं।
फ्रॉयड के साथ ही एक नई चेतना का जन्म हुआ और वह यह कि दमन गलत है। और दमन मनुष्य को आत्महिंसा में डाल देता है। आदमी अपने ही से लड़ने लगे तो सिर्फ नष्ट हो सकता है। अगर मैं अपने बाएँ और दाएँ हाथ को लड़ाऊँ तो न तो बायाँ जीतेगा, न दायाँ जीतेगा, लेकिन मैं हार जाऊँगा। दोनों हाथ लड़ेंगे और मैं नष्ट हो जाऊँगा। तो दमन ने मनुष्य को आत्मघाती बना दिया, उसने अपनी ही हत्या अपने हाथों कर ली।

कृष्ण, फ्रॉयड के बाद जो चेतना का जन्म हुआ है, जो समझ आई है, उस समझ के लिए कृष्ण ही अकेले हैं, जो सार्थक मालूम पड़ सकते हैं क्योंकि पुराने मनुष्य-जाति के इतिहास में कृष्ण अकेले हैं, जो दमनवादी नहीं हैं। उन्होंने जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिया है। वे प्रेम से भागते नहीं। वे पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वे परमात्मा को अनुभव करते हुए युद्ध से विमुख नहीं होते। वे करुणा और प्रेम से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। अहिंसक चित्त है उनका, फिर भी हिंसा के ठेठ दावानल में उतर जाते हैं। अमृत की स्वीकृति है उन्हें, लेकिन जहर से कोई भय भी नहीं है। और सच तो यह है, जिसे भी अमृत का पता चल गया है उसे जहर का भय मिट जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा अमृत ही क्या, जो जहर से फिर डरता चला जाए। और जिसे अहिंसा का सूत्र मिल गया उसे हिंसा का भय मिट जाना चाहिए। ऐसी अहिंसा ही क्या, जो अभी हिंसा से भी भयभीत और घबराई हुई है। और ऐसी आत्मा भी क्या, जो शरीर से भी डरती हो और बचती हो ! और ऐसे परमात्मा का क्या अर्थ, जो सारे संसार को अपने आलिंगन में न ले सकता हो। तो कृष्ण द्वंद्व को एक-सा स्वीकार कर लेते हैं। और इसलिए द्वंद्व के अतीत हो जाते हैं। ‘ट्रांसेंडेंस’ जो है, अतीत जो हो जाना है, वह द्वंद्व में पड़कर कभी संभव नहीं है, दोनों को एक साथ स्वीकार कर लेने से संभव है।

तो भविष्य के लिए कृष्ण की बड़ी सार्थकता है। और भविष्य में कृष्ण का मूल्य निरंतर बढ़ते ही जाने को है। जबकि सबके मूल्य फीके पड़ जाएँगे और द्वंद्व-भरे धर्म जबकि पीछे अँधेरे में डूब जाएँगे और इतिहास की राख उन्हें दबा देगी, तब भी कृष्ण का अंगार चमकता हुआ रहेगा। और भी निखरेगा, क्योंकि पहली दफा मनुष्य इस योग्य होगा कि कृष्ण को समझ पाए। कृष्ण को समझना बड़ा कठिन है। आसान है यह बात समझना कि एक आदमी संसार को छोड़कर चला जाए और शांत हो जाए। कठिन है इस बात को समझना कि संसार के संघर्ष में, बीच में खड़ा होकर और शांत हो। आसान है यह बात समझनी कि आदमी विरक्त हो जाए, आसक्ति के संबंध तोड़कर भाग जाए और उसमें एक पवित्रता का जन्म हो। कठिन है यह बात समझनी कि जीवन के सारे उपद्रव के बीच, जीवन के सारे उपद्रव में अलिप्त, जीवन के सारे धूल-धवाँस के कोहरे और आँधियों में खड़ा हुआ दिया हिलता न हो, उसकी लौ कँपती न हो-कठिन है यह समझना। इसलिए कृष्ण को समझना बहुत कठिन था। निकटतम जो कृष्ण थे, वे भी नहीं समझ सकते।

लेकिन पहली दफा एक महान प्रयोग हुआ है। पहली दफा आदमी ने अपनी शक्ति का पूरा परीक्षण कृष्ण में किया है। ऐसा परीक्षण कि संबंधों में रहते हुए असंग रहा जा सके, और युद्ध के क्षण पर भी करुणा न मिटे। और हिंसा की तलवार हाथ में हो, तो भी प्रेम का दिया मन से न बुझे।

इसलिए कृष्ण को जिन्होंने पूजा भी है, जिन्होंने कृष्ण की आराधना भी की है, उन्होंने भी कृष्ण के टुकड़े-टुकड़े करके किया है। सूरदास के कृष्ण कभी बच्चे से बड़े नहीं हो पाते। बड़े कृष्ण के साथ खतरा है। सूरदास बर्दाश्त न कर सकेंगे। वह बाल कृष्ण को ही..क्योंकि बालकृष्ण अगर गाँव की स्त्रियों को छेड़ आता है तो हमें बहुत कठिनाई नहीं है। लेकिन युवा कृष्ण जब गाँव की स्त्रियों को छेड़ देगा तो फिर बहुत मुश्किल हो जाएगा। फिर हमें समझना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि हम अपने ही तल पर तो समझ सकते हैं। हमारे अपने तल के अतिरिक्त समझने का हमारे पास कोई उपाय भी नहीं है। तो कोई है, जो कृष्ण के एक रूप को चुन लेगा; कोई है, जो दूसरे रूप को चुन लेगा। गीता को प्रेम करनेवाले भागवत की उपेक्षा कर जाएँगे, क्योंकि भागवत का कृष्ण और ही है। भागवत को प्रेम करनेवाले गीता की चर्चा में पड़ेगे, क्योंकि कहाँ राग-रंग और कहाँ रास और कहाँ युद्ध का मैदान ! उनके बीच कोई ताल-मेल नहीं है। शायद कृष्ण से बड़े विरोधों को एक-साथ पी लेनेवाला कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। इसिलए कृष्ण की एक-एक शक्ल को लोगों ने पकड़ लिया है। जो जिसे प्रीतिकर लगी है, उसे छांट लिया है, बाकी शक्ल को उसने इंकार कर दिया है।

गांधी गीता को माता कहते हैं, लेकिन गीता को आत्मसात नहीं कर सके। क्योंकि गाँधी की अहिंसा युद्ध की संभावनाओं को कहाँ रखेगी ? तो गांधी उपाय खोजते हैं, वह कहते हैं कि यह जो युद्ध है, यह सिर्फ रूपक है, यह कभी हुआ नहीं । यह मनुष्य के भीतर अच्छाई और बुराई की लड़ाई है। यह जो कुरुक्षेत्र है, यह कहीं कोई बाहर का मैदान नहीं है, और ऐसा नहीं है कि कृष्ण ने कहीं अर्जुन को किसी बाहर के युद्ध में लड़ाया हो। यह तो भीतर के युद्ध की रूपक-कथा है। यह ‘पैरबेल’ है, यह एक कहानी है। यह एक प्रतीक है। गांधी को कठिनाई है। क्योंकि गांधी का जैसा मन है, उसमें तो अर्जुन ही ठीक मालूम पडे़गा। अर्जुन के मन में बड़ी अहिंसा का उदय हुआ है। वह युद्ध छोड़कर भाग जाने को तैयार है। वह कहता है, अपनों को मारने से फायदा क्या ? और वह कहता है, इतनी हिंसा करके धन पाकर भी, यश पाकर भी, राज्य पाकर भी मैं क्या करूँगा? इससे तो बेहतर है कि मैं सब छोड़कर भिखमंगा हो जाऊँ। इससे तो बेहतर है कि मैं भाग जाऊँ और सारे दु:ख वरण कर लूँ, लेकिन हिंसा में न पड़ूँ। इससे मेरा मन बड़ा कँपता है। इतनी हिंसा अशुभ है।

कृष्ण की बात गांधी की पकड़ में कैसे आ सकती हैं ? क्योंकि कृष्ण उसे समझाते हैं कि तू लड़। और लड़ने के लिए जो-जो तर्क देते हैं, वह ऐसा अनूठा है कि इसके पहले कभी भी नहीं दिया गया था। उसको परम अहिंसक ही दे सकता है, उस तर्क को।

कृष्ण का यह तर्क है कि जब तक तू ऐसा मानता है कि कोई मर सकता है, तब तक तू आत्मवादी नहीं है। तब तक तुझे पता ही नहीं है कि जो भीतर है, वह कभी मरा है, न कभी मर सकता है। अगर तू सोचता है कि मैं मार सकूँगा, तो तू बड़ी भ्रांति में है, बड़े अज्ञान में है। क्योंकि मारने की धारणा ही भौतिकवादी की धारणा है। जो जानता है, उसके लिए कोई मरता नहीं है। तो अभिनय है- कृष्ण उससे कह रहे हैं-मरना और मारना लीला है, एक नाटक है।

इस संदर्भ में यह समझ लेना उचित होगा कि राम के जीवन को हम चरित्र कहते हैं। राम बड़े गंभीर हैं। उनकी जीवन लीला नहीं है, चरित्र ही है। लेकिन कृष्ण गंभीर नहीं है। कृष्ण का चरित्र नहीं है वह, कृष्ण की लीला है। राम मर्यादाओं से बँधे हुए व्यक्ति हैं, मर्यादाओं के बाहर वे एक कदम न बढ़ेंगे। मर्यादा पर वे सब कुर्बान कर देंगे। कृष्ण के जीवन में मर्यादा जैसी कोई चीज ही नहीं है। अमर्यादा। पूर्ण स्वतंत्र। जिसकी कोई सीमा नहीं, जो कहीं भी जा सकता है। ऐसी कोई जगह नहीं आती, जहाँ वह भयभीत हो और कदम को ठहराए। यह अमर्यादा भी कृष्ण के आत्म-अनुभव का अंतिम फल है। तो हिंसा भी बेमानी हो गई है वहाँ, क्योंकि हिंसा हो नहीं सकती। और जहाँ हिंसा ही बेमानी हो गई हो, वहाँ अहिंसा भी बेमानी हो जाती है। क्योंकि जब तक हिंसा सार्थक है और हिंसा हो सकती है, तभी तक अहिंसा भी सार्थक है। असल में हिंसक अपने को मानना भौतिकवाद है, अहिंसक अपने को मानना भी उसी भौतिकवाद का दूसरा छोर है। एक मानता है मैं मार डालूँगा, एक मानता है मैं मारूँगा नहीं, मैं मारने को राजी ही नहीं हूँ। लेकिन दोनों मानते हैं कि मारा जा सकता है।

ऐसा अध्यात्म युद्ध को भी खेल मान लेता है। और जो जीवन की सारी दिशाओं को राग की, प्रेम की, भोग की, काम की, योग की, ध्यान की समस्त दिशाओं को एक साथ स्वीकार कर लेता है। इस समग्रता के दर्शन को समझने की संभावना रोज बढ़ती जा रही है, क्योंकि अब हमें कुछ बातें पता चली हैं, जो हमें कभी भी पता नहीं थीं। लेकिन कृष्ण को निश्चित ही पता रही हैं।

जैसे हमें आज जाकर पता चला कि शरीर और आत्मा जैसी दो चीजें नहीं है। आत्मा का जो छोर दिखाई पड़ता है, वह शरीर है, और शरीर का जो छोर दिखाई नहीं पड़ता है, वह आत्मा है। परमात्मा और संसार जैसी दो चीजें नहीं हैं। परमात्मा और प्रकृति जैसा द्वंद्व नहीं है कहीं। परमात्मा का हिस्सा दृश्य हो गया है, वह प्रकृति है। और जो अब भी अदृश्य है, वह परमात्मा है। कहीं भी ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ प्रकृति खत्म होती है और परमात्मा शुरू होता है। बस प्रकृति ही लीन होते-होते परमात्मा बन जाती है। परमात्मा ही प्रगट होते-होते प्रकृति बन जाता है। अद्वैत का यही अर्थ है। और इस अद्वैत की अगर हमें धारणा स्पष्ट हो जाए, इसकी प्रतीति हो जाए, तो कृष्ण को समझा जा सकता है।

साथ ही भविष्य में और क्यों कृष्ण के मूल्य और कृष्ण की सार्थकता बढ़ने को है और कृष्ण क्यों मनुष्य के और निकट आ जाएँगे ? अब दमन संभव नहीं हो सकेगा। बड़े लंबे संघर्ष और बड़े लंबे ज्ञान की खोज के बाद ज्ञात हो सका कि जिन शक्तियों से हम लड़ते हैं, वे शक्तियाँ हमारी ही हैं, हम ही हैं। इसलिए उनसे लड़ने से बड़ा कोई पागलपन नहीं हो सकता। और यह भी ज्ञात हुआ है कि जिससे हम लड़ते हैं, हम सदा के लिए उसी से घिरे रह जाते हैं।  उसे हम कभी रूपांतरित नहीं कर पाते। उसका ‘ट्रांसफार्मेशन’ नहीं होता।

अगर कोई व्यक्ति काम से लड़ेगा तो उसके जीवन में ब्रह्मचर्य कभी भी घटित नहीं हो सकता। अगर ब्रह्मचर्य घटित हो सकता है तो एक ही उपाय है कि वह अपनी काम की ऊर्जा को कैसे रूपांतरित करे। काम की ऊर्जा से लड़ना नहीं है, काम की ऊर्जा को कैसे रूपांतरित करे। काम की ऊर्जा से दुश्मनी नहीं लेनी, काम की ऊर्जा से मैत्री साधनी है। क्योंकि हम सिर्फ उसी को बदल सकते हैं, जिससे हमारी मैत्री है। जिसके हम शत्रु हो गए उसको बदलने का सवाल नहीं। जिसके हम शत्रु हो गए उसको समझने का भी उपाय नहीं है। समझ भी हम उसे ही सकते हैं, जिससे हमारी मैत्री है।

तो जो हमें निकृष्टतम दिखाई पड़ रही है, वह भी श्रेष्ठतम का ही छोर है। पर्वत का जो बहुत ऊपर का शिखर है, वह, और पर्वत के पास की जो बहुत गहरी खाई है, ये दो घटनाएँ नहीं हैं। ये एक ही घटना के दो हिस्से हैं। यह जो खाई बनी है, यह पर्वत के ऊपर उठने से बनी है। यह जो पर्वत ऊपर उठ सका है, यह खाई के बनने से ऊपर उठ सका है। ये दो चीजें नहीं हैं। पर्वत और खाई हमारी भाषा में दो हैं, अस्तित्व में एक ही चीज के दो छोर हैं।

नीत्शे का एक बहुत कीमती वचन है। नीत्शे ने कहा है कि जिस वृक्ष को आकाश की ऊँचाई छूनी हो, उसे अपनी जड़े पाताल की गहराई तक पहुँचनी पड़ती हैं। और अगर कोई वृक्ष अपनी जड़ों को पाताल तक पहुँचाने से डरता है, तो उसे आकाश तक पहुँचने की आकांक्षा भी छोड़ देनी पड़ती है। असल में जितनी ऊंचाई, उतने ही गहरे भी जाना पड़ता है। जितना ऊँचा जाना हो उतना ही नीचे भी जाना पड़ता है। निचाई और ऊँचाई दो चीजें नहीं हैं, एक ही चीज के दो आयाम हैं और वे सदा समानुपात हैं, एक ही अनुपात में बढ़ते हैं।

मनुष्य के मन ने सदा चाहा कि वह चुनाव कर ले। उसने चाहा कि स्वर्ग को बचा ले और नर्क को छोड़ दे। उसने कहा कि शांति को बचा ले, तनाव को छोड़ दे। उसने चाहा शुभ को बचा ले, अशुभ को छोड़ दे। उसने चाहा प्रकाश ही रहे, अंधकार न रह जाए। मनुष्य के मन के अस्तित्व को दो हिस्सों में तोड़कर एक हिस्से का चुनाव किया और दूसरे का इंकार किया। इससे द्वंद्व पैदा हुआ, इससे द्वैत पैदा हुआ। कृष्ण दोनों को एक साथ स्वीकार करने के प्रतीक है। नहीं तो अपूर्ण ही रह जाएगा। जितने को चुनेगा, उतना हिस्सा रह जाएगा और जिसको इंकार करेगा, सदा उससे बँधा रहेगा। उससे बाहर नहीं जा सकता है। जो व्यक्ति काम का दमन करेगा, उसका चित्त कामुक-से-कामुक होता चला जाएगा। इसलिए जो संस्कृति, जो धर्म काम का दमन सिखाता है, वह संस्कृति कामुकता पैदा कर जाती है।

हमने कृष्ण के उन हिस्सों का इंकार किया, जो काम की स्वीकृति है। लेकिन अब यह संभव हो जाएगा, क्योंकि अब हमें दिखाई पड़ना शुरू हुआ है कि काम की ऊर्जा, वह जो ‘सेक्स इनर्जी’ है, वह ऊर्ध्वगमन करके ब्रह्मचर्य के उच्चतम शिखरों को छू पाती है। जीवन में किसी से भागना नहीं है और जीवन में किसी को छोड़ना नहीं है, जीवन को पूरा ही स्वीकार करके जीना है। उसको जो समग्रता से जीता है, वह जीवन को पूर्णता को उपलब्ध होता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि भविष्य के संदर्भ में कृष्ण का बहुत मूल्य है और हमारा वर्तमान रोज उस भविष्य के करीब पहुँचता है, जहाँ कृष्ण की प्रतिमा निखरती जाएगी और एक हँसता हुआ धर्म, एक नाचता हुआ धर्म जल्दी निर्मित होगा। तो उस धर्म की बुनियादों में कृष्ण का पत्थर जरूर रहने को है।

फ़रवरी 23, 2011

Buddhism चीन से आया भारत : Paulo Coelho

बहुधा ऐसा हो जाता है कि विश्व प्रसिद्ध विदेशी लेखक अपनी पुस्तकों में भारत से जुड़ी बातों को गलत ढ़ंग से प्रस्तुत करते हैं। कई बार तो उन्हे जानकारी ही नहीं होती और वे केवल अनुमान के भरोसे कुछ लिख डालते हैं और कई दफा वे भारत के बारे में फैले भ्रमों के कारण उसे हल्के ढ़ंग से लेने के कारण इसे और इससे जुड़े मामलों को गम्भीरता से नहीं लेते और गलत तथ्यों का समावेश अपनी पुस्तकों में कर डालते हैं। फिल्म निर्देशक भी इन मामलों में पीछे नहीं हैं।

Buddhism और भारत के जुड़ाव के सम्बंध में विदेशी लेखकों में अक्सर भ्रम देखने को मिलता है। आयरलैंड के रहने वाले प्रसिद्ध लेखक J. H. Brennan अपनी पुस्तक Tibetan Magic and Mysticism में तिब्बत पर Buddhism के पड़ने वाले असर की चर्चा करते हुये लिखते हैं –

There is no question at all that the doctrines of the Buddha helped change Tibetan history. All the same, Buddhism alone is no guarantee of a peaceful culture. India, the home of Gautam Buddha, has been to war twice in my life time.

शोध करके लिखने वाले लेखकों का यह हाल है कि वे अपने समय के भारत के बारे में भी इस सत्य को नज़रअंदाज कर जाते हैं कि सन 1947 के बाद से ही भारत ने किसी भी देश पर अपनी ओर से आक्रमण नहीं किया है। विभाजन के बाद पहले कश्मीर को लेकर, बाद में सन 1965 में और 1971 में और 1999 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके शांतिप्रिय लोकतांत्रिक देश पर युद्ध थोपे थे।  1962 में साम्राज्यवादी चीन ने भारत पर धोखे से आक्रमण किया और अपने इस शांतिप्रिय पड़ोसी देश को युद्ध में घसीटा।

दुनिया में बहुत बड़े-बड़े विदेशी विद्वान हैं जो भारत और चीन को एक ही शीशे से देखते हैं।  और सब बातों में उनके विचार सटीक पाये जाते हैं तब भारत के मामले में वे कैसे इतनी लापरवाही का परिचय दे देते हैं। भारत चीन जैसा शक्त्तिशाली देश नहीं है और न ही चीन की तरह उसे यू.एन में वीटो पॉवर मिली हुयी है और न ही वह चीन की भाँति दुनिया भर को घुड़की देता घूमता है। भारत एक सॉफ्ट देश है और यह बात सभी मुल्क जानते हैं।

दशकों से दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों से लोग विकसित पश्चिमी देशों में काम करने या रहने जाते रहे हैं। प्रवासी चीनी लोग लगभग हर विकसित देश में बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं और वे वहाँ एक समूह के रुप में रहते हैं और वहाँ भी उनकी एक सामुहिक शक्त्ति कायम रहती है। जबकि भारतीय एकल रुप में विकास करने में ज्यादा रुचि लेते हैं और पूजाघरों और अन्य सामाजिक स्थलों पर मेलमिलाप का दिखावा करने के अलावा वे अंदर से बाहर के देशों में भी बँटे ही रहते हैं।

विश्व प्रसिद्ध लेखक Paulo Coelho सन 2005 में प्रकाशित होने वाले उपन्यास – The Zahir में एक स्थान पर लिखते हैं कि Buddhism चीन से भारत में आया।

And he started telling me about his life, while I tried to remember what I knew about the Silk Road, the old commercial route that connected Europe with the countries of the East. The traditional route started in Beirut, passed through Antioch and went all the way to the shores of the Yangtse in China; but in Central Asia it became a kind of web, with roads heading off in all directions, which allowed for the establishment of trading posts, which, in time, became towns, which were later destroyed in battles between rival tribes, rebuilt by the inhabitants, destroyed, and rebuilt again. Although almost everything passed along that route—gold, strange animals, ivory, seeds, political ideas, refugees from civil wars, armed bandits, private armies to protect the caravans—silk was the rarest and most coveted item. It was thanks to one of these branch roads that Buddhism traveled from China to India.

दुनिया में ऐसे भी लोग होंगे जिन्हे भारत और बुद्ध के बारे में न पता हो और Paulo Coelho की किताब में लिखा गलत तथ्य उन्हे सही जानकारी लगेगा और वे इसे ही सत्य मानेंगे।

सन 2006 के फरवरी माह में उन्हे लिखे एक ईमेल में उनकी पुस्तक में उपस्थित इस गलती की ओर उनका ध्यान दिलवाये जाने पर उन्होने जवाब तो लिखा पर इस मुद्दे पर कोई भी बात नहीं लिखी। चूँकि पुस्तक शायद स्पेनिश से अंग्रेजी में अनुवादित होकर प्रकाशित हुयी थी तो बहुत संभावना है कि अनुवाद के कारण ऐसी गलती रह गयी हो। आशा थी कि आने वाले संस्करण में ऐसी तथ्यागत गलती का सुधार करवा लेंगे परंतु हाल ही में The Zahir का एक नया संस्करण देखने को मिला और उसमें गलती अभी तक उपस्थित है।

ऐसी गलती वे अमेरिका और अन्य शक्त्तिशाली देशों से जुड़ी बातों के साथ नहीं करेंगे, परंतु उन्हे भी पता है कि भारत से जुड़ी बातों को कैसे भी प्रस्तुत कर दो।

नेतृत्व से बहुत फर्क पड़ता है कि भारत के नेता कैसा व्यवहार भारत से बाहर करते हैं। कहीं भारत के नेताओं के कपड़े उतार लिये जाते हैं और कहीं भारतीयों से बदसलूकी की जाती है पर भारत के विदेश मंत्रालय के कानों पर जूँ नहीं रेंगती।

सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि विदेश मत्रांलय और इससे जुड़े अधिकारी बाहर के देशों में जाने वाले ज्यादातर भारतीयों को अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्त्ति मानकर चलती है, ज्यादातर तो उनका व्यवहार ऐसा ही रहता है कि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर आने-जाने वाला हर साधारण भारतीय कबूतरबाजी या अवैध किस्म के कागजों से विदेश जा रहा है या वहाँ से आया है।

भारत का नेतृत्व और मीडिया इसी बात से खुश रहता है कि किसी शक्त्तिशाली देश ने विदेश यात्रा के दौरान हमारे नेता को भोज दिया या  अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में अपने पड़ोस में बैठा लिया या भोज के बाद हाथ धोने के लिये जाते समय रुककर मुस्कुराकर बातें कीं।

चीन अपने लिये जितने फायदे अपने लिये दूसरे देशों से ले लेता है उतनी समझ और उतने ठसके की कल्पना भी भारत नहीं कर सकता।

दूसरों को सम्मान देने का मतलब उनकी गलत-सलत माँगों के सामने बिछना नहीं होता।

पिछले कम से कम बीस-पच्चीस सालों में भारत में उच्च तबके में समृद्धि भले ही बढ़ी हो पर भारतीय नेतृत्व की कमजोरी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा दिखायी देती रही है। इसे चाहें तो गठबंधन सरकारों का साइड इफेक्ट कह लें या कि बिजनेस के दौर में माँगते रहने की प्रवृत्ति के कारण हर बात को पैसे से तोलने की नयी प्रवृत्ति से अपने को कमजोर समझकर आत्मसम्मान में कमी का प्रभाव।

ताज्जुब होता है यह पढ़कर या सुनकर कि 1971 में बांगलादेश मुक्त्ति के संघर्ष के समय जब अमेरिका ने अपने जहाजी बेड़े भारत की हदों में समुद्र में लाकर खड़े कर दिये थे तब भी भारत गरीब होते हुये भी इस घुड़की में नहीं आया था और देश ने आत्म सम्मान को ज्यादा तवज्जो दी थी।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में तब भी भारत के रुख के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाया जा रहा था।

उसी दौरान बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार से, उस वक्त्त देश की प्रधानमत्रीं रहीं श्रीमति इंदिरा गाँधी के तेवर देख कर रोमांच हो उठता है कि एक गरीब और विकासशील देश दुनिया की आँखों में आँखें डालकर भारत के खिलाफ फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का जवाब दे सकता है और विश्व  शक्त्तियों को उनके गलत कार्यों की याद दिला सकता है।

अगर सत्तर के दशक की भारतीय प्रधानमंत्री ऐसा आत्मविश्वास और आत्मसम्मान दुनिया को दिखा सकीं तो आज जबकि भारत पहले से ज्यादा समृद्ध है तब भारत को क्या हो गया है जो वैश्विक मंचों पर एक भ्रष्टाचारी, कमजोर और लुंजपुंज देश के रुप में अपने को प्रस्तुत कर रहा है। भारत अवैध घुसपैठ का मसला हो या बाहरी शक्त्तियों द्वारा देश में फैलाये आतंकवाद का या मुक्त्त व्यापार के नाम पर भारत से ठगी करने का, चुप्पी साधे सब सहन करता जाता है।

भारत और भारतीयों को अपने आत्मसम्मान की फिक्र करनी चाहिये और देश के बारे में फैली किसी भी गलत बात का विरोध उचित मंच पर करना चाहिये।

दंभी होना निम्नस्तरीय दोष है पर एक देश सज्जन होते हुये भी अपने आत्मसम्मान के लिये चारित्रिक दृढ़ता संसार को दिखा सकता है और इस लक्ष्य को पाने में देश में रहने वाले और दुनिया में हर जगह रहने वाले भारतीयों के प्रयास महत्वपूर्ण हैं।

देश की साख होगी तो प्रवासियों को भी उचित स्थान और सम्मान हर देश में मिलेगा। केवल अपने भले के लिये देश की साख पर बट्टा लगाने वाली बातों की अनदेखी इस लोभ से करना कि उनके व्यक्तिगत हितों को विदेश में नुकसान न पहुँचे, भारतीयों को कम से कम ऊँचाई पर तो नहीं ले जाता।

खुले दिमाग वाले विदेशी इस बात को कहते भी हैं कि जाने क्यों भारतीयों को अपने देश के गौरवशाली इतिहास और नायकों को सम्मान देना नहीं आता। विदेशियों की निगाहों में अच्छा और उदार दिखने के लिये भारतीय अपने नायकों को नीचे घसीटने से कभी पीछे नहीं रहते।

जिन भारतीय नायकों को विदेशी भी सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं उन्हे भी भारतीय कोसने से बाज नहीं आते।

अनुचित अंधी प्रशंसा न करें पर द्वेषपूर्ण अंधी आलोचना भी तो न करें। एक संतुलित दृष्टिकोण रखना तो अनुचित बात नहीं है न।

राजनीतिक दलों के आपसी द्वंदों में फँसकर आम भारतीय भी बंट गया है और यह बँटवारा भारत की विरासत के साथ अत्याचार कर रहा है। भारत की सामुहिक चेतना का ऐसे टुकड़े टुकड़े होना देश के सम्मान को हर दिशा से खोखला कर रहा है।

…[राकेश]

फ़रवरी 18, 2011

स्वतंत्रता : मोहम्मद का नुस्खा ओशो का शहद

मोहम्मद का एक शिष्य है, अली। और अली मोहम्मद से पूछता है कि बड़ा विवाद है सदा से कि मनुष्य स्वतंत्र है अपने कृत्य में या परतंत्र! बंधा है कि मुक्त! मैं जो करना चाहता हूं वह कर सकता हूं या नहीं कर सकता हूं?

सदा से आदमी ने यह पूछा है। क्योंकि अगर हम कर ही नहीं सकते कुछ, तो फिर किसी आदमी को कहना कि चोरी मत करो, झूठ मत बोलो, ईमानदार बनो, नासमझी है! एक आदमी अगर चोर होने को ही बंधा है, तो यह समझाते फिरना कि चोरी मत करो, नासमझी है! या फिर यह हो सकता है कि एक आदमी के भाग्य में बदा है कि वह यही समझाता रहे कि चोरी न करो–जानते हुए कि चोर चोरी करेगा, बेईमान बेईमानी करेगा, असाधु असाधु होगा, हत्या करने वाला हत्या करेगा, लेकिन अपने भाग्य में यह बदा है कि अपन लोगों को कहते फिरो कि चोरी मत करो! एब्सर्ड है! अगर सब सुनिश्चित है तो समस्त शिक्षाएं बेकार हैं; सब प्रोफेट और सब पैगंबर और सब तीर्थंकर व्यर्थ हैं। महावीर से भी लोग पूछते हैं, बुद्ध से भी लोग पूछते हैं कि अगर होना है, वही होना है, तो आप समझा क्यों रहे हैं? किसलिए समझा रहे हैं?

मोहम्मद से भी अली पूछता है कि आप क्या कहते हैं?

अगर महावीर से पूछा होता अली ने तो महावीर ने जटिल उत्तर दिया होता। अगर बुद्ध से पूछा होता तो बड़ी गहरी बात कही होती। लेकिन मोहम्मद ने वैसा उत्तर दिया जो अली की समझ में आ सकता था। कई बार मोहम्मद के उत्तर बहुत सीधे और साफ हैं। अक्सर ऐसा होता है कि जो लोग कम पढ़े-लिखे हैं, ग्रामीण हैं, उनके उत्तर सीधे और साफ होते हैं। जैसे कबीर के, या नानक के, या मोहम्मद के, या जीसस के। बुद्ध और महावीर के और कृष्ण के उत्तर जटिल हैं। वह संस्कृति का मक्खन है। जीसस की बात ऐसी है जैसे किसी ने लट्ठ सिर पर मार दिया हो।

कबीर तो कहते ही हैं: कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ

लट्ठ लिए बाजार में खड़े हैं! कोई आए हम उसका सिर खोल दें!

मोहम्मद ने कोई बहुत मेटाफिजिकल बात नहीं कही।

मोहम्मद ने कहा, अली, एक पैर उठा कर खड़ा हो जा!

अली ने कहा कि हम पूछते हैं कि कर्म करने में आदमी स्वतंत्र है कि परतंत्र!

मोहम्मद ने कहा, तू पहले एक पैर उठा!

अली बेचारा एक पैर–बायां पैर–उठा कर खड़ा हो गया।

मोहम्मद ने कहा, अब तू दायां भी उठा ले।

अली ने कहा, आप क्या बातें करते हैं!

तो मोहम्मद ने कहा कि अगर तू चाहता पहले तो दायां भी उठा सकता था। अब नहीं उठा सकता।

तो मोहम्मद ने कहा कि एक पैर उठाने को आदमी सदा स्वतंत्र है। लेकिन एक पैर उठाते ही तत्काल दूसरा पैर बंध जाता है।

वह जो नॉन-एसेंशियल हिस्सा है हमारी जिंदगी का, जो गैर-जरूरी हिस्सा है, उसमें हम पूरी तरह पैर उठाने को स्वतंत्र हैं। लेकिन ध्यान रखना, उसमें उठाए गए पैर भी एसेंशियल हिस्से में बंधन बन जाते हैं। वह जो बहुत जरूरी है वहां भी फंसाव पैदा हो जाता है। गैर-जरूरी बातों में पैर उठाते हैं और जरूरी बातों में फंस जाते हैं।

साभार – (ओशोज्योतिष अद्वैत का विज्ञान)

 

सितम्बर 30, 2010

जरुरत है जरुरत है कबीर की

आज के भारत की सबसे बड़ी कमजोरी है किसी भी ऐसी शख्सियत की गैर-मौजूदगी, जो कि पूरे भारत के जन-मानस को प्रभावित कर सके। जो किसी भी पक्ष का न हो बस मानवता का हो। राजनीति के क्षेत्र से तो आशा करना ही मूर्खता है कि ऐसा कोई व्यक्तित्व उपज पायेगा अगले दस बीस सालों में भी क्योंकि राजनीतिक रुप से तो देश अगले कम से कम पच्चीस सालों तक बँटा हुआ रहेगा।

अध्यात्म के क्षेत्र से ही किसी ऐसी भरपूर धार्मिक शख्सियत उभर सकती है जो देश को और मानवता को दिशा दे सके।

अयोध्या पर कोर्ट ने ऐसा निर्णय दिया है जो लगभग सभी पक्षों की राजनीति खत्म कर देगा। कितना ही तड़पड़ायें अयोध्या के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले पर अब बहुत बड़ी राजनीति इस मुद्दे पर कोई भी नहीं चला पायेगा। वे माहौल को बिगाड़ना चाहेंगे आखिरकार उनके रुतबे का साम्राज्य खत्म होने जा रहा है।

पर अयोध्या या ऐसे मुद्दे तो बहुत छोटे सरोकार हैं और भारत में धार्मिक सदभाव और सामजिक एकता बनाये रखने के लिये ऐसे नेतृत्व का होना बहुत जरुरी है जो हर धर्म के मानने वालों को समान अधिकार से दिशा दे सकें और अगर लोग गलत राह पर जा रहे हों तो उन्हे डाँट सकें। ऐसे नेतृत्व की जरुरत है जो सभी धर्मों की कमजोरियों की तरफ बिना किसी भय या पक्षपात के इशारा कर सकें।
भारतीय इतिहास में समय समय पर ऐसे सामाजिक नेता हुये हैं। कबीर ऐसे महान व्यक्तियों में बहुत ऊँचे स्थान पर विराजते हैं।

उनके वचनों को पढ़कर, सुनकर लगता है कि हिन्दू-मुस्लिम तनाव उनके समय में भी अस्तित्व में आता रहता था और दोनों वर्ग एक दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में लगे रहते थे।
कबीर ने दोनों वर्गों को उनकी कमजोरियाँ दिखायी हैं। वे दोनों वर्गों को डाँटते हुये कहते हैं।

अरे इन दोऊन राह न पाई
हिन्दू अपने करै बड़ाई गागर छुअन न देई।
वेश्या के पायन तर सौवे, यह देखो हिन्दुआई।
मुसलमान के पीर औलया, मुरगी मुरगा खाई।
खाला केरी बेटी ब्याहे घरहि में करहिं सगाई।

कबीर समय समय पर हिन्दू और मुसलमान, दोनों वर्गों को चेताते रहे और बताते रहे कि दोनों धर्मों के लोग कर्मकांड के घेरे में फँसे हुये हैं और धर्म के नाम पर पाखंड अपनाते हैं।

हिन्दुओं को उन्होने चेताया कह कर

पाहन पूजे हरि मिले
तो मैं पूजौ पहार

और मुसलमानों को शीशा दिखाना चाहा कह कर

काँकर पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दै, बहरा हुआ खुदाय।

कबीर ने अपने जीवन से और अपने ज्ञान से बखूबी सिद्ध किया है कि धार्मिक होने का, अध्यात्मिक होने का धर्म के पाखंड के सामने दंडवत होने से कोई सम्बंध नहीं है। एक व्यक्ति पूरी तरह धार्मिक और अध्यात्मिक हो सकता है और वह जीवन भर मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा और सिनेगॉग आदि से पीठ करे रह सकता है।

कबीर कटाक्ष करते हैं हिन्दू और इस्लाम धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों पर।

न जाने तेरा साहब कैसा?
मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या साहब तेरा बहरा है?
चींटी के पग नेबर बाजै, सो भी साहब सुनता है।
बहुतै देखे पीर औलिया, पढ़े किताब कुराना
कह हिन्दू मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहमाना।

आधुनिक दौर में कबीर जैसे ही किसी अस्तित्व की जरुरत है।

यह कबीर का ही माद्दा था कि वे राजतंत्र में राजा के ऊपर भी कटाक्ष करने से नहीं हिचकिचाये।

राजा देश बड़ौ परपंची, रैयत रहत उजारी,
इतते उत, उतते इत रहु, यम की सौढ़ सवारी,
घर के खसम बधिक वे राजा,
परजा क्या छोंकौ, विचारा।

भारत ने सब कुछ राजनीति (धार्मिक और सामाजिक) से अपनी जीविका चलाने वालों के हाथों में छोड़ दिया है और इस व्यवस्था ने भारत की बहुत बड़ी हानि की है। भारत के लोग केवल अपना और अपने परिवार का हित देखने वाले नेताओं के पिछलग्गू बन कर रह गये हैं। राजनीतिक गुटबंदियों के कारण लोग गहन और सच्चे मित्रों से भी अलगाव करने से नहीं बाज आते।

भारत को पुनर्जागरण की जरुरत है और जनता को यह काम खुद ही करना होगा। बुद्धिमान, ईमानदार और चेतन जनता के प्रतिनिधि नेता भी बुद्धिमान, ईमानदार और चेतनाशील होंगे। मूर्ख, दुष्ट, भ्रष्ट नेता तब अपने आप हाशिये पर चले जायेंगे।

भारत की सांस्कृति और अध्यात्मिक चेतना की विरासत बुद्ध, कबीर, जैसी मेधाओं के हाथों में रही है। बहुत पतन हो चुका है भारत का और इसके लोगों का। अब तो यही कहा जा सकता है

अपने ही हाथों में पतवार सँभाली जाये
तब तो मुमकिन है कि ये नाव बचा ली जाये।

और एक एक व्यक्ति जाग जाये इस जागरण के लिये कबीर जैसे प्रकाश पुंज की जरुरत आज के समय को है।

…[राकेश]

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