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फ़रवरी 1, 2014

जीवन रस की हर बूँद पी लेना : संत सिद्धार्थ

जीवन हमें मिलता है तो इसलिए नहीं कि हम मौत के साये में जीकर जीवन के पलों को व्यर्थ कर दें या मौत का इन्तजार करें कि एक दिन वह आयेगी इसलिए उसे रोकने के साधन जुटा लें| मौत आनी है एक दिन यह बोध होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक इसलिए है कि एक दिन मौत आकर जीवन को अपने साथ ले जायेगी इसलिए जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना बेहद जरूरी है| मौत के सत्य का बोध इसलिए नहीं कि उसके आने के भय में जीवन को बच बच कर जीने लगें, जो करना चाहते हैं उसे कल पर टालने लगें|

जीवन के हर पल को सघनता से जीना, हर पल को जीने में अपने अंतस के गहनतम तल तक की उर्जा लगा देना तभी पूर्णता की अनुभूति होगी और किसी भी बात में अटकने से बच जाओगे| जीवन का हरेक पल का एकमात्र लक्ष्य है मनुष्य को अनुभूति देकर उसके पार पहुंचाना|

ऊर्जा को बचाने वाले कंजूस का जीवन मत जीना, न ही पलों को संजोकर रखने वाले जमाखोर का जीवन जीना| कुछ अच्छा करने की इच्छा बलवती हो जाए तो उसे कर गुजरना क्योंकि केवल करने से ही उसे समझ पाओगे, उसके पार हो पाओगे अगर दमन करते रहोगे, कल परसों पर बात को टालते रहोगे तो चेतनता पर इच्छाओं का बोझ लदता चला जाएगा और जब जाने का मौक़ा आएगा तो उस समय बेहद दरिद्र जीवन जीकर मौत के चंगुल में जाने का भाव सारे जीवन की व्यर्थता की पीड़ा को और घनीभूत कर देगा| जब जाना हो तो इच्छाओं की स्लेट एकदम कोरी हो, यही शर्त है श्रेष्ठ तरीके से जीवन जीने की|

तुम्हे पहाओं पर चढ़ना है, तैरना सीखना है, गीत गाना सीखना है, वाद्ययंत्र बजाने सीखने हैं, चित्रकला सीखनी है, मूर्ति बनाना सीखना है, कोई खेल विशेष खेलना है, कहीं यात्रा पर जाना है, विभिन्न स्थान देखने हैं,एक कविता,कहानी,उपन्यास, या किताब लिखनी है, या कुछ भी सीखना है, तो ऐसी सब इच्छाओं की पूर्ती करने के प्रयास ही एकमात्र रास्ता  है| इन्हें टालना मत क्योंकि नहीं पता कि फिर इन रास्तों से गुजरने का मौक़ा मिले न मिले| मौत जब दस्तक दे तो उसके सामने गिडगिडाने की जरुरत न पड़े कि अभी तो यह रह गया था वह रह गया था करने से|

मौत हमारे हाथ की बात नहीं पर जीवन कैसे जियें यह पूरी तरह से हमारे वश में है| बच्चों को देखते हो कैसे जो वे करना चाहते हैं उसे करने में पूरी तल्लीनता से मगन हो जाते हैं बस वही तो कुंजी है जीवन जीने की जिसे बड़े होते होते सब लोग कहीं खो देते हैं और फिर जीवन भर दुख से भरे रहते हैं कि यह नहीं कर पा रहे, वह नहीं कर पा रहे| नौकरी और व्यवसाय के कारण सब छुटा जा रहा है, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ छुटा जा रहा है| जब करने की इच्छा सच्ची हो तो उसे करने का वक्त भी निकल जाता है| हो सकता है गले गले तक जिम्मेदारियों में डूबे हुए हो पर तब भी समय और ऊर्जा निकालना उन कामों को करने के लिए जिन्हें करना चाहते हो केवल अपने लिए, अपने अंतर्मन को आनंद पहुंचाने के लिए|

जरूरी नहीं कि हर काम में औरों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए प्रयास किये जाएँ और जब तक ऐसा न लगे कि अच्छा स्तर पा लिया है तब तक काम शुरू न किया जाए| बहुत बार ऐसा होता है कि सपने पाल लिए जाते हैं कि अगर ऐसा न करके वैसा करते जो जीवन कुछ और ही होता| जिस मार्ग को चुनना चाहते थे उस पर अब चलना शुरू करके देखो| ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की देखादेखी उस मार्ग पर चलने की इच्छा बलवती हुयी थी| अपने मन की सच्ची संतुष्टि और आनंद के लिए कामों को करो| जीवन में ऐसा हल्का महसूस करने लगोगे जैसा पहले कभी नहीं किया| बोझ हटाओ उन सब बातों का जिनका दमन किया है, या जिन्हें कर नहीं पाए हो| जितना संभव हो उन्हें करने का प्रयास करो|

जीवन को जी लोगे तो मौत के भय का कोई अर्थ नहीं रह जाता वह अटल सत्य की तरह आयेगी पर तब वह तुम्हारी दमित इच्छाओं को साथ नहीं लेकर जायेगी|

जाते समय कोरे कोरे जाओ इससे बेहतर योगदान धरती पर तुम नहीं दे नहीं सकते|

सारे अध्यात्मिक संदेशों में महत्वपूर्ण है यह बात कि – जीवन को जियो!

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नवम्बर 17, 2013

मृत्युंजय कोई नहीं धरा पर : संत सिद्धार्थ

नहीं नहीं नहीं !karna-001

मृत्युंजय कोई नहीं है धरा पर,

कभी भी नहीं हुआ,

कभी हो नहीं सकता|

जो जन्मा है

वह मरेगा अवश्य|

जन्म और मृत्यु

दो मुख हैं एक ही अटल सत्य के, एक के बिना दूसरा नहीं|

इसे चाहे लम्बाई में समझ लें तो ये दो सिरे हैं और चाहे गोलाई में मान लें तो एक दूजे में गुथी हुयी दो परतें हैं|

एक कथा कहता हूँ तुमसे| महाभारत की है|

कर्ण की वीरता के सच का बोध अर्जुन को करा कर कृष्ण मरणासन्न कर्ण के पास ब्राह्मण वेष में पहुँच दान माँग और मनचाहा दान पाकर  अर्जुन को कर्ण की दानवीरता का भव्य प्रदर्शन भी दिखा चुके थे|

कर्ण के सामने अपने असली रूप में आकर कृष्ण ने कर्ण से उसकी अंतिम इच्छा पूछी|

मरणासन्न पर चेतन कर्ण ने कृष्ण से कहा,”मेरी मृत देह का संस्कार अदग्धा भूमि पर किया जाए|

कृष्ण बोल उठे,”ऐसा ही होगा”|

कथा कहती है कि कर्ण के मरणोपरांत कृष्ण उसके पार्थिव शरीर को लेकर सारे संसार में घूम आए पर हर जगह, धरती ने उन्हें एक ही जवाब दिया,

“अदग्धा भूमि! वह कैसे मिल सकती है? आप तो ज्ञानी हैं, आपने कैसे ऐसा वचन दे दिया? आरम्भ से ही मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते आए हैं और जब तक जीवन है तब तक वे मृत्यु के  शिकार होते ही रहेंगे| अमर कोई नहीं है| ऐसे में अदग्धा स्थल के बारे में कल्पना करना भी असंभव है|”

कहते हैं, कृष्ण ने अपनी हथेली पर कर्ण का दाह संस्कार किया|

कृष्णकर्ण कथा के द्वारा धरती, और यहाँ मनुष्य से सम्बंधित जन्म और मृत्यु के चक्र को सुपरिभाषित किया गया है|

मनुष्य संत हो या शैतान, मृत्यु से परे नहीं है|

मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता|

पर मृत्यु के भय पर उसे विजय प्राप्त करनी होती है…करनी ही होती है|

इस सच के बोध को कभी धूमिल न होने दें| यही सच जीवन में बड़े सच की ओर यात्रा करवा पाने में सहायक सिद्ध होता है|

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

अगस्त 10, 2011

भ्रष्टाचार की परिभाषा

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
जंग लड़ने से पहले
स्पष्ट करना होगा
भ्रष्टाचार का अर्थ
तय करनी होगी इसकी परिभाषा
ताकि भूखा, नंगा और
खुले आसमान के नीचे
सोने वाला इन्सान कहीं
भ्रष्टाचार के अर्थ की
गिरफ्त में न आ जाए
और यदि ऐसा हुआ तो
प्रकृति-रुप सत्य पर भी
लग जाएगा प्रश्नचिन्ह
क्योंकि
भूखा, नंगा और बेघर व्यक्ति
यदि दिन रात मेहनत कर
रोटी, कपड़ा और मकान न कमा पाया
तो होगा सत्य-प्रकृति और
उसके अंश इन्सान पर
घोर अन्याय क्योंकि
रोटी, कपड़ा और मकान
इन्सान की वह कुदरती जरूरत है
जो उसे शरीर मिलने के साथ मिली है
शरीर प्रकृति का अंश है
शरीर टूटेगा तो
प्रकृति-नियम के प्रति
अन्याय होगा क्योंकि
शरीर प्रकृति है
भूखे नंगे और बेघर इन्सान को
इन्सान ही रहने दो
मेहनत करने का उसका हक
और मेहनत करके
कमाए जाने वाले
रोटी, कपड़ा और मकान को
उससे छिनने का प्रयास न करो
वर्ना वह डाका डालेगा और
चोरी भी करेगा
और तुम उसे भी
भ्रष्टाचारी कहोगे क्योंकि
तुमने अपने समर्थन में
जोड़ना है हर व्यक्ति
ताकि बड़ी भीड़ में
तुम्हे कोई आसानी से पहचान न सके
लेकिन याद रखो कि
भूखा. नंगा और बेघर आदमी
अपना शरीर तो बेच सकता है
अपनी आत्मा नहीं
कभी नहीं
वह बिके हुए शरीर होते हुए भी
तुमसे लाख दर्ज़े अच्छा है
क्योंकि उसने अभी तक भी
तुम्हारी तरह अपनी आत्मा नहीं बेचीं
और यह भूल जाओ कि
प्रकृति नियम
तुम्हारी भ्रष्टाचारी के रुप में
पहचान करने में असमर्थ होंगे
प्रकृति में
भूख और वासना का स्वरुप
स्वतः निर्धारित है
और तुम्हारा निर्दयी अन्त
तुम्हारी अपनी ही वासना से होगा
सत्य हमेशा सत्य ही रहेगा
क्योंकि भूख सत्य है
वासना नहीं
और तुम आज भी
हारे हुए हो
और कल भी
क्योंकि तुम वासना यानि
असत्य के रास्ते पर हो
और असत्य की हमेशा
हार होती है और
सत्य की हमेशा जीत !

(अश्विनी रमेश)

अगस्त 4, 2011

वह जो है

वह जो है
तुम्हारा सच्चा और प्रियमित्र
तुम्हारे मन के दरवाज़े को
रोज खटखटाता है
अर्धचेतन होकर अर्धनिद्रा में
सोए हुए की तरह
जब तुम अचानक जागते हो
और दरवाज़ा खोलते हो
तो बाहर तुम्हे लगता है कोई नहीं
फिर झट से तुम
दरवाज़ा बंद कर देते हो
वह सच्चा मित्र है न
इसलिए उसको तुम्हारी
इस उपेक्षा का कोई क्षोभ नहीं होता
कभी वह तुमसे रूठता नहीं
इस विश्वास के साथ कि
कभी तो तुम उसे
खोजने का प्रयास करोगे
वह तुम्हे जानता है
मगर तुम उसे नहीं जानते
फिर भी सच्चा मित्र है
अपने कर्तब्य को
इसलिए निभा रहा है कि
कभी तो तुम
उस पर विश्वास करोगे
वह तुम्हे
तुम्हारी उदासी में
व्याकुलता में
अवसाद में
साहस बंधाकर
सदैव तुम्हे प्रसन्न देखना चाहता है
लेकिन तुम हो कि
तर्क देकर हर समय
यह साबित करने में तुले हुए हो कि
वह कोई नहीं है
होता तो, तुम्हे दिखता
तुम्हारी आँखे धोखा नहीं खा सकतीं
तुम्हारे आँख, कान, नाक आदि
समस्त इन्द्रियाँ खुलीं हैं
फिर ये धोखा कैसे खा सकतीं हैं
बस तुम्हारे साथ यही विडम्बना है कि
तुम अपनी आँख अथवा कान आदि
इन्द्रियों का देखा सुना
सच मान बैठते हो
और अपने मन पर
यह दबाव बनाते हो कि
जो तुमने देखा, सुना है
वही तुम्हारे लिए सत्य है
बाकि तुम्हारे लिए सारा झूठ है
यदि आँख का देखा ही सच है तो
ऊँची दिवार के पीछे क्या चीज़ रखी है
यह तो तुम्हे दिखाई नहीं दे रहा
जो दिखाई ही नहीं दे रहा
अथवा कभी दिखाई ही नहीं दिया
मन भी उसकी कल्पना कैसे कर सकता है
यदि तुमने शिमला कभी देखा ही नहीं तो
शिमला कैसा है
इसकी कल्पना भी तो तुम नहीं कर सकते
तो क्या दीवार के पीछे जो घट रहा है अथवा
तुम्हारे सामने खड़ा व्यक्ति क्या सोच रहा है
अथवा क्या महसूस कर रहा है
वह सच इसलिए नहीं है कि
वह तुम्हारी आँख नहीं देख रही है
बस यही तो है कि
तुम्हारी आँख खुली होते हुए भी
नहीं देख सकती
और जो देख सकती है
वह क्योंकि सीमित है इसलिए समग्र सच नहीं
और मन भी वही कुछ तो सोच  सकता है
कभी तुमने आँख, कानादि इन्द्रिओं से
देखा सुना आदि हो
इसलिए तुम सहज ही
यह जान लो कि
तुम्हारी आँखों देखा भी सच नहीं है
जो कभी भी, कहीं भी
अंदर और बाहर घट रहा है
वही मिलाकर सच है
अब तो कम से कम
जब वह दरवाज़ा खटखटाए तो
उसकी उपेक्षा न करना
उसे अंदर, बाहर सब जगह ढूढना
अपने सच्चे और प्रिय मित्र से
दिल से खूब मिलना
इस आनंदमयी अहसास से फिर
तुम्हारा जीवन सफल हो जाएगा
तुम्हारा सच्चा और प्रिय मित्र
जो तुम्हे सदैव चेताता था
आखिर
तुम्हे आज मिल गया
हाँ वह ‘जो है’
वही तो ‘है’
जो तुम्हारी अपनी आत्मा है !

(अश्विनी रमेश)

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जुलाई 23, 2011

कल और आज

अब कोई चरवाहा
बाँसुरी की सुरीली तान पर
प्रेम गीत नहीं गाता
और न ही कोयल कूकती
चिड़िया भी बहुत कम चहचहाती है
घर की चहेती गाय
जिसका दूध कई पीढ़ियों तक
अमृत पान की तरह पिया
उसके  ढूध न देने के बाद
उसे बेकार समझकर
सडकों पर आवारा घूमने
धक्के और डंडे खाने के लिए
बेसहारा छोड़ दिया
अब कोई बच्चा भावुकता भरे स्वर में
माँ को
अम्मा कहकर नहीं पुकारता
अब खेत में स्वस्थ लहलहाती फसलें नहीं
कीटनाशकों को पीने वाली
नशीली फ़सलें उगती हैं
गांव में बड़े बूढ़ों की
अब कोई चौपाल नहीं बैठती
जिसमे कभी
सुख दुःख की बातें हुआ करती थीं
अब तो घर में
बूढ़ों को बोझ समझकर
बच्चे भी उनको धक्के मारते हैं
और कुत्ते की तरह
उनको दूर से रोटी फेंकते हैं
और जवान ये सब
मौन होकर देखतें हैं
ये सब देखकर
मेरे मन में
बस रोज यही सवाल
घूमता है कि
ये इन्सानियत की नयी उन्नति है
या फिर
उपभोक्तावाद की लादी हुयी बेबसी
कुछ भी हो
मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं कि
शरीर ढ़ोया जा रहा है
या फिर
जीवन धीरे धीरे बेमौत मर रहा है
यदि उपभोक्तावाद से बेबस व्यक्ति
केवल शरीर ढ़ो रहा है
और चेतना कहीं
अंधकार के गर्त में खो गयी है
तो यही कहना होगा कि
उपभोक्तावाद की इस भयानक आंधी में
यदि तुम चेतना के
दीपक की लौ अपने घर के अंदर भी
जलाए रख सको तो भी
सत्य तुम्हे इस साहस के लिए भी
दुगुनी हिम्मत, ताकत देगा
और तुम यह हिम्मत कर बैठोगे कि
तुम्हे शरीर ढोने वाली
उधार की ज़िंदगी नहीं
बेशक दिन में कुछ पलों के लिए ही सही
मानवीय संवेदना वाली
कुदरत की दी हुई
स्वाभाविक ज़िंदगी जीनी है!

(अश्विनी रमेश)

मई 30, 2010

गुलजार साब ने चेतन भगत को सीख दी

लेखक चेतन भगत को वर्तमान समय के उन भाग्यशाली सितारों में गिना जा सकता है जिन्हे कला के क्षेत्र में उनकी योग्यता से कहीं ज्यादा सफलता मिल जाती है। फिल्मी दुनिया में ऐसा हमेशा से होता रहा है परन्तु गाहे बेगाहे लेखन की दुनिया में भी ऐसा देखने को मिल जाता है। उनके लेखन पर फिल्मों का असर बहुत ज्यादा है और वे इसी विचारधारा के साथ लिखते भी दिखाई देते हैं कि उनके लिखे हुये पर फिल्म बनेगी। अपने लिखे में विजुअल्स के तत्व का मुलम्मा चढ़ाने में कोई बुराई नहीं है। पर वे ऐसा कतई नहीं लिखते या अब तक ऐसा कतई नहीं लिख पाये हैं जिससे कि उन्हे मिली केवल आर्थिक सफलता और प्रसिद्धि के आधार पर ही अच्छे लेखकों और कवियों की जमात में शामिल कर लिया जाये।

ऊँट कभी कभी पहाड़ के नीचे आ भी/ही जाता है और ऐसा ही चेतन के साथ हो गया। आजकल कुछ भी कहीं भी कभी भी बोलने का फैशन हो गया है और चेतन को तो शशि थरुर जैसे लेखकों की संगत में भी देखा जा सकता है सो उन्हे इस बात की गलतफहमी हो जाना स्वाभाविक है कि वे विद्वान भी उच्च कोटि के हैं और अब वे कुछ भी कहीं भी और कभी भी कह सकते हैं और दुनिया उन्हे मौन होकर सुनेगी।

चेतन की प्रसिद्धि के कारण उन्हे आजकल कई कार्यक्रमों में देखा जाने लगा है। इस बार गलती से वे गुलजार साब को छेड़ बैठे। एक कार्यक्रम में चेतन गुलजार साब के बारे में बोलते हुये  कह गये,” मुझे गुलजार साब द्वारा लिखा गया गाना कजरारे कजरारे बहुत पसंद है, क्या पोएट्री है उसमें“।

उन्होने तो यह ऐसा दिखाने के लिये किया होगा कि वे पोएट्री की समझ रखते हैं या आजकल जैसा कि लोग एक दूसरे की तारीफ करके सम्बंध मधुर बनाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं और सोचते हैं कि ऐसा करके वे अपने लेखन आदि की स्वीकृति भी सबसे ले लेंगे, ऐसा ही कुछ उन्होने भी किया होगा। उन्होने सोचा होगा कि शशि थरुर आदि लेखकों को जीतने के बाद अब वे गुलजार साब के किले में भी प्रवेश कर सकते हैं। परन्तु उनका मिठास भरा प्रयास गुलजार साब को हत्थे से उखाड़ गया और नाराज होकर उन्होने माइक्रोफोन मांगा और उसी समय कहा,”चेतन मुझे खुशी है कि आपके जैसे लेखक को गाना पसंद आया पर मुझे नहीं लगता कि उसमें उपस्थित कवित्त भाव को आप समझ पाये हैं जैसा कि आप यहाँ सबके सामने दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं। पर अगर आप जोर देंगे तो मैं आपको उस गाने की दो पक्त्तियाँ सुनाता हूँ और आप मुझे उनका मतलब बता दें“।

तेरी बातों में किमाम की खुशबू है
तेरा आना भी गरमियों की लू है
“।

चेतन हक्के बक्के रह गये गुलजार साब की ऐसी स्पष्टवादिता का स्वाद चखकर। गुलजार साब ने आगे उनसे अनुरोध किया।
कृपया उसके बारे में बोलें जिसके बारे में आपको जानकारी है। जिस बात के बारे में आपको जानकारी नहीं है उसके बारे में बोलने का प्रयत्न न करें“।

आजकल हर बात मैनेजमेंट के अंतर्गत मानी जानी लगी है और ऐसा माना जाने लगा है कि सब चलता है और सब कुछ अपने प्रबंधन से मैनेज किया जा सकता है और कला का क्षेत्र भी इस बीमारी से अछूता नहीं रह पाया है।

आधी अधूरी जानकारी और कला के क्षेत्र में थोड़ी बहुत दखलअंदाजी के बलबूते लोग दुनिया इस आधार पर फ़तेह करने निकल पड़े हैं कि वे अपनी व्यवहारकुशलता और सामने वाले की तारीफ करके सब सम्भाल लेंगे।

ऐसा भी संभव है कि ज्यादातर लोग गुलजार साब को ही दोषी ठहरायें और कहें कि कि ऐसे चेतन भगत को टोका जाना गलत था पर उनका भड़क जाना एक सूक्ष्म किस्म के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रयास है

कोई दो तीन साल पहले लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप ने अपने एक ब्लॉग में गुलजार साब से जुड़ी एक रोचक घटना का जिक्र किया था।

सत्या बनाये जाते समय निर्देशक राम गोपाल वर्मा और उनकी टीम, जिसमें अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला आदि भी शामिल थे, ने महसूस किया कि गुलजार साब द्वारा लिखे गये एक गाने के दो प्रकारों में से पहले वाला ज्यादा उपयुक्त्त लगता है।

गुलजार साब ने पहले लिखा था “ग़म के नीचे बम लगा के ग़म उड़ा दे” और बाद में उन्हे लगा कि “गोली मार भेजे में” ज्यादा अच्छा है।

तय किया गया कि अनुराग ही गुलज़ार साब को यह बताने की जहमत उठायेंगें कि “ग़म के नीचे बम” वाला गीत ज्यादा अच्छा है।

अपनी नादानी में जैसे ही अनुराग ने कहा कि ” सर गम काम नहीं करता “ गुलजार साब ने उन्हे टोक दिया,” बरखुरदार पहले ग़म को ढ़ंग से बोलना तो सीख लो“।

अनुराग लिखते हैं कि बस मैं तो विचार विमर्श से एकदम बाहर ही हो गया उसके बाद। वे आगे लिखते हैं,” शुक्र है भगवान का कि उन्होने गोली मार भेजे वाले संस्करण पर जोर दिया। क्या गाना बना था वो“।

आशा है अनुराग कश्यप की तरह चेतन भी इस घटना को इसके सही परिपेक्षय में लेंगे और इसे अपनी मानहानि का मुद्दा न बना कर इससे कुछ सीखने की कोशिश करेंगे।

डिस्क्लेमर : गुलजार साब और चेतन भगत वाले मामले को छ्पी रिपोर्टस के आधार पर कोट किया गया है।

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