Posts tagged ‘Yamuna’

जुलाई 14, 2015

आनंद स्वतः होने में है, लालसा से करने में नहीं – ओशो

osho dancing

अकबर ने एक दिन तानसेन को कहा, तुम्‍हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा ख्‍याल उठता है कि तुम जैसा गाने वाला शायद ही इस पृथ्‍वी पर कभी हुआ हो और न हो सकेगा। क्‍योंकि इससे ऊंचाई और क्‍या हो सकेगी। इसकी धारणा भी नहीं बनती। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्‍हें विदा किया था, और सोने लगा तब अचानक ख्‍याल आया। हो सकता है, तुमने भी किसी से सीखा है, तुम्‍हारा भी कोई गुरू होगा। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं। कि तुम्‍हारा कोई गुरू है? तुमने किसी से सीखा है?

      तो तानसेन ने कहा, मैं कुछ भी नहीं हूं गुरु के सामने; जिससे सीखा है। उसके चरणों की धूल भी नहीं हूं। इसलिए वह ख्‍याल मन से छोड़ दो। शिखर? भूमि पर भी नहीं हूं। लेकिन आपने मुझे ही जाना है। इसलिए आपको शिखर मालूम पड़ता हूं। ऊँट जब पहाड़ के करीब आता है, तब उसे पता चलता है, अन्यथा वह पहाड़ होता ही है।
तानसेन ने कहा कि मैं गुरु के चरणों में बैठा हूं; मैं कुछ भी नहीं हूं। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्‍यता भी हो जाए, तो समझूंगा बहुत कुछ पा लिया।
      तो अकबर ने कहा, तुम्‍हारे गुरु जीवित हों तो तत्‍क्षण, अभी और आज उन्‍हें ले आओ। मैं सुनना चाहूंगा। पर तानसेन ने कहा: यही तो कठिनाई है। जीवित वे है, लेकिन उन्‍हें लाया नहीं जा सकता हे।
      अकबर ने कहा, जो भी भेट करना हो, तैयारी है। जो भी। जो भी इच्‍छा हो, देंगे। तुम जो कहो, वहीं देंगे। तानसेन ने कहा, वही कठिनाई है, क्‍योंकि उन्‍हें कुछ लेने को राज़ी नहीं किया जा सकता। क्‍योंकि कुछ लेने का प्रश्‍न ही नहीं है।
अकबर ने कहा, कुछ लेने का प्रश्‍न नहीं है तो क्‍या उपाय किया जाए?
तानसेन ने कहा, कोई उपाय नहीं, आपको ही चलना पड़ेगा।
अकबर ने कहा,मैं अभी चलने को तैयार हूं।
तानसेन ने कहा, अभी चलने से तो कोई सार नहीं है। क्‍योंकि कहने से वह गायेंगे नहीं। ऐसा नहीं है वे गाते बजाते नहीं है। तब कोई सुन ले बात और है। तो मैं पता लगाता हूं, कि वह कब गाते-बजाते है। तब हम चलेंगे।
      पता चला—हरिदास फकीर उसके गुरू थे। यमुना के किनारे रहते थे। पता चला रात तीन बजे उठकर वह गाते है। नाचते हे। तो शायद ही दुनिया के किसी अकबर की हैसियत के सम्राट ने तीन बजे रात चोरी से किसी संगीतज्ञ को सुना हो। अकबर और तानसेन चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठ गये। पूरी रात इंतजार करेने के बाद सुबह जब बाबा हरिदास ने भगती भाव में गीत गया और मस्‍त हो कर डोलने लगे। तब अकबर की आंखों से झर-झर आंसू गीर रहे थे। वह केवल मंत्र मुग्ध हो कर सुनते रहे एक शब्‍द भी नहीं बोले।
      संगीत बंद हुआ। वापस घर जाने लगे। सुबह की लाली आसमान पर फैल रही थी। अकबर शांत मौन चलते रहे। रास्‍ते भर तानसेन से भी नहीं बोले। महल के द्वार पर जाकर तानसेन से केवल इतना कहा,”  अब तक सोचता था कि तुम जैसा कोई भी नहीं गा बजा सकता है। मेरा भ्रम आज टुट गया। अब सोचता हूं कि तुम हो कहां। लेकिन क्‍या बात है? तुम अपने गुरु जैसा क्‍यों नहीं गा सकते हो?”
      तानसेन न कहा, बात तो बहुत साफ है। मैं कुछ पाने की लिए बजाता हूं और मेरे गुरु ने कुछ पा लिया है। इसलिए बजाते गाते है। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्‍य है। जो मुझे मिले उसमें मेरे प्राण है। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो पाते। बजाते-गाते समय में सदा अधूरा रहता हूं। अंश हूं। अगर बिना गाए-बजाए भी मुझे वह मिल जाए जो गाने से मिलता है तो गाने-बजाने को फेंककर उसे पा लुंगा। गाने मेरे लिए साधन है। साध्‍य नहीं। साध्‍य कहीं और है—भविष्‍य में, धन में, यश में, प्रतिष्‍ठा में—साध्‍य कहीं और है। संगीत सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्‍मा नहीं बन सकता; साध्‍य में ही आत्‍मा का वास होता है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाए, तो साध को छोड़ दूँ अभी। लेकिन नहीं मिलता  साधन के बिना, इसलिए साधन को  खींचता हूं। लेकिन दृष्‍टि और प्राण और आकांशा ओर सब घूमता है साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे है। संगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी है जिसे पाने को वह गा-बजा रहे हे। बल्‍कि पीछे कुछ है। वह बह रहा है। जिससे उनका संगीत फूट रहा है। और बज रहा है। कुछ पा लिया है, कुछ भर गया है। वह बह रहा है। कोई अनुभूति, कोई सत्‍य, कोई परमात्‍मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है। पैमाना छलक रहा है आनंद का। उत्‍सव का।
      अकबर बार-बार पूछने लगा, किस लिए? किस लिए?
      स्‍वभावत: हम भी पूछते है। किस लिए? पर तानसेन ने कहा,नदिया किस लिए बह रही है? फूल किस लिए खिल रहे है? चाँद-सूरज किस लिए चमक रहे है? जीवन किस लिए बह रहा है?
      किस लिए मनुष्‍य की बुद्धि ने पैदा किया हे। सारा जगत ओवर फ्लोइंग है, आदमी को छोड़कर। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा है। सारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहे। खिलनें का आनंद है। सूर्य निकलता है। निकलने में आनंद है। पक्षी गीत गा रहे है। गाने में आनंद है। हवाएँ बह रही है, चाँद-तारे,आकाश गंगाए चमक रही है। चारों तरफ एक उत्सव का माहौल है। पर आदमी इसके बीच कैसा पत्थर और बेजान सा हो गया है। आनंद अभी है, यही है, स्‍वय में विराजने में है अपने होने में है। अभी और यही। अकबर ने पूछा तब हम उसे कैसे पाये। क्‍या करे जो आपके गुरु को मिला है। उनके गायन में उनके नृत्य में। कुछ अभूतपूर्व था। कुछ प्रसाद था। जो मैंने अभी तक नहीं देखा।
(गीता दर्शन,भाग-1, अध्‍याय 1-2)
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जनवरी 7, 2015

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं…

पुरखों की कसम खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

आर्य, शक, हूण, मंगोल, मुगल, अंग्रेज,

द्रविड़, आदिवासी, गिरिजन, सुर-असुर

जाने किस-किस का रक्त

प्रवाहित हो रहा है हमारी शिराओं में

उसी मिश्रित रक्त से संचरित है हमारी काया

हाँ हम सब वर्णसंकर हैं।

पंच तत्वों को साक्षी मानकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र, कावेरी से लेकर

वोल्गा, नील, दजला, फरात और थेम्स तक

असंख्य नदियों का पानी हिलोरें मारता है हमारी कोशिकाओं में

उन्हीं से बने हैं हम कर्मठ, सतत् संघर्षशील

सत्यनिष्ठा की शपथ लेकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

जाने कितनी संस्कृतियों को हमने आत्मसात किया है

कितनी सभ्यताओं ने हमारे ह्रदय को सींचा है

हज़ारों वर्षों की लंबी यात्रा में

जाने कितनों ने छिड़के हैं बीज हमारी देह में

हमें बनाए रखा है निरंतर उर्वरा

इस देश की थाती सिर-माथे रखते हुए कहता हूँ

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

बुद्ध, महावीर, चार्वाक, आर्यभट्ट, कालिदास

कबीर, ग़ालिब, मार्क्स, गाँधी, अंबेडकर

हम सबके मानस-पुत्र हैं

तुम सबसे अधिक स्वस्थ एवं पवित्र हैं

इस देश की आत्मा की सौगंध खाकर कहता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं!

हम एक बाप की संतान नहीं

हममें शुद्ध रक्त नहीं मिलेगा

हमारे नाक-नक्श, कद-काठी, बात-बोली,

रहन-सहन, खान-पान, गान-ज्ञान

सबके सब गवाही देंगे

हमारा डीएन परीक्षण करवाकर देख लो

गुणसूत्रों में मिलेंगे अकाट्य प्रमाण

रख दोगे तुम कुतर्कों के धनुष-बाण

मैं एतद् द्वारा घोषणा करता हूँ-

कि हम सब हरामज़ादे हैं

हम जन्मे हैं कई बार कई कोख से

हमें नहीं पता हम किसकी संतान हैं

इतना जानते हैं पर

जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं

हम उस राम के वंशज नहीं

माफ़ करना रामभक्तों

हम रामज़ादे नहीं!

हे शुद्ध रक्तवादियों,

हे पवित्र संस्कृतिवादियों

हे ज्ञानियों-अज्ञानियों

हे साधु-साध्वियों

सुनो, सुनो, सुनो!

हर आम ओ ख़ास सुनो!

नर, मुनि, देवी, देवता

सब सुनो!

हम अनंत प्रसवों से गुज़रे

इस महादेश की जारज़ औलाद हैं

इसलिए डंके की चोट पर कहता हूँ

हम सब हरामज़ादे हैं।

हाँ, हम सब हरामज़ादे हैं।

(मुकेश कुमार , मीडियाकर्मी)

मई 20, 2014

कैसे हो द्वारकाधीश?… बोली राधा

radhakrishnaस्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण,
प्रसन्नचित सी राधा…

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई…

इससे पहले
कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल उठी…

कैसे हो द्वारकाधीश?

जो राधा
उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से
द्वारकाधीश का संबोधन
कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी
किसी तरह
अपने आप को संभाल लिया…

और बोले राधा से,
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है…
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो…

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी…

बोली राधा,
मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई
ना कोई आंसू बहा…
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते…

इन आँखों में
सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे…

प्रेम के
अलग होने पर
तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको?

कुछ कडवे सच,
प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा
इस तरक्की में
तुम कितने पिछड़ गए?

यमुना के
मीठे पानी से
जिंदगी शुरू की
और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए?

एक ऊँगली पर
चलने वाले सुदर्शन चक्र पर
भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए?

कान्हा
जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी,
प्रेम से अलग होने पर
वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी?

सुदर्शन चक्र उठाकर
विनाश के काम आने लगी!

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ?

कान्हा होते
तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता!

युद्ध में और प्रेम में
यही तो फर्क होता है!

युद्ध में
आप मिटाकर जीतते हैं
और
प्रेम में
आप मिटकर जीतते हैं!

कान्हा
प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है,
पर किसी को दुःख नहीं देता !

आप तो
कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया ?
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया !

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था
जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे!

आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर, हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे !

आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं !

गीता में
मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर

” राधे राधे” करते है..!

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